भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को न सफलता मिलती है और न ही सुख ! विवाह, विद्या ,मकान, दुकान ,व्यापार, परिवार, पद, प्रतिष्ठा,संतान आदि का सुख हर कोई अच्छा से अच्छा चाहता है किंतु मिलता उसे उतना ही है जितना उसके भाग्य में होता है और तभी मिलता है जब जो सुख मिलने का समय आता है अन्यथा कितना भी प्रयास करे सफलता नहीं मिलती है ! ऋतुएँ भी समय से ही फल देती हैं इसलिए अपने भाग्य और समय की सही जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए |एक बार अवश्य देखिए -http://www.drsnvajpayee.com/
Saturday, July 12, 2014
astro
बंधुवर !
एक निवेदन मेरा है कि जो लोग धर्म शास्त्रों को मजाक समझते हैं इसलिए उस विषय में साईं या अन्य विषयों में मन माने तर्क गढ़ लिया करते हैं और शास्त्रार्थ के नाम पर चोंच लड़ाना शुरू कर देते हैं हैं ये अच्छी परंपरा नहीं है आखिर सरकार ने संस्कृत विश्वद्यालय बनाए किस लिए हैं वहाँ पुराणों से लेकर हर सब्जेक्ट का डिपार्टमेंट है जिसमें कई कई शिक्षक होते हैं जिनकी लगभग एक लाख रूपए सैलरी होती है आखिर सरकार कुछ सोच कर ही दे रही होगी और वहाँ कुछ पढ़ाया भी जाता होगा जब सामान्य विश्व विश्वद्यालयों की तरह ही उसमें भी एम. ए.पी.एच.डी.आदि होती है तो आखिर कुछ तो सरकार को आवश्यक लगा ही होगा तब वो ऐसा कर रही है!ऐसी परिस्थिति में जो लोग ऐसे किसी शिक्षण संस्थान या मजबूत गुरुपरम्परा का आश्रय लिए बिना कुछ धार्मिक पुस्तकों के हिंदी टीका पढ़कर बहस के नाम पर केवल चोंच लड़ाते हैं मैं उनसे अपने को अलग रखना चाहता हूँ आखिर बीस वर्ष तक संस्कृत विश्वद्यालयों की परंपरा में रहकर जिन आकर ग्रंथों का अध्ययन किया गया है उसकी गरिमा से समझौता करने की मेरी मजबूरी क्या है !
हमने ज्योतिष विषय से एम. ए.पी.एच.डी.किया है हमारे संस्थान में बिलकुल ज्योतिष वैज्ञानिक की तरह लोगों को ज्योतिष की सेवाएँ लिखित एवं प्रमाणित रूप से दी जाती हैं !उसमें कई बार ऐसे लोग चोंच लड़ाने चले आते हैं जिनका ज्योतिष का स्वयं कोई ज्ञान नहीं होता है और किसी पढ़े लिखे ज्योतिषी से उनका कभी कोई संपर्क भी नहीं रहा होता है ,बहुत तंग करते हैं ऐसे लोग !
बंधुओं ! ऐसे लोगों ने उन लोगों को विद्वान मान लिया है जिनका ज्योतिष से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध ही नहीं होता है समाज को आज कुछ ऐसा भ्रम सा हो गया कि अच्छे महात्मा और पढ़े लिखे विद्वान की पहचान उसके पास बहुत पैसे का होना, बड़े बड़े नेताओं का आना जाना लगा रहना या उसका विदेश में भी अपने काम के प्रचार प्रसार के लिए जाना आना आदि,अधिक से अधिक टी.वी.पर दिखाई पड़ना,या ज्योतिष आदि विषयों के विषय में टी. वी. चैनलों पर बैठ कर बड़ी बड़ी बातें करे,या कुछ पढ़ावे,या कुंडली देखना सिखावे या भविष्य बदलने की बात करने लगे लोग ऐसे लोगों को विद्वान समझते हैं आज कल और जिसके पास ये कुछ नहीं वो पढ़ा लिखा मूर्ख माना जाता है । यही वर्तमान समय में यही ज्योतिष आदि शास्त्रों के उपहास का प्रमुख कारण है और शास्त्रीय विषयों का सम्मान एवं क्वालिटी भी इसी लिए घटी है !
वस्तुतः इसप्रकार के प्रचार प्रसार से सम्बंधित सभी कार्य करने के लिए धन की अधिक आवश्यकता होती है और धन दो प्रकार से मिलता है एक तो आता है और एक लाया जाता है बिलकुल किसी गाय के दूध की तरह वो जो स्वाभाविक दूध देती है वो तो सर्व गुण संपन्न होता है किंन्तु इंजेक्सन लगा कर जबरदस्ती निकला जाता है उसमें उतने गन नहीं होते ठीक इसी प्रक़र से ज्योतिष आदि विषयों में भी जब तक सच बोल कर जो पैसे समाज से मिलते हैं वो परिश्रम की कमाई कोई बर्बाद नहीं करेगा किन्तु कालसर्पदोष बताकर नग नगीनों का कमीशन लेकर,वास्तु दोष का बहम डालकर ,यदि ऐसा नहीं करोगे तो वैसा हो जाएगा आदि आदि भय भावना भरके जो थोड़े प्रयास में अधिक पैसा कलेक्ट किया जाता है उसे प्रचार प्रसार में खर्च करने में अधिक कठिनाई नहीं होती है क्योंकि वो इंजेक्सन लगाकर निकाला गया दूध होता है! पुराने लोग पहले भी कहा करते थे कि बिना पाप के बहुत काम समय में अधिक धन नहीं कमाया जा सकता है। बिना धन के प्रचार प्रसार कैसे किया जा सकता है ! और यदि आप प्रचार प्रसार नहीं कर पाए तो आपके पास भीड़ नहीं होगी और यदि आपके पास भीड़ नहीं होगी तो आप विद्वान नहीं हैं यदि आप कुछ मंत्री मंत्रियों के साथ लिपट चिपट कर फोटो खिंचवा पाए तो और बड़े विद्वान ,और यदि आप टी.वी.चैनलों का मोटा मोटा पेमेंट करके वहाँ जाकर कुंडली कुंडली कहकर कुछ कुछ बोलने लगे तो आप और बड़े विद्वान बन गए ,और यदि आप ज्योतिष पढ़ाने लगे तो आपके विषय में समाज जरूर समझ जाता है कि इन बेचारों ने यदि ज्योतिष पढ़ी न होती तो पढ़ा कैसे पाते पढ़ा रहे हैं इसका मतलब जरूर पढ़ी होगी !
