Sunday, February 4, 2018

   समय का परीक्षण कैसे किया जाए ?     
  वस्तुतः मानव जीवन से लेकर सभी जीव जंतुओं तक यहाँ  तक कि वृक्षों बनौषधियों समेत समस्त प्रकृति में घटित होने वाली अधिकाँश घटनाएँ समय के प्रभाव से प्रेरित  होती हैं| समस्त शरीरों से सम्बंधित या प्रकृति से संबंधित प्रायः प्रत्येक घटना के प्रारंभ होने का कोई न कोई समय होता है समय का वही क्षण उस घटना परिस्थिति कार्य या उत्पादन संबंधित समस्त विस्तार का अत्यंत सूक्ष्म बीज होता है !जैसे अत्यंत छोटे से बीज में बहुत बड़ा बटवृक्ष छिपा होता है किंतु ये बात पता उन्हीं को होती है जो उस बीज और वृक्ष तथा बीज से वृक्ष बनने की प्रक्रिया से सुपरिचित होते हैं !उस बीज को पहचानने वाले विशेषज्ञ  बीज को देखते ही इस बात  का पूर्वानुमान लगा लेते हैं कि यह बीज अंकुरित होकर एक दिन बहुत बड़ा बरगद का वृक्ष बनेगा उसके ऐसे पत्ते होंगे ऐसी शाखाएँ होंगी ऐसे फल होंगे उन सब में ऐसे ऐसे गुण या दोष होंगे !ऐसी सभी बातों का पूर्वानुमान उस छोटे से बीज को देख कर  जिस प्रकार से लगा लिया जाता है उसीप्रकार से समय  का  प्रत्येक 'क्षण' भी बीज के समान ही है जैसे कोई बीज अपने अंदर संपूर्ण वृक्ष का आकार समेटे हुए होता है उसी प्रकार से 'समयबीज' होता है जिसमें प्रत्येक क्षण का परीक्षण करना होता है !ऐसे समय बीजों के आधार पर रिसर्च पूर्वक प्रत्येक समय के विषय में यह जाना और समझा जा सकता है कि यह 'क्षणबीज' कैसा है !जैसा वह 'क्षण' होगा उस क्षण में किए जाने वाले या होने वाले संपूर्ण कार्य उस क्षण के स्वभाव के अनुरूप ही विकसित हो पाते हैं !किसी काम या रोग का बढ़ना या घटना सफलता या असफलता आदि सब कुछ उस क्षण के अनुरूप ही होता है !
    इस 'क्षणबीज' अध्ययन पद्धति के आधार पर जीवन से संबंधित अनेकों क्षेत्रों की कई बड़ी समस्याएँ सुलझाई जा सकती हैं जिस क्षण में जो बीज बोया जा रहा है वो  क्षण यदि अच्छा नहीं है तो वो अनेकों प्रकार से उस कार्य के परिणाम को जरूर नष्ट कर देगा !या तो उस बीज को जमने नहीं देगा या जम जाने पर भी उसमें कोई रोग लग कर उसे खराब कर देगा यदि ऐसा भी नहीं हुआ तो तैयार फसल को प्राकृतिक आपदाओं या स्वकृत निर्णयों से नष्ट कर देगा !
