पूर्वानुमान लगाने की तीन वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ
मौसमपूर्वानुमान लगाने की तीन प्रक्रियाएँ हैं | पहली प्रक्रिया में प्रत्यक्ष साक्ष्यों के आधार पर और दूसरा परोक्ष साक्ष्यों के आधार पर और तीसरा गणितीय पद्धति के आधार पर |
प्रत्यक्ष साक्ष्यों का मतलब मौसमसंबंधी जो घटनाएँ तैयार होकर किसी भी रूप में दिखाई देने लगी होती हैं | जैसे प्रातःकाल हुआ कलियाँ खिलते दिखाई दीं तो उनके फूल बनने का अंदाजा लगा लिया गया | इसमें सब कुछ प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा होता है | प्रातःकाल हुआ दिखाई दे रहा है और कलियाँ खिलते भी दिखाई दे रही हैं |ये पता ही है कि कलियाँ खिलेंगी तो विकसित होकर फूल ही बनेंगी |
इसी प्रकार से मौसम के बिषय में उपग्रह आदि यंत्रों से सुदूर आकाश में दिखाई दे रहे बादलों उपग्रहों आदि को देख लिया जाता है | उनकी गति और दिशा के अनुसार ये पता लगा लिया जाता है कि ये बादल कब कहाँ पहुँचेंगे | ये सबको पता ही है कि ये बादल जहाँ पहुँचेंगे वहाँ वर्षा हो सकती है|वर्षासंबंधी इस प्रकार के अंदाजों की महामारी संबंधी अध्ययनों अनुसंधानों की दृष्टि से कोई उपयोगिता नहीं होती है ! क्योंकि इस प्रक्रिया में प्रकृति के स्वभाव को समझना आवश्यक नहीं होता है |
परोक्ष सामग्री का मतलब वह सिद्धांत खोजकर उसके आधार पर घटना के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना है | जिससे यह पता लगा कि कमल न तो प्रातः काल होने पर खिलता है और न ही सूर्योदय होने पर खिलता है | कमल अपने खिलने के समय पर खिलता है | यह संयोग ही है कि प्रातःकाल होने ,सूर्योदय होने और कमल खिलने जैसी तीनों घटनाएँ एक ही समय पर घटित होनी होती हैं | इसलिए इन तीनों में से कोई एक घटना घटित होते दिखाई पड़ जाए तो बाक़ी दो घटनाओं के घटित होने के बिषय में पूर्वानुमान लगा लिया जाता है |
प्रकृतिसंबंधी कुछ ऐसी परोक्ष घटनाओं को देख कर उनके आधार पर वर्षा होने या आँधीतूफ़ान आने के बिषय में पूर्वानुमान लगा लिया जाता है |इस प्रक्रिया में बादल या आँधी तूफ़ान प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ रहे होते हैं किंतु प्राकृतिक वातावरण में उस प्रकार के संकेत उभर रहे होते हैं | जीव जंतुओं की उस प्रकार की चेष्टाएँ दिखाई दे रही होती हैं | जिनसे प्राप्त संकेतों के आधार पर ये पूर्वानुमान लगा लिया जाता है कि वर्षा होने वाली है या आँधी तूफ़ान आने वाला है | इस प्रक्रिया में प्रकृति के स्वभाव का आंशिक उपयोग किया जाता है |इसलिए महामारी संबंधी अनुसंधानों में इससे कुछ मदद मिल सकती है |
तीसरा प्रत्यक्ष और परोक्ष से भी ऊपर उठकर सोचना होता है | जिससे यह पता लगाया जाता है कि कमल न तो प्रातः काल होने पर खिलता है और न ही सूर्योदय होने पर खिलता है | कमल अपने खिलने के समय पर खिलता है | यह संयोग ही है कि प्रातःकाल होने ,सूर्योदय होने और कमल खिलने जैसी तीनों घटनाएँ एक ही समय पर घटित होनी होती हैं | इसलिए ये तीनों घटनाएँ जिस समय पर घटित होनी होती हैं | गणित के द्वारा उस समय को खोजहा जाता है कि वो समय कब होता है | उस समय के बिषय में पता लगते ही भविष्यवाणी कर दी जाती है कि इतने समय प्रातः काल होगा !इसी समय सूर्योदय होगा | इसी समय कमल खिलेगा | इस प्रक्रिया का आधार केवल गणित होती है |इसके आधार पर वह समय कब आएगा इसकी खोज करनी होगी | इसका पता गणित के द्वारा लगाया जा सकता है |
