Thursday, January 9, 2014

आम आदमी पार्टीं में अभी तक के प्रकाश में आए नामों के अनुशार अरविंद केजरी वाल  के साथ मनीष सिसोदिया एवं योगेन्द्र यादव ये  दो लोग तो हर परिस्थिति में सहयोग करते रहेंगे जहाँ तक इनका सम्मान सुरक्षित रहता जाएगा वहाँ  तक ये किन्तु परन्तु  नहीं करेंगे इस लिए इनके साथ अरविन्द को लम्बी योजनाएँ बनानी चाहिए ।
           जहाँ तक बात प्रशांत भूषण  और  कुमार विश्वास हैं इन दोनों लोगों की  राजनैतिक तथा  सामाजिक गम्भीरता के अभाव में ये अपनी  कही हुई बातों एवं अपने अलोक प्रिय  व्यवहारों के कारण  ये साथ साथ नहीं चल पाएँगें और जब तक साथ रहेंगे तब तक  अरविन्द केजरीवाल के लिए  समस्याएँ  ही पैदा करते रहेंगे
   जहाँ तक बात संजय सिंह  है उनके साथ अरविन्द केजरीवाल जी का ताल मेल तभी तक चल पाएगा जब तक वो उनकी अच्छी बुरी हर बात में अपनी मोहर लगते रहेंगे अपनी हठवादिता का भी ये पूरा सम्मान करना चाहेंगे यही स्थिति गोपाल राय जैसे महत्वांकांक्षी लोगों की भी यही स्थिति है इन लोगों के साथ किसी संगठन को सफलता पूर्वक चला पाना अरविन्द जी के लिए बहुत टेढ़ी खीर होगी इनके मन में असंतोष होते ही ये चुप नहीं बैठेंगे उससे जो लपटें निकलेंगी  उनसे अपने व्यक्तित्व को संवार सुधर कर सफलता पूर्वक आगे बढ़ते रहना काफी काठी होगा विशेष संयम पूर्वक ही उस स्थिति से निपट पाना सम्भव हो पाएगा! उससे

Monday, January 6, 2014

आम आदमी पार्टी की ईमानदारी का हाहा कार आखिर क्यों मचा हुआ है ?

ऐसी ईमानदारी भाजपा के संस्कारों में हमेंशा रही है किन्तु उन्होंने इसका कभी भी विज्ञापन नहीं किया है और भले लोगों को करना भी नहीं चाहिए!

       दिल्ली में आम आदमी पार्टी की बड़ी विजय के बाद ऐसी  कैसी  या जैसी तैसी सभी प्रकार की बातें बोली जा सकती हैं उसमें रोक वैसे भी नहीं थी किन्तु ऐसे रौब के साथ बोली जा सकती हैं वैसे खाली मूली बोलने की अपेक्षा ऐसे  अधिक अच्छा है।अब लोग कुछ कुछ ईमानदारी की टोपी पर भरोसा भी करने लगे हैं कि शायद यह ईमानदारी की टोपी देश की सबसे बड़ी पंचायत को भी पवित्र कर दे !

        जहाँ तक आम आदमी पार्टी की बड़ी विजय की  बात है तो यह भी देखना होगा कि यह विजय किस पार्टी से बड़ी है और किससे छोटी है जिससे  छोटी है उससे तो अदब से बात करनी चाहिए!केवल इतना ही नहीं जो पार्टी दिल्ली में आम आदमी पार्टी से बड़ी है उसी ने तीन अन्य प्रांतों में जीत का डंका बजाया  है क्या वो भुला दिए जाने लायक है या वो उनकी पार्टी के अधिष्ठातृ लोगों की ईमानदारी पर विश्वास न कहा जाए आखिर क्यों ?इन तीन प्रांतों के अलावा भी उनकी यशस्वी सरकारें चल रही हैं जनता में उनके प्रति कोई आक्रोश तो दिखता ही नहीं है अपितु भाजपा के प्रति उत्साह दिखता है इन सब बातों के लिए जनता उनके अचार विचार व्यवहार एवं सादगी पर भरोसा करती है वैसे भी ये संस्कारों का सृजन करने वाले सुसंगठन से सृजित पार्टी है जिसमें किसी व्यक्ति के संस्कारों के द्वारा संस्कार विरुद्ध आचरण करने पर एक साथ असंख्य अँगुलियाँ  उठ जाती हैं वो कितना बड़ा व्यक्ति ही क्यों न हो ?

       जबकि अन्य छोटे बड़े दलों में कहाँ हैं ऐसी सुविधाएँ ?भारत की हर राजनैतिक पार्टी का एक प्राण प्रतिष्ठित प्रमुख देवता होता है जैसे काँग्रेस में एक परिवार है ऐसे ही हर पार्टी में कोई न कोई है किन्तु भाजपा में नहीं है यहाँ हर किसी के लिए एक जैसा फिल्टर लगाया गया है हर किसी को उससे होकर ही गुजरना होगा भाजपा का नेता बनने के लिए !क्या इस पारदर्शिता को भाजपा की ईमानदारी नहीं माना जाना चाहिए?

        आम आदमी पार्टी की इस तथाकथित दिल्ली विजय को यदि एक और भी दृष्टिकोण से भी देखा जाए जिसमें भाजपा का सी.एम. प्रत्याशी घोषित करते समय पार्टी का एक वर्ग असंतुष्ट था हो सकता है कि उसने चुनावों में उतनी रूचि न ली हो जितनी उसे लेनी चाहिए थी जैसी कि हर किसी को आशंका है और स्वाभाविक भी है इसीलिए मैंने अपुष्ट सूत्रों से सुना है कि करीब बारह सीटों पर उतारे ही कमजोर कंडीडेट गए थे यदि ऐसा कुछ हुआ ही हो जिनमें कुछ ऐसे अपरिचित या कम परिचित प्रत्याशियों उतरा ही गया हो जिनमें से कुछ को मैं निजी तौर पर भी  जानता हूँ किन्तु रही होगी पार्टी या पार्टी कार्यकर्ताओं कि कुछ मजबूरी क्या कहा जाए किन्तु यदि इन कारणों से भाजपा की वो ही दस बारह सीटें कम हुईं अर्थात काँग्रेस से नाराज मत दाताओं ने भाजपा के उन कमजोर प्रत्याशियों में रूचि न लेकर अपना वोट आम आदमी पार्टी को दे दिया!

        अब सोचने लायक विषय यह है कि यदि भाजपा में आपसी बात व्यवहार में बिगाड़ के कारण यह सब कुछ न हुआ होता तो भाजपा को दस बारह सीटें और मिली होतीं  और बन जाती भाजपा की  सरकार !आम आदमी पार्टी की ईमानदारी पर भाजपा की ईमानदारी आज भी भारी है और कुछ सीटें और आ जातीँ तो और भारी पड़  सकती थी  भाजपा की ईमानदारी आम आदमी पार्टी की ईमानदारी पर !

     यदि ऐसा हो जाता तो आम आदमी पार्टी प्रधानमंत्री बनने के सपने भी शायद न देख पाती । मैं नहीं समझता कि दिल्ली में लोकसभा चुनावों में ही भाजपा लापरवाही करेगी और उतारेगी अपने कमजोर प्रत्याशी भी !

       वैसे भी ईमानदारी एवं त्याग  तपस्या जैसी चीजों में भाजपा किसी भी अन्य दल की अपेक्षा ज्यादा अधिक आदरणीय एवं विश्वसनीय है जो जनसंघ के ज़माने से ही उनके संस्कारों में रच बस रहा है कभी कदाचित कुछ लोग यदि भ्रष्टाचार से जुड़े दिखाई भी दें तो इतने बड़े परिवार में सबको दोषी कैसे कहा जा सकता है !


बाबा जी के बयानों का बोझ कहीं भाजपा पर ही भारी न पड़ जाए ?

  एजेंडे के खींच तान में उलझा भाजपा हाईकमान !