    इसी प्रकार से जिस 'क्षणबीज' में जो बच्चा माँ के गर्भ में आता हैं और जिस 'क्षणबीज' में उस बच्चे का जन्म होता है ये दोनों 'क्षणबीज' यद्यपि एक दूसरे से संबंधित होते हैं एक दूसरे के आधार पर ही आश्रित होते हैं यदि ऐसा तो वैसा वाले सिद्धांत के आधार पर ये दोनों एक दूसरे से जुड़े होते हैं !इसलिए इन दोनों के आधार पर जीवन संबंधी प्रत्येक परिस्थिति की व्याख्या की जा सकती है !जो व्यक्ति जिस 'क्षणबीज' में पैदा होता है उस 'क्षणबीज' पर रिसर्च करके यह समझा जा सकता है कि यह व्यक्ति कितना सुखी और कितना दुखी होगा जीवन में इसे किस किस प्रकार के रोग या कष्ट आदि किस किस उम्र में कितने दिनों महीनों या वर्षों के लिए होगा !उसके आधार पर पहले से ही परिस्थितियों  को अपने अनुकूल बनाने के प्रयास किए जा सकते हैं !हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि भविष्य में जब जो परिस्थितियाँ  हमें रोग या दुःख पहुँचाने वाली अथवा अन्य प्रकार से तनाव देने वाली लगेंगी उनसे पहले से ही बचने का या उन्हें घटाने का प्रयास किया जाएगा !अधिक से अधिक प्रयास करके ऐसी परिस्थितियों को निष्क्रिय करने के प्रयास किए जाएँगे !इसीप्रकार से रोगकारक या अन्य प्रकार से भविष्य में आने वाली विपरीत परिस्थितियों  को सहने के लिए भी पहले से ही हम अपने मन को तैयार करते चले जाएँगे !ऐसे ही जो 'क्षणबीजजन्य' परिस्थितियाँ भविष्य में हमारे लिए सुखद विकास कारक या आरोग्यता प्रदान करने वाली लगेंगी  उनका अधिक से अधिक सदुपयोग करते हुए पूरी ताकत लगाकर उस समय का फायदा उठाने  की कोशिश करेंगे ! जैसे आग की छोटी सी चिनगारी को भी अधिक हवा देकर बहुत बड़ा रूप दिया जा सकता है उसी प्रकार से अच्छे क्षण बीजों का उपयोग हम जितना अधिक से अधिक कर सकेंगे हमारे लिए वो उतना  अधिक सहायक होगा !अच्छे क्षणों में हम जितना अधिक से अधिक विकास कर लेते हैं वो अच्छे समय में तो काम देता ही है साथ ही बुरे समय को भी  हम अच्छे समय में संचित की गई शक्ति के आधार पर आराम से पार कर लेते हैं !
   हर किसी के जीवन में अच्छा और बुरा दोनों प्रकार का समय बार बार आता है ये खंभे अर्थात पिलर्स के समान होता है  यदि हम अच्छे समय में अच्छे काम करके अपने समय का अधिक से अधिक सदुपयोग कर लेते हैं तो दो अच्छे समयों के दो पिलर बन जाते हैं जिनके ऊपर सेतु अर्थात ब्रिज बनाकर हम दो अच्छे समयों के बल पर बुरे समय के पिलर को लाँघ जाने में समर्थ हो जाते हैं अर्थात आसानी से पार कर लिया करते हैं !जैसे किसी ने अच्छे समय में खूब धन कमा लिया हो फिर अचानक बुरा समय आ जाए तो उस बुरे समय के प्रभाव से सब काम काज बिगड़ने लगेगा ,स्वास्थ्य बिगड़ेगा ,सहयोगी साथ छोड़ने लगेंगे इन सब के माध्यम से धन का भारी अपव्यय होता चला जाएगा !यदि धन का संचय अच्छा होगा तो सब काम होते चले जाएँगे भले ही उन कामों में भी असफलता ही मिले किंतु प्रयास न कर पाने का पछतावा तो नहीं रह जाएगा !संचित धन न हो काम तो तब भी करने पड़ेंगे किंतु कर्जे पर कर्जा होगा जिससे काम न होने का तनाव कर्जा देने का तनाव तथा काम को आगे बढ़ाने के लिए और अधिक धन राशि जुटाने का तनाव आदि बढ़ता चला जाएगा !किंतु अच्छे समय में धन का संचय यदि अच्छा किया गया होगा तब आधे से अधिक समय तो पहले के संचित धन से पार हो जाएगा और थोड़ा बहुत कर्जा हो भी जाएगा तो उसकी भरपाई आगे आने वाले अच्छे समय में आसानी से करना संभव हो जाता है !
   इसी प्रकार से बुरे समय में बुरे कर्म करके जो लोग बुराई के पिलर्स खड़े करके  उन पर सेतु बना लेते हैं वे अपने अच्छे समयों को भी उन बुराइयों के पिलर्स से ढकते चले जाते हैं जिससे उन्हें बुरे समय में तो तनाव मिलता ही है अच्छे समय में भी वो प्रसन्नताके लिए तरसते रहते हैं उनके जीवन का अच्छा समय भी उसी बुराई में ही ढका हुआ निकल जाता है !
