Tuesday, February 11, 2014

सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल क्यों ?

   सैलरी से संतुष्ट नहीं हैं तो छोड़ें नौकरी और दें बेरोजगारों को अवसर!

   हड़ताल करने वाले सरकारी कर्मचारियों की छुट्टी करके  योग्य बेरोजगारों को क्यों न दिया जाए रोजगार !इतनी अधिक सैलरी लेकर भी जिन लोगों का पेट नहीं भर रहा है सरकार उनके हाथ क्यों नहीं जोड़ देती है आखिर उन्हें मना मना कर बार बार नौकरी में रहने के लिए बाध्य क्यों किया जाता है और ऐसा तब किया जा रहा है जब उनसे अधिक या समान लोग बेरोजगार होकर मजदूरी करते घूम रहे हैं इसी बहाने सही सरकार उन गरीबों को भी अवसर क्यों नहीं दे रही है इससे एक सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि दुबारा से इस तरह का ड्रामा हमेंशा हमेंशा के लिए बंद हो  जाएगा और घूस लेकर काम करने की प्रवृत्ति पर भी लगाम लगेगी! किन्तु सरकार ऐसा करने में डरती क्यों है क्या कहीं सरकार का कोई कमजोर बिंदु इनके पास दबा तो नहीं होता है अन्यथा इनके सामने सरकार दब्बू सी क्यों दिखाई देती है!आखिर सरकार को भी पता है कि सरकारी स्कूलों में पढाई नहीं होती है फिर भी सरकार साठ  हजार सैलरी देती है किन्तु सारे सरकारी कर्मचारी यहाँ तक कि सरकारी शिक्षक भी अपने बच्चों को पढाते प्राइवेट स्कूल में है जहाँ शिक्षक की सैलरी पाँच दस हजार होती है!हमारे  कहने का उद्देश्य मात्र इतना है कि जो काम पाँच दस हजार रूपए खर्च करके बहुत अच्छा किया जा सकता है उसी काम को उससे बहुत कम अच्छा करवाने के लिए सरकार उससे दसगुनी सैलरी क्यों देती है! गरीब जनता का पैसा इसतरह बर्बाद किया जाता है आखिर सरकार की मंसा  क्या है सरकार के हर विभाग का यही हाल क्यों है !एक तरफ शिक्षित बेरोजगार मारे  घूम रहे हैं तो दूसरी जिन्हें रोजगार मिला है वो काम नहीं करना चाह  रहे हैं इसका कुछ निराकरण तो करना ही पड़ेगा !

     सरकारी कर्मचारियों को मनाया आखिर क्यों जाता है जाए सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों के व्यवहार से बहुत निराश हैं देशवासी!पुलिस तो बदनाम है ही किन्तु हर विभाग बिक रहा है !किसी कवि ने कितना आहत होकर लिखा होगा कि 

 "हर चेहरे पर दाम लिखे हैं हर कुर्सी उपजाऊ है" 

        अर्थात पैसे लिए बिना लोग काम ही नहीं करना चाह रहे हैं एक साधारण सा पोस्टमैन त्यौहार माँगता है अर्थात देना हो तो दो अन्यथा कल तुम्हारी चेकबुक जैसे जरूरी कागजात दरवाजे पर  पड़े मिलेंगे !

     प्रिंटेड बुक्स के बंडलों को बुक करने के लिए पोस्ट आफिस जाओ तो प्रति बण्डल के हिसाब से पैसे दो तो ठीक और न दो तो तलाशी करने के नाम पर फाड़ दिए जाते हैं बण्डल !

       निगम कार्यालय,पुलिस विभाग और अदालती काम काज,बैंकों में लोन लेने के लिए जाओ तो ये लोग चलते ही पैसे के बल पर हैं।बैंकों में काउंटरों पर कितनी  भी लम्बी लाइन लगी हो भले ही लाइन और बढ़ती जा रही हो किन्तु काउंटर वाले बाबू जी जब तक मन आएगा तब तक मोबाईल पर बात करते रहेंगे काम तो बाद में कर ही लेंगे!ट्रेन टिकट लेने जाओ टिकट बाबू की यही स्थिति है सरकारी स्कूलों अस्पतालों का तो भगवान् ही मालिक है !ये लोग जनता के प्रति कतई जवाबदेय नहीं होते क्योंकि जनता इनको सैलरी नहीं देती है जो सैलरी नहीं देता है वो काम किस हक़ से करने को कह सकता है जो सैलरी देता है उसे काम देखने का समय कहाँ है!बिडम्बना यही है इसलिए यदि काम कराना है तो उसके बदले में पैसे तो देने ही पड़ेंगे ! जनता ने ऐसा मान भी लिया है इसलिए वो देती भी बड़े शौक से है इसे कोई भ्रष्टाचार कहे तो कहे !चुनावों के दो चार महीने पहले से अपनी ईमानदारी दिखाने के लिए कोई सरकार घूस  लेने वालों पर कार्यवाही के नाम पर दो चार सौ लोगों को पकड़ कर उन पर कार्यवाही कर भी दे तो इससे क्या भ्रष्टाचार ख़तम हो रहा है जहाँ कुँए में ही भाँग पड़ी हो वहाँ क्या मायने रखते हैं दो चार सौ लोग !

       सैलरी के नाम पर सरकार अपने कर्मचारियों को इतना अधिक धन देती है न केवल इतना अपितु समय समय पर सैलरी भी बढ़ाती रहती है महँगाई भत्ता आदि बहुत कुछ देती ही रहती है फिर भी कईबार वो लोग मूड और मुद्दे बना बनाकर मनोरंजन के लिए अनशन धरना प्रदर्शन आदि किया करते हैं और सरकारें उनकी माँगे माना करती है !भाई बड़े दुलारे होते हैं सरकार को अपने कर्मचारी !ये लोग अपने आफिस में एक बार घूम आए तो उस दिन की हाजिरी लग जाती है कम से कम दो हजार रूपए के आदमी हो जाते हैं और अगर अपने सीनियर को किसी तरह खुश करके चल लेते हुए हों तो जाना भी नहीं पड़ता है दस पाँच  दिन की छुट्टी तो जेब में होती है!सरकारी प्राथमिक स्कूलों में तो पूरी तरह से ही रामराज्य है जब चाहें तब जा सकते हैं !

   दूसरी ओर किसान और मजदूर वर्ग के साथ साथ शिक्षित या अशिक्षित सभी  आम आदमियों की आजीविका के लिए सरकार की योजना है कि भोजन मिलेगा और साल में सौ दिन का काम मिलेगा इस प्रकार से उसे ढाई हजार रूपए महीने में देने की व्यवस्था है !

     मेरा प्रश्न केवल इतना है कि इसी देश के रहने वाले दो लोग समान रूप से शिक्षित हुए किन्तु एक की नौकरी लग गई उसकी तो सरकार को पूरी चिंता है उसे कम से कम पचास साठ  हजार रुपए तो मिलेंगे ही और पेंसन आदि सारी सुविधाएँ भी मिलेंगी आदि आदि ! ये तो नौकरी लगने के कारण मिलेंगी बाक़ी यदि काम करेंगे तो ऊपरी आमदनी भी होगी और यदि काम नहीं भी करेंगे तो भी फिलहाल सैलरी और पेंसन तो मिलेगी ही । 

      उसी के समान शिक्षित दूसरा व्यक्ति जिसे नौकरी नहीं मिली है सरकार की निगाह में उसकी औकाद ढाई हजार रूपए महीने की है! उसे ढाई हजार बस जिम्मेदारी उस पर भी उतनी ही है आवश्यकताएँ इच्छाएँ उसकी भी वैसी ही हैं संघर्ष उसने भी उतना ही किया है शिक्षा भी उतनी ही ली है ऐसी परिस्थिति में सरकार ये कैसे सोचती है कि दो समान शिक्षित लोगों में एक को गुजारे के लिए पचास हजार रूपए चाहिए तो दूसरा अपना गुजारा ढाई हजार रूपए महीने में कर लेगा !