    बाबा जी को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए !उन्हें किसी भी व्यक्ति का विरोध करने का नैतिक हक़ तो है किन्तु राजनैतिक नहीं !फिर किसी नेता का नाम लेकर उसकी आलोचना करके वो साधुता के गौरव के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं और "हनीमून" जैसे शब्द का प्रयोग करके उन्होंने पहली बात तो अपने वैराग्य की बेइज्जती करवाई है दूसरी बात अपनी अयोग्यता का परिचय दिया है क्योंकि अयोग्य व्यक्ति भी मौन रहकर अपना गौरव बचा  सकता है किन्तु ऐसा नहीं हुआ तीसरी बात उनकी  "हनीमून"की बात जिन घरों में सम्बंधित है अर्थात नेता जी का जाना आना जहाँ रहा होगा उनकी भी तो कोई इज्जत रही  होगी उसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए था जो नहीं रखा गया !ऐसे बयान भाजपा पर भी भारी पड़  सकते हैं भाजपा को भी इस कुसंग की क्षतिपूर्ति के लिए तैयार रहना चाहिए !

      बात बस इतनी है कि काले धन का मुद्दा किसका है,इसी प्रकार से भ्रष्टाचार एवं  टैक्स मुक्ति आदि से जुड़े मुद्दे भाजपा के हैं या किसी और के ?और यदि किसी और के हैं तो क्या भाजपा उनके लिए उस और की मदद कर रही है !और यदि यह सच है तो भाजपा क्या इतने दिन में अपने चुनावी मुद्दे भी नहीं बना पाई है क्या?यदि यह सच है तो उसकी अपनी चुनावी तैयारियाँ  क्या हैं और यदि उसे दूसरों के एजेंडे पर ही चुनाव लड़ना होगा तो मुख्य विपक्षी दल होने के नाते उसकी अपनी योग्यता  क्या है?

      देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के  समर्थक एक बाबा जी ने आजकल बीते कुछ दिनों से अपने स्वर कुछ बदल दिए हैं हमने तो टेलीवीजन चैनलों पर ही सुना है कि अब वे अपना समर्थन देने के लिए कोई शर्त भी रख रहे हैं कि यदि ऐसा तो वैसा अर्थात भाजपा यदि मेरी शर्त मानेगी तो मैं उसका समर्थन करूँगा। अभी तक पानी पी पीकर भाजपा का समर्थन करने की कसमें खाने वाले बाबा जी का अचानक बदला हुआ रुख देखकर हर कोई हैरान था कि आखिर क्या कुछ घटित हुआ जो बाबा जी को अचानक करवट बदलनी पड़ी !खैर ये बात तो लोगों की  है किन्तु बाबा जी देखने में परेशान से  लग रहे थे और वे हों भी क्यों न !संभवतः वे सोच रहे होंगे कि लोकपाल का श्रेय तो अन्ना हजारे ले गए अरविन्द केजरीवाल को  दिल्ली की सरकार मिल गई !शोर हमने भी खूब मचाया किन्तु हमारे हाथ तो कुछ भी नहीं लगा!यदि विदेश से काला धन लाने का और टैक्स मुक्ति का मुद्दा ही हमारा बन जाए अर्थात ये हो जाए कि बाबा जी के दबाव में आकर ही काला धन विदेश से लाने पर मुख्य विपक्षी पार्टी तैयार हुई है यही स्थिति टैक्स मुक्ति मुद्दे की हो जाए जिससे किसी तरह इन सफलताओं के हीरो बाबा जी माने जाएँ !भारतीय धर्मनीति, योगनीति, आयुर्वेद नीति ,साधुनीति, व्यापार नीति के बाद  राजनीति के हीरो भी बाबा जी ही मानें जाएँ !और हर क्षेत्र में मजबूत सिक्का उन्हीं का चले!

     राजनैतिक वार्ता के लिए दिल्ली की कुछ बात ही और है इस चक्कर में अबकी बार अपने वार्षिकोत्सव के साथ साथ अपना सारा आश्रम ही उठाकर बाबा जी  दिल्ली ले आए और फिर बुलाकर बैठाए  गए देश की मुख्य विपक्षी पार्टी के बड़े बड़े नेतात्रय और उनके सामने बाबा जी ने फेंका अपना एजेंडा ,किन्तु भला हो राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष का जिन्होंने इतनी सफाई से पानी फेरा आखिर वकील साहब जो ठहरे उन्होंने बाबा जी की और उनके आयोजन की और उनकी देश भक्ति की प्रशंसा करते हुए साफ कह दिया कि भ्रष्टाचार समाप्त करने का प्रमुख मुद्दा तो हमारी पार्टी का है ही साथ  ही कालाधन वापस लाने के लिए भी हमारी पार्टी निरंतर संघर्ष करती रही है! इसके लिए ही तो  हमारे बयोवृद्ध नेता ने चार साल पहले रथ यात्रा भी निकाली थी इसीलिए यह तो हमारी पार्टी का  प्रमुख मुद्दा पहले से रहा है आज भी है इसमें  कहने की कोई बात ही नहीं है !इसके बाद  बोलने की बारी आई पार्टी अध्यक्ष जी की उन्होंने भी बड़ी सफाई से कालाधन वापस लाने वाला मुद्दा अपनी पार्टी के पास ही रखा! फिर पार्टी के पी.एम.प्रत्याशी जी का नंबर आया उन्होंने गम्भीरता पूर्वक अपना एवं अपनी पार्टी का पक्ष रखते हुए बाबा जी को प्रणाम एवं उनकी प्रशंसा आदि खूब कर दी पर कालाधन वापस लाने से लेकर भ्रष्टाचार मुक्ति, किसान हित, टैक्स मुक्ति आदि सारे मुद्दे अपनी पार्टी के एजेंडे के रूप में ही बड़े जतन से सँभालकर अपनी पार्टी के पास ही रखे और भाषण पूरा कर दिया! इस बात से बाबा जी की आत्मा संतुष्ट नहीं हुई आखिर वे जो कहलाना चाह रहे थे वह बात तो सामने आई ही नहीं इसके बाद बाबा जी  स्वयं माइक लेकर खड़े हुए और फिर से उसी एजेंडे पर बोलने के लिए लगाया पी.एम. इन वेटिंग के मुख में माइक शायद उन्हें आशा रही होगी कि धोखे से भी कोई ऐसा शब्द निकल जाए जिससे लगने लगे कि काले धन वाले बाबा जी के मुद्दे को हम लोग एवं हमारी पार्टी गम्भीरता से लेगी ऐसा कुछ भी उनके मुख से निकलवाने पर पूरी तरह अमादा लग रहे थे बाबा जी! सोचते होंगे कि यदि ऐसा कुछ हुआ तो  ले उड़ेंगे किन्तु वे भी मजे खिलाड़ी हैं आखिर पी.एम.प्रत्याशी ऐसे ही थोड़े बनाए गए हैं उन्होंने अपनी पहले कही हुई बातें ही दोहरा  दीं इससे बाबाजी की बेचैनी घटी नहीं !अब निराश हताश बाबा जी ने माइक उठाकर पार्टी अध्यक्ष जी के मुख में लगाकर उन्हें एजेंडे पर बोलने को बाध्य किया किन्तु वे भी पार्टी अध्यक्ष जो ठहरे उन्होंने भी सारे एजेंडे फिर से अपनी पार्टी के पास ही रखते हुए अपनी पहले कही हुई बात ही दोबारा कह दी!सारा खेल बिगड़ गया अब बाबा जी ने स्वयं अपने हाथ में माइक पकड़ कर उन दोनों लोगों के सामने रखने लगे घुमा घुमाकर अपने एजेंडे और उन दोनों लोगों से हाँ कराना चाह रहे थे किन्तु जब उससे कोई रस नहीं निकला तो बाबा जी स्वयं अपने एजेंडे बोलते गए और पब्लिक को समझाते गए कि ये लोग सब कुछ ठीक ही करेंगे किन्तु उन दोनों  नेताओं के मुख से कुछ नहीं निकलने पर निराश हताश बाबा जी की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी कि ये तो जा रहे हैं कुछ हल भी नहीं निकला ये तो सारा भाँगड़ा ही बेकार जा रहा है! फिर जाते जाते उन्होंने अंतिम दाँव मारने की कोशिश की और समाज से कहने लगे कि आप लोगों की जो उचित,सच्चाई युक्त और न्यायसंगत योजनाएँ होंगी उसमें ये लोग आप लोगों का साथ अवश्य देंगे!इन्हीं अमृत बचनों के साथ उन्होंने अपनी हारी थकी बाणी  को बिश्राम दिया, भगवान् उनकी  आत्मा को शांति दे !दूसरी ओर वो अध्यक्ष जी और भावी प्रधान मंत्री जी किसी तरह से पीछा छुड़ाकर अपने अपने लोकों  को गए !भाजपा के कर्मठ एवं निष्ठावान कार्यकर्ताओं के लिए हमारे जैसे हैरान परेशान लोगों ने भी चैन की साँस ली !कि चलो बच गई पार्टी एवं पार्टी के असंख्य कार्यकर्ताओं की श्रम साधना!और जो उपलब्धि होगी उसका  श्रेय अब उन्हीं को मिलेगा जो उसके वास्तविक हक़दार हैं। दूसरा कोई अपने वाक्चातुर्य से पार्टी को मिलने योग्य उसका  श्रेय उससे लेकर अब अपने हक़ में नहीं कर पाएगा !