इसी प्रकार से गणित के आधार पर मौसम के बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाता है |
पूर्वानुमान लगाने की तीन वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ
मौसम पूर्वानुमान लगाने की तीन प्रक्रियाएँ हैं |पहली प्रक्रिया में बादलों या आँधी तूफानों को उपग्रहों से एक स्थान पर देख लिया जाता है | वे जितनी गति से जिस दिशा की ओर जा रहे होते हैं | उसके आधार पर ये अंदाजा लगाया जाता है कि ये यदि इसी गति से इसी दिशा की ओर चलते रहे तो इतने घंटों में इतनी दूरी तय कर सकते हैं | उतनी दूरी पर जो जो देश प्रदेश आदि पड़ते हैं | उन बादलों या आँधी तूफानों के वहाँ वहाँ पहुँचने के बिषय में अंदाजा लगा जाता है | उसके सही निकलने की संभावना सबसे कम होती है |उसका कारण यह है कि हवाएँ कभी भी किसी भी दिशा में मुड़ सकती हैं | ऐसी स्थिति में बादल या आँधी तूफान उन हवाओं के साथ साथ उस दिशा में मुड़ जाते हैं | ऐसी स्थिति में पहले लगाए गए अंदाजे गलत निकल जाते हैं |
मौसमसंबंधी इसप्रकार के अंदाजों से महामारी संबंधी अनुसंधानों में कोई मदद नहीं मिल पाती है | इनमें प्रकृति के स्वभाव को समझने वाला विज्ञान कहीं नहीं सम्मिलित होता है | ये तो उसप्रकार का सामान्य अंदाजा होता है | जिस प्रकार से किसी नदी में आई बाढ़ एक स्थान पर देखकर उसका बढ़ा हुआ पानी आगे कब कहाँ पहुंचेगा दूसरे स्थान पर न तो प्रकति
उनके दूसरे स्थान पर पहुँचने
जिससे यह पता लगता है कि पता लग गया कि कमल के खिलने का संबंध सूर्योदय से है | इसलिए सूर्योदय होने पर कमल खिलेगा | | लगा कि
मौसम को समझने के लिए प्रकृति के स्वभाव को समझना होगा | प्रकृति के स्वभाव के आधार पर ही महामारी को समझा जा सकता है और उसके बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकता है |
मौसमसंबंधी जिन प्रकृति बिषयक अनुसंधानों से महामारी को समझा जा सकता है | उसप्रकार के अनुसंधानों के लिए अभी तक ऐसा कोई विज्ञान ही नहीं है | जिससे प्रकृति को सही ढंग से पढ़ा जा सके | प्रकृति की भाषा गणित है | इसलिए प्राकृतिक घटनाओं को गणित के द्वारा ही समझा जा सकता है| इससे संबंधित गणितीय अनुसंधानों के द्वारा जिस समय मौसमसंबंधी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाया जा सकेगा | उसी समय महामारी को समझना संभव हो पाएगा | महामारी के बिषय में लगाए गए अनुमान पूर्वानुमान आदि भी उसके बाद ही सही निकलेंगे |
मौसम संबंधी अनुसंधान और महामारी
वर्तमान समय में उपग्रहों से बादलों आँधी तूफानों को देखकर सुपर कंप्यूटरों से गणना करके केवल यह पता लगाया जाता है कि जो बादल आँधी तूफान आदि अभी इतनी ही गति से इस दिशा की ओर बढ़ते दिखाई पड़ रहे हैं | वे यदि इसी गति से इसी दिशा में आगे बढ़ते रहे तो इतने दिनों या घंटों में इतनी दूरी तय कर लेंगे | उस दूरी पर जो देश या प्रदेश पड़ते हैं |वहाँ पहुँच जाएँगे | वहाँ वर्षा या आँधी तूफ़ान आ सकता है | ऐसा अनुमान लगा लिया जाता है |कई बार बीच में हवाएँ अपनी दिशा या गति बदल लेती हैं तो बादल आँधीतूफान उस दिशा में चले जाते हैं |
