भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को न सफलता मिलती है और न ही सुख ! विवाह, विद्या ,मकान, दुकान ,व्यापार, परिवार, पद, प्रतिष्ठा,संतान आदि का सुख हर कोई अच्छा से अच्छा चाहता है किंतु मिलता उसे उतना ही है जितना उसके भाग्य में होता है और तभी मिलता है जब जो सुख मिलने का समय आता है अन्यथा कितना भी प्रयास करे सफलता नहीं मिलती है ! ऋतुएँ भी समय से ही फल देती हैं इसलिए अपने भाग्य और समय की सही जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए |एक बार अवश्य देखिए -http://www.drsnvajpayee.com/
Tuesday, August 27, 2013
राम भक्त संतों संगठनों को सरकार शंका की दृष्टि से क्यों देखती है ?
अयोध्या की परिक्रमा से परेशान राजनेताओं के झुंड!
अधिकांश राजनेता राजनैतिक दल एवं सरकारें श्री राम भक्तों का अकारण उत्पीड़न केवल इसीलिए करती रहती हैं जिससे दूसरे समुदाय के लोगों को खुश कर सकें, संभव है कि वो समुदाय ऐसा न भी चाहते हों !अभी तक तो केवल विश्व हिन्दू परिषद् एवं संत समाज का ही यह उद्घोष रहता था किन्तु अब की बार इस पवित्र परिक्रमा यात्रा पर लगाई गई रोक से तो न केवल यह सिद्ध हो गया अपितु सारे विश्व ने देख भी लिया और समझ गया कि देश के संत एवं हिन्दू संगठन हमेंशा से सच ही कहते रहे हैं !क्योंकि बिना किसी तनाव या धमकी के यदि दो ढाई सौ संत प्रतिदिन परिक्रमा करते तो कैसे सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ जाता!
सच तो यह है कि स्वाभिमानी हिन्दुओं को सरकार एवं प्रशासन से एक बार पूछना चाहिए कि हिन्दुओं की किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि साम्प्रदायिक कैसे मान ली जाती है ?दूसरी बात उनके लिए केवल अल्प संख्यकों का वोट ही यदि इतना महत्त्व रखता है तो बहु संख्यक हिन्दू वर्ग को भी चाहिए कि वो भी अपने वोट के महत्त्व को न केवल समझे अपितु संगठित होकर उन्हें इस बात का एहसास भी करावे साथ ही उसी राजनैतिक दल के साथ जुड़े जो हिन्दुओं के सनातन प्रतीकों की रक्षा करने में सक्षम हो,हिन्दुओं के हितों का भी ध्यान रखे, साथ ही रामराज्य की पावन परम्पराओं के पथ पर अग्रसर रह कर भ्रष्टाचार मुक्त संस्कार युक्त सुशासन दे सके !
जैसा कि कुछ लोगों ने तर्क दिया कि इस चतुर्मास के समय में कोई भी धार्मिक यात्रा नहीं की जा सकती !क्योंकि इसका शास्त्रीय निषेध है! इस पर उनका तर्क है कि श्री राम ने भी बन में अपनी यात्रा रोक दी थी और पर्वत पर रह कर चातुर्मास किया था!
इस पर मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि चातुर्मास एक व्रत होता है कुछ लोग इसका पालन करते हैं कुछ नहीं भी करते हैं जो नहीं करते उन पर चातुर्मास व्रत बल पूर्वक कैसे थोपा जा सकता है?इसका यह मतलब भी नहीं है कि वे अशास्त्रीय हैं क्योंकि वे और और प्रकार के व्रतों का पालन करते हैं उसमें चौरासी कोसी अयोध्या की परिक्रमा भी हो सकती है। ये हिन्दू धर्म के व्रतों की प्रक्रिया है वो जैसे चाहें वैसे करें क्यों नहीं कर सकते ?यदि इससे साम्प्रदायिक तनाव फैल सकता है तो इसमें हिन्दुओं का क्या दोष?इसके लिए वो संप्रदाय जिम्मेदार हैं जो हिन्दुओं के धर्माचरण को सह नहीं पाते हैं! इसमें सरकार को कूदने की क्या जरूरत थी ?
जहाँ तक श्री राम ने बन में अपनी यात्रा रोक दी थी की बात है, उसका अभिप्राय यह है कि बन पर्वत एवं दूर देश की यात्राएँ वर्षा बाढ़ आदि के उपद्रवों से बचने के लिए रोक दी जाती थीं न कि धर्म के लिए! यदि इसका कारण धर्म होता तो केवल धार्मिक लोग ही यात्रा बंद करते किंतु श्री राम अपना चातुर्मास व्रत पूरा होने पर स्वयं लक्ष्मण से कहते हैं कि देखो वर्षा का चातुर्मास समय समाप्त हो गया है इसलिए राजा ,तपस्वी, व्यापारी और भिखारी ये चारों लोग अपना अपना नगर छोड़ कर चल पड़े हैं यथा-
दो.चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि । इससे यह बात साफ हो जाती है कि श्री राम ने चातुर्मास व्रत को धर्म से न जोड़कर अपितु सुरक्षा से जोड़ा है। इस दृष्टि से अयोध्या की परिक्रमा से किसी को क्या आपत्ति होनी चाहिए ?
एक तर्क यह भी दिया गया कि इस समय देवता सो रहे हैं या दक्षिणायन सूर्य हैं इस लिए धार्मिक कार्य करने का निषेध है !इसलिए अयोध्या की परिक्रमा इस समय नहीं होनी चाहिए थी।
इसपर मेरा निवेदन यह है कि काम्य कर्म अर्थात जिस धर्म कार्य के बदले कोई कुछ पाना चाहता है उन्हें करने के लिए तो मुहूर्त का बिचार किया जाता है किंतु निष्काम कर्म अर्थात भक्ति के लिए कोई धर्म कार्य कभी भी किया जा सकता है ।इसलिए अयोध्या की परिक्रमा इस समय होने में किसी को क्या और क्यों आपत्ति है ?
एक तर्क यह भी है कि ऐसी यात्रा पहले कभी नहीं हुई अब क्यों हो रही है ?
इस पर मेरा निवेदन है कि यदि लोकतांत्रिक संबिधान में संशोधन हो सकता है तो धार्मिक संबिधान में क्यों नहीं हो सकता ?वह भी तब जब किसी और को कोई हानि न पहुँच रही हो!
कुछ दलों या लोगों को यदि इस बात की आपत्ति है कि इसमें विश्व हिन्दू परिषद् भाजपा को चुनावी फायदा कराने के लिए ऐसी धार्मिक यात्राओं के आयोजन कर रही है इस लिए यह धार्मिक यात्रा न होकर अपितु राजनैतिक यात्रा आन्दोलन है !
इस पर मेरा निवेदन है कि यदि ऐसा भी है तो इसमें गलत क्या है?वर्तमान समय में देश की परिस्थिति इस प्रकार की बन गई है कि बिना राजनैतिक पकड़ के जब कोई काम होता ही नहीं है तो श्री राम मंदिर कैसे बन जाएगा !ऐसे समय हिन्दुओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न है कि या तो श्री राम मंदिर बनाने की ईच्छा ही छोड़ दी जाए तो ऐसा संभव नहीं है यदि श्री राम मंदिर बनाना ही है तो बलपूर्वक बनाया जाए उससे हिंसा फैलेगी!तीसरा रास्ता कानून बनाकर मंदिर बनाने का है। कानून बनेगा संसद में वो भी सांसदों के बहुमत से,सांसद बनाने के लिए जनता का समर्थन चाहिए ही, जनता का समर्थन पाने के लिए जनता को जगाना और दिखाना होगा कि देखो तुम अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन भी नहीं कर सकते परिक्रमाएँ रोकी जा रही हैं ऐसे श्री राम मंदिर कैसे बना पाओगे?यह बात समाज भी समझेगा कि यदि अपने प्यारे प्रभु श्री राम का मंदिर बनाना है तो अधिक से अधिक सांसद जिताने पड़ेंगे जो सबके सहयोग के बिना संभव नहीं है।इस प्रकार से सामाजिक जन जागरण के लिए संत शांति पूर्ण ढंग से धार्मिक आयोजन करते हैं हिन्दू संगठन होने के नाते विश्व हिन्दू परिषद् का नैतिक दायित्व बनता है कि वो न केवल संतों के संकल्प का समर्थन करे अपितु उसे कार्यान्वित भी करे!जो विश्व हिन्दू परिषद् करता भी है।
वैसे भी हिन्दू संगठन और संत मंदिर बनाने की बात ही करेंगे इसी में उनकी प्रासंगिकता है और यही उनका कर्तव्य है जनता को भी उनसे ऐसी ही अपेक्षा है।इस प्रकार से न केवल श्री राम के मंदिर का निर्माण अपितु समस्त सनातन धर्मावलंबी प्रतीकों मर्यादाओं की सुरक्षा के लिए हिन्दू संगठन और साधू संत इसी पवित्र भावना से प्राण प्रण पूर्वक समर्पित हैं।श्री राम मंदिर निर्माण हेतु सहयोग के लिए ईर्ष्या द्वेष के बिना सभी सम्प्रदायों संगठनों राजनैतिक दलों आदि से सहयोग का आह्वान भी इसी भावना से करते हैं,जैसे श्री राम प्रभु को मनाने के लिए जब भरत जी बन जाते हैं तो जो मिलता उसको प्रणाम तो करते हैं किन्तु उसके प्रति समर्पित नहीं होते समर्पण तो श्री राम प्रभु के प्रति ही रहता है यथा -
करि प्रनाम पूछहिं जेहि तेही।
केहि बन राम लषन वैदेही ॥
यही स्थिति हिन्दू संगठनों और संतों एवं सभी राम भक्तों की भी है ये श्री राम मंदिर विरोधी सम्प्रदायों के प्रमुखों एवं ऐसे राजनेताओं से भी मिलते हैं,जिन राजनैतिक दलों या नेताओं का समर्थन करते हैं उनसे भी मिलते हैं! इन सभी बातों विचारों का पवित्र उद्देश्य तो प्रभु श्री राम की प्रणम्य जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण ही है इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
कुछ लोग कहते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के द्वारा प्रायोजित अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा को बल पूर्वक रोक दिया गया,इन लोगों की पराजय हुई इन्हें जनता का समर्थन नहीं मिला, कुछ धर्म से जुड़े लोगों ने भी इस यात्रा के समय महूर्त परम्परा आदि का सहारा लेकर यात्रा के विरोध में कुछ अशास्त्रीय आधारहीन कुतर्क दिए जिनका कहीं किसी भी मंच पर उद्घोषणा पूर्वक खण्डन किया जा सकता है किसी भी परिस्थिति में निष्काम परिक्रमा या पूजा का कहीं भी निषेध नहीं है।
विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के द्वारा प्रायोजित इस यात्रा का पवित्र उद्देश्य चूँकि श्री राम का मंदिर का निर्माण था तो लक्ष्य पवित्र होने के कारण प्रभु कार्य के लिए किए गए प्रयास यदि न भी सफल हों तो भी प्रयास जन्य पुण्य तो मिलता ही है! रही बात विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के पराजय की तो प्रभु कार्य के लिए मिली पराजय भी पूजा की तरह ही होती है।प्रभु कार्य के पथ पर अग्रसर रामभक्तों का ध्यान जय और पराजय पर होता ही कहाँ है वहाँ तो ध्यान इस पर होता है कि अपने प्रयास में कहीं कोई कमी न रह जाए !जब रामभक्त श्री हनुमान जी लंका में बाँध लिए गए तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा -
मोहिं न कछु बाँधे कर लाजा।
कीन्ह चहहुँ निज प्रभुकर काजा ॥
इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रखते हुए सभी श्री राम भक्त संतों संगठनों आदि के प्रति हम एवं हमारा राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध संस्थान हार्दिक कृतज्ञता करते हैं एवं इस प्रकार के जन जागरण के प्रयास के लिए बारबार आभार प्रकट करते हैं ।
अयोध्या की परिक्रमा पर प्रश्न खड़े करने वालों में ज्ञान की कमी !