में कमीशन के लिए ये सब कुछ है आदि है के पास पैसा
गलती से वो लोग कुछ ऐसे लोगों को ज्योतिषी मान बैठे हैं जिन लोगों का ज्योतिष शास्त्र से कोई संबंध ही नहीं होता है न किसी संस्कृत विश्व विद्यालय के ज्योतिष पाठ्यक्रम से ही उनका कोई सम्बन्ध रहा होता है फिर भी वो पैसे खर्च करके अपने को ज्योतिषी सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं!कुछ लोग टी.वी.पर पढ़ाने लगते हैं कुछ कुंडली समझने लगते हैं कुछ नेताओं मंत्रियों के साथ अपनी फोटो लेकर टी.वी.पर ज्योतिष की कुछ बातें बोल बताकर या इधर उधर लाप्प झप्प करके किसी प्राइवेट संस्था से अपने ज्योतिषी होने के विषय में कुछ लिखवा कर कुछ लोग अपने ज्योतिषी होने का पैसे के बल पर प्रचार प्रसार कर लेते हैं ऐसे लोगों के अनुयायी कई बार बहुत तंग करते थे वो ये मानने को ही तैयार नहीं होते हैं कि उनके ज्योतिषी कम पढ़े लिखे हुए हैं हो जाएँ कि उनके ज्योतिषी जी के यहाँ मंत्रियों का आना जाना रहता है बहुत बन फटो खिंचवाकर खूँटों के साथ से ही उनका
बंधुओं ! ऐसे लोगों ने उन लोगों को विद्वान मान लिया है जिनका ज्योतिष से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध ही नहीं होता है समाज को आज कुछ ऐसा भ्रम सा हो गया कि अच्छे महात्मा और पढ़े लिखे विद्वान की पहचान उसके पास बहुत पैसे का होना, बड़े बड़े नेताओं का आना जाना लगा रहना या उसका विदेश में भी अपने काम के प्रचार प्रसार के लिए जाना आना आदि,अधिक से अधिक टी.वी.पर दिखाई पड़ना,या ज्योतिष आदि विषयों के विषय में टी. वी. चैनलों पर बैठ कर बड़ी बड़ी बातें करे,या कुछ पढ़ावे,या कुंडली देखना सिखावे या भविष्य बदलने की बात करने लगे लोग ऐसे लोगों को विद्वान समझते हैं आज कल और जिसके पास ये कुछ नहीं वो पढ़ा लिखा मूर्ख माना जाता है । यही वर्तमान समय में यही ज्योतिष आदि शास्त्रों के उपहास का प्रमुख कारण है और शास्त्रीय विषयों का सम्मान एवं क्वालिटी भी इसी लिए घटी है !
वस्तुतः इसप्रकार के प्रचार प्रसार से सम्बंधित सभी कार्य करने के लिए धन की अधिक आवश्यकता होती है और धन दो प्रकार से मिलता है एक तो आता है और एक लाया जाता है बिलकुल किसी गाय के दूध की तरह वो जो स्वाभाविक दूध देती है वो तो सर्व गुण संपन्न होता है किंन्तु इंजेक्सन लगा कर जबरदस्ती निकला जाता है उसमें उतने गन नहीं होते ठीक इसी प्रक़र से ज्योतिष आदि विषयों में भी जब तक सच बोल कर जो पैसे समाज से मिलते हैं वो परिश्रम की कमाई कोई बर्बाद नहीं करेगा किन्तु कालसर्पदोष बताकर नग नगीनों का कमीशन लेकर,वास्तु दोष का बहम डालकर ,यदि ऐसा नहीं करोगे तो वैसा हो जाएगा आदि आदि भय भावना भरके जो थोड़े प्रयास में अधिक पैसा कलेक्ट किया जाता है उसे प्रचार प्रसार में खर्च करने में अधिक कठिनाई नहीं होती है क्योंकि वो इंजेक्सन लगाकर निकाला गया दूध होता है! पुराने लोग पहले भी कहा करते थे कि बिना पाप के बहुत काम समय में अधिक धन नहीं कमाया जा सकता है। बिना धन के प्रचार प्रसार कैसे किया जा सकता है ! और यदि आप प्रचार प्रसार नहीं कर पाए तो आपके पास भीड़ नहीं होगी और यदि आपके पास भीड़ नहीं होगी तो आप विद्वान नहीं हैं यदि आप कुछ मंत्री मंत्रियों के साथ लिपट चिपट कर फोटो खिंचवा पाए तो और बड़े विद्वान ,और यदि आप टी.वी.चैनलों का मोटा मोटा पेमेंट करके वहाँ जाकर कुंडली कुंडली कहकर कुछ कुछ बोलने लगे तो आप और बड़े विद्वान बन गए ,और यदि आप ज्योतिष पढ़ाने लगे तो आपके विषय में समाज जरूर समझ जाता है कि इन बेचारों ने यदि ज्योतिष पढ़ी न होती तो पढ़ा कैसे पाते पढ़ा रहे हैं इसका मतलब जरूर पढ़ी होगी !
में कमीशन के लिए ये सब कुछ है आदि है के पास पैसा
गलती से वो लोग कुछ ऐसे लोगों को ज्योतिषी मान बैठे हैं जिन लोगों का ज्योतिष शास्त्र से कोई संबंध ही नहीं होता है न किसी संस्कृत विश्व विद्यालय के ज्योतिष पाठ्यक्रम से ही उनका कोई सम्बन्ध रहा होता है फिर भी वो पैसे खर्च करके अपने को ज्योतिषी सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं!कुछ लोग टी.वी.पर पढ़ाने लगते हैं कुछ कुंडली समझने लगते हैं कुछ नेताओं मंत्रियों के साथ अपनी फोटो लेकर टी.वी.पर ज्योतिष की कुछ बातें बोल बताकर या इधर उधर लाप्प झप्प करके किसी प्राइवेट संस्था से अपने ज्योतिषी होने के विषय में कुछ लिखवा कर कुछ लोग अपने ज्योतिषी होने का पैसे के बल पर प्रचार प्रसार कर लेते हैं ऐसे लोगों के अनुयायी कई बार बहुत तंग करते थे वो ये मानने को ही तैयार नहीं होते हैं कि उनके ज्योतिषी कम पढ़े लिखे हुए हैं हो जाएँ कि उनके ज्योतिषी जी के यहाँ मंत्रियों का आना जाना रहता है बहुत बन फटो खिंचवाकर खूँटों के साथ से ही उनका
ये जितने प्रश्न आपने किए हैं यदि इस परंपरा से कोई धर्म शास्त्र शिक्षित व्यक्ति होता तो उसे इनके विषय में न केवल शास्त्रीय अपितु वैज्ञानिक उत्तर स्वयं ही पता होते दो चार न भी पता होते तो बताए जा सकते थे किन्तु बिलकुल नए व्यक्ति को सारी जानकारी बिना पढ़े ही कैसे दी जा सकती है वैसे भी मैंने यहाँ कोई स्कूल तो खोल नहीं रखा है किसी ने कुछ पढ़ा हो तो कुछ समझाना आसान हो जाता है !अब आपसे ये जानना चाहता हूँ कि प्राचीन विद्याओं के विषय में किसी संस्कृत विश्वद्यालय से कुछ पढ़ा है और यदि पढ़ा है तो किस विषय में किस क्लास तक आप बता दें तो उससे मुझे अपनी बात आप तक पहुँचाने में आसानी हो जाएगी कुछ मैं बताऊँगा कुछ आपसे पूछूंगा आपको समझ भी आ जाएगा और बात भी साफ हो जाएगी अन्यथा बेकार में चोच लड़ाने का कोई फायदा ही नहीं समाज में बहुत लोग बहुत कुछ नहीं मानते हैं तो वो उनका विषय है हमारा काम लिखना है जिन्होंने कुछ पढ़ा होगा वो समझेंगे ।
आपने कहा भगवान श्री राम थे मैं नहीं मानता साबित करिए मैं कैसे साबित कर दूँ ये शास्त्रीय स्वाध्याय एवं चिंतन करने से आपको स्वयं इसका ज्ञान होगा कोई और कैसे साबित करेगा ये आपके अंतस का विषय है अब कोई आम आदमी जिसे चिकित्सा के विषय में कुछ भी न पता हो वो कहे कि हार्ट सर्जरी मैं तो नहीं मानता तो डाक्टर को क्या करना चाहिए उसके सामने किसी व्यक्ति को लिटाकर उसकी सर्जरी करने लगना चाहिए खैर ,वो आपका विषय है
Friday, July 11, 2014
लोक सभा की नींद का आनंद ही कुछ और है !
