पूर्वानुमान लगाने की तीन वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ
मौसम पूर्वानुमान लगाने की तीन प्रक्रियाएँ हैं |पहली प्रक्रिया में
भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को न सफलता मिलती है और न ही सुख ! विवाह, विद्या ,मकान, दुकान ,व्यापार, परिवार, पद, प्रतिष्ठा,संतान आदि का सुख हर कोई अच्छा से अच्छा चाहता है किंतु मिलता उसे उतना ही है जितना उसके भाग्य में होता है और तभी मिलता है जब जो सुख मिलने का समय आता है अन्यथा कितना भी प्रयास करे सफलता नहीं मिलती है ! ऋतुएँ भी समय से ही फल देती हैं इसलिए अपने भाग्य और समय की सही जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए |एक बार अवश्य देखिए -http://www.drsnvajpayee.com/
पूर्वानुमान लगाने की तीन वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ
मौसम पूर्वानुमान लगाने की तीन प्रक्रियाएँ हैं |पहली प्रक्रिया में
महामारी विज्ञान की खोज BOOK
मौसम से महामारी या महामारी से मौसम
कोरोना महामारी में जनधन का बहुत बड़ा नुक्सान हुआ है | इतना उन्नत विज्ञान है विद्वान वैज्ञानिक हैं और निरंतर अनुसंधान चला करते हैं | इसके बाद भी कोरोना महामारी में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के संक्रमित होने और मृत्यु होने का कारण था | विद्वान वैज्ञानिकों के द्वारा महामारी को समझा क्यों नहीं जा सका | महामारी की किसी भी लहर का सही अनुमान पूर्वानुमान आदि क्यों नहीं लगाया जा सका | चूक आखिर कहाँ हुई !यह खोजना होगा |
कोरोनामहामारी के समय मौसम दिनोंदिन बिगड़ता जा रहा था | मार्च अप्रैल तक वर्षा होती रहती थी | बार बार भूकंप आ रहे थे | वायुप्रदूषण बहुत अधिक बढ़ा हुआ था | सितंबर महीने में मई जून जैसी गरमी पड़ रही थी |इसी समय महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ता जा रहा था | ऐसी स्थिति में ये समझना कठिन होता जा रहा था कि मौसम महामारी के कारण बिगड़ रहा है या कि मौसम के कारण महामारी बढ़ रही है |
वैज्ञानिकों ने बताया कि महामारी आने एवं संक्रमण बढ़ने घटने का कारण मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाएँ होती हैं |ऐसी परिस्थिति में महामारी के लिए मौसमसंबंधी जिन घटनाओं को जिम्मेदार बताया जा रहा था | महामारी को समझने के लिए मौसमसंबंधी उन घटनाओं को समझा जाना अधिक आवश्यक हो गया |उन्हीं के आधार पर महामारी को सही सही समझा जा सकेगा |
इसी प्रकार से वैज्ञानिकों के एक वर्ग ने बताया कि महामारी संबंधी संक्रमण का प्रभाव महामारी पर पड़ता है | ऐसी स्थिति में बढ़ने घटने पर तापमान बढ़ने घटने का प्रभाव पड़ता है | इस बात पर विश्वास किया जाए तो महामारी को समझने के लिए तापमान को समझना पड़ेगा | महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने घटने के लिए तापमान बढ़ने घटने को जिम्मेदार मानना पड़ेगा | महामारी के बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए तापमान बढ़ने घटने के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना पड़ेगा |
ऐसे ही वैज्ञानिकों के एक वर्ग का मानना था कि महामारी वायुप्रदूषण के प्रभाव से महामारी बढ़ती है यदि ऐसा माना जाता है तो महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने का कारण वायुप्रदूषण को मानना पड़ेगा | महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने घटने के लिए वायु प्रदूषण बढ़ने घटने के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना पड़ेगा |
इसी प्रकार से यदि वर्षा बाढ़ या आँधीतूफानों का प्रभाव महामारी संबंधी संक्रमण पर पड़ता है तो वर्षा बाढ़ या आँधीतूफानों आदि के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाकर उन्हीं पूर्वानुमानों के आधार पर महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना पड़ेगा |
इस प्रकार से महामारी को समझने के लिए हमें मौसम को समझना होगा | महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने का कारण तापमान से संबंधित है या वायुप्रदूषण से संबंधित है अथवा वर्षा बाढ़ आदि मौसमसंबंधी घटनाओं से संबंधित है | इन तीनों प्रकार की घटनाओं का संयुक्त प्रभाव ही तो महामारी का कारण नहीं बना है | इसे अनुसंधान पूर्वक समझकर महामारी के वास्तविक कारण को खोजा जा सकता है |
महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए तापमान वायुप्रदूषण या वर्षा बाढ़ आदि मौसमसंबंधी घटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने की प्रक्रिया खोजनी होगी | ऐसे मौसमसंबंधी अनुमान पूर्वानुमान यदि सही निकलते हैं तो उन्हीं के आधार पर महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जा सकेंगे |
इस प्रकार से महामारी को अच्छी प्रकार से समझने के लिए तापमान वायुप्रदूषण एवं मौसमसंबंधी घटनाओं को सही सही समझना होगा | इन तीनों ही प्रकार की घटनाओं के बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने की सही प्रक्रिया खोजनी होगी |इसके बिना न तो मौसम के बिषय में कुछ पता लगाया जा सकता है और न ही महामारी के बिषय में कुछ पता लगाया जाना संभव है |
महामारी संबंधी अनुसंधानों और यह मौसमविज्ञान !
बादलों या आँधी तूफानों को उपग्रहों से एक स्थान पर देख लिया जाता है | वे जितनी गति से जिस दिशा की ओर जा रहे होते हैं | उसके आधार पर ये अंदाजा लगाया जाता है कि ये यदि इसी गति से इसी दिशा की ओर चलते रहे तो इतने घंटों में इतनी दूरी तय कर सकते हैं | उतनी दूरी पर जो जो देश प्रदेश आदि पड़ते हैं | उन बादलों या आँधी तूफानों के वहाँ वहाँ पहुँचने के बिषय में अंदाजा लगा जाता है |
इस प्रक्रिया से एक बार में 4-5 दिन तक के ही बादल दिखाई पड़ सकते हैं | इसलिए 4-5 दिन तक के बादलों को देखकर 4 दिन तक वर्षा होने की भविष्यवाणी कर दी जाती है |उसके बाद बादल आएँगे या नहीं ये उस समय पता नहीं लग पाता है |
इस प्रक्रिया के आधार पर की गई 4-5 दिनों तक की भविष्यवाणियाँ भी अक्सर इसलिए गलत निकल जाती हैं | क्योंकि हवाएँ कभी भी किसी दूसरी दिशा में मुड़ सकती हैं | ऐसी स्थिति में बादल या आँधी तूफान उन हवाओं के साथ साथ उसी दिशा में मुड़ जाते हैं | जिस ओर हवाएँ जा रही होती हैं | ऐसी स्थिति में पहले लगाए गए अंदाजे गलत निकल जाते हैं | तत्काल लगाए गए अंदाजे भी कभी कभी गलत निकल जाते हैं | चक्रवात आदि अपनी दिशा बदल लिया करते हैं |
मौसमसंबंधी इसप्रकार के अंदाजों से महामारी संबंधी अनुसंधानों में कोई मदद नहीं मिल पाती है | ये तो उसप्रकार का सामान्य अंदाजा होता है | जिसप्रकार से किसी नदी में आई बाढ़ का बढ़ा हुआ पानी या किसी नहर में छोड़ा गया पानी आगे कब कहाँ पहुँचेगा | इसका अंदाजा लगा लिया जाता है | ऐसे अंदाजे तुरंत या दो चार दिन पहले के लिए ही लगाए जा सकते हैं | उनके कुछ हद तक सही निकलने की संभावना हो सकती है | ऐसे जुगाड़ से चक्रवातों को कुछ पहले देख लिए जाने से उससे होने वाले नुक्सान से कभी कभी सुरक्षा हो जाती है |
ऐसे जुगाड़ अक्सर बाढ़ में लोगों के फँसा देते हैं | इस जुगाड़ू प्रक्रिया से सीमित क्षेत्र तक के ही बादल देखे जा सकते हैं | उतने का ही अंदाजा लगाया जा सकता है | इसीलिए किसी क्षेत्र जब वर्षा होनी प्रारंभ होती है तब दो या तीन दिन पहले की भविष्यवाणी की जाती है | जब वर्षा का क्रम तीन दिनों के बाद भी चलता रहता है तो अभी 72 घंटे तक वर्षा और होगी | उसके बाद भी वर्षा नहीं रुकती है तो 48 घंटे और वर्षा होने की भविष्यवाणी की जाती है |
कुछ पहली भविष्यवाणी पर भरोसा कर लेते हैं कि तीन दिन ही पानी बरसेगा | इसके बाद खुल जाएगा |उतना ही राशन पानी लेकर रख लेते हैं | इसके बाद भी जब वर्षा होती रहती है तब तक पानी इतना अधिक भर जाता है कि वहाँ से निकलने लायक नहीं रह जाता है | इस तरह 2-2 दिन तब तक बढ़ाए जाते रहते हैं | जब तक वर्षा होती रहती है तब तक यही प्रक्रिया चलती रहती है |
कुल मिलाकर मौसम संबंधी इस जुगाड़ में मौसमपूर्वानुमान कम मौसम समाचार अधिक होता है | इस प्रक्रिया से आँखों देखा हाल ही कुछ जोड़ घटाकर बताना होता है | जब जहाँ जैसा होते देखा जाता है तब वहाँ वैसा ही वही बता दिया जाता है | कहाँ कितने सेंटीमीटर बारिश हुई | बारिश ने सर्दी ने गर्मी ने कहाँ कहाँ कितने वर्षों का रिकार्ड तोड़ा मौसमपूर्वानुमान के नाम पर यह बताया जा रहा होता है |
ऐसे मौसमविज्ञान के नाम पर ये जो पूर्वानुमान बताए जा रहे होते हैं | इनमें 2 -2 दिन बढ़ाने के बजाए एक साथ ही बता दिया जाता कि कुल कितने दिन वर्षा होनी है | लोग भी उतने दिनों के लिए राशन औषधि आदि आवश्यक वस्तुओं का संग्रह कर लेते | जिस मौसम विज्ञान के द्वारा 10 -12 दिनों का मौसमपूर्वानुमान एक साथ नहीं बताया जा सकता है | उसी मौसमविज्ञान के आधार अप्रैल में 4 महीने पहले के बिषय में ये पूर्वानुमान कैसे बताया जा सकता है कि इसवर्ष वर्षाऋतु में कैसी बारिश होगी |
ऐसी परिस्थिति में जिस मौसमविज्ञान के द्वारा 10 -12 दिनों का मौसमपूर्वानुमान एक साथ नहीं बताया जा सकता है | उसके आधार पर महीनों वर्षों पूर्व के पूर्वानुमान कैसे पता लगाए जा सकते हैं !जबकि महामारी संबंधी अध्ययनों अनुसंधानों के लिए तो वर्षों पहले के मौसम संबंधी पूर्वानुमानों की आवश्यकता होती है |
महामारी को समझने के लिए तो तापमान बढ़ने घटने तथा वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के लिए जिम्मेदार कारणों को खोजना होता है | इसके साथ साथ इनके बिषय में सही अनुमानों पूर्वानुमानों की भी आवश्यकता होती है | भूकंपों के लिए जिम्मेदार कारणों को खोजने की आवश्यकता होती है | चक्रवात बज्रपात जैसी सभी प्राकृतिक घटनाओं समझने की आवश्यकता होती है |
वर्तमान मौसमविज्ञान के द्वारा इस प्रकार के अनुसंधान किए जाने संभव नहीं हैं | इनमें प्रकृति के स्वभाव को समझने लायक कोई विज्ञान सम्मिलित ही नहीं होता है |इसीलिए इस प्रकार के मौसम पूर्वानुमान महामारी संबंधी अध्ययनों के काम के नहीं होते हैं |
मौसम को समझने के विज्ञान की खोज !
