महामारी संबंधी अनुसंधान और मौसमविज्ञान !
वर्तमानसमय में मौसमविज्ञान के नाम पर केवल एक कैमरा (उपग्रह) प्रणाली है |जिससे बादलों या आँधी तूफानों को कहीं आते या जाते हुए देख लिया जाता है | वे जिस दिशा की ओर जितनी गति से जा रहे होते हैं | उसके आधार पर ये अंदाजा लगाया जाता है कि ये यदि इसी गति से इसी दिशा की ओर चलते रहे तो इतने घंटों में बादल चक्रवात आदि अमुक स्थान पर पहुँच सकते हैं | वहाँ वर्षा या चक्रवात आने की भविष्यवाणी कर दी जाती है| ऐसे मौसमीजुगाड़ों से कभी कभी मदद मिल जाती है|
कई बार हवाएँ किसी दूसरी दिशा में मुड़ जाती हैं | ऐसी स्थिति में बादल या आँधी तूफान उन हवाओं के साथ साथ उसी दिशा में मुड़ जाते हैं |ऐसी स्थिति में बादलों चक्रवातों आदि की दिशा और गति दोनों बदल जाया करती है |इससे पहले लगाए गए अंदाजे गलत निकल जाते हैं |यह एक प्रकार का जुगाड़ मात्र है | जो कभी सही तो कभी गलत निकलते देखा जाता है | यही कारण है कि बीते कुछ वर्षों में अनेकों हिंसक आँधी तूफ़ान आए | बादल फटे बाढ़ आई | जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हुई किंतु उनके बिषय में कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका | इसीलिए इस मौसमविज्ञान से महामारी को समझा जाना संभव नहीं है |
महामारी को समझने के लिए प्रकृति के स्वभाव को समझकर उसके अनुसार प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना होगा | वे जब सही निकलने लग जाएँगे तो इसके आधार पर लगाए गए महामारी संबंधी अनुमान पूर्वानुमान भी सही निकल जाएँगे |
जिसप्रकार से किसी नदी में आई बाढ़ का बढ़ा हुआ पानी या किसी नहर में छोड़ा गया पानी आगे कब कहाँ पहुँचेगा | इसका अंदाजा लगा लिया जाता है | ऐसे ही मौसम संबंधी अंदाजे तुरंत या दो चार दिन पहले के लिए ही लगाए जा सकते हैं | एक बार में उतनी ही दूरी के बादल चक्रवात आदि देखे जा सकते हैं |इसीलिए उन बादलों को देखकर 4 दिन तक वर्षा होने की भविष्यवाणी कर दी जाती है |उसके बाद बादल आएँगे या नहीं ये उस समय पता नहीं होता है |
लोगों को बाढ़ में फँसा देते हैं ऐसे जुगाड़
इसीलिए ऐसे जुगाड़ लोगों को अक्सर बाढ़ में फँसा देते हैं | किसी क्षेत्र जब वर्षा होनी प्रारंभ होती है तब दो या तीन दिन वर्षा होने की भविष्यवाणी कर दी जाती है | जब वर्षा का क्रम तीन दिनों के बाद भी चलता रहता है, तो उसके बाद 72 घंटे तक वर्षा होने की भविष्यवाणी कर दी जाती है | उसके बाद भी यदि वर्षा नहीं रुकती है तो 48 घंटे और वर्षा होने की भविष्यवाणी की जाती है | पहली भविष्यवाणी पर भरोसा कर लेने वाले लोग मान लेते हैं कि तीन दिन ही पानी बरसेगा |तीन दिनों का ही राशन पानी लेकर रख लेते हैं | इसके बाद भी जब वर्षा होती रहती है तब तक पानी इतना अधिक भर जाता है कि वहाँ से निकलने लायक नहीं रह जाता है | इसी तरह वर्षा होने के अंदाजे 2-2 दिन तब तक बढ़ाए जाते रहते हैं | जब तक वर्षा होती रहती है तब तक यही प्रक्रिया चलती रहती है |
कुल मिलाकर मौसम संबंधी इस जुगाड़ में मौसमपूर्वानुमान कम मौसम समाचार अधिक होता है | इस प्रक्रिया से आँखों देखा हाल ही कुछ जोड़ घटाकर बताना होता है | जब जहाँ जैसा होते देखा जाता है तब वहाँ वैसा ही वही बता दिया जाता है | कहाँ कितने सेंटीमीटर बारिश हुई | बारिश ने सर्दी ने गर्मी ने कहाँ कहाँ कितने वर्षों का रिकार्ड तोड़ा मौसमपूर्वानुमान के नाम पर यह बताया जा रहा होता है |
