Saturday, April 27, 2013

Who Is Responsible For Teaching in Government Schools

केवल भोजन से भला नहीं होता शिक्षा भी जरूरी है !!!

    पूर्वी दिल्ली के एक सरकारी विद्यालय  में मैं अपनी बच्चियों के एडमीशन के लिए गया तो वहाँ के जो अनुभव हुए  हैं वे शिक्षा के लिए अत्यंत भयावह हैं।यह हालत देखकर मुझसे रहा न गया और मैंने  बीस से अधिक  विद्यालयों में जा जाकर पता किया, सबका मिलाजुला वही  वातावरण मिला। 

   मैंने जो देखा सुना समझा उसके निष्कर्ष रूप में हम इतना तो कह ही सकते हैं कि सरकारी स्कूलों को बनाने के पीछे  सरकार का उद्देश्य जो भी रहा हो किन्तु  समाज को साक्षर बनाना तो हो ही नहीं सकता और यह बात भी मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि वहाँ बेशक भोजन बाँटा जाता होगा कुछ पैसे दिए जाते होंगे किन्तु शिक्षक नाम के स्कूली  कर्मचारी  बस केवल नाम से जाने  पहचाने जाते हैं उनके काम और आचरण से वे अपने अध्यापक होने का एहसास नहीं करा पाते हैं।एक आध अध्यापक छोड़कर बाकी उनके चेहरों पर कहीं भी इस बात की ग्लानि नहीं दिखी कि जिन बच्चों की जिंदगी बनाने के लिए हमारी नियुक्ति  हुई है जिस लिए हम सैलरी लेते हैं  वह काम हमें क्यों  नहीं करना  चाहिए? सरकार और अभिभावकों ने बच्चों की जिंदगी बनाने की जो जिम्मेदारी शिक्षकों पर भरोसा करके छोड़ी है वो उसमें कितना खरे उतर पा रहे हैं! 

     यहाँ विशेष ध्यान देने लायक बात यह भी है कि शिक्षकवर्ग अपने जिस कर्तव्य का पालन करके बड़ी संख्या में बच्चों का भविष्य जितनी ऊँचाई पर ले जा सकता है उसी प्रकार से कर्तव्य का पालन न करने वाले  शिक्षकों से पढ़ने वाले  बच्चों का समूचा भविष्य गड्ढे में जा सकता है जिसके जिम्मेदार केवल और केवल शिक्षक ही माने जाने चाहिए।क्योंकि बच्चों के माता पिता एवं सरकार ने तो  शिक्षकवर्ग की छत्रछाया में ही अपने बच्चे पढ़ने के लिए छोड़ रखे होते हैं। यदि शिक्षकवर्ग पढ़ाने में रूचि नहीं लेता है तो खाली दिमाग शैतान का होता है वे कुछ न कुछ तो सिखेंगे ही  भले वो अपराध ही क्यों न हो ?

     इसलिए शिक्षकों के लिए भी यह आवश्यक है कि जिस काम के लिए उन्हें सैलरी मिलती है वह काम करने से उन्हें पहली  बात तो जिन बच्चों का जीवन सँवरता है वे अपराधी तो नहीं ही बनेंगे अपितु उनका नाम भी रोशन करेंगे।दूसरी बात ऐसे शिक्षकों की प्रतिष्ठा हमेंशा बनी रहती है। तीसरी बात ऐसे परिश्रम से प्राप्त सैलरी रूपी धन से घर  में बरक्कत होती रहेगी। अपने बच्चे सदाचारी बनेंगे।सात्विक धन से बीमारी   आरामी  का  सामना नहीं  या कम करना पड़ेगा । 

    सबसे बड़ी बात जब थाल में भोजन परोस कर सामने आएगा और आप भोजन का ग्रास हाथ में तोड़ेंगे तो आपको आपकी आत्मा यह कह कर धिक्कारेगी नहीं कि छोड़ दे यह ग्रास! इस भोजन पर तेरा अधिकार नहीं है।क्योंकि यह भोजन जिस पैसे से बना है वह पैसा उस शिक्षक सैलरी का है जो बच्चों को पढ़ाने के बदले आपको मिलता है किन्तु आप बच्चों को पढ़ाते नहीं हैं। इसलिए इस भोजन पर तुम्हारा कोई  अधिकार नहीं है।   

    यह सैलरी उस मध्यम एवं उच्च वर्गीय  लोगों के द्वारा जमा किए गए टैक्स के पैसे से दी जाती है  जो जिन भर धक्के खाकर  बड़े परिश्रम पूर्वक जो धन कमाते हैं उससे टैक्स रूप में जो धन सरकार को  देते हैं वही सैलरी रूप में बाँटा जाता है वे लोग भी चाहते हैं कि उनके धन का भी सदुपयोग देश की स्थिति सुधारने में हो और बच्चों का भविष्य बने देश की गरीबत दूर हो ! 

    इसप्रकार धनी लोगों के द्वारा दिए जाने वाले  टैक्स का देश के विकास में सदुपयोग होता है जो  देना उनका कर्तव्य भी है।उस टैक्स का दूसरा उपयोग आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आगे लाने के लिए होता है यह उन गरीबों पर कृपा पूर्ण ऋण होता है वह भी इस उद्देश्य से कि आपके बच्चे भी पढ़ लिखकर कल उन्नति करेंगे इसी प्रकार उनके द्वारा भी टैक्स  में दिया गया पैसा कुछ और गरीब बच्चों की उन्नति में सहायक होगा इस प्रकार धीरे धीरे देश की सामाजिक  स्थिति  में  सुधार  होगा। वे बच्चे भी कभी इस देश की दशा को सुधारने के लिए  सहयोग देने  में सहायक हो सकते हैं। 

    आज एक सच्चाई है कि मैं कहूँ कुछ भी कोई माने या न माने ये उसकी ईच्छा किन्तु सरकारी शिक्षा में आज बहुत लापरवाही हो रही है इसी परिणाम स्वरूप प्राइवेट वाले मनमानी लूट रहे हैं। 

         मैं अपने बच्चों के एडमीशन के समय बीस से अधिक सरकारी स्कूलों में गया जहाँ शिक्षक लोगों के बिचार   मिले जुले कुछ इस रूप में देखने सुनने को मिले-    

    अलग अलग स्कूलों के अध्यापक या अध्यापिकाओं ने मिल जुल  कर सरकारी शिक्षा व्यवस्था एवं अपने  अधिकारियों को जमकर अपशब्द कहे।  उन्होंने  भोजन और पैसे बाँटने  को गलत बताया ।कोर्स में पढ़ाई जाने वाली किताबों को गंदा एवं बकवास कहा। उन्होंने हमें  बताया कि इसीलिए इन सरकारी किताबों को  हमलोग पढ़ाते नहीं हैं।वहाँ पढ़ने आने वाले बच्चों को दुर्गन्धित शरीर  वाले एवं उनके माता पिता को अकर्मण्य और निकम्मा बताया और साफ साफ कहा गया कि आपको यदि अपने बच्चे का एडमीशन कराना ही है तो करा भले लो, पढ़ाई  की आशा हमसे मत करना! बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी जब तक मैं क्लास में रहूँगी तब तक मेरी इसके बाद आप जानें आपका काम !मैंने पूछा आप क्लास में कब कब रहेंगी ?हँसते हुए उन्होंने कहा हमारे भी तो छोटे छोटे बच्चे हैं इसलिए मेरा स्कूल में रुक पाना बहुत कठिन होता है।

