Sunday, February 1, 2026

निवेदन 2

                                             महामारी संबंधी अनुसंधान और मौसमविज्ञान !

      वर्तमानसमय में मौसमविज्ञान के नाम पर केवल एक कैमरा (उपग्रह) प्रणाली है |जिससे  बादलों या आँधी तूफानों को कहीं आते या जाते हुए  देख लिया जाता है | वे जिस दिशा की ओर जितनी  गति से जा रहे  होते हैं | उसके आधार पर ये अंदाजा लगाया जाता है कि ये  यदि इसी  गति से इसी दिशा की ओर चलते रहे तो इतने घंटों में बादल चक्रवात आदि अमुक स्थान पर पहुँच  सकते हैं | वहाँ वर्षा या चक्रवात आने की भविष्यवाणी कर दी जाती है| ऐसे मौसमीजुगाड़ों से कभी कभी मदद मिल जाती है| 

     कई बार हवाएँ किसी दूसरी दिशा में मुड़ जाती हैं | ऐसी स्थिति में  बादल या आँधी तूफान उन हवाओं के साथ साथ  उसी दिशा में मुड़ जाते हैं |ऐसी स्थिति में बादलों चक्रवातों आदि की दिशा और गति दोनों बदल जाया करती है |इससे  पहले लगाए गए अंदाजे  गलत निकल जाते हैं |यह एक प्रकार का जुगाड़ मात्र है | जो कभी सही तो कभी  गलत निकलते देखा जाता है | यही कारण है कि बीते  कुछ वर्षों में अनेकों हिंसक आँधी तूफ़ान आए | बादल फटे बाढ़ आई |  जिनमें बड़ी  संख्या में लोगों की मृत्यु हुई किंतु  उनके बिषय में कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका  |  इसीलिए इस मौसमविज्ञान से महामारी को समझा जाना संभव नहीं है |

    महामारी को समझने के लिए  प्रकृति के  स्वभाव को समझकर उसके अनुसार प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना होगा | वे जब  सही निकलने लग  जाएँगे तो इसके आधार पर लगाए गए महामारी संबंधी अनुमान पूर्वानुमान भी सही निकल जाएँगे | 

     जिसप्रकार से किसी नदी में आई बाढ़ का  बढ़ा हुआ पानी या किसी नहर में छोड़ा गया पानी आगे कब कहाँ पहुँचेगा | इसका अंदाजा लगा लिया जाता है | ऐसे ही मौसम संबंधी अंदाजे तुरंत या दो चार  दिन पहले के लिए ही  लगाए जा सकते हैं | एक बार में उतनी ही दूरी के बादल चक्रवात आदि देखे जा सकते हैं |इसीलिए उन बादलों को देखकर 4 दिन तक वर्षा होने की भविष्यवाणी कर दी जाती है |उसके बाद बादल आएँगे या नहीं ये उस समय पता नहीं होता है | 

                                मौसमपूर्वानुमान मतलब क्या और क्या है उसका उद्देश्य   !

       अनुसंधानों में विज्ञान कहा हैं :  विज्ञानवेत्ताओं को अक्सर कहते सुना जाता है कि विज्ञान में 2-2 मिलकर चार होते हैं |कोई करके देख ले 4  ही होंगे |जिस विज्ञान का सिद्धांत इतना दृढ़ होता है |उन्हीं वैज्ञानिकों के द्वारा किसी घटना के बिषय में एक बार कोई  भविष्यवाणी की जाती है |उसे बार बार बदला जाता है | उसी घटना के बिषय में अलग अलग वैज्ञानिकों के द्वारा अलग अलग भविष्यवाणियाँ न केवल की जाती हैं |उन्हें भी बार बार बदला जाता है |

     इसप्रकार की भविष्यवाणियों में "2-2 मिलकर चार वाले " वैज्ञानिक सिद्धांत का अनुपालन इसलिए दिखाई नहीं देता है ,क्योंकि किसी घटना के बिषय में की गई भविष्यवाणी सही या गलत कुछ भी निकल सकती है |चिंता ये नहीं है !चिंता तो इस बात की होती है कि जिस विज्ञान को पढ़ कर विभिन्न वैज्ञानिकों ने जिस घटना के बिषय में जितने  पूर्वानुमान लगाए वे एक जैसे क्यों नहीं निकले | यहाँ तक कि  वे परस्पर विरोधी क्यों निकले |इसलिए ऐसे अनुसंधानों में वैज्ञानिक चिंतन का अभाव झलकता है | 