ऐसे पूर्वानुमानों से न
ऐसे मौसमविज्ञान के नाम पर ये जो पूर्वानुमान बताए जा रहे होते हैं | इनमें 2 -2 दिन बढ़ाने के बजाए एक साथ ही बता दिया जाता कि कुल कितने दिन वर्षा होनी है | लोग भी उतने दिनों के लिए राशन औषधि आदि आवश्यक वस्तुओं का संग्रह कर लेते | जिस मौसम विज्ञान के द्वारा 10 -12 दिनों का मौसमपूर्वानुमान एक साथ नहीं बताया जा सकता है | उसी मौसमविज्ञान के आधार अप्रैल में 4 महीने पहले के बिषय में ये पूर्वानुमान कैसे बताया जा सकता है कि इसवर्ष वर्षाऋतु में कैसी बारिश होगी |
ऐसी परिस्थिति में जिस मौसमविज्ञान के द्वारा 10 -12 दिनों का मौसमपूर्वानुमान एक साथ नहीं बताया जा सकता है | उसके आधार पर महीनों वर्षों पूर्व के पूर्वानुमान कैसे पता लगाए जा सकते हैं !जबकि महामारी संबंधी अध्ययनों अनुसंधानों के लिए तो वर्षों पहले के मौसम संबंधी पूर्वानुमानों की आवश्यकता होती है |
महामारी को समझने के लिए तो तापमान बढ़ने घटने तथा वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के लिए जिम्मेदार कारणों को खोजना होता है | इसके साथ साथ इनके बिषय में सही अनुमानों पूर्वानुमानों की भी आवश्यकता होती है | भूकंपों के लिए जिम्मेदार कारणों को खोजने की आवश्यकता होती है | चक्रवात बज्रपात जैसी सभी प्राकृतिक घटनाओं समझने की आवश्यकता होती है |
वर्तमान मौसमविज्ञान के द्वारा इस प्रकार के अनुसंधान किए जाने संभव नहीं हैं | इनमें प्रकृति के स्वभाव को समझने लायक कोई विज्ञान सम्मिलित ही नहीं होता है |इसीलिए इस प्रकार के मौसम पूर्वानुमान महामारी संबंधी अध्ययनों के काम के नहीं होते हैं |
मौसम संबंधी अनुसंधान और महामारी
विज्ञान और मौसम पूर्वानुमान
मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने जिस प्रकार से प्रयत्न किया जाता है | इस प्रकार के प्रयोगों के द्वारा क्या मौसम संबंधी प्राकृतिक वातावरण को समझा जाना संभव नहीं है | इस प्रक्रिया के अनुसार बादलों आँधी तूफानों आदि मौसम संबंधी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि भी नहीं लगाए जा सकते हैं | ऐसा किया जाना यदि संभव होता तो अभी तक मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना संभव क्यों नहीं हो पाया है | वैसे भी दीर्घावधि मौसम पूर्वानुमान प्रायः गलत निकल ही जाते हैं |
इसी प्रकार से अलनीनो लानिना के आधार पर लगाए गए पूर्वानुमान सही निकलते ही नहीं हैं | उन्हें सही सिद्ध करने के लिए तरह तरह के जुगाड़ किए जाते हैं किंतु उनसे प्रकृति का कोई सीधा संबंध सिद्ध नहीं हो पाया है | यदि अलनीनो लानिना के आधार पर सही पूर्वानुमान लगाया जाना संभव ही होता तो मौसम संबंधी दीर्घावधि पूर्वानुमानों के सही निकलने की प्रक्रिया अब तक प्रारंभ हो चुकी होती किंतु ऐसा कुछ होते तो कभी नहीं दिखाई दिया |
इसीलिए जितनी भी हिंसक प्राकृतिक घटनाएँ घटित होती हैं उनके बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना संभव ही नहीं हो पाता है | विगत कुछ वर्षों में बार बार बादल फटते रहे उनसे जनधन का नुक्सान होता रहा किंतु उसके बिषय में सही पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका |मौसमविज्ञान पर यदि वास्तव में मौसमविज्ञान ही होता तो ऐसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाए जा सकते थे |