घटनाओं को तीन प्रकार से समझा जा सकता है एक तो प्रत्यक्ष सामग्री के आधार पर और दूसरा परोक्ष सामग्री के आधार पर और तीसरा गणित के आधार पर | जिसमें न तो प्रत्यक्ष घटनाएँ दिखाई दे रही होती हैं और न ही परोक्ष रूप में | उन्हें केवल गणित के द्वारा समझा जाता है |
प्रत्यक्ष सामग्री का मतलब जो घटनाएँ तैयार होकर किसी भी रूप में दिखाई देने लगी होती हैं | प्रातः हुआ कलियाँ खिलते दिखाई दीं तो उनके फूल बनने का अंदाजा लगा लिया गया | इसमें सब कुछ दिखाई दे रहा है | प्रातःकाल हुआ दिखाई दे रहा है और कलियाँ खिलते दिखाई दे रही हैं |
परोक्ष सामग्री का मतलब वह सिद्धांत खोजकर उसके आधार पर घटना बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना है | इसमें और बारीकी खोजी गई | जिससे यह पता लगा कि कमल खिलने का कारण सूर्योदय होना है | सूर्योदय तो कल भी होगा इसलिए सूर्योदय होने पर कमल तो कल भी खिलेगा |
तीसरा प्रत्यक्ष और परोक्ष से भी ऊपर उठकर सोचना है कि कमल न तो प्रातः काल होने पर खिलता है और न ही सूर्योदय होने पर खिलता है | कमल अपने खिलने के समय पर खिलता है | यह संयोग ही है कि प्रातःकाल होने ,सूर्योदय होने और कमल खिलने जैसी तीनों घटनाएँ एक ही समय पर घटित होनी होती हैं | वह समय कब आएगा उसकी खोज करनी होगी | उसका पता गणित के द्वारा लगाया जा सकता है |
पूर्वानुमान लगाने की तीन वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ
मौसम पूर्वानुमान लगाने की तीन प्रक्रियाएँ हैं |पहली प्रक्रिया में बादलों या आँधी तूफानों को उपग्रहों से एक स्थान पर देख लिया जाता है | वे जितनी गति से जिस दिशा की ओर जा रहे होते हैं | उसके आधार पर ये अंदाजा लगाया जाता है कि ये यदि इसी गति से इसी दिशा की ओर चलते रहे तो इतने घंटों में इतनी दूरी तय कर सकते हैं | उतनी दूरी पर जो जो देश प्रदेश आदि पड़ते हैं | उन बादलों या आँधी तूफानों के वहाँ वहाँ पहुँचने के बिषय में अंदाजा लगा जाता है | उसके सही निकलने की संभावना सबसे कम होती है |उसका कारण यह है कि हवाएँ कभी भी किसी भी दिशा में मुड़ सकती हैं | ऐसी स्थिति में बादल या आँधी तूफान उन हवाओं के साथ साथ उस दिशा में मुड़ जाते हैं | ऐसी स्थिति में पहले लगाए गए अंदाजे गलत निकल जाते हैं |
मौसमसंबंधी इसप्रकार के अंदाजों से महामारी संबंधी अनुसंधानों में कोई मदद नहीं मिल पाती है | इनमें प्रकृति के स्वभाव को समझने वाला विज्ञान कहीं नहीं सम्मिलित होता है | ये तो उसप्रकार का सामान्य अंदाजा होता है | जिस प्रकार से किसी नदी में आई बाढ़ एक स्थान पर देखकर उसका बढ़ा हुआ पानी आगे कब कहाँ पहुंचेगा दूसरे स्थान पर न तो प्रकति
उनके दूसरे स्थान पर पहुँचने
जिससे यह पता लगता है कि पता लग गया कि कमल के खिलने का संबंध सूर्योदय से है | इसलिए सूर्योदय होने पर कमल खिलेगा | | लगा कि
मौसम को समझने के लिए प्रकृति के स्वभाव को समझना होगा | प्रकृति के स्वभाव के आधार पर ही महामारी को समझा जा सकता है और उसके बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकता है |
मौसमसंबंधी जिन प्रकृति बिषयक अनुसंधानों से महामारी को समझा जा सकता है | उसप्रकार के अनुसंधानों के लिए अभी तक ऐसा कोई विज्ञान ही नहीं है | जिससे प्रकृति को सही ढंग से पढ़ा जा सके | प्रकृति की भाषा गणित है | इसलिए प्राकृतिक घटनाओं को गणित के द्वारा ही समझा जा सकता है| इससे संबंधित गणितीय अनुसंधानों के द्वारा जिस समय मौसमसंबंधी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकेगा | उसी समय महामारी को समझना संभव हो पाएगा | महामारी के बिषय में लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि भी उसके बाद ही सही निकलेंगे |
मौसम संबंधी अनुसंधान और महामारी
वर्तमान समय में उपग्रहों से बादलों आँधी तूफानों को देखकर सुपर कंप्यूटरों से गणना करके केवल यह पता लगाया जाता है कि जो बादल आँधी तूफान आदि अभी इतनी ही गति से इस दिशा की ओर बढ़ते दिखाई पड़ रहे हैं | वे यदि इसी गति से इसी दिशा में आगे बढ़ते रहे तो इतने दिनों या घंटों में इतनी दूरी तय कर लेंगे | उस दूरी पर जो देश या प्रदेश पड़ते हैं |वहाँ पहुँच जाएँगे | वहाँ वर्षा या आँधी तूफ़ान आ सकता है | ऐसा अनुमान लगा लिया जाता है |कई बार बीच में हवाएँ अपनी दिशा या गति बदल लेती हैं तो बादल आँधीतूफान उस दिशा में चले जाते हैं |
वस्तुतः यह मौसमविज्ञान नहीं है ये तो एक प्रकार की कैमरा प्रणाली है | जिसके द्वारा दूर तक के बादलों आँधी तूफानों को देखा जा सकता है | इससे उस प्रकार की तैयारी पहले करके रख ली जाती है |आँधी तूफानों चक्रवातों से बचाव के लिए उस प्रकार के उपाय करके रख लिए जाते हैं |
कुल मिलाकर ये आँधी तूफानों से बचाव के लिए बनाया गया एक जुगाड़ मात्र है | जो कभी सही तो कभी गलत निकलते देखा जाता है | इसीलिए बीते कुछ वर्षों में अनेकों हिंसक आँधी तूफ़ान आए | जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु भी हुई किंतु उनके बिषय में कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका था |
ऐसे जुगाड़ जब कभी सही निकल जाते हैं तो ऐसी घटनाओं से लोगों की सुरक्षा में मदद भले मिल जाती है किंतु ऐसे मौसमीजुगाड़ों से महामारी को समझना संभव नहीं है | महामारी को समझने के लिए प्रकृति स्वभाव को समझकर उसके अनुसार प्राकृतिक घटनाओं बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना होगा | वे जब सही निकलने लग जाएँगे तो इसके आधार पर लगाए गए महामारी संबंधी अनुमान पूर्वानुमान भी सही निकल जाएँगे |
विज्ञान और मौसम पूर्वानुमान
मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने जिस प्रकार से प्रयत्न किया जाता है | इस प्रकार के प्रयोगों के द्वारा क्या मौसम संबंधी प्राकृतिक वातावरण को समझा जाना संभव नहीं है | इस प्रक्रिया के अनुसार बादलों आँधी तूफानों आदि मौसम संबंधी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि भी नहीं लगाए जा सकते हैं | ऐसा किया जाना यदि संभव होता तो अभी तक मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना संभव क्यों नहीं हो पाया है | वैसे भी दीर्घावधि मौसम पूर्वानुमान प्रायः गलत निकल ही जाते हैं |
इसी प्रकार से अलनीनो लानिना के आधार पर लगाए गए पूर्वानुमान सही निकलते ही नहीं हैं | उन्हें सही सिद्ध करने के लिए तरह तरह के जुगाड़ किए जाते हैं किंतु उनसे प्रकृति का कोई सीधा संबंध सिद्ध नहीं हो पाया है | यदि अलनीनो लानिना के आधार पर सही पूर्वानुमान लगाया जाना संभव ही होता तो मौसम संबंधी दीर्घावधि पूर्वानुमानों के सही निकलने की प्रक्रिया अब तक प्रारंभ हो चुकी होती किंतु ऐसा कुछ होते तो कभी नहीं दिखाई दिया |
इसीलिए जितनी भी हिंसक प्राकृतिक घटनाएँ घटित होती हैं उनके बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना संभव ही नहीं हो पाता है | विगत कुछ वर्षों में बार बार बादल फटते रहे उनसे जनधन का नुक्सान होता रहा किंतु उसके बिषय में सही पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका |मौसमविज्ञान पर यदि वास्तव में मौसमविज्ञान ही होता तो ऐसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाए जा सकते थे |
वर्तमान मौसमविज्ञान के द्वारा मौसम पूर्वानुमान लगाया जाना संभव है भी या नहीं यह समझने के लिए बादलों आँधी तूफानों आदि की प्रक्रिया को वैज्ञानिक अनुसंधानों की दृष्टि से दोबारा (रिक्रिएट )करके देखा जाना चाहिए | इससे उस कमजोरी को खोजा जा सकता है | जिसके कारण मौसमसंबंधी सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने में अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है |
इसके लिए सुदूर आकाश में किसी कपड़े या रुई के गोले को छोड़ दिया जाए | उस उड़ते हुए कपड़े को दूरबीनों उपग्रहों रडारों से लगातार देखा जाए | सुपर कंप्यूटरों से उसका विश्लेषण करके उसके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए प्रयत्न किया जाए कि ये कितनी देर तक उड़ेगा | कितनी तेजी से उड़ेगा और उड़कर किस दिशा की ओर जाएगा |
इस प्रकार से उस कपड़े या रुई के गोले के बिषय में लगे हुए अनुमान पूर्वानुमान जितने प्रतिशत सही निकल सकते हैं | इस प्रक्रिया से लगाए गए मौसमसंबंधी पूर्वानुमान भी उतने प्रतिशत ही सही निकल पाएँगे |
महामारी को समझने या उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान खोजने के लिए मौसमसंबंधी प्राकृतिक परिवर्तनों के वास्तविक कारणों को खोजना होगा | उसी के आधार पर सही अनुमानों पूर्वानुमानों लगाने की आवश्यकता होगी |
वायुसंचार और प्रकृतिविज्ञान !रुई के गोले की तरह ही बादलों तथा आँधीतूफानों की गति भी वायु के ही आधीन होती है | वायु जिस ओर जितनी गति से जाएगी रुई का गोला भी उसी ओर उतनी ही गति से जाएगा | हवा के रुख में जब जैसे परिवर्तन आएँगे तब तैसे परिवर्तन उसमें भी होंगे | हवा रुक जाएगी तो रुई का गोला भी रुक जाएगा |
कुल मिलाकर उस रुई के गोले के कहीं जाने आने या उसकी गति घटने बढ़ने में उसकी अपनी कोई भूमिका नहीं होती है |इसका कारण वायुसंचार है | रुई के गोले की तरह ही बादलों तथा आँधीतूफानों की गति और दिशा भी वायुसंचार के ही आधीन होती है |वायु जिस गति से जिस दिशा में जहाँ जहाँ जाएगा | बादलों एवं आँधीतूफानों को भी उसी गति से उसी दिशा में वहाँ वहाँ ले जाएगा |
उपग्रहों के द्वारा आकाश में दूरस्थ बादलों आँधीतूफानों को देखकर उनकी केवल वर्तमान अवस्था का पता लगाया जा सकता है कि वे इस समय कहाँ हैं और उड़ते हुए किस ओर जा रहे हैं |वे भविष्य में कब कहाँ जाएँगे ये पता नहीं लग सकता है | इस बात का पता लगाने के लिए वायु संचार को समझना पड़ेगा | इनके कहीं जाने आने का कारण वायु ही है |
बादलों तथा आँधीतूफानों को देखकर यह पूर्वानुमान लगाया जा सकता है कि ये कब कहाँ पहुँचेंगे तो उस रुई के गोले के बिषय में भी पूर्वानुमान लगा लिया जाना चाहिए कि ये कब कहाँ पहुँचेगा | यदि वह पूर्वानुमान सही निकल जाता है | इसका मतलब उपग्रहों के द्वारा बादलों तथा आँधीतूफानों के बिषय में सही अंदाजा लगाया जा सकता है
वर्षा बाढ़ आँधी तूफानों के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए हमें उनकी भविष्य की अवस्था का पता लगाना होता है कि ये भविष्य में कब कहाँ होंगे | मार्च अप्रैल के महीने में ही हमें यदि पता करना है कि इस वर्ष मई और जून के महीनों में आँधी तूफान कब कितने आएँगे तो हमें मार्च अप्रैल के महीनों में ही ये पता करना होगा कि उस समय वायु संचार किस प्रकार का होगा
की गति क्या होगी वर्षाकाल अर्थात जुलाई अगस्त में वर्षा कब कितनी होगी तो जुलाई अगस्त में बादल कब कहाँ किस प्रकार के रहेंगे |
इसलिए रुई के गोले के उड़ने न उड़ने या कहीं जाने आने के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए वायुसंचार को ही समझना पड़ेगा | ऐसी स्थिति में उपग्रहों की मदद से यदि |
इस अंदाजे का उपयोग
वायु के आधीन है |
वायुसंचार को समझे बिना उस कपड़े को दूरबीनों उपग्रहों रडारों से देखकर सुपर कंप्यूटरों से गणना करके उस कपड़े के बिषय में कुछ भी पता लगाना संभव नहीं होता है |
इसीप्रकार से उपग्रहों रडारों के द्वारा सुदूर आकाश में उड़ रहे बादलों तथा आँधी तूफानों को यदि उपग्रहों रडारों को देखकर वर्षा या आँधी तूफानों के बिषय में पूर्वानुमान नहीं लगा सकते हैं | ऐसा किया जाना संभव होता तो कर लिया जाता |
ऐसे अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए हमें सबसे पहले इस बात पर विश्वास करना होगा कि उड़ने की क्षमता कपड़े में होती नहीं है | इसलिए कपड़े के उड़ने का कारण कपड़ा नहीं वो हवा होती है | जिसके द्वारा वो उड़ाया जा रहा होता है |
ऐसी स्थिति में कपड़े के उड़ने से संबंधित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर कपड़े को देखने से नहीं पता लगेगा | इसके लिए हवा के संचार को देखना पड़ेगा | हवा दिखाई नहीं पड़ती है इसलिए उस समय हवा के संचारी स्वभाव को समझना पड़ेगा | उसी के आधार पर कपड़े के उड़ने के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जा सकते हैं |
जिसप्रकार से उड़ते हुए कपड़े को किसी भी यंत्र के द्वारा देखकर किसी भी कंप्यूटर से गणना करके इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि ये कपड़ा उड़ता हुआ कब कहाँ पहुँचेगा |
ऐसी परिस्थिति में हवाओं के संचार पर आश्रित बादलों आँधी तूफानों को उपग्रहों रडारों से देखकर सुपर कंप्यूटरों से गणना करके इनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है | इसके लिए तो निराकार हवाओं का ही अध्ययन करना होगा |
कपड़े के टुकड़े की तरह ही भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात उल्कापात एवं महामारी जैसी घटनाएँ भी हवाओं के ही आधीन हैं |इनके घटित होने का कारण भी हवाएँ ही हैं | ऐसी घटनाओं के स्वभाव प्रभाव अनुमान पूर्वानुमान आदि के बिषय में जो जो कुछ पता लगाना है |उसके लिए ऐसी घटनाओं को देखने की नहीं प्रत्युत हवाओं के संचार को समझने की आवश्यकता होती है |
उपग्रहों रडारों से प्राकृतिक घटनाओं को घटित होते जब देख ही लिया जाएगा तो अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी |इन घटनाओं से तब तक जो नुकसान होना होगा वो तो इनके घटित होने के साथ ही हो चुका होगा |
कुल मिलाकर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने का कारण हवाएँ ही होती हैं | हवाओं को प्रत्यक्ष या यंत्रों के द्वारा देखा नहीं जा सकता है | उन्हें समझा ही जा सकता है | इन घटनाओं को समझने एवं अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए हवाओं के स्वभाव को समझना पड़ेगा |
इसके अतिरिक्त भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात एवं महामारी जैसी घटनाओं के बिषय में प्रत्यक्ष के आधार पर आज क्या भविष्य में हजार वर्ष बाद भी कुछ भी पता लगाना संभव नहीं हो पाएगा |
प्राचीनकाल में महामारियों को समझने के लिए वैदिक विज्ञान था | उसी के आधार पर अनुसंधान होते थे | अनुसंधानकर्ताओं की ये जवाबदेही होती थी कि वो जो बताएँगे वो प्रायः सच निकलेगा | प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में उनके द्वारा लगाए हुए अनुमान पूर्वानुमान आदि प्रायः सही निकलेंगे |
उस युग में पूर्वानुमान लगाने का दावा करने वालों की योग्यता का परीक्षण प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में भविष्यवाणियाँ करवाकर किया जाता था |जिनकी भविष्यवाणियाँ सही निकलती थीं उन्हें पद प्रतिष्ठा मानदेय (सैलरी) आदि दी जाती थी | गलत भविष्यवाणियाँ करने वालों पर अंकुश लगाया जाता था |भविष्यवाणियों के नाम पर अफवाहें फैलाने का अधिकार उन्हें भी नहीं दिया जाता था | जो पूर्वानुमान लगाने का दावा करते थे | उनकी भविष्यवाणियों का एकांतिक परीक्षण किया जाता था | सही भविष्यवाणियाँ करने में सफल विद्वानों ने उसी युग में भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात एवं महामारियों के घटित होने के कारण खोज लिए थे ,प्रत्युत वे सही सटीक अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिया करते थे |
प्राचीनवैज्ञानिकों ने उसीयुग में सूर्य चंद्र मंडलों के समीप जाए बिना ही खगोलीय रहस्य सुलझा लिए थे | उन्होंने गणित विज्ञान के आधार पर यहीं बैठे बैठे सूर्य चंद्र पृथ्वी आदि के मंडलों की परिधियाँ नाप ली थीं | उनकी गतियाँ मार्ग आदि खोज लिए थे | उनके पृथ्वी पर एवं पृथ्वीवासियों पर पड़ने वाले अच्छे बुरे प्रभावों का पता लगाने में सफल हो गए थे | उन्होंने उसी विज्ञान के आधार पर उसी युग में सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में हजारों वर्ष पहले पूर्वानुमान लगाने की वैज्ञानिकता विकसित कर ली थी |
कुल मिलाकर उन प्राचीन वैज्ञानिकों ने आकाश पाताल समुद्रों तथा समस्त ब्रह्मांडों के रहस्य को जिस गणित वैज्ञानिक पद्धति से सुलझा लिया था | उसी गणितीय पद्धति के द्वारा अनुसंधानपूर्वक भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात एवं महामारी जैसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान अभी भी लगाया जा सकता है | प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने की प्रक्रिया प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ती है |
प्राकृतिकघटनाओं के निर्माण की प्रक्रिया अप्रत्यक्ष वातावरण में होती है |इसीलिए उसके पैदा या समाप्त होने एवं उसका प्रभाव घटने या बढ़ने के कारण भी अप्रत्यक्ष ही होते हैं |
ये इसलिए पता नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि
हवा के साथ उड़ रहे ये सब कुछ दिखाई नहीं पड़ता है | इसमें केवल घटनाएँ ही दिखाई पड़ती हैं | जिसप्रकार से फलपत्तों से युक्त वृक्ष को देखकर उसकी जड़ों का पता लग जाता है | उसी प्रकार से प्राकृतिक घटनाओं को प्रत्यक्ष देखकर उनकी जड़ों गणितवैज्ञानिक पद्धति से खोजये
महामारी में हुए जनसंहार का दोषी कौन !महामारी या मनुष्य ?