खबरदार कोई डिस्टर्ब न करे इस समय बड़े लोग शयन कर रहे हैं !सुना जाता है कि मोदी जी दिन रात काम ले रहे हैं किन्तु ये तो यहीं पोल खोल रहे हैं बाकी का भगवान मालिक !
रात रात भर जगते रहते इतनी मेहनत इतना काम।
कहाँ भाग्य में बदी सभी के यह संसद सदनी आराम ॥
मोदी जी का राज सुखद है बहुमत भी है अपने पास।
शीतल मंद सुगंध पवन है अच्छे अवसर का एहसास ॥
मंत्री पद पर हुई प्रतिष्ठा और न है कोई अभिलाष ।
इतने में संतोष हमें है होगा अपने आप विकास ॥
संसद शयन सुरक्षित सुन्दर सुखद स्वप्न के सारे रंग ।
चिंता रहित मस्त यह जीवन संसद में अतुलित आनंद ॥
-डॉ.एस.एन.वाजपेयी
कहाँ भाग्य में बदी सभी के यह संसद सदनी आराम ॥
मोदी जी का राज सुखद है बहुमत भी है अपने पास।
शीतल मंद सुगंध पवन है अच्छे अवसर का एहसास ॥
मंत्री पद पर हुई प्रतिष्ठा और न है कोई अभिलाष ।
इतने में संतोष हमें है होगा अपने आप विकास ॥
संसद शयन सुरक्षित सुन्दर सुखद स्वप्न के सारे रंग ।
चिंता रहित मस्त यह जीवन संसद में अतुलित आनंद ॥
-डॉ.एस.एन.वाजपेयी
आखिर क्यों ? बहस समझ में नहीं आ रही थी या बहस सुनना जरूरी नहीं समझ रहे थे,या सत्ता से हटने के बाद जिम्मेदारियाँ घटने से मन हल्का हुआ और नींद आ गई ,या कोई तनाव है जो घर में सोने नहीं देता संसदीय चर्चा में मन भटक गया और नींद आ गई,या अगले पाँच वर्ष तक खालीपन की निश्चिंतता का एहसास है कि कौन क्या कह रहा है कहने दो अभी से क्या चिंता जब चुनाव आएँगें तब फिर सुन लेंगे दो चार भाषण अभी से कौन मत्था मारने जाए ,या जो मैंने दस वर्ष किया है और हम लोगों ने बोला है मिलाजुला कर कर वही करना और वही बोलना मोदी जी को भी है इसलिए नया क्या होगा जो सुनें इसलिए नींद आ गई !
बलात्कार तब हो रहे थे वो अभी भी हो रहे हैं महँगाई तब थी महँगाई अब है डीजल पेट्रोल के दाम तब बढ़ रहे थे वो अभी भी बढ़ रहे हैं चुनावों में जीतकर जो पार्टी सरकार में आती है उसे सपने बड़े बड़े जनता को दिखाने ही पड़ते हैं और जब सरकार में आती है तो धन के अभाव में उन्हें पूरा करना कठिन हो ही जाता है तब बताना ही पड़ता है कि पिछली सरकार खजाना खाली करके गई है इसमें कोई नै बात नहीं है क्या सुनें ऐसा हर कोई कहता और करता है वो तो कहना ही पड़ेगा आखिर जनता को कुछ जवाब तो देना ही है देने दो क्या करना है ये सब बातें सुन के ,कुछ दिनों में धीरे धीरे जनता को सच्चाई समझ में आ जाएगी कि खजाना ही होता तो काम पिछली सरकार भी कर सकती थी वो कब हारना चाहती थी चुनाव !
खजाना खाली खजाना खाली ऐसा कहते कहते धीरे धीरे बाकी सरकारों की तरह ही नई सरकार भी महँगाई की कड़ुई दवा पिलाने लगती है और धीरे धीरे जनता को भी सहने का अभ्यास होने लगता है !
चुनावों के समय खजाना खाली करने के लिए लाखों करोड़ के घोटालों का तत्कालीन सरकार पर आरोप लगाया जाता है किन्तु ये आरोप यदि सच होते हों तो दाम बढ़ाने की जरूरत क्या है वही घोटालों और भ्रष्टाचार वाला पैसा निकलवाना चाहिए और लेना चाहिए काम में किन्तु सत्ता में आने के बाद कौन कराता है किसकी जाँच !और कोई थोड़ा बहुत हाथ पैर मारे भी तो बदले की कार्यवाही कह कर बंद करा दी जाएगी जाँच आखिर किसे नहीं पता होता है कि कल जब ये सत्ता में आएँगे और हम विपक्ष में होंगे तो वही होगा हमारे साथ जो हम आज इनके साथ करेंगे इसलिए अपना बुरा कोई नहीं चाहता है वैसे भी कोई केवट किसी और केवट से कहाँ लेता है उतराई ! देखिए यू. पी. में सपा बसपा जैसे परस्पर विरोधी दल दोनों चुनावों के समय एक दूसरे पर बड़े बड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं किन्तु जब सत्ता में आ जाते हैं तो बड़े प्रेम से मिलजुल कर रहते हैं दोनों अपनी अपनी बारी की प्रतीक्षा में काट लेते हैं दिन !वो बात और है जब विपक्षी पार्टी के नेताओं को मीडिया वाले पिन मार देते हैं तो कह देते हैं कि सरकार चोर है खूब घोटाला हो रहे हैं कानून व्यवस्था चरमरा गई है बाकी ऐसी गर्मी में कौन जाता है घर से निकल कर जनता को देखने हाँ चुनावों के समय तो मजबूरी हो जाती है जाना ही पड़ता है पांच वर्ष के रोजी रोजगार की बात होती है !
इसलिए ऐसे लोकतंत्र में किसी के भाषणों का क्या महत्त्व जहाँ अपनी कही हुई बातों पर अमल करने के लिए कोई बचन बद्ध नहीं होता है फिर क्यों अपना समय ऐसे वैसे बिताना बल्कि इससे तो अच्छा ये है कि समय का सदुपयोग करो और सो जाओ वैसे भी जो जाग रहे थे वही कौन सुन रहे थे वहाँ होने वाले भाषण !हाँ कुछ हंगामा वंगामा होता तो बात और ही थी कोई किसी को गाली दे देता तो सब ने सुनी होती और सबको याद होती किसी से पूछ लिया जाता एक भी मात्र पाई छूूटती नहीं सब पूरी पूरी बात बताते कि कैसे किसने कौन सी गाली दी थी किन्तु ऐसे सामान्य नीरस भाषणों में किसने क्या कहा किसको याद रहता है और सुनता ही कौन है मीडिया वाले सुन लेते हैं उतना बहुत है चबा चबा कर मीडिया वाले खुद बताएँगे दिन बताएँगे रात बताएँगे समझा समझाकर बताएँगे फिर क्यों नींद ख़राब करना ! ऐसे अपनी सुविधानुशार जब चाहेंगे तब टी वी पर या नेट में देख सुन लेंगे कुछ जरूरी होगा तो !