   भाजपा का समर्पित चिंतक होने के नाते मेरा निवेदन तो यही है कि अब भाजपा को किसी की शर्त के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए और अपने बल पर चुनाव लड़ना चाहिए। वैसे भी जिस देश में राष्ट्रीय पार्टियाँ दो ही हों कोई यदि एक से दुश्मनी कर ही ले तो अपना साम्राज्य सुरक्षित  रखने के लिए किसी दल से तो जुड़ना ही पड़ेगा अन्यथा दलों वाले लोगों के द्वारा दल दल में फँसा देने का भय तो उसे भी हमेंशा ही रहेगा !इसलिए किसी के शर्त के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए !

      वैसे भी कुछ हो न हो किन्तु भाजपा को एक बात तो समाज के सामने स्पष्ट कर ही देनी  चाहिए कि उसे आम समाज के सहारे चलना है या साधू समाज के ?       जो चरित्रवान विरक्त तपस्वी एवं शास्त्रीय स्वाध्यायी संत हैं उनके धर्म एवं वैदुष्य में सेवा भावना से सहायक होकर विनम्रता से साधुओं का आशीर्वाद लेना एवं उनकी समाज सुधार की शास्त्रीय बातों विचारों के समर्थन में सहयोग देना ये और बात है! सच्चे साधू संत भी अपने धर्म कर्म में सहयोगी दलों नेताओं व्यक्तियों कार्यक्रमों में साथ देते ही  हैं किन्तु उसके लिए कोई शर्त रखे और वो मानी जाए ये परंपरा ही ठीक नहीं है ! 

        विदेश से कालाधन लाने जैसी भ्रष्टाचार निरोधक लोकप्रिय योजनाओं के लिए भाजपा को स्वयं अपने कार्यक्रम न केवल बनाने अपितु घोषित भी करने चाहिए ताकि ऐसी योजनाओं का श्रेय केवल भाजपा और उसके लिए दिन रात कार्य करने वाले उसके परिश्रमी कार्यकर्ताओं को मिले।वो भाजपा की पहचान में सम्मिलित हो जिन्हें लेकर दुबारा समाज में जाने लायक  कार्यकर्ता बनें उनका मनोबल बढ़े !अन्यथा कुछ योजनाओं का श्रेय नाम देव ले जाएँगे कुछ का कामदेव और भाजपा के पास अपने लिए एवं अपने कार्यकर्ताओं के लिए बचेगा क्या ? ऐसे तो दस लोग और मिल जाएँगे वो भी अपने अपने मुद्दे भाजपा को पकड़ा कर चले जाएँगे भाजपा उन्हें ढोती फिरे श्रेय वो लोग लेते रहें ।

      इसलिए भाजपा को मुद्दे अपने बनाने चाहिए उनके आधार पर समर्थन माँगना चाहिए । अब यह समाज ढुलममुल भाजपा का साथ छोड़कर अपितु सशक्त भाजपा का साथ देना चाहता है। 

        जो ऐसी शर्तें रखते हैं ऐसे लोगों के अपने समर्थक कितने हैं और वो उनका कितना साथ देते हैं यह उनके आन्दोलनों  में देखा जा चुका है किसी ने पुलिस के विरोध में एक दिन धरना प्रदर्शन भी नहीं किया था सब भाग गए थे । 

        दूसरी बात संदिग्ध साधुओं की विरक्तता पर अब सवाल उठने लगे हैं अब  लोग किसी बाबा की अविरक्तता  सहने को तैयार नहीं हैं किसी भी व्यापारी या ब्याभिचारी बाबा से अधिक संपर्क इस समय लोग नहीं बना  रहे  हैं सम्भवतः इसीलिए कथा कीर्तन भी घटते जा रहे हैं ।

       इसलिए भाजपा समर्थकों का भाजपा से निवेदन है कि वो अपने मुद्दों पर ही समाज से समर्थन माँगे तो बेहतर होगा !




Wednesday, January 1, 2014

अंग्रेजों का नववर्ष आखिर हम क्यों मनाएँ ?मनाने में समस्या क्या है ?

          यह बड़ा  समस्या ग्रस्त प्रश्न है उचित भी है कि हमें नहीं मनाना चाहिए उन अंग्रेंजों का नव वर्ष !

    आखिर कब तक होता रहेगा हमें अपराध बोध कि हमें अंग्रेजी वर्ष क्यों मनाना चाहिए फिर भी हम कब  तक मनाते रहेंगे यह नव वर्ष!

  इस विषय में मेरा निवेदन है कि इसके लिए अंग्रेज हमें बाध्य नहीं कर रहे हैं हमारे सामने ही कुछ जटिल समस्याएँ एवं हमारी ही जरूरतें हैं जिनके कारण हमें ये मानने पड़  रहे हैं !क्योंकि हिंदी वर्षों की अपेक्षा इंग्लिश वर्षों से दैनिक कार्य सञ्चालन में भी आसानी होती है । 

       हमारे यहाँ तिथियाँ घटा बढ़ा करती हैं एक ये कठिनाई है दूसरी जिन्हें जानने और मानने के लिए सर्व प्रथम पूरे देश का एक सर्व मान्य पंचांग बनाना पड़ेगा फिर सबको पंचांग देखना सीखना पड़ेगा! एक बड़ी समस्या और है कि कई बार तिथि संधि के समय में सौ  दो सौ किलोमीटर की दूरी पर तिथियाँ   बदलने लगती हैं तो ट्रेन या जहाज  की व्यवस्था के  सञ्चालन में कठिनाई होगी ।यदि यहाँ ये सब कुछ विशेष व्यवस्था करके ठीक भी कर लिया जाए तो हमारे विदेशी कार्य व्यापार या राजनैतिक कार्यक्रमों का क्या होगा वहाँ की उड़ानें हमारे पंचांगों के अनुशार क्यों चलेंगी उनके साथ हमारी मीटिंग आदि कार्य क्रम रखने में भारी कठिनाई होगी!

      घरेलू क्षेत्र में भी आफिस स्कूल ट्रेन जहाज आदि का सञ्चालन हिंदी तिथियों के आधार पर करना आसान नहीं होगा! हमारे बिल ,सैलरी,टैक्स आदि समस्त कार्यक्रमों के सञ्चालन में कठिनाई होगी!