     जब सरकारी कर्मचारियों का गुजारा साठ हजार में नहीं हो पाता और वो आंदोलन करने को निकल पड़ते हैं तो आम आदमी ढाई हजार में कैसे कर लेगा !भूख तो सबको बराबर लगती है बीमारी आरामी सुख दुःख सबके लगभग समान ही होते हैं !भले ही स्वाद,शौक और शान में नियंत्रण किया जा सकता है फिर भी कहाँ साठ हजार और कहाँ ढाई हजार !इतना अंतर एक देश के दो समान नागरिकों में अगर है तो यह न केवल गम्भीर चिंता का विषय है अपितु असहिष्णु लोगों में अपराध की भावना को जन्म देने वाला होता है!

      यह बात कोई एक आदमी नहीं कह रहा है अपितु पूरा देश न केवल कह रहा है अपितु  समझ भी रहा है इतना ही  नहीं सरकारी  कर्मचारियों से सारा देश निराश है और तो क्या कहें आज सरकारी कर्म चारियों का भरोसा सरकारी कर्मचारी  नहीं कर रहे हैं सरकारी डाक्टर; मास्टर, पोस्ट मास्टर और टेलीफोन विभाग के लोग भी अपना इलाज प्राइवेट अस्पतालों कराते हैं बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं मोबाईल प्राइवेट कंपनी का रखते है और अपना लेटर प्राइवेट कोरिअर को देते हैं इस प्रकार से सरकारी लोग ही जब सरकारी विभागों पर भरोसा नहीं करते हैं तो आम जनता कैसे करे विश्वास ?मजे की बात तो यह है कि प्राइवेट  विभागों में वही काम सरकारी विभागों की अपेक्षा बहुत कम खर्च में हो जाता है  इसीलिए तो प्राइवेट स्कूलों ने सरकारी स्कूलों को पीट रखा है प्राइवेट अस्पतालों नें सरकारी अस्पतालों को पीट रखा है प्राइवेट कोरिअर ने पोस्ट आफिसों को  पीट रखा है प्राइवेट फोन व्यवस्था नें सरकारी फोन विभाग को पीट रखा है !कहने को भले ही सरकारी विभागों को प्राइवेट विभाग पीट रहे हों किन्तु उन्हीं पीटने वालों ने ही उन उन विभागों की इज्जत भी बचा रखी है चूँकि सरकारी पुलिस विभाग को पीटने के लिए कोई प्राइवेट विभाग बनने की व्यवस्था ही नहीं है इसलिए उसे न कोई पीटने वाला है और न ही उसकी कोई इज्जत ही बचाने वाला है सम्भवतः इसीलिए हर कोई पुलिस विभाग पर ही अंगुली उठता रहता है न जाने लोग उसे इतना कमजोर विभाग क्यों समझते है  ?

      सरकार एवं कुछ सरकारी लोग जनता के लिए बड़ी समस्या बनते जा र हे हैंकाम चोर घूसखोर सरकारी मशीनरी की सैलरी का बोझ  अब देश की गरीब जनता पर नहीं पड़ने देने का संकल्प लेना होगा ।यह सबसे बड़ा पुण्य एवं पवित्र कार्य  होगा !

    ऐसी बातों से कम से कम सबको पता तो लग जाता है कि आम आदमी के विषय में इन की सोच क्या है! सच्चाई ये है कि ईमानदारी का अभाव एवं भ्रष्टाचार की अधिकता तथा जनता के प्रति संवेदन हीनता ने ऐसी सरकारों तथा ऐसे सरकारी कर्मचारियों को न केवल अविश्वसनीय बना दिया है अपितु ये देश के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं आखिर टैक्स रूप में दिए गए धन से जनता ऐसे लोगों का एवं उनके बीबी बच्चों का भार क्यों उठावे!जब कुछ कर पाना तो इनके बश का है ही नहीं किन्तु क्या इनकी बातों में भी संवेदन शीलता नहीं होनी चाहिए?

    सरकारी लोग जनता के दस लाख रूपए खर्च करके भी उतना काम नहीं कर पाते हैं जितना क्या और उससे  अच्छा एवं अधिक काम प्राइवेट लोग एक लाख रूपए में करके दिखा देते हैं। इसी प्रकार सरकारी स्कूल लाखों रूपए खर्च करके भी उतना अच्छा प्रतिफल नहीं दे पाता है प्राइवेट स्कूल जितना उनसे बहुत कम धन खर्च करके दे देता है!यही स्थिति सरकारी अस्पतालों की है ऐसी घातक काम चोरी एवं घूस खोरी होने के बाद सरकार को चाहिए कि देश एवं समाज पर बोझ बन चुके ऐसे लोगों की छुट्टी कर दे आखिर जनता अपनी गाढ़ी कमाई पर कहाँ तक ढोवे ऐसे कामचोर घूसखोर संवेदना विहीन लोगों को ?आज सरकारी स्कूलों में शिक्षक हैं कि नहीं पता ही नहीं लगता है आश्चर्य है !!! किन्तु सरकार ऐसे कर्मचारियों से भी खुश होकर  इनकी सैलरी बढ़ाया करती है क्योंकि ऐसी काली कमाई का हिस्सा ये सरकार तक पहुँचाते जो हैं। क्या अंधेर है! ये सब देखकर तो लगता है कि सरकार और सरकारी सारी मशीनरी  अपना दुश्मन केवल आम जनता को ही समझती है ।

      इस सरकार एवं सरकारी मशीनरी को ठीक करने की सारी  उम्मींद केजरीवाल जैसों से ही नहीं लगाना चाहिए हम सबको सभी पार्टियों एवं मीडिया तथा ईमानदार सरकारी कर्मचारियों की मदद से काम चोर घूसखोर सरकारी मशीनरी की सैलरी का बोझ अब देश की गरीब जनता पर नहीं पड़ने देने का संकल्प लेना चाहिए। यह सबसे बड़ा पुण्य एवं पवित्र कार्य इस समय के लिए होगा !इससे उन लोगों को भी एक सन्देश मिलेगा जो केवल बैठे की तनख्वाह लेने के  लिए सरकारी नौकरियाँ  ढूँढ़ते हैं उनकी भी भीड़ छँटेगी !ऐसे तो समाज में गलत सन्देश जा रहा है कि सरकार से लोन लेकर सरकारी कर्मचारियों को घूस   दे कर नौकरी पा लो फिर जीवन भर मजा करो कोई पूछने वाला ही नहीं होता है। 

  ऐसे तो धीरे धीरे केजरीवाल जैसे लोगों को गलत फहमी हो रही है कि जनता उन पर एवं आम आदमी पार्टी पर प्रभावित है किन्तु समाज उनसे प्रभावित किस बात से होगा उन्होंने अभी तक ऐसा कुछ किया ही नहीं है बोल अच्छा अच्छा रहे हैं जनता उनकी लोक लुभावनी बातें  सुनकर एक गेम उन पर भी लगा रही है जनता ने ऐसा ही भरोसा वी.पी.सिंह एवं भाजपा पर भी किया था किन्तु उसे वहाँ निराश होना पड़ा अब देखना ये है कि केजरी वाल जी जो बोल रहे हैं उसमें अमल कितना कर पाते हैं आशा है कि वो जनता को निराश नहीं करेंगे कम से कम भ्रष्टाचार को समाप्त करने का प्रयास तो करेंगे ही केवल इतना ही नहीं अपितु दिखाई भी पड़ेगा कि वो भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए कुछ कर भी रहे हैं।   