    पूर्वानुमान  बार बार  बदलने से भ्रमित होते हैं लोग  : बार बार बदले जाने वाले ऐसे पूर्वानुमानों से कोई ऐसा निष्कर्ष नहीं निकल पाता  है | जिनके आधार पर उस घटना के बिषय में कुछ समझा जा सके या उससे संबंधित कोई कार्य योजना तैयार की जा सके | ऐसे  अनुसंधान  कार्य योजना बनाने लायक तो नहीं ही होते हैं ,महामारी जैसी घटनाओं के बिषय में इनके आधार पर अनुसंधान भी नहीं किया जा सकता है | अनुसंधान  करने लायक होते हैं | यदि ऐसा किया जाना संभव होता तब तो वैज्ञानिकों ने मौसम के आधार पर महामारी के स्वभाव का पता लगा लिया होता | उसी के आधार पर महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिया होता किंतु ऐसा किया ही नहीं जा सका | इससे ये सिद्ध होता है कि जिसे मौसम विज्ञान कहा जाता है |उसमें विज्ञान जैसा कुछ भी नहीं है | वो तो मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाओं को दूर से देख लेने का एक जुगाड़ है | 

    कुल मिलाकर विभिन्न वैज्ञानिकों के द्वारा एक ही घटना के बिषय में की गई अलग अलग भविष्यवाणियों भ्रम तो पैदा होता है | इसके साथ ही साथ ऐसे अनुसंधान  किसी कार्य योजना को बनाने लायक रह जाते हैं और न ही  महामारी जैसी घटनाओं के बिषय में अनुसंधान  करने लायक होते हैं | समाज को पूर्वानुमानों से लाभ तभी मिल सकता है जब  किसी घटना के बिषय में जो भविष्यवाणी की जाए उसे फिर बदला न जाए और वह सही निकले | ऐसा होने पर  समाज उस पर भरोसा करके उसके अनुसार भविष्य के लिए कार्य योजना बना सकता है | 

   पूर्वानुमानों के गलत निकलने  से होता है नुक्सान :कभी कभी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में एक बार जो भविष्यवाणी की जाती है| समाज उसके अनुसार योजना बनाकर उसी दिशा में आगे बढ़ना शुरू कर देता है तब तक भविष्यवाणी बदल दी जाती है |उस बदली हुई भविष्यवाणी पर भरोसा करके जब उस प्रकार की योजना बनाने लगता है, तब तक भविष्यवाणी फिर बदल दी जाती है | ऐसी भविष्यवाणियों से समाज का लाभ तो हो नहीं पाता  है ,प्रत्युत नुक्सान हो जाता है |  

    किसी क्षेत्र में बाढ़ अचानक नहीं आती है |लगातार  वर्षा होती रहती है पानी बढ़ता जाता है तो बाढ़ आ जाती है |  इस प्रक्रिया में वर्षा होनी प्रारंभ होती है तब सबसे पहले दो या तीन दिन तक वर्षा होने की भविष्यवाणी की जाती है | जब वर्षा का क्रम तीन दिनों के बाद भी चलता रहता है, तो  उसके बाद 72 घंटे और वर्षा होने की भविष्यवाणी कर दी जाती है | उसके बाद भी यदि वर्षा नहीं रुकती है तो 48 घंटे और वर्षा होने की भविष्यवाणी की जाती है |

    इस प्रकार से  पहली भविष्यवाणी पर भरोसा कर लेने वाले लोग मान लेते हैं कि तीन दिन ही पानी बरसेगा | इसलिए वे तीन दिनों का ही राशन पानी औषधि आदि आवश्यकता की सामग्री का संग्रह कर लेते हैं | तीन दिन बाद भी जब वर्षा होती रहती है तब तक पानी इतना अधिक भर चुका होता है,कि वहाँ से निकलने लायक नहीं रह जाता है | ऐसी स्थिति में आवश्यक सामग्री लेने जाना भी संभव नहीं हो पाता  है|  इस प्रकार से   तरह जब तक वर्षा होती रहती है तब तक वर्षा होने के अंदाजे  2-2 दिन तब तक बढ़ाए जाते रहते हैं | तब तक यही प्रक्रिया चलती रहती है |घरों की एक एक मंजिल डूब जाती है | इसके बाद जब वर्षा बंद हो जाती है तो वर्षा बंद होने की भविष्यवाणी का दी जाती है | इस प्रकार के मौसम पूर्वानुमानों से समाज को लाभ कम नुक्सान अधिक होता है | मौसम संबंधी ऐसे जुगाड़ों में मौसमपूर्वानुमान कम मौसम समाचार अधिक होता है | इस प्रक्रिया   में विज्ञान का उपयोग ही क्या है और यही करना है तो इसमें अनुसंधानों की आवश्यकता ही कहाँ है | 