       दूसरी बड़ी बात सर्व मान्य पंचांग बनाएगा कौन बात बात में मतभेद रखने वाले विद्वान सिद्धांत भेद की भावना से आपस में रोज टकराएँगे और रोज करेंगे शास्त्रार्थ!कौन करेगा फैसला किसकी मानी जाएगी बात!

      अब दूसरी बात करते हैं कि केवल अंग्रेंजों के नव वर्ष से ही क्यों परेशानी होती है अंग्रेजों  के दिनों से क्यों नहीं ?भारतीय दिन तो सूर्योदय से बदलते हैं जब दिनकर उदित होता है तो दिन प्रारम्भ होता है किन्तु प्रायः भारतीय लोग आधी रात  में तारीख बदलते ही अपना दिन बदलना मान लेते हैं आखिर हम लोग क्यों मनाते हैं रात में  बारह  बजने पर ही श्री कृष्ण जन्माष्टमी इसे आधी रात कैसे कहा जा सकता है आधी रात तो रात्रिमान को आधा करके सूर्यास्त में जोड़ने से निकलेगा जो हर शहर का अलग अलग होगा फिर रात बारह बजे ही क्यों ?इसमें हमारा भारतीयत्व हमें क्यों नहीं धिक्कारता है? यही स्थिति श्री राम नवमी की होती है वहाँ भी स्टैण्डर्ड टाइम से ठीक बारह बजते ही श्री राम प्रभु का जन्म मान लिया जाता है आखिर क्यों ?भारतीय पद्धति से वास्तविक समय क्यों नहीं निकाला जाता है?

       इसी प्रकार से और भी कई रहस्य हैं जो समय आने पर हमारे संस्थान द्वारा खोले जाएँगे तब विश्व देखेगा कि भारतीय संस्कृति में वास्तव में क्षमता क्या है आज तो शास्त्रीय लुटेरों ने शास्त्रीय ज्ञान विज्ञान की छीछालेदर मचा रखी है इस छीना झपटी में मीडिया उनका साथ दे रहा है। इन झोलाछाप लोगों पर आखिर क्यों दबाव नहीं दिया जाता है कि जिस विषय सम्बंधित ज्ञान की डिग्रियाँ उनके पास नहीं हैं उस विषय का भाषण एवं प्रैक्टिस उनसे बंद क्यों नहीं कराई  जाती?और यदि ऐसा करने में सरकार सक्षम नहीं है तो क्यों नहीं बंद करवा देती है संस्कृत विश्व विद्यालय ?आखिर वहाँ पढ़ने पढ़ाने का औचित्य ही क्या बचता  है जब वही काम झोला छाप लोग भी कर रहे हैं ?इस तरफ सरकार कोई ध्यान ही नहीं दे रही है।गैर सरकारी वा हिन्दू संगठन तो केवल शोर मचाना चाहते हैं विषय की   गम्भीरता से उन्हें कोई लेना देना नहीं होता है इन विषयों की इतनी उन्हें जानकारी ही नहीं होती है। 

      दूर दूर से कहना तो  बहुत आसान है किन्तु जब जो कोई घुसेगा ज्योतिष विज्ञान की अत्यंत कठिन गणित के दायरे में तो उसे समझ में आजाएगा कि यह कितना कठिन एवं वैज्ञानिक विषय है। बिना किसी यंत्र के सहयोग के भी केवल गणित के आधार पर न केवल आकाशीय ग्रह नक्षत्रों का पता लगा लेना ,सूर्य चन्द्रमा की गति पता लगा लेना,सूर्य चन्द्रमा से सम्बंधित ग्रहणों का पता लगा लेने का गौरव एक मात्र भारत वर्ष को प्राप्त है किंतु  इस ग्रहगणित  की साधना करने वाले उन महान प्राचीन वैज्ञानिक महापुरुषों का आदर ,सम्मान एवं आजीविका का पूर्ण प्रबंध न हो पाने के कारण ज्योतिष शास्त्र के लिए समर्पित वह महान परिश्रमी वर्ग इन विधाओं से धीरे धीरे दूर होता चला जा रहा है यह सबसे अधिक चिंता की बात है !आज भी बड़े बड़े पंचांग कर्ता पंचांग बनाने में नॉटिकल की सहायता ले रहे हैं!

       अगर इसी प्रकार से अपनी उपेक्षा से आहत होकार शास्त्रीय ज्ञान विज्ञान की दृष्टि से शास्त्रीय वैज्ञानिकों का समुदाय दिवालिया होता चला गया तो भविष्य में अपने पास नारे लगाने के अलावा  बचेगा कुछ नहीं !

         आज शास्त्रीय विज्ञान पर भी बैंकिंग का वह सिद्धांत पूरी तरह लागू हो रहा है कि "फटी पुरानी ख़राब मुद्राएँ नई और अच्छी मुद्राओं  को चलन से बाहर कर देती हैं "। 

    वही स्थिति आज धर्म एवं धर्मशास्त्रीय ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में है जब से बिना पढ़े लिखे तरह तरह के स्वरूप धारण करने वाले बड़े बड़े बाबा जोगी भूतप्रेतों  यक्षिणियों  जोगिनियों ने उठाया है शास्त्रीय ज्ञान विज्ञान के सत्यानाश का बीड़ा तब से यह विश्वास भी होने लगा है कि ये जंगली जीव जंतु धर्मशास्त्रीय ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में बचने अब कुछ नहीं देंगे !

      एक दिन ज्योतिष के विषय में टेलीवीजन पर धारा प्रवाह बकते एक शनैश्चरासुर को देखा क्या स्पीड थी ज्योतिष के विषय में उसके झूठ बोलने की! उसकी वाणी का क्या प्रवाह था कोई भयंकर शराबी शराब पीकर इतनी स्पीड में गालियाँ  भी नहीं दे सकता है जितनी स्पीड में वह राशिफल बकता है बाप रे बाप !इसी प्रकार एक दिन टेलीविजन पर ही देखा एक ज्योतिषासुर को! क्या स्वरूप रचना थी उसकी अद्भुत बिलकुल अद्भुत !मैं सोच के दंग था कि किसी पढ़े लिखे शर्मवान व्यक्ति के ज्योतिष बकने की ये स्पीड हो सकती है क्या ? किन्तु माननी पड़ेगी कि उसकी स्पीड थी!!! ऐसे और भी बिना पढ़े लिखे तरह तरह के स्वरूप धारण करने वाले बड़े बड़े ज्योतिषीय भूतप्रेतों  यक्षिणियों जोगिनियों को टेलीविजन पर ज्योतिष समझाते पढ़ाते परेशान लोगों के भाग्यों के भीतर की लुकी छिपी परतें तक नोचते देखता हूँ  क्या किसी ढोर को नोचता होगा कोई कुशल गृद्ध जैसे वो नोचते हैं लोगों के भाग्य ! उनका स्वरूप होता है बिलकुल विलक्षण ,क्या भाषा होती है बिलकुल शुभ चिंतकों जैसी और उनकी नोचाई  तो वास्तव में बहुत अद्भुत होती है । धन्य हैं वे लोग जो ज्योतिष को नष्ट करने के लिए इतना परिश्रम कर रहे हैं अपनी जान जोखिम में डालकर कितना झूठ बोल रहे हैं मानना पड़ेगा बड़े हिम्मती हैं वे लोग !

          कोई कुंडली देखकर भविष्य बताते हैं तो कोई हाथ पैर मुख नाक कान मल मूत्र नाक थूक सब देखकर बकते हैं भविष्य कुछ  शीशे में मुख देखकर कुछ चड्ढी बनियान देखकर तो कोई जुराबें देखकर बकते हैं भविष्य ! कोई कोई तो अपनी चप्पलें देखकर दूसरों का भविष्य बकने लगते हैं!

     कई बार सोचता हूँ कि अच्छा किया कि जैमिनि पराशर जैसे प्राचीन ऋषिगण पहले ही चले गए ये धरा धाम छोड़ कर अन्यथा अब उन्हें आत्महत्या जरूर करनी पड़ती !धन्य मृताः ते नराः!!! 