वर्तमान मौसमविज्ञान के द्वारा मौसम पूर्वानुमान लगाया जाना संभव है भी या नहीं यह समझने के लिए बादलों आँधी तूफानों आदि की प्रक्रिया को वैज्ञानिक अनुसंधानों की दृष्टि से दोबारा (रिक्रिएट )करके देखा जाना चाहिए | इससे उस कमजोरी को खोजा जा सकता है | जिसके कारण मौसमसंबंधी सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने में अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है |
इसके लिए सुदूर आकाश में किसी कपड़े या रुई के गोले को छोड़ दिया जाए | उस उड़ते हुए कपड़े को दूरबीनों उपग्रहों रडारों से लगातार देखा जाए | सुपर कंप्यूटरों से उसका विश्लेषण करके उसके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए प्रयत्न किया जाए कि ये कितनी देर तक उड़ेगा | कितनी तेजी से उड़ेगा और उड़कर किस दिशा की ओर जाएगा |
इस प्रकार से उस कपड़े या रुई के गोले के बिषय में लगे हुए अनुमान पूर्वानुमान जितने प्रतिशत सही निकल सकते हैं | इस प्रक्रिया से लगाए गए मौसमसंबंधी पूर्वानुमान भी उतने प्रतिशत ही सही निकल पाएँगे |
महामारी को समझने या उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान खोजने के लिए मौसमसंबंधी प्राकृतिक परिवर्तनों के वास्तविक कारणों को खोजना होगा | उसी के आधार पर सही अनुमानों पूर्वानुमानों लगाने की आवश्यकता होगी |
वायुसंचार और प्रकृतिविज्ञान !रुई के गोले की तरह ही बादलों तथा आँधीतूफानों की गति भी वायु के ही आधीन होती है | वायु जिस ओर जितनी गति से जाएगी रुई का गोला भी उसी ओर उतनी ही गति से जाएगा | हवा के रुख में जब जैसे परिवर्तन आएँगे तब तैसे परिवर्तन उसमें भी होंगे | हवा रुक जाएगी तो रुई का गोला भी रुक जाएगा |
कुल मिलाकर उस रुई के गोले के कहीं जाने आने या उसकी गति घटने बढ़ने में उसकी अपनी कोई भूमिका नहीं होती है |इसका कारण वायुसंचार है | रुई के गोले की तरह ही बादलों तथा आँधीतूफानों की गति और दिशा भी वायुसंचार के ही आधीन होती है |वायु जिस गति से जिस दिशा में जहाँ जहाँ जाएगा | बादलों एवं आँधीतूफानों को भी उसी गति से उसी दिशा में वहाँ वहाँ ले जाएगा |
उपग्रहों के द्वारा आकाश में दूरस्थ बादलों आँधीतूफानों को देखकर उनकी केवल वर्तमान अवस्था का पता लगाया जा सकता है कि वे इस समय कहाँ हैं और उड़ते हुए किस ओर जा रहे हैं |वे भविष्य में कब कहाँ जाएँगे ये पता नहीं लग सकता है | इस बात का पता लगाने के लिए वायु संचार को समझना पड़ेगा | इनके कहीं जाने आने का कारण वायु ही है |
बादलों तथा आँधीतूफानों को देखकर यह पूर्वानुमान लगाया जा सकता है कि ये कब कहाँ पहुँचेंगे तो उस रुई के गोले के बिषय में भी पूर्वानुमान लगा लिया जाना चाहिए कि ये कब कहाँ पहुँचेगा | यदि वह पूर्वानुमान सही निकल जाता है | इसका मतलब उपग्रहों के द्वारा बादलों तथा आँधीतूफानों के बिषय में सही अंदाजा लगाया जा सकता है