   मौसमविज्ञान के नाम पर कोरी कल्पनाएँ : मौसमविज्ञान के नाम पर ये जो पूर्वानुमान बताए जा रहे होते हैं | उनका आधार यदि विज्ञान होता तो पूर्वानुमानों में 2 -2 दिन बढ़ाने के बजाए एक साथ ही बता दिया जाता कि कुल कितने दिन वर्षा होनी है | लोग भी उतने दिनों के लिए राशन औषधि आदि आवश्यक वस्तुओं का संग्रह कर लेते | 

   जिस मौसमविज्ञान के द्वारा 10 -12 दिन पहले  का मौसमपूर्वानुमान एक साथ नहीं बताया जा सकता | उसी मौसमविज्ञान के आधार पर अप्रैल के महीने में ये कैसे बताया जा सकता है कि इसवर्ष वर्षाऋतु में कैसी बारिश  होगी | भविष्य में झाँकने के लिए ऐसा कौन सा विज्ञान है जिसके आधार पर आज के सौ दो सौ वर्ष बाद जलवायुपरिवर्तन के प्रभाव से किस किस प्रकार की प्राकृतिकघटनाएँ  घटित होंगी | ये कैसे पता लगा लिया जाता है | 

 इतने पहले का पता लगाने के लिए यदि कोई विज्ञान ही नहीं है तो ऐसे काल्पनिक पूर्वानुमानों से महामारी संबंधी अध्ययनों अनुसंधानों को कैसे किया जा सकता है | इसके लिए तो दशकों पहले के मौसमसंबंधी पूर्वानुमानों की आवश्यकता होती है |

                                        ऐसे अनुसंधानों से महामारी को समझा जाना संभव न था 

    " जिन मौसमसंबंधी अनुसंधानों के आधार पर मौसमसंबंधी घटनाओं को ही समझा जाना संभव न हो सका | उन्हीं मौसमसंबंधी अनुसंधानों के आधार पर महामारी को समझा जाना कैसे संभव हो सकता था | कह तो दिया गया था कि महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने घटने पर मौसम का प्रभाव पड़ता है किंतु मौसम के स्वभाव को न समझ पाने के कारण को नहीं महामारी को भी नहीं समझा जा सका | 

     किस महीने या सप्ताह में कहाँ कितने सेंटीमीटर बारिश,सर्दी या गर्मी हुई है |" " बारिश ने सर्दी ने गर्मी ने कहाँ कहाँ कितने कितने वर्षों का रिकार्ड तोड़ा  है |" "जलवायुपरिवर्तन हो रहा है " "हिमालय में बहुत बड़ा भूकंप आने वाला है "ऐसी बातों या अफवाहों से प्राकृतिक आपदापीड़ितों एवं महामारी पीड़ितों को क्या लाभ पहुँचाया जा सकता है | इसप्रकार की बातों का आम जनता से कोई लेना देना नहीं होता है | उसे तो केवल सही पूर्वानुमान चाहिए | मौसम पूर्वानुमान के नाम पर  ये बताने की आवश्यकता ही क्या है और इससे समाज का भला कैसे हो सकता है | 

          वर्तमानसमय के मौसमसंबंधी पूर्वानुमानों का महामारी के लिए किए जाने वाले अनुसंधानों में उपयोग ही क्या है |  महामारी को समझने के लिए तो तापमान बढ़ने घटने तथा वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के लिए,या जलवायु परिवर्तन होने के लिए जिम्मेदार कारणों  को खोजना होता है | इसके साथ साथ इनके बिषय में सही अनुमानों पूर्वानुमानों की भी आवश्यकता  होती है | भूकंपों के  लिए जिम्मेदार कारणों को खोजने की आवश्यकता होती है | चक्रवात बज्रपात जैसी सभी प्राकृतिक घटनाओं  के कारणों को समझने  की  आवश्यकता होती है |       