       इन पाखंडियों के उपाय भी अद्भुत होते हैं ज्योतिष न जानने के कारण कंप्यूटर रख लेते हैं और गृह शांति के वेदमंत्र न जानने के कारण उपायों के नाम पर मन्त्रों को छोड़कर जो मुख में आ जाता है सो सब कुछ बकते हैं ये तो सुनने वाले की जिम्मेदारी होती है कि वह स्वयं समझे कि उसे क्या क्या पहनना ओढ़ना बिछाना खाना खिलाना लेना देना रखना उठाना बहाना फेंकना गाढ़ना खोदना है! 

       ये सब देख सुनकर लगता है कि क्यों न माने लोग ज्योतष को बकवास जब यहीं से हो रहा है सत्यानाश !न कहीं लिखे हैं ऐसे बकवासी उपाय और न ही  होता है इनका कोई असर !

       राशिफल की तो कला ही बिलकुल अद्भुत  है दिन में अलग अलग चैनलों पर अलग अलग टाइम पर अलग अलग लोग अलग फलादेश एक ही व्यक्ति के एक ही दिन के बारे में बताते हैं क्या इनके बेबकूप बनाने की इस प्रक्रिया को समझा नहीं जाना चाहिए और क्यों नहीं की जानी चाहिए इन पर कोई कठोर कार्यवाही ?केवल इसलिए नहीं कि ये ऐसा क्यों करते हैं अपितु इनसे इसके प्रमाण भी पूछे जाने चाहिए कि जब प्रतिदिन कोई ग्रह नहीं बदलता है तो आपका राशिफल कैसे बदलता है प्रतिदिन ?

     इसलिए लिए हमारी समस्त सनातन धर्मियों से प्रार्थना है कि आप संगठित हो कर अपने ज्ञान विज्ञान के प्रचार प्रसार में लग जाएँ । 

   इसके लिए आप हमारे राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान में भी संपर्क कर सकते हैं में भी संपर्क कर सकते हैं - 9811226973  

       

नमस्ते चोर नेताओं को खतरा है केजरीवाल की राजनीति से !

आम लोगों से  बात करने में तौहीन समझने वाले भाजपाई अब आम लोगों से किस मुख से करें  बात एवं  कैसे माँगें  वोट ?

केजरीवाल की चर्चा तो बहुत है मीडिया ने इस ईमानदार विभूति की बात विदेशों तक फैला भी खूब रखी है किन्तु उन्होंने किया आखिर क्या है ऐसी कौन सी हमदर्दी की है दिल्ली की जनता के साथ?

    इतना सब कुछ होने के बाद भी केजरीवाल जी का बर्चस्व जैसा  कुछ भी समाज में बिलकुल नहीं है और इसलिए लोक सभा चुनावों में भी केजरीवाल जी कोई करिश्मा करने नहीं जा रहे हैं। बात साफ है कि दिल्ली से लेकर सारे देश में लुटी पिटी काँग्रेस ने अन्य प्रदेशों की तरह ही दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी के रूप में अपनी एक फीडर पार्टी तैयार करना प्रारंभ कर दिया है जैसे -बिहार में लालू प्रसाद जी की पार्टी ,यू.पी.में सपा बसपा के मुलायम और मायावती जी जैसे लोग जो चुनावों के समय काँग्रेस की आलोचना एवं जनता का पक्ष ले करके पहले औने पौने में जनता से वोट हासिल कर लेते हैं फिर अपनी अपनी शर्तों पर काँग्रेस की शरण में पहुँच जाते हैं


दिल्ली भाजपा के आपसी कलह  के कारण कई जगह से ऐसे प्रत्याशी बनाए गए जो चुनाव जीतने लायक थे ही नहीं वो कागजी शेर पराजित होने ही थे सो हुए परिणाम सवरूप भाजपा को बहुमत से दूर रहना था सो रही। जो मतदाता काँग्रेस से तो दुखी था ही और भाजपा के न जीतने योग्य कार्यकर्त्ता को वोट देना उसने ठीक नहीं समझा अब वो अपना वोट कुँए में डालना चाह रहा था तो आम आदमी पार्टी को दे दिया । इससे आम आदमी के साथ वो भाजपा को मिलने वाली सीटें भी जुड़ गईं तो उनकी सीटें बढ़नी ही थीं सो बढ़ गईं । इसमें केजरीवाल का कमाल क्या है जो उनकी प्रशंसा में कसीदे पढ़े जा रहे हैं। भाजपा ने   उत्तर प्रदेश में पहली बार मायावती को प्रत्यक्ष समर्थन देकर वहाँ से अपना पत्ता काट लिया दूसरी बार आपस में ही एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए न चाहते हुए भी अप्रत्यक्ष रूप से केजरीवाल जैसे नेताओं को फायदा पहुँचाया है कुछ भी हो केजरीवाल के नाम के साथ मुख्यमंत्री तो लगवा ही दिया ! इसका श्रेय भाजपा को ही जाता है अब मायावती की तरह ही दिल्ली में भाजपा को ही चोट पहुँचाएँगे केजरीवाल!अभी भी भाजपा यदि अटल अडवाणी जी के स्वभाव और शैली से प्रेरणा लेकर आगे बढे तो भाजपा का कुछ नहीं बिगाड़ पाएँगे केजरीवाल!


  केजरीवाल  का अभी तक न कहीं विस्तार है और न कहीं चमत्कारिक विस्तार होगा ।दिल्ली  


      

Tuesday, December 31, 2013

प्यार का आधुनिक स्वरूप परिवारों को तोड़ने वाला एवं बलात्कारों को बढ़ाने वाला होता जा रहा है !

    ऐसे सार्वजनिक दृश्यों को प्यार मानना सबसे बड़ी भूल क्योंकि  यही बेशर्मी बलात्कारों की ओर खींचकर  ले जाती है ! 

    अपनी इच्छा पूर्वक लड़कों के शरीरों से लिपटी इन लड़कियों को विवाह तक की समाई आखिर क्यों नहीं होती है !लड़कियों को चूमते, चाटते, दुलराते लड़के !शायद माता पिता की गोद में भी  इतने प्यार से  खेलने को न पा पाई हों बेचारी !क्या आनंद है जिसका अनुभव केवल इन दोनों की अंतरात्माएँ ही अनुभव कर रही हों गी किन्तु टूटेंगे जिस दिन वे झूठे आश्वासनऔर कभी न पूरे हो सकने वाले सपने जो सेक्स लोभ में एक दूसरे को दिए और दिखाए गए होंगे तब क्या होगा !इनके द्वारा एक दूसरे को अपने अपने विषय में बताई गई झूठी अच्छाइयों की पोल कभी तो खुलेगी ही !तब यही पार्की प्यार बलात्कार के रूप में प्रचारित किया जाएगा , इसपर समाज को विश्वास करना पड़ेगा,सरकार से बलात्कारों के विरुद्ध कड़े कदम उठाए जाने की रस्म निभाने को कहा जाएगा!महिलाओं की सुरक्षा के प्रश्न उठाए जाएँगे !समस्त पुरुष जाति को न केवल कटघरे में खड़ा किया जाएगा अपितु उन्हें बलात्कारों के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए धिक्कारा  जाएगा ! शार्ट समय में नेता बनने की लालषा लेकर बैठे नेता लोग सत्ता में बैठे लोगों को  त्यागपत्र देने के लिए ललकारेंगे ,पत्रकार लोग चैनलों पर बैठकर समझदार लोगों के साथ बहस करा रहे होंगे ,मनोरोग के डाक्टर बुलाकर उनसे उपाय पूछा  जाएगा किन्तु सच बोलने सुनने सहने का साहस किसी में नहीं होता है कि यदि पार्कों में ऐसा न हुआ होता तो वहाँ वैसा होने की सम्भावनाएँ भी शायद कम होतीं !

