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Tuesday, July 28, 2026

  भाई जी 

      सादर चरण स्पर्श ! 

      भाई जी ! उस दिन से हम बहुत तनाव में हैं |रिसर्च संबंधी काम को पूरा करने के लिए हमने दिवाली  तक का समय लिया था | सोचा था कि इससे शायद काम आगे बढे किंतु वो पूरा काम अस्त व्यस्त हो गया है | इसलिए  घर के बँटवारे वाले बिषय को हम पहले निपटा लेना चाहते हैं| ये ज्यादा जरूरी है | अपने रिसर्च वाले काम को हम बाद में देख लेंगे |  
   मैं पूरा प्लॉट एक साथ बनवाना चाहता था | अंदर फिर जैसा अच्छा लगता वैसा कर लिया  जाता ,किंतु स्वास्थ्य कारण से ऐसा किया जाना संभव नहीं हो पाया | कथा प्रवचन बंद करना पड़ा | विवाह कर्मकांड पूजा पाठ  आदि रोकने पड़े |इससे हमारे आर्थिक स्रोत धीरे धीरे कमजोर होते चले गए | रिसर्चकार्य में भी  सरकारी सहयोग न मिल पाने के कारण वह काम भी बीच में ही रुका हुआ है | उसके साथ ही साथ  मेरे जीवन के सारे कार्य रुके हुए हैं |इसलिए मैं जैसा करना चाहता था वैसा करने में  सफल नहीं हुआ |आगे कब क्या हो पाएगा पता नहीं | 
   इन्हीं सभी समस्याओं से घिरा होने के कारण तनाव काफी बढ़ा हुआ है | इसीलिए बीपी बढ़ जाता है |  पिछले 6 महीनों में बीपी बढ़ने के कारण चक्कर आने से कई बार गिर चुका हूँ | अभी एक दिन कुमुद की परीक्षा दिलाने गया था तो मुख भर गिर गया था | नाक मुख फूट गया था | काफी खून गिरा था | इसलिए अभी कहीं आने जाने से डर लगता है | वहाँ आने की अभी मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही है | हमारे सहारे इस काम को  लेट न करो | प्लॉट बांटना है बाँट लो|  आधा तुम बना लो | आधा हमारा पड़ा रहने दो | हमारी जब जैसी परिस्थितियाँ बनेंगी | हम भी तब तैसा कर लेंगे | 
    प्लॉट के बँटवारे के बिषय में मेरी राय है कि पूरे प्लॉट को खड़ा खड़ा बाँट लो ताकि दोनों प्लाटों का मेन गेट  दक्षिण दिशा वाले चौड़े रोड पर खोला जा सके | पीछे वाले गेट का लाभ दोनों प्लॉटों को मिले इसलिए गुप्ता के बराबर बराबर 8 या 10 फिट की गैलरी बना लेनी चाहिए ताकि आवागमन दोनों प्लॉटों का दोनों तरफ से होता रहे | 
 इसके बाद बीच से बराबर बराबर दो टुकड़े कर लो | तुम चाहो तो पूरब का शत्रुघ्न सिंह की तरफ वाला आधा बनवा लो, चाहो तो पश्चिम की तरफ वाला बनवा लो | तुम्हें जैसा ठीक लगे वैसा कर लो |
    हमारे लिए जिस तरफ छोड़ना वो बता देना शायद किसी से बात करनी पड़े तो उसी हिसाब से कर लेंगे |हमारी यदि कोई व्यवस्था नहीं हुई तो संभव है कि  दिल्ली का फ़्लैट बचाने के लिए उसे निकालना पड़े | गुप्ता जी के 80 लाख रुपए उधार वाले चुकाना पड़ेंगे !रहने के लिए कुछ व्यवस्था तो करनी ही पड़ेगी | 
     इसलिए हमारे वहाँ आने का इंतिजार न करो |मेरे आने में अभी न जाने कितना समय और लग जाएगा पता नहीं |मेरा जब जैसा स्वास्थ्य और समय साथ देगा तब तैसा कर लेंगे | बंटवारे के लिए हमारा इंतजार न करो आगे ईश्वरेच्छा | 
आपका अनुज -
 
डॉ.शेष नारायण वाजपेयी  

 
 
 
 
 
 वैसे भी स्वास्थ्य कारण से ऐसा किया जाना संभव न हो पाया | कथा प्रवचन बंद करना पड़ा | विवाह कर्मकांड पूजा पाठ  आदि रोकने पड़े |इससे हमारे आर्थिक स्रोत धीरे धीरे कमजोर होते चले गए | मैं जैसा करना चाहता था वैसा करने में  सफल नहीं हुआ |  इस इन्तजार में अभी कितना समय और लग जाएगा पता नहीं |
 
 
 