     मैंने कहा कि आगे चलकर अपने बच्चों को हमें प्रतिभा विकास  विद्यालय में पढ़ाना है इसलिए यहाँ इंग्लिश मीडियम में कराना चाह्ता हूँ।यह सुनकर  सबने मिलकर हमारी खूब हँसी उड़ाई और समझाया कि कुछ कमाया धमाया भी करो क्या करते हैं आप? यदि वास्तव में अपने बच्चे को पढ़ाने की ईच्छा रखते हो तो प्राइवेट में पढ़ा लो सेंट जोसफ में मेरे बच्चे पढ़ते हैं।मैंने कहा कि फ्री शिक्षा देती है सरकार तो वहाँ क्यों पढ़ा लूँ ?यहाँ ही पढ़ाऊँगा यह सुनकर उन्होंने कहा कि कहीं भी पढ़ा लो पढ़ने वाला पढ़ ही लेता है वैसे फ्री में शिक्षा क्या मिट्टी भी नहीं मिलती है। मैंने कहा किन्तु यह तो सरकार की शिक्षा व्यवस्था है तो उन्होंने कहा यह तो ठीक है किन्तु यदि शिक्षक पढ़ाएँगे  ही नहीं तो क्या कर लेगी सरकार?पढ़ाना तो हमें ही है हम आपको सही सलाह दे रहे हैं फ़िर भी  यदि आपको समझ में नहीं आता है तो पढ़ा लीजिए न !!!

       इसलिए पढ़ने वाला अच्छा होना चाहिए कहीं भी पढ़ लेगा एडमीशन आप करवा लो पढ़ाई के लिए ट्यूशन लगवा देना। खैर,  मेरी और कोई जिम्मेदारी नहीं है हाँ, पास जरूर  करवा दूँगी सरकार का आदेश है कि किसी को भी फेल नहीं करना है!!!यह सब सुनकर अत्यंत तनाव में मैं घर चला आया।

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु  ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी नीतिगत  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।



 

Children Can Eat Only Not Read In Gornment Schools

        सरकारी विद्यालयों  में  केवल भोजन !!!

    पूर्वी दिल्ली के एक सरकारी विद्यालय  में मैं अपनी बच्चियों के एडमीशन के लिए गया तो वहाँ के जो अनुभव हुए  हैं वे शिक्षा के लिए अत्यंत भयावह हैं।यह हालत देखकर मुझसे रहा न गया और मैंने  बीस से अधिक  विद्यालयों में जा जाकर पता किया, सबका मिलाजुला वही  वातावरण मिला। 

   मैंने जो देखा सुना समझा उसके निष्कर्ष रूप में हम इतना तो कह ही सकते हैं कि सरकारी स्कूलों को बनाने के पीछे  सरकार का उद्देश्य जो भी रहा हो किन्तु  समाज को साक्षर बनाना तो हो ही नहीं सकता और यह बात भी मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि वहाँ बेशक भोजन बाँटा जाता होगा कुछ पैसे दिए जाते होंगे किन्तु शिक्षक नाम के स्कूली  कर्मचारी  बस केवल नाम से जाने  पहचाने जाते हैं उनके काम और आचरण से वे अपने अध्यापक होने का एहसास नहीं करा पाते हैं।एक आध अध्यापक छोड़कर बाकी उनके चेहरों पर कहीं भी इस बात की ग्लानि नहीं दिखी कि जिन बच्चों की जिंदगी बनाने के लिए हमारी नियुक्ति  हुई है जिस लिए हम सैलरी लेते हैं  वह काम हमें क्यों  नहीं करना  चाहिए? सरकार और अभिभावकों ने बच्चों की जिंदगी बनाने की जो जिम्मेदारी शिक्षकों पर भरोसा करके छोड़ी है वो उसमें कितना खरे उतर पा रहे हैं! 

     यहाँ विशेष ध्यान देने लायक बात यह भी है कि शिक्षकवर्ग अपने जिस कर्तव्य का पालन करके बड़ी संख्या में बच्चों का भविष्य जितनी ऊँचाई पर ले जा सकता है उसी प्रकार से कर्तव्य का पालन न करने वाले  शिक्षकों से पढ़ने वाले  बच्चों का समूचा भविष्य गड्ढे में जा सकता है जिसके जिम्मेदार केवल और केवल शिक्षक ही माने जाने चाहिए।क्योंकि बच्चों के माता पिता एवं सरकार ने तो  शिक्षकवर्ग की छत्रछाया में ही अपने बच्चे पढ़ने के लिए छोड़ रखे होते हैं। यदि शिक्षकवर्ग पढ़ाने में रूचि नहीं लेता है तो खाली दिमाग शैतान का होता है वे कुछ न कुछ तो सिखेंगे ही  भले वो अपराध ही क्यों न हो ?

     इसलिए शिक्षकों के लिए भी यह आवश्यक है कि जिस काम के लिए उन्हें सैलरी मिलती है वह काम करने से उन्हें पहली  बात तो जिन बच्चों का जीवन सँवरता है वे अपराधी तो नहीं ही बनेंगे अपितु उनका नाम भी रोशन करेंगे।दूसरी बात ऐसे शिक्षकों की प्रतिष्ठा हमेंशा बनी रहती है। तीसरी बात ऐसे परिश्रम से प्राप्त सैलरी रूपी धन से घर  में बरक्कत होती रहेगी। अपने बच्चे सदाचारी बनेंगे।सात्विक धन से बीमारी   आरामी  का  सामना नहीं  या कम करना पड़ेगा । 

    सबसे बड़ी बात जब थाल में भोजन परोस कर सामने आएगा और आप भोजन का ग्रास हाथ में तोड़ेंगे तो आपको आपकी आत्मा यह कह कर धिक्कारेगी नहीं कि छोड़ दे यह ग्रास! इस भोजन पर तेरा अधिकार नहीं है।क्योंकि यह भोजन जिस पैसे से बना है वह पैसा उस शिक्षक सैलरी का है जो बच्चों को पढ़ाने के बदले आपको मिलता है किन्तु आप बच्चों को पढ़ाते नहीं हैं। इसलिए इस भोजन पर तुम्हारा कोई  अधिकार नहीं है।   

    यह सैलरी उस मध्यम एवं उच्च वर्गीय  लोगों के द्वारा जमा किए गए टैक्स के पैसे से दी जाती है  जो जिन भर धक्के खाकर  बड़े परिश्रम पूर्वक जो धन कमाते हैं उससे टैक्स रूप में जो धन सरकार को  देते हैं वही सैलरी रूप में बाँटा जाता है वे लोग भी चाहते हैं कि उनके धन का भी सदुपयोग देश की स्थिति सुधारने में हो और बच्चों का भविष्य बने देश की गरीबत दूर हो ! 