रही बात भाषण की किसी से पूछ लो जो जग रहे थे वही कहाँ सुन रहे थे हाँ कुछ प्रतिशत लोग ही बता पाएँगे कि आज संसद में क्या क्या बोला गया था बाकी तो जागते हुए भी सो रहे होंगे राहुल जी तो सोते हुए सो रहे थे कोई बात नहीं थकावट तो उतारनी ही चाहिए !
Wednesday, July 9, 2014
बधाई श्री अमितशाह जी को !
भाजपा के अभिनव अध्यक्ष जी को बहुत बहुत बधाई !
किसको किसकी बधाई दी जाए मैंने सुना है कि उत्तर प्रदेश में अमित शाह जी ने भयंकर परिश्रम किया है उस कारण से मोदी जी प्रधान मंत्री बन पाए इस नाते बधाई अमित शाह जी के लिए बनती है फिर एक बात आई कि आजकल पार्टी में मोदी जी की ही चलती है और उन्होंने ही अमित शाह जी को पार्टी का अध्यक्ष बनवाया है तो मैंने सोचा कि ऐसे तो बधाई मोदी जी की बनती है तो मैंने सोचा मोदी जी को बधाई दे देते हैं तब तक विचार आया कि उस समय अध्यक्ष राजनाथ सिंह जी थे उनकी कार्यकुशलता और सुन्दर प्रबंधन को इस जीत का श्रेय जाता है यदि ऐसा न हुआ होता तो शायद ऐसे सुखद अवसर नहीं मिल पाते तो बधाई तो राजनाथ सिंह जी की बनती है तब तक जोशी जी आडवाणी जी अटल जी जैसे सभी महान नेताओं के वट वृक्षीय विराट व्यक्तित्व की साधना की ओर दृष्टि गई तो चिंतन करते ही आँखें भर आईं और अधीर हो उठा मन पहले उन्हें नमन करने के लिए !
हे अभिनव अध्यक्ष जी ! मुझे यह संवाद अत्यंत सुखद लगा और एक क्षण के लिए कौंध गया भाजपा की संघर्ष यात्रा का विराट परिदृश्य और अपने बयोवृद्ध नेतृत्व का त्याग तपस्या और बलिदान का जीवन ! सबसे बड़ी पार्टी होकर उभरने के बाद भी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सत्ता से खदेड़े जाते हुए देखा गया है -कैसे भूल जाया जाए वह दिन जब -
"रो चला था देश देख उनकी विनम्रता को
तेरह दिनों का ताज हँसके उतारा था "
श्री अटल जी आडवाणी जी जैसे धवल चरित्र लोगों का उपहास आज भी वो लोग उड़ाते हैं जिनका चरित्र से कोई सम्बन्ध ही नहीं है फिर भी उन्होंने रथयात्रा का रथ तो रोक ही लिया था इसलिए वो कह भी सकते हैं इसीलिए वो लोगों के सामने खिल्ली उड़ाने के लिए कहते भी हैं किन्तु उन बेचारों को यह नहीं पता है कि आप आडवाणी जी की रथयात्रा रोकने में भले ही सफल हो गए हों किन्तु उन्हीं आडवाणी जी की मनोरथ यात्रा रोक नहीं पाए थे और उसी का परिणाम है कि आज उन्हीं अटल आडवाणी जी की अँगुली पकड़ कर राजनीति में चलाए गए भाजपा के राष्ट्र साधक लालकिले पर झंडा फहराने को तैयार हैं जिस भगवा ध्वज से भगवा विरोधियों को चिढ़ थी आज उसी भगवा की छाँव में पले बढ़े लोग संसद को प्रणाम करके संसद का गौरव बढ़ा रहे हैं जिन्हें भगवा से चिढ़ थी उनका कहीं अता पता नहीं है अजीब सा सूखा पड़ा है वहाँ !अजीब सा सन्नाटा है! बिलकुल महाभारत समाप्त होने के बाद जैसा !ऐसा सूखा पड़ा है जिसमें कहीं कहीं कोई बबूल वृक्ष विवश है अपना आस्तित्व बनाए रहने के लिए बाक़ी भगवा ही भगवा है अब 'जय श्री राम' के अमर उद्घोष को सांप्रदायिक कहकर कैसे दबाया जा सकेगा !
इस प्रकार का सौभाग्य छोटे बड़े समस्त भाजपा साधकों की जिस कठिन साधना से संभव हो सका है उन समस्त साधकों को नमन करते हुए बहुत बहुत बधाई भाजपा के अभिनव अध्यक्ष जी को !
लोक सभा में सोते दिखे राहुल गाँधी ! आखिर क्यों ?
संसद भवन में सोने का अपना ही आनंद है
रात रात भर जगते रहते इतनी मेहनत इतना काम।
कहाँ भाग्य में बदी सभी के यह संसद सदनी आराम ॥
मोदी जी का राज सुखद है बहुमत भी है अपने पास।
शीतल मंद सुगंध पवन है अच्छे अवसर का एहसास ॥
मंत्री पद पर हुई प्रतिष्ठा और न है कोई अभिलाष ।
इतने में संतोष हमें है होगा अपने आप विकास ॥
संसद शयन सुरक्षित सुन्दर सुखद स्वप्न के सारे रंग ।
चिंता रहित मस्त यह जीवन संसद में अतुलित आनंद ॥
-डॉ.एस.एन.वाजपेयी
कहाँ भाग्य में बदी सभी के यह संसद सदनी आराम ॥
मोदी जी का राज सुखद है बहुमत भी है अपने पास।
शीतल मंद सुगंध पवन है अच्छे अवसर का एहसास ॥
मंत्री पद पर हुई प्रतिष्ठा और न है कोई अभिलाष ।
इतने में संतोष हमें है होगा अपने आप विकास ॥
संसद शयन सुरक्षित सुन्दर सुखद स्वप्न के सारे रंग ।
चिंता रहित मस्त यह जीवन संसद में अतुलित आनंद ॥
-डॉ.एस.एन.वाजपेयी
आखिर क्यों ? बहस समझ में नहीं आ रही थी या बहस सुनना जरूरी नहीं समझ रहे थे,या सत्ता से हटने के बाद जिम्मेदारियाँ घटने से मन हल्का हुआ और नींद आ गई ,या कोई तनाव है जो घर में सोने नहीं देता संसदीय चर्चा में मन भटक गया और नींद आ गई,या अगले पाँच वर्ष तक खालीपन की निश्चिंतता का एहसास है कि कौन क्या कह रहा है कहने दो अभी से क्या चिंता जब चुनाव आएँगें तब फिर सुन लेंगे दो चार भाषण अभी से कौन मत्था मारने जाए ,या जो मैंने दस वर्ष किया है और हम लोगों ने बोला है मिलाजुला कर कर वही करना और वही बोलना मोदी जी को भी है इसलिए नया क्या होगा जो सुनें इसलिए नींद आ गई !