    इसलिए यदि हम समय का सदुपयोग करना सीख जाएँ तो अच्छा समय अपनी सीमा से अधिक अच्छा फल देकर जाता है और हमारा बुरा समय हमारे जीवन में अपना बुरा प्रभाव पूरी तरह  नहीं छोड़ पाता है !इस प्रकार से जीवन के सभी क्षेत्रों से संबंधित भविष्य के संभावित तनावों से बचा जा सकता है !

Thursday, December 7, 2017

आरक्षण लोभियों और नेताओं ने जातियाँ जिंदा कर रखी हैं दोष ब्राह्मणों को देते हैं !

जातियों का तड़का लगाए बिना भारत के चुनावों में स्वाद ही नहीं आता !चुनाव जीतने के लिए कसाई मंडियों के पशुओं की तरह हर चुनाव में दलितों अल्पसंख्यकों को पकड़कर खड़ा कर लेते हैं भ्रष्ट कामचोर नेतालोग चुनाव हो जाने के बाद फिर उन्हें चरने खाने के लिए छोड़ देते हैं इनका बंधुआ मजदूरों की तरह उपयोग करते चले आ रहे हैं नेता लोग !
उनकी गलत सिख मानकर आरक्षणभिक्षुकों ने भी अपनी गरीबत का ठीकरा ब्राह्मण आदि सवर्णों पर फोड़ रखा है वो ये नहीं देखते हैं कि सवर्ण उनका शोषण आखिर कर कैसे लेंगे !आजादी के बाद नेताओं ने उन्हें आजतक दिया क्या ?
राजनैतिक भिखारियों ने दलितों को किसी लायक नहीं छोड़ा उन्हें कभी कुछ दिया भी नहीं ऊपर से कामचोर अपाहिज गुण विहीन परिश्रम करके अपना विकास करने में अक्षम वर्ग सिद्ध कर दिया कि ये अपने बलपर अपनी तरक्की नहीं कर सकते !ऐसे बीमार लोग यदि विश्व के किसी अन्य देश में बसना चाहें तो वहाँ की सरकार ऐसे लोगों का बोझ क्यों ढोएगी वो तो जाते ही लट्ठ उठाएगी और पूँछेगी कि तुम्हारा शोषण जब सवर्ण करते रहे तब तुम्हारे पूर्वज सहते क्यों रहे वो तो सवर्णों की अपेक्षा संख्या में भी अधिक थे अपनी अकर्मण्यता का दोष सवर्णों पर मढ़ते लज्जा क्यों नहीं लगती है !
ऐसे कामचोर लोग अपने को इतना दबा कुचला सिद्ध करने पर आमादा हैं कि यदि उनके यहाँ बच्चा न हो तो उसके लिए भी वो सवर्णों को ही दोषी ठहरा देगें हालात इतने ज्यादा बिगड़ चुके हैं ! ऊपर से आग में घी डालने का काम कर रहे हैं कामचोर बदमाश भ्रष्ट नेता लोग !जो दलितों के हिस्से का हक़ खुद खा जाते हैं और उनके आक्रोश की बंदूक सवर्णों की ओर तान देते हैं !आजादी के बाद आज तक ऐसी ही कल्पित किस्से कहानियाँ गढ़ गढ़ कर दो दो कौड़ी के नेता अरबों खरबों की संपत्ति बना बैठे !किंतु दोषी सवर्णो को ही बताया करते हैं !इन बेईमानों को ये समझ में नहीं आता कि गरीब से गरीब ब्राह्मण भी तो बिना आरक्षण के परिश्रम पूर्वक संघर्ष पूर्वक अपना पेट पालन करते हैं वो तो किसी सरकार के सामने आता दाल चावल के लिए कटोरा लेकर भीख नहीं माँगते हैं !वो भूखे रह लेते हैं परेशान हो लेते हैं किंतु स्वाभिमान पूर्वक जीते हैं आरक्षण भिखारी कहलाना पसंद नहीं करते !सवर्णों का मानना है कि रईसत गरीबत तो भाग्य और कर्म का खेल है हर किसी को अच्छे बुरे दोनों प्रकार के दिन देखने पड़ते हैं किंतु उसके लिए आरक्षण भिखारियों की श्रेणी में खड़े होकर वे अपनी भावी पीढ़ियों का मनोबल नहीं गिराना चाहते जिससे उनका सम्मान बना और बचा रहता है !दलित भी उनसे कुछ सीखें और आरक्षण का बहिष्कार करें कर्म और संघर्ष का पथ चुनें ईश्वर स्वयं कृपा करेगा !ईश्वर किसी को जाति देखकर संपत्तियाँ नहीं देता है दलित भी चाहें तो जातीय जुमलों से बाहर निकलकर ईश्वरीय सिद्धांतों पर भरोसा करें अन्यथा नेताओं के द्वारा परोसी गई दुर्दशा भोगते रहें जिसके लिए सवर्णों को दोषी कभी नहीं ठहराया जा सकता !