    इसप्रकार धनी लोगों के द्वारा दिए जाने वाले  टैक्स का देश के विकास में सदुपयोग होता है जो  देना उनका कर्तव्य भी है।उस टैक्स का दूसरा उपयोग आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आगे लाने के लिए होता है यह उन गरीबों पर कृपा पूर्ण ऋण होता है वह भी इस उद्देश्य से कि आपके बच्चे भी पढ़ लिखकर कल उन्नति करेंगे इसी प्रकार उनके द्वारा भी टैक्स  में दिया गया पैसा कुछ और गरीब बच्चों की उन्नति में सहायक होगा इस प्रकार धीरे धीरे देश की सामाजिक  स्थिति  में  सुधार  होगा। वे बच्चे भी कभी इस देश की दशा को सुधारने के लिए  सहयोग देने  में सहायक हो सकते हैं। 

    आज एक सच्चाई है कि मैं कहूँ कुछ भी कोई माने या न माने ये उसकी ईच्छा किन्तु सरकारी शिक्षा में आज बहुत लापरवाही हो रही है इसी परिणाम स्वरूप प्राइवेट वाले मनमानी लूट रहे हैं। 

         मैं अपने बच्चों के एडमीशन के समय बीस से अधिक सरकारी स्कूलों में गया जहाँ शिक्षक लोगों के बिचार   मिले जुले कुछ इस रूप में देखने सुनने को मिले-    

    अलग अलग स्कूलों के अध्यापक या अध्यापिकाओं ने मिल जुल  कर सरकारी शिक्षा व्यवस्था एवं अपने  अधिकारियों को जमकर अपशब्द कहे।  उन्होंने  भोजन और पैसे बाँटने  को गलत बताया ।कोर्स में पढ़ाई जाने वाली किताबों को गंदा एवं बकवास कहा। उन्होंने हमें  बताया कि इसीलिए इन सरकारी किताबों को  हमलोग पढ़ाते नहीं हैं।वहाँ पढ़ने आने वाले बच्चों को दुर्गन्धित शरीर  वाले एवं उनके माता पिता को अकर्मण्य और निकम्मा बताया और साफ साफ कहा गया कि आपको यदि अपने बच्चे का एडमीशन कराना ही है तो करा भले लो, पढ़ाई  की आशा हमसे मत करना! बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी जब तक मैं क्लास में रहूँगी तब तक मेरी इसके बाद आप जानें आपका काम !मैंने पूछा आप क्लास में कब कब रहेंगी ?हँसते हुए उन्होंने कहा हमारे भी तो छोटे छोटे बच्चे हैं इसलिए मेरा स्कूल में रुक पाना बहुत कठिन होता है।

     मैंने कहा कि आगे चलकर अपने बच्चों को हमें प्रतिभा विकास  विद्यालय में पढ़ाना है इसलिए यहाँ इंग्लिश मीडियम में कराना चाह्ता हूँ।यह सुनकर  सबने मिलकर हमारी खूब हँसी उड़ाई और समझाया कि कुछ कमाया धमाया भी करो क्या करते हैं आप? यदि वास्तव में अपने बच्चे को पढ़ाने की ईच्छा रखते हो तो प्राइवेट में पढ़ा लो सेंट जोसफ में मेरे बच्चे पढ़ते हैं।मैंने कहा कि फ्री शिक्षा देती है सरकार तो वहाँ क्यों पढ़ा लूँ ?यहाँ ही पढ़ाऊँगा यह सुनकर उन्होंने कहा कि कहीं भी पढ़ा लो पढ़ने वाला पढ़ ही लेता है वैसे फ्री में शिक्षा क्या मिट्टी भी नहीं मिलती है। मैंने कहा किन्तु यह तो सरकार की शिक्षा व्यवस्था है तो उन्होंने कहा यह तो ठीक है किन्तु यदि शिक्षक पढ़ाएँगे  ही नहीं तो क्या कर लेगी सरकार?पढ़ाना तो हमें ही है हम आपको सही सलाह दे रहे हैं फ़िर भी  यदि आपको समझ में नहीं आता है तो पढ़ा लीजिए न !!!

       इसलिए पढ़ने वाला अच्छा होना चाहिए कहीं भी पढ़ लेगा एडमीशन आप करवा लो पढ़ाई के लिए ट्यूशन लगवा देना। खैर,  मेरी और कोई जिम्मेदारी नहीं है हाँ, पास जरूर  करवा दूँगी सरकार का आदेश है कि किसी को भी फेल नहीं करना है!!!यह सब सुनकर अत्यंत तनाव में मैं घर चला आया।

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु  ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी नीतिगत  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।



 

Friday, April 26, 2013

Teachers are Not Teaching in Government Schools

                    सरकारी विद्यालयों  की पढ़ाई 

    पूर्वी दिल्ली के एक सरकारी विद्यालय  में मैं अपनी बच्चियों के एडमीशन के लिए गया तो वहाँ के जो अनुभव हुए  हैं वे शिक्षा के लिए अत्यंत भयावह हैं।यह हालत देखकर मुझसे रहा न गया और मैंने  बीस से अधिक  विद्यालयों में जा जाकर पता किया, सबका मिलाजुला वही  वातावरण मिला। 

   मैंने जो देखा सुना समझा उसके निष्कर्ष रूप में हम इतना तो कह ही सकते हैं कि सरकारी स्कूलों को बनाने के पीछे  सरकार का उद्देश्य जो भी रहा हो किन्तु  समाज को साक्षर बनाना तो हो ही नहीं सकता और यह बात भी मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि वहाँ बेशक भोजन बाँटा जाता होगा कुछ पैसे दिए जाते होंगे किन्तु शिक्षक नाम के स्कूली  कर्मचारी  बस केवल नाम से जाने  पहचाने जाते हैं उनके काम और आचरण से वे अपने अध्यापक होने का एहसास नहीं करा पाते हैं।एक आध अध्यापक छोड़कर बाकी उनके चेहरों पर कहीं भी इस बात की ग्लानि नहीं दिखी कि जिन बच्चों की जिंदगी बनाने के लिए हमारी नियुक्ति  हुई है जिस लिए हम सैलरी लेते हैं  वह काम हमें क्यों  नहीं करना  चाहिए? सरकार और अभिभावकों ने बच्चों की जिंदगी बनाने की जो जिम्मेदारी शिक्षकों पर भरोसा करके छोड़ी है वो उसमें कितना खरे उतर पा रहे हैं! 

     यहाँ विशेष ध्यान देने लायक बात यह भी है कि शिक्षकवर्ग अपने जिस कर्तव्य का पालन करके बड़ी संख्या में बच्चों का भविष्य जितनी ऊँचाई पर ले जा सकता है उसी प्रकार से कर्तव्य का पालन न करने वाले  शिक्षकों से पढ़ने वाले  बच्चों का समूचा भविष्य गड्ढे में जा सकता है जिसके जिम्मेदार केवल और केवल शिक्षक ही माने जाने चाहिए।क्योंकि बच्चों के माता पिता एवं सरकार ने तो  शिक्षकवर्ग की छत्रछाया में ही अपने बच्चे पढ़ने के लिए छोड़ रखे होते हैं। यदि शिक्षकवर्ग पढ़ाने में रूचि नहीं लेता है तो खाली दिमाग शैतान का होता है वे कुछ न कुछ तो सिखेंगे ही  भले वो अपराध ही क्यों न हो ?

     इसलिए शिक्षकों के लिए भी यह आवश्यक है कि जिस काम के लिए उन्हें सैलरी मिलती है वह काम करने से उन्हें पहली  बात तो जिन बच्चों का जीवन सँवरता है वे अपराधी तो नहीं ही बनेंगे अपितु उनका नाम भी रोशन करेंगे।दूसरी बात ऐसे शिक्षकों की प्रतिष्ठा हमेंशा बनी रहती है। तीसरी बात ऐसे परिश्रम से प्राप्त सैलरी रूपी धन से घर  में बरक्कत होती रहेगी। अपने बच्चे सदाचारी बनेंगे।सात्विक धन से बीमारी   आरामी  का  सामना नहीं  या कम करना पड़ेगा । 

    सबसे बड़ी बात जब थाल में भोजन परोस कर सामने आएगा और आप भोजन का ग्रास हाथ में तोड़ेंगे तो आपको आपकी आत्मा यह कह कर धिक्कारेगी नहीं कि छोड़ दे यह ग्रास! इस भोजन पर तेरा अधिकार नहीं है।क्योंकि यह भोजन जिस पैसे से बना है वह पैसा उस शिक्षक सैलरी का है जो बच्चों को पढ़ाने के बदले आपको मिलता है किन्तु आप बच्चों को पढ़ाते नहीं हैं। इसलिए इस भोजन पर तुम्हारा कोई  अधिकार नहीं है।   

    यह सैलरी उस मध्यम एवं उच्च वर्गीय  लोगों के द्वारा जमा किए गए टैक्स के पैसे से दी जाती है  जो जिन भर धक्के खाकर  बड़े परिश्रम पूर्वक जो धन कमाते हैं उससे टैक्स रूप में जो धन सरकार को  देते हैं वही सैलरी रूप में बाँटा जाता है वे लोग भी चाहते हैं कि उनके धन का भी सदुपयोग देश की स्थिति सुधारने में हो और बच्चों का भविष्य बने देश की गरीबत दूर हो ! 