वस्तुतः यह मौसमविज्ञान नहीं है ये तो एक प्रकार की कैमरा प्रणाली है | जिसके द्वारा दूर तक के बादलों आँधी तूफानों को देखा जा सकता है | इससे उस प्रकार की तैयारी पहले करके रख ली जाती है |आँधी तूफानों चक्रवातों से बचाव के लिए उस प्रकार के उपाय करके रख लिए जाते हैं |
कुल मिलाकर ये आँधी तूफानों से बचाव के लिए बनाया गया एक जुगाड़ मात्र है | जो कभी सही तो कभी गलत निकलते देखा जाता है | इसीलिए बीते कुछ वर्षों में अनेकों हिंसक आँधी तूफ़ान आए | जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु भी हुई किंतु उनके बिषय में कोई पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका था |
ऐसे जुगाड़ जब कभी सही निकल जाते हैं तो ऐसी घटनाओं से लोगों की सुरक्षा में मदद भले मिल जाती है किंतु ऐसे मौसमीजुगाड़ों से महामारी को समझना संभव नहीं है | महामारी को समझने के लिए प्रकृति स्वभाव को समझकर उसके अनुसार प्राकृतिक घटनाओं बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना होगा | वे जब सही निकलने लग जाएँगे तो इसके आधार पर लगाए गए महामारी संबंधी अनुमान पूर्वानुमान भी सही निकल जाएँगे |
विज्ञान और मौसम पूर्वानुमान
मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने जिस प्रकार से प्रयत्न किया जाता है | इस प्रकार के प्रयोगों के द्वारा क्या मौसम संबंधी प्राकृतिक वातावरण को समझा जाना संभव नहीं है | इस प्रक्रिया के अनुसार बादलों आँधी तूफानों आदि मौसम संबंधी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि भी नहीं लगाए जा सकते हैं | ऐसा किया जाना यदि संभव होता तो अभी तक मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही सही अनुमान पूर्वानुमान लगाना संभव क्यों नहीं हो पाया है | वैसे भी दीर्घावधि मौसम पूर्वानुमान प्रायः गलत निकल ही जाते हैं |
इसी प्रकार से अलनीनो लानिना के आधार पर लगाए गए पूर्वानुमान सही निकलते ही नहीं हैं | उन्हें सही सिद्ध करने के लिए तरह तरह के जुगाड़ किए जाते हैं किंतु उनसे प्रकृति का कोई सीधा संबंध सिद्ध नहीं हो पाया है | यदि अलनीनो लानिना के आधार पर सही पूर्वानुमान लगाया जाना संभव ही होता तो मौसम संबंधी दीर्घावधि पूर्वानुमानों के सही निकलने की प्रक्रिया अब तक प्रारंभ हो चुकी होती किंतु ऐसा कुछ होते तो कभी नहीं दिखाई दिया |
इसीलिए जितनी भी हिंसक प्राकृतिक घटनाएँ घटित होती हैं उनके बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना संभव ही नहीं हो पाता है | विगत कुछ वर्षों में बार बार बादल फटते रहे उनसे जनधन का नुक्सान होता रहा किंतु उसके बिषय में सही पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका |मौसमविज्ञान पर यदि वास्तव में मौसमविज्ञान ही होता तो ऐसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाए जा सकते थे |