अयोध्या की परिक्रमा से परेशान राजनेताओं के झुंड!
अधिकांश राजनेता राजनैतिक दल एवं सरकारें श्री राम भक्तों का अकारण उत्पीड़न केवल इसीलिए करती रहती हैं जिससे दूसरे समुदाय के लोगों को खुश कर सकें, संभव है कि वो समुदाय ऐसा न भी चाहते हों !अभी तक तो केवल विश्व हिन्दू परिषद् एवं संत समाज का ही यह उद्घोष रहता था किन्तु अब की बार इस पवित्र परिक्रमा यात्रा पर लगाई गई रोक से तो न केवल यह सिद्ध हो गया अपितु सारे विश्व ने देख भी लिया और समझ गया कि देश के संत एवं हिन्दू संगठन हमेंशा से सच ही कहते रहे हैं !क्योंकि बिना किसी तनाव या धमकी के यदि दो ढाई सौ संत प्रतिदिन परिक्रमा करते तो कैसे सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ जाता!
सच तो यह है कि स्वाभिमानी हिन्दुओं को सरकार एवं प्रशासन से एक बार पूछना चाहिए कि हिन्दुओं की किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि साम्प्रदायिक कैसे मान ली जाती है ?दूसरी बात उनके लिए केवल अल्प संख्यकों का वोट ही यदि इतना महत्त्व रखता है तो बहु संख्यक हिन्दू वर्ग को भी चाहिए कि वो भी अपने वोट के महत्त्व को न केवल समझे अपितु संगठित होकर उन्हें इस बात का एहसास भी करावे साथ ही उसी राजनैतिक दल के साथ जुड़े जो हिन्दुओं के सनातन प्रतीकों की रक्षा करने में सक्षम हो,हिन्दुओं के हितों का भी ध्यान रखे, साथ ही रामराज्य की पावन परम्पराओं के पथ पर अग्रसर रह कर भ्रष्टाचार मुक्त संस्कार युक्त सुशासन दे सके !
जैसा कि कुछ लोगों ने तर्क दिया कि इस चतुर्मास के समय में कोई भी धार्मिक यात्रा नहीं की जा सकती !क्योंकि इसका शास्त्रीय निषेध है! इस पर उनका तर्क है कि श्री राम ने भी बन में अपनी यात्रा रोक दी थी और पर्वत पर रह कर चातुर्मास किया था!
इस पर मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि चातुर्मास एक व्रत होता है कुछ लोग इसका पालन करते हैं कुछ नहीं भी करते हैं जो नहीं करते उन पर चातुर्मास व्रत बल पूर्वक कैसे थोपा जा सकता है?इसका यह मतलब भी नहीं है कि वे अशास्त्रीय हैं क्योंकि वे और और प्रकार के व्रतों का पालन करते हैं उसमें चौरासी कोसी अयोध्या की परिक्रमा भी हो सकती है। ये हिन्दू धर्म के व्रतों की प्रक्रिया है वो जैसे चाहें वैसे करें क्यों नहीं कर सकते ?यदि इससे साम्प्रदायिक तनाव फैल सकता है तो इसमें हिन्दुओं का क्या दोष?इसके लिए वो संप्रदाय जिम्मेदार हैं जो हिन्दुओं के धर्माचरण को सह नहीं पाते हैं! इसमें सरकार को कूदने की क्या जरूरत थी ?
जहाँ तक श्री राम ने बन में अपनी यात्रा रोक दी थी की बात है, उसका अभिप्राय यह है कि बन पर्वत एवं दूर देश की यात्राएँ वर्षा बाढ़ आदि के उपद्रवों से बचने के लिए रोक दी जाती थीं न कि धर्म के लिए! यदि इसका कारण धर्म होता तो केवल धार्मिक लोग ही यात्रा बंद करते किंतु श्री राम अपना चातुर्मास व्रत पूरा होने पर स्वयं लक्ष्मण से कहते हैं कि देखो वर्षा का चातुर्मास समय समाप्त हो गया है इसलिए राजा ,तपस्वी, व्यापारी और भिखारी ये चारों लोग अपना अपना नगर छोड़ कर चल पड़े हैं यथा-
दो.चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि । इससे यह बात साफ हो जाती है कि श्री राम ने चातुर्मास व्रत को धर्म से न जोड़कर अपितु सुरक्षा से जोड़ा है। इस दृष्टि से अयोध्या की परिक्रमा से किसी को क्या आपत्ति होनी चाहिए ?
एक तर्क यह भी दिया गया कि इस समय देवता सो रहे हैं या दक्षिणायन सूर्य हैं इस लिए धार्मिक कार्य करने का निषेध है !इसलिए अयोध्या की परिक्रमा इस समय नहीं होनी चाहिए थी।
इसपर मेरा निवेदन यह है कि काम्य कर्म अर्थात जिस धर्म कार्य के बदले कोई कुछ पाना चाहता है उन्हें करने के लिए तो मुहूर्त का बिचार किया जाता है किंतु निष्काम कर्म अर्थात भक्ति के लिए कोई धर्म कार्य कभी भी किया जा सकता है ।इसलिए अयोध्या की परिक्रमा इस समय होने में किसी को क्या और क्यों आपत्ति है ?
एक तर्क यह भी है कि ऐसी यात्रा पहले कभी नहीं हुई अब क्यों हो रही है ?
इस पर मेरा निवेदन है कि यदि लोकतांत्रिक संबिधान में संशोधन हो सकता है तो धार्मिक संबिधान में क्यों नहीं हो सकता ?वह भी तब जब किसी और को कोई हानि न पहुँच रही हो!
कुछ दलों या लोगों को यदि इस बात की आपत्ति है कि इसमें विश्व हिन्दू परिषद् भाजपा को चुनावी फायदा कराने के लिए ऐसी धार्मिक यात्राओं के आयोजन कर रही है इस लिए यह धार्मिक यात्रा न होकर अपितु राजनैतिक यात्रा आन्दोलन है !
इस पर मेरा निवेदन है कि यदि ऐसा भी है तो इसमें गलत क्या है?वर्तमान समय में देश की परिस्थिति इस प्रकार की बन गई है कि बिना राजनैतिक पकड़ के जब कोई काम होता ही नहीं है तो श्री राम मंदिर कैसे बन जाएगा !ऐसे समय हिन्दुओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न है कि या तो श्री राम मंदिर बनाने की ईच्छा ही छोड़ दी जाए तो ऐसा संभव नहीं है यदि श्री राम मंदिर बनाना ही है तो बलपूर्वक बनाया जाए उससे हिंसा फैलेगी!तीसरा रास्ता कानून बनाकर मंदिर बनाने का है। कानून बनेगा संसद में वो भी सांसदों के बहुमत से,सांसद बनाने के लिए जनता का समर्थन चाहिए ही, जनता का समर्थन पाने के लिए जनता को जगाना और दिखाना होगा कि देखो तुम अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन भी नहीं कर सकते परिक्रमाएँ रोकी जा रही हैं ऐसे श्री राम मंदिर कैसे बना पाओगे?यह बात समाज भी समझेगा कि यदि अपने प्यारे प्रभु श्री राम का मंदिर बनाना है तो अधिक से अधिक सांसद जिताने पड़ेंगे जो सबके सहयोग के बिना संभव नहीं है।इस प्रकार से सामाजिक जन जागरण के लिए संत शांति पूर्ण ढंग से धार्मिक आयोजन करते हैं हिन्दू संगठन होने के नाते विश्व हिन्दू परिषद् का नैतिक दायित्व बनता है कि वो न केवल संतों के संकल्प का समर्थन करे अपितु उसे कार्यान्वित भी करे!जो विश्व हिन्दू परिषद् करता भी है।
वैसे भी हिन्दू संगठन और संत मंदिर बनाने की बात ही करेंगे इसी में उनकी प्रासंगिकता है और यही उनका कर्तव्य है जनता को भी उनसे ऐसी ही अपेक्षा है।इस प्रकार से न केवल श्री राम के मंदिर का निर्माण अपितु समस्त सनातन धर्मावलंबी प्रतीकों मर्यादाओं की सुरक्षा के लिए हिन्दू संगठन और साधू संत इसी पवित्र भावना से प्राण प्रण पूर्वक समर्पित हैं।श्री राम मंदिर निर्माण हेतु सहयोग के लिए ईर्ष्या द्वेष के बिना सभी सम्प्रदायों संगठनों राजनैतिक दलों आदि से सहयोग का आह्वान भी इसी भावना से करते हैं,जैसे श्री राम प्रभु को मनाने के लिए जब भरत जी बन जाते हैं तो जो मिलता उसको प्रणाम तो करते हैं किन्तु उसके प्रति समर्पित नहीं होते समर्पण तो श्री राम प्रभु के प्रति ही रहता है यथा -
करि प्रनाम पूछहिं जेहि तेही।
केहि बन राम लषन वैदेही ॥
यही स्थिति हिन्दू संगठनों और संतों एवं सभी राम भक्तों की भी है ये श्री राम मंदिर विरोधी सम्प्रदायों के प्रमुखों एवं ऐसे राजनेताओं से भी मिलते हैं,जिन राजनैतिक दलों या नेताओं का समर्थन करते हैं उनसे भी मिलते हैं! इन सभी बातों विचारों का पवित्र उद्देश्य तो प्रभु श्री राम की प्रणम्य जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण ही है इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
कुछ लोग कहते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के द्वारा प्रायोजित अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा को बल पूर्वक रोक दिया गया,इन लोगों की पराजय हुई इन्हें जनता का समर्थन नहीं मिला, कुछ धर्म से जुड़े लोगों ने भी इस यात्रा के समय महूर्त परम्परा आदि का सहारा लेकर यात्रा के विरोध में कुछ अशास्त्रीय आधारहीन कुतर्क दिए जिनका कहीं किसी भी मंच पर उद्घोषणा पूर्वक खण्डन किया जा सकता है किसी भी परिस्थिति में निष्काम परिक्रमा या पूजा का कहीं भी निषेध नहीं है।
विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के द्वारा प्रायोजित इस यात्रा का पवित्र उद्देश्य चूँकि श्री राम का मंदिर का निर्माण था तो लक्ष्य पवित्र होने के कारण प्रभु कार्य के लिए किए गए प्रयास यदि न भी सफल हों तो भी प्रयास जन्य पुण्य तो मिलता ही है! रही बात विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के पराजय की तो प्रभु कार्य के लिए मिली पराजय भी पूजा की तरह ही होती है।प्रभु कार्य के पथ पर अग्रसर रामभक्तों का ध्यान जय और पराजय पर होता ही कहाँ है वहाँ तो ध्यान इस पर होता है कि अपने प्रयास में कहीं कोई कमी न रह जाए !जब रामभक्त श्री हनुमान जी लंका में बाँध लिए गए तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा -
मोहिं न कछु बाँधे कर लाजा।
कीन्ह चहहुँ निज प्रभुकर काजा ॥
इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रखते हुए सभी श्री राम भक्त संतों संगठनों आदि के प्रति हम एवं हमारा राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध संस्थान हार्दिक कृतज्ञता करते हैं एवं इस प्रकार के जन जागरण के प्रयास के लिए बारबार आभार प्रकट करते हैं ।
किसी भी तीर्थ स्थल की परिक्रमा कभी भी हो सकती है
अयोध्या की परिक्रमा से परेशान राजनेताओं के झुंड!