    इसप्रकार धनी लोगों के द्वारा दिए जाने वाले  टैक्स का देश के विकास में सदुपयोग होता है जो  देना उनका कर्तव्य भी है।उस टैक्स का दूसरा उपयोग आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आगे लाने के लिए होता है यह उन गरीबों पर कृपा पूर्ण ऋण होता है वह भी इस उद्देश्य से कि आपके बच्चे भी पढ़ लिखकर कल उन्नति करेंगे इसी प्रकार उनके द्वारा भी टैक्स  में दिया गया पैसा कुछ और गरीब बच्चों की उन्नति में सहायक होगा इस प्रकार धीरे धीरे देश की सामाजिक  स्थिति  में  सुधार  होगा। वे बच्चे भी कभी इस देश की दशा को सुधारने के लिए  सहयोग देने  में सहायक हो सकते हैं। 

    आज एक सच्चाई है कि मैं कहूँ कुछ भी कोई माने या न माने ये उसकी ईच्छा किन्तु सरकारी शिक्षा में आज बहुत लापरवाही हो रही है इसी परिणाम स्वरूप प्राइवेट वाले मनमानी लूट रहे हैं। 

         मैं अपने बच्चों के एडमीशन के समय बीस से अधिक सरकारी स्कूलों में गया जहाँ शिक्षक लोगों के बिचार   मिले जुले कुछ इस रूप में देखने सुनने को मिले-    

    अलग अलग स्कूलों के अध्यापक या अध्यापिकाओं ने मिल जुल  कर सरकारी शिक्षा व्यवस्था एवं अपने  अधिकारियों को जमकर अपशब्द कहे।  उन्होंने  भोजन और पैसे बाँटने  को गलत बताया ।कोर्स में पढ़ाई जाने वाली किताबों को गंदा एवं बकवास कहा। उन्होंने हमें  बताया कि इसीलिए इन सरकारी किताबों को  हमलोग पढ़ाते नहीं हैं।वहाँ पढ़ने आने वाले बच्चों को दुर्गन्धित शरीर  वाले एवं उनके माता पिता को अकर्मण्य और निकम्मा बताया और साफ साफ कहा गया कि आपको यदि अपने बच्चे का एडमीशन कराना ही है तो करा भले लो, पढ़ाई  की आशा हमसे मत करना! बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी जब तक मैं क्लास में रहूँगी तब तक मेरी इसके बाद आप जानें आपका काम !मैंने पूछा आप क्लास में कब कब रहेंगी ?हँसते हुए उन्होंने कहा हमारे भी तो छोटे छोटे बच्चे हैं इसलिए मेरा स्कूल में रुक पाना बहुत कठिन होता है।

     मैंने कहा कि आगे चलकर अपने बच्चों को हमें प्रतिभा विकास  विद्यालय में पढ़ाना है इसलिए यहाँ इंग्लिश मीडियम में कराना चाह्ता हूँ।यह सुनकर  सबने मिलकर हमारी खूब हँसी उड़ाई और समझाया कि कुछ कमाया धमाया भी करो क्या करते हैं आप? यदि वास्तव में अपने बच्चे को पढ़ाने की ईच्छा रखते हो तो प्राइवेट में पढ़ा लो सेंट जोसफ में मेरे बच्चे पढ़ते हैं।मैंने कहा कि फ्री शिक्षा देती है सरकार तो वहाँ क्यों पढ़ा लूँ ?यहाँ ही पढ़ाऊँगा यह सुनकर उन्होंने कहा कि कहीं भी पढ़ा लो पढ़ने वाला पढ़ ही लेता है वैसे फ्री में शिक्षा क्या मिट्टी भी नहीं मिलती है। मैंने कहा किन्तु यह तो सरकार की शिक्षा व्यवस्था है तो उन्होंने कहा यह तो ठीक है किन्तु यदि शिक्षक पढ़ाएँगे  ही नहीं तो क्या कर लेगी सरकार?पढ़ाना तो हमें ही है हम आपको सही सलाह दे रहे हैं फ़िर भी  यदि आपको समझ में नहीं आता है तो पढ़ा लीजिए न !!!

       इसलिए पढ़ने वाला अच्छा होना चाहिए कहीं भी पढ़ लेगा एडमीशन आप करवा लो पढ़ाई के लिए ट्यूशन लगवा देना। खैर,  मेरी और कोई जिम्मेदारी नहीं है हाँ, पास जरूर  करवा दूँगी सरकार का आदेश है कि किसी को भी फेल नहीं करना है!!!यह सब सुनकर अत्यंत तनाव में मैं घर चला आया।

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु  ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी नीतिगत  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।



 

The Education Of Govern Ment Schools Just Like a Jokes

          सरकारी स्कूलों की पढ़ाई या मजाक !

     प्रशासन एवं कानून व्यवस्था का प्रश्न उठने पर एक बात  स्पष्ट है कि ऐसे दुर्व्यवहारों या किसी प्रकार की आपराधिक या भ्रष्टाचार सम्बन्धी गतिविधि के लिए केवल  पुलिस विभाग ही क्यों सरकार का हर विभाग जिम्मेदार है हर विभाग में लापरवाही है फिर केवल पुलिस पर दोष क्यों मढ़ा जा रहा है?यदि केवल पुलिस का दोष होता तो अब तक कुछ  नियंत्रण  जरूर  होता किन्तु दुर्घनाएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं।इसका साफ साफ अर्थ है कि समस्या की जड़ें कहीं और भी हैं।इन पर कानून और पुलिस का भय उतना होता नहीं दिख रहा है जितनी इससे आशा लगा रखी गई है।  

      मैं मानता हूँ कि अपराध मन से सोचे जाते शरीर से किए जाते हैं मुख्यरूप से  तो सोच बदलने की ज़रूरत है ।सोच बदल  पाना   यदि किसी के अपने बश में होता तो संभवतः वह बदल भी सकता था  क्योंकि हर किसी को पता होता है कि बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है। उस पर भी  अपराधों की सजा के रूप में फाँसी तक की चर्चा बड़ी जोर शोर से है दूसरी ओर  अपराधियों को पकड़ने की हाईटेक तकनीक है फिर भी यदि कोई सोचे कि वह अपने अपराध को छिपा ले जाएगा तो यह उसकी गलत धारणा ही होगी इसलिए ऐसा सोचना उचित  नहीं है। मेरा अनुमान  है कि अपराध की गंभीरता  एवं सजा की भयंकरता ठीक ठीक प्रकार से जानते समझते हुए भी वर्तमान समय में सारे अपराध किए  जा रहे हैं किन्तु मन पर उनका बश नहीं है। इसलिए अपराधी प्रवृत्ति दिनोदिन बढ़ रही है। मन पर नियंत्रण करने के लिए  धर्म एवं अध्यात्म की आवश्यकता है वही सक्षम भी  है किन्तु इसकी शिक्षा कैसे दी जाए? कौन दे? कहाँ दे? इसकी कोई सरकारी योजना नहीं दिखती है।धर्म एवं अध्यात्म के प्राइवेट  प्रशिक्षण में पाखंड इतना अधिक है कि उसका समाज पर कोई सात्विक असर नहीं हो पा रहा है।इसलिए  धर्म एवं अध्यात्म शिक्षा की आशा ही किससे करे ?