बलात्कार तब हो रहे थे वो अभी भी हो रहे हैं महँगाई तब थी महँगाई अब है डीजल पेट्रोल के दाम तब बढ़ रहे थे वो अभी भी बढ़ रहे हैं चुनावों में जीतकर जो पार्टी सरकार में आती है उसे सपने बड़े बड़े जनता को दिखाने ही पड़ते हैं और जब सरकार में आती है तो धन के अभाव में उन्हें पूरा करना कठिन हो ही जाता है तब बताना ही पड़ता है कि पिछली सरकार खजाना खाली करके गई है इसमें कोई नै बात नहीं है क्या सुनें ऐसा हर कोई कहता और करता है वो तो कहना ही पड़ेगा आखिर जनता को कुछ जवाब तो देना ही है देने दो क्या करना है ये सब बातें सुन के ,कुछ दिनों में धीरे धीरे जनता को सच्चाई समझ में आ जाएगी कि खजाना ही होता तो काम पिछली सरकार भी कर सकती थी वो कब हारना चाहती थी चुनाव !
खजाना खाली खजाना खाली ऐसा कहते कहते धीरे धीरे बाकी सरकारों की तरह ही नई सरकार भी महँगाई की कड़ुई दवा पिलाने लगती है और धीरे धीरे जनता को भी सहने का अभ्यास होने लगता है !
चुनावों के समय खजाना खाली करने के लिए लाखों करोड़ के घोटालों का तत्कालीन सरकार पर आरोप लगाया जाता है किन्तु ये आरोप यदि सच होते हों तो दाम बढ़ाने की जरूरत क्या है वही घोटालों और भ्रष्टाचार वाला पैसा निकलवाना चाहिए और लेना चाहिए काम में किन्तु सत्ता में आने के बाद कौन कराता है किसकी जाँच !और कोई थोड़ा बहुत हाथ पैर मारे भी तो बदले की कार्यवाही कह कर बंद करा दी जाएगी जाँच आखिर किसे नहीं पता होता है कि कल जब ये सत्ता में आएँगे और हम विपक्ष में होंगे तो वही होगा हमारे साथ जो हम आज इनके साथ करेंगे इसलिए अपना बुरा कोई नहीं चाहता है वैसे भी कोई केवट किसी और केवट से कहाँ लेता है उतराई ! देखिए यू. पी. में सपा बसपा जैसे परस्पर विरोधी दल दोनों चुनावों के समय एक दूसरे पर बड़े बड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं किन्तु जब सत्ता में आ जाते हैं तो बड़े प्रेम से मिलजुल कर रहते हैं दोनों अपनी अपनी बारी की प्रतीक्षा में काट लेते हैं दिन !वो बात और है जब विपक्षी पार्टी के नेताओं को मीडिया वाले पिन मार देते हैं तो कह देते हैं कि सरकार चोर है खूब घोटाला हो रहे हैं कानून व्यवस्था चरमरा गई है बाकी ऐसी गर्मी में कौन जाता है घर से निकल कर जनता को देखने हाँ चुनावों के समय तो मजबूरी हो जाती है जाना ही पड़ता है पांच वर्ष के रोजी रोजगार की बात होती है !
इसलिए ऐसे लोकतंत्र में किसी के भाषणों का क्या महत्त्व जहाँ अपनी कही हुई बातों पर अमल करने के लिए कोई बचन बद्ध नहीं होता है फिर क्यों अपना समय ऐसे वैसे बिताना बल्कि इससे तो अच्छा ये है कि समय का सदुपयोग करो और सो जाओ वैसे भी जो जाग रहे थे वही कौन सुन रहे थे वहाँ होने वाले भाषण !हाँ कुछ हंगामा वंगामा होता तो बात और ही थी कोई किसी को गाली दे देता तो सब ने सुनी होती और सबको याद होती किसी से पूछ लिया जाता एक भी मात्र पाई छूूटती नहीं सब पूरी पूरी बात बताते कि कैसे किसने कौन सी गाली दी थी किन्तु ऐसे सामान्य नीरस भाषणों में किसने क्या कहा किसको याद रहता है और सुनता ही कौन है मीडिया वाले सुन लेते हैं उतना बहुत है चबा चबा कर मीडिया वाले खुद बताएँगे दिन बताएँगे रात बताएँगे समझा समझाकर बताएँगे फिर क्यों नींद ख़राब करना ! ऐसे अपनी सुविधानुशार जब चाहेंगे तब टी वी पर या नेट में देख सुन लेंगे कुछ जरूरी होगा तो !
रही बात भाषण की किसी से पूछ लो जो जग रहे थे वही कहाँ सुन रहे थे हाँ कुछ प्रतिशत लोग ही बता पाएँगे कि आज संसद में क्या क्या बोला गया था बाकी तो जागते हुए भी सो रहे होंगे राहुल जी तो सोते हुए सो रहे थे कोई बात नहीं थकावट तो उतारनी ही चाहिए !धन्यवाद राहुल जी !!
Sunday, June 29, 2014
यदि ऐसा मान लिया जाए कि किसी का बाप किसी कारण से उसकी माँगें पूरी नहीं पा रहा हो और पड़ोसी उसकी माँगें पूरी करने लगे अर्थात जो मँगावे सो लाकर देने लगे तो क्या अपने बाप को छोड़कर उस पड़ोसी को मान लिया जाना चाहिए अपना बाप ?
यदि नहीं तो जोलोग कहते हैं कि किसी बुड्ढे को पूजने से उसकी मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं इसका मतलब क्या उसे भगवान बना लिया जाए !छिः ! हम इतने स्वार्थी हो गए ! हमें धिक्कार है !
ऐसे तो कल पड़ोसी देश के लोग हमें कुछ लालच देकर हमें अपना लेंगें तो हम उनके प्रति समर्पित हो जाएँगे ! आखिर कहाँ तक उचित है हमारा भिखारी बनकर जीना ? धिक्कार है हमें !भगवान हमें कुछ दे नहीं सके इसलिए भगवान बदल लिया !
जब भगवान नहीं दे सके तो वो बुड्ढा क्या दे सकेगा बने रहो भ्रम देखो कब तक अपनों को छोड़कर पड़ोसियों को पूजोगे !
Monday, June 23, 2014
साईंबाबा को भगवान बताने वालों को शास्त्रार्थ की खुली चुनौती !
अब अयोध्या में श्री राम मंदिर बनने की जगह साईं राम मंदिर बनेगा क्या !
साईं के नाम पर केवल सनातन धर्म की ही छीछालेदर क्यों की जा रही है किसी मस्जिद में साईं की मूर्ति क्यों नहीं है किसी गुरुद्वारे में साईं की मूर्ति क्यों नहीं है किसी चर्च में साईं की मूर्ति क्यों नहीं है फिर साईं बाबा का सभी धर्मों में सम्मान कैसे मान लिया जाए !
दूसरी बात साईं बाबा के नाम के साथ साईं राम ही क्यों कहा जाता है साईं अल्ला या साईं ईसामसीह क्यों नहीं कहा जाता है !
साईंआरती ही क्यों ? साईं नमाज या साईं मिसा(धर्म विशेेष की प्रार्थना) आखिर क्यों नहीं ?
