भाई जी
सादर चरण स्पर्श !
भाई जी !हमने आज तक जो कुछ कमाया है वो हमारी ये रिसर्च है जिसके लिए मैंने अपना सारा जीवन न्योछवर किया है | आज वो फाइनल स्टेज पर है | यदि सरकार इसे स्वीकार करती है तो हमारे इस काम की सार्थकता है ,अन्यथा ये जीवन ऐसा ही बीता जा रहा है | तुमने उस दिन मुझे जो जो कुछ बोला है | उससे मुझे मेरे रिसर्च कार्य में बहुत व्यवधान हुआ है | मैं आज तक कुछ काम नहीं कर पाया हूँ | मैं बहुत आहत हूँ |
मैं बहुत संघर्ष पूर्ण जीवन जीता आ रहा हूँ | लेकिन किसी के दो पैसे की मैंने बेईमानी की है | आज भी वही स्थिति है |मैंने अपने को और अपने घर को कसा है | किसी के दो पैसे का गुनहगार नहीं हूँ |इसीलिए मेरे पास आज न तो धन है और न ही संपत्ति है | कल बार बार तुमने दो फ्लैटों की चर्चा की | पुराना फ्लेट साढ़े 5 लाख का लिया था | जिसमें ढाई लाख मेरा लगा था 3 लाख गुप्ता जी का लगा था | जो आज तक दिया नहीं गया है | फ्लैट की कीमत बढ़ी आज वो बढ़ कर 15 लाख हो गया है | ये फ्लैट मुझे चाहिए तो ये पैसे मुझे देने होंगे |नया वाला फ्लैट 1 करोड़ 20 लाख का है | उसमें 40 लाख मेरे लगे हैं | 80 उनके लगे हैं | आज जो बढे होंगे वे तथा उनके 80 उन्हें देना होगा | यदि हमें लेना है | मेरे पास पैसे हैं नहीं | अभी तक उनकी किताबें कर देता था और कुछ सरकारी आफिसों में दौड़ धूप कर काम करा देता था तो वे शांत बैठे थे कोरोना के बाद हमारा स्वास्थ खुद ख़राब रहने लगा तो मैंने किताबें करने को भी मना कर दिया है |अब सरकारी काम भी नहीं करा पाता हूँ | इसलिए उन्होंने पिछले दो वर्षों में 3 बार पैसों का इशारा किया था तो मैंने ये कहकर टाल दिया है कि जैसा चाहो वैसा कर लो | पैसे मेरे पास नहीं हैं | अभी 4 महीने पहले उन्हें फालिस मार गई अब कुछ ठीक हैं | उसके बाद उन्हें एक दिन बुलाया था | उन्होंने कहा उन फ्लैटों का जो कुछ करना है करके नक्की करो | वो बात टल गई आगे देखेंगे जब जो कुछ होगा | घर बेचें तो रहने की समस्या इतने पैसे देने के लिए हैं नहीं | ये तुम्हें पता है कि जब तुम यहाँ थे तब ऊपर वाले लाला से लड़ाई हुई थी तो गुप्ता जीने तुरंत दखल दिया था | हमें बुलाया था फिर भी तुम्हें हमारे दो दो फ्लैट दिखाई पड़ रहे हैं |
हमारी आमदनी के साधन सीमित हैं | हम कहीं पूजा पाठ कराने जाते नहीं हैं प्रवचन भी नहीं करते शादी विवाह नहीं करवाते | घर में करवाने के लिए जो पूजा मिल जाती हैं | वही हैं वे भी निश्चित नहीं हैं | आमदनी है दो चार फ्लैट लेने के लिए पैसे भी तो चाहिए | बिना पैसे मिलते तब तो हर कोई ले लेता |
तुम्हें जब व्यापार शुरू किया मैं दिन भर गुप्ता जी के यहाँ किताबें करता था | जिसके प्रतिदिन वे 200 रुपए देते थे | इनमें व्यापार में लगाने के लिए पैसे कहाँ से आते | घर भी चलाना था | तुमसे पूछा तुमने कहा वहाँ ब्याज पर तो पैसे हैं नहीं |जो सामान जाता था कुछ वर्षों तक तो उसके आधे चौथाई पैसे भी लौट के नहीं आते थे | हर बार उधार व्यवहारतब बहुत तकलीफ हुई या ब्याज पर पैसे लेकर सामान भेजना होता था | जब कोई अनुष्ठान मिलता था |तो उससे वो ब्याज और कर्जा चुकाया जाता था | तुम्हें याद होगा सुरभि कुमुद