 इसके बाद तुम चाहो तो दोनों में से कोई भी बनवा लो | हमें अभी रहना नहीं है | तुम चाहो तो पूर्वी भाग व्यवस्थित है| उसे बनवाने में समय और खर्चा कुछ कम लगेगा | वही बनवा लो | जल्दी तैयार हो जाएगा | बाकी जैसा उचित लगे | मेरी एक राय और है | घर बनवाओ लेकिन हिस्सा बाँट पर यहाँ से गाँव तक कहीं चर्चा न हो तो अच्छा है | किसी को सफाई देने की आवश्यकता ही क्या है | 
    भाई जी |  तुम्हारे लिए हम जैसे पहले थे वैसे ही आज हैं | तुम्हें व्यवस्थित करने के लिए कभी पैसा नहीं देखा है | आज भी कोई समस्या नहीं है | अम्मा के दिए हुए संस्कारों पर हम आज भी अडिग हैं | हमारे तुम्हारे बीच कोई तीसरा हस्तक्षेप करे | ये ठीक नहीं है | हर किसी को अपनी अपनी सीमाएँ समझनी चाहिए | जो हमें निरंतर तनाव ही देता आया हो | हमारे सपर्पण में केवल कमियाँ निकालता रहा हो | हमारी संघर्ष पूर्ण परिस्थिति समझने की कभी कोशिश ही न की हो | ऐसे किसी सदस्य की बात सहना हमारे लिए संभव नहीं है |भले वो घर का ही सदस्य क्यों न हो |यहाँ सुरभि की माँ को भी ये अधिकार नहीं है कि वे तुम्हारे बिषय में कोई टिप्पणी करें | ऐसी ही मैं उनसे अपेक्षा करता हूँ | 
  हमारे पास भी अपना तनाव कम नहीं है |तुम यहाँ दो मकान की बात कर रहे हो | इन गलत सूचनाओं का किसी के पास कोई प्रमाण नहीं है | अफवाह कोई कुछ भी फैलावे | सच्चाई ये है कि वो फ्लैट अपना करने के लिए उन्हें कम से कम  80 लाख देने पड़ेंगे | पिछले 5 वर्षों से हम उनका कोई काम कर नहीं पा रहे हैं | अभी गुप्ता जी को फालिस मार गई थी | अब उन्होंने उन फ्लैटों का निपटारा करने को कहा है |  पैसे मेरे पास हैं नहीं और न ही आमदनी के स्रोत है साल में दस पाँच पूजा मिल जाती हैं | उनसे ये कर्जा चुका पाना संभव नहीं है | इसलिए ये सोचना कि हम परेशानी उठा रहे हैं | दूसरा राज्य कर रहा होगा | ये ठीक नहीं दूसरे की भी परिस्थितियाँ समझनी चाहिए | यही सफाई देते देते थक गया तब मैंने वहाँ जाना बंद कर दिया था | झूठी अफवाहें किसी के बिषय में फैलाई जाएँगी | कोई कैसे और कब तक सहेगा | 
      इसलिए यदि इस रिसर्च कार्य में जल्दी कोई सफलता नहीं मिल जाती है तो  इस फ्लैट को बचाने के लिए हमें वहाँ का प्लाट निकालना होगा या फिर वहाँ व्यवस्था करने के लिए इस फ्लैट को बेंच कर जो पैसे हमें मिलेंगे | उससे वहाँ रहने की व्यवस्था देखनी होगी | बच्चों का काम काज करने के लिए बनवाना तो पड़ेगा | यहाँ अधिकाँश पंजाबी समुदाय है |
    घुटने ख़राब हो रहे हैं | वजन अधिक है | चलने में दिक्कत होती है |पूजा पाठ कराने कहीं जाता नहीं हूँ | कथा प्रवचन करता नहीं हूँ | घर चलाने के लिए जो अनुष्ठान मिल जाते हैं | उसी के सहारे रहना पड़ता है | मेरे जीवन की सभी योजनाएँ बच्चों की पढ़ाई रोजी रोजगार काम काज आदि हमारा सभी कुछ उसी रिसर्च की सफलता पर टिका हुआ है | ईश्वर जाने आगे क्या होगा |आज भी  उस अनुसंधान के लिए मैं दिन में 10 -10 घंटे परिश्रम करता हूँ | हमारी फाइलें 7 अभी भी मंत्रालयों में जमा हैं |पता नहीं उनका कब नंबर आएगा | यदि सरकार इसे स्वीकार करती है तो हमारे इस काम की सार्थकता है ,अन्यथा ये जीवन ऐसा ही बीता जा रहा है |
       

 
 
 
इसमें काफी काम है | पीछे के गेट का लाभ दोनों प्लॉटों को मिले | इसलिए पीछे 8-10 फिट चौड़ी गली छोड़ दी जाए ताकि दोनों प्लॉटों का आवागमन दोनों तरफ से बना रहे |  यदि पैसों की कोई व्यवस्था नहीं हो पाती है और यहाँ का फ्लैट बचाने के लिए हमें वहाँ का प्लॉट बेचना ही पड़ता है तो ऐसा कर लेंगे |80 लाख रुपए उन्हें देना होगा | इसलिए मैं वहाँ का घर अभी नहीं बनवा पाऊँगा |  बच्चों की पढ़ाई के लिए भी पैसे चाहिए | अभी स्वास्थ्य भी साथ नहीं दे रहा है | 
     
            

 
                                           
                                           भाई जी ! कभी समय मिले तो ये भी पढ़ना !
 