साईं गायत्री ही क्यों साईं कुछ अन्य धर्मों का क्यों नहीं !
(श्री राम चरित्र मानस की नक़ल करते हुए) साईं चरित्र ही क्यों ? साईं कुरान, बाइबिल,गुरुग्रंथ साहब आदि क्यों नहीं ?
साईं पादुका पूजन ही क्यों ? ये केवल सनातन धर्मियों की परंपरा में है !
अधिकाँश साईं मंदिरों में ब्राह्मण पुजारी ही क्यों किसी अन्य धर्म का क्यों नहीं ?
देवी जागरण की ही तरह साईं जागरण ही क्यों ? किसी अन्य धर्म का अनुगमन क्यों नहीं !
सनातन धर्मियों की ही पूजा की नक़ल करते हुए प्रसाद या लड्डुओं का भोग आखिर क्यों किसी अन्य धर्म में भी ऐसा देखा गया है क्या ?
इस प्रकार से सारी सनातन धर्मियों की पूजा पद्धति की सारी नक़ल करके करते हुए भोले भाले सनातन धर्मियों को समझाया गया है कि साईं बाबा भी भगवान ही हैं उन्होंने वहाँ जाकर देखा तो अकल लगाकर सारी नक़ल अपने ही धर्म की गई थी इसलिए उन्हें संशय नहीं हो सका ये उनके साथ छल हुआ है इसीलिए सनातन धर्मियों का साईं बाबा की ओर ध्यान डाइवर्ट हो जाना स्वाभाविक था आज भी वो अपना सनातन धर्म का देवी देवता मानकर ही साईं बाबा पर आस्था रखते हैं न कि सर्व धर्म समभाव के कारण !साईं बाबा को भगवान मानने को लेकर जो हिन्दू भ्रमित किए गए हैं उन्हें आज भी सच्चाई से दूर रखा जा रहा है !ये अत्यंत चिंतनीय है !
गंगा जमुनी तहजीव या हिन्दू मुश्लिम एकता के नाम पर केवल हिन्दी धर्म की ही छीछालेदर क्यों की जा रही है आखिर अन्य धर्म भी तो हैं थोड़ी बहुत जिम्मेदारी उनकी भी होगी !आखिर देश की एकता और अखंडता के नाम पर केवल सनातन धर्मी ही क्यों अपने वेद पुराण एवं धर्मशास्त्रों के सिद्धांतों को छिन्न भिन्न हो जाने दें !
सनातन धर्म न तो साईं बाबा को भगवान मानता है और न ही साईं बाबा की पूजा प्रक्रिया में सनातन शास्त्रों की पद्धति की नक़ल ही बर्दाश्त करेगा !
वेद पुराण एवं धर्मशास्त्रों के सिद्धांतों को छोड़कर केवल साईंबाबा के रूप में ही साईंबाबा की प्रतिष्ठा बनाई जाए तो उसमें हमें या किसी को कोई आपत्ति नहीं होनई चाहिए ! तभी स्पष्ट रूप से यह पता चल पाएगा कि साईंबाबा के अपने अनुयायिओं की वास्तविक संख्या उनके अपने बल पर कितनी है अभी तक की संख्या को उनके अनुयायिओं की वास्तविक संख्या इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि वो संख्या सनातन धर्मपर आस्थावान लोगों की है ।
जब हमारे सनातन धर्म के सर्व सम्मान्य प्रतिनिधि जगद्गुरु अपने रहन सहन त्याग तपस्या एवं सनातन धर्म एवं धर्म शास्त्रों के प्रति समर्पित होकर समय समय पर जनता को जागरूक और प्रभावित करते रहें तब तो संभव है कि इस तरह की धार्मिक स्मगलिंग रोकी जा सके अन्यथा ऐसे लोग अपनी धार्मिक शरारतों से बाज नहीं आएँगे !
साईं के नाम पर केवल सनातन धर्म की ही छीछालेदर क्यों की जा रही है किसी मस्जिद में साईं की मूर्ति क्यों नहीं है किसी गुरुद्वारे में साईं की मूर्ति क्यों नहीं है किसी चर्च में साईं की मूर्ति क्यों नहीं है फिर साईं बाबा का सभी धर्मों में सम्मान कैसे मान लिया जाए !
दूसरी बात साईं बाबा के नाम के साथ साईं राम ही क्यों कहा जाता है साईं अल्ला या साईं ईसामसीह क्यों नहीं कहा जाता है !
साईंआरती ही क्यों ? साईं नमाज या साईं मिसा(धर्म विशेेष की प्रार्थना) आखिर क्यों नहीं ?
साईं गायत्री ही क्यों साईं कुछ अन्य धर्मों का क्यों नहीं !
(श्री राम चरित्र मानस की नक़ल करते हुए) साईं चरित्र ही क्यों ? साईं कुरान, बाइबिल,गुरुग्रंथ साहब आदि क्यों नहीं ?
साईं पादुका पूजन ही क्यों ? ये केवल सनातन धर्मियों की परंपरा में है !
अधिकाँश साईं मंदिरों में ब्राह्मण पुजारी ही क्यों किसी अन्य धर्म का क्यों नहीं ?
देवी जागरण की ही तरह साईं जागरण ही क्यों ? किसी अन्य धर्म का अनुगमन क्यों नहीं !
सनातन धर्मियों की ही पूजा की नक़ल करते हुए प्रसाद या लड्डुओं का भोग आखिर क्यों किसी अन्य धर्म में भी ऐसा देखा गया है क्या ?
इस प्रकार से सारी सनातन धर्मियों की पूजा पद्धति की सारी नक़ल करके करते हुए भोले भाले सनातन धर्मियों को समझाया गया है कि साईं बाबा भी भगवान ही हैं उन्होंने वहाँ जाकर देखा तो अकल लगाकर सारी नक़ल अपने ही धर्म की गई थी इसलिए उन्हें संशय नहीं हो सका ये उनके साथ छल हुआ है इसीलिए सनातन धर्मियों का साईं बाबा की ओर ध्यान डाइवर्ट हो जाना स्वाभाविक था आज भी वो अपना सनातन धर्म का देवी देवता मानकर ही साईं बाबा पर आस्था रखते हैं न कि सर्व धर्म समभाव के कारण !साईं बाबा को भगवान मानने को लेकर जो हिन्दू भ्रमित किए गए हैं उन्हें आज भी सच्चाई से दूर रखा जा रहा है !ये अत्यंत चिंतनीय है !
गंगा जमुनी तहजीव या हिन्दू मुश्लिम एकता के नाम पर केवल हिन्दी धर्म की ही छीछालेदर क्यों की जा रही है आखिर अन्य धर्म भी तो हैं थोड़ी बहुत जिम्मेदारी उनकी भी होगी !आखिर देश की एकता और अखंडता के नाम पर केवल सनातन धर्मी ही क्यों अपने वेद पुराण एवं धर्मशास्त्रों के सिद्धांतों को छिन्न भिन्न हो जाने दें !
सनातन धर्म न तो साईं बाबा को भगवान मानता है और न ही साईं बाबा की पूजा प्रक्रिया में सनातन शास्त्रों की पद्धति की नक़ल ही बर्दाश्त करेगा !