   आजकल तो बड़े बड़े लोग भी   बलात्कारों की लपेट इन आ गए हैं ! इसमें नेता ,उद्योग पति ,न्याय प्रणाली से जुड़े लोग,पत्रकारिता से जुड़े लोग ,पुलिस विभाग से जुड़े लोग हों या आम जनता से जुड़े लोग आदि तो मिल ही जाते हैं जिनमें  सबसे जघन्यतम चिंतनीय घटनाओं में से एक धर्म से जुड़े लोगों का भी इन्हीं आरोपों में आरोपित होना है। इस तरह की दुर्घटनाओं का प्रचार प्रसार भी इस प्रकार से हुआ है कि सम्पूर्ण वर्ष में बलात्कार से जुडी ख़बरें प्रमुखता से दिखाई सुनाई एवं छापी जाती रही हैं।जन जागरण भी खूब हुआ आम समाज से लेकर प्रशासन से जुड़े लोग ,राज नेता लोग युवा वर्ग आदि सभी स्त्री पुरुष मय समाज  इन बलात्कारों की समाप्ति के लिए सुचिंतित भी दिखा !न केवल इतना अपितु बलात्कारों को रोकने के लिए कठोर कानून भी बनाया गया !ये सब तो ठीक ही है ।      मुझे भी विभिन्न शहरों शिक्षण संस्थानों समाजों में रहने के अवसर मिले!जिसमें ज्योतिष एवं धर्म तथा समाज सुधार सम्बंधित कार्यों से जुड़े होने के नाते इसी विषय से जुड़े हमारे अनुभव में जो आम समाज में  से दबे छिपे कुछ तथ्य सामने आए हैं वो मैं आप सभी के सम्मुख रखना  चाह रहा हूँ। जहाँ तक मुझे लगता है कि जैसे किसी जीवित व्यक्ति के वजन को एक आदमी भी उठा सकता है किन्तु प्राण हीन शरीर वजनीला होने के कारण उठाया नहीं जाता है।

      इसी प्रकार से हम सभी लोग यदि अपनी अपनी जीवन शैली में सुधार नहीं करते हैं और चाहते हैं कि सरकार हमें रखाती घूमे ऐसा कैसे सम्भव है !कहने का मतलब अपना स्वेच्छाचार जारी रखते हुए केवल  पुलिस और कानून के भरोसे अपने को छोड़ देना ठीक नहीं होगा। अपनी सुरक्षा के लिए हमारी अपनी भी कुछ जिम्मेदारियाँ हैं जिन्हें हमें भी न केवल समझना होगा अपितु अपने रहन सहन बात व्यवहार वेष भूषा आदि में भी आवश्यक संयम बनाए रखना होगा तभी पुलिस और कानून से सुरक्षा की आशा रखना ठीक होगा ।

      बनारस की बात है वर्षों से टूटी पड़ी एक बिल्डिंग थी, भूत प्रेत के भय से उसके अंदर कोई जाता आता नहीं था। एक दिन एक लड़की लड़के का जोड़ा एकांत की तलाश में उसके अंदर घुसा और उस एकांत से बड़ा प्रभावित हुआ!इसलिए उनका वहाँ अक्सर आना जाना होने लगा!ऐसे में यदि वहाँ उस लड़की के साथ कोई दुर्घटना घट ही जाती तो क्या कर लेती पुलिस !और ऐसी एकांतिक जगहों पर प्रशासन कितनी रखे निगरानी ?कोई लड़का यदि किसी अत्यंत एकांत स्थान में किसी लड़की को ले भी जाना चाहता है तो क्या उसकी बात मान लेनी चाहिए !यदि हाँ तो पुलिस क्या करे ?आखिर वे भी इंसान हैं और हमें भी रामराज्य की आशा नहीं करनी चाहिए ! 


  हमारे संस्थान के द्वारा इस विषय में जहाँ तहाँ से लिए गए ये तथाकथित लव के लिए लव लवाते लड़के लड़कियों के चित्र हैं जो ऊपर दिए गए हैं जिनमें हर लड़की अपनी सम्पूर्ण रूचि के साथ इन लड़कों का साथ देती दिख रही होती है।इन लड़कों की सामूहिक हरकतों का न तो कोई विरोध कर रही होती है और न कोई शोर मचाया जा रहा होता है और न ही उन लड़कों के साथ कोई गिरोह या हथियार ही दिख रहे होते  हैं और न ही कहीं किसी को कैद कर के रखा दिखाई पड़ रहा होता  है ऐसी परिस्थिति में यदि वह लड़का विश्वास घात कर ही देता है और कुछ नहीं तो गला ही दबा दे तो उस समय कैसे सुरक्षा कर  लेगी पुलिस?और गला दबाने से पहले यदि किसी दुर्घटना की आशंका से पुलिस वाले लोग इन्हें रोकने की कोशिश करें तो प्यार पर पहरा कहकर मीडिया शोर मचाने लगता है।आखिर लड़कियों की सुरक्षा के लिए किया क्या और कैसे जाए!आखिर प्यार की गलत फहमी में इंद्रियों की भूख मिटाने लिए कितनी लड़कियों के जीवन से खेलने की यों ही आजादी मिलती रहेगी और इसे रोकने के लिए इस प्यार के खेल में सम्मिलित बच्चों के लिए  कठोर कानून के नाम पर क्या फाँसी ही एक मात्र विकल्प है! क्या ये हमारी समाज के चिंतकों लिए चिंता का विषय नहीं होना चाहिए ? कि हमें अपने बच्चों के लिए इतने कठोर दंड के विषय में निर्णय लेना पड़ा! आखिर ऐसे लड़के लड़कियों के माता पिता समेत समस्त परिवार वालों का दोष क्या है जो उन्हें उनकी आँखों के सामने अपने बच्चों के साथ हुई इस प्रकार की अप्रिय वारदातें सुननी सहनी पड़ती हैं, क्या उन्मुक्त आधुनिकता के उत्कट समर्थकों के पास है कोई मध्यम मार्ग जिससे ऐसे युवक युवतियों के माता पिता को यह दुस्सह पीड़ा कभी न सहनी पड़े!इस विषय में मेरा एक और निवेदन है कि कानूनी स्तर पर जब तक ऐसे यौवनोन्मादी लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर ली जाती है तब तक के लिए ऐसे खुलेपन को विराम क्यों न दे दिया जाए!आखिर कैसे टाली जाएँ  ये दुर्घटनाएँ?

     ऐसे खुलेपन को रोकने की बात उठते ही न जाने क्यों कुछ विदेशी संस्कृति परस्त लोग,समलैंगिक वर्ग के साथ साथ और भी लिंगजीवी वर्ग अर्थात केवल  लैंगिक सुखों के लिए जीवन धारण करने वाला शरारती वर्ग भी शोर मचाने लगता है। नाच गाकर भागवत के नाम पर भोगवत बाँचने  वाला आम समाज या साधू समाज ये लोग भी रासलीला के नाम पर खूब दुष्कर्म करते देखे सुने जा रहे हैं। ये सब टी.वी.चैनलों पर भी बैठ बैठ कर शोर मचाने लगते हैं आखिर क्यों न पूछा जाए उन्हीं से ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने का उपाय ?

   इस प्रकार से प्यार के नाम पर जब तक मेट्रो ,पार्कों,पार्किंगों  जैसी सामूहिक जगहों पर आपसी सहमति से भी ये शरीर घर्षण होते रहेंगे तब तक बलात्कारों का बंद होना कठिन ही नहीं असम्भव भी लगता है।यदि सच है कि ये युवा वर्ग बासना की बेदना सहने में सक्षम नहीं है तो शारीरिक आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए इनकी शादी क्यों नहीं कर दी जानी चाहिए? इससे इन युवकों की भी सामाजिक साख सुरक्षित बनी रहे एवं समाज का वातावरण भी न बिगड़े और युवक युवतियों की  जिंदगी भी सुरक्षित बनी रहे !