    अपने घर में जब नाई कूदे थे तब मैं कुछ करने लायक नहीं था 15 सौ का पंखा हम नहीं ला पाए थे | घर की स्थिति इतनी खराब थी ही |  उस समय खेतों की लागत भी बाहर से जब पैसे आते थे तब लग पाती थी | उस स्थिति में जिस किसी तरह से प्लॉट हुआ | हमारे विवाह के लिए तुमने कहा प्लाट बन जाता तो वहीं से करते | पैसे थे नहीं एक लाख की कमेटी डालकर पहले बाउंड्री की व्यवस्था की फिर 1 लाख की कमेटी डालकर 72 हजार में उठाई | उससे घर बना फिर भी कुछ कम पड़े 10 हजार तुमने व्यवस्था करके उसे पूरा किया | विवाह वहाँ से नहीं हुआ ये और बात है | वे सभी लोग 
      बाहर के कुछ विवाह संबंध काफी अच्छे थे किंतु हमारी परिस्थितियाँ उस लायक नहीं थीं | इसलिए हमारा विवाह  जैसा हुआ वो हमारी परिस्थितियों की दृष्टि से अच्छा रहा | अन्यथा हमारा उन बिगड़ी परिस्थितियों में साथ देना हर किसी के लिए संभव न था | इन 25  वर्षों में मैंने उनके लिए दो चार धोती ही खरीदी हैं | वो उसी समय खरीदी हैं जब घर जाना आना था | इन 25  वर्षों में मैंने अपने लिए कभी कोई कुरता पजामा नहीं ख़रीदा | तुमने कई बार खरीदने या बनवाने के लिए कहा भी था लेकिन  मैं अपने को उस लायक नहीं बना पाया | जूते चप्पल कभी अच्छे नहीं खरीदे | दूसरों के दिए हुए कपड़ों से ही हमारा और उनका काम चलता रहा | यहाँ तक कि वहाँ घर में कोई जरूरत लगी तो और मेरे द्वारा पूरी करनी संभव हो सकी तो मैंने उसके लिए प्रयत्न किया | यहाँ जैसे तैसे काम चल गया | तुम्हें स्वास्थ्य की दिक्कत लगी दाँत में दिक्कत हुई तो यथा संभव तुरंत व्यवस्था की जबकि अपने को दिक्कत हुई तो महीनों चलती रही | ये हम आपके प्रति स्नेह है | ऐसा यहाँ हमें जानने वाले सभी लोग अभी भी मानते हैं | 
     वहाँ बच्चों की पढ़ाई चल रही थी !ट्यूशन भी चल रहा था | उस पर खर्चा होता ही था | व्यापार में यहीं से पैसे लगाने होते थे | ज्यादातर पैसा ब्याज पर लेकर लगाना होता था ,जब कोई अनुष्ठान मिलता था तब उस कर्ज को चुका पाते थे | पैसे की व्यवस्था न होने के कारण ही मुझे सुरभी कुमुद की पढ़ाई बीच में ही रोक कर उनका एडमीशन  सरकारी विद्यालय में करवाना पड़ा था | ये तुम्हें भी पता है कि पहले दोनों चिंतपूर्णी मंदिर के पास प्राइवेट स्कूल में जाती थी | वहाँ साल में 11 हजार रुपए देने पड़ते थे | वो बोझ हम नहीं उठा सके थे | आज भी निगम विद्यालयों में मजदूर भी अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते हैं  |  जब हमने एडमीशन करवाया था तब सुरभी की माँ कई दिन तक रोती रहीं थीं | उन्होंने कहा था कि हम सब परेशानी उठा लेंगे हमारे बच्चे निगम में न डालो | पैसे न होने के कारण मैं उनकी बात नहीं रख सका | दिवाली में घर गए भाभी फिर फिर वही बात बोलने लगीं यहाँ इतनी परेशानी उठाते हैं तुम लोग वहाँ राज करते हो | इनकी उनकी लड़ाई होने लगी | तुम्हें भी बीच में कुदा दिया गया | तुमने भी गिनाना शुरू कर दिया तुम्हारे लिए हमने जिंदगी बर्बाद कर दी | तुम्हें पढ़ाया लिखाया न जाने कितने एहसान गिनवाने लगे | हमारी परिस्थिति न समझने के कारण ऐसे विवाद तैयार किया जाता था | जिससे बचा जा सकता था | 