      अब समय आ गया है जब बहुत सारे सरकारी कर्मचारी लोग अपने लापरवाही पूर्ण आचरण से  धीरे धीरे अपनी उपयोगिता स्वयं समाप्त करते चले जा रहे हैं| आज सरकारी आफिसों  संस्थाओं में काम काज  का स्तर इतना गिर चुका है कि समाज इन पर क्रोधित तो नहीं है  इनसे निराश जरूर  है और हो भी क्यों न !
     एक ओर तो गरीब भारत है जिसे दिनरात परिश्रम करने पर भी भरपेट खाना नहीं मिल पा रहा है तो दूसरा वह वर्ग है जो परिश्रम पूर्वक अपना जीवन संचालित कर रहा है तीसरा वर्ग सरकारी कर्मचारियों का है जो जिस काम के लिए नियुक्त किया गया है वह काम या तो करता नहीं है या भारी मन से अर्थात क्रोधित होकर करता है या फिर आधा अधूरा करता है या फिर घूस लेकर करता है| इन सबके बाबजूद भी उनका बेतन आम देशवासियों  के जीवन स्तर एवं देश की वर्तमान परिस्थितियों  के अनुशार  बहुत अधिक होता है उस पर भी सरकार अकारण ही उनकी सैलरी और बढ़ाए जा रही है|हर समय  पैसे पैसे का रोना रोने वाली सरकारों के पास  सरकारी कर्मचारियों का बेतन बढ़ाते समय न जाने पैसा कहाँ से आ जाता है या सरकार का अपना भी कोई कमजोर बिंदु है जिसकी पोल सरकारी कर्मचारियों के पास दबी होती है जो कहीं खुल न जाए इस भय से उनकी सैलरी बढ़ाना कहीं सरकार की मज़बूरी तो नहीं है!
       यही अंधी आमदनी देखकर  सरकारी नौकरियाँ   पाने के लिए चारों तरफ मारामारी मची रहती है कोई आरक्षण माँग  रहा है कोई घूस देकर घुसना चाह रहा है क्योंकि एक बात सबको पता है कि बिना तनाव एवं बिना परिश्रम के भी यहाँ  जीवन आराम से काटा जा सकता है|
    कुछ विभागों के  सरकारी कर्मचारियों में कितनी काम चोरी घूस खोरी लूट मार आदि  मची हुई है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो काम जितने अच्छे ढंग से  संतोष पूर्वक प्राइवेट संस्थाएं पाँच दस हजार रूपए मासिक पारिश्रमिक देकर करवा ले रही हैं वो काम उससे दस दस गुना अधिक बेतन देकर भी  उतने अच्छे ढंग से तो छोडिए बुरे ढंग से भी सही  सरकार अपने कर्मचारियों से नहीं करवा पा रही है आखिर क्यों ? फिर भी सरकार  पता नहीं इनके  किस आचरण से खुश होकर  इनकी सैलरी समय समय पर बढाया  करती है| प्राइवेट संस्थाएं  जिन कर्मचारियों  को  बिना बेतन के भी नहीं ढो सकती हैं  उन्हें अकारण ढोते रहने  में सरकार कि न जाने क्या मज़बूरी है!
      केवल यही न कि प्राइवेट संस्थाएँ कमा कर अपने पैसे से सैलरी बाँटती हैं इसलिए उन्हें पैसे की बर्बादी होने से कष्ट होता है  जबकि सरकार को कमा कमाया बिना किसी परिश्रम के जनता का पैसा टैक्स रूप में मिलता है यही कारण  है कि पराई कमाई अर्थात जनता के धन से किसी को क्यों लगाव हो ?बर्बाद हो तो होने दो !
      इस प्रकार सरकारी कर्मचारियों की इन्हीं गैर जिम्मेदार प्रवृत्तियों  ने  सरकारी संस्थाओं को उपहास का पात्र बना दिया है! क्या भारतीय लोकतंत्र को बचाए रखने की सारी जिम्मेदारी केवल आम जनता एवं गरीब वर्ग की ही है बाकी लोग ऐश करें! सरकारी कार्यक्रमों में होने वाला खर्च  देखिए,नेताओं एवं  सरकारी कर्मचारियों का खर्च देखिए बहाया जा रहा होता है पैसा? इनके भाषणों के लिए करोड़ों  के मंच तैयार किए जाते हैं आम आदमी अपनी कन्या के विवाह के लिए बेचैन घूम रहा होता है उसके पास कन्या के हाथ पीले करने के लिए धन नहीं होता है क्या करे बेचारा गरीब आम आदमी! कुछ उदाहरण आपके सामने भी रखता हूँ आप भी सोचिए कि लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर आखिर यह अंधेर कब  तक चलेगी!    

     कई बार तब बहुत आश्चर्य होता है जब ये पता लगता है कि जो कानून पालन करने के लिए बने थे वो पालन करने के बजाए केवल बनाए और बेचे जा रहे हैं तो बड़ा कष्ट होता है!

     एक बार किसी ने गुंडई के स्वभाव से हमारे निजी लोगों को मारा उनके शिर में काफी चोट लगी थी मैं उन्हें लेकर थाने गया उनका खून बहता रहा किंतु दूसरा पक्ष तीन घंटे बाद थाने में आया तब तक उन्हें इलाज भी नहीं उपलब्ध कराया गया जब वो किसी नेता को लेकर आए तो दरोगा जी ने उनसे हाथ मिलाया बात की इसके बाद हमें बुलाकर समझौते का दबाव डाला जब हम नहीं माने तो दरोगा जी ने हमारे सामने तीन आप्सन रखे कि यदि मैं उन्हें थाने में बंद कराना चाहता हूँ तो हमें कितने पैसे देने पड़ेंगे,यदि मैं किसी उचित धारा में बंद कराना चाहता हूँ तो क्या देना पडे़गा,अन्यथा दोनों पक्षों को बंद कर देंगे। हमने कहा मैं पैसे तो नहीं दूँगा जो उचित हो सो कीजिए हमें कानून पर भरोसा है तो उन्होंने कहा कानून क्या करेगा और क्या कर लेगा जज?देखना उसे भी हमारी आँखों से ही  है वो लोग तो कहने के अधिकारी होते हैं बाकी होते तो सब हमारी कलम के गुलाम ही हैं जैसा  हम लिखकर भेजेंगे वैसा ही केस चलेगा और हम वही लिखकर भेजेंगे जैसे हमें पैसे मिलेंगे! उसी के अनुशार केस चलेगा जज तुम्हारे शिर का घाव थोड़ा देखने आएगा!और देखे भी तो क्या कर लेगा जब हम लिखेंगे ही नहीं!वैसे भी घाव कब तक सॅभाल कर रख लोगे? हमारे यहॉं जितने दिन मुकदमें चलते हैं उतने में समुद्र सूख जाते हैं घाव क्या चीज है!
    इसी प्रकार दूसरे पक्ष से भी क्या कुछ बात की गई पता नहीं अंत में दोनों पक्षों को थाने में बंद कर दिया गया।एक कोठरी में ही बंद होने के कारण दोनों पक्षों की आपस में बात चीत होने लगी तो पता लगा कि दरोगा ने उन्हें भी इसी प्रकार धमकाया था कि इसमें कौन कौन सी दफाएँ  लग सकती हैं जिन्हें हटाने के लिए कितना कितना देना पड़ेगा!उन्होंने भी देने को मना कर दिया तो दोनों पक्ष बंद कर दिए गए!

    इसी प्रकार दिल्ली जैसी राजधानी में कागज, हेलमेट आदि की जॉंच के नाम पर किससे कितने पैसे लेकर छोड़ना है रेट खुले होते हैं!रोड के किनारे सब्जी बेचते रेड़ी वाले से पैसे लेकर बीट वाला उसे वहॉं खड़ा होने देता है।पार्कों में अश्लील हरकतें करने वाले जोड़ों को  भी पैसे के बल पर कुछ भी करने की छूट मिल जाती है। किसी भी खाली जगह पर खड़ी गाड़ी के बीट वाला कब पैसे मॉंगने लगेगा उसका मन!कानून के रखवाले इमान धरम के साथ साथ सब कुछ बेच रहे हैं खरीदने वाला चाहिए!देश  की राजधानी का जब यह हाल है तो देश  के अन्य शहरों के लोग क्या कुछ नहीं सह रहे होंगे!ये धोखा धड़ी क्या अपनों के साथ ! आश्चर्य है !!!