विगत कुछ दशकों में भारत को पड़ोसी देशों के साथ तीन युद्ध लड़ने पड़े | उन तीनों में मिलाकर जितने लोगों की दुर्भाग्य पूर्ण मृत्यु हुई थी | उससे कई गुणा अधिक लोग केवल कोरोना महामारी में ही मृत्यु को प्राप्त हुए हैं |इसके बाद भी अनुसंधानों के द्वारा महामारी को समझना भी संभव नहीं हो पाया है | इसे अत्यंत गंभीरता से लिए जाने की आवश्यकता है |
कोरोनामहामारी में इतनी बड़ी संख्या में लोगों का मारा जाना कोई साधारण घटना नहीं है| ये बहुत बड़ी आपदा है | मनुष्यकृत प्रयत्नों से इसे रोकना तो दूर अभीतक समझा ही नहीं जा सका है | महामारी के बिषय में बिना किसी निष्कर्ष पर पहुँचे यूँ ही भुला दिया जाना न तो हितकर है और न ही भविष्य के लिए ठीक है |
महामारी में हुए इतने बड़े जनसंहार के लिए महामारी को ही दोषी ठहराया जाता रहा है !महामारी अचानक आ गई है | महामारी लोगों को तेजी से संक्रमित करती है !महामारी स्वरूप परिवर्तित कर लेती है | महामारी संबंधी बिषाणु शरीर के अंदर छिप कर वार करते हैं | महामारी से इतनी सारी शिकायतें !अरे !ये तो महामारी का स्वभाव ही है |स्वभाव किसी का नहीं बदलता है | अग्नि की लव का स्वभाव ऊपर की ओर जाना और जलधार का स्वभाव नीचे की ओर आना है | ये कभी नहीं बदला है | ऐसे ही महामारी का मतलब ही जनसंहार है | उसका स्वभाव जिसदिन बदल जाएगा !उस दिन वो महामारी रह ही नहीं जाएगी |
महामारी को न तो रोका जाना संभव है और न ही उसके प्रभाव को कम किया जाना संभव है | वैज्ञानिकअनुसंधानों के द्वारा महामारी का स्वभाव समझना है|उसके अनुसार महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना है | मनुष्यों के शरीरों की प्रतिरोधक क्षमता समझनी है | उसी के अनुसार चिकित्सा के उपाय औषधियाँ आदि खोजनी होंगी | इसी प्रक्रिया से मनुष्यों को सुरक्षित बचाया जाना था | जो मनुष्यों के द्वारा नहीं की जा सकी | जिसके कारण वे निर्दोष लोग मृत्यु को प्राप्त हुए जिन्होंने महामारियों से अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकारों और वैज्ञानिकवर्ग पर डाल रखी थी | ऐसे अनुसंधानों को करने कराने में धन की कमी बाधा न बने | इसके लिए अपने हिस्से का टैक्स सरकार को समय से भुगतान करते रहे |
ऐसे ईमानदार कर्मठ लोगों से भी बहुत लोग महामारी में इसमें उनका दोष क्या था | ऐसे अनुसंधानों को करने में जिन संसाधनों की आवश्यकता थी| यदि वो सरकारें समय से उपलब्ध करवाती रही हैं |अनुसंधान कर्ताओं को समय से उनका पारिश्रमिक प्रदान करती रही हैं | अनुसंधान करने योग्य परिस्थितियाँ यदि समय से उपलब्ध करवाती रही हैं तो महामारी में हुए जनसंहार के लिए सरकारों को भी दोष नहीं दिया जा सकता |
इसमें विज्ञान का पक्ष अत्यंत दुर्बल है | जिस पर समाज सबसे अधिक विश्वास करता है |वैज्ञानिकों चिकित्सकों की तुलना भगवानों से की जाती रही है |महामारी संक्रमितों को उन भगवानों से भी कोई मदद नहीं मिल सकी | भविष्य में यदि ऐसी कभी आवश्यकता पड़े तो विज्ञान और वैज्ञानिकों की भी समाज को सुरक्षित बचाने में कुछ तो भूमिका बन सके |
महामारीविज्ञान वैज्ञानिक अनुसंधान और तर्क !
वर्तमान समय में अत्यंत उन्नत विज्ञान भी है,सुयोग्य वैज्ञानिक भी हैं, और निरंतर चलने वाले अनुसंधान भी हैं |सबकुछ उच्चकोटि का होते हुए भी अनुसंधानों के द्वारा समाज की सुरक्षा क्यों नहीं की जा सकी ! चूक कहाँ हुई !कैसे हुई !समय पर सही निदान क्यों नहीं किया जा सका | महामारी बिषयक अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए क्या कोई विज्ञान है यदि हाँ तो सही पूर्वानुमान लगाए क्यों नहीं जा सके और जो लगाए जाते रहे वे गलत क्यों निकल जाते रहे | आदि क्यों नहीं लगाए जा सके ?जो लगाए जा रहे थे | वे गलत क्यों निकल जा रहे थे | इसके काल्पनिक कारण तो बहुत सारे बताए जा सकते हैं किंतु इनके वास्तविक कारण क्या हैं | उन्हें खोजा जाना चाहिए |
अनुसंधानों के लिए धन एवं संसाधनों की कमी नहीं होने दी जाती है | जनता का पर्याप्त आर्थिक सहयोग भी मिलता है |
ऐसी स्थिति में महामारी का काम लोगों को संक्रमित करना था महामारी ने लोगों को संक्रमित किया किंतु वैज्ञानिकों के द्वारा अनुसंधान करने का लक्ष्य तो महामारी से समाज की सुरक्षा करना था | संक्रमितों को संक्रमण मुक्त करना था | उसमें हमारा विज्ञानजगत सफल क्यों नहीं हुआ !आखिर सुरक्षा तो की जानी चाहिए थी |
अनुसंधानों का लक्ष्य महामारी के बिषय में आगे से आगे पूर्वानुमान लगाना था !महामारी के स्वभाव को समझना था !महामारी पीड़ितों को प्रभावी चिकित्सा उपलब्ध करवाना था |अनुसंधानों के द्वारा इन आवश्यक लक्ष्यों को हासिल क्यों नहीं किया जा सका |
जिन अनुसंधानों के करने कराने का उद्देश्य ही
महामारी से समाज की सुरक्षा करना रहा हो | उनके होते हुए भी समाज को
सुरक्षित न बचाया जा सका हो |ऐसे अनुसंधानों के सहारे भविष्य को कैसे छोड़ा जा सकता
है | महामारियों का आना जाना तो भविष्य में भी लगा रहेगा |वो तो कभी भी आ सकती है | हमें ऐसी तैयारी
करके अभी से रखनी होगी | जिससे कोरोना महामारी जैसी कोई महामारी या उसकी लहर यदि अभी
फिर आकर लोगों को संक्रमित करने लगे तो उससे समाज को सुरक्षित बचाया जा सके |
कहाँ हैं महामारी बिषयक इन अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर !
किसी भी रोग या महारोग से समाज को सुरक्षित बचाने या संक्रमितों को संक्रमण मुक्त करने के लिए रोग का निदान आवश्यक होता है |रोग की प्रकृति को पहचाने बिना न तो चिकित्सा की जा सकती है और न ही सही अनुमान पूर्वानुमान ही लगाया जा सकता है | रोग को अच्छी प्रकार से पहचान कर ही चिकित्सा की जा सकती है | इसके लिए ही तरह तरह की जाँचों का सहारा लिया जाता है | महामारी को पहचानना ही संभव नहीं हो पाया है तो संक्रमण से मुक्ति की आशा कैसे की जा सकती है |
इतने उन्नतविज्ञान एवं वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा महामारी को समझना संभव होता तो समझ लिया गया होता | महामारी से लोगों को सुरक्षित बचाया जाना संभव होता तो बचा लिया गया होता ! महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाने संभव होते तो लगा लिए गए होते | किसी ने किसी को रोका तो नहीं था | आखिर क्या कारण रहा कि महामारी समाज को रौंदती रही किंतु वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा न तो उसको पहचाना जा सका और न ही उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान ही लगाया जा सका | वैज्ञानिक अनुसंधानों की प्रक्रिया में तर्कों के द्वारा साक्ष्यों को खोजने की परंपरा रही है | महामारीसंबंधी अनुसंधानों को भी यदि उसी कसौटी पर कसा जाना हो तो कुछ ऐसे प्रश्नों का तर्कसंगत उत्तर खोजा जाना चाहिए |
1. कोरोना महामारी भयंकर थी इसलिए उसे पहचाना नहीं जा सका अथवा वैज्ञानिक अनुसंधान इस स्तर के नहीं थे | जिनसे महामारी की पहचान करना संभव हो पाता |
2. महामारी का प्रभाव सभी पर एक समान पड़ता है फिर कुछ लोगों के रोगी होने का कारण क्या है !
3 . प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण यदि लोग रोगी हुए तो कारण प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना है | या महामारी भयंकरता !
4.महामारीजनित संक्रमण प्राकृतिक रूप से अपने आप बढ़ता था अथवा कोविडनियमों के पालन न किए जाने से बढ़ता था !
5.महामारी की किसी लहर के आने के बाद उस लहर के समाप्त होने का कारण प्राकृतिक होता था अथवा कोविडनियमों का पालन या चिकित्सा का प्रभाव होता था !
6.मौसम बिगड़ने के कारण महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ता था या फिर महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने के कारण मौसम बिगड़ता था !कहीं ऐसा तो नहीं है कि मौसम बिगड़ने और संक्रमण बढ़ने की घटनाएँ साथ साथ घटित होती थीं !
7 . महामारीजनित संक्रमण बढ़ने पर भूकंप अधिक आते थे या फिर भूकंप अधिक आने के कारण महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ता था !
8 .महामारी आने के कारण वायुप्रदूषण बढ़ा या वायुप्रदूषण बढ़ने के कारण महामारी आई !
9.महामारी आने के कारण तापमान में अधिक उतार चढ़ाव आया या तापमान अचानक घटने बढ़ने से महामारी आई !
10. महामारी का सबसे अधिक प्रभाव शरीर के किस अंग पर पड़ा तथा शरीर में किस किस प्रकार का रोग या दिक्कत होने का कारण महामारी को माना जाए !
ऐसे ही महामारी मनुष्यकृत थी या प्राकृतिक,महामारी का विस्तार कितना था ! प्रसार माध्यम क्या था !अंतर्गम्यता कितनी थी !महामारी पर मौसम का प्रभाव पड़ता था था या नहीं !वायु प्रदूषण का प्रभाव पड़ता था या नहीं !तापमान का प्रभाव पड़ता था या नहीं ! महामारी पैदा होने का कारण क्या था और महामारी समाप्त होने का कारण क्या था ?महामारी पैदा और समाप्त होने में मनुष्यकृत अच्छे बुरे व्यवहारों की क्या भूमिका थी | महामारी संबंधी लहरों के आने और जाने में मनुष्यकृत व्यवहारों की क्या भूमिका थी ?