   तुम जब होता है वो बातें बोलने लगते हो जिनसे मैं मुझे कोई विशेष  लाभ नहीं हुआ तुम कहते हो कि मैंने  तुम्हारे लिए जिंदगी बर्बाद कर दी | तुम्हें पढ़ाया लिखाया | होली दीपावली में हम भी घर आते थे एक एक महीने रुककर खेती का काम करवाते थे |एक बार खेतों की  बोआई हो जाती थी तब जाते थे एक बार कटाई हो जाती थी तब जाते थे | साथ साथ पूरा काम करवाते थे | जो फसलें होती थीं उनके बेचने खर्चने की मलकियत तुम्हारे पास थी | इसलिए हमें पढ़ने जाना था तो तुम्हें ही पैसे देने थे | उससे सन 1986 तक मुझे भी डेढ़ सौ रुपए महीने दिए जाते रहे | लगभग 5 हजार रुपए दिए गए | मेरे जनेऊ विवाह में कोई पैसा घर का खर्च नहीं हुआ | मेरी किसी हैरानी परेशानी में घर से कोई मदद नहीं मिली | 1999 में मुझे लीवर की ज्यादा दिक्क्त हो गई थी | घर इलाज कराने ही आया था | तब तुमने कहा इलाज कराओ हम खेत बेच देंगे | मैं चुप चाप वापस दिल्ली लौट गया | वहाँ लोगों ने मदद की स्वस्थ हुआ | अब तुम कहो कि तुम्हारे लिए जिंदगी बर्बाद कर दी | तुम्हें पढ़ाया लिखाया | ये सुनकर भाभी को लगता है तुमने वास्तव में बहुत कुर्बानी  की है ,जबकि ये वो भी देखती रही हैं | 1989 से 2000 तक तुम्हारा स्वस्थ ही सही नहीं रहा | हमारी मदद क्या कर सकते थे | उन्हीं खेतों के पैसों से  तुमने 10 हजार की भैंस ली | तुम्हारा जनेऊ विवाह हुआ | इस सब पर खर्च होता रहा | हमारी पढ़ाई पर उन्हीं खेतों के 5 हजार रुपए खर्च हो गए तो तुम हमें हमारे परिवार को कितना कोसते हो | आखिर कुर्बानी की क्या और कब की | 
      अम्मा की सेवा की बात करते हो !उन्होंने आते ही हमें मना कर दिया था  कि मैं नहीं कर पाऊँगी | तुम यहाँ  रहकर सेवा करो या बाहर ले जाओ | मैं यदि घर रुक जाता तो चिकित्सा के लिए तथा घर में खाने खर्चे के लिए खेतों की लागत के लिए पैसे नहीं होते थे | इसलिए अम्मा ने हमसे कहा था कि तुम हमें हमारी परिस्थिति पर छोड़ो | बाहर निकलो कुछ करो तब मैं पहली बार दिल्ली गया था | तुमने सेवा की तो मैं भी बाहर से जो पैसा लाता था  | उससे घर चलता था खेती की लागत लगती थी | अम्मा की दवा होती थी | 
      इसलिए अपना अपना कर्तव्य हर कोई कर रहा था | इसमें कोई किसी पर न तो एहसान कर रहा था और न ही उसके लिए अपना जीवन बर्बाद कर रहा था | 
     तुमने खुद आगे बढ़ने के लिए काम प्रयास नहीं किए | तुम्हारे पीछे पीछे हम अम्मा भी लगे रहे | सन 1980 से 1984 तक मुन्ना के चक्कर में पढ़कर  तुम परेशान होते रहे हम दोनों भी परेशान होते रहे | कर्जा बहुत हो चुका था | 1984 में तुम्हें अम्मा ने आलू गाड़ने को रोका तुमने हमसे कहा अबकी और गाढ़ लेने दो नहीं हुआ तो हम नौकरी करने चले जाएँगे | आलू फिर बिगड़ा कर्जा बढ़ ही चुका था तो तुम नौकरी करने चले गए | 1989 से 2000 क्या उसके बहुत बाद तक तुम स्वास्थ्य से ही परेशान रहे | हमारे लिए जिंदगी कब लगा दी कब अपने को बर्बाद कर लिया | 
     मैं अम्मा थीं तभी घर से निकल चुका था | तभी से कमा रहा था उसी से घर चलता था खेतों में लागत लगती थी कभी तुमसे पूछता था | खेतों में क्या कुछ मिला तो तुम साफ कह देते थे कि खेतों में कुछ हुआ ही नहीं | आज तक जब जब पूछा तब तब यही कहते रहे |व्यापार में भी हम पैसा लगाते दिन दिन भर परिश्रम करते | कुर्बानी तुमने हमारे ऊपर की जिंदगी तुमने हमारे लिए लगाई है | आखिर कब !यही झूठा इतिहास उन्हें पढ़ाया है | इसलिए वो भी बकवास करती हैं | उसमें सच्चाई नहीं है इसलिए हम मानते  इसलिए घर में कलह होता है उसके कारण तो तुम्हारे द्वारा फैलाया गया त्याग बलिदान का झूठ ही है | 
      ये सारा झूठ तुम्हारा और भाभी का हम उसे सहते इसलिए रहे कि हम कुछ दिन के लिए घर आए हैं | हम कलह का कारण न बनें | इससे तुम्हारा मनोबल बढ़ गया | तुम इतने निरंकुश हो गए कि हमें गालियाँ देने लग गए | तुम्हारा बढ़प्पन ढो ढो कर हम कब तक गालियाँ खाते | इसलिए हमने घर जाना बंद कर दिया | 
 