    पचासों हजार सैलरी पाने वाले डाक्टर मास्टर  पोस्ट मास्टर फोन मोबाइल आदि सभी सरकारी विभागों को अपने अपने क्षेत्र के प्राइवेट विभागों से पिटते देख रहा हूँ फिर भी बेशर्मी का आलम यह है कि काम हो या न हो सरकारी कर्मचारियों की सैलरी समय से बढ़ा दी जाती है।इसका कारण कहीं यह तो नहीं है कि भ्रष्टाचार के द्वारा कमाकर सरकारी कर्मचारियों ने जो कुछ सरकार को दिया होता है उसका कुछ अंश  सैलरी बढ़ाकर न दिया जाए तो पोल खुलने का भय होता है!
    ऐसे सभी प्रकार के अपराधों एवं अपराधियों के लिए सभी पार्टियों की सरकारें जिम्मेदार हैं जो दल जितने ज्यादा दिन सत्ता में रहा है वह उतना ही अधिक जिम्मेदार है जो दल सबसे अधिक सरकार में रहा उसने सभी प्रकार के अपराधों को सबसे अधिक पल्लवित किया है उसका कारण सरकारी निकम्मापन एवं अनुभवहीनता से लेकर आर्थिक भ्रष्टाचार आदि कुछ भी हो सकता है।
   अपराधियों का बोलबाला राजनीति में भी है हर अपराधी की सॉंठ गॉंठ लगभग हर दल में होती है क्योंकि वे इस सच्चाई को भली भॉंति जानते हैं कि अपराध करके बचना है तो अपना आका राजनीति में जरूर बनाकर रखना होगा या राजनीति में सीधे कूदना होगा और वो ऐसा कर भी रहे हैं, इसमें सभी दल उनकी मदद भी कर रहे हैं!यही कारण है कि  आजकल सामान्य अपराधियों के साथ साथ अपराधी बाबा लोग भी अपनी संपत्ति की सुरक्षा आदि को लेकर घबड़ाए हुए हैं, उनके द्वारा किए जा रहे बलात्कार आदि गलत कार्यों में कहीं उनकी पोल न खुल जाए कहीं कानून का शिकंजा उन पर  न कसने लगे इसलिए जिताऊ कंडीडेट के समर्थन में चीखते चिल्लाते घूमने लगते हैं दिखाते हैं कि जैसे सबसे बड़े देश भक्त एवं उस नेता के प्रति समर्पित वही हैं।

    बलात्कार और भ्रष्टाचार  रोकने के लिए अभी तक कितने भी कठोर कानून बनाए गए हों किन्तु उनका भय आम अपराधियों में बिलकुल नहीं रहा क्योंकि वे किसी नेता या प्रभावी बाबा से जुड़े होते थे जिनसे उन्हें अभय दान मिला करता था किन्तु अब जबसे बड़े बड़े बाबा और बड़े बड़े नेता लोग भी जेल भेजे जाने लगे तब से अपराधियों में हडकंप मच हुआ है कि अब क्या होगा! मेरा अनुमान है कि भ्रष्ट नेताओं एवं भ्रष्ट बाबाओं की दूसरी किश्त जैसे ही जेल पहुंचेगी तैसे ही अपराध का ग्राफ बहुत तेजी से घटेगा और फिर एक बार जनता में सरकार एवं प्रशासन के प्रति विश्वास जागना शुरू हो जाएगा! 

     सरकारी प्राथमिक  स्कूलों को ही लें उनकी पचासों हजार सैलरी होती है किंतु वहाँ के सरकार दुलारे शिक्षक या तो स्कूल नहीं जाते हैं यदि गए  भी तो जब मन आया  या घर बालों की याद सताई तो  बच्चों की तरह स्कूल से भाग आते हैं पढ़ने पढ़ाने की चर्चा वहाँ  कहाँ और कौन  करता है और कोई करे भी तो क्यों? इनकी इसी लापरवाही से बच्चों के भोजन में  गंदगी  की ख़बरें तो हमेंशा से मिलती रहीं किन्तु इस बीच तो जहर तक  भोजन में निकला बच्चों की मौतें तक हुई हैं किंतु बच्चे तो आम जनता के थे कर्मचारी  अपने हैं इसलिए थोड़ा बहुतशोर शराबा मचाकर ये प्रकरण ही बंद कर दिया जाएगा ! आगे आ रही है दिवाली पर फिर बढ़ेगी सैलरी महँगाई भत्ता आदि आदि!

    अपने शिक्षकों को दो  चार दस हजार की  सैलरी देने वाले प्राइवेट स्कूल अपने बच्चों को शिक्षकों से अच्छे ढंग से पढ़वा  लेते हैं और लोग भी बहुत सारा धन देकर वहाँ अपने बच्चों का एडमीशन करवाने के लिए ललचा रहे होते हैं किंतु वही लोग फ्री में पढ़ाने वाले सरकारी स्कूलों को घृणा की नजर से देख रहे होते हैं! यदि सोच कर  देखा जाए तो लगता  है कि यदि प्राइवेट स्कूल न होते तो क्या होता? सरकारी शिक्षकों,स्कूलों के भरोसे कैसा होता देश की शिक्षा का हाल?

    सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों  के एक बड़े वर्ग ने जिस प्रकार से जनता के विश्वास को तोड़ा है वह किसी से छिपा  नहीं है आज लोग सरकारी अस्पतालों पर नहीं प्राइवेट नर्शिंग होमों पर भरोसा करते हैं,सरकारी डाक पर नहीं कोरियर पर भरोसा करते हैं,सरकारी फ़ोनों की जगह प्राइवेट कंपनियों ने विश्वास जमाया है! सरकार के हर विभाग का यही  बुरा हाल है! जनता का विश्वास  सरकारी कर्मचारी किसी क्षेत्र में नहीं जीत पा रहे हैं सच्चाई यह है कि सरकारी कर्मचारी जनता की परवाह किए बिना फैसले लेते हैं वो जनता का विश्वास जीतने की जरूरत ही नहीं समझते इसके दुष्परिणाम पुलिस के क्षेत्र में साफ दिखाई पड़ते हैं चूँकि पुलिस विभाग में प्राइवेट का विकल्प नहीं है इसलिए वहाँ उन्हीं से काम चलाना है चूँकि वहाँ काम प्रापर ढंग से चल नहीं पा रहा है जनता हर सरकारी विभाग की तरह ही पुलिस विभाग से भी असंतुष्ट है इसीलिए पुलिस और जनता के  बीच हिंसक झड़पें तक होने लगी हैं जो अत्यंत गंभीर चिंता का विषय है उससे  भी ज्यादा चिंता  का विषय यह है कि कोई अपराधी तो किसी वारदात के बाद भाग जाता है किन्तु वहाँ पहुँची पुलिस के साथ जनता अपराधियों जैसा वर्ताव करती है उसे यह विश्वास ही नहीं होता है कि पुलिस वाले हमारी सुरक्षा के लिए आए हैं !!! 

     इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए ही मैं सरकार एवं सरकारी कर्मचारियों  के सामने एक प्रश्न छोड़ता हूँ कि जनता का विश्वास जीतने की जिम्मेदारी  आपकी आखिर  क्यों नहीं है?

     मेरा मानना है कि यदि पुलिस विभाग की तरह ही  अन्य क्षेत्रों में भी प्राइवेट का विकल्प न होता तो वहाँ भी हो रही होतीं हिंसक झड़पें!

       

Tuesday, February 4, 2014

खिलाड़ियों का सम्मान तो ठीक है किन्तु कोई भगवान कैसे हो सकता है ?

       भगवान किसे कहते हैं क्या कभी जाना समझा है हम लोगों ने! इस विषय में क्या कहते हैं  हमारे  शास्त्र ?

      देश वासियों की सुरक्षा के लिए शिर कटाने वाले सैनिक यदि हमारे भगवान् नहीं हो सकते तो कोई खिलाड़ी भगवान् कैसे हो सकता !सम्मानीय हो जाए ये बात और है । 

        कुछ मीडिया के महापुरुषों  ने एक बाबा जी से जब तक विज्ञापन मिलते रहे तब तक उन्हें बे मतलब में सर्व शक्तिमान मलमल बाबा की तरह उनसे  उनकी  शक्तियों की कृपा लोगों पर लुटवाते रहे उन्हें अपने मन से धर्म गुरु और जाने क्या क्या बताते रहे और भी जितना चढ़ा सकते थे उतना चढ़ाया किन्तु जब वो अपने पत्र पत्रिकाएँ टी. वी.चैनल आदि खुद चलाने लगे तो इसी मीडिया ने न केवल उनके लिए अपितु समस्त धर्म एवं धर्माचार्यों के लिए क्या कुछ नहीं कहा !महीनों तक अपने अपने चैनलों पर बैठकर पानी पी पी कर खूब कोसते रहे बाक़ी सच्चाई तो ईश्वर ही जाने !मेरा उद्देश्य किसी का पक्ष लेना नहीं है ,किन्तु विज्ञापन का ये ढंग ठीक नहीं है गम्भीरता तो रखनी ही चाहिए । 

        हमारे कहने का अभिप्राय मात्र इतना है कि वह मीडिया यदि किसी मनुष्य को भगवान जैसे शब्दों से सम्बोधित करने भी लगे तो गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि अब मीडिया भी निष्पक्ष नहीं रहा है !