अधिकांश राजनेता राजनैतिक दल एवं सरकारें श्री राम भक्तों का अकारण उत्पीड़न केवल इसीलिए करती रहती हैं जिससे दूसरे समुदाय के लोगों को खुश कर सकें, संभव है कि वो समुदाय ऐसा न भी चाहते हों !अभी तक तो केवल विश्व हिन्दू परिषद् एवं संत समाज का ही यह उद्घोष रहता था किन्तु अब की बार इस पवित्र परिक्रमा यात्रा पर लगाई गई रोक से तो न केवल यह सिद्ध हो गया अपितु सारे विश्व ने देख भी लिया और समझ गया कि देश के संत एवं हिन्दू संगठन हमेंशा से सच ही कहते रहे हैं !क्योंकि बिना किसी तनाव या धमकी के यदि दो ढाई सौ संत प्रतिदिन परिक्रमा करते तो कैसे सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ जाता!
सच तो यह है कि स्वाभिमानी हिन्दुओं को सरकार एवं प्रशासन से एक बार पूछना चाहिए कि हिन्दुओं की किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि साम्प्रदायिक कैसे मान ली जाती है ?दूसरी बात उनके लिए केवल अल्प संख्यकों का वोट ही यदि इतना महत्त्व रखता है तो बहु संख्यक हिन्दू वर्ग को भी चाहिए कि वो भी अपने वोट के महत्त्व को न केवल समझे अपितु संगठित होकर उन्हें इस बात का एहसास भी करावे साथ ही उसी राजनैतिक दल के साथ जुड़े जो हिन्दुओं के सनातन प्रतीकों की रक्षा करने में सक्षम हो,हिन्दुओं के हितों का भी ध्यान रखे, साथ ही रामराज्य की पावन परम्पराओं के पथ पर अग्रसर रह कर भ्रष्टाचार मुक्त संस्कार युक्त सुशासन दे सके !
जैसा कि कुछ लोगों ने तर्क दिया कि इस चतुर्मास के समय में कोई भी धार्मिक यात्रा नहीं की जा सकती !क्योंकि इसका शास्त्रीय निषेध है! इस पर उनका तर्क है कि श्री राम ने भी बन में अपनी यात्रा रोक दी थी और पर्वत पर रह कर चातुर्मास किया था!
इस पर मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि चातुर्मास एक व्रत होता है कुछ लोग इसका पालन करते हैं कुछ नहीं भी करते हैं जो नहीं करते उन पर चातुर्मास व्रत बल पूर्वक कैसे थोपा जा सकता है?इसका यह मतलब भी नहीं है कि वे अशास्त्रीय हैं क्योंकि वे और और प्रकार के व्रतों का पालन करते हैं उसमें चौरासी कोसी अयोध्या की परिक्रमा भी हो सकती है। ये हिन्दू धर्म के व्रतों की प्रक्रिया है वो जैसे चाहें वैसे करें क्यों नहीं कर सकते ?यदि इससे साम्प्रदायिक तनाव फैल सकता है तो इसमें हिन्दुओं का क्या दोष?इसके लिए वो संप्रदाय जिम्मेदार हैं जो हिन्दुओं के धर्माचरण को सह नहीं पाते हैं! इसमें सरकार को कूदने की क्या जरूरत थी ?
जहाँ तक श्री राम ने बन में अपनी यात्रा रोक दी थी की बात है, उसका अभिप्राय यह है कि बन पर्वत एवं दूर देश की यात्राएँ वर्षा बाढ़ आदि के उपद्रवों से बचने के लिए रोक दी जाती थीं न कि धर्म के लिए! यदि इसका कारण धर्म होता तो केवल धार्मिक लोग ही यात्रा बंद करते किंतु श्री राम अपना चातुर्मास व्रत पूरा होने पर स्वयं लक्ष्मण से कहते हैं कि देखो वर्षा का चातुर्मास समय समाप्त हो गया है इसलिए राजा ,तपस्वी, व्यापारी और भिखारी ये चारों लोग अपना अपना नगर छोड़ कर चल पड़े हैं यथा-
दो.चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि । इससे यह बात साफ हो जाती है कि श्री राम ने चातुर्मास व्रत को धर्म से न जोड़कर अपितु सुरक्षा से जोड़ा है। इस दृष्टि से अयोध्या की परिक्रमा से किसी को क्या आपत्ति होनी चाहिए ?
एक तर्क यह भी दिया गया कि इस समय देवता सो रहे हैं या दक्षिणायन सूर्य हैं इस लिए धार्मिक कार्य करने का निषेध है !इसलिए अयोध्या की परिक्रमा इस समय नहीं होनी चाहिए थी।
इसपर मेरा निवेदन यह है कि काम्य कर्म अर्थात जिस धर्म कार्य के बदले कोई कुछ पाना चाहता है उन्हें करने के लिए तो मुहूर्त का बिचार किया जाता है किंतु निष्काम कर्म अर्थात भक्ति के लिए कोई धर्म कार्य कभी भी किया जा सकता है ।इसलिए अयोध्या की परिक्रमा इस समय होने में किसी को क्या और क्यों आपत्ति है ?
एक तर्क यह भी है कि ऐसी यात्रा पहले कभी नहीं हुई अब क्यों हो रही है ?
इस पर मेरा निवेदन है कि यदि लोकतांत्रिक संबिधान में संशोधन हो सकता है तो धार्मिक संबिधान में क्यों नहीं हो सकता ?वह भी तब जब किसी और को कोई हानि न पहुँच रही हो!
कुछ दलों या लोगों को यदि इस बात की आपत्ति है कि इसमें विश्व हिन्दू परिषद् भाजपा को चुनावी फायदा कराने के लिए ऐसी धार्मिक यात्राओं के आयोजन कर रही है इस लिए यह धार्मिक यात्रा न होकर अपितु राजनैतिक यात्रा आन्दोलन है !