वर्तमानसमय में महामारी शांत है यह प्राकृतिक कारणों से शांत हुई है या कोविडवैक्सीन लगाए जाने से अथवा कोविडनियमों के पालन से ! वर्तमानसमय में जिन चिकित्सकीय प्रयोगों को कोरोना महामारी से मुक्ति दिलाने में सक्षम मान लिया गया है| क्या वे वास्तव में सक्षम हैं या केवल मान ही लिया गया है | ऐसे समस्त प्रश्नों के साक्ष्य आधारित तर्कसंगत उत्तर खोजे जाने चाहिए | जिनके प्रमाण प्रस्तुत किए जा सकें |
प्लाज्माथैरेपी को भी तो कुछ समय तक महामारीजनित संक्रमण से मुक्ति दिलाने में सक्षम मान लिया गया था | दूसरी लहर आने पर वह अनुमान गलत निकला |
इसीप्रकार से संभव है कि महामारी का वेग शांत होने में चिकित्सा वैक्सीन आदि मनुष्यकृत प्रयत्नों की कोई भूमिका ही न रही हो |महामारी संबंधी संक्रमण स्वतः शांत हो रहा हो |प्लाज्मा थैरेपी की तरह ही एक बार फिर से ऐसा कोई भ्रम ही पाल लिया गया हो |सच्चाई क्या है ये तो तभी पता लग पाएगा ,जब महामारी की कोई दूसरी लहर आएगी |प्लाज्माथैरेपी को भी पहली लहर के समय संक्रमण से मुक्ति दिलाने में प्रभावी मान लिया गया था | दूसरी लहर न आती तो ये भ्रम न टूटता | दूसरी लहर आते ही सच्चाई सामने आ गई कि प्लाज्माथैरेपी महामारी से मुक्ति दिलाने में सक्षम नहीं है |
इसीप्रकार से महामारी की जब तक कोई अन्य लहर नहीं आती है तब तक यह कहा जाना उचित नहीं होगा कि कोरोना महामारी से मुक्ति दिलाने में वैक्सीन आदि मनुष्यकृत प्रयत्नों से कोई मदद मिली है या नहीं |
महामारी को समझे बिना चिकित्सा भी संभव न थी !
चिकित्साविज्ञान के आधार पर कोरोनामहामारी से संक्रमित रोगियों का रोग परीक्षण किया गया | उन परीक्षणों से जो जानकारी प्राप्त हुई | वो कितनी सही है | यह पता लगाने के लिए उस जानकारी के आधार पर महामारी बिषयक कुछ और अनुमान लगाए गए | यदि वे सही निकल जाते तो ये प्रमाणित हो जाता कि रोगियों का परीक्षण करके महामारी के बिषय में जो जानकारी जुटाई गई है | वही सही है | इसी के आधार पर महामारी से सुरक्षा के लिए औषधि टीका आदि बनाकर उसी से संक्रमितों की चिकित्सा करके उन्हें स्वस्थ किया जा सकता था ,किंतु ऐसा किया जाना इसलिए संभव नहीं हो पाया क्योंकि उनके द्वारा लगाए गए महामारी संबंधी अनुमान ही गलत निकलते चले गए | उससे यह स्पष्ट हो गया कि महामारी के बिषय में विशेषज्ञों के द्वारा जो समझा गया था | महामारी के बिषय में जो बताया गया वो सही नहीं था | इसलिए उन परीक्षणों से प्राप्त जानकारी महामारी से सुरक्षा या संक्रमितों की चिकित्सा की दृष्टि से विशेष उपयोगी नहीं है |
इसीप्रकार से महामारी के बिषय में जो कुछ समझा जा सका था | उसी के आधार पर विभिन्न वैज्ञानिकों के द्वारा महामारी की लहरों के आने और जाने के बिषय में पूर्वानुमान लगाए जा रहे थे | जिसका उद्देश्य था कि यदि ये पूर्वानुमान सही निकल जाएँगे तो ये प्रमाणित हो जाएगा कि पूर्वानुमान लगाने वाले वैज्ञानिकों ने महामारी तथा उसकी लहरों की प्रकृति को पहचान लिया है | उसी जानकारी के आधार पर महामारी से लोगों की सुरक्षा कर ली जाएगी | संक्रमितों की चिकित्सा करके उन्हें संक्रमण मुक्त कर लिया जाएगा ,किंतु वे पूर्वानुमान ही गलत निकलते जा रहे थे | पूर्वानुमानों के गलत निकलते ही वे अनुसंधान भी गलत सिद्ध हो गए | जिनके आधार पर वे पूर्वानुमान लगाए गए थे |
कुल मिलाकर समाज की सुरक्षा के लिए महामारी को अच्छी प्रकार से समझा जाना आवश्यक था |वैज्ञानिकों को महामारी की प्रकृति यदि समझ में आ गई होती तो उनके द्वारा कोरोना महामारी के बिषय में लगाए जा रहे अनुमान पूर्वानुमान आदि सही निकलने चाहिए थे | यदि ऐसा हो जाता तो ये प्रमाणित हो जाता कि उन्होंने महामारी को समझ लिया है,किंतु उनके द्वारा लगाए जाते रहे अनुमान पूर्वानुमान आदि निरंतर गलत निकलते जा रहे थे |इसका मतलब था कि कोरोनामहामारी की प्रकृति को समझा नहीं जा सका था |ऐसी आधी अधूरी समझ के आधार पर महामारी से मुक्ति दिलाने के लिए प्रभावी औषधि टीके आदि कैसे बनाए जा सकते थे |
अनुमान गलत निकलते चले गए -
वैज्ञानिकों के द्वारा कहा गया कि तापमान कम होने पर कोरोना बढ़ेगा, किंतु ऐसा नहीं हुआ !कोरोना की तीन लहरें तब आईं जब तापमान बढ़ा हुआ था | केवल तीसरी लहर सर्दी में अर्थात जनवरी 2022 में आई थी | ऐसे में यह कैसे कहा जाए कि कोरोना संक्रमण का तापमान बढ़ने घटने से कोई संबंध था या नहीं ! ये अनुमान सही नहीं निकला |
ऐसे ही बताया गया कि वायुप्रदूषण बढ़ने पर कोरोना बढ़ेगा ,किंतु ऐसा हुआ तो नहीं |सन 2020 के अक्टूबर नवंबर में जब वायुप्रदूषण दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था किंतु कोरोनासंक्रमण दिनोंदिन कम होता जा रहा था | दूसरी ओर मार्च अप्रैल 2021 में जब वातावरण इतना स्वच्छ था कि पंजाब के अमृतशर एवं बिहार के सीतामढ़ी से हिमालय दिखाई देने लगा था ! इसी समय भारत में कोरोना की सबसे भयानक दूसरी लहर आई थी | इसलिए कोरोना संक्रमण बढ़ने का कारण वायुप्रदूषण है | वैज्ञानिकों का ये अनुमान भी गलत निकल गया |
इसी प्रकार से कोविड नियमों का पालन न करने से कोरोना संक्रंमण बढ़ने की बात कही गई थी किंतु बिहार बंगाल की चुनावी रैलियों में ,दिल्ली के किसान आंदोलन में, दिल्ली मुंबई सूरत आदि से पलायित श्रमिकों में ,घनी बस्तियों में, सामूहिक रहन सहन में कोविड नियमों का पालन न होने पर भी संक्रमण दिनोंदिन घटता जा रहा था | ये अनुमान भी सही नहीं निकल पाया |
प्लाज्मा थैरेपी से कोरोना नियंत्रित होगा !रेमडेसिविर इंजेक्शन से कोरोना नियंत्रित होगा | ऐसे जितने भी अनुमान या पूर्वानुमान लगाए जाते रहे | वे गलत निकल जाते रहे थे | उनका सही न निकलना विशेषज्ञों की महामारी संबंधी समझ पर संशय पैदा करता जा रहा है |
इस प्रकार से रोग की पहचान करना कठिन होता जा रहा था !रोग के बिषय में लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान गलत निकलते जा रहे थे | संक्रमितों पर किए जा रहे चिकित्सकीय प्रयोग असफल होते जा रहे थे | ये सब महामारी प्रारंभ होने के संकेत दिखाई दे रहे थे | ऐसी स्थिति में महामारी को समझे बिना महामारी को पराजित कर देने या कोरोना को खदेड़ देने या महामारी पर विजय प्राप्त कर लेने जैसी बातें किस वैज्ञानिक बल पर की जा सकती हैं | कोरोना महामारी को समझने एवं उसपर विजय प्राप्त कर लेने लायक ऐसी कौन सी क्षमता हासिल कर ली गई थी | जिसके बलपर महामारी को बार बार ललकारा जा रहा था |
महामारी से सुरक्षा की तैयारियों के लिए चाहिए समय !
प्रत्येककार्य को करने में संसाधन तो लगते ही हैं | उनके साथ ही साथ समय भी लगता है | किसी कार्य को करने के लिए संसाधन हों किंतु उसे करने के लिए समय न हो तो भी वह कार्य पूर्ण नहीं हो पाता है| कितनी भी अच्छी चिकित्सा करके भी किसी रोगी के शरीर में हुए घाव या किसी अन्य रोग को तुरंत नहीं ठीक किया जा सकता है | प्रत्येक रोग और प्रत्येक कार्य में ऐसी ही समय की आवश्यकता होती है |
महामारी जब आ जाती है | उससमय उससे समाज की सुरक्षा करनी होती है | इसके लिए महारोग की प्रकृति पहचाननी होती है |रोग का परीक्षण करना होता है | संक्रमितों की चिकित्सा के लिए किस उपाय या औषधि की आवश्यकता होगी | रोग की प्रकृति के आधार पर औषधिदान या चिकित्सा आदि का निर्णय लेना होता है | ऐसी औषधि के निर्माण करने में जिन औषधीय द्रव्यों की आवश्यकता होती है | उनका संग्रह करना होता है | इसके बाद औषधि निर्माण के लिए संसाधन जुटाने पड़ते हैं इतनी अधिक मात्रा में औषधि निर्माण करके उसे जनजन तक पहुँचाना पड़ता है | इसमें बहुत अधिक समय लग जाता है | इसके बाद उस औषधि का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है |
इसीप्रकार से विज्ञान कितना भी उन्नत क्यों न हो !वैज्ञानिक कितने भी विद्वान् क्यों न हों | अनुसंधानों के नामपर कुछ भी क्यों न किया जा रहा हो | संसाधन कितने भी सक्षम क्यों न हों ! फिर भी महामारी से समाज की सुरक्षा करने में एवं महामारी संक्रमितों की चिकित्सा करने में समय तो लगता है |
महामारी के अचानक आ जाने पर इतने कम समय में न तो इस प्रकार के अध्ययन किए जा सकते हैं और न ही औषधीय द्रव्यों का संग्रह किया जा सकता है | औषधि निर्माण करके उन्हें जन जन तक पहुँचाने के लिए भी समय चाहिए होता है | इतनी सारी व्यवस्था करने में जितना समय लगेगा उतने समय तक महामारी प्रतीक्षा तो नहीं करती रहेगी | तब तक तो उस महामारी के बीतने का भी समय आ चुका होगा | महामारी का जो थोड़ा बहुत समय बचा भी होगा | वो यह कहकर पार कर लिया जाएगा कि महामारी का स्वरूप परिवर्तन हो रहा है | इस कारण निर्मित औषधि से लाभ नहीं हो पा रहा है | तब तक तो महामारी से जनधन का बहुत बड़ा नुक्सान हो चुका होता है |इसके बाद समय प्रभाव से वैसे ही महामारी समाप्त हो जाती है जैसे पैदा हुई होती है |
ऐसी परिस्थिति में उस समय निर्मित की गई महामारी से मुक्ति दिलाने वाली उस औषधि का उपयोग उस महामारी में प्रायः नहीं हो पाता है और भविष्य में संभावित किसी दूसरी महामारी के लायक वो इसलिए नहीं रह जाती है क्योंकि उस महामारी का वायरस कुछ दूसरा होगा | उसमें इस औषधि टीके आदि का उपयोग कैसे होगा | तब सारी प्रक्रिया नए सिरे से प्रारंभ की जाएगी |
इस प्रकार से महामारियों के बिषय में अनुसंधानों के माध्यम से किया बहुत कुछ जाता है | दिखाई भी पड़ता है किंतु होता कुछ नहीं है | महामारियों में सबकुछ सहकर जनता को जूझना स्वयं ही पड़ता है |
कुल मिलाकर रोग परीक्षण और चिकित्सा की समस्त प्रक्रिया में संसाधनों के साथ साथ जितना समय लगता है |इसके लिए समय ही कहाँ होता है | महामारी का वेग ही इतना अधिक होता है कि बड़ी संख्या में लोग तेजी से संक्रमित होने लगते हैं| कुछ लोगों की मृत्यु होते देखी जाती है |
ऐसे कठिन समय में औषधियाँ एवं चिकित्सा आदि के समस्त संसाधन उतनी बड़ी मात्रा में तुरंत उपलब्ध नहीं हो पाते हैं | संसाधनों के अभाव में लोगों की सुरक्षा कैसे की जा सकती है | ऐसे समय तुरंत कितने लोगों की जाँच कर ली जाएगी और कितने लोगों की चिकित्सा कैसे कर ली जाएगी | इसलिए उस समय ऐसे अनुसंधानों से कोई लाभ नहीं मिल पाता है | लोग सघन चिकित्सा कक्षों में चिकित्सकों के सामने वेंटीलेटरों पर पड़े पड़े मृत्यु को प्राप्त हो रहे होते हैं |
वर्तमान समय में रोग के परीक्षण में मशीनों से बड़ी मदद मिल जाती है |चिकित्सा का निर्णय लेना आसान होता है | कुछ मात्रा में तैयार औषधियाँ मिल जाती हैं | इसके अतिरिक्त भी जिन जिन आवश्यक औषधियों संसाधनों आदि की आवश्यकता होती है | वो पर्याप्त मात्रा में मिल जाते हैं |सुयोग्य चिकित्सक आसानी से सुलभ हो जाते हैं | महामारी में ऐसा नहीं होता है | महामारी में बहुत लोग एक साथ अस्वस्थ होते हैं | उन सबकी जाँच उसी समय उसी प्रकार से किया जाना संभव नहीं हो पाता है |एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों का रोग परीक्षण तो तुरंत किया जा सकता है सभी संक्रमितों का नहीं | ऐसी तैयारी महामारी से सुरक्षा के लिए करनी हो तो बड़े स्तर पर संसाधनों की आवश्यकता होती है |
आयुर्वैदिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार देखा जाए तो किसी रोगी की चिकित्सा करते समय रोग रोगी एवं औषधि अध्ययन करना होता है | उसी के अनुसार असंतुलित वातादि को औषधियों के द्वारा संतुलित करना होता है |वातादि दोषों के संतुलित होते ही रोगी रोगमुक्त होकर स्वस्थ हो जाता है | ऐसे ही अन्य चिकित्सा पद्धतियों में भी रोग रोगी औषधि आदि का अध्ययन करना होता है |