     
  
विवाह के बाद पत्नी का निर्वाह न घर में नहीं हो पाया तो दिल्ली लाना मेरी मजबूरी थी | गुप्ता जी की पत्नी घर लेने की जिद कर बैठीं मेरे पास पैसे नहीं थे | पूजा में  उन दिनों घर लेने के लिए वे अच्छे पैसे दे देती थीं | जिससे उन्होंने मेरी कमेटी डलवाई | बाद में गुप्ता जी से 3 लाख रुपए उधार दिलाए तो घर हुआ | यदि ये घर न होता तो हम जो पूजा पाठ करवाकर पैसे कमाए व्यापार शुरू किया वो संभव न था |      
     इसके बाद मैं दिन भर गुप्ता जी के यहाँ किताबें करता था | जिसके प्रतिदिन वे 200 रुपए देते थे | किसी दिन नहीं भी देते थे | दिन भर वहाँ लग जाता था कुछ और कर भी नहीं पाते थे | इसी में कमेटी  देनी होती थी | घर भी चलाना था | इसलिए व्यापार में लगाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे | व्यापार उधार के पैसों से ही शुरू किया गया | ब्याज पर पैसे ले लेकर ही हर बार सामान भेजना होता था | कोई अनुष्ठान मिलता तो उससे वो कर्जा चुकाया जाता था | आज भी पूजा कहीं करने जाते नहीं हैं | कथा प्रवचन करते नहीं हैं | पैसे और आवें भी तो कहाँ से | दस बारह अनुष्ठान साल में यदि मिल भी जाते हैं तो उसमें क्या होता है | 
    तुम्हें याद होगा  सुरभी  कुमुद पहले चिंतपूर्णी मंदिर के पास प्राइवेट स्कूल में पढ़ने जाती थीं | साल में फीस और किताबों के साथ लगभग 11 हजार   रुपए देने पड़ते थे | इस कर्जे के कारण उन्हें वहाँ हटाकर MCD स्कूल में डालना पड़ा था | जिसके लिए उनकी मम्मी कई दिन रोती  रहीं थीं | इन स्कूलों में यहाँ कोई अपने बच्चों को नहीं पढ़ाता था | इसलिए हमें भी बुरा लगना स्वाभाविक था | मजबूरी में करना पड़ा था | उससे बेस कमजोर हो गया | पैसे के अभाव में हम ट्यूशन भी नहीं पढ़ा सके | इसलिए अभी भी शिक्षा में कुछ विशेष रौनक नहीं आ पाई है | 
      बच्चों से मेरा स्नेह था है और रहेगा | तुम लोगों से छिप कर भी मैं बउआ से बोलकर आता था | बेटा परेशान न होना  कुछ चाहिए तो मुझे बता देना मैं लेता आऊँगा | आज भी बच्चे मुझे बहुत प्यारे हैं | बेटियों के शादी विवाह की चिंता थी | इसलिए इन संघर्षों में  ही मैंने कमेटी डाल डालकर जो पैसे इकट्ठे किए | उनसे तीनों बेटियों के लिए 1,60 ,000 की बीमा की पॉलिसी ली थी कि इनके विवाह काम काज में कुछ सहयोग मिल जाएगा | उनमें से बिट्टी के नाम वाली तुम्हें दे दी थी | सुरभी कुमुद वाली दूसरे वाले फ्लैट  के समय तोड़नी पड़ गई थीं |
     बउआ का जब बीटेक में एडमीशन हुआ तुमने हमें पैसे जमा करने को कहा मुझे बहुत प्रसन्नता हुई क्योंकि बच्चे कुछ बनें इसीलिए मैं इतना संघर्ष करते आ रहा था | आज मेरा वो सपना पूरा हो रहा था | मैं भाग कर छोटू के यहाँ गया उनसे उतनी ही प्रसन्नता से पैसे जमा करवाए | उसके बाद जब वो पैसे तुमने हमारे एकाउंट में वापस किए तब बहुत तकलीफ हुई | उसके बाद मैं उस मोह को कम करने लगा ताकि दुबारा ऐसा बिचलन न हो | 
       जिन दो दो फ्लैटों की बात तुम बार बार करते हो | उनमें पुराना  फ्लेट  साढ़े 5 लाख का लिया था | जिसमें ढाई लाख मेरा लगा था 3 लाख  गुप्ता जी का लगा था | जो आज तक दिया नहीं गया है | फ्लैट  की कीमत बढ़ी आज वो बढ़ कर 20  लाख हो गया है | ये फ्लैट मुझे चाहिए तो ये 20  लाख रुपए मुझे देने होंगे |तब ये फ्लैट हमें मिलेगा | 
     नया वाला फ्लैट 1 करोड़ 20 लाख का है | उसमें 40 लाख मेरे लगे हैं | 80 उनके लगे हैं | आज जो बढे होंगे वे तथा उनके 80 लाख तो उन्हें देना ही होगा | तब वो फ्लेट हमें मिलेगा | मेरे पास पैसे नहीं हैं | बिना पैसे दिए वो फ्लैट हमारे कैसे हो गए | ऐसे कोई क्यों छोड़ देगा | 
    अभी तक उनकी किताबें कर देता था और कुछ सरकारी आफिसों में दौड़ धूप कर काम करा देता था तो वे पैसों के लिए भी कुछ नहीं कहते थे | कोरोना के समय से हमारा स्वास्थ खुद ख़राब रहने लगा | चक्कर ज्यादा आने लगा तो मैंने किताबें करने को भी मना कर दिया है | घुटनों में दर्द और सूजन होने के कारण अब उतनी भागदौड़ करना भी संभव नहीं रहा | इसलिए न अब उतने सरकारी संपर्क रहे और न ही उनके सरकारी काम काज ही करा पाता हूँ | 