      ये लोग खुद तो बर्बाद होते ही हैं और देखने वालों को भी बर्बाद कर रहे होते हैं जो ऐसे असामाजिक कृत्यों में सम्मिलित हो जाते हैं या होना चाहते हैं या हो चुके होते हैं वे इन्हें प्रेम या प्यार कहने लगते हैं बाकी लोग तो घृणा करते ही हैं।जब तक ऐसे असामाजिक कृत्य सामूहिक रूप से होते रहेंगे तब तक बलात्कारों का बंद होना मेरी अपनी समझ में कठिन ही नहीं असम्भव सा भी लगता है। 

      प्रेम या प्यार जैसे ऐसे कुकृत्यों में सम्मिलित लोग केवल एक दूसरे की जिंदगी से खेल रहे होते हैं अर्थात दोनों दोनों के साथ जब एक बार पूरी तरह एक दूसरे की अंतरंगता में सहभागी हो चुके होते हैं फिर उन दोनों में किसी एक का प्यार नाम का सौदा कहीं दूसरी जगह उससे अच्छा पट जाता है तो वो पहले वाले को छोड़ना चाहता है इसके लिए उन दोनों के बीच हर प्रकार के अपराध की गुंजाइस रहती है इसमें हत्या और आत्म हत्या तक होते  देखी जाती हैं!

          यहाँ एक विशेष बात ध्यान देनी होगी कि जो युवा वर्ग इस तरह की गतिविधियों में सम्मिलित है वो शादी होने तक इतना बेकार हो चुका होता है कि शादी शुदा जीवन या तो सुखमय नहीं होता या नाना प्रकार की दवाएँ  लेकर काम चलातू माहौल तैयार किया जाता है फिर भी काम संतोष जनक न हुआ तो तलाक होता है

  ये तलाक शुदा लोग या तो कार्य क्षेत्र में कोई साथी ढूँढते हैं यदि नौकरी पेशा या   विशेष बाहर जाने आने वाले न हुए तो कोई बाबा ,मुल्ला ,फादर, पंडित आदि धार्मिक लोगों से जुड़ते हैं जिन्हें जब अपने घर बुलाना चाहें बुला लें या उनके पास जब जाना चाहें तब किसी बहाने से चले जाएँ ! अपने दाम्पत्यिक जीवन से असंतुष्ट लोगों की विशेष भर्ती सत्संग या योग शिविरों में ही होती देखी जाती है जिनके लिए घर गृहस्थी में विशेष विरोध भी नहीं झेलना पड़ता है !इसके बाद आना जाना प्रारम्भ हो जाता है!अन्यथा कथा सत्संगों में उमड़ने वाली भीड़ें यदि चरित्र सुधरने तथा सुधारने एवं साधना  के लिए जातीं तो इसका असर समाज में भी दिखाई पड़ता किन्तु सुधारने के ठेकेदार खुद बलात्कारों में लिपटे घूम रहे हैं। धर्म क्षेत्र  में जो व्यभिचारी वर्ग है वो शास्त्रों को न तो पढ़ा होता है न पढ़ता है न उनकी बात मानना होता है जैसे मन आता है वैसे रहता है और जो मन आता है वो खाता है जैसा मन होता है वैसा श्रृंगार करता है प्रायः ऐसे मजनूँ  ही धर्म की आड़ में दुष्कर्म करते घूम रहे हैं!

      गैंग रेप की घटनाएँ भी आजकल अधिक रूप में घटने लगीं हैं जो घोर निंदनीय हैं और रोकी जानी चाहिए । इसमें कुछ  और भी कारण सामने आए हैं जो विशेष चिंतनीय हैं एक तो वो जो लड़कियाँ सामूहिक जगहों पर अपनी सहमति से अपने साथ किसी प्रेमी नाम के लड़के को अश्लील हरकतें करने देती हैं या हँसते हँसते सहा करती हैं उन्हें देखने वाले सब नपुंसक नहीं होते ,सब संयमी नहीं होते ,सब डरपोक नहीं होते कई बार देखने वाले कई लोग एक जैसी मानसिकता के  भी मिल जाते हैं वो यह सब देखकर कुछ करने के इरादे से उनका पीछा करते हैं मैटो आदि सामूहिक जगहों से हटते ही वो कई लड़के मिलकर उन्हें दबोच लेते हैं वो अकेला प्रेमी नाम का जंतु क्या कर लेगा फिर उस लड़की से उसका कोई विवाह आदि सामाजिक सम्बंध तो होता नहीं है जिसके लिए वो अपनी कुर्बानी दे वो तो थोड़ी देर आँख मीच कर या तो निकल जाता है या समय पास कर लेता है।अगले दिन सौ पचास रुपए किसी डाक्टर को देकर ऐसी ऐसी जगहों पर पट्टियाँ करा लेता है ताकि लड़की को दिखा सके कि उसके लिए वो कितना लड़ा है ऐसी दुर्घटनाएँ घटने के बाद यदि अधिक तकलीफ नहीं हुई तो ऐसे प्रेम पाखंडी बच्चे डर की वजह से घरों में बताते भी नहीं हैं और जो बताते भी हैं  तो कुछ अन्य कारण बता देते हैं!

     ऐसी  घटनाएँ  कई बार देर  सबेर कारों में लिफ्ट लेने,या ऑटो पर बैठकर,या सूनी बसों में बैठकर,या अन्य सामूहिक जगहों पर की गई प्रेमी प्रेमिकाओं की आपसी अश्लील हरकतें  देखकर घटती हैं यह नोच खोंच देखते ही जो लोग संयम खो बैठते हैं उनके द्वारा घटती हैं ये भीषण दुर्घटनाएँ !इनमें सम्मिलित लोग अक्सर पेशेवर अपराधी नहीं होते हैं।ये सब देख सुनकर ही इनका दिमाग ख़राब होता है । 

       एक बात और सामने आई है कि आज कुछ लड़कियाँ कुछ निश्चित समय के लिए निश्चित एमाउंट अर्थात घंटों के हिसाब से धन लेकर शारीरिक सेवाएँ देने के लिए सहमति पूर्वक किसी लड़के के साथ जाती हैं उसमें उस नियत समय के लिए वह ग्राहक रूप लड़का लगभग स्वतन्त्र होता है उन्हें कहीं ले जाने के लिए! किन्तु उतने समय में उसे छोड़ना होता है। ऐसी परिस्थितियों में उस लड़की को बिना बताए ही वह लड़का उस समय में ही कंट्रीब्यूशन के लिए अपने साथी  कुछ और लड़कों को साझीदार बना लेता है जिससे वो लड़के आपस में आर्थिक कंट्रीब्यूशन  कर लेते हैं और कम कम पैसों में निपट जाते हैं किन्तु पहले करार इस प्रकार का न होने के कारण उस लड़की को बुरा लगना स्वाभाविक ही है उसके सामने दो विकल्प होते हैं या तो वह चुप करके घर बैठ जाए या फिर उन्हें सबक सिखाने के लिए कानून की शरण में जाए यदि वह कानून की शरण में जाती  है तो सारी  कार्यवाही   गैंग रेप की तरह   ही की जाती है यहाँ तक कि चिकित्सकीय रिपोर्ट भी उसी तरह की बनती है मीडिया में भी इसी प्रकार का प्रचार होता है! 

      इसीप्रकार आजकल कुछ छोटी छोटी बच्चियों के साथ किए जाने वाले बलात्कार नाम के जघन्यतम  अत्याचार देखने सुनने को मिल रहे हैं जिनका प्रमुख कारण अश्लील फिल्में तथा इंटर नेट आदि के द्वारा  उपलब्ध कराई  जा रही अश्लील सामग्री  आदि है आज जो बिलकुल अशिक्षित  मजदूर आदि लड़के भी बड़ी स्क्रीन वाला मोबाईल रखते हैं भले ही वह सेकेण्ड हैण्ड ही क्यों न हो ?होता होगा उनके पास उसका कोई और भी उपयोग !क्या कहा जाए! 