विशेष बात यह है कि संक्रमितों के शरीर एक जैसी प्रतिरोधक क्षमता से युक्त नहीं होते हैं | थोड़ा बहुत अंतर तो सभी में होता है | सभी लोग न तो एक जैसे रोगी होते हैं और न उनकी प्रतिरोधक क्षमता ही एक जैसी होती है | इसलिए उन्हें एक जैसी औषधि की एक जैसी मात्रा में आवश्यकता भी नहीं होती है |ऐसी स्थिति में एक जैसी औषधि एक जैसी मात्रा में सभी संक्रमितों को देकर उन्हें स्वस्थ नहीं किया जा सकता है | इसके बाद भी कुछ औषधियों टीकों आदि का प्रयोग सभी लोगों पर एक जैसा कर दिया जाता है ऐसी औषधियों टीकों आदि से वे स्वस्थ हो जाते हों | जिन्हें उनकी आवश्यकता होती है |जिन शरीरों को ऐसी औषधियों टीकों आदि की आवश्यकता बिल्कुल ही नहीं होती है | उनमें ऐसी औषधियों के सेवन से छोटे बड़े तमाम प्रकार के दुष्प्रभाव प्रकट होते हैं | इसीलिए कोरोना महामारी के बाद भी बहुत स्वस्थ लोगों की मृत्यु होते देखी जाती रही है |
कुल मिलाकर महामारी से मुक्ति दिलाने में सक्षम मानकर जिन जिन औषधियों टीकों आदि का प्रयोग किया जाता रहा है | उनमें वो गुण है भी या नहीं ये तो तभी पता चल पाएगा जब इस महामारी के बाद कोई ऐसी महामारी आएगी | संभव है कि महामारी से मुक्ति दिलाने वाली औषधियों टीकों आदि का भी ऐसा कोई रहस्य अभी तक उद्घाटित न हो पाया हो |प्लाज्माथैरेपी को भी पहली लहर के समय संक्रमण से मुक्ति दिलाने में प्रभावी मान लिया गया था | दूसरी लहर न आती तो ये भ्रम नहीं टूटता | दूसरी लहर आते ही सच्चाई सामने आ गई कि प्लाज्माथैरेपी महामारी से मुक्ति दिलाने में सक्षम नहीं है |
अनुसंधानों को तर्क की कसौटी पर कैसे बिना वैज्ञानिकता की पुष्टि नहीं होती है | इसलिए तार्किक दृष्टि से देखा जाए तो करते समय तर्क वैसे भी जिन लोगों ने महामारी से मुक्ति दिलाने वाली वैक्सीनों का सेवन नहीं किया था | वे अभी भी संक्रमित होते जा रहे हों ऐसा तो नहीं है वे भी उसी समय उसी प्रकार से उतने ही महामारी से स्वस्थ और सुरक्षित दिख रहे हैं | जितने वैक्सीन लेने वाले स्वस्थ और सुरक्षित हैं | ऐसी स्थिति में औषधियों टीकों आदि का प्रभाव अलग से कैसे पता लगे | जिन्होंने वैक्सीन ली है और जिन्होंने नहीं ली है उनमें दोनों प्रकार के लोगों में कुछ तो अंतर दिखना चाहिए | वैक्सीन लेने के बाद भी कुछ लोगों को संक्रमित होते देखा जा रहा था तो कुछ लोगों ने वैक्सीन भी नहीं ली और संक्रमित भी नहीं हुए | ऐसी स्थिति में संक्रमितों पर वैक्सीन का प्रभाव पड़ा या नहीं और पड़ा तो कितना पड़ा | इसका आकलन कैसे किया जाएगा |
अचानक महामारी आ जाने पर महामारी लोगों को तेजी से अपनी चपेट में लेती जा रही होती है | बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होते एवं मृत्यु को प्राप्त होते जा रहे होते हैं | दूसरी ओर सुरक्षा उपायों का दूर दूर तक कोई पता नहीं होता है |
ऐसे समय अच्छी से अच्छी औषधि यदि तुरंत भी मिल जाए तो उसे उतनी अधिक मात्रा में तैयार करके जन जन तक पहुँचाने में इतना समय लग जाएगा | जितने में आधी महामारी बीत चुकी होगी | इसके बाद उसका संक्रमितों की चिकित्सा में उपयोग किया जाएगा |संक्रमितों पर उसका प्रभाव पड़ने में बहुत समय लग जाएगा ! प्रभावी औषधि यदि अनुसंधान पूर्वक खोजनी भी पड़े तो रोग रोगी एवं महामारी की प्रकृति पता करके उसी के अनुसार औषधि खोजनी होगी | इस संपूर्ण प्रक्रिया में जितना समय लगता है, उतने समय तक महामारी के समाप्त होने का समय आ जाता है | महामारी समाप्त होनी जब प्रारंभ ही हो गई होती है | ऐसे समय बिषाणुओं का प्रभाव घटना शुरू हो जाने के कारण लोग प्राकृतिक रूप से रोग मुक्त होने शुरू हो जाते हैं |इसलिए चिकित्सकीय औषधियों टीकों आदि की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है | ऐसे समय उन्हें टीके औषधियाँ आदि देनी शुरू की जाती हैं | उनका दुष्प्रभाव होना स्वाभाविक ही है | उन टीकों औषधियों से महामारी संक्रमितों को स्वस्थ करने में मदद मिलती भी है या नहीं ये तो तभी पता लग पाएगा जब ऐसी कोई महामारी दूसरी बार आएगी |
वहीं दूसरी ओर ऐसे समय कितने भी प्रभावी प्रयत्न कर लिए जाएँ | उनसे उस महामारी में तो कोई लाभ नहीं हो सकता है | ऐसी परिस्थिति में महामारी से लोगों के संक्रमित होने लगने के बाद मनुष्यकृत प्रयत्नों से मनुष्यों की सुरक्षा करना संभव नहीं होता है | कोई उपाय यदि करना भी है तो उनकी तैयारी महामारी आने से पहले ही करके रखनी होगी
पूर्वानुमानों के बिना महामारी से सुरक्षा असंभव !
चिकित्सा में किस रोग से मुक्ति दिलाने के लिए किस प्रकार की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए | औषधिनिर्माण के लिए किसप्रकार के औषधीय द्रव्यों का संग्रह करना होगा |इसका निर्णय उस रोग की प्रकृति पहचानकर लेना होता है |इसके लिए तरह तरह से रोग महारोग औषधि एवं शरीरों की तत्कालीन परिस्थिति समझना आवश्यक होता है | उसी के आधार पर महामारी पीड़ितों की सुरक्षा की जा सकती है | इस सारी प्रक्रिया में बहुत समय लगता है |
ऐसे में लोगों के तेजी से संक्रमित होने या मृत्यु को प्राप्त होने लगने के बाद यदि पता लगता है कि महामारी आ गई है | उस परिस्थिति में लोगों को सुरक्षित बचाने के लिए तुरंत क्या कर लिया जाएगा | कुछ करने के लिए भी तो समय चाहिए | वैसे भी महामारी से सुरक्षा के लिए कुछ नहीं बहुत कुछ करना पड़ता है |
महामारी जैसी घटनाओं के समय व्यवस्था बहुत बड़े स्तर पर करनी होती है | जितने बड़े स्तर पर करनी होती है | उतना अधिक समय लगता है | यही व्यवस्था राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जानी हो तो सामग्री, परिश्रम एवं संसाधनों के साथ साथ इसमें समय भी बहुत अधिक लग जाता है |ऐसी स्थिति में संक्रमितों पर मनुष्यकृत प्रयत्नों का प्रभाव पड़ने के लिए जो समय चाहिए वो महामारी आने के बाद तुरंत कैसे मिल पाएगा | इतने कम समय में संक्रमितों की चिकित्सा हेतु औषधि कैसे तैयार कर ली जाएगी | इतनी अधिक मात्रा में औषधि निर्माण के लिए अधिक द्रव्यों संसाधनों को जुटाने में भी तो समय लगेगा |
इसके लिए समय चाहिए |समय तभी मिल सकता है जब महामारी या उसकी लहरों के आने से पहले उनके बिषय में सही पूर्वानुमान लगाए जा सकें !
इसका कारण महामारी के अचानक आ जाने पर न तो महामारी का अध्ययन करना संभव होता है और न ही संक्रमितों के शरीरों एवं औषधियों का अध्ययन करना भी संभव हो पाता है | इतना समय ही नहीं मिल पाता है | महामारी संबंधी पूर्वानुमानों के अभाव में महामारी के आने की सूचना ही तभी मिल पाती है, जब बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होने लगते हैं |उस समय महामारी आने के बिषय में पता लग भी जाए तो भी तुरंत क्या कर लिया जाएगा जब तैयारी करने के लिए पहले से समय ही नहीं मिला है तो मजबूत तैयारी के बिना महामारी के प्रकोप से किसी को सुरक्षित बचाया जाना तुरंत के प्रयासों से कैसे संभव हो पाएगा |
इसलिए महामारी आने से उतने पहले तो महामारी आने के बिषय में पूर्वानुमान पता लगा ही लिया जाना चाहिए | जितना समय महामारी से सुरक्षा करने की तैयारी प्रक्रिया में लगता है | जो महामारी से सुरक्षा के लिए की जाती है | महामारी की किसी भी लहर के आने से पहले उसके बिषय में यदि पूर्वानुमान पता लगाए जा पाते तो कोविड नियमों का पालन करके या अन्य आवश्यक सावधानियाँ बरतकर लोगों की सुरक्षा के लिए कुछ प्रभावी प्रयत्न किए जा सकते थे |पूर्वानुमान पता न होने से जो आवश्यक सावधानियाँ बरती जा सकती थीं | वैसा भी नहीं किया जा सका |
इसीलिए महामारी आ रही है या महामारी कब आ रही है | इसका पहले से पता लगाया जाना ही एक मात्र विकल्प है | जिससे महामारी आने से पूर्व वह सब तैयारी करके रखी जा सके जो महामारी से सुरक्षा के लिए आवश्यक होती है | ऐसा तभी किया जा सकता है जब महामारी जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमानु लगाने के लिए कोई मजबूत वैज्ञानिक प्रक्रिया हो | ऐसी किसी प्रक्रिया के अभाव में इसके शुरू होने का पता ही तभी लग पाता है ,जब लोग पीड़ित होने शुरू हो जाते हैं तब तो सभी को अपनी अपनी जान बचाने की पड़ी होती है | उस समय इतनी बड़ी अनुसंधान प्रक्रिया का पालन कैसे कर लिया जाएगा | इसके लिए समय ही नहीं होता है |
महामारी के अचानक आ जाने पर लोग तेजी से संक्रमित होने एवं मृत्यु को प्राप्त होने लगते हैं | उस समय लोगों की सुरक्षा के लिए इतनी सारी परीक्षण प्रक्रिया का पालन किया जा सकता है |ऐसे समय कुछ औषधियों टीकों आदि का प्रयोग अनुमान के आधार पर सभी लोगों पर एक जैसा कर दिया जाता है ,किंतु सभी लोग न तो एक जैसे रोगी होते हैं और न ही उन्हें एक जैसी औषधि की आवश्यकता होती है | उन सभी के शरीर भी एक जैसी प्रतिरोधक क्षमता से युक्त नहीं होते हैं | थोड़ा बहुत अंतर तो सभी में होता है फिर एक जैसी औषधि एक जैसी मात्रा में सभी को देकर उन्हें स्वस्थ कैसे किया जा सकता है |
अंदाजे से दी जाने वाली ऐसी औषधियों टीकों आदि से वे तो स्वस्थ हो जाते हैं | जिन्हें उनकी आवश्यकता होती है|जिन शरीरों को ऐसी औषधियों टीकों आदि की आवश्यकता बिल्कुल ही नहीं होती है | उनमें इनके सेवन से छोटे बड़े तमाम प्रकार के दुष्प्रभाव प्रकट होते हैं | कोरोना महामारी के बाद भी बहुत स्वस्थ लोगों की मृत्यु होते देखी जाती रही है |ऐसे दुष्प्रभावों से बचने के लिए चिकित्सा से पूर्व रोग औषधि एवं शरीरों की प्रकृति का अध्ययन करना आवश्यक होता है |महामारी के अचानक आ जाने पर इतने कम समय में न तो इस प्रकार के अध्ययन किए जा सकते हैं और न ही औषधीय द्रव्यों का संग्रह किया जा सकता है | औषधि निर्माण करने में , निर्मित औषधियों का परीक्षण करने में ,परीक्षित औषधियों को जन जन तक पहुँचाने में बहुत समय लग जाता है |
कहाँ है पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान !
नियमतः किसी रोग के प्रारंभ होने से पहले उस प्रकार की सावधानी बरतनी प्रारंभ कर देनी चाहिए | जिससे महामारी से शरीर को रोगी होने से बचाया जा सके ! यदि रोग प्रारंभ हो भी जाए तो रोग का सही निदान तुरंत किया जा सके | उसी के आधार पर रोग मुक्ति दिलाने के लिए प्रभावी चिकित्सा तुरंत प्रारंभ की जा सके | इससे शरीर रोगी भले जाए किंतु चिकित्सा के प्रभाव से उसे धीरे धीरे रोग मुक्ति मिल जाती है |
महामारी जैसे बड़े रोगों में बहुत अधिक सतर्कता बरतनी पड़ती है | महामारियों का वेग बहुत अधिक होता है | इसमें बड़ी संख्या में लोग संक्रमित होते चले जा रहे होते हैं| ऐसे में रोग की प्रकृति खोजना बड़ा काम होता है | इसके बाद चिकित्सा का निर्णय तुरंत लिया जाना कठिन होता है |औषधि खोजने ,औषधीय द्रव्यों का संग्रह करने एवं औषधि निर्माण करने में काफी समय लग जाता है | इसके बाद कहीं चिकित्सा की प्रक्रिया प्रारंभ हो पाती है |इतने समय तक तो रोग बहुत अधिक बढ़ चुका होता है | इतने समय तक महामारियाँ न तो प्रतीक्षा करती रहेंगी और न ही शरीर महामारी की पीड़ा सहने लायक रह जाते हैं |तब तक तो शरीर अत्यंत दुर्बल हो चुके होते हैं |
ऐसी परिस्थिति में महामारी से लोगों की सुरक्षा तभी की जा सकती है | जब महामारी आने से पहले उतनी तैयारियाँ पूरी करके रख ली जाएँ | जिनसे मनुष्यों की सुरक्षा की जा सके | ऐसा तभी किया जा सकता है जब महामारी आने से पहले उसके बिषय में पूर्वानुमान पता हों | पूर्वानुमान लगाना अत्यंत कठिन कार्य होता है | इसलिए गलत निकल जाते हैं | कई बार लगता है कि पूर्वानुमानों के गलत निकलने का कारण पूर्वानुमान लगाने में कोई गलती छूट गई होगी ,किंतु ऐसा नहीं था |पूर्वानुमान लगाने के लिए जब कोई विज्ञान ही नहीं है तो पूर्वानुमान लगाने के लिए अंदाजे के आधार पर ही निर्णय लेना होगा |
महामारी या वर्षा आदि के बिषय में जितना जो कुछ पता हो उसके आधार पर जो न पता हो उस प्रकार के कुछ अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाएँ | यदि वे गलत निकल जाते हैं | इसका मतलब उस घटना के बिषय में जो जो कुछ समझा गया है वो सही नहीं है |यदि वे सही निकल जाते हैं तो उस घटना को ठीक ठीक से समझ लिया गया है | ऐसा मान लिया जाना चाहिए | उस घटना का यही विज्ञान है |ऐसा मानकर उसी के आधार पर भविष्य बिषयक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है |
महामारी पैदा होने के जिम्मेदार कारणों की खोज !