वैसे भी जातियाँ ब्राह्मणों के कारण नहीं हैं जातियाँ तो आरक्षण भिखारियों ने जिन्दा कर रखी हैं जिन्हें कुछ करना धरना है नहीं अपनी असफलता का दोष दूसरों है दूसरे नेता लोग हैं जिन्होंने पिछले साठ थ से देश को केवल लूटा है उन्होंने देश और समाज के लिए कुछ भी नहीं किया है इसलिए चुनावों के समय उन्हें जातियों की जरूरत पड़ती है !जैसे भैंस का दूध निकालने के लिए लोग इंजेक्सन लगाते और दूध दुह लेते हैं उसी प्रकार से चुनाव जिताने के लिए नेता जातिवाद का इंजेक्सन लगाते और चुनाव जीत लेते हैं !इसमें ब्राह्मणों का दोष कहाँ हैं ये तो नेताओं और दलितों की आपसी साँठ गाँठ का नतीजा है !
ब्राह्मणों को गालियाँ दे देकर लोग कितने बड़े बड़े पदों पर पहुँच गए किंतु ब्राह्मणों ने कभी किसी का बुरा नहीं किया !
विधायक सांसद मंत्री मुख्यमंत्री आदि क्या क्या नहीं बन गए ब्राह्मणों को गालियाँ देकर लोग !ब्राह्मण गलत कभी नहीं रहे यही कारण है कि अंबेडकर साहब ने भी दूसरी शादी ब्राह्मण के यहाँ ही की थी और उनके शिक्षक तो ब्राह्मण थे ही !
अंबेडकर साहब ने जिनके कहने पर अपने नाम से 'सकपाल' टाइटिल हटाकर 'अंबेडकर' जोड़ा था वो उनके आत्मीय शिक्षक ब्राह्मण थे उनका नाम था महादेव अंबेडकर !इसी प्रकार से अंबेडकर साहब की दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर भी जन्म से ब्राह्मण थीं !
अम्बेडकर साहब से उनके शिक्षक महादेव अंबेडकर जी न केवल बहुत अधिक स्नेह करते थे अपितु वैसे भी वे अंबेडकर साहब की मदद किया करते थे उनके आपसी संबंध अत्यंत मधुर थे यदि ऐसा न होता तो उन्होंने उनके कहने पर अपने नाम की टाइटिल क्यों बदल ली थी और यदि बदल भी ली थी तो बाद में फिर से सकपाल बन सकते थे किन्तु ये उनका आपसी स्नेह एवं उन ब्राह्मण शिक्षक महोदय के प्रति सम्मान ही था जो उन्होंने आजीवन निभाया !
इसी प्रकार से अंबेडकर साहब की दूसरी पत्नी जन्म से ब्राह्मण थीं विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम शारदा कबीर था। बाद में सविता अम्बेडकर रूप में जानी गईं !वे सन 2002 तक जीवित रही वे अंतिम साँस तक बाबा साहब के आदर्शो के प्रति समर्पित रहीं !
ब्राह्मण विरोधी नेताओं ने उन्हें सम्मानित करना तो दूर उनका जिक्र करना तक मुनासिब नहीं समझा !जबकि रमादेवी अम्बेडकर से जुड़े न जाने कितने स्मारक, पार्क इत्यादि हैं वो बाबा साहेब की पहली पत्नी थीं !
दलितों का शोषण सवर्णों ने बिलकुल नहीं किया किन्तु दलितों के बिछुड़ने के कारण कुछ और ही थे !
दलित लोग यदि वास्तव में अपनी उन्नति चाहते हैं तो ऐसे नेताओं को अपने दरवाजे से दुदकार कर भगा दें जो उन्हें खुश करने के लिए सवर्णों की निंदा करते हैं !दलित लोग भी अब अपना लालच छोड़कर नेताओं से देश एवं समाज के विकास का हिसाब माँगें !सीधे कह दें कि आप मेरी हमदर्दी मत कीजिए आपके पास इतनी संपत्ति कहाँ से आई आपका धंधा व्यापार क्या है और आप करते कब हैं !और यदि न बतावें तो सीधे पूछिए हमारा हक़ क्यों हड़पा है आपने !भले वो दलित नेता ही क्यों न हों !अपराध अपराध है उसमें जातिवाद नहीं चलता !
ब्राह्मणों ने सबके साथ अच्छा व्यवहार किया किंतु जो सफल हुए उन्होंने सफलता का श्रेय अपनी योग्यता को दिया किंतु जो असफल हुए उन्होंने अपने अपमान भय से दोष ब्राह्मणों पर मढ़ दिया !वैसे भी हर असफल व्यक्ति अपनी असफलता की जिम्मेदारी हमेंशा दूसरों पर डालता है । नक़ल करते पकड़ा गया विद्यार्थी हमेंशा अपने बगल में बैठे विद्यार्थी पर ही दोष मढ़ता है बड़े बड़े अपराधों में पड़े गए लोगों को कहते सुना जाता है कि हमें गलत फँसाया गया है किंतु यदि इनकी बात सही मान ली जाए तो क्यों कोई दोषी माना जाएगा !
बंधुओ !ब्राह्मण यदि किसी की तरक्की में कभी बाधक बने होते तो आजादी के बाद आज तक इतना लंबा समय मिला जिसमें कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति अपनी तरक्की अपने परिश्रम से कर सकता था उसे आरक्षण की भी जरूरत नहीं पड़ती !आखिर गरीब सवर्ण भी तो अपनी तरक्की बिना आरक्षण के अपने बल पर ही करते हैं वो अपने स्वाभिमान को गिरवी नहीं होने देते हैं|अपनेस्वाभिमान को सुरक्षित रखने वाले किसी भी जाति के व्यक्ति का अपमान करने का साहस करने में हर कोई डरता है कि ये अपने स्वाभिमान के लिए मर मिटेगा इसलिए इससे भिड़ना ठीक नहीं है । ऐसे लोगों की इज्जत भी होती है और माँ बहन बेटियाँ भी सुरक्षित बनी रहती हैं ।
जो लोग कहते हैं कि हम बिना आरक्षण के तरक्की ही नहीं कर सकते इसका सीधा सा मतलब है कि उन्होंने अपने मुख से अपने को कमजोर मान लिया है और कमजोर लोगों का अपमान तो होता ही है इसमें जातियाँ कहाँ से आ गईं !कमजोर जाति की बात छोड़िये कमजोर भाई का अपमान उसका सगा भाई करने लगता है !कमजोर बेटे का पक्ष अधिकाँश माता नहीं लेते !कमजोर पति को पत्नी सम्मान नहीं देती है कमजोर पिता का सम्मान उसकी संतानें नहीं करती हैं ऐसे में स्वयं अपने ऊख से अपने को कमजोर कहने वाले लोग सम्मान की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं बड़े बड़े पदों पर पहुँच कर भी लोग या तो अपने को कमजोर ही मन करते हैं या फिर सवर्णों को शत्रु मानने लगते हैं !