   जहाँ तक किसी को भगवान् कहने की बात है ये धर्म का विषय है इसे धर्माचार्यों पर छोड़ा जाना चाहिए साथ ही हमें एक बात और  ठीक तरह  से समझ लेनी चाहिए कि खेल या किसी कला में कोई कितना भी निपुण क्यों न हो जाए किन्तु उसे भगवान् नहीं कहा जा सकता ! भगवान् न तो कोई बन सकता है और न ही बनाया जा सकता है ये बनने बनाने का खेल ही नहीं है वह परं प्रभु तो ("चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्" "स्वे महीम्नि महीयते" आदि आदि )अपनी महिमा में महिमान्वित् एवं स्वयं सिद्ध स्वामी हैं उनकी तुलना किसी मनुष्य से करनी ही क्यों ?             

      ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ।

    ज्ञानवैराग्ययोश्चैव  षण्णां   भग   इतीरणा ॥

    समग्र ऐश्वर्य, शौर्य, यश, श्री, ज्ञान, और वैराग्य आदि । ये जिनमें एक साथ हों वो भगवान होता है यथा -
 1. समग्र ऐश्वर्य- शक्ति संपन्न ,योग्य ,समर्थ,धनाढ्य, स्वामी आदि अर्थ होते हैं। 

2.शौर्य-बहादुर, वीर, पराक्रमी आदि ।    

3.यश-प्रसिद्धि ,ख्याति,कीर्ति, विश्रुति आदि । 

4.श्री-असीम धन,समृद्धि,सौभाग्य ,गौरव ,महिमा ,प्रतिष्ठा ,सुंदरता श्रेष्ठता समझ अति मानवीय शक्ति सम्पन्नता आदि । 

5.ज्ञान-विद्या प्रवीणता ,समझ,परिचय,चेतना आदि। 

6.वैराग्य-सभी प्रकार के सांसारिक सुख की इच्छाओं का अभाव। 

      ये छहो  गुण एक साथ जिसमें होते हैं वो भगवान् होता है ! जो ईश्वर के बिना किसी और में सम्भव ही नहीं हैं फिर बात बात में जिस पर जिसकी आस्था श्रद्धा विश्वास हो जाए  वह उसका आस्था पुरुष हो सकता है किन्तु भगवान् नहीं !

     सभी सनातन धर्मावलम्बियों से प्रार्थना है कि अपने भगवान् और सभी देवी- देवताओं, वेदों ,शास्त्रों, पुराणों ,तथा समस्त पवित्र ग्रंथों ,तीर्थों, नदियों  ऋषियों ,विद्वानों ,वीरों समेत सभी सदाचारी स्त्री पुरुषों का गौरव घटने नहीं देना चाहिए क्योंकि इनका गौरव बचने से समाज और देश बच पाएगा अपने धार्मिक प्रतीकों ,शब्दों कथानकों का प्रयोग हर किसी को हर जगह प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए । ऐसे तो कोई क्रिकेट का भगवान् होगा तो कोई कुस्ती का तो कोई किसी और कला का भगवान हो जाएगा !आखिर हमारी आत्माओं, हृदयों, प्राणों को आनंदित कर देनेवाले ईश्वर की तुलना किसी मनुष्य से कैसे की जा सकती है ?

    वैसे भी सरकारें पुरस्कारों की स्वामिनी होती हैं वो इनका प्रयोग अपनी अपनी सुविधानुसार किया करती हैं अगर ईमानदारी,गुणगौरव,लोकप्रियता के आधार पर ये सम्मान दिए जाते होते तो अटल जी जैसे महापुरुष को क्यों नहीं दिए जा सकते थे? जिनके प्रशंसक हर दल ,वर्ग,समुदाय ,संप्रदाय ,क्षेत्रों में हैं जिनकी स्वच्छ छवि स्वदेश ही नहीं अपितु विदेशों तक विस्तारित है।यह समझ से बाहर की बात है कि सरकार आदरणीय अटल जी को इस सम्मान के योग्य क्यों नहीं मानती है?इस विषय पर यदि पूरे देश की राय शुमारी करा ली जाए तो पता चल जाएगा कि सरकार कितने गहरे पानी में है !   

  अब मैं खेल प्रिय समाज से क्षमा माँगते हुए खिलाड़ियों और देश के लिए समर्पित सैनिकों की तुलना करना चाहता हूँ ! देश के लोगों  का जो समर्पण खेल ,खेलों और खिलाडियों के एवं फ़िल्म से जुड़े लोगों के प्रति होता है काश! कम से कम उतना ही समर्पण राष्ट्र के प्रति समर्पित वीर सैनिकों के प्रति  भी होता तो क्यों झेलना पड़ता देश को आतंक वाद का कठिन दंश !

       विदेशों से जब खिलाड़ी खेलों में जीत कर आए होते हैं तो प्रधान मंत्री जी,मुख्यमंत्री जी फिल्मोद्योग से जुड़े लोग एवं बड़े बड़े उद्योग पति सब लोग कुछ न कुछ देने घोषणा कर रहे होते हैं !

        किन्तु राष्ट्र की सीमाओं की सुरक्षा में शहीद हुए वीर सैनिकों  के लिए यह जोश क्यों नहीं दिखाई पड़ता है ?जब उन सैनिकों के दुध मुए बच्चों के दूध की व्यवस्था एवं भविष्य सुधारने की व्यवस्था करने के लिए सरकारी आफिसों के चक्कर काटती फिरती हैं सैनिकों की विधवाएँ!  उन्हें  देखकर इन जोशीले नेताओं एवं धनियों की आत्माएँ इनको क्यों नहीं धिक्कारती हैं इनकी कुंद  जबान से क्यों नहीं निकलता कि  देवी ! तुम घर बैठो तुम्हारे बच्चों समेत तुम्हारे परिवार की चिंता हम उद्योग पतियों और सरकारों पर छोड़ दो !

       उनमें से जिन सैनिकों के परिजनों के लिए पेट्रोल पम्प देने की घोषणा सरकारों के द्वारा की भी जाती है उन्हें वे मिलते भी हैं कि नहीं है कोई देखने या पूछने वाला? उनकी विधवाओं को कागजों फाइलों अफ्सरों के नाम पर कितने चक्कर कटवाए जाते हैं वे छोटे छोटे बच्चे लेकर भटका करती हैं एक आफिस से दूसरी आफिस दूसरी से तीसरी आदि आदि !कितनी  निर्दयता का व्यवहार होता है उनके साथ ?

        जब किसी खिलाड़ी  भगवान की खेल जगत से बड़े धूम धाम पूर्वक विदाई देखता हूँ जिसमें बड़ी बड़ी स्वर कोकिलाओं के द्वारा प्रशंसा की गई होती है फ़िल्म इंडस्ट्री के बड़े बड़े महापुरुष वहाँ  पहुँच जाते हैं बड़े  बड़े तथाकथित युवराज ,मुख्य मंत्रियों समेत राजनैतिक जगत के बड़े  बड़े भाग्य विधाता पहुँचकर उस अवसर पर शोभा बढ़ा रहे होते हैं  बहुत अच्छा लगता है यह सब देखकर !

        दूसरी ओर  राष्ट्र की सीमाओं की सुरक्षा में लगे देश के महान  वीर सपूतों के शिर काट लिए जाते हैं बिना शिरों के शव पहुँचते हैं परिजनों के पास उस दुःख की घड़ी  में कोई नहीं पहुँचता है उन  प्रणम्य शहीद  वीर सैनिकों  के परिजनों को ढाढस बँधाने !यदि आत्मा का विज्ञान सच है तो यह सब देखकर उन शहीद सैनिकों की आत्माओं को कितना बड़ा आघात लगता होगा ?