पहले चिंतपूर्णी मंदिर के पास प्राइवेट स्कूल में पढ़ने जाती थीं | साल में फीस और किताबों के साथ लगभग 15 हजार रुपए देने पड़ते थे | इस कर्जे के कारण उन्हें वहाँ हटाकर MCD स्कूल में डालना पड़ा था | जिसके लिए उनकी मम्मी कई दिन रोती रहीं हमारे लिए अम्मा का ऐसा | उन स्कूलों में यहाँ कोई अपने बच्चों को नहीं पढ़ाता था | इसलिए बुरा लगना स्वाभाविक था | मुझे भी लगा था | मजबूरी में करना पड़ा था | इसीलिए बउआ का जब बीटेक में एडमीशन हुआ तुमने हमें पैसे जमा करने को कहा मुझे बहुत प्रसन्नता हुई क्योंकि बच्चे कुछ बनें इसीलिए मैं इतना संघर्ष करते आ रहा था | आज मेरा वो सपना पूरा हो रहा था | मैं भाग के छोटू के यहाँ गया उनसे उतनी ही प्रसन्नता से पैसे जमा करवाए | उसके बाद जब वो पैसे तुमने हमारे एकाउंट में वापस किए तब बहुत तकलीफ हुई | लेकिन वो तुम्हारा निर्णय था | तुम लोगों से छिप कर भी मैं बउआ से बोलकर आता था | बेटा परेशान न होना कुछ चाहिए तो मुझे बता देना मैं लेता आऊँगा | आज भी बच्चे मुझे बहुत प्यारे हैं |
इन संघर्षों में ही मैंने कमेटी डाल डालकर जो पैसे इकट्ठे किए | उनसे तीनों बेटियों के लिए 1,60 ,000 की बीमा की पॉलिसी ली थी कि इनके विवाह काम काज में कुछ सहयोग मिल जाएगा | उनमें से बिट्टी के नाम वाली तुम्हें दे दी थी | सुरभी कुमुद वाली दूसरे वाले फ्लैट के समय तोड़नी पड़ गई थीं |
92-99 तुम्हारी मंगल की दशा थी वो बहुत गंदा समय था | आमदनी की बात क्या कहें बीमारी के कारण तुहारा एक एक दिन पार करना मुश्किल हो रहा था | घर में एक एक पैसे की परेशानी थी |अम्मा बीमार चल रही थीं | हमें जब जो जहाँ से जितने पैसे मिल रहे थे | घर में झोंकते रहे फिर भी परेशानियाँ इतनी अधिक थीं कि घर जब जितने पैसे लाते थे | वे खर्च न हो जाएँ | उन्हें दोपहर में ही लेकर जमा करने तुम बैंक चले जाते थे |हमें केवल किराया भाड़ा ही लेकर घर से निकल जाना पड़ता था | उसी समय नाइयों ने हमला किया | उस चुनौती से जूझने के लिए गाँव से बाहर रहने की व्यवस्था करनी थी | एक एक दिन में 18 -18 घंटे संघर्ष किया तब जो पैसे बने वे मकान खरीदने में सहायक हुए | 40000 यहाँ से सीधे ब्याज पर लेकर बयाना दिया दिया था |
हमारी आर्थिक परिस्थिति इतनी खराब थी कि
सुरभी की मम्मी ने आज तक उतनी ही धोती खरीदी हैं जितने बार बार घर भी ले गई
हैं | उसके अलावा विवाह के बाद आज तक कोई नहीं | मैंने आज तक कोई कुरता
पजामा इन 27 वर्षों में नहीं ख़रीदा | जो कपडे कहीं से मिले वही उन्होंने
पहने और मैंने पहने | यही स्थिति आज तक चल रही है | जिसे जैसे भरोसा हो जो
कसम खाना हो मैं खा सकता हूँ | ये सच्चाई है | जीवन में इतना अधिक संघर्ष
था कि शुरू में इतने पैसे नहीं थे | जब इतने पैसे हुए भी कि कपडे ख़रीदे जा
सकते थे | अब मैं इस लिए नहीं बना रहा हूँ कि मेरा काम जिस दिन सफल होगा तब
बनवाएँगे | उस दिन का इन्तजार पत्नी बच्चे सभी कर रहे हैं | बच्चों को
स्कूल ड्रेस या थोड़े बहुत काम चलाऊ कपडे लिए जाते हैं | सं 1994 में बनारस
में एक स्वेटर कथा में मिला था | सर्दियाँ उसी से कट जाती हैं | एक लेडीज
छोटी साइकिल है बच्चों के लिए लाए थे | पिछले 4 वर्षों से मैं उसी से कहीं