इस पर मेरा निवेदन है कि यदि ऐसा भी है तो इसमें गलत क्या है?वर्तमान समय में देश की परिस्थिति इस प्रकार की बन गई है कि बिना राजनैतिक पकड़ के जब कोई काम होता ही नहीं है तो श्री राम मंदिर कैसे बन जाएगा !ऐसे समय हिन्दुओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न है कि या तो श्री राम मंदिर बनाने की ईच्छा ही छोड़ दी जाए तो ऐसा संभव नहीं है यदि श्री राम मंदिर बनाना ही है तो बलपूर्वक बनाया जाए उससे हिंसा फैलेगी!तीसरा रास्ता कानून बनाकर मंदिर बनाने का है। कानून बनेगा संसद में वो भी सांसदों के बहुमत से,सांसद बनाने के लिए जनता का समर्थन चाहिए ही, जनता का समर्थन पाने के लिए जनता को जगाना और दिखाना होगा कि देखो तुम अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन भी नहीं कर सकते परिक्रमाएँ रोकी जा रही हैं ऐसे श्री राम मंदिर कैसे बना पाओगे?यह बात समाज भी समझेगा कि यदि अपने प्यारे प्रभु श्री राम का मंदिर बनाना है तो अधिक से अधिक सांसद जिताने पड़ेंगे जो सबके सहयोग के बिना संभव नहीं है।इस प्रकार से सामाजिक जन जागरण के लिए संत शांति पूर्ण ढंग से धार्मिक आयोजन करते हैं हिन्दू संगठन होने के नाते विश्व हिन्दू परिषद् का नैतिक दायित्व बनता है कि वो न केवल संतों के संकल्प का समर्थन करे अपितु उसे कार्यान्वित भी करे!जो विश्व हिन्दू परिषद् करता भी है।
वैसे भी हिन्दू संगठन और संत मंदिर बनाने की बात ही करेंगे इसी में उनकी प्रासंगिकता है और यही उनका कर्तव्य है जनता को भी उनसे ऐसी ही अपेक्षा है।इस प्रकार से न केवल श्री राम के मंदिर का निर्माण अपितु समस्त सनातन धर्मावलंबी प्रतीकों मर्यादाओं की सुरक्षा के लिए हिन्दू संगठन और साधू संत इसी पवित्र भावना से प्राण प्रण पूर्वक समर्पित हैं।श्री राम मंदिर निर्माण हेतु सहयोग के लिए ईर्ष्या द्वेष के बिना सभी सम्प्रदायों संगठनों राजनैतिक दलों आदि से सहयोग का आह्वान भी इसी भावना से करते हैं,जैसे श्री राम प्रभु को मनाने के लिए जब भरत जी बन जाते हैं तो जो मिलता उसको प्रणाम तो करते हैं किन्तु उसके प्रति समर्पित नहीं होते समर्पण तो श्री राम प्रभु के प्रति ही रहता है यथा -
करि प्रनाम पूछहिं जेहि तेही।
केहि बन राम लषन वैदेही ॥
यही स्थिति हिन्दू संगठनों और संतों एवं सभी राम भक्तों की भी है ये श्री राम मंदिर विरोधी सम्प्रदायों के प्रमुखों एवं ऐसे राजनेताओं से भी मिलते हैं,जिन राजनैतिक दलों या नेताओं का समर्थन करते हैं उनसे भी मिलते हैं! इन सभी बातों विचारों का पवित्र उद्देश्य तो प्रभु श्री राम की प्रणम्य जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण ही है इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
कुछ लोग कहते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के द्वारा प्रायोजित अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा को बल पूर्वक रोक दिया गया,इन लोगों की पराजय हुई इन्हें जनता का समर्थन नहीं मिला, कुछ धर्म से जुड़े लोगों ने भी इस यात्रा के समय महूर्त परम्परा आदि का सहारा लेकर यात्रा के विरोध में कुछ अशास्त्रीय आधारहीन कुतर्क दिए जिनका कहीं किसी भी मंच पर उद्घोषणा पूर्वक खण्डन किया जा सकता है किसी भी परिस्थिति में निष्काम परिक्रमा या पूजा का कहीं भी निषेध नहीं है।
विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के द्वारा प्रायोजित इस यात्रा का पवित्र उद्देश्य चूँकि श्री राम का मंदिर का निर्माण था तो लक्ष्य पवित्र होने के कारण प्रभु कार्य के लिए किए गए प्रयास यदि न भी सफल हों तो भी प्रयास जन्य पुण्य तो मिलता ही है! रही बात विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के पराजय की तो प्रभु कार्य के लिए मिली पराजय भी पूजा की तरह ही होती है।प्रभु कार्य के पथ पर अग्रसर रामभक्तों का ध्यान जय और पराजय पर होता ही कहाँ है वहाँ तो ध्यान इस पर होता है कि अपने प्रयास में कहीं कोई कमी न रह जाए !जब रामभक्त श्री हनुमान जी लंका में बाँध लिए गए तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा -
मोहिं न कछु बाँधे कर लाजा।
कीन्ह चहहुँ निज प्रभुकर काजा ॥
इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रखते हुए सभी श्री राम भक्त संतों संगठनों आदि के प्रति हम एवं हमारा राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध संस्थान हार्दिक कृतज्ञता करते हैं एवं इस प्रकार के जन जागरण के प्रयास के लिए बारबार आभार प्रकट करते हैं ।
राम भक्तों को परिक्रमा की सफलता पर बधाई !
अयोध्या की परिक्रमा से परेशान राजनेताओं के झुंड!
अधिकांश राजनेता राजनैतिक दल एवं सरकारें श्री राम भक्तों का अकारण उत्पीड़न केवल इसीलिए करती रहती हैं जिससे दूसरे समुदाय के लोगों को खुश कर सकें, संभव है कि वो समुदाय ऐसा न भी चाहते हों !अभी तक तो केवल विश्व हिन्दू परिषद् एवं संत समाज का ही यह उद्घोष रहता था किन्तु अब की बार इस पवित्र परिक्रमा यात्रा पर लगाई गई रोक से तो न केवल यह सिद्ध हो गया अपितु सारे विश्व ने देख भी लिया और समझ गया कि देश के संत एवं हिन्दू संगठन हमेंशा से सच ही कहते रहे हैं !क्योंकि बिना किसी तनाव या धमकी के यदि दो ढाई सौ संत प्रतिदिन परिक्रमा करते तो कैसे सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ जाता!
सच तो यह है कि स्वाभिमानी हिन्दुओं को सरकार एवं प्रशासन से एक बार पूछना चाहिए कि हिन्दुओं की किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि साम्प्रदायिक कैसे मान ली जाती है ?दूसरी बात उनके लिए केवल अल्प संख्यकों का वोट ही यदि इतना महत्त्व रखता है तो बहु संख्यक हिन्दू वर्ग को भी चाहिए कि वो भी अपने वोट के महत्त्व को न केवल समझे अपितु संगठित होकर उन्हें इस बात का एहसास भी करावे साथ ही उसी राजनैतिक दल के साथ जुड़े जो हिन्दुओं के सनातन प्रतीकों की रक्षा करने में सक्षम हो,हिन्दुओं के हितों का भी ध्यान रखे, साथ ही रामराज्य की पावन परम्पराओं के पथ पर अग्रसर रह कर भ्रष्टाचार मुक्त संस्कार युक्त सुशासन दे सके !
जैसा कि कुछ लोगों ने तर्क दिया कि इस चतुर्मास के समय में कोई भी धार्मिक यात्रा नहीं की जा सकती !क्योंकि इसका शास्त्रीय निषेध है! इस पर उनका तर्क है कि श्री राम ने भी बन में अपनी यात्रा रोक दी थी और पर्वत पर रह कर चातुर्मास किया था!
इस पर मैं निवेदन करना चाहता हूँ कि चातुर्मास एक व्रत होता है कुछ लोग इसका पालन करते हैं कुछ नहीं भी करते हैं जो नहीं करते उन पर चातुर्मास व्रत बल पूर्वक कैसे थोपा जा सकता है?इसका यह मतलब भी नहीं है कि वे अशास्त्रीय हैं क्योंकि वे और और प्रकार के व्रतों का पालन करते हैं उसमें चौरासी कोसी अयोध्या की परिक्रमा भी हो सकती है। ये हिन्दू धर्म के व्रतों की प्रक्रिया है वो जैसे चाहें वैसे करें क्यों नहीं कर सकते ?यदि इससे साम्प्रदायिक तनाव फैल सकता है तो इसमें हिन्दुओं का क्या दोष?इसके लिए वो संप्रदाय जिम्मेदार हैं जो हिन्दुओं के धर्माचरण को सह नहीं पाते हैं! इसमें सरकार को कूदने की क्या जरूरत थी ?
जहाँ तक श्री राम ने बन में अपनी यात्रा रोक दी थी की बात है, उसका अभिप्राय यह है कि बन पर्वत एवं दूर देश की यात्राएँ वर्षा बाढ़ आदि के उपद्रवों से बचने के लिए रोक दी जाती थीं न कि धर्म के लिए! यदि इसका कारण धर्म होता तो केवल धार्मिक लोग ही यात्रा बंद करते किंतु श्री राम अपना चातुर्मास व्रत पूरा होने पर स्वयं लक्ष्मण से कहते हैं कि देखो वर्षा का चातुर्मास समय समाप्त हो गया है इसलिए राजा ,तपस्वी, व्यापारी और भिखारी ये चारों लोग अपना अपना नगर छोड़ कर चल पड़े हैं यथा-
दो.चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि । इससे यह बात साफ हो जाती है कि श्री राम ने चातुर्मास व्रत को धर्म से न जोड़कर अपितु सुरक्षा से जोड़ा है। इस दृष्टि से अयोध्या की परिक्रमा से किसी को क्या आपत्ति होनी चाहिए ?
एक तर्क यह भी दिया गया कि इस समय देवता सो रहे हैं या दक्षिणायन सूर्य हैं इस लिए धार्मिक कार्य करने का निषेध है !इसलिए अयोध्या की परिक्रमा इस समय नहीं होनी चाहिए थी।
इसपर मेरा निवेदन यह है कि काम्य कर्म अर्थात जिस धर्म कार्य के बदले कोई कुछ पाना चाहता है उन्हें करने के लिए तो मुहूर्त का बिचार किया जाता है किंतु निष्काम कर्म अर्थात भक्ति के लिए कोई धर्म कार्य कभी भी किया जा सकता है ।इसलिए अयोध्या की परिक्रमा इस समय होने में किसी को क्या और क्यों आपत्ति है ?
एक तर्क यह भी है कि ऐसी यात्रा पहले कभी नहीं हुई अब क्यों हो रही है ?
इस पर मेरा निवेदन है कि यदि लोकतांत्रिक संबिधान में संशोधन हो सकता है तो धार्मिक संबिधान में क्यों नहीं हो सकता ?वह भी तब जब किसी और को कोई हानि न पहुँच रही हो!
कुछ दलों या लोगों को यदि इस बात की आपत्ति है कि इसमें विश्व हिन्दू परिषद् भाजपा को चुनावी फायदा कराने के लिए ऐसी धार्मिक यात्राओं के आयोजन कर रही है इस लिए यह धार्मिक यात्रा न होकर अपितु राजनैतिक यात्रा आन्दोलन है !