      क्या तुलना नहीं की जानी  चाहिए एक खिलाडी की खेल जगत से की गई धूम धाम से विदाई, दूसरी ओर  राष्ट्र की सीमाओं की सुरक्षा में लगे देश के महान  वीर सपूतों की इस संसार से विदाई में बेरुखाई ही बेरुखाई!क्या किसी को नहीं लगना  चाहिए कि सैनिकों के परिजनों को न कुछ और तो सांत्वना ही दे आएँ !

        याद रखिए कि खेल कूद और नाच गाना आदि सारा मनोरंजन तभी तक अच्छा लगता है जब तक असंख्य सैनिक देश की  सीमाओं की सुरक्षा के लिए सीना लगाए  खड़े हैं ,उन्हें भी बूढ़े माता पिता ,जवान पत्नी एवं छोटे छोटे बच्चों की याद आती होगी! प्रिय परिजन,  पुरबासी, खेत -खलिहान  समेत सभी स्मृतियाँ उन्हें भी सोने नहीं देती होंगी किन्तु राष्ट्र रक्षा की प्रबल भावना ने उन्हें बाँध रखा होता है देश की सीमा पर और यों ही बीत जाते हैं उनके सारे तिथि त्यौहार,सारे गाँव , घर खानदान के उत्सव !

      अपने प्रिय देश वासियों से मेरी प्रार्थना यही है कि सैनिकों के महान त्याग और बलिदान का सम्मान भी देश में कम से कम उतना तो हो ही जितना किसी और का होता है !!!

           (इस कारगिल विजय नामक काव्यात्मक पुस्तक की प्राप्ति के लिए हमारा वर्तमान पता है-)
                   (  K -71, Chhachhi  Building Chauk, Krishna  Nagar  Delhi  -51. Mo.9811226973)

                 

पांचजन्य में प्रकाशित अंश 






 

   

      

Sunday, February 2, 2014

                                      जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद जी महाराज

      ये सच है कि जगद् गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद जी महाराज जी के अच्छे सम्बन्ध पहले से भी काँग्रेस पार्टी के साथ सुने जाते रहे हैं किन्तु उतना ही सच यह भी है वे हमारे हिन्दू धर्म के शास्त्रीय विधि से प्रमाणित शंकराचार्य हैं इस लिए जब तक वो इस पद पर हैं तब तक तो शंकराचार्य होने के नाते उनका सम्मान करना ही पड़ेगा वो यदि शंकराचार्य नहीं भी रहते हैं तो भी संत ,विद्वान एवं वयोवृद्ध होने का  होना चाहिए!
        जहाँ तक पत्रकार के द्वारा नरेंद्र मोदी के विषय में सवाल पूछने पर चाटा मारने की बात है यहाँ प्रथम दृष्टया उनकी गलती लगती  जरूर है किन्तु पत्रकार महोदय को भी तो उनसे इस प्रकार का प्रश्न नहीं करना चाहिए था! है  

Saturday, February 1, 2014


सोनिया के निशाने पर मोदी, कहा- वो करते हैं जहर की खेती!

     किन्तु उन्होंने यह नहीं बताया कि भाजपा को जहर की खेती  करनी आखिर क्यों पड़ी ?




Thursday, January 30, 2014

काँग्रेस राहुल और सरकार का 'कृपा कारोबार' आखिर कब तक सहा जाएगा ?

   गैस सिलेंडरों की संख्या घटा कर फिर बढ़ाना जनता पर राहुल जी की कृपा थोपने की सरकारी शरारत मात्र लगती है !राहुल गाँधी ने बढ़वाए गैस सिलेंडर तो घटाए किसके कहने पर गए थे ?

     गैस सिलेंडरों की संख्या बढ़ाने का श्रेय  यदि सरकार और काँग्रेस राहुल गाँधी को देना चाहती है तो कोई बात नहीं दे किन्तु एक प्रश्न का उत्तर भी दे कि जब सिलेंडर  घटाए गए थे उसका जिम्मेदार कौन है? देश वासियों को तो उसका नाम जानना है?जिसने यह खेल खेला है और घटाए क्यों  गए इसका कारण जानना है ?यदि कहा जाए कि इतने सिलेंडर दे पाना सम्भव नहीं था तो आज कैसे हो रहा है उसमें भी चुनावों के समय केवल राहुलगाँधी के कहने पर कैसे सम्भव हो गया ?सरकार को अपनी आँखों से क्यों नहीं दिखाई पड़  रही थी आम आदमी की  पीड़ा!और अब कैसे यह बात समझ में आ गई! अब घाटा भी क्यों नहीं पड़  रहा है? अब सरकार को कोई कठिनाई भी नहीं हो रही है आखिर क्यों ?मजे की बात तो  यह है कि जिस दिन राहुल ने बारह सिलेंडरों की माँग की थी देश का बच्चा बच्चा उसी समय कहने लगा था कि अब सरकार बारह सिलेंडर आराम से दे देगी क्योंकि राहुल ने कहा है इतना ही नहीं जिला स्तरीय काँग्रेसी भी बताते घूम रहे थे कि राहुल जी ने डंडा दिया है अब जरूर  मिलेंगे बारह सिलेंडर!और ऐसा किया भी जा रहा है । 

      क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि राहुल गाँधी की ही प्रेरणा से ही सिलेंडरों की संख्या घटाई गई थी उन्हीं के कहने पर अब बढ़ा भी दी गई! इसका सीधा सा मतलब है कि गैस की शार्टेज न होकर अपितु यह राहुल को जनता का शुभ चिंतक सिद्ध करने के लिए सरकार के द्वारा की गई एक  शरारत मात्र थी !केवल यह दिखाना था कि राहुल जी की कृपा पर जी रहे हैं देश के लोग ?राहुल गाँधी जब जैसा चाहेंगे वैसा होगा जो जनता चाहेगी वो नहीं होगा ! 

     इसी प्रकार से सरकार के द्वारा सर्व सम्मति से पास किए गए बिल की कापियाँ राहुल ने फाड़ देने की बात की थी और फिर ऐसा ही हुआ कि सरकार दुम दबाकर बैठ गई और पता नहीं चला कि उस सरकार के सर्व सम्मत सम्माननीय निर्णय का आखिर हुआ क्या ?

           यदि राहुल इतने ही काबिल हैं तो स्वयं क्यों नहीं सँभालते हैं देश की कमान आखिर क्या भय है उन्हें ?जनता के प्रति कोई तो जवाबदेय  होता आज तो कोई नहीं है!ये तो नरसिंहा राव जी  की तरह ही होगा कि सारे अप्रिय निर्णयों का ठीकरा मनमोहन सिंह जी पर फोड़ा जाएगा और खानदान विशेष की स्वच्छता पवित्रता बचा लेंगे ऐसे दुमदार चाटुकार लोग !

    इस छोटी सी बात से बड़ी से बड़ी शंकाएँ उठना स्वाभाविक है जैसे लोकतंत्र में मालिक जनता होती है किन्तु वर्त्तमान सरकार राहुल गाँधी को मालिक मानती है इसी प्रकार से लोक तंत्र में जनता जैसा चाहती है वैसा होता है किन्तु इस सरकार में राहुल जैसा चाहते हैं वैसा होता है !लोकतंत्र में जनता का समर्थन जिसको मिलता है वह प्रधान मन्त्री बनता है किन्तु यहाँ जनता से समर्थन कोई माँगता है और बाद में सरकार किसी की बनती है अथवा यूँ कह लिया जाए कि सरकार बनवाकर बाद में ठेके पर उठा दी जाती है !

       हमारी शंका इस बात की है कि  आखिर क्या कारण है कि सरकार की जवाब देही  जनता के प्रति न होकर केवल एक परिवार के प्रति है ये दब्बू लोग कैसे रख पाते होंगे विदेशीमंचों  पर भारत का पक्ष !आखिर क्यों काटे जाते हैं भारतीय सैनिकों के शिर और जाँच के नाम पर क्यों उतरवाए जाते हैं भारतीयों के कपड़े!फिर ऐसे लोगों या देशों से कैसे निपट पाती है सरकार !खैर ,देशवासियों को जो सहना है सो तो सहना ही है किन्तु बड़ी पीड़ा के साथ !