      मौसमसंबंधी प्राकृतिकघटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए जिस प्रकार से प्रयत्न किया जाता है | उसके द्वारा  मौसमसंबंधी  प्राकृतिकवातावरण को समझा जाना संभव नहीं है |उस प्रक्रिया के आधार पर बादलों आँधी तूफानों  आदि  मौसम संबंधी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जाना यदि संभव होता  तो अभी तक मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकता था |  

     इसी प्रकार से अलनीनो लानिना  के आधार पर लगाए गए पूर्वानुमान सही  नहीं निकलते हैं | उनका प्रकृति के साथ सही सही संबंध बैठाने के लिए अलनीनो लानिना जैसे तरह तरह के जुगाड़ किए जाते हैं किंतु उनसे प्रकृति का सीधा संबंध सिद्ध नहीं किया जा सका है | यदि ऐसा किया जा सका होता तो मौसमसंबंधी दीर्घावधि पूर्वानुमानों के सही निकलने की प्रक्रिया अब तक प्रारंभ हो चुकी होती |  

      इसीलिए जितनी भी  हिंसक प्राकृतिक घटनाएँ घटित होती हैं | उनके बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना संभव  नहीं हो पाता  है | विगत कुछ वर्षों में बार बार बादल फटते रहे उनसे जनधन का नुक्सान  होता रहा किंतु उसके बिषय में सही पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका |

      वर्तमान मौसमविज्ञान के द्वारा इस प्रकार के अनुसंधान किए जाने संभव नहीं हैं | इनमें प्रकृति के स्वभाव को समझने लायक कोई विज्ञान सम्मिलित ही नहीं  होता है |इसीलिए इस प्रकार के मौसम पूर्वानुमान महामारी संबंधी अध्ययनों के काम के नहीं होते हैं | इसीलिए महामारी के बिषय में कुछ भी खोजा नहीं जा सका |     

   महामारी को समझने या उसके बिषय में  सही अनुमान पूर्वानुमान खोजने के लिए  मौसमसंबंधी प्राकृतिक परिवर्तनों के वास्तविक कारणों को  खोजना होगा | उसी के आधार पर सही अनुमानों  पूर्वानुमानों  लगाने की आवश्यकता होगी | 

                                                             वायुसंचार और प्रकृतिविज्ञान ! 

      बादलों तथा आँधीतूफानों की गति और दिशा वायुसंचार के आधीन होती है |वायु जिस गति से जिस दिशा में जहाँ जहाँ जाएगा | बादलों एवं आँधीतूफानों को भी उसी गति से उसी दिशा में वहाँ वहाँ ले जाएगा | हवा के रुख में जब जैसे परिवर्तन आते जाएँगे तब तैसे परिवर्तन बादलों आँधीतूफानों में भी होंगे | हवा रुक  जाएगी तो वे भी रुक जाएँगे |बादलों आँधीतूफानों के कहीं जाने आने या उनकी गति घटने बढ़ने में उनकी अपनी कोई भूमिका नहीं होती है | 

    उपग्रहों के द्वारा आकाश में दूरस्थ बादलों आँधीतूफानों को देखकर उनकी केवल वर्तमान अवस्था का पता लगाया जा सकता है कि वे इस समय कहाँ हैं और उड़ते हुए किस गति से किस दिशा की ओर जा रहे हैं किंतु वर्षा बाढ़ आँधी तूफानों के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए हमें उनकी भविष्य की अवस्था का पता लगाना होता है कि ये भविष्य  में  कब कहाँ  जाएँगे | यह पता लगाने के लिए वायुसंचार को समझना पड़ेगा | उपग्रहों आदि किसी भी यंत्र  के द्वारा वायु की न तो वर्तमान अवस्था को  देखा जाना संभव है और न ही भविष्य के बिषय में अनुमान लगाया जाना ही संभव है | 

    मार्च अप्रैल के महीने में ही हमें यदि पता करना होता है कि इस वर्ष मई  और जून के महीनों में गर्मी कितनी पड़ेगी और आँधी तूफान कब कितने आएँगे |आगामी वर्षाऋतु में बारिश कैसी होगी | ये सबकुछ  हमें मार्च अप्रैल  के महीनों में ही ये पता करना होगा कि उन समयों में  वायुसंचार किस प्रकार का होगा | विश्व में अभी तक ऐसा कोई यंत्र या वैज्ञानिक विधा विकसित नहीं की जा सकी है | जिसके द्वारा यह पता लगाया जाना संभव हो कि भविष्य में हवाएँ कब किस प्रकार की चलेंगी | 