इस पर मेरा निवेदन है कि यदि ऐसा भी है तो इसमें गलत क्या है?वर्तमान समय में देश की परिस्थिति इस प्रकार की बन गई है कि बिना राजनैतिक पकड़ के जब कोई काम होता ही नहीं है तो श्री राम मंदिर कैसे बन जाएगा !ऐसे समय हिन्दुओं के सामने सबसे बड़ा प्रश्न है कि या तो श्री राम मंदिर बनाने की ईच्छा ही छोड़ दी जाए तो ऐसा संभव नहीं है यदि श्री राम मंदिर बनाना ही है तो बलपूर्वक बनाया जाए उससे हिंसा फैलेगी!तीसरा रास्ता कानून बनाकर मंदिर बनाने का है। कानून बनेगा संसद में वो भी सांसदों के बहुमत से,सांसद बनाने के लिए जनता का समर्थन चाहिए ही, जनता का समर्थन पाने के लिए जनता को जगाना और दिखाना होगा कि देखो तुम अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन भी नहीं कर सकते परिक्रमाएँ रोकी जा रही हैं ऐसे श्री राम मंदिर कैसे बना पाओगे?यह बात समाज भी समझेगा कि यदि अपने प्यारे प्रभु श्री राम का मंदिर बनाना है तो अधिक से अधिक सांसद जिताने पड़ेंगे जो सबके सहयोग के बिना संभव नहीं है।इस प्रकार से सामाजिक जन जागरण के लिए संत शांति पूर्ण ढंग से धार्मिक आयोजन करते हैं हिन्दू संगठन होने के नाते विश्व हिन्दू परिषद् का नैतिक दायित्व बनता है कि वो न केवल संतों के संकल्प का समर्थन करे अपितु उसे कार्यान्वित भी करे!जो विश्व हिन्दू परिषद् करता भी है।
वैसे भी हिन्दू संगठन और संत मंदिर बनाने की बात ही करेंगे इसी में उनकी प्रासंगिकता है और यही उनका कर्तव्य है जनता को भी उनसे ऐसी ही अपेक्षा है।इस प्रकार से न केवल श्री राम के मंदिर का निर्माण अपितु समस्त सनातन धर्मावलंबी प्रतीकों मर्यादाओं की सुरक्षा के लिए हिन्दू संगठन और साधू संत इसी पवित्र भावना से प्राण प्रण पूर्वक समर्पित हैं।श्री राम मंदिर निर्माण हेतु सहयोग के लिए ईर्ष्या द्वेष के बिना सभी सम्प्रदायों संगठनों राजनैतिक दलों आदि से सहयोग का आह्वान भी इसी भावना से करते हैं,जैसे श्री राम प्रभु को मनाने के लिए जब भरत जी बन जाते हैं तो जो मिलता उसको प्रणाम तो करते हैं किन्तु उसके प्रति समर्पित नहीं होते समर्पण तो श्री राम प्रभु के प्रति ही रहता है यथा -
करि प्रनाम पूछहिं जेहि तेही।
केहि बन राम लषन वैदेही ॥
यही स्थिति हिन्दू संगठनों और संतों एवं सभी राम भक्तों की भी है ये श्री राम मंदिर विरोधी सम्प्रदायों के प्रमुखों एवं ऐसे राजनेताओं से भी मिलते हैं,जिन राजनैतिक दलों या नेताओं का समर्थन करते हैं उनसे भी मिलते हैं! इन सभी बातों विचारों का पवित्र उद्देश्य तो प्रभु श्री राम की प्रणम्य जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण ही है इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
कुछ लोग कहते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के द्वारा प्रायोजित अयोध्या की चौरासी कोसी परिक्रमा को बल पूर्वक रोक दिया गया,इन लोगों की पराजय हुई इन्हें जनता का समर्थन नहीं मिला, कुछ धर्म से जुड़े लोगों ने भी इस यात्रा के समय महूर्त परम्परा आदि का सहारा लेकर यात्रा के विरोध में कुछ अशास्त्रीय आधारहीन कुतर्क दिए जिनका कहीं किसी भी मंच पर उद्घोषणा पूर्वक खण्डन किया जा सकता है किसी भी परिस्थिति में निष्काम परिक्रमा या पूजा का कहीं भी निषेध नहीं है।
विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के द्वारा प्रायोजित इस यात्रा का पवित्र उद्देश्य चूँकि श्री राम का मंदिर का निर्माण था तो लक्ष्य पवित्र होने के कारण प्रभु कार्य के लिए किए गए प्रयास यदि न भी सफल हों तो भी प्रयास जन्य पुण्य तो मिलता ही है! रही बात विश्व हिन्दू परिषद्और संतों के पराजय की तो प्रभु कार्य के लिए मिली पराजय भी पूजा की तरह ही होती है।प्रभु कार्य के पथ पर अग्रसर रामभक्तों का ध्यान जय और पराजय पर होता ही कहाँ है वहाँ तो ध्यान इस पर होता है कि अपने प्रयास में कहीं कोई कमी न रह जाए !जब रामभक्त श्री हनुमान जी लंका में बाँध लिए गए तो उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा -
मोहिं न कछु बाँधे कर लाजा।
कीन्ह चहहुँ निज प्रभुकर काजा ॥
इन्हीं सभी बातों को ध्यान में रखते हुए सभी श्री राम भक्त संतों संगठनों आदि के प्रति हम एवं हमारा राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध संस्थान हार्दिक कृतज्ञता करते हैं एवं इस प्रकार के जन जागरण के प्रयास के लिए बारबार आभार प्रकट करते हैं ।
Saturday, August 24, 2013
ज्योतिषीय ग्रह योग और श्री राम मंदिर अयोध्या !
श्री
राम की जन्म कुंडली और श्री राम मंदिर
(19.6.2014 से प्रारम्भ होकर 14.7.2015 तक)
होगा अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर निर्माण !!!
वैसे तो धरती पर करोड़ों श्री राम मंदिर होंगे किन्तु जो अयोध्या में जो भगवान श्री राम का वास्तविक भवन है जिसे हम सभी लोग श्रृद्धा से श्री राम मंदिर कहते हैं उसके बनने में रुकावट के सामाजिक राजनैतिक सांप्रदायिक आदि बहुत सारे कारण हैं उनमें से एक कारण ज्योतिष भी हो सकता है।ज्योतिष के कुछ योगों पर भी यहाँ ध्यान देना आवश्यक है।ज्योतिषीय दृष्टि कोण से कहा जा सकता है कि यदि राजनेताओं और धर्माचार्यों के द्वारा ईमानदारी पूर्वक अयोध्या में श्री राम मंदिर बनाने के लिए प्रयास किया जाए तो जैसे बिना विवाद के सम्मान पूर्वक श्री राम का राज्याभिषेक उस युग में अयोध्या में हुआ था उसी प्रकार बिना विवाद के सम्मान पूर्वक इस समय भी(19.6.2014 से प्रारम्भ होकर 14.7.2015 तक)श्री राम का भव्य मंदिर निर्माण सभी की सहमति से होने के प्रबल योग हैं
यदि थोड़ी सी ज्योतिषीय सावधानी राम भक्तों के द्वारा बरती गई तो मंदिर बनने को रोका नहीं जा सकता बनेगा जरूर! और भव्य श्री राम मंदिर बनेगा यह भी निश्चित है।सर्व सम्मति से बनने के योग हैं। इसलिए रामभक्तों को निराश या हताश नहीं होना चाहिए और प्रयास करके तनाव नहीं बढ़ने देना चाहिए ।
ज्योतिषीय सावधानी कहने से हमारा अभिप्राय यह है कि जैसे उत्तर प्रदेश में अखिलेश की सरकार है और इसके मंत्री आजम खान हैं उधर दूसरी ओर विश्व हिन्दू परिषद के अशोक सिंघल जी हैं और चौथा नाम अयोध्या का है जहाँ श्री राम मंदिर बनना है इन चारों के नाम का पहला अक्षर अ है इसलिए यदि ये लोग आमने सामने आकर कोई रास्ता निकालना चाहेंगे तो कोई शांति पूर्ण समझौता हो ही नहीं सकता अपितु समझौते के सारे प्रयास संघर्ष के रूप में भी बदल सकते हैं !
इस लेख को भी पढ़ें-
(श्रीराममंदिर बनेगा कैसे?ज्योतिष! Dr.Vajpayee?)

काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में श्री रामचरित मानस और ज्योतिष पर ही हमारी पी.एच.डी.की थीसिस थी।जिसे पूरा करने के बाद इन विषयों पर खोज पूर्ण कई ग्रन्थ लिखे हैं।जिसका कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत करता हूँ।
श्री राम की जन्म
कुंडली में भवन सुख भाव में शनि होने से भवन होने के बाद भी भवनसुख का योग
मध्यम एवं संघर्ष पूर्ण है।इसीलिए बचपन में पहले पिता के साथ रहते रहे। 15
वर्ष की उम्र में विश्वामित्र जी ले गए फिर विवाह के बाद राज्य मिलना था
तो बनवास हो गया । वहाँ जाकर जंगल में जब कुटी बनाई तो सीता हरण हो गया।जब
बन से वापस आए तो सीता जी को बनवास हो गया।इसप्रकार जब गृहणी ही चली गई तो
गृह सुख की आशा ही क्या बची ?