       जब सरकार केवल एक परिवार के प्रति ही जवाब देय  है तब तो सरकार की सारी  मशीनरी भी केवल उसी परिवार को सजाया सँवारा करती है उसी की सुरक्षा की जाती है बाकी पूरा देश चोरी लूट बलात्कार अपहरण हत्या जैसी दुखद पीड़ाएँ सहता रहे तो सहे किन्तु इस देश का एक परिवार सुरक्षित रहे बस एक परिवार ! कहीं यही कारण तो नहीं है कि राहुलगाँधी के कहे बिना इन सरकारी ड्राइवरों को यह होश भी नहीं होता है कि ये लोग सरकार को जिस दिशा में लिए जा रहे हैं वो उचित है भी या नहीं !कहीं रेड़ी चलाने वाले की तरह ही तो नहीं चलाई जा रही है सरकार ! जिसे राहुल गाँधी जिस दिशा में उठाकर रख देते हैं ये उधर ही धकियाए चले जाते हैं उसका प्लस माइनस राहुल जी जानें इन्हें तो धकियाने से मतलब!

     यदि यह सब कुछ ऐसा ही है तो इसे लोकतंत्र कहना कहाँ तक ठीक होगा !क्या इस देश का यही लोकतंत्र है जिस पर गर्व किया जाए !खैर ,और जो भी हो ठीक ही है मेरा निवेदन मात्र इतना है कि देशवासी भी यदि आत्मसम्मान एवं स्वाभिमान पूर्वक जीवन जीना चाहते हैं तो उनकी भी कुछ जिम्मेदारी बनती ही है उन्हें भी सोचना होगा कि देश की आजादी पर केवल किसी एक व्यक्ति या परिवार का ही  अधिकार तो नहीं है और न ही केवल  एक परिवार की ही कुर्वानियों से आजादी मिली है! इस देश को अपना समझकर ही इसे स्वतन्त्र कराने के लिए सारे देशवासियों ने अपने अपने बलिदान दिए थे उनका कतई उद्देश्य नहीं रहा होगा कि उनकी संतानों को गैस सिलेंडरों जैसी छोटी एवं सर्वाधिक जरूरी चीजों के लिए के कोई राहुल इस प्रकार का खिलवाड़  या अपनी मन मानी करेगा!
    केवल चुनावी वर्ष में ही उसमें जनहित साधना की भावना जागेगी बाक़ी सोती रहेगी !पहले महँगाई बढ़ने दी  जाएगी बाद में फूड सिक्योरटी बिल लाकर अपनी पीठ थपथपायी  जाएगी !समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इस तरह से क्यों खेला  जा रहा है जनता के जीवन से ! देश में सबसे अधिक वर्ष तक सत्ता में रही पार्टी यदि देश वासियों को इतने वर्षों में भोजन भी न उपलब्ध करा पाई हो और इतने वर्षों बाद अब ऐसी कोई पहल की गई हो तो ये गर्व का विषय कैसे हो सकता है इसके लिए तो देश से माफी माँगी जानी चाहिए कि जो काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था वो हम किन्हीं मजबूरियों के कारण इतने बिलम्ब से कर पा रहे हैं  जिसके लिए आप लोगों ने शांति पूर्ण वातावरण बनाकर सरकार का सहयोग किया है आपके ऐसे सदाचरण पूर्ण सहयोग के लिए सरकार आपकी आभारी है । इस प्रकार के विनम्र बचनों से घटाए जा सकते हैं जनता के दुःख और जीता  जा सकता है जनता का अपनापन !इससे जनता को भी लगेगा कि हमारे सदाचरण पूर्ण सहयोग का सम्मान सरकार के मन में भी है अर्थात सरकार भी हमारे समर्पण से सुपरिचित है और हमें भी धैर्य बनाए रखना चाहिए किन्तु राहुल जी सोनियाँ जी , सोनियाँ जी  राहुल जी का स्तुति गान सुनते सुनते अब तो आत्मा भी थक गई है !सरकार की गलत नीतियों या अभावों के कारण दुःख तो जनता ने सहे हैं और तारीफ सोनियाँ राहुल की आखिर क्यों ?

     कम से कम आभाव के कारण तो सोनियाँ राहुल कभी भूखे नहीं रहे उनके भोजन से लेकर सुरक्षा समेत सारी सुखसुविधाओं का भारी भरकम खर्च आखिर सरकार ही तो बहन कर रही है !इसलिए ये नहीं भूला जाना चाहिए कि वो जनता का पैसा होता है ये उसी जनता का जो स्वयं भूखी रहती है किन्तु आपके उत्तमोत्तम भोजन के खर्च को बहन करती है न केवल इतना अपितु स्वयं असुरक्षित रह कर भी अपने खर्च से तुम्हें सुरक्षा उपलब्ध करवाती है फिर भी उस पर ही सोनियाँ जी  राहुल जी की कृपा का कारोबार करने की कोशिश की जाए तो इसे कैसे सहा जा सकता है आखिर देशवासियों के इतने सारे त्याग बलिदान सेवा एवं समर्पण की सराहना क्यों नहीं की जानी चाहिए ?

        यदि अटल जी के घुटने का इलाज स्वदेश में हो सकता है तो सोनियाँ जी का क्यों नहीं हो सकता !क्या यहाँ के चिकित्सकों पर विश्वास नहीं है या वे योग्य नहीं  हैं यदि ऐसा भी है तो आपकी सरकार के आधीन जब सारे देशवासी हैं तो आपको केवल अपनी जान ही प्यारी क्यों है देश की जनता की परवाह क्यों नहीं होनी चाहिए!आखिर आपके मन में उनके स्वस्थ्य का महत्त्व क्यों नहीं है यदि है तो आपकी सरकार दस वर्ष में और कुछ नहीं कर पाई तो न सही कम से कम अपने लायक एक अस्पताल ही यहॉं बनवा लेते! जहाँ देश की जनता इलाज तो खैर क्या करवा  पाती! कम से कम उसे देखकर ये कह तो सकती थी कि यह उनका अस्पताल है जो इस देश एवं देशवासियों को केवल भाषणों में तो अपना कहते  हैं किन्तु भरोसा बिलकुल नहीं करते हैं!सोनियाँ जी !आखिर इन भावुक भारतीयों के साथ इतना अन्याय क्यों ?         

      इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रखते हुए देश वासियों से मेरा निवेदन है कि हम सक्षम लोकतंत्र हैं यदि अपनी ऐसी प्रतिष्ठा वैश्विक स्तर पर किसी प्रकार से बन ही गई है तो उसमें जनता की सहनशीलता का बहुत बड़ा योगदान है उसे भूला नहीं जाना चाहिए साथ ही उसकी पोल खुलने से पहले क्या देश वासियों को अपनी शासन पद्धति बदल नहीं लेनी चाहिए और अब समय आ गया है जब इन ठेके की सरकारों को 'राम राम' कह देना चाहिए और अपनी भावना साफ कर देनी चाहिए कि अब देश वासियों के साथ इस प्रकार का खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा !आखिर देश वासियों की मजबूरी क्या है कि वो इस प्रकार की छीछालेदर को बर्दाश्त करें!किसी सोनियाँ जी या राहुल जी की कृपा पर आखिर कब तक किया जाएगा जीवन यापन ? देश में क्या और राजनैतिक दल नहीं हैं या और सक्षम नेता नहीं हैं!आखिर ! क्यों राहुल और सोनियाँ जी की बात मानकर मनमोहन सिंह जी का पल्लू पकड़कर चलना देशवासियों की मजबूरी है ?


 

Tuesday, January 28, 2014

अभिवादन पूर्वक कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए आपका बहुत बहुत आभार !

    बाबा विश्वनाथ जी की कृपा से आगामी चुनावों में भारतीय संस्कृति ,संस्कारों  एवं सात्विक सरकारों के सृजन जैसे पुण्य प्रयासों के द्वारा आपका अमित यशोविस्तार होवे !
       ईश्वर आपको वह शक्ति एवं सात्विकता प्रदान करे जिससे कि असंख्य असहायों की जीवनदायिनी  माता काशी की पुण्य भूमि तथा गंगा यमुना के पवित्र प्रवाह से सुसिंचित पावन हो चुका  अपना पुण्यप्रदेश आपके अवतरण तथा आचार विचार व्यवहार एवं कर्तव्य निष्ठा पर गर्व कर सके!
 हर हर महादेव !जय जय काशी विश्वनाथ !जय माँ अन्नपूर्णा ,जयतु पुण्य सलिला उत्तर वाहिनी माँ गंगा !!