     इसीप्रकार के कुछ मटुक नाथ टाइप के ब्यभिचारी शिक्षकों ने प्यार की पवित्रता समझा समझाकर बर्बाद कर डाला है बहुतों का जीवन !

        बड़े बड़े विश्व विद्यालयों में पी.एच.डी. जैसी डिग्री हासिल करने के लिए लड़कियों को कई प्रकार के समझौते करने पड़ते हैं यदि गाईड संयम विहीन और पुरुष होता है तो !क्योंकि शोध प्रबंध उसके ही आधीन होता है वो जब तक चाहे उसे गलत करता रहे !वह थीसिस उसी की कृपा पर आश्रित होती है । 

         ज्योतिष के काम से जुड़े लोग पहले मन मिलाकर सामने वाले के मन की बात जान लेते हैं फिर उसका मिस यूज करते देखे जाते हैं। 

       चिकित्सक लोग बीमारी ढूँढने के बहाने सब सच सच उगलवा लेते हैं फिर ब्लेकमेल करते रहते हैं ।इसी प्रकार से कार्यक्षेत्र में कुछ लोग अपनी जूनियर्स  को डायरेक्ट सीनियर बनाने के लिए कुछ हवाई सपने दिखा चुके होते हैं उन सपनों को पकड़कर शारीरिक सेवाएँ लेते रहते हैं उनकी !किन्तु जब  महीनों वर्षों तक चलता रहता है ऐसा घिनौना खेल, किन्तु दिए गए आश्वासन झूठे सिद्ध होने लगते हैं तब झुँझलाहट बश जो सच सामने निकल कर आता है उनमें आरोप बलात्कार का लगाया जाता है किन्तु किसी भी रूप में आपसी सहमति से महीनों वर्षों तक चलने वाले शारीरिक सम्बन्धों को बलात्कार कहना कहाँ तक उचित होगा ?ऐसे स्वार्थ बश शरीर सौंपने के मामले राजनैतिकादि अन्य क्षेत्रों में भी घटित होते देखे जाते हैं वहाँ भी वही प्रश्न उठता है कि ऐसी परिस्थितियों में कैसे रुकें बलात्कार ? 




 

       

Wednesday, December 25, 2013

युग पुरुष माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के लिए अनंतानंत शुभ कामनाएँ -

ईश्वर आपको स्वस्थ प्रसन्न तथा दीर्घायुष्यवान  करे 

 रखना सुरक्षित स्वस्थ  जीवन प्रसन्न सदा 

                   देश की धरोहर इस अमित निशानी को

त्याग के तागों से निर्मित कलेवर यह 

                    अमर बना रहे ये सत्य कवि  बानी हो

ईश्वर अनंत यश देता रहे आपको 

                   अटल! तुम्हारी अमितायु जिंदगानी हो

गरिमा मय जीवन सदैव रहे आपका 

                 अंत में कलंक मुक्त मंजुल कहानी हो ॥ 1 ॥

 कामना हमारी है ये कुशल रहो सदैव

                          ईश्वर कृपा करे जो सबका सहारा है। 

देश ने प्रशासकों के घृणित घोटाले देख 

                     आपसे व्रती को आर्त  होकर पुकारा है ॥

भूल मत जाना तुम भूषण हो भारत के 

                      मातृ भूमि के लिए ही जीवन सँवारा है। 

अटल! अटल सदैव जीवन तुम्हारा रहे 
                    भारती वसुंधरा पे सबका दुलारा है ॥2 ॥

त्याग के सभी का मोह राष्ट्र निर्माण हेतु 

                   भारतीय  क्षितिज में अटल सितारा था। 

स्वार्थ पे न ध्यान सदा ध्येय परमार्थ रहा 

                    देश के लिए ही निज जीवन उतारा था॥ 

लूटते स्वशासकों के घृणित घोटाले देख 

                      राष्ट्र की सुरक्षा हेतु शासन सँवारा  था। 

रो चला था देश देख आपकी  विनम्रता को 

                  तेरह दिनों का ताज हँसके उतार था ॥3 ॥ 

 जीवन का सारा भाग भारती की सेवा हेतु 

                 सौंप दिया जिसने समस्त सुख विसार के। 

 धैर्य धर्म सत्यता समाज के हितों का ध्यान 

                         रखते रहे सदैव त्याग के आधार पे ॥

 साधना  चरित्र वा पवित्र राष्ट्र सेवा की जो 

                   आज लौं  बचा रखी है चढ़ के भी धार पे । 

चाहते तो जाते सिद्धांत सरकार नहीं 

                 बिकने के लिए लोग तब भी तैयार थे ॥4॥                                                  - कारगिल विजय से


आदरणीय अटल जी जब प्रधानमंत्री थे तो एक दिन उनसे बात करने और अपनी काव्य पुस्तक कारगिल विजय भेंट करने एवं कविताएँ सुनाने का सौभाग्य मुझे मिला इतने व्यस्त जीवन में भी कितना तन्मय होकर वो सुन रहे थे हमारी रचनाएँ! उनकी टिप्पणियाँ  मुझे आज भी याद हैं देश एवं समाज के प्रति कितना अपनापन  है उनमें !वास्तव में वो राष्ट्र निष्ठा के समुद्र हैं साथ में भाजपा सांसद श्री श्याम बिहारी मिश्र जी एवं एक और पंडित जी थे जब मैं कविताएँ सुनाने लगा तो वो न केवल सुन रहे थे अपितु टिप्पणियाँ भी करते जा रहे थे । जब मैंने उनसे निवेदन किया कि आपके आदर्श जीवन को कोई आम आदमी समझना चाहे तो क्या पढ़े कितना पढ़े तो वो हँसने लगे और कहा -

         न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितो यशः । 

   अर्थात मैं मृत्यु से भयभीत नहीं हूँ केवल यश दूषित होने से डरता हूँ !

       हमारे द्वारा लिखी गई कारगिल विजय पुस्तक की श्री अटल जी से सम्बंधित कुछ और रचनाएँ -

  जेनेवा में भेजे जाने के लिए -

  चाह के भी सत्ता पक्ष खोज न विकल्प सका 

               अटल को भेजना ही एक मात्र चारा था ।

सबकी निगाहें ढूँढ़ते न थकती थीं जिसे 

         बुद्धिजीवियों कि भावनाओं का सितारा था ॥

  विज्ञ नरसिंह राव से प्रबुद्ध शासक ने

                      अपने ही मुख से कह गुरू पुकारा था  ।

कैसे छिनाया गया ताज उस शासक से 

     जो सौ करोड़ हिंदुओं कि आस का सहारा था ॥1॥

आपस में बढ़ते विवादों से विषाक्त विश्व 

                 चुने चुने नायकों का भारी अखारा था।

विश्व की विभूतियाँ न रौंद दें हमारा मान

          ध्यान था सभी का देश चिंतित बिचारा था॥

सौ करोड़ हिंदुओं कि आश का सहारा था जो 

             अटल बिहारी वहाँ प्रतिनिधि हमारा था । 

उससे छिनाया था ताज पद लोलुपों ने 

        जाकर जेनेवा जो न हारा  ललकारा था ॥ 2 ॥    

 भारत को शक्तिवान मान ले विशाल विश्व 

              करके परमाणु विस्फोट जो दहाड़ा  था। 

शोर सुन घोर चीत्कार उठे रौद्र राष्ट्र 

              जिनकी बहादुरी का बजता नगाड़ा था ॥

मान के कँगाल हमें कोटि प्रतिबन्ध किए

            पहले के शासकों की भीरुता को ताड़ा था । 

किन्तु पाला  पड़ा था आज अटल बिहारी जी से 

             डटे निःशंक और सबको लताड़ा था ॥ 3 ॥

                                                - कारगिल विजय से