     इसलिए उन्होंने पिछले दो वर्षों में 3 बार पैसों का इशारा किया था तो मैंने ये कहकर टाल दिया है कि जैसा चाहो वैसा कर लो | अभी मेरे पास पैसे नहीं हैं | अभी 4 महीने पहले गुप्ता जी को फालिस मार गई थी | अब कुछ ठीक हैं | अभी उन्होंने एक दिन बुलाया था | उनका कहना था कि उन फ्लैटों का जो कुछ करना है करके नक्की करो | कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा | मैंने कहा कुछ समय और चलने दो फिर देखते हैं |  बात टल गई आगे देखेंगे जब जो कुछ होगा | ऐसी स्थिति में  घर बेचें तो रहने की समस्या है | 1 करोड़ रुपए कैसे और कहाँ से दिए जाएँगे | ये तुम्हें भी पता है कि जब तुम यहाँ थे तब ऊपर वाले लाला से लड़ाई हुई थी तो लाला के कहने पर गुप्ता जीने तुरंत दखल दिया था | हमें बुलाया था  फिर भी तुम हमारे दो दो फ्लेटों की बात कर रहे हो | 
    हमारी आमदनी के साधन सीमित हैं | हम कहीं पूजा पाठ कराने जाते नहीं हैं  प्रवचन भी नहीं करते शादी विवाह नहीं करवाते | घर में करवाने के लिए जो पूजा मिल जाती हैं | वही हैं वे भी निश्चित नहीं हैं | ऐसी स्थिति में दो फ्लेट खरीदना हँसी खेल नहीं है | इतना आसान होता तब तो हर कोई खरीद लेता | ऐसी ही निराधार बातें घर में कही जाती थीं खुद गरीबत ओढ़ ली जाती थो तो घर में कलह होता था | जिसके लिए हमारी रईसत को दोष दिया जाता था | उन काल्पनिक बातों से कलह बढ़ता था | 
      हमने तो कभी ऐसी बातों पर ध्यान नहीं दिया | हमसे न जाने कितने लोगों ने कहा खेतों से हर साल पाँच छै लाख की कमाई हो जाती है | हमने कहा ये तो ठीक है |इससे भाई जी के हाथ मजबूत होते हैं | कुछ लोगों को लगा कि बंटवारा हो गया है तो खेत पटती पर लेने के लिए दो फोन आए | मैंने उनसे साफ कहा कि भाई जी देख रहे हैं उन्हीं से बात करो | आज तुम कह रहे हो अब खेती करलो हम तुम्हें दे रहे हैं |  आज घुटने हमारे चल नहीं रहे हैं |  
    घर में कलह जो होता रहा जिसके लिए तुम कह रहे हो कि हम वहाँ जाते थे और कलह करके चले आते थे | वो कलह हम नहीं करते थे | हमारे वहाँ न आने देने के लिए होता था | हमें घमंडी कलही सिद्ध करने के लिए हर प्रकार की किस्से कहानियाँ गढ़ी जाती थीं |हम तुम्हें पाकर घर आते थे | ऐसा अम्मा ने कहा था सुख दुःख में भाई जी के साथ रहना | जितना संभव हुआ हमने प्रयास किया जलती दिवाली में दीपक बुझाकर वहाँ उस आतिशबाजी के समय स्नेह से ही आते रहे | यहाँ 8 दिन के लिए हम उतनी दूर से आते थे | तुम्हें उतने दिनों के लिए भी समय नहीं होता था | तुम किसी न किसी बहाने गाँव या बाजार भेज दिए जाते थे | बच्चे स्कूल चले जाते थे | इसके बाद हमारे और बच्चों के खाने पीने के बिषय की कहानियाँ गढ़ी जाती थीं | जिनसे हमारा तुम्हारा विरोध बढ़े | ऐसे कलह के लिए मैं केवल वहाँ  घर समझकर आता रहा ये मेरा दोष है | सन 2008 में हमसे हमारा घर का हिस्सा उनके बड़े भाई को लिखने को कहा गया था | जिसकी शर्त थी कि मैंने उनसे ज्यादा पैसे न मागूँ और नकद न मागूँ | इसके लिए मैंने मना  कर दिया था | कोई बोले न बोले हमेंशा के लिए छोड़ दे | उसे खुश करने के लिए हम ऐसा कैसे कर सकते थे | 
       हमने बँटवारा या तुमसे किनारा करने को कभी सोचा ही नहीं था करना होता तो तभी कर लेते | ऐसा भी नहीं है कि मेरा घर से कोई लोभ था | जिस स्वार्थ पूर्ति के लिए हमने बँटवारा नहीं किया था | 1986 से 89 तक हमारी शिक्षा में जो पाँच छै हजार लगे हों | उसके अलावा आज तक मैंने घर से कुछ नहीं लिया है |हमारा जनेऊ हुआ नहीं | विवाह हमारे पैसों से हुआ |इस संघर्ष यात्रा में  कई बार मुझे बहुत परेशानी हुई फिर भी तुमसे कभी पैसे नहीं माँगे | मुझे लगता था कि घर में पैसे नहीं हैं | कभी घर में कुछ पैसे हैं यह जानकर भी नहीं ले जाता था कि दिल्ली में तो हमें उधार मिल जाएँगे | यहाँ आकस्मिक जरूरत पड़ी तो कहाँ से आएँगे | 
 