     अब दूसरी बड़ी यह बात है कि  धर्म एवं अध्यात्म की शिक्षा सबको मिलनी चाहिए यदि यह संभव न हो तो नैतिक शिक्षा यदि वह भी संभव न हो तो कम से कम शिक्षा तो सबको मिलनी ही चाहिए, किन्तु धर्म एवं अध्यात्म की शिक्षा तथा नैतिक शिक्षा  देने की बात तो दूर है सरकार द्वारा दी जा रही साधारण शिक्षा का भी कितना बुरा हाल है कोई जाकर देखे तो सही सारे  रहस्य की एक एक पर्त खुलती चली जाएगी। दूर की बात क्या कहूँ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सरकार के विद्यालयों से लेकर एम.सी.डी. तक के विद्यालयों में पाठ्य क्रम की किताबों की पाठ्य विषय वस्तु से लेकर उन्हें शिक्षण कार्य आदि सबकुछ असंतोष जनक है।पहली बात तो विद्यालयों में शिक्षकों की  उपस्थिति नहीं है जो अध्यापक आते भी हैं वे कक्षाओं में नहीं जाते हैं प्रार्थना में नहीं खड़े होना चाहते कोई बहाना बनाकर बीच से चले जाते हैं।जो कक्षाओं में जाते भी हैं वे फोन में लगे रहते हैं।कभी कदाचित बच्चों को कुछ लिखने पढ़ने को बताते भी हैं तो परायों जैसा व्यवहार  होता है।जब मन आता है तो छुट्टी कर देते हैं।कोई अधिकारी वहाँ झाँकने नहीं जाता है जहाँ जाते भी हैं वे बेमन जाते हैं इसलिए उनका वहाँ के शिक्षकों में कोई दबाव नहीं होता है।इसके जो भी कारण हों।पूछने पर अधिकारियों से लेकर अध्यापकों तक सबका  अपना अपना रोना धोना है किन्तु शिक्षा पर किसी की जवाब देही नहीं होनी चाहिए क्या ?माना की सरकार की लापरवाही या अन्य किसी कारण से जहाँ 12 अध्यापक होने चाहिए वहाँ 10 ही होंगे तो उन दस को  तो पढ़ाना  चाहिए ।मजे की बात यह है कि वो न केवल पढ़ाते नहीं हैं अपितु हर अधिकारी पर हावी होते रहते हैं अपनी बड़ी से बड़ी लापरवाही को उन दो अध्यापकों की कमी में लपेट कर परोसा करते हैं। इस डर से अधिकारी अध्यापकों के सामने पड़ने से कतराया करते हैं और शिक्षकों की स्वतंत्रता बरक़रार बनी रहती है। 

  बंधुओं !जब ये दुर्दशा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विद्यालयों की है तब  देश के अन्य प्रदेशों, शहरों, कस्बों, गावों या दूर दराज के गाँवों में सरकारी शिक्षा कैसी होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। जैसी शिक्षा वैसे संस्कार !

   आखिर क्या कारण है कि आज कोई शिक्षित,संभ्रांत,संपन्न या  सक्षम व्यक्ति अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहता है।ग्राम प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक किसके बच्चे पढ़ते हैं सरकारी विद्यालयों में? यदि जनप्रतिनिधियों के बच्चे भी यहाँ पढ़ रहे होते तो भी इतनी लापरवाही नहीं होती ! रही बात गरीबों की तो सच्चाई यह भी है कि अपने बच्चों को पढ़ाना गरीब  लोग भी सरकारी स्कूलों में नहीं चाहते हैं किन्तु प्राइवेट में पढ़ाने के लिए धन नहीं है इसलिए मजबूरी में सरकारी स्कूलों में पढ़ाना पड़ रहा है।सरकारीकर्मचारी,शिक्षा  अधिकारी,स्कूल कर्मचारी यहाँ तक  कि सरकारी स्कूलों के अध्यापक भी अपने बच्चों को अपने स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते हैं आखिर क्यों ?सरकार को हमारी बात न मानकर इन विषयों की उच्चस्तरीय  जाँच करानी चाहिए।जो तथ्य सामने आएँगे वो सरकारी विद्यालयों की वर्तमान शिक्षा  व्यवस्था    के लिए अत्यंत भयावह होंगे।

      जिन गरीबों के बच्चे पैसे के अभाव में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ नहीं सकते सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है। वो खाली दिमाग कहीं तो जाएगा कुछ तो करेगा ही ? हो न हो वह स्कूलों में हो रही शैक्षणिक  लापरवाही का ही नतीजा हो आज का आपराधिक वातावरण ?तो इसमें पुलिस का क्या दोष?इसमें सरकार एवं सरकार की शिक्षा नीतियाँ ही जिम्मेदार हैं सरकार के शिक्षकों की लापरवाही जिम्मेदार है। सरकार की शिक्षा के प्रति उपेक्षा जिम्मेदार है।   

      इसके लिए सरकार के इंतजाम इतने हास्यास्पद हैं कि कभी सोच सोचकर लगता है कि आज की सरकारी शैक्षणिक लापरवाही के शिकार शिक्षा संस्कार विहीन युवाओं की फौज  भारतीय समाज को भविष्य में जब अपने आगोश में लेगी तब वह दृश्य कितना भयंकर होगा कभी कभी यह सोच सोच कर मन सिहर उठता है! 

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु  ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी नीतिगत  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है

Who Is Responsible For Poor Education In Government Schools ?

   भारत में सरकारी स्कूलों की आखिर जरूरत क्या है 

    प्रशासन एवं कानून व्यवस्था का प्रश्न उठने पर एक बात  स्पष्ट है कि ऐसे दुर्व्यवहारों या किसी प्रकार की आपराधिक या भ्रष्टाचार सम्बन्धी गतिविधि के लिए केवल  पुलिस विभाग ही क्यों सरकार का हर विभाग जिम्मेदार है हर विभाग में लापरवाही है फिर केवल पुलिस पर दोष क्यों मढ़ा जा रहा है?यदि केवल पुलिस का दोष होता तो अब तक कुछ  नियंत्रण  जरूर  होता किन्तु दुर्घनाएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं।इसका साफ साफ अर्थ है कि समस्या की जड़ें कहीं और भी हैं।इन पर कानून और पुलिस का भय उतना होता नहीं दिख रहा है जितनी इससे आशा लगा रखी गई है।  