      रवि की फसल तैयार होने पर किसान लोग आवश्यकता भर के लिए अनाज चारा आदि सुरक्षित रखना चाहते हैं ,बाक़ी उसी समय बेच लेना होता है | इसके लिए उन्हें मार्च अप्रैल में ही ऐसे पूर्वानुमानों की आवश्यकता होती है कि इस वर्ष वर्षाकाल अर्थात जुलाई अगस्त में वर्षा कैसी  होगी | मानसून कब आएगा और कब जाएगा | यह पता लगाने के लिए मार्च अप्रैल में ही वर्षाऋतु के वायुसंचार को समझना एवं उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना आदि कैसे संभव हो पाएगा | वर्षासंबंधी  उस वायुसंचार को दूरबीनों उपग्रहों रडारों से देखकर सुपर कंप्यूटरों से गणना करके क्या पता लगाना संभव हो सकता है कि इस वर्ष वर्षाऋतु में वायुसंचार कैसा रहेगा |

     प्राकृतिक घटनाओं के बनने बिगड़ने का कारण वायुसंचार में उसप्रकार के परिवर्तन होना होता है | उन परिवर्तनों को समझे बिना उनके प्रभावों के बिषय में बात नहीं की जा सकती है  | भविष्यवाणियाँ नहीं की जा सकती हैं | कुछ लोग जलवायुपरिवर्तन के भावी प्रभावों को बताते हुए भविष्यवाणियाँ  करते देखे जाते हैं कि आज के सौ दो सौ वर्ष बाद कैसी कैसी प्राकृतिक घटनाएँ घटित होंगी | यदि उन्होंने ऐसा कोई विज्ञान खोज लिया होता है जिससे सैकड़ों वर्ष पहले की भविष्य संबंधी घटनाओं को देखा या अनुभव किया जा सकता हो |आखिर  इस बात का पूर्वानुमान कैसे लगा लिया जाता है कि आज के सौ दो सौ वर्ष बाद मौसम में किस किस प्रकार के परिवर्तन हो सकते हैं | किस वैज्ञानिक प्रक्रिया के द्वारा ऐसा किया जाना संभव हुआ है | ये उनसे समझने की आवश्यकता इसलिए कि एक ओर तो दस बारह दिन पहले के मौसम के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाया जाना संभव हो पाया है और दूसरी ओर आज के सैकड़ों वर्ष बाद की बातें की जा रही हैं | उनमें सच्चाई कितनी हो सकती है | 

     भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात एवं महामारी जैसी घटनाएँ भी हवाओं के ही आधीन हैं |इनके  घटित होने का कारण भी हवाएँ ही हैं | ऐसी   घटनाओं  के  स्वभाव प्रभाव अनुमान पूर्वानुमान आदि के बिषय  में जो जो कुछ पता लगाना है |उसके लिए ऐसी घटनाओं को देखने  की नहीं प्रत्युत  हवाओं  के संचार  को  समझने की आवश्यकता होती है | 

      कुल मिलाकर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने का कारण हवाएँ ही होती हैं | हवाओं  को प्रत्यक्ष या यंत्रों के द्वारा देखा नहीं जा सकता है | उन्हें समझा ही जा सकता है | इन  घटनाओं को समझने एवं अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए हवाओं के स्वभाव को समझना पड़ेगा | हवाएँ समय के अनुसार बदलती हैं | ग्रीष्मऋतु में पश्चिम से आने वाली हवाएँ गर्म होती हैं | हेमंत ऋतु में  उत्तर दिशा  की ओर से आने वाली हवाएँ ठंडी होती हैं | 

    इस प्रकार से हवाओं का संबंध समय से होता है और समय को समझने के लिए ग्रहचार को समझना पड़ता है | जिस प्रकार से घड़ी समय बना नहीं सकती है किंतु समय बता सकती है | इसी प्रकार से सूर्यादि ग्रह समय बना नहीं सकते किंतु  उनके संचार से समय संचार के संकेत मिल जाते हैं कि कब कैसा समय आ रहा है |प्रकृति की भाषा गणित है | इसलिए ग्रहों के संचार को  गणित से समझा  जाता है तभी तो गणित के द्वारा ही सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में सैकड़ों वर्ष पहले पूर्वानुमान  लगा लिया जाता है | 