वर्तमान मौसमविज्ञान के द्वारा मौसम पूर्वानुमान लगाया जाना संभव है भी या नहीं यह समझने के लिए बादलों आँधी तूफानों आदि की प्रक्रिया को वैज्ञानिक अनुसंधानों की दृष्टि से दोबारा (रिक्रिएट )करके देखा जाना चाहिए | इससे उस कमजोरी को खोजा जा सकता है | जिसके कारण मौसमसंबंधी सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने में अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है |
इसके लिए सुदूर आकाश में किसी कपड़े या रुई के गोले को छोड़ दिया जाए | उस उड़ते हुए कपड़े को दूरबीनों उपग्रहों रडारों से लगातार देखा जाए | सुपर कंप्यूटरों से उसका विश्लेषण करके उसके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए प्रयत्न किया जाए कि ये कितनी देर तक उड़ेगा | कितनी तेजी से उड़ेगा और उड़कर किस दिशा की ओर जाएगा |
इस प्रकार से उस कपड़े या रुई के गोले के बिषय में लगे हुए अनुमान पूर्वानुमान जितने प्रतिशत सही निकल सकते हैं | इस प्रक्रिया से लगाए गए मौसमसंबंधी पूर्वानुमान भी उतने प्रतिशत ही सही निकल पाएँगे |
महामारी को समझने या उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान खोजने के लिए मौसमसंबंधी प्राकृतिक परिवर्तनों के वास्तविक कारणों को खोजना होगा | उसी के आधार पर सही अनुमानों पूर्वानुमानों लगाने की आवश्यकता होगी |
वायुसंचार और प्रकृतिविज्ञान !रुई के गोले की तरह ही बादलों तथा आँधीतूफानों की गति भी वायु के ही आधीन होती है | वायु जिस ओर जितनी गति से जाएगी रुई का गोला भी उसी ओर उतनी ही गति से जाएगा | हवा के रुख में जब जैसे परिवर्तन आएँगे तब तैसे परिवर्तन उसमें भी होंगे | हवा रुक जाएगी तो रुई का गोला भी रुक जाएगा |
कुल मिलाकर उस रुई के गोले के कहीं जाने आने या उसकी गति घटने बढ़ने में उसकी अपनी कोई भूमिका नहीं होती है |इसका कारण वायुसंचार है | रुई के गोले की तरह ही बादलों तथा आँधीतूफानों की गति और दिशा भी वायुसंचार के ही आधीन होती है |वायु जिस गति से जिस दिशा में जहाँ जहाँ जाएगा | बादलों एवं आँधीतूफानों को भी उसी गति से उसी दिशा में वहाँ वहाँ ले जाएगा |
उपग्रहों के द्वारा आकाश में दूरस्थ बादलों आँधीतूफानों को देखकर उनकी केवल वर्तमान अवस्था का पता लगाया जा सकता है कि वे इस समय कहाँ हैं और उड़ते हुए किस ओर जा रहे हैं |वे भविष्य में कब कहाँ जाएँगे ये पता नहीं लग सकता है | इस बात का पता लगाने के लिए वायु संचार को समझना पड़ेगा | इनके कहीं जाने आने का कारण वायु ही है |
बादलों तथा आँधीतूफानों को देखकर यह पूर्वानुमान लगाया जा सकता है कि ये कब कहाँ पहुँचेंगे तो उस रुई के गोले के बिषय में भी पूर्वानुमान लगा लिया जाना चाहिए कि ये कब कहाँ पहुँचेगा | यदि वह पूर्वानुमान सही निकल जाता है | इसका मतलब उपग्रहों के द्वारा बादलों तथा आँधीतूफानों के बिषय में सही अंदाजा लगाया जा सकता है
वर्षा बाढ़ आँधी तूफानों के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए हमें उनकी भविष्य की अवस्था का पता लगाना होता है कि ये भविष्य में कब कहाँ होंगे | मार्च अप्रैल के महीने में ही हमें यदि पता करना है कि इस वर्ष मई और जून के महीनों में आँधी तूफान कब कितने आएँगे तो हमें मार्च अप्रैल के महीनों में ही ये पता करना होगा कि उस समय वायु संचार किस प्रकार का होगा