      मैं मानता हूँ कि अपराध मन से सोचे जाते शरीर से किए जाते हैं मुख्यरूप से  तो सोच बदलने की ज़रूरत है ।सोच बदल  पाना   यदि किसी के अपने बश में होता तो संभवतः वह बदल भी सकता था  क्योंकि हर किसी को पता होता है कि बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है। उस पर भी  अपराधों की सजा के रूप में फाँसी तक की चर्चा बड़ी जोर शोर से है दूसरी ओर  अपराधियों को पकड़ने की हाईटेक तकनीक है फिर भी यदि कोई सोचे कि वह अपने अपराध को छिपा ले जाएगा तो यह उसकी गलत धारणा ही होगी इसलिए ऐसा सोचना उचित  नहीं है। मेरा अनुमान  है कि अपराध की गंभीरता  एवं सजा की भयंकरता ठीक ठीक प्रकार से जानते समझते हुए भी वर्तमान समय में सारे अपराध किए  जा रहे हैं किन्तु मन पर उनका बश नहीं है। इसलिए अपराधी प्रवृत्ति दिनोदिन बढ़ रही है। मन पर नियंत्रण करने के लिए  धर्म एवं अध्यात्म की आवश्यकता है वही सक्षम भी  है किन्तु इसकी शिक्षा कैसे दी जाए? कौन दे? कहाँ दे? इसकी कोई सरकारी योजना नहीं दिखती है।धर्म एवं अध्यात्म के प्राइवेट  प्रशिक्षण में पाखंड इतना अधिक है कि उसका समाज पर कोई सात्विक असर नहीं हो पा रहा है।इसलिए  धर्म एवं अध्यात्म शिक्षा की आशा ही किससे करे ?

     अब दूसरी बड़ी यह बात है कि  धर्म एवं अध्यात्म की शिक्षा सबको मिलनी चाहिए यदि यह संभव न हो तो नैतिक शिक्षा यदि वह भी संभव न हो तो कम से कम शिक्षा तो सबको मिलनी ही चाहिए, किन्तु धर्म एवं अध्यात्म की शिक्षा तथा नैतिक शिक्षा  देने की बात तो दूर है सरकार द्वारा दी जा रही साधारण शिक्षा का भी कितना बुरा हाल है कोई जाकर देखे तो सही सारे  रहस्य की एक एक पर्त खुलती चली जाएगी। दूर की बात क्या कहूँ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सरकार के विद्यालयों से लेकर एम.सी.डी. तक के विद्यालयों में पाठ्य क्रम की किताबों की पाठ्य विषय वस्तु से लेकर उन्हें शिक्षण कार्य आदि सबकुछ असंतोष जनक है।पहली बात तो विद्यालयों में शिक्षकों की  उपस्थिति नहीं है जो अध्यापक आते भी हैं वे कक्षाओं में नहीं जाते हैं प्रार्थना में नहीं खड़े होना चाहते कोई बहाना बनाकर बीच से चले जाते हैं।जो कक्षाओं में जाते भी हैं वे फोन में लगे रहते हैं।कभी कदाचित बच्चों को कुछ लिखने पढ़ने को बताते भी हैं तो परायों जैसा व्यवहार  होता है।जब मन आता है तो छुट्टी कर देते हैं।कोई अधिकारी वहाँ झाँकने नहीं जाता है जहाँ जाते भी हैं वे बेमन जाते हैं इसलिए उनका वहाँ के शिक्षकों में कोई दबाव नहीं होता है।इसके जो भी कारण हों।पूछने पर अधिकारियों से लेकर अध्यापकों तक सबका  अपना अपना रोना धोना है किन्तु शिक्षा पर किसी की जवाब देही नहीं होनी चाहिए क्या ?माना की सरकार की लापरवाही या अन्य किसी कारण से जहाँ 12 अध्यापक होने चाहिए वहाँ 10 ही होंगे तो उन दस को  तो पढ़ाना  चाहिए ।मजे की बात यह है कि वो न केवल पढ़ाते नहीं हैं अपितु हर अधिकारी पर हावी होते रहते हैं अपनी बड़ी से बड़ी लापरवाही को उन दो अध्यापकों की कमी में लपेट कर परोसा करते हैं। इस डर से अधिकारी अध्यापकों के सामने पड़ने से कतराया करते हैं और शिक्षकों की स्वतंत्रता बरक़रार बनी रहती है। 

  बंधुओं !जब ये दुर्दशा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विद्यालयों की है तब  देश के अन्य प्रदेशों, शहरों, कस्बों, गावों या दूर दराज के गाँवों में सरकारी शिक्षा कैसी होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। जैसी शिक्षा वैसे संस्कार !

   आखिर क्या कारण है कि आज कोई शिक्षित,संभ्रांत,संपन्न या  सक्षम व्यक्ति अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहता है।ग्राम प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक किसके बच्चे पढ़ते हैं सरकारी विद्यालयों में? यदि जनप्रतिनिधियों के बच्चे भी यहाँ पढ़ रहे होते तो भी इतनी लापरवाही नहीं होती ! रही बात गरीबों की तो सच्चाई यह भी है कि अपने बच्चों को पढ़ाना गरीब  लोग भी सरकारी स्कूलों में नहीं चाहते हैं किन्तु प्राइवेट में पढ़ाने के लिए धन नहीं है इसलिए मजबूरी में सरकारी स्कूलों में पढ़ाना पड़ रहा है।सरकारीकर्मचारी,शिक्षा  अधिकारी,स्कूल कर्मचारी यहाँ तक  कि सरकारी स्कूलों के अध्यापक भी अपने बच्चों को अपने स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते हैं आखिर क्यों ?सरकार को हमारी बात न मानकर इन विषयों की उच्चस्तरीय  जाँच करानी चाहिए।जो तथ्य सामने आएँगे वो सरकारी विद्यालयों की वर्तमान शिक्षा  व्यवस्था    के लिए अत्यंत भयावह होंगे।

      जिन गरीबों के बच्चे पैसे के अभाव में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ नहीं सकते सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है। वो खाली दिमाग कहीं तो जाएगा कुछ तो करेगा ही ? हो न हो वह स्कूलों में हो रही शैक्षणिक  लापरवाही का ही नतीजा हो आज का आपराधिक वातावरण ?तो इसमें पुलिस का क्या दोष?इसमें सरकार एवं सरकार की शिक्षा नीतियाँ ही जिम्मेदार हैं सरकार के शिक्षकों की लापरवाही जिम्मेदार है। सरकार की शिक्षा के प्रति उपेक्षा जिम्मेदार है।   

      इसके लिए सरकार के इंतजाम इतने हास्यास्पद हैं कि कभी सोच सोचकर लगता है कि आज की सरकारी शैक्षणिक लापरवाही के शिकार शिक्षा संस्कार विहीन युवाओं की फौज  भारतीय समाज को भविष्य में जब अपने आगोश में लेगी तब वह दृश्य कितना भयंकर होगा कभी कभी यह सोच सोच कर मन सिहर उठता है! 

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु  ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी नीतिगत  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।



 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

System Of Poors Education Is Very Poor In India

             गरीबों की गरीबत शिक्षा के लिए मुशीबत !