वेद पुराण एवं धर्मशास्त्रों के सिद्धांतों को छोड़कर केवल साईंबाबा के रूप में ही साईंबाबा की प्रतिष्ठा बनाई जाए तो उसमें हमें या किसी को कोई आपत्ति नहीं होनई चाहिए ! तभी स्पष्ट रूप से यह पता चल पाएगा कि साईंबाबा के अपने अनुयायिओं की वास्तविक संख्या उनके अपने बल पर कितनी है अभी तक की संख्या को उनके अनुयायिओं की वास्तविक संख्या इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि वो संख्या सनातन धर्मपर आस्थावान लोगों की है ।
जब हमारे सनातन धर्म के सर्व सम्मान्य प्रतिनिधि जगद्गुरु अपने रहन सहन त्याग तपस्या एवं सनातन धर्म एवं धर्म शास्त्रों के प्रति समर्पित होकर समय समय पर जनता को जागरूक और प्रभावित करते रहें तब तो संभव है कि इस तरह की धार्मिक स्मगलिंग रोकी जा सके अन्यथा ऐसे लोग अपनी धार्मिक शरारतों से बाज नहीं आएँगे !
आज सारे देश में मानव मंदिर बनाए जा रहे हैं । मैं बात साईं बाबा जी के विषय में भी कह रहा हूँ आज उनकी आरतियों में पूजा में उनकी तुलना श्री राम और कृष्ण से की जाती है ये सब शास्त्रीय है क्या !हो सकता है कि साईं बाबा के नाम पर किया जा रहा भारी भरकम धन संग्रह एवं योजना बद्ध ढंग से धर्म स्थलों पर या मंदिर मंदिर में रखवाई जा रही मूर्तियाँ सनातन धर्म को पूरी तरह नष्ट करने की केवल साजिश ही न हों अपितु इसमें थोड़ी बहुत सच्चाई भी हो किन्तु इनके अनुयायियों के द्वारा उनके विषय में अपनाई जा रही गतिविधियाँ एवं फैलाई जा रही भ्रांतियाँ सच्चाई कम एवं सनातन धर्म को नष्ट करने की साजिश अधिक लगती हैं! क्योंकि इनका कोई प्रमाणित इतिहास नहीं मिलता है और इनके विषय में कोई प्रमाणित विचारधारा नहीं मिलती है इनके कार्य नहीं मिलते हैं इन्होंने धर्म के विषय में कुछ लिखा हो वो नहीं मिलता है इनका कोई संप्रदाय रहा हो वो नहीं मिलता है । वो बात और है कि सनातन धर्म के धर्म ग्रंथों से एवं महापुरुषों के जीवन वृत्तों से पूजने पुजाने लायक आख्यानों की चोरी करके उनका एक पोथा साईं बाबा के नाम से तैयार कर दिया गया और आगे भी जो जो कुछ धर्म के नाम पर अच्छा होता जाएगा वो सब साईं व्यापारी सनातन धर्म को नष्ट करने के लिए साईं बाबा के चरित्रों में जोड़ते जाएँगे !जब झूठ ही लिखना है तो उसके विषय में प्रमाण क्या खोजना !इन्हीं साईं बाबा को श्री राम बताया जाएगा इन्हीं को श्री कृष्ण इन्हीं को शिव शंकर भी बता दिया जाएगा इन्हें ही रुक्मणी और श्री राधा जी का पति अर्थात श्री कृष्ण बताया जाएगा इन्हीं साईं बाबा के मुख में बाँसुरी लगाई जाएगी और इन्हीं की अँगुली पर गोबर्धन रखा जाएगा और इन्हीं को श्री सीता पति भी कहा जाएगा इन्हीं साईं बाबा से साईं पाखंडी धनुष तोड़वाएँगे और रावण मरवाएँगे!ये रखेंगे हिन्दुओं के ही पैरों पर पैर!यही लोग साईं बाबा को ही पार्वती पति शिव शम्भो भी बताएँगे इन्हें ही कैलास पर बैठाया जाएगा और धन के बल पर इन्हीं के शिर से गंगा बहाई जाएँगी! यदि सनातन धर्मी सचेत नहीं हुए तो श्री राम नवमी, श्री कृष्ण जन्माष्टमी,शिवरात्रि और दशहरा दीपावली जैसे सारे प्रमुख त्योहारों को साईं लीलाओं से जोड़ा जाएगा और पीछे का सारा इतिहास पुराण वेदादिकों के ज्ञान की बातें धन के बल पर झूठी सिद्ध कर दी जाएँगी !इस प्रकार से जब वेदों पुराणों की बातें ही भ्रम सिद्ध कर दी जाएँगी और मंदिरों में केवल साईं बाबा पूजे जाएँगे इन्ही की पाँच आरतियाँ गाई जाएँगी इन्हीं पर चढ़ावा चढ़ेगा बाक़ी देवी देवता घमा रहे होंगे ! श्री सीता और श्री राधा जी की जगह भी इन्हीं साईं को फिट करने की साजिश की जाएगी जैसे - जय श्री सीताराम की जगह जय श्री साईं राम एवं जय श्री राधाकृष्ण की जगह जय श्री साईंकृष्ण का प्रचार किया जाएगा यदि ध्यान से देखा जाए तो सनातन धर्म को पूरी तरह से नष्ट करने की तैयारी है, पैसे के बल पर साईं को ही टेलिवीजनों पर दिखाया जाएगा यही अखवारों में लिखवाया जाएगा !
चूँकि मंदिरों में हिन्दुओं की आस्था बहुत अधिक होती है इसलिए साईं के अधिक से अधिक मंदिर बनवाए जाएँगे अन्यथा सनातन धर्म के प्राचीन मंदिरों में ही मूर्तियाँ रख दी जाएँगी !चूँकि ब्राह्मण पंडित पुजारियों की बातें समाज श्रद्धा पूर्वक मान लेता है इसलिए इनकी पूजा में भी ब्राह्मण पंडित पुजारी ही रख कर उनसे ही साईं चरित नाम का झूठ बोलवाया जाएगा ।
कुल मिलाकर साईंबाबा नाम के आर्थिक आंदोलन को आगे बढ़ाने एवं सनातन शास्त्रों मर्यादाओं को ध्वस्त करने के लिए अभी तक जो गतिविधियाँ सामने आई हैं वे सनातन धर्मी समाज के लिए बहुत भयावह हैं इन पर यदि समय रहते लगाम न लगाई गई तो अयोध्या में श्री राम मंदिर न बनकर साईं राम मंदिर ही बन पाएगा !क्योंकि उसे भी ये लोग साईं राम की जन्म भूमि सिद्ध करने का प्रयास करेंगे !