इसलिए सभी आरक्षण भोगियों को आपस में बैठकर चिंतन करना चाहिए तब उन्हें पता लगेगा कि उन्होंने आरक्षण से पाया कुछ ख़ास नहीं है किंतु भिखारी होने का ठप्पा जरूर लगवा लिया !साथ ही इससे देश का बहुत बड़ा नुक्सान ये हुआ है कि एक से एक नकारा कामचोर मक्कार नेता लोग आरक्षण भोगी जातियों का वोट लेने के लिए चुनावों के समय सवर्णों को दस पाँच दिन गालियाँ देते हैं और जीत लेते हैं चुनाव किंतु घर तो अपना ही भरते हैं दलितों के उत्थान करने वाले भी नेता ही क्यों न हों आज वो करोड़ों अरबों में खेल रहे हैं जबकि राजनीति में आते समय किराया भी जेब में नहीं था यही हाल हर जाति के नेता का है वो फुल टाइम राजनीति करते रहे कभी कोई धंधा व्यापार नहीं किया फिर भी करोड़ों अरबों पति हो गए ये धन दलितों के ही हिस्से का है ये धन गरीबों किसानों मजदूरों के हिस्से का है जो नताओं के घरों में जमा है ये लोग दसकों से यही खेल खेलते चले आ रहे हैं किंतु आरक्षण भोगियों की संख्या अधिक है उन्हें खुश करने के लिए ये पापी सवर्णों की निंदा किया करते हैं और संपत्ति का अम्बार लगाए हुए हैं ! अब जरूरत है कि दलित लोग ऐसे नेताओं को दरवाजे से दुदकार कर भगा दें जो सवर्णों की निंदा करके उन्हें खुश करने का प्रयास करें !















Sunday, November 5, 2017

प्रधानमंत्री जी !सरकार बदलने पर नेता बदल जाते हैं किंतु नियत नहीं बदलती है ! पार्टियाँ बदल जाती हैं पाप वही होता रहता है !

सरकार बदलने से नेताओं को सत्ता मिली जनता को क्या मिला  ?प्रधानमंत्री जी !

  •  आज भी 'घूस दो काम लो' के सिद्धांत पर चल रहे हैं सरकारी विभाग और व्यवस्था !जनता को हजार बार गर्ज हो तो उनसे काम लेने के लिए उन्हें घूस दे !अन्यथा घर बैठे !!
  •  सरकार कहती है टैक्स दो अन्यथा भुगतोगे !जनता डरेगी तो टैक्स देगी ही !
  •  डाकू कहते हैं जो कुछ है सो सब रख दो अन्यथा गोली मार देंगे !जनता डरेगी तो देगी ही !
  •   बलात्कारी कहते हैं कि बलात्कार तो हम करेंगे ही अन्यथा जान से मार देंगे तेज़ाब फ़ेंक देंगे !
  •  जनप्रतिनिधि कहते हैं ये साले सब बड़े बदमाश हैं घूस लिए बिना करेंगे नहीं तुम भले आदमी हो ले दे कर अपना काम निकाल लो !मेरे यहाँ से चिट्ठी लेते जाना मानेगा तो ठीक अन्यथा ... !
  • सरकार उनके सैलरी तो बढ़ाए जा रही है आत्म हत्या करते किसानों के लिए दस दस रूपए के चेक !  
    प्रधानमंत्री जी !यदि जनता के प्रति थोड़ी भी हमदर्दी आपके मन में है तो राजनीति में सुशिक्षित योग्य अनुभवी चरित्रवान और ईमानदार लोगों को घुसने भर दीजिए वे जीवित लोग ऐसे बेईमानों से स्वयं निपट लेंगे और बदल देंगे देश की दशा दिशा !अन्यथा राजनैतिक दलों के गंदे मालिक लोग देश की राजनीति  को स्वच्छ होने ही नहीं देते हैं क्योंकि इससे उनकी अपनी भी कमाई बंद होती है उनके अपने काळा कारनामे खुलने का भय रहता है !

   नेता लोग केवल उनकी सुनते हैं जो उन्हें चुनावी टिकट दिलवा सकते हों  या कटवा सकते हों अथवा जो उन्हें चुनाव जितवा सकते हों या हरवा सकते हों!इसके अलावा जनता को तो जानवर पहले वाले भी समझते थे  और अभी वाले भी !2014 के चुनावों में मैंने भी जिनके लिए प्रतिदिन चौदह चौदह घंटे काम किया आज मुझे भी ठेस लगी है !