      इस प्रकार से ग्रहों के संचार से समय संचार का पता लगाया जाता है और समय संचार से वायुसंचार  का पता लगाया जाता है | वायु संचार से भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात  एवं महामारी जैसी घटनाओं को समझा जाता है | उनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जाता है | इस प्रक्रिया से अभी क्या भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के बिषय में हजारों वर्ष पहले पूर्वानुमान लगाए जा सकते हैं | 

     समय एवं हवाओं के भी स्वाद और गुण होते हैं | हेमंतऋतु में समय मीठा होता है | उसके प्रभाव से गन्ना मीठा हो जाता है | ग्रीष्मऋतु में हवाएँ मीठी होती हैं  हवाओं के प्रभाव से अत्यंत खट्टी इमली  एवं आम जैसे खट्टे फल पक कर मधुर हो जाते हैं | लू जितनी अधिक चलती है तरबूज खरबूजे आदि उतने ही अधिक मधुर होते हैं | 

     इस प्रकार से समय और हवाओं के भी स्वाद और गुण होते हैं |उनसे मनुष्य आदि जीव जंतुओं के शरीर तो प्रभावित होते ही हैं  | इसके साथ ही साथ पेड़ पौधे फलफूल शाक  सब्जियाँ अनाज दालें आदि  प्रभावित होने लगती हैं | अर्थात वे भी उन्हीं ऋतुओं के स्वाद और गुणों से प्रभावित  होती हैं | यही कारण है कि स्वस्थ रहने के लिए ऋतुफल एवं उसी ऋतु में पैदा होने वाली शाक सब्जियाँ  स्वास्थ्य के लिए हितकारी माने जाते हैं  | 

    जिस प्रकार से मनुष्यों के शरीरों में चिकनाहट पैदा होती है | उसी प्रकार से वृक्षों बनस्पतियों में पशु पक्षियों में चिकनाहट पैदा होती है | कमजोर शरीर वाले मनुष्यों के शरीर में उस  चिकनाहट की कमी होती है | उसे पूरा करने के लिए  सरसों तिल आदि  के तेलों का उपयोग किया जाता है | पशुओं से प्राप्त होने वाले  दूध घी मक्खन आदि से पूरा किया जाता है | इसी प्रकार से शरीर के लिए आवश्यक जिन तत्वों की जिन मनुष्यों में कमी रह जाती है | उन्हें  पेड़ पौधों  शाक सब्जियों आदि से पूरा किया जाता है | उसके बाद भी यदि कमी रह जाए तो उन गुणों से युक्त बनस्पतियों  या उनसे निर्मित औषधियों का उपयोग करके शरीरों को स्वस्थ  किया जाता है | इसीलिए ऋतुफलों  एवं उसी ऋतु में पैदा होने वाली शाकसब्जियों को स्वास्थ्य के लिए हितकर माना जाता है |उन्हीं फलों  शाकसब्जियों  आदि को  यदि दूसरी ऋतुओं में खाया जाए तो वे उतने गुणकारी नहीं रह जाते हैं |कभी कभी तो रोगकारक भी होते  देखे जाते हैं  | 

     इसी प्रकार से  समय और ऋतुओं का  भी गुण और स्वभाव होता है | उससे शरीर प्रभावित होता है | प्रत्येक ऋतु यदि  अपने अपने गुण और स्वभाव के अनुरूप व्यवहार  करती रहे तब तो  वात पित्त आदि संतुलित बने रहते हैं  | ऋतुएँ  जब दूसरी ऋतुओं के गुण ग्रहण करने लगती हैं | ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होने लगे सर्दी के समय तापमान बढ़ने लगे वर्षा के समय सूखा पड़ने लगे या फिर  ग्रीष्म ऋतु में अधिकवर्षा होने लगे ,अधिकसर्दी के समय अधिक सर्दी बढ़ने लगे बढ़ने लगे ,वर्षाऋतु में अधिक वर्षा होने लगे | ऐसे समय रोग पैदा होने की संभावना अधिक हो जाती है | यह असंतुलन कम होता है तो छोटे रोग पैदा होते हैं  और यदि यह असंतुलन अधिक हो जाता है  तो बड़े रोग पैदा होने लगते हैं | 