वर्षा बाढ़ आँधी तूफानों के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए हमें उनकी भविष्य की अवस्था का पता लगाना होता है कि ये भविष्य में कब कहाँ होंगे | मार्च अप्रैल के महीने में ही हमें यदि पता करना है कि इस वर्ष मई और जून के महीनों में आँधी तूफान कब कितने आएँगे तो हमें मार्च अप्रैल के महीनों में ही ये पता करना होगा कि उस समय वायु संचार किस प्रकार का होगा
की गति क्या होगी वर्षाकाल अर्थात जुलाई अगस्त में वर्षा कब कितनी होगी तो जुलाई अगस्त में बादल कब कहाँ किस प्रकार के रहेंगे |
इसलिए रुई के गोले के उड़ने न उड़ने या कहीं जाने आने के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए वायुसंचार को ही समझना पड़ेगा | ऐसी स्थिति में उपग्रहों की मदद से यदि |
इस अंदाजे का उपयोग
वायु के आधीन है |
वायुसंचार को समझे बिना उस कपड़े को दूरबीनों उपग्रहों रडारों से देखकर सुपर कंप्यूटरों से गणना करके उस कपड़े के बिषय में कुछ भी पता लगाना संभव नहीं होता है |
इसीप्रकार से उपग्रहों रडारों के द्वारा सुदूर आकाश में उड़ रहे बादलों तथा आँधी तूफानों को यदि उपग्रहों रडारों को देखकर वर्षा या आँधी तूफानों के बिषय में पूर्वानुमान नहीं लगा सकते हैं | ऐसा किया जाना संभव होता तो कर लिया जाता |
ऐसे अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए हमें सबसे पहले इस बात पर विश्वास करना होगा कि उड़ने की क्षमता कपड़े में होती नहीं है | इसलिए कपड़े के उड़ने का कारण कपड़ा नहीं वो हवा होती है | जिसके द्वारा वो उड़ाया जा रहा होता है |
ऐसी स्थिति में कपड़े के उड़ने से संबंधित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर कपड़े को देखने से नहीं पता लगेगा | इसके लिए हवा के संचार को देखना पड़ेगा | हवा दिखाई नहीं पड़ती है इसलिए उस समय हवा के संचारी स्वभाव को समझना पड़ेगा | उसी के आधार पर कपड़े के उड़ने के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जा सकते हैं |
जिसप्रकार से उड़ते हुए कपड़े को किसी भी यंत्र के द्वारा देखकर किसी भी कंप्यूटर से गणना करके इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि ये कपड़ा उड़ता हुआ कब कहाँ पहुँचेगा |
ऐसी परिस्थिति में हवाओं के संचार पर आश्रित बादलों आँधी तूफानों को उपग्रहों रडारों से देखकर सुपर कंप्यूटरों से गणना करके इनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है | इसके लिए तो निराकार हवाओं का ही अध्ययन करना होगा |
कपड़े के टुकड़े की तरह ही भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात उल्कापात एवं महामारी जैसी घटनाएँ भी हवाओं के ही आधीन हैं |इनके घटित होने का कारण भी हवाएँ ही हैं | ऐसी घटनाओं के स्वभाव प्रभाव अनुमान पूर्वानुमान आदि के बिषय में जो जो कुछ पता लगाना है |उसके लिए ऐसी घटनाओं को देखने की नहीं प्रत्युत हवाओं के संचार को समझने की आवश्यकता होती है |
उपग्रहों रडारों से प्राकृतिक घटनाओं को घटित होते जब देख ही लिया जाएगा तो अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी |इन घटनाओं से तब तक जो नुकसान होना होगा वो तो इनके घटित होने के साथ ही हो चुका होगा |
कुल मिलाकर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने का कारण हवाएँ ही होती हैं | हवाओं को प्रत्यक्ष या यंत्रों के द्वारा देखा नहीं जा सकता है | उन्हें समझा ही जा सकता है | इन घटनाओं को समझने एवं अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए हवाओं के स्वभाव को समझना पड़ेगा |