 
 
  
 
 
     उस बिगड़ी हुई परिस्थिति में भी घर में मुझे कोई आवश्यकता लगे या तुम्हें कुछ जरूरत लगे तो जितना अधिक से अधिक  कर पाता  था | वो करने का प्रयास करता था | हमारे उस संघर्ष पूर्ण प्रयत्न को हमारी रईसत से जोड़ा जाने लगा |        
      ईश्वर साक्षी ये संघर्ष मैं पूरे घर के लिए कर रहा था फिर भी हमारे ऊपर न जाने कैसे कैसे पैसे वाला होने के ताने कैसे जाते | इससे घर में कलह होता था |इसके लिए मुझपर मेरी पत्नी पर रईसत के घमंड का आरोप लगाया जाता था | एक ओर उसप्रकार की संघर्ष पूर्ण परिस्थिति और इतना घिनौना आरोप कलह होना ही था | जिसे दूसरा रूप दे दिया जाता था |कलह का कारण कुछ ऐसी  कुटिल काल्पनिक बातें होती थीं  | उन साजिशों षडयंत्रों से लाख प्रयास करने के बाद भी जो उन्होंने सोचा था वो कर लिया |     

             
   
 
 मैं बहुत संघर्ष पूर्ण जीवन जीता आ रहा हूँ | लेकिन किसी के दो पैसे की मैंने बेईमानी की है | आज भी वही स्थिति है |मैंने अपने को और अपने घर को कसा है | किसी के दो पैसे का गुनहगार नहीं हूँ |इसीलिए मेरे पास आज न तो धन है और न ही संपत्ति है | कल बार बार तुमने दो फ्लैटों की चर्चा की |
 
 
 

 
 
 
      

       

     92-99 तुम्हारी मंगल की दशा थी वो बहुत गंदा समय था | आमदनी की बात क्या कहें बीमारी के कारण तुहारा  एक एक दिन पार करना मुश्किल हो रहा था | घर में एक एक पैसे की परेशानी थी |अम्मा बीमार चल रही थीं |  हमें जब जो जहाँ से जितने पैसे मिल रहे थे | घर में झोंकते रहे फिर भी परेशानियाँ इतनी अधिक थीं कि घर जब जितने पैसे लाते थे | वे खर्च न हो जाएँ | उन्हें दोपहर में ही लेकर जमा करने तुम बैंक चले जाते थे |हमें  केवल किराया भाड़ा ही लेकर घर से निकल जाना पड़ता था | उसी समय नाइयों ने हमला किया | उस चुनौती से जूझने के लिए गाँव से बाहर रहने की व्यवस्था करनी थी | एक एक दिन में 18 -18 घंटे संघर्ष किया तब जो पैसे बने वे मकान खरीदने  में सहायक हुए | 40000 यहाँ से सीधे ब्याज पर लेकर बयाना दिया दिया था | 
      हमारी आर्थिक परिस्थिति इतनी खराब थी कि सुरभी की मम्मी ने आज तक उतनी ही धोती खरीदी हैं जितने बार बार घर भी ले गई हैं | उसके अलावा विवाह के बाद आज तक कोई नहीं | मैंने आज तक कोई कुरता पजामा इन 27 वर्षों में नहीं ख़रीदा | जो कपडे कहीं से मिले वही उन्होंने पहने और मैंने पहने | यही स्थिति आज तक चल रही है | जिसे जैसे भरोसा हो जो कसम खाना हो मैं खा सकता हूँ | ये सच्चाई है | जीवन में इतना अधिक संघर्ष था कि शुरू में इतने पैसे नहीं थे | जब इतने पैसे हुए भी कि कपडे ख़रीदे जा सकते थे | अब मैं इस लिए नहीं बना रहा हूँ कि मेरा काम जिस दिन सफल होगा तब बनवाएँगे  | उस दिन का इन्तजार पत्नी बच्चे सभी कर रहे हैं | बच्चों को स्कूल ड्रेस या थोड़े बहुत काम चलाऊ कपडे लिए जाते हैं | सं 1994 में बनारस में एक स्वेटर कथा में मिला था | सर्दियाँ उसी से कट जाती हैं | एक लेडीज छोटी साइकिल है बच्चों के लिए लाए थे | पिछले 4 वर्षों से मैं उसी से कहीं जाता आता हूँ | सामान लाता हूँ | 
    कुल मिलाकर जीवन बहुत संघर्षपूर्ण था इसी बीच तुमने कभी किसी सामान के लिए कहा या कोई जरूरत पड़ी तो उसमें जितने भी पैसे लगे उसका इन्तिजाम करके उसे पूरा किया | उससे यहां तनाव इसलिए हुआ कि यहाँ के लिए ऐसा क्यों नहीं करते और जब होली दिवाली वहां जाते तो वहाँ व्यंग कर करके ताने मारे जाते कि हम तो मर रहें तुम लोग मौज कर रहे हो | इसके आधार पर साजिशें रची जाती थीं किस्से कहानियां गढ़ी जाती थीं | वो वो सुविधाएँ थीं नहीं जिनका आरोप लगाया जाता था तो उन्हें बुरा लगता था कि जिस घरको अपना बताकर घर का एक एक पैसा झार कर दे दिया जाता कर्जा लेकर दे दिया जाता है | वहाँ आकर खाना बनाने खाने में बार बार ताने  मारे जाते हैं | दो कटोरी साम की सब्जी बच जाए तो उसमें 3 ग्लास पानी मिलाकर तुम्हें दिखा दिया जाता था देखो कितनी सब्जी बर्बाद हो रही है | तुम्हें लगता था वास्तव में ऐसा हो रहा है | ये मैंने देखा है 
    सन  2008 में हमसे कहा गया कि हमारी पटरी सुरभि की मम्मी के साथ नहीं खाएगी | हमने पूछा वो तो खिलानी पड़ेगी | तुम्हें भी सुधारना पड़ेगा उन्हें भी सुधारना पड़ेगा | हमसे कहा गया तुम अपना हिस्सा बेच दो | हमने कहा उससे पटरी खा जाएगी इसकी क्या गारंटी !बोलीं खा जाएगी | हमने पूछा कैसे !कहती हैं हमारे भतीजे को भाई जी बहुत चाहते हैं | बड़े भैया से भी उनकी पटरी खाती है | इसलिए उन्हें ही बेच दो | लेकिन उनसे ज्यादा पैसे मत माँगना और सब नगद मत माँगना | हमने मन लेने के लिए पूछा कि फिर मैं कैसे खरीदूंगा | कहती हैं तुम्हारे पास तो पैसा हैं | ले लेना फिर भैया से धीरे धीरे लेते रहना | इस प्रकार से हमें पैसे वाला सिद्ध किया जाता रहा है | बात बढ़ती थी तो तुम्हारे सामने कोई और कहानी गढ़कर पेश की जाती थी | जिसका उससे संबंध ही नहीं होता था | इससे उत्तेजित होकर तुम लड़ना शुरू करते थे | ये बातें खुद हमारे साथ बीती हैं | ऐसी साजिशों को हम सह रहे थे |तुम कह रहे हो यहाँ आके ऊट पटांग बक कर चले जाते थे | मैंने आना छोड़ दिया | 
    आज तुम्हीं हमें चोर बदमाश नीच नालायक  कह रहे हो | किस आधार पर मैंने किसकी क्या बेईमानी की है किसके साथ गद्दारी की है | मैंने किसे क्या धोखा दिया है | किसके साथ क्या नीचता की है | तुम कहते हो हमारी जिंदगी बर्बाद कर दी | हमारे लिए ऐसा क्या किया जिसमें मेरे लिए तुम्हारी जिंदगी बर्बाद हो गई | तुम 1980 से 1984 तक मुन्ना घर वालों के कहे  चलते रहे | मुन्ना धोखा देते रहे ! खेत धोखा देते रहे |काम हम भी करते रहे अम्मा भी लगी रहीं | कर्जा हो गया तुम नौकरी करने गए  | उसमें हमारी पढ़ाई कहाँ से आ गई | तुम 1989 में फिर आए उन्हीं मुन्ना के कहने से तुमने भैंस खरीदी | तुम्हारे ऐसे गलत निर्णयों का  नुक्सान हम तीनों उठाते रहे | उसके लिए संघर्ष सबको करना पड़ता था | उस समय खेती में हम बराबर साथ देते  थे | होली दिवाली में महीनों यहाँ रुककर  काम समाप्त कर ही जाते थे | ये नुक्सान करेने का अधिकार केवल तुम्हारा ही नहीं था | हमारे जनेऊ विवाह में  एक पैसा लगा नहीं  | 1999 में हमारा स्वास्थ्य खराब हुआ तुमने कहा कहीं इलाज कराओ | जरूरत पड़ी तो कहे बेच देंगे | अगले दिन उन्होंने हमसे कहा कि अपने खेत बेचकर इलाज करा लो |भाई जी ने इसमें गलत क्या कहा है | मैं कुछ नहीं बोला दो दिन बाद मैं दिल्ली आया | यहाँ दवा ली उससे जो लाभ हुआ सो हुआ |
   वो घर मेरा भी था मुझे 1986 नवंबर से 1989 तक डेढ़ सौ रुपए महीने घर से जाते रहे | उसके लिए उसके लिए तुम और भाभी हमेंशा  ताना दिया करते हो | हमने पढ़ाया लिखाया | तुमने भी  तो उसका खर्च किया है | 
 