की गति क्या होगी वर्षाकाल अर्थात जुलाई अगस्त में वर्षा कब कितनी होगी तो जुलाई अगस्त में बादल कब कहाँ किस प्रकार के रहेंगे |
इसलिए रुई के गोले के उड़ने न उड़ने या कहीं जाने आने के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए वायुसंचार को ही समझना पड़ेगा | ऐसी स्थिति में उपग्रहों की मदद से यदि |
इस अंदाजे का उपयोग
वायु के आधीन है |
वायुसंचार को समझे बिना उस कपड़े को दूरबीनों उपग्रहों रडारों से देखकर सुपर कंप्यूटरों से गणना करके उस कपड़े के बिषय में कुछ भी पता लगाना संभव नहीं होता है |
इसीप्रकार से उपग्रहों रडारों के द्वारा सुदूर आकाश में उड़ रहे बादलों तथा आँधी तूफानों को यदि उपग्रहों रडारों को देखकर वर्षा या आँधी तूफानों के बिषय में पूर्वानुमान नहीं लगा सकते हैं | ऐसा किया जाना संभव होता तो कर लिया जाता |
ऐसे अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए हमें सबसे पहले इस बात पर विश्वास करना होगा कि उड़ने की क्षमता कपड़े में होती नहीं है | इसलिए कपड़े के उड़ने का कारण कपड़ा नहीं वो हवा होती है | जिसके द्वारा वो उड़ाया जा रहा होता है |
ऐसी स्थिति में कपड़े के उड़ने से संबंधित प्रत्येक प्रश्न का उत्तर कपड़े को देखने से नहीं पता लगेगा | इसके लिए हवा के संचार को देखना पड़ेगा | हवा दिखाई नहीं पड़ती है इसलिए उस समय हवा के संचारी स्वभाव को समझना पड़ेगा | उसी के आधार पर कपड़े के उड़ने के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जा सकते हैं |
जिसप्रकार से उड़ते हुए कपड़े को किसी भी यंत्र के द्वारा देखकर किसी भी कंप्यूटर से गणना करके इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है कि ये कपड़ा उड़ता हुआ कब कहाँ पहुँचेगा |
ऐसी परिस्थिति में हवाओं के संचार पर आश्रित बादलों आँधी तूफानों को उपग्रहों रडारों से देखकर सुपर कंप्यूटरों से गणना करके इनके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है | इसके लिए तो निराकार हवाओं का ही अध्ययन करना होगा |
कपड़े के टुकड़े की तरह ही भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात उल्कापात एवं महामारी जैसी घटनाएँ भी हवाओं के ही आधीन हैं |इनके घटित होने का कारण भी हवाएँ ही हैं | ऐसी घटनाओं के स्वभाव प्रभाव अनुमान पूर्वानुमान आदि के बिषय में जो जो कुछ पता लगाना है |उसके लिए ऐसी घटनाओं को देखने की नहीं प्रत्युत हवाओं के संचार को समझने की आवश्यकता होती है |
उपग्रहों रडारों से प्राकृतिक घटनाओं को घटित होते जब देख ही लिया जाएगा तो अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने की आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी |इन घटनाओं से तब तक जो नुकसान होना होगा वो तो इनके घटित होने के साथ ही हो चुका होगा |
कुल मिलाकर प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने का कारण हवाएँ ही होती हैं | हवाओं को प्रत्यक्ष या यंत्रों के द्वारा देखा नहीं जा सकता है | उन्हें समझा ही जा सकता है | इन घटनाओं को समझने एवं अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए हवाओं के स्वभाव को समझना पड़ेगा |