    प्रशासन एवं कानून व्यवस्था का प्रश्न उठने पर एक बात  स्पष्ट है कि ऐसे दुर्व्यवहारों या किसी प्रकार की आपराधिक या भ्रष्टाचार सम्बन्धी गतिविधि के लिए केवल  पुलिस विभाग ही क्यों सरकार का हर विभाग जिम्मेदार है हर विभाग में लापरवाही है फिर केवल पुलिस पर दोष क्यों मढ़ा जा रहा है?यदि केवल पुलिस का दोष होता तो अब तक कुछ  नियंत्रण  जरूर  होता किन्तु दुर्घनाएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं।इसका साफ साफ अर्थ है कि समस्या की जड़ें कहीं और भी हैं।इन पर कानून और पुलिस का भय उतना होता नहीं दिख रहा है जितनी इससे आशा लगा रखी गई है।  

      मैं मानता हूँ कि अपराध मन से सोचे जाते शरीर से किए जाते हैं मुख्यरूप से  तो सोच बदलने की ज़रूरत है ।सोच बदल  पाना   यदि किसी के अपने बश में होता तो संभवतः वह बदल भी सकता था  क्योंकि हर किसी को पता होता है कि बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है। उस पर भी  अपराधों की सजा के रूप में फाँसी तक की चर्चा बड़ी जोर शोर से है दूसरी ओर  अपराधियों को पकड़ने की हाईटेक तकनीक है फिर भी यदि कोई सोचे कि वह अपने अपराध को छिपा ले जाएगा तो यह उसकी गलत धारणा ही होगी इसलिए ऐसा सोचना उचित  नहीं है। मेरा अनुमान  है कि अपराध की गंभीरता  एवं सजा की भयंकरता ठीक ठीक प्रकार से जानते समझते हुए भी वर्तमान समय में सारे अपराध किए  जा रहे हैं किन्तु मन पर उनका बश नहीं है। इसलिए अपराधी प्रवृत्ति दिनोदिन बढ़ रही है। मन पर नियंत्रण करने के लिए  धर्म एवं अध्यात्म की आवश्यकता है वही सक्षम भी  है किन्तु इसकी शिक्षा कैसे दी जाए? कौन दे? कहाँ दे? इसकी कोई सरकारी योजना नहीं दिखती है।धर्म एवं अध्यात्म के प्राइवेट  प्रशिक्षण में पाखंड इतना अधिक है कि उसका समाज पर कोई सात्विक असर नहीं हो पा रहा है।इसलिए  धर्म एवं अध्यात्म शिक्षा की आशा ही किससे करे ?

     अब दूसरी बड़ी यह बात है कि  धर्म एवं अध्यात्म की शिक्षा सबको मिलनी चाहिए यदि यह संभव न हो तो नैतिक शिक्षा यदि वह भी संभव न हो तो कम से कम शिक्षा तो सबको मिलनी ही चाहिए, किन्तु धर्म एवं अध्यात्म की शिक्षा तथा नैतिक शिक्षा  देने की बात तो दूर है सरकार द्वारा दी जा रही साधारण शिक्षा का भी कितना बुरा हाल है कोई जाकर देखे तो सही सारे  रहस्य की एक एक पर्त खुलती चली जाएगी। दूर की बात क्या कहूँ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सरकार के विद्यालयों से लेकर एम.सी.डी. तक के विद्यालयों में पाठ्य क्रम की किताबों की पाठ्य विषय वस्तु से लेकर उन्हें शिक्षण कार्य आदि सबकुछ असंतोष जनक है।पहली बात तो विद्यालयों में शिक्षकों की  उपस्थिति नहीं है जो अध्यापक आते भी हैं वे कक्षाओं में नहीं जाते हैं प्रार्थना में नहीं खड़े होना चाहते कोई बहाना बनाकर बीच से चले जाते हैं।जो कक्षाओं में जाते भी हैं वे फोन में लगे रहते हैं।कभी कदाचित बच्चों को कुछ लिखने पढ़ने को बताते भी हैं तो परायों जैसा व्यवहार  होता है।जब मन आता है तो छुट्टी कर देते हैं।कोई अधिकारी वहाँ झाँकने नहीं जाता है जहाँ जाते भी हैं वे बेमन जाते हैं इसलिए उनका वहाँ के शिक्षकों में कोई दबाव नहीं होता है।इसके जो भी कारण हों।पूछने पर अधिकारियों से लेकर अध्यापकों तक सबका  अपना अपना रोना धोना है किन्तु शिक्षा पर किसी की जवाब देही नहीं होनी चाहिए क्या ?माना की सरकार की लापरवाही या अन्य किसी कारण से जहाँ 12 अध्यापक होने चाहिए वहाँ 10 ही होंगे तो उन दस को  तो पढ़ाना  चाहिए ।मजे की बात यह है कि वो न केवल पढ़ाते नहीं हैं अपितु हर अधिकारी पर हावी होते रहते हैं अपनी बड़ी से बड़ी लापरवाही को उन दो अध्यापकों की कमी में लपेट कर परोसा करते हैं। इस डर से अधिकारी अध्यापकों के सामने पड़ने से कतराया करते हैं और शिक्षकों की स्वतंत्रता बरक़रार बनी रहती है। 

  बंधुओं !जब ये दुर्दशा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विद्यालयों की है तब  देश के अन्य प्रदेशों, शहरों, कस्बों, गावों या दूर दराज के गाँवों में सरकारी शिक्षा कैसी होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। जैसी शिक्षा वैसे संस्कार !

   आखिर क्या कारण है कि आज कोई शिक्षित,संभ्रांत,संपन्न या  सक्षम व्यक्ति अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहता है।ग्राम प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक किसके बच्चे पढ़ते हैं सरकारी विद्यालयों में? यदि जनप्रतिनिधियों के बच्चे भी यहाँ पढ़ रहे होते तो भी इतनी लापरवाही नहीं होती ! रही बात गरीबों की तो सच्चाई यह भी है कि अपने बच्चों को पढ़ाना गरीब  लोग भी सरकारी स्कूलों में नहीं चाहते हैं किन्तु प्राइवेट में पढ़ाने के लिए धन नहीं है इसलिए मजबूरी में सरकारी स्कूलों में पढ़ाना पड़ रहा है।सरकारीकर्मचारी,शिक्षा  अधिकारी,स्कूल कर्मचारी यहाँ तक  कि सरकारी स्कूलों के अध्यापक भी अपने बच्चों को अपने स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते हैं आखिर क्यों ?सरकार को हमारी बात न मानकर इन विषयों की उच्चस्तरीय  जाँच करानी चाहिए।जो तथ्य सामने आएँगे वो सरकारी विद्यालयों की वर्तमान शिक्षा  व्यवस्था    के लिए अत्यंत भयावह होंगे।

      जिन गरीबों के बच्चे पैसे के अभाव में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ नहीं सकते सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है। वो खाली दिमाग कहीं तो जाएगा कुछ तो करेगा ही ? हो न हो वह स्कूलों में हो रही शैक्षणिक  लापरवाही का ही नतीजा हो आज का आपराधिक वातावरण ?तो इसमें पुलिस का क्या दोष?इसमें सरकार एवं सरकार की शिक्षा नीतियाँ ही जिम्मेदार हैं सरकार के शिक्षकों की लापरवाही जिम्मेदार है। सरकार की शिक्षा के प्रति उपेक्षा जिम्मेदार है।   

      इसके लिए सरकार के इंतजाम इतने हास्यास्पद हैं कि कभी सोच सोचकर लगता है कि आज की सरकारी शैक्षणिक लापरवाही के शिकार शिक्षा संस्कार विहीन युवाओं की फौज  भारतीय समाज को भविष्य में जब अपने आगोश में लेगी तब वह दृश्य कितना भयंकर होगा कभी कभी यह सोच सोच कर मन सिहर उठता है! 

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु  ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी नीतिगत  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है

Jaisi Sarkar Vaise Sanskar Kaise Ruke Balatkar ?