इसीप्रकार से महामारी आने जाने एवं उससे संबंधित संक्रमण बढ़ने घटने के लिए कुछ विशेषज्ञों ने तापमान बढ़ने घटने को जिम्मेदार कारण माना था | ऐसी स्थिति में महामारी संबंधी पूर्वानुमान लगाने के लिए पहले तापमान बढ़ने घटने के बिषय में पूर्वानुमान लगाना आवश्यक हो गया था | विशेषज्ञों के द्वारा तापमान के बिषय में जो पूर्वानुमान लगाए गए थे वे गलत निकल गए |ऐसी स्थिति में तापमान बढ़ने घटने के आधार पर महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना कैसे संभव हो सकता है |
ऐसे ही वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के बिषय में पूर्वानुमान लगाना तो दूर अभी तक इसके बढ़ने घटने के लिए जिम्मेदार कारण ही नहीं खोजे जा सके हैं,तो इसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान कैसे लगाए जा सकेंगे |ऐसा किए बिना उसके आधार पर महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना संभव न हो पाएगा |
सुरक्षा में सहायक हो सकते हैं पूर्वानुमान !
ऐसी परिस्थिति में महामारी जैसे स्वास्थ्य संकटों से यदि जनधन की रक्षा की जानी है तो मुख्य ध्यान उस समस्या और उसी के समाधान पर देना होगा |प्राकृतिक संकटों से जनधन की सुरक्षा के लिए अनुसंधान किए जाते हैं |अनुसंधानों से जनधन की सुरक्षा में यदि मदद मिले तब तो अनुसंधान और यदि कोई मदद न मिले तो उन्हें वैज्ञानिक अनुसंधान कैसे कहा जा सकता है |
इसलिए महामारियों में होने वाली जनधन हानि को कम करने का लक्ष्य है तो सबसे पहले यह पता लगाना होगा कि महामारी का निदान एवं चिकित्सकीय उपाय से जनधन की सुरक्षा करने में कितना समय लगेगा | रोग का सही निदान और चिकित्सकीय उपाय करने के लिए जितना समय चाहिए | महामारी आने से उतने पहले महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगा पाना यदि संभव है तब तो महामारियों से सुरक्षा कार्य में विज्ञान कुछ भूमिका निभा सकता है अन्यथा नहीं !फिर तो जो करना होगा वो महामारी ही करेगी |
किसी भी रोग या महारोग से मुक्ति पाने या दिलाने के लिए उस रोग के अनुसार ही औषधि देनी होती है | किस रोग के लिए कैसी औषधि दी जानी चाहिए | इसका निर्णय उस रोग की प्रकृति पहचानकर लेना होता है | यदि रोग की प्रकृति ही न पहचानी जा सकी हो तो औषधि का निर्माण किस आधार पर कर लिया जाता और कैसे कर ली जाती संक्रमितों की चिकित्सा ! औषधि निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में औषधीय द्रव्यों का संग्रह करना होता है |औषधि निर्माण के लिए अधिक संसाधनों को जुटाया जाना होता है | सही औषधि को समझे बिना औषधीय द्रव्यों का संग्रह किया जाना कठिन था | इसके बाद औषधि निर्माण किए जाने या निर्मित औषधि का परीक्षण किए जाने आदि में काफी समय लग जाता है | इसके बाद उस औषधि को जन जन तक पहुँचाना होता है |इसमें बहुत समय लग जाता है |
इस प्रकार की व्यवस्था जितने बड़े स्तर पर करनी होती है | उतना अधिक समय लगता है | राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जानी हो तो सामग्री, परिश्रम एवं संसाधनों के साथ साथ इसमें समय भी बहुत अधिक लग जाता है | इतने समय तक महामारी रुककर प्रतीक्षा तो नहीं करती रहेगी |
जिस महामारी के प्रारंभ होते ही लोग तेजी से संक्रमित होने एवं मृत्यु को प्राप्त होने लगते हैं |ऐसे संकट काल में इतना समय कहाँ होता है कि लोगों की सुरक्षा के लिए इतनी सारी प्रक्रिया का पालन किया जा सके |इस प्रक्रिया में जितना समय लगता है|उतने में तो महामारी जनधन का बहुत नुकसान कर चुकी होती है |
इसीलिए रोग का सही निदान और चिकित्सकीय उपाय करने के लिए जितना समय चाहिए | महामारी आने से उतने पहले महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान पता लगा लेना आवश्यक होता है | जिससे महामारी से महामारी प्रारंभ होने से उतने पहले उससे सुरक्षा की तैयारियाँ करके करके रखी जा सकें | जितना समय सही निदान एवं उपाय करने में लग सकता हो |
कोरोनामहामारी पर प्रभावी है प्राचीनविज्ञान
प्राकृतिक आपदाएँ महामारियाँ आदि तो प्राचीनकाल से ही घटित होती रही होंगी | सृष्टि के आरंभिक काल में तो जनसंख्या बहुत कम रही होगी | प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदि को उस युग में यदि जनधन का इतना नुक्सान करने दिया गया होता,तब तो सृष्टि का क्रम इतने आगे तक बढ़ पाना संभव ही न था | उस युग के सक्षम वैज्ञानिकों ने उसी समय बिना किसी आधुनिक उपकरण के जब सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में सही सटीक पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान खोज लिया था तो वे प्राकृतिक आपदाओं महामारियों के बिषय में क्या पूर्वानुमान नहीं लगा पाए होंगे | जिनसे मनुष्य जीवन को सीधे जूझना पड़ता था |प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदिके बिषय में वे न केवल पूर्वानुमान लगा लेते रहे होंगे,प्रत्युत ऐसी प्राकृतिक घटनाओं से जनजीवन की सुरक्षा करने के उपाय भी खोज लिए होंगे | इसीलिए तो सृष्टि का क्रम इतने आगे तक बढ़ना संभव हो पाया है |
ऐसे सक्षम प्राचीन ज्ञानविज्ञान की उन उपलब्धियों पर विश्वास करके मैंने भी उसी प्राचीन विज्ञान के आधार पर उसी प्रकार के अनुसंधान करने का निश्चय किया था | जिससे प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदि के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के साथ साथ ऐसी आपदाओं से जनधन की सुरक्षा करने का न केवल लक्ष्य निश्चित किया ,प्रत्युत कोरोना महामारी की सभी लहरों के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाने के लिए जो प्रयत्न किए वे सफल हुए |इसके प्रमाण पीएमओ की मेल पर विद्यमान हैं |
मेरे प्राचीन वैज्ञानिक अनुसंधानों का दूसरा लक्ष्य महामारी से समाज को सुरक्षित बचाना था | इसलिए कोरोना महामारी की दूसरी लहर का वेग जब बहुत अधिक बढ़ने लगा तो उसे घोषणापूर्वक मैंने तुरंत नियंत्रित करने का प्रयत्न जैसे ही प्रारंभ किया वैसे ही महामारी की दूसरी लहर तुरंत नियंत्रत होने लगी थी | इसके प्रमाण पीएमओ की मेल पर अभी भी सुरक्षित हैं |
विश्व में मुझे छोड़कर किसी दूसरे व्यक्ति या वैज्ञानिक को इतनी बड़ी सफलता नहीं मिली है | मुझे भी यह सफलता केवल इसलिए मिली है ,क्योंकि मैंने भारत के प्राचीन विज्ञान के आधार पर अनुसंधान पूर्वक महामारी संबंधी पूर्वानुमान लगाए हैं | इसलिए वे सही निकले हैं |
प्राचीन विज्ञान के आधार पर मेरे अनुसंधान
प्राचीनविज्ञान के आधार पर मैं पिछले 35 वर्षों से अनुसंधान करता आ रहा हूँ | जिससे मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में तो पूर्वानुमान लगाता ही रहा हूँ | उसी के आधार पर मैं महामारी पैदा और समाप्त होने के सही कारणों की पहचान कर पाया हूँ |
कोरोनामहामारी के बिषय में विश्ववैज्ञानिकों ने जिन बातों को बहुत बाद में कहा या स्वीकार किया है | कुछ बिंदुओं पर तो वे अभी तक दुविधा में हैं | ऐसी सभी बातें मैंने 19 मार्च 2020 को ही लिखकर पीएमओ की मेल पर भेज दी थीं | मैंने उसमें लिखा था -
"ऐसी महामारियों को सदाचरण स्वच्छता उचित आहार विहार आदि धर्म कर्म ,ईश्वर आराधन एवं ब्रह्मचर्य आदि के अनुपालन से जीता जा सकता है |"(बाद में कोविड नियमों में स्वच्छता को सम्मिलित किया गया था "
"इसमें चिकित्सकीय प्रयासों का बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा | क्योंकि महामारियों में होने वाले रोगों का न कोई लक्षण होता है न निदान और न ही कोई औषधि होती है |"
"किसी भी महामारी की शुरुआत समय के बिगड़ने से होती है और समय के सुधरने पर ही महामारी की समाप्ति होती है | "
"बुरे समय का प्रभाव सबसे पहले ऋतुओं पर पड़ता है | ऋतुओं का प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है उसका प्रभाव वृक्षों बनस्पतियों फूलों फलों फसलों आदि समस्त खाने पीने की वस्तुओं पर पड़ता है वायु और जल पर भी पड़ता है इससे वहाँ के कुओं नदियों तालाबों आदि का जल प्रदूषित हो जाता है | इन परिस्थितियों का प्रभाव जीवन पर पड़ता है इसलिए शरीर ऐसे रोगों से पीड़ित होने लगते हैं |" इसलिए महामारी प्राकृतिक है|
कुलमिलाकर मैंने ये सब कुछ उस मेल में लिखकर भेजा था | इसके साथ ही साथ महामारी की सभी लहरों के बिषय में पूर्वानुमान लगाकर आगे से आगे पीएमओ की मेल पर भेजता रहा हूँ | जो सही निकलते रहे हैं | साक्ष्यरूप में वे अभी तक सुरक्षित रखे गए हैं |
दूसरी लहर का वेग जब बहुत अधिक बढ़ चुका था | संक्रमितों एवं मृतकों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी | इसका पूर्वानुमान 19 अप्रैल 2021 को ही मैंने पीएमओ की मेल पर भेज दिया था | जो सही निकला है | यह प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान के द्वारा ही संभव हो पाया है | दूसरी लहर के बिषय में मैंने उस मेल में यह लिखा था -
" यज्ञ प्रभाव के विषय में मेरा अनुमान है कि ईश्वरीय कृपा से 20 अप्रैल 2021 से ही महामारी पर अंकुश लगना प्रारंभ हो जाएगा ! 23 अप्रैल के बाद महामारी जनित संक्रमण कम होता दिखाई भी पड़ेगा !और 2 मई के बाद से पूरी तरह से संक्रमण समाप्त होना प्रारंभ हो जाएगा |"
" 20 अप्रैल 2021 को यज्ञ प्रारंभ होते ही महामारी का वेग रुकने लगा था | 23 अप्रैल से संक्रमण बढ़ना रुक गया था | वह यज्ञ 11 दिवसीय था |इसलिए 11 हवें दिन अर्थात 1 मई को यज्ञ की पूर्णाहुति होते ही उसी दिन से दिल्ली में संक्रमितों की संख्या कम होने लगी थी | राष्ट्रीय कोरोना ग्राफ में भी 6 मई से राष्ट्रीय स्तर पर संक्रमण कम होते देखा जा रहा था |
कुल मिलाकर प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान वर्तमान समय में भी प्राकृतिक घटनाओं को समझने एवं उनके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने में प्राचीनकाल की तरह ही अभी भी प्रासंगिक हैं | सनातन धर्म की इस वैज्ञानिक सामर्थ्य का उपयोग करके प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से समाज की सुरक्षा अभी भी की जा सकती है |
वैदिक विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो महामारी का मैंने जो निदान निकाला था | वो बिल्कुल सही घटित हुआ है | इसीप्रकार से महामारी के बिषय में जितने भी प्रकार के पूर्वानुमान लगाकर मैंने पीएमओ की मेल पर भेजे थे वे सभी सही निकले हैं |
इससे यह सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में ऐसा विज्ञान था | जिसके द्वारा उस युग से अभीतक प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से जनता की सुरक्षा की जाती रही है | इसीलिए सृष्टिक्रम आगे बढ़ पाया है | प्रकृति के स्वभाव को समझकर प्राकृतिकघटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने की दृष्टि से प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान वर्तमान समय में भी उतना ही प्रासंगिक है |जितना प्राचीनकाल में था | बीते कुछ सौ वर्ष पूर्व हुए महाकवि घाघ जिन्होंने उसी प्राचीन ऋतुविज्ञान के आधार पर मौसम के स्वभाव को समझा तथा समाज को समझाया था | उन्होंने उसी प्राचीन विज्ञान से संबंधित अपने अनुसंधानों अनुभवों के आधार पर वर्षा बिषयक पूर्वानुमान लगाने के लिए जिन सूत्रों का निर्माण किया था | जिनके आधार पर लगाए गए मौसमसंबंधी पूर्वानुमान अभी भी सही निकलते देखे जाते हैं |इसीलिए तो किसानों एवं ग्रामीणों में उनकी लोकप्रियता अभी भी बनी हुई है |
प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में भारतीय प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान से संबंधित अनुसंधान न किए जाने के कारण समाज को इससे होने वाला लाभ नहीं मिल पा रहा है | कोरोना महामारी के बिषय में यदि प्राचीनविज्ञान के आधार पर अनुसंधान किए गए होते तो समाज को महामारी से इतना पीड़ित नहीं होना पड़ता |
इसप्रकार से महामारी को समझना जब संभव हो पायगा तभी वर्तमान महामारी से लोगों को सुरक्षित बचाने में कुछ मदद मिल सकती है | भावी महामारियों से लोगों की सुरक्षा के लिए उपाय भी तभी किए जा सकते हैं |
कोरोनामहामारी मौसम और महामारीविज्ञान !