     जो नेता लोग जनता से फोन पर बात नहीं करते मिलने का समय नहीं देते पत्रों का उत्तर नहीं देते उनसे काम करने की उम्मींद जनता कैसे करे ?कार्यकर्ताओं से मिलने में मुख चुराने वाले नेता जनता से क्यों मिलेंगे ?
    काम न वो करते थे न ये करते हैं अधिकारी कर्मचारी न उनकी सिफारिशें मानते थे न इनकी मानते हैं !घूस देकर काम तब भी करवाया जाता था और अब भी घूस देकर ही काम हो पाता है !
     घूस नहीं तो काम नहीं !घूस दो तो सरकारी जमीनों पर भी कोठी बना लो और घूस न दो तो नाली छज्जे चबूतरे भी तोड़ जाते हैं सरकारी घूसखोर लोग !सरकार पूछती है भ्रष्टाचार कहाँ है !
    रेड़ी पटरी वाले घूस न दें तो सब्जी भी नहीं बेच सकते और घूस देकर तो बम भी बना लेते हैं आतंकवादी लोग !सरकार पूछती है भ्रष्टाचार कहाँ है!
   घूस के बलपर होते हैं अवैध निर्माण घूस देकर ही उन्हें बचाया जाता है यदि भ्रष्टाचार नहीं है तो क्यों नहीं हटाए जाते हैं अवैध निर्माण !
    अधिकारियों कर्मचारियों के द्वारा घूस लेकर करवाए गए अवैध निर्माण या अवैध कब्जे खोजेगा कौन!अवैध निर्माण के नाम पर ये घूस खोर लोग उन्हीं के घर तोड़ते हैं  जिन्होंने इन्हें घूस नहीं दी होती है !सरकार पूछती है भ्रष्टाचार कहाँ है!
    नेतालोग अवैध कालोनियों में पहले मद्दे सस्ते मकान लेते हैं जमीनें खरीदते हैं या अवैध निर्माण करवाते हैं अवैध निर्माण वाले लोगों से घूस लेते हैं फिर अवैध जमीनों और निर्माणों को नियमित करने के लिए शोर मचाते हैं !सरकार पूछती है भ्रष्टाचार कहाँ है!
    15 मीटर तक ऊँची बिल्डिंगें बनने की अनुमति थी तो उससे ऊँची बिल्डिंगें बनने  क्यों दी गईं उन्हें रोकने के लिए जिम्मेदार लोग उनसे घूस लेते रहे और सरकार से सैलरी किस बात की !ये ऊंचाई निश्चित क्यों की गई और की गई तो  इससे बढ़ने क्यों दी गई !ऐसे अधिकारी कर्मचारी रखे क्यों गए और रखे गए तो लापरवाही और घूस खोरी के लिए उन पर कार्यवाही क्यों नहीं की जाती है !सरकार पूछती है भ्रष्टाचार कहाँ है!
    कुल मिलाकर जैसा पहली सरकारों में था वही अभी भी होता चला आ रहा है ईमानदारी की केवल बातें बातें हैं बस काम की शैली वही है पहले वाली !
    नेता ईमानदार और कर्मठ नहीं होंगे तो यही होगा !चुनावी टिकट देते समय शैक्षणिक योग्यता अनुभव चरित्र ईमानदारी आदि को न वो महत्त्व देते थे न अब दिया जाता है!चुनाव जीतने के लिए झूठे वायदे वे भी करते थे अब भी किए जाते हैं !चुनावी टिकटें अपनों को या पैसे वालों को वो भी देते थे ये भी देते हैं !जनता की बात वो भी नहीं सुनते थे अब भी नहीं सुनी जाती हैं परिचित नेता भी फोन पर न बात करने के लिए झूठ बोलवा देते हैं घर जाने पर पता लगता फोन करके आओ या सुबह 9- 10 आओ !उस समय वो काम कम अपनी व्यस्तता बताने एवं अपने ओहदे को समझाने  में अधिक लगाते हैं !