इसके अतिरिक्त भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात एवं महामारी जैसी घटनाओं के बिषय में प्रत्यक्ष के आधार पर आज क्या भविष्य में हजार वर्ष बाद भी कुछ भी पता लगाना संभव नहीं हो पाएगा |
प्राचीनकाल में महामारियों को समझने के लिए वैदिक विज्ञान था | उसी के आधार पर अनुसंधान होते थे | अनुसंधानकर्ताओं की ये जवाबदेही होती थी कि वो जो बताएँगे वो प्रायः सच निकलेगा | प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में उनके द्वारा लगाए हुए अनुमान पूर्वानुमान आदि प्रायः सही निकलेंगे |
उस युग में पूर्वानुमान लगाने का दावा करने वालों की योग्यता का परीक्षण प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में भविष्यवाणियाँ करवाकर किया जाता था |जिनकी भविष्यवाणियाँ सही निकलती थीं उन्हें पद प्रतिष्ठा मानदेय (सैलरी) आदि दी जाती थी | गलत भविष्यवाणियाँ करने वालों पर अंकुश लगाया जाता था |भविष्यवाणियों के नाम पर अफवाहें फैलाने का अधिकार उन्हें भी नहीं दिया जाता था | जो पूर्वानुमान लगाने का दावा करते थे | उनकी भविष्यवाणियों का एकांतिक परीक्षण किया जाता था | सही भविष्यवाणियाँ करने में सफल विद्वानों ने उसी युग में भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात एवं महामारियों के घटित होने के कारण खोज लिए थे ,प्रत्युत वे सही सटीक अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिया करते थे |
प्राचीनवैज्ञानिकों ने उसीयुग में सूर्य चंद्र मंडलों के समीप जाए बिना ही खगोलीय रहस्य सुलझा लिए थे | उन्होंने गणित विज्ञान के आधार पर यहीं बैठे बैठे सूर्य चंद्र पृथ्वी आदि के मंडलों की परिधियाँ नाप ली थीं | उनकी गतियाँ मार्ग आदि खोज लिए थे | उनके पृथ्वी पर एवं पृथ्वीवासियों पर पड़ने वाले अच्छे बुरे प्रभावों का पता लगाने में सफल हो गए थे | उन्होंने उसी विज्ञान के आधार पर उसी युग में सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में हजारों वर्ष पहले पूर्वानुमान लगाने की वैज्ञानिकता विकसित कर ली थी |
कुल मिलाकर उन प्राचीन वैज्ञानिकों ने आकाश पाताल समुद्रों तथा समस्त ब्रह्मांडों के रहस्य को जिस गणित वैज्ञानिक पद्धति से सुलझा लिया था | उसी गणितीय पद्धति के द्वारा अनुसंधानपूर्वक भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात एवं महामारी जैसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान अभी भी लगाया जा सकता है | प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने की प्रक्रिया प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ती है |
प्राकृतिकघटनाओं के निर्माण की प्रक्रिया अप्रत्यक्ष वातावरण में होती है |इसीलिए उसके पैदा या समाप्त होने एवं उसका प्रभाव घटने या बढ़ने के कारण भी अप्रत्यक्ष ही होते हैं |
ये इसलिए पता नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि
हवा के साथ उड़ रहे ये सब कुछ दिखाई नहीं पड़ता है | इसमें केवल घटनाएँ ही दिखाई पड़ती हैं | जिसप्रकार से फलपत्तों से युक्त वृक्ष को देखकर उसकी जड़ों का पता लग जाता है | उसी प्रकार से प्राकृतिक घटनाओं को प्रत्यक्ष देखकर उनकी जड़ों गणितवैज्ञानिक पद्धति से खोजये