अनुसंधानों का उद्देश्य यदि प्राचीन विज्ञान से वर्तमानविज्ञान को बड़ा सिद्ध करना नहीं है तो विज्ञान के उन विकल्पों पर बिचार किया जाना चाहिए | जिनसे प्राकृतिक आपदाओं या महामारियों से पीड़ित लोगों को अधिक से अधिक मदद मिल सके |प्राकृतिक आपदाओं महामारियों के समय जो अनुसंधान लोगों के जनधन की सुरक्षा करने में जितने अधिक सहायक हो सकें | अनुसंधानों के उद्देश्य से ऐसे वैज्ञानिकों को अधिक मदद दी जानी चाहिए | जो संकट के समय समाज को सुरक्षित बचाने के लिए न केवल प्रयत्न करते हों ,प्रत्युत उसमें सफल भी होते हों |ऐसे अनुसंधानों से प्राप्त परिणामों को जनसुरक्षा की कसौटी पर कसा जाना चाहिए | किन अनुसंधानों से समाज को कितनी मदद मिलती है | यह देखा जाना चाहिए आधुनिकविज्ञान या प्राचीनविज्ञान से संबंधित भेद भाव नहीं होना चाहिए |
महामारी तथा उसकी लहरों के आने जाने के बिषय में किसी ने भी यदि पहले से सही पूर्वानुमान लगाए हों ,तो उसकी सच्चाई का परीक्षण किया जाए | जो पूर्वानुमान सही निकल जाते हैं |उनका वैज्ञानिक आधार पूछे बिना सभी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर ऐसे पूर्वानुमानों का जनहित में उपयोग किया जाना चाहिए ,क्योंकि अनुसंधानों का उद्देश्य जनहित खोजना ही है |
आधुनिकविज्ञान अभी कुछ सौ वर्ष पहले आया है | इससे पहले तो प्राचीन विज्ञान ही था |प्राकृतिक आपदाएँ और महामारियाँ समय संबंधी घटनाएँ हैं | जो हमेंशा से घटित होती रही हैं | भारत के प्राचीनविज्ञान के द्वारा हमेंशा से प्राकृतिकआपदाओं तथा महामारियों से समाज की सुरक्षा की जाती रही है| इससे ये सिद्ध होता है कि प्राचीनविज्ञान से संबंधित अनुसंधानों के द्वारा प्राकृतिकआपदाओं तथा महामारियों से समाज की सुरक्षा अभी भी की जा सकती है |
आधुनिकविज्ञान की तरह ही प्राचीनविज्ञान का भी पठन पाठन भारत सरकार अपने संस्कृतविश्वविद्यालयों में करवाती है |उसी तरह प्राचीन विज्ञान से संबंधित बिषयों में भी एम.ए. पीएचडी जैसी डिग्रियाँ करवाई जाती हैं | ऐसे अनुसंधानों का भी प्राकृतिकआपदाओं एवं महामारी जैसे संकटों से समाज की सुरक्षा के लिए उपयोग किया जाए तो संभव है ,उससे कुछ ऐसा समाधान मिल जाए जो प्राकृतिकआपदाओं एवं महामारी जैसे संकटों से समाज की सुरक्षा करने में सहायक हो |जिन प्राकृतिक संकटों का समाधान अभी तक आधुनिकविज्ञान के आधार पर निकाला नहीं जा सका है | उन प्राकृतिक संकटों का समाधान निकालने के लिए प्राचीन विज्ञान का भी उपयोग किया जाना चाहिए |
इसी उद्देश्य से मैंने सरकारी संस्कृत विश्व विद्यालय से प्राचीनविज्ञान से संबंधित बिषयों में उच्चकोटि की शिक्षा ली है | उसी के आधार पर मैं बीते 35 वर्षों से अनुसंधान करता आ रहा हूँ | उसके आधार पर प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारी जैसी आपदाओं के बिषय में जो निष्कर्ष निकाले हैं | वे सही निकलते रहे हैं | महामारी के बिषय में मेरे लगाए हुए पूर्वानुमान सही निकलते रहे हैं | मेरे अतिरिक्त विश्व में किसी अन्य के द्वारा कोरोना महामारी के बिषय में सही पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सके हैं |इसलिए इन अनुसंधानों को जनहित में विशेष प्रोत्साहन मिलना चाहिए |
कोरोनामहामारी संबंधी मेरी अनुसंधान प्रक्रिया के अनुसार महामारी की कुल 11 लहरें आई थीं | इन ग्यारहों लहरों में से प्रत्येक लहर के पूर्वानुमान मैं आगे से आगे पीएमओ की मेल पर भेजता आ रहा हूँ | पूर्वानुमानों में प्रत्येक लहर के आने और जाने की स्पष्ट तारीखें लिखी गई हैं | जिनका मिलान कोरोना ग्राफ तथा उस समय के समाचार पत्रों से करने पर मेरे द्वारा लगाए गए पूर्वानुमान सही घटित हुए हैं |
ऐसी परिस्थिति में मेरा विनम्र निवेदन है कि अनुसंधानों का उद्देश्य यदि जनहित करना ही है तो जिस किसी भी विज्ञान के द्वारा जनहित से जुड़े अनुसंधानकार्यों में सफलता मिले | उन्हें अपनाया जाना चाहिए |भारत के जिस प्राचीनविज्ञान के द्वारा प्राकृतिक आपदाओं तथा महामारियों से मनुष्यों की सुरक्षा की जाती रही है | उसके द्वारा अभी भी ऐसा किया जा सकता है | प्राचीन विज्ञान यदि जनधन की सुरक्षा करने में सहायक हो सकता है तो उसके आधार पर अनुसंधान करने में संकोच नहीं किया जाना चाहिए |
समय प्रभाव से महामारीजनित संक्रमण जब स्वयं समाप्त होने लगता है तब सभी रोगी स्वतः संक्रमण मुक्त होने लगते हैं |ऐसे समय जिन्होंने चिकित्सकीय उपाय किए हैं वे स्वस्थ हुए हैं तो कुछ ने उपायों के नाम पर भिन्न भिन्न प्रकार के खानपान रहन सहन आदि अपनाए हैं | वे भी स्वस्थ हुए हैं | ऐसे भी बहुत लोग हैं | जिन्होंने उपायों के नाम पर कुछ भी नहीं किया है |वे भी स्वस्थ हुए हैं |
विशेष बात यह है कि भिन्न भिन्न प्रकार के उपायों को करने या न करने के परिणाम एक जैसे नहीं निकल सकते हैं| यदि ऐसा होता है तो इसका मतलब उन सभी के स्वस्थ होने का कारण वे उपाय न होकर प्रत्युत वह समयसुधार है |जिसका प्रभाव सभी पर एक समान रूप से पड़ रहा होता है | वे सभी समान रूप से स्वस्थ हो रहे होते हैं |ऐसे समय रोग स्वतः समाप्त हो ही रहा होता है | समय प्रभाव को न समझने वाले लोग स्वस्थ होने का श्रेय अपने अपने उपायों को देने लगते हैं |चिकित्सा का लाभ ले रहे रोगियों के स्वस्थ होने का श्रेय चिकित्सक अपनी चिकित्सा को देने लगते हैं | ऐसे भ्रम की अवस्था में ही प्लाज्मा थैरेपी जैसे प्रयोगों को महामारी से मुक्ति दिलाने में समर्थ मान लिया जाता है |
इसके बाद समय प्रभाव से जब संक्रमण स्वतः बढ़ने लगता है | उस समय सभी लोगों का अपने अपने उपायों से संबंधित अपना भ्रम टूटने लगता है | रेमडिसिविर प्लाज्मा थैरेपी आदि के कोरोना महामारी से मुक्ति दिलाने संबंधी प्रभाव पर विश्वास घटने लगता है |
अनुसंधानों का लक्ष्य है जनधन की सुरक्षा !
प्राचीन काल में अनुसंधानकर्ताओं के द्वारा खोजे गए प्राकृतिक घटनाओं के कारणों अनुमानों पूर्वानुमानों से राजाओं शासकों सरकारों का संतुष्ट होना तो आवश्यक होता ही था | इसके साथ साथ उन अनुसंधानों से देश वासियों को संतुष्ट किया जाना आवश्यक माना जाता था |जनता की आवश्यकताओं अपेक्षाओं पर अनुसंधानों को खरा उतरना पड़ता था | वस्तुतः जिन अनुसंधानों पर किए जाने वाले व्यय का वहन जनता करती है | उन अनुसंधानों को जनता की आवश्यकताओं पर खरा उतरना होता था |
प्राचीनकाल में जो वैज्ञानिक जिस घटना से संबंधित होता था | उसे उसप्रकार की घटनाओं के घटित होने के कारण अनुमान पूर्वानुमान आदि पता लगाकर पहले से सार्वजनिक रूप से घोषित करने होते थे | जनता की दृष्टि में यदि वे सही निकल जाते थे तो उन्हें उस बिषय का वैज्ञानिक मान लिया जाता था |इसप्रकार से प्रत्येक वैज्ञानिक को सार्वजनिक रूप से अपनी वैज्ञानिकता प्रमाणित करनी होती थी | इसमें यदि वे सफल हो जाते थे तब उन्हें वैज्ञानिकपद प्रतिष्ठा प्रदान की जाती थी |
उदाहरण के रूप में भूकंपवैज्ञानिकों का चयन करते समय भूकंप को समझने एवं उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने की परीक्षा में सफल होने पर उसे भूकंपवैज्ञानिक के रूप में पद प्रतिष्ठा पारिश्रमिक आदि प्रदान किया जाता था | वर्तमान भूकंप वैज्ञानिकों ने भूकंपों के बिषय में अभीतक ऐसी क्या खोज की है| जिसके द्वारा भूकंप आने पर होने वाले जन धन के नुक्सान को कम किया जा सका हो |
इसीप्रकार से वर्षाविशेषज्ञों अर्थात मौसमविशेषज्ञों को चयनित करने के लिए उन्हें प्राकृतिकघटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी | सौ दो वर्ष पहले की भविष्यवाणी करने से पहले उन्हें एक वर्ष पहले की मौसम संबंधी घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान बताने होते थे | वे यदि सही निकल जाते थे, तो उन्हें 10 वर्ष पहले के मौसमसंबंधी पूर्वानुमान घोषित करने होते थे | यदि वे भी सही निकल जाते थे तब उनपर विश्वास किया जाता था कि ये प्रकृति के स्वभाव को समझने में सक्षम हैं | इनके द्वारा सौ दो सौ वर्ष पहले की मौसमसंबंधी घटनाओं के बिषय में बताए जा रहे पूर्वानुमान सच हो सकते हैं |इसी विश्वास पर ऐसे लोगों को वर्षा(मौसम) वैज्ञानिक या ऋतुवैज्ञानिक होने जैसी पद प्रतिष्ठा प्रदान की जाती थी |
सनातनधर्म के प्राचीनग्रंथों में प्रकृति और जीवन के बिषय में पूर्वानुमान लगाने की अनेकों विधियाँ बताई गई हैं | ऐसा करने के लिए ही अनुसंधानों की परिकल्पना की गई है | आयुर्वेद के शीर्षग्रंथ चरकसंहिता में इसी का उपदेश किया गया है | यदि ऐसा हो पाता है तब तो महामारी के समय अनुसंधानों से समाज को सुरक्षित बचाया जा सकता है या संक्रमितों को रोगमुक्त किया जा सकता है ,अन्यथा उस महामारी में उन अनुसंधानों की उपयोगिता ही क्या बचती है |
शिवसंहिता, नरपतिजयचर्या, शिवस्वरोदय,ज्ञानस्वरोदय पवनस्वरोदय आदि योग के ग्रंथों में ऐसी घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान लगाने की विधियाँ बताई गई हैं |निरंतर योगाभ्यास करने वाले साधकों के द्वारा महामारी बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना चाहिए था |
इसीप्रकार से महामारी आने जाने एवं उससे संबंधित संक्रमण बढ़ने घटने के लिए यदि तापमान बढ़ने घटने या वायुप्रदूषण बढ़ने घटने को जिम्मेदार माना जाएगा तो भी मौसम जैसी अनुसंधान समस्या का ही सामना करना होगा | महामारी संबंधी पूर्वानुमान लगाने के लिए पहले तापमान या वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के बिषय में पूर्वानुमान लगाना होगा | यदि वह सही निकलेगा तभी उसके आधार पर महामारी के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा | यदि तापमान बढ़ने घटने के बिषय में अभी तक पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं हो पाया है तो महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना कैसे संभव हो पाएगा | ऐसे ही वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के बिषय में पूर्वानुमान लगाना तो दूर अभी तक इसके बढ़ने घटने के लिए जिम्मेदार कारण ही नहीं खोजे जा सके हैं,तो इसके बिषय में पूर्वानुमान कैसे लगाए जा सकेंगे |ऐसा किए बिना महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना संभव न हो पाएगा |
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बिषाणुओं का प्रभाव सब पर एक जैसा नहीं पड़ता है और चिकित्सा का प्रभाव भी सभी शरीरों पर एक जैसा नहीं पड़ता है | यही कारण है कि कोरोना महामारी में कुछ लोग संक्रमित हुए, कुछ लोग मृत्यु को प्राप्त हुए, तो कुछ लोग बिल्कुल स्वस्थ घूमते रहे | उन्हें जुकाम भी नहीं हुआ |
इसी प्रकार से कोरोनाकाल काल में कुछ लोग स्वस्थ बने रहे,कुछ लोग अस्वस्थ हुए ! उनमें से कुछ बिना किसी चिकित्सा के ही स्वस्थ हो गए तो कुछ चिकित्सा से स्वस्थ हुए ! कुछ चिकित्सा का लाभ लेकर भी स्वस्थ नहीं हुए तो कुछ अच्छी से अच्छी चिकित्सा का लाभ लेकर भी मृत्यु को प्राप्त हो गए |
इसीलिए संक्रमित होने के बाद कुछ लोग बिना किसी चिकित्सा के ही स्वस्थ हो गए |कुछ लोग चिकित्सा होने के बाद स्वस्थ हुए तो कुछ चिकित्सा के बाद भी अस्वस्थ ही बने रहे ,जबकि कुछ लोगों को अच्छी से अच्छी चिकित्सा करके भी बचाया नहीं जा सका है | वे मृत्यु को प्राप्त हो गए |
कुल मिलाकर कोई औषधि कितनी भी अच्छी क्यों न हो फिर भी वो सभी लोगों को सभी रोगों में सदा ही लाभप्रद नहीं होती है | जिस औषधि के अच्छे प्रभाव से कुछ लोगों के जीवन की रक्षा होती है | उसी औषधि के बुरे प्रभाव से कुछ लोगों को नुक्सान पहुँचता है |गुण दोष तो सभी में होते हैं | उनका संतुलन बैठाकर ही चिकित्सा के उद्देश्य से औषधियों का प्रयोग करना होता है |
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वैक्सीन या टीका की भूमिका !