 
 
अगर मेरे भाई हो तो तुम्हें हमारी सौगंध है | तुम्हारा धर्म है हमारे दुर्गुणों से हमें अवगत कराओ |
 
ऐसे ही खाने पीने से संबंधित जब तुम दिल्ली आते थे तब सबसे साथ खाने पीने में कुछ अच्छा कर लेना चाहते थे | यही जब हम घर आते थे तब भी ऐसा कर लेते थे | घर में किसी सामान की आवश्यकता देखते तो उसे पूरी करने का प्रयास करता | हमारे ऐसे आत्मीय व्यवहार से ये कहानी गढ़ी गई कि मेरे पास न जाने कितना पैसा है तुम हमें नहीं पता कि तुम्हें कैसे लगता है कि मेरे पास बहुत पैसा है |
 

 नी ऊपर से पूरे घर का बोझ आमदनी का कोई स्रोत नहीं था |

 
संघर्ष कम नहीं था | ईश्वर ने मदद की |   
 
तुमसे व्यापार के लिए कभी कोई सामान बोला मुझी कितने भी ब्याज पर पैसा लेना पड़ा मैंने लिया और सामान भेजा | 
 
    तुमने कहा हमारे जीवन को पूरा बर्बाद कर दिया है  

सारे जीवन मैंने बहुत संघर्ष किया है जिसका एहसास केवल मुझे है या मुझे जो लोग देख रहे हैं | कोई न समझे तो न समझे | जिसका मेरे जीवन के प्रति कोई योगदान ही न रहा हो | उसका समझना भी आवश्यक नहीं है | 

 भाई जी !तुम्हें स्थापित करने के लिए मुझे जहाँ जब जो करना पड़ा है किया है | आगे भी करते रहेंगे | ये जिम्मेदारी मुझे अम्मा ने दी थी | उसका मैं जब जिस लायक रहूँगा आजीवन  निर्वाह करता रहूँगा | इसीलिए मैं बंटवारा करने वहाँ जाकर हम अपने उस त्याग को छोटा नहीं करना चाहते | बँटवारे के बिषय में तुम या बउआ जो निर्णय लेना चाहते हो लो और बनवाओ | 
 
जिस बटवारे के लिए तुम हमें बुला रहे हो |भरोसा हो तो कहकर देखो  
 
                                       बउआ आज भी बउआ कहे तुम कहो हमसे न भी कहो  अपने आप से निर्णय लो 
 

 

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