ज्योतिष की दृष्टि से यहाँ एक
बात अवश्य है कि भवन भाव में शनि उच्च राशि का है एवं भवनेश शुक्र भाग्य
स्थान में उच्च राशि का है इसलिए राम जी कहाँ कितने दिन रह पाए या उन्हें
गृहसुख कितना मिला या नहीं मिला ये अलग बात है किन्तु उन्हें रहने के लिए
जो भवन या राज्य मिले वो एक से एक भव्य अर्थात सुन्दर थे।अयोध्या का
राज्य तो अपना था ही लंका और किष्किन्धा भी लोग देने को तैयार थे किन्तु
श्री राम ने जीते हुए देश भी लिए ही नहीं।
यहाँ ज्योतिष की एक बात विशेष ध्यान देने लायक यह है कि जैसे अयोध्या का राज्य मिलने से पहले भी गर्मी शर्दी बरसात आदि सभी ऋतुएँ श्री राम को खुले आसमान में ही बितानी पड़ी थीं अब फिर से अस्थाई श्री राम मंदिर में गर्मी शर्दी बरसात आदि सभी ऋतुएँ खुले आसमान में ही प्रभु श्री राम को बितानी पड़ रही हैं।
इसी प्रकार उस समय भी श्री राम को चौदह वर्षों तक तपस्या करनी पड़ी थी अब भी सन दो हजार चौदह तक फिर से प्रभु श्री राम को खुले आसमान में ही अस्थाई श्री राम मंदिर में तपस्या करते रहना होगा।
जैसे उस समय चौदह वर्ष पूर्ण होने से चौदह महीने बारह दिन पूर्व सीता हरण हुआ था उसके बाद से ही असुरों के संहार की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी। असुर आतंकियों को कठोर सजा देने का काम अब भी लगभग चौदह महीने पहले ही शुरू हो सका है।
आतंकियों को कठोर सजा देने का चिर प्रतीक्षित काम भी सन दो हजार बारह के नवंबर मास के अंत से ही करना प्रारंभ किया जा सका है। यहाँ से लेकर सन दो हजार चौदह प्रारंभ तक भी वही लंका वाले लगभग चौदह महीने ही हो पाएँगे।
यही चौदह महीने पहले सीता हरण से ही नारियों की सुरक्षा के लिए जन जागरण वहाँ प्रारंभ हुआ था। अब भी 16 दिसंबर 2012 से अर्थात चौदह महीने पहले से ही यहाँ भी नारियों की सुरक्षा के लिए उसी तरह का जन जागरण प्रारंभ हुआ है।
इसी समय में यदि इसीप्रकार से सज्जन समाज को पीड़ा पहुँचाकर समाज को पीड़ित करने वाले किसी भी जाति, समुदाय, संप्रदाय आदि के जो भी लोग हैं ऐसे असुर आतंकियों के साथ निपटने में यदि सरकार सफल हुई तो निराश हताश समाज के मन में फिर से प्रशासकों के प्रति विश्वास बढ़ेगा।सभी प्रकार के कठोर कानूनों के सफल क्रियान्वयन से भ्रष्टाचार आदि आपदाओं से देश मुक्त होगा। भ्रष्टाचार मिटते ही न केवल आपराधिक वारदातों में कमी आएगी अपितु महँगाई में भी लगाम लगेगी ।सभी देश वासियों की सुरक्षा का वातावरण बनेगा।
दूसरी बात यह है कि जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गई थी उस समय क्षिप्र संज्ञक अश्वनी था।इसमें अस्थाई काम तो किए जा सकते थे जैसे दुकान करना या कोई भी कला संबंधी कार्य कर पाना संभव था।इसी प्रकार मस्जिद का भी भविष्य कुछ भी नहीं था इसलिए वह भी टूट गई।यहाँ विशेष बात यह है कि उसी समय मंदिर निर्माण के लिए चबूतरा या अस्थाई मंदिर बना दिया गया था किन्तु जो महूर्त तोड़ने का था उसी मुहूर्त में शिलान्यास कैसे किया जा सकता था? तोड़ने के मुहूर्त में किसी चीज का जोड़ना कैसे संभव हो सकता है। मत्स्य वेध करके अर्जुन ने द्रोपदी के साथ विवाह किया था।इसीप्रकार धनुष तोड़कर श्री राम ने सीता जी से विवाह किया था। इसलिए अर्जुन और द्रोपदी एवं श्री राम और सीता जी का सम्पूर्ण जीवन भटकते हुए संघर्ष पूर्वक बीता।
जैसे धनुष तोड़ने का काम वर्षों से चल रहा था किन्तु कोई तोड़ नहीं पा रहा था उसीप्रकार बाबरी मस्जिद भी विवादित चल रही थी। धनुष तोड़ने का काम भी अश्वनी नक्षत्र में हुआ था और बाबरी मस्जिद भी अश्वनी नक्षत्र में ही तोड़ी जा सकी थी ।अंतर इतना रहा कि वशिष्ठ आदि ऋषियों ने धनुष टूटने के बाद उसके बारहवें दिन शुभ मुहूर्त विवाह नक्षत्र उत्तरा फाल्गुनी में श्री राम और सीता का विवाह करवाया गया था। इस कारण दोष कुछ टल गया था फिर भी बहुत कुछ सहना पड़ा था।उसका कारण था कि धनुष टूटने के साथ ही विवाह मान लिया गया था टूटतही धनुभयउविवाहू।सुरनरनाग विदित सब काहू
चूँकि रहेउ विवाह चाप आधीना
इसीलिए
गुरु वशिष्ठ से पंडित ग्यानी शोधि केलगन धरी ।
फिर भी
सीता हरण मरण दशरथ को बन में बिपति परी ।।
चूँकि धनुष टूटते हीश्री राम और सीता का विवाह हो गया था इसलिए वशिष्ठ जी का प्रयास विशेष कारगर सिद्ध नहीं हो सका, किन्तु बाबरी मस्जिद टूटने के साथ ऐसी कोई प्रतिज्ञा नहीं जुड़ी थी ।यहाँ तुरन्त शिलान्यास न करके यदि शुभ मुहूर्त में किया जाता तो संभव है कि मंदिर बनने का अबतक कोई समाधान निकल ही जाता।चूँकि इस्वी सन 1527 में सनातन हिंदुओं ने विजय दशमी,दीपावली और रामनवमी पर्व बहुत बड़े जन समूह के साथ उमड़ घुमड़ कर अत्यंत धूम धाम से मनाए थे।श्रीराम प्रभु के प्रति हिन्दुओं की इतनी श्रृद्धा देखकर ये विधर्मी सह नहीं सके थे इसलिए श्रीराम मंदिर तोड़कर उसी पर बाबरी मस्जिद बना डाली ।चूँकि उन्होंने भी मंदिर तोड़ने के साथ ही उसी पर मस्जिद का निर्माण किया था तोड़ने के साथ ही जोड़ने का अर्थ होता है कि इसका कोई स्थायित्व नहीं होगा ये कभी भी तोड़ी जा सकती है इस कारण बाबरी मस्जिद बनने के साथ ही उसका विध्वंस जुड़ा था।उसीप्रकार यदि इसी अस्थाई श्री राम चबूतरे पर ही यदि मंदिर बना दिया गया तो
बाबरी मस्जिद विध्वंस का कुयोग श्री मंदिर के साथ भी आरम्भ से ही जुड़ जाएगा।इसलिए इससे बचा जाना चाहिए ।
चूँकि उस मस्जिद तोड़ी जा सकी थी इससे यह प्रमाणित भी होता
है कि वह मुहूर्त मकान टूटने का ही था तो ऐसे समय में मकान बनाना कैसे
प्रारम्भ किया जा सकता था?
इसलिए श्री राम
मंदिर निर्माण के लिए कोई और मुहूर्त देख कर उसमें शिलान्यास करने से
मंदिर निर्माण का स्वप्न साकार किया जा सकता है
यहाँ एक विशेष बात का ध्यान और रखा जाना चाहिए कि इस देश की दो सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टियों के प्रमुखों के नाम रा अक्षर से प्रारंभ होते हैं राजनाथ और राहुल ये दोनों से ही राम मंदिर में ईमानदारी पूर्वक समर्पणात्मक सहयोग की आशा नहीं की जानी चाहिए।
यहाँ ज्योतिष एक बहुत बड़ा कारण है। किन्हीं दो या दो से अधिक लोगों का नाम यदि एक अक्षर से ही प्रारंभ होता है तो ऐसे सभी लोगों के आपसी संबंध शुरू में तो अत्यंत मधुर होते हैं बाद में बहुत अधिक खराब हो जाते हैं, क्योंकि इनकी पद-प्रसिद्धि-प्रतिष्ठा -पत्नी-प्रेमिका आदि के विषय में पसंद एक जैसी होती है। इसलिए कोई सामान्य मतभेद भी कब कहॉं कितना बड़ा या कभी न सुधरने वाला स्वरूप धारण कर ले या शत्रुता में बदल जाए कहा नहीं जा सकता है।
जैसेः-राम-रावण, कृष्ण-कंस आदि। इसी प्रकार और भी उदाहरण हैं।
रामलीला मैदान में पहुँचने से पहले तो रामदेव को मंत्री गण मनाने पहुँचे फिर रामलीला मैदान में पहुँचने के बाद राहुल को ये पसंद नहीं आया तो रामदेव वहाँ से भगाए गए।
दूसरी बार फिर रामदेव रामलीला मैदान पहुँचे इसके बाद राजीवगाँधी स्टेडियम जा रहे थे फिर राहुल को पसंद न आता और लाठी डंडे चल सकते थे किन्तु अम्बेडकर स्टेडियम ने बचा लिया।
इसप्रकार से जब रा अक्षर वालों ने रा अक्षर वालों का साथ नहीं दिया तो राहुल और राजनाथ राम मंदिर का समर्थन कितना या कितने मन से करेंगे कैसे कहा जा सकता है? राम मंदिर प्रमुख रामचन्द्र दास परमहंसजी महाराज एवं उस समय के डी.एम. रामशरण श्रीवास्तव के और राम मंदिर इन तीनों का आपसी तालमेल सन 1990 में अच्छा नहीं रहा परिणामतः संघर्ष चाहें जितना रहा हो किन्तु मंदिर निर्माण की दिशा में कोई विशेष सफलता नहीं मिली।
दिल्ली भाजपा के चार विजयों के समूह का एक साथ एक क्षेत्र में एक समय पर काम करना आगामी चुनावों में राजनैतिक भविष्य के लिए चिंता प्रद हैं।इसी कारण से पहले भी कांग्रेस विजय पाती रही है।
विजयेंद्रजी -विजयजोलीजी
विजयकुमारमल्होत्राजी - विजयगोयलजी
इसी प्रकार भारत वर्ष में भाजपा राजग बनाकर ही सत्ता में आ पाने में सफल हो सकी।जबकि इससे कम सदस्य संख्या वाले एवं अटलजी से कमजोर व्यक्तित्व वाले लोग भी यहाँ प्रधानमंत्री बने हैं।कई प्रदेशों में भाजपा की सरकारें भी अच्छी तरह से चल भी रही हैं ।
कलराजमिश्र-कल्याण सिंह
ओबामा-ओसामा
अरूण जेटली- अभिषेकमनुसिंघवी
मायावती-मनुवाद
नरसिंहराव-नारायणदत्ततिवारी
लालकृष्णअडवानी-लालूप्रसाद
परवेजमुशर्रफ-पाकिस्तान
भाजपा-भारतवर्ष
मनमोहन-ममता-मायावती
उमाभारती - उत्तर प्रदेश
अमरसिंह - आजमखान - अखिलेशयादव
अमर सिंह - अनिलअंबानी - अमिताभबच्चन
नितीशकुमार-नितिनगडकरी-नरेंद्रमोदी प्रमोदमहाजन-प्रवीणमहाजन-प्रकाशमहाजन अन्नाहजारे-अरविंदकेजरीवाल-असीम त्रिवेदी-अग्निवेष- अरूण जेटली - अभिषेकमनुसिंघवी
अन्ना हजारे के आंदोलन के तीन प्रमुख ज्वाइंट थे अन्ना हजारे, अरविंदकेजरीवाल,असीमत्रिवेदी एवं अग्निवेष जिन्हें एक दूसरे से तोड़कर ये आंदोलन ध्वस्त किया जा सकता था। इसमें अग्निवेष कमजोर पड़े और हट गए। दूसरी ओर जनलोकपाल के विषय में लोक सभा में जो बिल पास हो गया वही राज्य सभा में क्यों नहीं पास हो सका इसका एक कारण नाम का प्रभाव भी हो सकता है। सरकार की ओर से अभिषेकमनुसिंघवी थे तो विपक्ष के नेता अरूण जेटली जी थे। इस प्रकार ये सभी नाम अ से ही प्रारंभ होने वाले थे। इसलिए अभिषेकमनुसिंघवी की किसी भी बात पर अरूण जेटली का मत एक होना ही नहीं था।अतः राज्य सभा में बात बननी ही नहीं थी। दूसरी ओर अभिषेकमनुसिंघवी और अरूण जेटली का कोई भी निर्णय अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल को सुख पहुंचाने वाला नहीं हो सकता था। अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल का महिमामंडन अग्निवेष कैसे सह सकते थे?अब अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल कब तक मिलकर चल पाएँगे?कहना कठिन है।असीमत्रिवेदी भी अन्नाहजारे के गॉंधीवादी बिचारधारा के विपरीत आक्रामक रूख बनाकर ही आगे बढ़े। आखिर और लोग भी तो थे। अ अक्षर से प्रारंभ नाम वाले लोग ही अन्नाहजारे से अलग क्यों दिखना चाहते थे ? ये अ अक्षर वाले लोग ही अन्नाहजारे के इस आंदोलन की सबसे कमजोर कड़ी हैं।
अन्नाहजारे की
तरह ही अमर सिंह जी भी अ अक्षर वाले लोगों से ही व्यथित देखे जा सकते हैं।
अमरसिंह जी की पटरी पहले मुलायम सिंह जी के साथ तो खाती रही तब केवल आजमखान
साहब से ही समस्या होनी चाहिए थी किंतु अखिलेश यादव का प्रभाव बढ़ते ही
अमरसिंह जी को पार्टी से बाहर जाना पड़ा। ऐसी परिस्थिति में अब अखिलेश के
साथ आजमखान कब तक चल पाएँगे? कहा नहीं जा सकता। पूर्ण बहुमत से बनी उत्तर
प्रदेश में सपा सरकार का यह सबसे कमजोर ज्वाइंट सिद्ध हो सकता है
चूँकि
अमरसिंह जी के मित्रों की संख्या में अ अक्षर से प्रारंभ नाम वाले लोग ही
अधिक हैं इसलिए इन्हीं लोगों से दूरियॉं बनती चली गईं। जैसेः- आजमखान
अमिताभबच्चन अनिलअंबानी अभिषेक बच्चन आदि।
राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध संस्थान की अपील
यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु आदि समस्त भारतीय प्राचीन विद्याओं सहित शास्त्र के किसी भी पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी लेना चाह रहे हों।
यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है।
सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान है।
श्री राम मंदिर निर्माण और ज्योतिष शंका समाधान !