विज्ञान वैज्ञानिकों एवं अनुसंधानों के द्वारा हम अपनी सुरक्षा के लिए कोई सार्थक प्रयत्न करने में लगातार असफल होते जा रहे हैं ,किंतु महामारी की शिकायत करते जा रहे हैं |महामारी सबल शत्रु की तरह होती है | शत्रु देश की सेनाएँ जिस देश पर जब आक्रमण कर दें | वह देश उस समय अपनी सुरक्षा के लिए तैयारी करना प्रारंभ करे | तो उसकी उसी प्रकार दुर्दशा होती है |जिस प्रकार की कोरोना महामारी से समाज की हुई है | पहले से तैयारियाँ करके न रखी गई हों तो आक्रांता अपनी इच्छा के अनुसार उस देश को कुचलता है और वह देश मजबूरी में सहता है क्योंकि प्रतिकार करने की उसके पास क्षमता ही नहीं होती है | ऐसे ही कोरोना महामारी का जब मन आया तब आई जब जितना जिस देश शहर आदि को कुचलना चाहा कुचला !जब घटना बढ़ना चाहा घटी बढ़ी और जब जाना चाहा तब गई !इसमें मनुष्यकृत प्रयत्नों की कोई भूमिका नहीं रही |
जिस प्रकार से सतर्क राजा अपने खुपिया तंत्र को मजबूत बनाकर उसे यह जिम्मेदारी सौंपते हैं कि अपने राष्ट्र के विरुद्ध कहीं कोई गतिविधि होती दिखाई दे तो तुरंत उसकी जानकारी जुटाओ ताकि उससे अपने देश की सुरक्षा की तैयारी की जा सके | इस प्रकार से शत्रु के आक्रमण से अपने देश को सुरक्षित रखने में उस खुपिया तंत्र की बहुत बड़ी भूमिका होती है | इसी प्रकार से महामारी के आने का पूर्वानुमान लगाने की जिम्मेदारी जिन वैज्ञानिकों को सौंपी गई थी | वे ऐसा कर पाने में असमर्थ रहे | जिसप्रकार से कोई व्यक्ति लट्ठ लेकर किसी को पीटने लगे !पिटने वाला व्यक्ति जहाँ लट्ठ लग रहा हो वहाँ अपने हाथ से सहला ले रहा हो तब तक वो दूसरी जगह लट्ठ मार दे रहा हो | इस प्रकार से अपनी इच्छा के अनुसार जब वो मारपीटकर वहाँ से चला जाए तब हम अपनी चोट पर अँगौछा लपेट कर यह गर्व कर रहे हों कि मैंने उस पीटने वाले व्यक्ति को खदेड़ दिया उसे पराजित कर दिया | उस पर विजय प्राप्त कर ली है |इसी प्रकार से हम महामारी को पराजित करने का दावा करते देखे जा रहे थे |
जिस प्रकार से उस आक्राँता के द्वारा पीटे जाने के कारण हुए घाव पर अँगौछा बाँध लेने से मिली आराम के कारण हम ऐसी तैयारी करने का निश्चय कर लें कि अब बहुत सारे अंगौछे लेकर हम अपने शरीर में बाँध लेंगे ताकि हमें कोई मारे तो घाव कम हों और जहाँ घाव हों वहाँ तुरंत अंगौछा बाँध लें ताकि पीटे जाने पर चोट की पीड़ा कुछ कम हो | तरह तरह की औषधियों टीकों आदि को लगाकर रोग प्रतिरोधक क्षमता अर्थात इम्युनिटी बढ़ाने का मतलब ही तो यही है कि हम अपने शरीर को इतना मजबूत बना लेना चाहते हैं | जिससे कोई पीटे तो हम उसे सह सकें |
आज किसी ने लट्ठ से पिटाई की तो हमने अंगौछे बाँधकर काम चला लिया | कल कोई ईंट पत्थरों से पिटाई करे तब अँगौछे वाला उपाय ब्यर्थ होने लगे तो हम कुछ मोटा कपड़ा कंबल आदि बाँधकर अपने को पिटाई को सहने योग्य बनावें |इसके बाद पीटने वाला ही तय करेगा कि वो अगली बार कैसे पीटेगा !उसे सहने के लिए तब तैसे प्रयत्न कर लिए जाएँगे |ऐसे ही एक महामारी से बचाव के लिए एक वैक्सीन बनाई जाती है | दूसरी महामारी आने पर दूसरी वैक्सीन बनानी पड़ती है | जब तीसरी महामारी आएगी तो तीसरी वैक्सीन बनाने के बिषय में सोचा जाएगा |
इस प्रक्रिया में जब तक कोई पीटेगा तब तक सुरक्षा के प्रबंध नहीं किए जा सकेंगे और जब कोई पीटकर चला जाएगा तब अँगौछा बाँधो या रजाई क्या अंतर पड़ेगा | उस समय पिट तो चुके ही हैं | इसी प्रकार से एक बार संक्रमित हो जाने के बाद कोई टीका लगा लें संक्रमित तो हो ही चुके होते हैं |
एक बार पिटने के बाद अँगौछा बाँध कर घूमने का मतलब होता है अब आकर वो मारे | उसे भी पता लगेगा कि हमारे अब उतनी चोट नहीं लगेगी !मतलब तैयारी पिटने की ही है | टीका लगाने का मतलब यही है | किसी भी ठीके का लाभ तो तब मिल सकता है जब महामारी के आने से पहले उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाकर पहले से वैक्सीन लगा ली जैसे ताकि समंकृमित ही न हों |
ऐसे कमान तो महामारी के ही हाथ में रहेगी ,जबकि कमान मनुष्यों के हाथ में आए बिना महामारी से मनुष्यों को सुरक्षित नहीं बचाया जा सकता है |
ऐसी स्थिति में हमारा ध्यान पिटाई को सहने योग्य शरीर बनाने पर क्यों है | हम ऐसा प्रयत्न क्यों नहीं कर रहे हैं ताकि हमारी पिटाई करने का किसी का साहस ही न हो |
महामारी विज्ञान और वैज्ञानिकों की वैज्ञानिकता !
मौसमसंबंधी सभी प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों को रोका जाना या उनका वेग घटाया बढ़ाया जाना संभव नहीं है | विश्व वैज्ञानिकों से केवल सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने की ही अपेक्षा की जाती है| ऐसी घटनाओं की प्रकृति का पता लगाने एवं महामारी जैसी हिंसकघटनाओं से सुरक्षा के उपाय खोजने की वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी होती है | इतनी सी जिम्मेदारी निभाकर अपने दायित्व का निर्वाह किया जा सकता है किंतु ऐसा किया जाना अभी तक संभव नहीं हो पाया है |
संपूर्ण विश्व में प्राकृतिक आपदाओं या महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए यदि कोई विज्ञान नहीं है तो पूर्वानुमान लगाने वाले वैज्ञानिक तैयार कैसे किए जाते हैं | वे अनुसंधान किस आधार पर करते हैं | उनके पूर्वानुमान लगाने का आधार क्या होता है | प्राकृतिक घटनाओं महामारियों आदि के बिषय में वैज्ञानिकों के द्वारा लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान सही क्यों नहीं निकलते हैं | ये आत्ममंथन का बिषय है |
भूकंपों के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए विज्ञान कहाँ है| भूकंपों को समझने वाले या भूकंपों के निश्चित कारण खोजने वाले वैज्ञानिक कहाँ हैं | वैज्ञानिकों के द्वारा समय समय पर किस आधार पर कहा जाता है कि निकट भविष्य में हिमालय में बहुत बड़ा भूकंप आएगा | यदि ये विज्ञान के द्वारा पता लगाया गया होता है तो ये क्यों नहीं बताया जा पाता है कि हिमालय में इतना बड़ा भूकंप कब आएगा !
ऐसे पूर्वानुमानों का वैज्ञानिक आधार क्या होता है ? ऐसा सक्षम विज्ञान एवं वैज्ञानिक कहाँ हैं | जिनके द्वारा हिमालय में किसी बड़े भूकंप के आने की बात पहले से पता लग जाती है |
ऐसे ही जिन मौसमवैज्ञानिकों के द्वारा आज के दो चार दिन पहले लगाए गए पूर्वानुमान सही नहीं निकल पाते हैं | उन्हीं मौसम वैज्ञानिकों को यह कहते सुना जाता है कि जलवायुपरिवर्तन के कारण आज के सौ दो सौ वर्ष बाद कैसी कैसी प्राकृतिक घटनाएँ घटित होंगी |यह कैसे पता लगा लिया जाता है | यह कैसे बताया जा रहा होता है कि सौ दो सौ वर्ष बाद तापमान बहुत अधिक बढ़ जाएगा | भीषण सूखा पड़ेगा | बड़े बड़े तूफ़ान बार बार आएँगे | ग्लेशियर पिघल जाएँगे | समुद्रों का पानी इतना बढ़ जाएगा | इससे अमुक अमुक शहर समुद्र में डूब जाएँगे | ऐसा सब कुछ कहे जाने का वैज्ञानिक आधार क्या होता है |
इसीप्रकार से महामारी के बिषय में वैज्ञानिकों के द्वारा बहुत कुछ
बताया जाता रहा है| महामारी की लहरों के बिषय में विभिन्न वैज्ञानिकों के
द्वारा अनुमान पूर्वानुमान आदि बदल बदल कर बार बार बताए जा रहे होते हैं | न तो वे अनुमान सही निकलते रहे हैं और न ही वे पूर्वानुमान सही होते हैं |इन सबका विज्ञान कहाँ है |
ऐसे अनुमानों पूर्वानुमानों को लगाने के लिए किस वैज्ञानिक पद्धति का अनुशरण किया जाता है | यदि ऐसा कोई विज्ञान नहीं है तो ऐसे अनुमानों पूर्वानुमानों को बताए जाने के लिए कोई वैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं होती है तो इसे बताया ही क्यों जाता है और इसकी आवश्यकता ही क्या होती है |
प्रायः सभी को पता है कि ऐसा कोई विज्ञान नहीं है | जिससे भूकंप को समझा जा सकता हो |सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जा सकते हों | इसके बाद भी भूकंप वैज्ञानिक होते हैं किंतु उनमें वैज्ञानिकता क्या है | ये किसी को नहीं पता |
ध्यान देने की बात है कि यदि मौसम वैज्ञानिकों को मौसम के बिषय में कुछ न पता हो,भूकंप वैज्ञानिकों को भूकंपों के बिषय में कुछ न पता हो एवं महामारी वैज्ञानिकों को महामारी के बिषय में कुछ न पता हो तो उससे संबंधित वैज्ञानिकों की जनहित में उपयोगिता ही क्या बचती है |
मौसमविशेषज्ञों के द्वारा मौसम के बिषय में पूर्वानुमान लगाए जाते रहे हैं | उनके गलत निकलने पर इसका कारण जलवायुपरिवर्तन बता दिया जाता रहा है |कहने का मतलब जलवायुपरिवर्तन के कारण मौसम संबंधी पूर्वानुमान सही नहीं निकलते हैं | जलवायुपरिवर्तन को न तो रोका जा सकता है और न ही इसके बिषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है तो वैज्ञानिकों के उस अनुमान का क्या होगा जिसमें उन्होंने महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने घटने के लिए मौसम संबंधी घटनाओं को जिम्मेदार बताया था |इसका मतलब न तो मौसम को समझा जा सकता है और न ही महामारी को ही समझा जाना संभव है |
ऐसे ही महामारी बिषयक पूर्वानुमानों के गलत निकलने के लिए महामारी के स्वरूपपरिवर्तन को जिम्मेदार बता दिया जाता है |किसी भी वस्तु व्यक्ति घटना आदि में परिवर्तन तो होता ही रहता है | उसे रोका जाना संभव नहीं है | ऐसी स्थिति महामारी के स्वरूपपरिवर्तन के कारण महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाया जाना संभव ही नहीं है
संभवतः इसीलिए विश्व के किसी वैज्ञानिक के द्वारा न तो प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में कभी कुछ सही बताया जा सका है और न ही उनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाए जा सके हैं |
कुल मिलाकर अनुसंधानों के लिए यदि ऐसी कोई वैज्ञानिकप्रक्रिया होती |जिससे महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना संभव होता तो लगा लिया गया होता |महामारी को नियंत्रित किया जाना संभव होता तो ऐसा कर लिया गया होता | महामारी का स्वभाव समझा जाना संभव होता तो समझ लिया गया होता ! किंतु ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सका |
ऐसी स्थिति में कहने को तो ये उन्नत विज्ञान है किंतु इसमें मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं या महामारियों को समझने के लिए कोई प्रक्रिया नहीं है |इसलिए वैज्ञानिकों के पूर्वानुमानों में और जनता के अंदाजे में कोई अंतर नहीं होता है| ऐसी स्थिति में आधुनिक विज्ञान संबंधी अनुसंधानों के द्वारा यदि प्राकृतिक घटनाओं महामारियों आदि के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना संभव नहीं है तो भारत के प्राचीन विज्ञान का सहयोग लेकर ऐसी घटनाओं से लोगों की सुरक्षा कर ली जानी चाहिए |
अनुमान पूर्वानुमान कितने प्रतिशत सही निकले !
महामारी में इतना जनधन का नुक्सान क्यों हुआ ! इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वैज्ञानिकों के द्वारा लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान कितने प्रतिशत सही निकले !वैज्ञानिकों के द्वारा महामारी को उतने ही प्रतिशत समझा जा सका है |