         सरकारी विद्यालयों लक्ष्य हीन गंतव्य 

       प्रशासन एवं कानून व्यवस्था का प्रश्न उठने पर एक बात  स्पष्ट है कि ऐसे दुर्व्यवहारों या किसी प्रकार की आपराधिक या भ्रष्टाचार सम्बन्धी गतिविधि के लिए केवल  पुलिस विभाग ही क्यों सरकार का हर विभाग जिम्मेदार है हर विभाग में लापरवाही है फिर केवल पुलिस पर दोष क्यों मढ़ा जा रहा है?यदि केवल पुलिस का दोष होता तो अब तक कुछ  नियंत्रण  जरूर  होता किन्तु दुर्घनाएँ दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं।इसका साफ साफ अर्थ है कि समस्या की जड़ें कहीं और भी हैं।इन पर कानून और पुलिस का भय उतना होता नहीं दिख रहा है जितनी इससे आशा लगा रखी गई है।  

      मैं मानता हूँ कि अपराध मन से सोचे जाते शरीर से किए जाते हैं मुख्यरूप से  तो सोच बदलने की ज़रूरत है ।सोच बदल  पाना   यदि किसी के अपने बश में होता तो संभवतः वह बदल भी सकता था  क्योंकि हर किसी को पता होता है कि बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है। उस पर भी  अपराधों की सजा के रूप में फाँसी तक की चर्चा बड़ी जोर शोर से है दूसरी ओर  अपराधियों को पकड़ने की हाईटेक तकनीक है फिर भी यदि कोई सोचे कि वह अपने अपराध को छिपा ले जाएगा तो यह उसकी गलत धारणा ही होगी इसलिए ऐसा सोचना उचित  नहीं है। मेरा अनुमान  है कि अपराध की गंभीरता  एवं सजा की भयंकरता ठीक ठीक प्रकार से जानते समझते हुए भी वर्तमान समय में सारे अपराध किए  जा रहे हैं किन्तु मन पर उनका बश नहीं है। इसलिए अपराधी प्रवृत्ति दिनोदिन बढ़ रही है। मन पर नियंत्रण करने के लिए  धर्म एवं अध्यात्म की आवश्यकता है वही सक्षम भी  है किन्तु इसकी शिक्षा कैसे दी जाए? कौन दे? कहाँ दे? इसकी कोई सरकारी योजना नहीं दिखती है।धर्म एवं अध्यात्म के प्राइवेट  प्रशिक्षण में पाखंड इतना अधिक है कि उसका समाज पर कोई सात्विक असर नहीं हो पा रहा है।इसलिए  धर्म एवं अध्यात्म शिक्षा की आशा ही किससे करे ?

     अब दूसरी बड़ी यह बात है कि  धर्म एवं अध्यात्म की शिक्षा सबको मिलनी चाहिए यदि यह संभव न हो तो नैतिक शिक्षा यदि वह भी संभव न हो तो कम से कम शिक्षा तो सबको मिलनी ही चाहिए, किन्तु धर्म एवं अध्यात्म की शिक्षा तथा नैतिक शिक्षा  देने की बात तो दूर है सरकार द्वारा दी जा रही साधारण शिक्षा का भी कितना बुरा हाल है कोई जाकर देखे तो सही सारे  रहस्य की एक एक पर्त खुलती चली जाएगी। दूर की बात क्या कहूँ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सरकार के विद्यालयों से लेकर एम.सी.डी. तक के विद्यालयों में पाठ्य क्रम की किताबों की पाठ्य विषय वस्तु से लेकर उन्हें शिक्षण कार्य आदि सबकुछ असंतोष जनक है।पहली बात तो विद्यालयों में शिक्षकों की  उपस्थिति नहीं है जो अध्यापक आते भी हैं वे कक्षाओं में नहीं जाते हैं प्रार्थना में नहीं खड़े होना चाहते कोई बहाना बनाकर बीच से चले जाते हैं।जो कक्षाओं में जाते भी हैं वे फोन में लगे रहते हैं।कभी कदाचित बच्चों को कुछ लिखने पढ़ने को बताते भी हैं तो परायों जैसा व्यवहार  होता है।जब मन आता है तो छुट्टी कर देते हैं।कोई अधिकारी वहाँ झाँकने नहीं जाता है जहाँ जाते भी हैं वे बेमन जाते हैं इसलिए उनका वहाँ के शिक्षकों में कोई दबाव नहीं होता है।इसके जो भी कारण हों।पूछने पर अधिकारियों से लेकर अध्यापकों तक सबका  अपना अपना रोना धोना है किन्तु शिक्षा पर किसी की जवाब देही नहीं होनी चाहिए क्या ?माना की सरकार की लापरवाही या अन्य किसी कारण से जहाँ 12 अध्यापक होने चाहिए वहाँ 10 ही होंगे तो उन दस को  तो पढ़ाना  चाहिए ।मजे की बात यह है कि वो न केवल पढ़ाते नहीं हैं अपितु हर अधिकारी पर हावी होते रहते हैं अपनी बड़ी से बड़ी लापरवाही को उन दो अध्यापकों की कमी में लपेट कर परोसा करते हैं। इस डर से अधिकारी अध्यापकों के सामने पड़ने से कतराया करते हैं और शिक्षकों की स्वतंत्रता बरक़रार बनी रहती है। 

  बंधुओं !जब ये दुर्दशा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विद्यालयों की है तब  देश के अन्य प्रदेशों, शहरों, कस्बों, गावों या दूर दराज के गाँवों में सरकारी शिक्षा कैसी होगी इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। जैसी शिक्षा वैसे संस्कार !

   आखिर क्या कारण है कि आज कोई शिक्षित,संभ्रांत,संपन्न या  सक्षम व्यक्ति अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहता है।ग्राम प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक किसके बच्चे पढ़ते हैं सरकारी विद्यालयों में? यदि जनप्रतिनिधियों के बच्चे भी यहाँ पढ़ रहे होते तो भी इतनी लापरवाही नहीं होती ! रही बात गरीबों की तो सच्चाई यह भी है कि अपने बच्चों को पढ़ाना गरीब  लोग भी सरकारी स्कूलों में नहीं चाहते हैं किन्तु प्राइवेट में पढ़ाने के लिए धन नहीं है इसलिए मजबूरी में सरकारी स्कूलों में पढ़ाना पड़ रहा है।सरकारीकर्मचारी,शिक्षा  अधिकारी,स्कूल कर्मचारी यहाँ तक  कि सरकारी स्कूलों के अध्यापक भी अपने बच्चों को अपने स्कूलों में नहीं पढ़ाना चाहते हैं आखिर क्यों ?सरकार को हमारी बात न मानकर इन विषयों की उच्चस्तरीय  जाँच करानी चाहिए।जो तथ्य सामने आएँगे वो सरकारी विद्यालयों की वर्तमान शिक्षा  व्यवस्था    के लिए अत्यंत भयावह होंगे।

      जिन गरीबों के बच्चे पैसे के अभाव में प्राइवेट स्कूलों में पढ़ नहीं सकते सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है। वो खाली दिमाग कहीं तो जाएगा कुछ तो करेगा ही ? हो न हो वह स्कूलों में हो रही शैक्षणिक  लापरवाही का ही नतीजा हो आज का आपराधिक वातावरण ?तो इसमें पुलिस का क्या दोष?इसमें सरकार एवं सरकार की शिक्षा नीतियाँ ही जिम्मेदार हैं सरकार के शिक्षकों की लापरवाही जिम्मेदार है। सरकार की शिक्षा के प्रति उपेक्षा जिम्मेदार है।   

      इसके लिए सरकार के इंतजाम इतने हास्यास्पद हैं कि कभी सोच सोचकर लगता है कि आज की सरकारी शैक्षणिक लापरवाही के शिकार शिक्षा संस्कार विहीन युवाओं की फौज  भारतीय समाज को भविष्य में जब अपने आगोश में लेगी तब वह दृश्य कितना भयंकर होगा कभी कभी यह सोच सोच कर मन सिहर उठता है! 

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

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     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

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