श्री
राम की जन्म कुंडली और श्री राम मंदिर
(19.6.2014 से प्रारम्भ होकर 14.7.2015 तक)
होगा अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर निर्माण !!!
वैसे तो धरती पर करोड़ों श्री राम मंदिर होंगे किन्तु जो अयोध्या में जो भगवान श्री राम का वास्तविक भवन है जिसे हम सभी लोग श्रृद्धा से श्री राम मंदिर कहते हैं उसके बनने में रुकावट के सामाजिक राजनैतिक सांप्रदायिक आदि बहुत सारे कारण हैं उनमें से एक कारण ज्योतिष भी हो सकता है।ज्योतिष के कुछ योगों पर भी यहाँ ध्यान देना आवश्यक है।ज्योतिषीय दृष्टि कोण से कहा जा सकता है कि यदि राजनेताओं और धर्माचार्यों के द्वारा ईमानदारी पूर्वक अयोध्या में श्री राम मंदिर बनाने के लिए प्रयास किया जाए तो जैसे बिना विवाद के सम्मान पूर्वक श्री राम का राज्याभिषेक उस युग में अयोध्या में हुआ था उसी प्रकार बिना विवाद के सम्मान पूर्वक इस समय भी(19.6.2014 से प्रारम्भ होकर 14.7.2015 तक)श्री राम का भव्य मंदिर निर्माण सभी की सहमति से होने के प्रबल योग हैं।
यदि थोड़ी सी ज्योतिषीय सावधानी राम भक्तों के द्वारा बरती गई तो मंदिर बनने को रोका नहीं जा सकता बनेगा जरूर! और भव्य श्री राम मंदिर बनेगा यह भी निश्चित है।सर्व सम्मति से बनने के योग हैं। इसलिए रामभक्तों को निराश या हताश नहीं होना चाहिए और प्रयास करके तनाव नहीं बढ़ने देना चाहिए ।
ज्योतिषीय सावधानी कहने से हमारा अभिप्राय यह है कि जैसे उत्तर प्रदेश में अखिलेश की सरकार है और इसके मंत्री आजम खान हैं उधर दूसरी ओर विश्व हिन्दू परिषद के अशोक सिंघल जी हैं और चौथा नाम अयोध्या का है जहाँ श्री राम मंदिर बनना है इन चारों के नाम का पहला अक्षर अ है इसलिए यदि ये लोग आमने सामने आकर कोई रास्ता निकालना चाहेंगे तो कोई शांति पूर्ण समझौता हो ही नहीं सकता अपितु समझौते के सारे प्रयास संघर्ष के रूप में भी बदल सकते हैं !
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काशी हिन्दू विश्व विद्यालय में श्री रामचरित मानस और ज्योतिष पर ही हमारी पी.एच.डी.की थीसिस थी।जिसे पूरा करने के बाद इन विषयों पर खोज पूर्ण कई ग्रन्थ लिखे हैं।जिसका कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत करता हूँ।
श्री राम की जन्म
कुंडली में भवन सुख भाव में शनि होने से भवन होने के बाद भी भवनसुख का योग
मध्यम एवं संघर्ष पूर्ण है।इसीलिए बचपन में पहले पिता के साथ रहते रहे। 15
वर्ष की उम्र में विश्वामित्र जी ले गए फिर विवाह के बाद राज्य मिलना था
तो बनवास हो गया । वहाँ जाकर जंगल में जब कुटी बनाई तो सीता हरण हो गया।जब
बन से वापस आए तो सीता जी को बनवास हो गया।इसप्रकार जब गृहणी ही चली गई तो
गृह सुख की आशा ही क्या बची ?
ज्योतिष की दृष्टि से यहाँ एक
बात अवश्य है कि भवन भाव में शनि उच्च राशि का है एवं भवनेश शुक्र भाग्य
स्थान में उच्च राशि का है इसलिए राम जी कहाँ कितने दिन रह पाए या उन्हें
गृहसुख कितना मिला या नहीं मिला ये अलग बात है किन्तु उन्हें रहने के लिए
जो भवन या राज्य मिले वो एक से एक भव्य अर्थात सुन्दर थे।अयोध्या का
राज्य तो अपना था ही लंका और किष्किन्धा भी लोग देने को तैयार थे किन्तु
श्री राम ने जीते हुए देश भी लिए ही नहीं।
यहाँ ज्योतिष की एक बात विशेष ध्यान देने लायक यह है कि जैसे अयोध्या का राज्य मिलने से पहले भी गर्मी शर्दी बरसात आदि सभी ऋतुएँ श्री राम को खुले आसमान में ही बितानी पड़ी थीं अब फिर से अस्थाई श्री राम मंदिर में गर्मी शर्दी बरसात आदि सभी ऋतुएँ खुले आसमान में ही प्रभु श्री राम को बितानी पड़ रही हैं।
इसी प्रकार उस समय भी श्री राम को चौदह वर्षों तक तपस्या करनी पड़ी थी अब भी सन दो हजार चौदह तक फिर से प्रभु श्री राम को खुले आसमान में ही अस्थाई श्री राम मंदिर में तपस्या करते रहना होगा।
जैसे उस समय चौदह वर्ष पूर्ण होने से चौदह महीने बारह दिन पूर्व सीता हरण हुआ था उसके बाद से ही असुरों के संहार की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी। असुर आतंकियों को कठोर सजा देने का काम अब भी लगभग चौदह महीने पहले ही शुरू हो सका है।
आतंकियों को कठोर सजा देने का चिर प्रतीक्षित काम भी सन दो हजार बारह के नवंबर मास के अंत से ही करना प्रारंभ किया जा सका है। यहाँ से लेकर सन दो हजार चौदह प्रारंभ तक भी वही लंका वाले लगभग चौदह महीने ही हो पाएँगे।
यही चौदह महीने पहले सीता हरण से ही नारियों की सुरक्षा के लिए जन जागरण वहाँ प्रारंभ हुआ था। अब भी 16 दिसंबर 2012 से अर्थात चौदह महीने पहले से ही यहाँ भी नारियों की सुरक्षा के लिए उसी तरह का जन जागरण प्रारंभ हुआ है।
इसी समय में यदि इसीप्रकार से सज्जन समाज को पीड़ा पहुँचाकर समाज को पीड़ित करने वाले किसी भी जाति, समुदाय, संप्रदाय आदि के जो भी लोग हैं ऐसे असुर आतंकियों के साथ निपटने में यदि सरकार सफल हुई तो निराश हताश समाज के मन में फिर से प्रशासकों के प्रति विश्वास बढ़ेगा।सभी प्रकार के कठोर कानूनों के सफल क्रियान्वयन से भ्रष्टाचार आदि आपदाओं से देश मुक्त होगा। भ्रष्टाचार मिटते ही न केवल आपराधिक वारदातों में कमी आएगी अपितु महँगाई में भी लगाम लगेगी ।सभी देश वासियों की सुरक्षा का वातावरण बनेगा।
दूसरी बात यह है कि जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गई थी उस समय क्षिप्र संज्ञक अश्वनी था।इसमें अस्थाई काम तो किए जा सकते थे जैसे दुकान करना या कोई भी कला संबंधी कार्य कर पाना संभव था।इसी प्रकार मस्जिद का भी भविष्य कुछ भी नहीं था इसलिए वह भी टूट गई।यहाँ विशेष बात यह है कि उसी समय मंदिर निर्माण के लिए चबूतरा या अस्थाई मंदिर बना दिया गया था किन्तु जो महूर्त तोड़ने का था उसी मुहूर्त में शिलान्यास कैसे किया जा सकता था? तोड़ने के मुहूर्त में किसी चीज का जोड़ना कैसे संभव हो सकता है। मत्स्य वेध करके अर्जुन ने द्रोपदी के साथ विवाह किया था।इसीप्रकार धनुष तोड़कर श्री राम ने सीता जी से विवाह किया था। इसलिए अर्जुन और द्रोपदी एवं श्री राम और सीता जी का सम्पूर्ण जीवन भटकते हुए संघर्ष पूर्वक बीता।
जैसे धनुष तोड़ने का काम वर्षों से चल रहा था किन्तु कोई तोड़ नहीं पा रहा था उसीप्रकार बाबरी मस्जिद भी विवादित चल रही थी। धनुष तोड़ने का काम भी अश्वनी नक्षत्र में हुआ था और बाबरी मस्जिद भी अश्वनी नक्षत्र में ही तोड़ी जा सकी थी ।अंतर इतना रहा कि वशिष्ठ आदि ऋषियों ने धनुष टूटने के बाद उसके बारहवें दिन शुभ मुहूर्त विवाह नक्षत्र उत्तरा फाल्गुनी में श्री राम और सीता का विवाह करवाया गया था। इस कारण दोष कुछ टल गया था फिर भी बहुत कुछ सहना पड़ा था।उसका कारण था कि धनुष टूटने के साथ ही विवाह मान लिया गया था टूटतही धनुभयउविवाहू।सुरनरनाग विदित सब काहू
चूँकि रहेउ विवाह चाप आधीना
इसीलिए
गुरु वशिष्ठ से पंडित ग्यानी शोधि केलगन धरी ।
फिर भी
सीता हरण मरण दशरथ को बन में बिपति परी ।।
चूँकि धनुष टूटते हीश्री राम और सीता का विवाह हो गया था इसलिए वशिष्ठ जी का प्रयास विशेष कारगर सिद्ध नहीं हो सका, किन्तु बाबरी मस्जिद टूटने के साथ ऐसी कोई प्रतिज्ञा नहीं जुड़ी थी ।यहाँ तुरन्त शिलान्यास न करके यदि शुभ मुहूर्त में किया जाता तो संभव है कि मंदिर बनने का अबतक कोई समाधान निकल ही जाता।चूँकि इस्वी सन 1527 में सनातन हिंदुओं ने विजय दशमी,दीपावली और रामनवमी पर्व बहुत बड़े जन समूह के साथ उमड़ घुमड़ कर अत्यंत धूम धाम से मनाए थे।श्रीराम प्रभु के प्रति हिन्दुओं की इतनी श्रृद्धा देखकर ये विधर्मी सह नहीं सके थे इसलिए श्रीराम मंदिर तोड़कर उसी पर बाबरी मस्जिद बना डाली ।चूँकि उन्होंने भी मंदिर तोड़ने के साथ ही उसी पर मस्जिद का निर्माण किया था तोड़ने के साथ ही जोड़ने का अर्थ होता है कि इसका कोई स्थायित्व नहीं होगा ये कभी भी तोड़ी जा सकती है इस कारण बाबरी मस्जिद बनने के साथ ही उसका विध्वंस जुड़ा था।उसीप्रकार यदि इसी अस्थाई श्री राम चबूतरे पर ही यदि मंदिर बना दिया गया तो
बाबरी मस्जिद विध्वंस का कुयोग श्री मंदिर के साथ भी आरम्भ से ही जुड़ जाएगा।इसलिए इससे बचा जाना चाहिए ।
चूँकि उस मस्जिद तोड़ी जा सकी थी इससे यह प्रमाणित भी होता
है कि वह मुहूर्त मकान टूटने का ही था तो ऐसे समय में मकान बनाना कैसे
प्रारम्भ किया जा सकता था?