जाता आता हूँ | सामान लाता हूँ |
कुल मिलाकर जीवन बहुत संघर्षपूर्ण था इसी बीच तुमने कभी किसी सामान के लिए कहा या कोई जरूरत पड़ी तो उसमें जितने भी पैसे लगे उसका इन्तिजाम करके उसे पूरा किया | उससे यहां तनाव इसलिए हुआ कि यहाँ के लिए ऐसा क्यों नहीं करते और जब होली दिवाली वहां जाते तो वहाँ व्यंग कर करके ताने मारे जाते कि हम तो मर रहें तुम लोग मौज कर रहे हो | इसके आधार पर साजिशें रची जाती थीं किस्से कहानियां गढ़ी जाती थीं | वो वो सुविधाएँ थीं नहीं जिनका आरोप लगाया जाता था तो उन्हें बुरा लगता था कि जिस घरको अपना बताकर घर का एक एक पैसा झार कर दे दिया जाता कर्जा लेकर दे दिया जाता है | वहाँ आकर खाना बनाने खाने में बार बार ताने मारे जाते हैं | दो कटोरी साम की सब्जी बच जाए तो उसमें 3 ग्लास पानी मिलाकर तुम्हें दिखा दिया जाता था देखो कितनी सब्जी बर्बाद हो रही है | तुम्हें लगता था वास्तव में ऐसा हो रहा है | ये मैंने देखा है
सन 2008 में हमसे कहा गया कि हमारी पटरी सुरभि की मम्मी के साथ नहीं खाएगी | हमने पूछा वो तो खिलानी पड़ेगी | तुम्हें भी सुधारना पड़ेगा उन्हें भी सुधारना पड़ेगा | हमसे कहा गया तुम अपना हिस्सा बेच दो | हमने कहा उससे पटरी खा जाएगी इसकी क्या गारंटी !बोलीं खा जाएगी | हमने पूछा कैसे !कहती हैं हमारे भतीजे को भाई जी बहुत चाहते हैं | बड़े भैया से भी उनकी पटरी खाती है | इसलिए उन्हें ही बेच दो | लेकिन उनसे ज्यादा पैसे मत माँगना और सब नगद मत माँगना | हमने मन लेने के लिए पूछा कि फिर मैं कैसे खरीदूंगा | कहती हैं तुम्हारे पास तो पैसा हैं | ले लेना फिर भैया से धीरे धीरे लेते रहना | इस प्रकार से हमें पैसे वाला सिद्ध किया जाता रहा है | बात बढ़ती थी तो तुम्हारे सामने कोई और कहानी गढ़कर पेश की जाती थी | जिसका उससे संबंध ही नहीं होता था | इससे उत्तेजित होकर तुम लड़ना शुरू करते थे | ये बातें खुद हमारे साथ बीती हैं | ऐसी साजिशों को हम सह रहे थे |तुम कह रहे हो यहाँ आके ऊट पटांग बक कर चले जाते थे | मैंने आना छोड़ दिया |
आज तुम्हीं हमें चोर बदमाश नीच नालायक कह रहे हो | किस आधार पर मैंने किसकी क्या बेईमानी की है किसके साथ गद्दारी की है | मैंने किसे
क्या धोखा दिया है | किसके साथ क्या नीचता की है | तुम कहते हो हमारी जिंदगी बर्बाद कर दी | हमारे लिए ऐसा क्या किया जिसमें मेरे लिए तुम्हारी जिंदगी बर्बाद हो गई | तुम 1980 से 1984 तक मुन्ना घर वालों के कहे चलते रहे | मुन्ना धोखा देते रहे ! खेत धोखा देते रहे |काम हम भी करते रहे अम्मा भी लगी रहीं | कर्जा हो गया तुम नौकरी करने गए | उसमें हमारी पढ़ाई कहाँ से आ गई | तुम 1989 में फिर आए उन्हीं मुन्ना के कहने से तुमने भैंस खरीदी | तुम्हारे ऐसे गलत निर्णयों का नुक्सान हम तीनों उठाते रहे | उसके लिए संघर्ष सबको करना पड़ता था | उस समय खेती में हम बराबर साथ देते थे | होली दिवाली में महीनों यहाँ रुककर काम समाप्त कर ही जाते थे | ये नुक्सान करेने का अधिकार केवल तुम्हारा ही नहीं था | हमारे जनेऊ विवाह में एक पैसा लगा नहीं | 1999 में हमारा स्वास्थ्य खराब हुआ तुमने कहा कहीं इलाज कराओ | जरूरत पड़ी तो कहे बेच देंगे | अगले दिन उन्होंने हमसे कहा कि अपने खेत बेचकर इलाज करा लो |भाई जी ने इसमें गलत क्या कहा है | मैं कुछ नहीं बोला दो दिन बाद मैं दिल्ली आया | यहाँ दवा ली उससे जो लाभ हुआ सो हुआ |सन 2008 में हमसे कहा गया कि हमारी पटरी सुरभि की मम्मी के साथ नहीं खाएगी | हमने पूछा वो तो खिलानी पड़ेगी | तुम्हें भी सुधारना पड़ेगा उन्हें भी सुधारना पड़ेगा | हमसे कहा गया तुम अपना हिस्सा बेच दो | हमने कहा उससे पटरी खा जाएगी इसकी क्या गारंटी !बोलीं खा जाएगी | हमने पूछा कैसे !कहती हैं हमारे भतीजे को भाई जी बहुत चाहते हैं | बड़े भैया से भी उनकी पटरी खाती है | इसलिए उन्हें ही बेच दो | लेकिन उनसे ज्यादा पैसे मत माँगना और सब नगद मत माँगना | हमने मन लेने के लिए पूछा कि फिर मैं कैसे खरीदूंगा | कहती हैं तुम्हारे पास तो पैसा हैं | ले लेना फिर भैया से धीरे धीरे लेते रहना | इस प्रकार से हमें पैसे वाला सिद्ध किया जाता रहा है | बात बढ़ती थी तो तुम्हारे सामने कोई और कहानी गढ़कर पेश की जाती थी | जिसका उससे संबंध ही नहीं होता था | इससे उत्तेजित होकर तुम लड़ना शुरू करते थे | ये बातें खुद हमारे साथ बीती हैं | ऐसी साजिशों को हम सह रहे थे |तुम कह रहे हो यहाँ आके ऊट पटांग बक कर चले जाते थे | मैंने आना छोड़ दिया |
वो घर मेरा भी था मुझे 1986 नवंबर से 1989 तक डेढ़
सौ रुपए महीने घर से जाते रहे | उसके लिए उसके लिए तुम और भाभी हमेंशा ताना दिया
करते हो | हमने पढ़ाया लिखाया | तुमने भी तो उसका खर्च किया है |
अगर मेरे भाई हो तो
तुम्हें हमारी सौगंध है | तुम्हारा धर्म है हमारे दुर्गुणों से हमें अवगत
कराओ |
नी
ऊपर से पूरे घर का बोझ आमदनी का कोई स्रोत नहीं था |
ऐसे ही खाने पीने से संबंधित जब तुम दिल्ली आते थे तब सबसे साथ खाने पीने में कुछ अच्छा कर
लेना चाहते थे | यही जब हम घर आते थे तब भी ऐसा कर लेते थे | घर में किसी
सामान की आवश्यकता देखते तो उसे पूरी करने का प्रयास करता | हमारे ऐसे आत्मीय व्यवहार से ये कहानी
गढ़ी गई कि मेरे पास न जाने कितना पैसा है तुम हमें नहीं पता कि तुम्हें
कैसे लगता है कि मेरे पास बहुत पैसा है |
संघर्ष कम नहीं था | ईश्वर ने मदद की |
तुमसे व्यापार के लिए कभी कोई सामान बोला मुझी कितने भी ब्याज पर पैसा लेना पड़ा मैंने लिया और सामान भेजा |
तुमने कहा हमारे जीवन को पूरा बर्बाद कर दिया है
सारे जीवन मैंने बहुत संघर्ष किया है जिसका एहसास केवल मुझे है या मुझे जो लोग देख रहे हैं | कोई न समझे तो न समझे | जिसका मेरे जीवन के प्रति कोई योगदान ही न रहा हो | उसका समझना भी आवश्यक नहीं है |
भाई जी !तुम्हें स्थापित करने के लिए
मुझे जहाँ जब जो करना पड़ा है किया है | आगे भी करते रहेंगे | ये जिम्मेदारी
मुझे अम्मा ने दी थी | उसका मैं जब जिस लायक रहूँगा आजीवन निर्वाह करता
रहूँगा | इसीलिए मैं बंटवारा करने वहाँ जाकर हम अपने उस त्याग को छोटा नहीं
करना चाहते | बँटवारे के बिषय में तुम या बउआ जो निर्णय लेना चाहते हो लो
और बनवाओ |
जिस बटवारे के लिए तुम हमें बुला रहे हो |भरोसा हो तो कहकर देखो
बउआ आज भी बउआ कहे तुम कहो हमसे न भी कहो अपने आप से निर्णय लो