मंदिर तो केवल देवी देवताओं के ही बन सकते हैं वैसे भी मूर्तियाँ भी केवल देवताओं की
ही पूजनीय हो सकती हैं क्योंकि मूर्ति में जब तक प्राण प्रतिष्ठा न की जाए
तब तक वो पत्थर ही मानी जाती है और प्राण प्रतिष्ठा वेदमंत्रों के द्वारा
की जाती है जिन देवी देवताओं के जो मन्त्र होते हैं उन्हीं से उनकी प्रतिष्ठा हो सकती है किन्तु जिसके मन्त्र ही नहीं होंगे उसकी कैसे की जा सकती है ?मुख्य बात यह है कि जब वेद लिखे गए थे तब साईं बाबा नाम ही नहीं था तो उनके मन्त्र कैसे लिखे जा सकते थे और जब उनके मन्त्र ही नहीं हो सकते तो उनकी प्रतिष्ठा कैसे की जा सकती है !अर्थात की ही नहीं जा सकती है जिसके मन्त्र नहीं हैं उसकी प्रतिष्ठा कैसी ? यदि मान भी लिया जाए कि इस नाम से कोई संत पहले कभी हुए ही होंगें तो वो अपना बुत पूजन करने के लिए किसी को क्यों प्रेरित करेंगे!संत तो भगवान की पूजा करने वाले होते हैं न कि अपनी पूजा करवाने वाले ! इसलिए ऐसे
संतों महापुरुषों की मूर्तियों को पूजने पुजाने का औचित्य ही क्या है ?और इसे सनातन धर्म को नष्ट करने की साजिश क्यों न माना जाए ! इस पर जगद्गुरु शंकराचार्य श्री स्वरूपानंद जी के
वक्तव्य को श्रद्धा पूर्वक स्वीकारते हुए इसपर नियंत्रण यथा सम्भव किया ही
जाना चाहिए यही उचित है।
जहाँ तक साईं बाबा को भगवान् कहने की बात है ये धर्म का विषय है इसे हमारे शास्त्रीय धर्माचार्यों पर छोड़ा जाना चाहिए न कि साईं षडयंत्र करने वालों पर ! भगवान् न तो कोई बन सकता है और न ही बनाया जा सकता है ये बनने बनाने का खेल ही नहीं है वह परं प्रभु तो ("चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्" "स्वे महीम्नि महीयते" आदि आदि )अपनी महिमा में महिमान्वित् एवं स्वयं सिद्ध स्वामी हैं उनकी तुलना किसी मनुष्य से करनी ही क्यों ?
भगवान कौन होता है ?
ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ।
ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥
समग्र ऐश्वर्य, शौर्य, यश, श्री, ज्ञान, और वैराग्य आदि । ये जिनमें एक साथ हों वो भगवान होता है यथा -
1. समग्र ऐश्वर्य- शक्ति संपन्न ,योग्य ,समर्थ,धनाढ्य, स्वामी आदि अर्थ होते हैं।
2.शौर्य-बहादुर, वीर, पराक्रमी आदि ।
3.यश-प्रसिद्धि ,ख्याति,कीर्ति, विश्रुति आदि ।
4.श्री-असीम धन,समृद्धि,सौभाग्य ,गौरव ,महिमा ,प्रतिष्ठा ,सुंदरता श्रेष्ठता समझ अति मानवीय शक्ति सम्पन्नता आदि ।
5.ज्ञान-विद्या प्रवीणता ,समझ,परिचय,चेतना आदि।
6.वैराग्य-सभी प्रकार के सांसारिक सुख की इच्छाओं का अभाव।
ये छहो गुण एक साथ जिसमें होते हैं वो भगवान् होता है ! जो ईश्वर के बिना किसी और में सम्भव ही नहीं हैं फिर बात बात में जिस पर जिसकी आस्था श्रद्धा विश्वास हो जाए वह उसका आस्था पुरुष हो सकता है किन्तु भगवान् नहीं !
सभी सनातन धर्मावलम्बियों से प्रार्थना है कि अपने भगवान् और सभी देवी- देवताओं, वेदों ,शास्त्रों, पुराणों ,तथा समस्त पवित्र ग्रंथों ,तीर्थों, नदियों ऋषियों ,विद्वानों ,वीरों समेत सभी सदाचारी स्त्री पुरुषों का गौरव घटने नहीं देना चाहिए क्योंकि इनका गौरव बचने से समाज और देश बच पाएगा अपने धार्मिक प्रतीकों ,शब्दों कथानकों का प्रयोग हर किसी को हर जगह प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए । ऐसे तो कोई साईं भगवान हो जाएगा तो कोई क्रिकेट का भगवान् होगा तो कोई कुस्ती का तो कोई किसी और कला का भगवान हो जाएगा !आखिर हमारी आत्माओं, हृदयों, प्राणों को आनंदित कर देनेवाले ईश्वर की तुलना किसी मनुष्य से कैसे की जा सकती है ?ये गलत है भ्रम है आडम्बर है साजिश है इसे समय रहते ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए !संत रूप में सम्मान किसी का भी किया जा सकता है किन्तु भगवान हम उसी को मान सकते हैं जिनके विषय में वेदों पुराणों में वर्णन मिलता हो इसके अलावा सारी साजिश एवं षड्यंत्र है !
इसी विषय में पढ़िए हमारे ये लेख भी -
साईं बाबा के विषय में शंकाराचार्य जी के बयान का विरोध क्यों ?आखिर इस समस्या का स्थाई समाधान क्यों न निकाला जाए !
धर्म के विषय में यदि कुछ लोग अपने शाही इमाम की बात को प्रमाण मानते हैं और कुछ लोग अपने पोप की बात को प्रमाण मानते हैं तो हिन्दू अपने शंकाराचार्य की बात को प्रमाण न मानकर क्या साईं बाबा के चमचों को प्रमाण मान लें जिन्होंने वेद पढ़े न पुराण और न ही धर्मशास्त्र !जिनका सब कुछ मन गढंत है ऐसे अँगूठाटेक धार्मिक लोग ही बचे हैं अब हमारे धर्म का निर्णय करने को क्या ?see more...http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/06/saain.html
धर्म के विषय में यदि कुछ लोग अपने शाही इमाम की बात को प्रमाण मानते हैं और कुछ लोग अपने पोप की बात को प्रमाण मानते हैं तो हिन्दू अपने शंकाराचार्य की बात को प्रमाण न मानकर क्या साईं बाबा के चमचों को प्रमाण मान लें जिन्होंने वेद पढ़े न पुराण और न ही धर्मशास्त्र !जिनका सब कुछ मन गढंत है ऐसे अँगूठाटेक धार्मिक लोग ही बचे हैं अब हमारे धर्म का निर्णय करने को क्या ?see more...http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/06/saain.html
साईंबाबा को भगवान ही क्यों मान लिया जाए अल्ला और ईसामसीह क्यों नहीं ? साईंबाबा की मूर्तियों को केवल मंदिरों में ही क्यों रखा जाए !गुरूद्वारे गिरिजाघर और मस्जिदों में क्यों नहीं ?
जब साईं बाबा के किसी आचार व्यवहार से ये सिद्ध ही नहीं होता है कि साईं बाबा सनातन धर्मी हिन्दू थे तो फिर केवल हिन्दुओं के मत्थे ही क्यों मढ़ा जा रहा है उन्हें ? अगर साईंबाबा see more.....http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/06/blog-post_24.html
जब साईं बाबा के किसी आचार व्यवहार से ये सिद्ध ही नहीं होता है कि साईं बाबा सनातन धर्मी हिन्दू थे तो फिर केवल हिन्दुओं के मत्थे ही क्यों मढ़ा जा रहा है उन्हें ? अगर साईंबाबा see more.....http://bharatjagrana.blogspot.in/2014/06/blog-post_24.html
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