इसके अतिरिक्त भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात एवं महामारी जैसी घटनाओं के बिषय में प्रत्यक्ष के आधार पर आज क्या भविष्य में हजार वर्ष बाद भी कुछ भी पता लगाना संभव नहीं हो पाएगा |
प्राचीनकाल में महामारियों को समझने के लिए वैदिक विज्ञान था | उसी के आधार पर अनुसंधान होते थे | अनुसंधानकर्ताओं की ये जवाबदेही होती थी कि वो जो बताएँगे वो प्रायः सच निकलेगा | प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में उनके द्वारा लगाए हुए अनुमान पूर्वानुमान आदि प्रायः सही निकलेंगे |
उस युग में पूर्वानुमान लगाने का दावा करने वालों की योग्यता का परीक्षण प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में भविष्यवाणियाँ करवाकर किया जाता था |जिनकी भविष्यवाणियाँ सही निकलती थीं उन्हें पद प्रतिष्ठा मानदेय (सैलरी) आदि दी जाती थी | गलत भविष्यवाणियाँ करने वालों पर अंकुश लगाया जाता था |भविष्यवाणियों के नाम पर अफवाहें फैलाने का अधिकार उन्हें भी नहीं दिया जाता था | जो पूर्वानुमान लगाने का दावा करते थे | उनकी भविष्यवाणियों का एकांतिक परीक्षण किया जाता था | सही भविष्यवाणियाँ करने में सफल विद्वानों ने उसी युग में भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात एवं महामारियों के घटित होने के कारण खोज लिए थे ,प्रत्युत वे सही सटीक अनुमान पूर्वानुमान आदि लगा लिया करते थे |
प्राचीनवैज्ञानिकों ने उसीयुग में सूर्य चंद्र मंडलों के समीप जाए बिना ही खगोलीय रहस्य सुलझा लिए थे | उन्होंने गणित विज्ञान के आधार पर यहीं बैठे बैठे सूर्य चंद्र पृथ्वी आदि के मंडलों की परिधियाँ नाप ली थीं | उनकी गतियाँ मार्ग आदि खोज लिए थे | उनके पृथ्वी पर एवं पृथ्वीवासियों पर पड़ने वाले अच्छे बुरे प्रभावों का पता लगाने में सफल हो गए थे | उन्होंने उसी विज्ञान के आधार पर उसी युग में सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में हजारों वर्ष पहले पूर्वानुमान लगाने की वैज्ञानिकता विकसित कर ली थी |
कुल मिलाकर उन प्राचीन वैज्ञानिकों ने आकाश पाताल समुद्रों तथा समस्त ब्रह्मांडों के रहस्य को जिस गणित वैज्ञानिक पद्धति से सुलझा लिया था | उसी गणितीय पद्धति के द्वारा अनुसंधानपूर्वक भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात बज्रपात एवं महामारी जैसी घटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान अभी भी लगाया जा सकता है | प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने की प्रक्रिया प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ती है |
प्राकृतिकघटनाओं के निर्माण की प्रक्रिया अप्रत्यक्ष वातावरण में होती है |इसीलिए उसके पैदा या समाप्त होने एवं उसका प्रभाव घटने या बढ़ने के कारण भी अप्रत्यक्ष ही होते हैं |
ये इसलिए पता नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि
हवा के साथ उड़ रहे ये सब कुछ दिखाई नहीं पड़ता है | इसमें केवल घटनाएँ ही दिखाई पड़ती हैं | जिसप्रकार से फलपत्तों से युक्त वृक्ष को देखकर उसकी जड़ों का पता लग जाता है | उसी प्रकार से प्राकृतिक घटनाओं को प्रत्यक्ष देखकर उनकी जड़ों गणितवैज्ञानिक पद्धति से खोजये