      कोरोना महामारी आई भले 2019 में थी किंतु  ऋतुएँ 2009 से ही असंतुलित होने लगीं थीं  |यह असंतुलन  दिनों दिन बढ़ता जा रहा था जो महामारी के आगमन की सूचना दे रहा था  | उसी के आधार पर मुझे किसी बड़े रोग के पैदा होने का अनुमान होने लगा था |  

 

कुल मिलाकर समय संचार के आधार पर  समय एवं हवाओं के स्वाद और गुणों का पता लगाया जा सकता है |   रोगों या महारोगों  (महामारी) को समझने या उनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए भी उसी प्रक्रिया से समय को समझना होता हैं | 

  प्राचीनकाल में महामारियों को समझने के लिए वैदिक विज्ञान था | उसी के आधार पर अनुसंधान होते थे | अनुसंधानकर्ताओं की ये जवाबदेही होती थी कि वो जो बताएँगे वो प्रायः सच निकलेगा | प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में उनके द्वारा लगाए हुए अनुमान पूर्वानुमान आदि प्रायः सही निकलेंगे | 

     उस युग में पूर्वानुमान  लगाने का दावा करने वालों की योग्यता का परीक्षण प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में भविष्यवाणियाँ करवाकर किया जाता था |जिनकी भविष्यवाणियाँ सही निकलती थीं उन्हें पद प्रतिष्ठा  मानदेय (सैलरी) आदि दी जाती थी | गलत भविष्यवाणियाँ करने वालों पर अंकुश लगाया जाता  था |भविष्यवाणियों के नाम पर अफवाहें फैलाने का अधिकार उन्हें भी नहीं दिया जाता था | जो पूर्वानुमान लगाने का दावा करते थे | उनकी भविष्यवाणियों का एकांतिक परीक्षण किया जाता था | सही भविष्यवाणियाँ करने में सफल विद्वानों ने उसी युग में भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात  एवं महामारियों के घटित होने के कारण खोज लिए थे ,प्रत्युत वे सही सटीक अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिया करते थे | 

     प्राचीनवैज्ञानिकों ने उसीयुग में सूर्य चंद्र मंडलों के समीप जाए बिना ही खगोलीय रहस्य सुलझा लिए थे | उन्होंने गणित विज्ञान के आधार पर यहीं बैठे बैठे  सूर्य चंद्र पृथ्वी आदि के मंडलों की परिधियाँ नाप  ली थीं | उनकी गतियाँ मार्ग आदि खोज लिए थे | उनके पृथ्वी पर एवं पृथ्वीवासियों पर पड़ने वाले अच्छे बुरे प्रभावों का पता लगाने में सफल हो गए थे | उन्होंने उसी विज्ञान के आधार पर उसी युग में सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में हजारों वर्ष पहले पूर्वानुमान  लगाने की वैज्ञानिकता विकसित कर ली थी | 

     कुल मिलाकर उन प्राचीन वैज्ञानिकों ने आकाश पाताल समुद्रों तथा समस्त ब्रह्मांडों के रहस्य को जिस गणित वैज्ञानिक पद्धति से सुलझा लिया था | उसी गणितीय पद्धति के द्वारा अनुसंधानपूर्वक भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात  एवं महामारी जैसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान अभी भी लगाया जा सकता है | प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने की प्रक्रिया प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ती है | 

      प्राकृतिकघटनाओं  के निर्माण की प्रक्रिया अप्रत्यक्ष वातावरण में होती है |इसीलिए उसके पैदा या समाप्त होने एवं उसका प्रभाव घटने या बढ़ने के कारण भी अप्रत्यक्ष ही होते हैं | 


ये इसलिए पता नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि  

हवा के साथ उड़ रहे ये सब कुछ दिखाई नहीं पड़ता है | इसमें केवल घटनाएँ  ही दिखाई पड़ती हैं | जिसप्रकार से फलपत्तों से युक्त वृक्ष को देखकर उसकी जड़ों का पता लग जाता है | उसी प्रकार से प्राकृतिक घटनाओं को प्रत्यक्ष देखकर उनकी जड़ों गणितवैज्ञानिक पद्धति से खोजये