इसलिए श्री राम
मंदिर निर्माण के लिए कोई और मुहूर्त देख कर उसमें शिलान्यास करने से
मंदिर निर्माण का स्वप्न साकार किया जा सकता है
यहाँ एक विशेष बात का ध्यान और रखा जाना चाहिए कि इस देश की दो सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टियों के प्रमुखों के नाम रा अक्षर से प्रारंभ होते हैं राजनाथ और राहुल ये दोनों से ही राम मंदिर में ईमानदारी पूर्वक समर्पणात्मक सहयोग की आशा नहीं की जानी चाहिए।
यहाँ ज्योतिष एक बहुत बड़ा कारण है। किन्हीं दो या दो से अधिक लोगों का नाम यदि एक अक्षर से ही प्रारंभ होता है तो ऐसे सभी लोगों के आपसी संबंध शुरू में तो अत्यंत मधुर होते हैं बाद में बहुत अधिक खराब हो जाते हैं, क्योंकि इनकी पद-प्रसिद्धि-प्रतिष्ठा -पत्नी-प्रेमिका आदि के विषय में पसंद एक जैसी होती है। इसलिए कोई सामान्य मतभेद भी कब कहॉं कितना बड़ा या कभी न सुधरने वाला स्वरूप धारण कर ले या शत्रुता में बदल जाए कहा नहीं जा सकता है।
जैसेः-राम-रावण, कृष्ण-कंस आदि। इसी प्रकार और भी उदाहरण हैं।
रामलीला मैदान में पहुँचने से पहले तो रामदेव को मंत्री गण मनाने पहुँचे फिर रामलीला मैदान में पहुँचने के बाद राहुल को ये पसंद नहीं आया तो रामदेव वहाँ से भगाए गए।
दूसरी बार फिर रामदेव रामलीला मैदान पहुँचे इसके बाद राजीवगाँधी स्टेडियम जा रहे थे फिर राहुल को पसंद न आता और लाठी डंडे चल सकते थे किन्तु अम्बेडकर स्टेडियम ने बचा लिया।
इसप्रकार से जब रा अक्षर वालों ने रा अक्षर वालों का साथ नहीं दिया तो राहुल और राजनाथ राम मंदिर का समर्थन कितना या कितने मन से करेंगे कैसे कहा जा सकता है? राम मंदिर प्रमुख रामचन्द्र दास परमहंसजी महाराज एवं उस समय के डी.एम. रामशरण श्रीवास्तव के और राम मंदिर इन तीनों का आपसी तालमेल सन 1990 में अच्छा नहीं रहा परिणामतः संघर्ष चाहें जितना रहा हो किन्तु मंदिर निर्माण की दिशा में कोई विशेष सफलता नहीं मिली।
दिल्ली भाजपा के चार विजयों के समूह का एक साथ एक क्षेत्र में एक समय पर काम करना आगामी चुनावों में राजनैतिक भविष्य के लिए चिंता प्रद हैं।इसी कारण से पहले भी कांग्रेस विजय पाती रही है।
विजयेंद्रजी -विजयजोलीजी
विजयकुमारमल्होत्राजी - विजयगोयलजी
इसी प्रकार भारत वर्ष में भाजपा राजग बनाकर ही सत्ता में आ पाने में सफल हो सकी।जबकि इससे कम सदस्य संख्या वाले एवं अटलजी से कमजोर व्यक्तित्व वाले लोग भी यहाँ प्रधानमंत्री बने हैं।कई प्रदेशों में भाजपा की सरकारें भी अच्छी तरह से चल भी रही हैं ।
कलराजमिश्र-कल्याण सिंह
ओबामा-ओसामा
अरूण जेटली- अभिषेकमनुसिंघवी
मायावती-मनुवाद
नरसिंहराव-नारायणदत्ततिवारी
लालकृष्णअडवानी-लालूप्रसाद
परवेजमुशर्रफ-पाकिस्तान
भाजपा-भारतवर्ष
मनमोहन-ममता-मायावती
उमाभारती - उत्तर प्रदेश
अमरसिंह - आजमखान - अखिलेशयादव
अमर सिंह - अनिलअंबानी - अमिताभबच्चन
नितीशकुमार-नितिनगडकरी-नरेंद्रमोदी प्रमोदमहाजन-प्रवीणमहाजन-प्रकाशमहाजन अन्नाहजारे-अरविंदकेजरीवाल-असीम त्रिवेदी-अग्निवेष- अरूण जेटली - अभिषेकमनुसिंघवी
अन्ना हजारे के आंदोलन के तीन प्रमुख ज्वाइंट थे अन्ना हजारे, अरविंदकेजरीवाल,असीमत्रिवेदी एवं अग्निवेष जिन्हें एक दूसरे से तोड़कर ये आंदोलन ध्वस्त किया जा सकता था। इसमें अग्निवेष कमजोर पड़े और हट गए। दूसरी ओर जनलोकपाल के विषय में लोक सभा में जो बिल पास हो गया वही राज्य सभा में क्यों नहीं पास हो सका इसका एक कारण नाम का प्रभाव भी हो सकता है। सरकार की ओर से अभिषेकमनुसिंघवी थे तो विपक्ष के नेता अरूण जेटली जी थे। इस प्रकार ये सभी नाम अ से ही प्रारंभ होने वाले थे। इसलिए अभिषेकमनुसिंघवी की किसी भी बात पर अरूण जेटली का मत एक होना ही नहीं था।अतः राज्य सभा में बात बननी ही नहीं थी। दूसरी ओर अभिषेकमनुसिंघवी और अरूण जेटली का कोई भी निर्णय अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल को सुख पहुंचाने वाला नहीं हो सकता था। अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल का महिमामंडन अग्निवेष कैसे सह सकते थे?अब अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल कब तक मिलकर चल पाएँगे?कहना कठिन है।असीमत्रिवेदी भी अन्नाहजारे के गॉंधीवादी बिचारधारा के विपरीत आक्रामक रूख बनाकर ही आगे बढ़े। आखिर और लोग भी तो थे। अ अक्षर से प्रारंभ नाम वाले लोग ही अन्नाहजारे से अलग क्यों दिखना चाहते थे ? ये अ अक्षर वाले लोग ही अन्नाहजारे के इस आंदोलन की सबसे कमजोर कड़ी हैं।
अन्नाहजारे की
तरह ही अमर सिंह जी भी अ अक्षर वाले लोगों से ही व्यथित देखे जा सकते हैं।
अमरसिंह जी की पटरी पहले मुलायम सिंह जी के साथ तो खाती रही तब केवल आजमखान
साहब से ही समस्या होनी चाहिए थी किंतु अखिलेश यादव का प्रभाव बढ़ते ही
अमरसिंह जी को पार्टी से बाहर जाना पड़ा। ऐसी परिस्थिति में अब अखिलेश के
साथ आजमखान कब तक चल पाएँगे? कहा नहीं जा सकता। पूर्ण बहुमत से बनी उत्तर
प्रदेश में सपा सरकार का यह सबसे कमजोर ज्वाइंट सिद्ध हो सकता है
चूँकि
अमरसिंह जी के मित्रों की संख्या में अ अक्षर से प्रारंभ नाम वाले लोग ही
अधिक हैं इसलिए इन्हीं लोगों से दूरियॉं बनती चली गईं। जैसेः- आजमखान
अमिताभबच्चन अनिलअंबानी अभिषेक बच्चन आदि।
राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध संस्थान की अपील
यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु आदि समस्त भारतीय प्राचीन विद्याओं सहित शास्त्र के किसी भी पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी लेना चाह रहे हों।
यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है।
सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान है।
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