Thursday, January 23, 2014

अमर सिंह एवं अमिताभ बच्चन का ज्योतिषीय विवाद !

अमिताभबच्चन एवं अमरसिंह की मधुर मित्रता आज भी चल सकती है !

     चूँकि मरसिंह जी के मित्रों की संख्या में अक्षर से प्रारंभ नाम वाले लोग ही अधिक हैं इसलिए इन्हीं लोगों से दूरियॉं बनती चली गईं। जैसेः- जमखान मिताभबच्चन  निलअंबानी  भिषेक बच्चन आदि।

    यहाँ ज्योतिष एक बहुत बड़ा कारण है। किन्हीं दो या दो से अधिक लोगों का नाम यदि एक अक्षर से ही प्रारंभ होता है तो ऐसे सभी लोगों के आपसी संबंध शुरू में तो अत्यंत मधुर होते हैं बाद में बहुत अधिक खराब हो जाते हैं, क्योंकि इनकी पद-प्रसिद्धि-प्रतिष्ठा -पत्नी-प्रेमिका आदि के विषय में पसंद एक जैसी होती है। इसलिए कोई सामान्य मतभेद भी कब कहॉं कितना बड़ा या कभी न सुधरने वाला स्वरूप धारण कर ले या शत्रुता में बदल जाए कहा नहीं जा सकता है। 

जैसेः-राम-रावण, कृष्ण-कंस आदि। इसी प्रकार और भी उदाहरण हैं।

 

     मर सिंह जी भी अक्षर वाले लोगों से ही व्यथित देखे जा सकते हैं। अमरसिंह जी की पटरी पहले मुलायम सिंह जी के साथ तो खाती रही तब केवल जमखान साहब से ही समस्या होनी चाहिए थी किंतु खिलेश  यादव का प्रभाव बढ़ते ही मरसिंह जी को पार्टी से बाहर जाना पड़ा। ऐसी परिस्थिति में अब खिलेश के साथ जमखान कब तक चल पाएँगे? कहा नहीं जा सकता। पूर्ण बहुमत से बनी उत्तर प्रदेश  में सपा सरकार का यह सबसे कमजोर ज्वाइंट सिद्ध हो सकता है    


इसीप्रकार जैसे -

     अन्नाहजारे-अग्निवेष-अरविंद-असीम त्रिवेदी 

जब को एक साथ नहीं रखा जा सका तो  नितीशकुमार-नरेंद्रमोदी-नितिनगडकरी को एक साथ कैसे रखा जा सकता था? मोदी जी का प्रभाव बढ़ते ही  नितिनगडकरी को पहले ही इसी के तहत अध्यक्ष पद से हटना पड़ा था ।इसके अलावा जो कारण बनाए गए वो सब तो राजनीति में चला ही करता है।

  इसीप्रकार फिर मोदी जी का प्रभाव बढ़ते ही  नितीशकुमार जी को भी राजग से हटना पड़ सकता है। अभी भी समय है नितीशकुमार जी  एवं नरेंद्रमोदी जी को आमने सामने पड़ने एवं पारस्परिक वाद विवाद से बचाया जाना चाहिए।श्री शरद यादव जी एवं श्री राजनाथ सिंह जी को आगे आकर आपसी बातचीत से राजग की रक्षा कर लेनी चाहिए!

     इसी प्रकार जैसे भारत वर्ष में  भाजपा राजग बनाकर ही सत्ता में आ पाने में सफल हो सकी।जबकि इससे कम सदस्य संख्या वाले एवं अटलजी से  कमजोर व्यक्तित्व वाले लोग भी यहाँ प्रधानमंत्री बनते रहे हैं।कई प्रदेशों में भाजपा की सरकारें भी अच्छी तरह से चल भी रही हैं ।जैसे - दिल्ली में ही देखें भाजपा के चार विजयों  के  समूह का एक साथ एक क्षेत्र में एक समय पर काम करना आगामी चुनावों में राजनैतिक भविष्य  के लिए चिंता प्रद हैं।इसी कारण से पहले भी कांग्रेस विजय पाती रही है।                   विजयेंद्रजी -विजयजोलीजी 

      विजयकुमारमल्होत्राजी - विजयगोयलजी   

इसी प्रकारऔर भी उदहारण हैं -       

               कलराजमिश्र-कल्याण सिंह  

                       ओबामा-ओसामा   

               अरूण जेटली- अभिषेकमनुसिंघवी

                     मायावती-मनुवाद

                         नरसिंहराव-नारायणदत्ततिवारी 

         लालकृष्णअडवानी-लालूप्रसाद 

              परवेजमुशर्रफ-पाकिस्तान 

                        भाजपा-भारतवर्ष  

                मनमोहन-ममता-मायावती    

                   उमाभारती -   उत्तर प्रदेश 
       अमरसिंह - आजमखान - अखिलेशयादव 

      अमर सिंह - अनिलअंबानी - अमिताभबच्चन 

 प्रमोदमहाजन-प्रवीणमहाजन-प्रकाशमहाजन  आदि और भी हैं -

न्नाहजारे-अग्निवेष-अरविंद-असीम त्रिवेदी -
   न्ना हजारे के आंदोलन के तीन प्रमुख ज्वाइंट थे न्ना हजारे, रविंदकेजरीवाल,सीमत्रिवेदी एवं ग्निवेष जिन्हें एक दूसरे से तोड़कर ये आंदोलन ध्वस्त किया जा सकता था। इसमें ग्निवेष कमजोर पड़े और हट गए। दूसरी ओर जनलोकपाल के विषय में लोक सभा में जो बिल पास हो गया वही राज्य सभा में क्यों नहीं पास हो सका इसका एक कारण नाम का प्रभाव भी हो सकता है। सरकार की ओर से भिषेकमनुसिंघवी थे तो विपक्ष के नेता रूण जेटली जी थे। इस प्रकार ये सभी नाम अ से ही प्रारंभ होने वाले थे। इसलिए भिषेकमनुसिंघवी की किसी भी बात पर रूण जेटली का मत एक होना ही नहीं था।अतः राज्य सभा में बात बननी ही नहीं थी। दूसरी  ओर अभिषेकमनुसिंघवी और अरूण जेटली का कोई भी निर्णय अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल को सुख पहुंचाने वाला नहीं हो सकता था। अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल का महिमामंडन अग्निवेष कैसे सह सकते थे?अब अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल कब तक मिलकर चल पाएँगे?कहना कठिन है।असीमत्रिवेदी भी अन्नाहजारे के गॉंधीवादी बिचारधारा के विपरीत आक्रामक रूख बनाकर ही आगे बढ़े। आखिर और लोग भी तो थे।  अ अक्षर से प्रारंभ नाम वाले लोग ही अन्नाहजारे  से अलग क्यों दिखना चाहते थे ? ये अ अक्षर वाले लोग  ही अन्नाहजारे के इस आंदोलन की सबसे कमजोर कड़ी हैं।      

    रामदेव -

  रामलीला मैदान में पहुँचने से पहले तो रामदेव को मंत्री गण  मनाने पहुँचे फिर रामलीला मैदान में पहुँचने के बाद राहुल को ये पसंद नहीं आया तो रामदेव वहाँ से भगाए गए।

   दूसरी बार फिर रामदेव रामलीला मैदान पहुँचे इसके बाद राजीवगाँधी स्टेडियम जा रहे थे फिर राहुल को पसंद न आता और  लाठी डंडे चल सकते थे किन्तु अम्बेडकर स्टेडियम ने बचा लिया। 

     इसप्रकार से जब रा अक्षर वालों ने रा अक्षर वालों का साथ नहीं दिया तो राहुल और राजनाथ राम मंदिर का समर्थन कितना या कितने मन से करेंगे कैसे कहा जा सकता है? राम मंदिर प्रमुख रामचन्द्र दास परमहंसजी महाराज एवं उस समय के डी.एम. रामशरण श्रीवास्तव के और राम मंदिर इन तीनों का आपसी तालमेल सन 1990 में अच्छा नहीं रहा परिणामतः संघर्ष चाहें जितना रहा हो किन्तु मंदिर निर्माण की दिशा में कोई विशेष सफलता नहीं मिली।

    राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है