   चुनाव जीतने या कोई बड़ा पद पाने के बाद नेता इतने अधिक जहरीले हो जाते हैं कि इनके उठने  बैठने  बोलने चालने आदि के ढंगसे तमीज गायब हो चुकी होती है सत्ता में रह चुके नेताओं की नकल करते करते ये वैसे ही हो जाते हैं जिनके जिन आचरणों की निंदा करते करते ये सत्ता में आए थे अब जनता ने जैसे उन्हें धक्का दिया था यदि ये न सुधरे तो अब इन्हें देगी !    मंत्री हो और घमंडी न हो, नेता हो और काम करे ऐसा कभी हो सकता है क्या ?मंत्री बदलते रहने से ये बात ढकी रहती है बहाना बनाने का मौका मिलता रहता है !
    मंत्री सांसद विधायक आदि बनने के बाद घमंडी सभी हो जाते हैं ! काम करना न आता है और न ही करना चाहते हैं संवेदनाएँ मर सी जाती हैं !मंत्री बदल बदल कर सरकार अपना मुख साफ दिखाने की कोशिश किया करती है किंतु जनप्रतिनिधियों के आचरणों के दाग धब्बे तो आ ही जाते हैं |काश !संयमशील होते अपने भी देशभक्त नेता लोग !!!
  विधायकों सांसदों मंत्रियों आदि को जब होने लगता है सत्ता का नशा !तब ऐसे स्वयंभू भगवानों को इंसान बना देती है जनता !इसलिए सत्ता की ऐसी नशाखोरी से बचने में ही हर किसी की भलाई है !
    राजनेता हों या राजनैतिक दल ये स्वयं में न अच्छे होते हैं न बुरे !सत्ता पाते ही पागल हो जाते हैं बस !इनकी सबसे बड़ी सच्चाई ये है कि जिसे सत्ता मिलती है वो घमंडी हो जाता है बिना सत्ता के सब सुंदर शालीन मनुष्यता पसंद गाँवों गरीबों किसानों मजदूरों के हमदर्द दिखते हैं !
     नेता जब सरकार में रहते हैं वो स्वार्थी घमंडी आदि दुर्गुणों से भरपूर हो जाते हैं और सत्ता जाते ही फिर इंसान के इंसान ! भूल जाता है देवता बनना !तब याद आने लगते हैं जनता कार्यकर्ता गाँव गरीब किसान आदि सब !इसलिए दोष राजनेताओं का नहीं अपितु दोष तो सत्ता का होता है इसीलिए सत्ता छीनकर अपने को भगवान् समझने वाले नेताओं को इंसान बना देना जानती है जनता !
         विरोधी पार्टियां जब सरकार  थीं तब उनसे बड़ी शिकायत थी उनके नेताओं की मैं निंदा किया करता था किंतु जब अपनी पार्टी सत्ता में आ गई तो समझ में आ गया कि वो नेता सही और मैं ही गलत था !मैं उन बेचारों को समझ नहीं पाया कि इतने मासूम होते हैं वे बेचारे !सत्ता का नशा होता ही ऐसा है कि बड़े बड़े ज्ञानियों गुणियों को भी अंधा बना देता है | सच्चाई यही है कि सत्ता में पहुँचने के बाद प्रायः नेता लोग होश में नहीं रह जाते !जो नेता पहले कभी आपके साथ  बात बिना बात हँसते हाथ मिलाते गले मिलते रहे थे वे सत्ता में आने के बाद उनसे वैसी उम्मींद नहीं की जानी चाहिए ! 
      सत्ता में सम्मिलित नेता कब किसका किस बात पर कितना अपमान कर दें पता ही नहीं चलता !सत्ता में रहकर  उठने बैठने बोलने मिलने जुलने का शिष्टाचार तो बिल्कुल समाप्त हो ही जाता है! अपने दरवाजे मिलने आए हर व्यक्ति को बिना कुछ दिए भी भिखारी समझने लगते हैं सत्ता में आ जाने वाले  सत्तामूर्च्छित नेतालोग ! 
    मेरा निजी अनुभव है कि कोमल भावनाओं वाले अधिक संवेदन शील भावुक लोगों को अपने पूर्व परिचित नेताओं के पास मिलने कभी नहीं जाना चाहिए !जरूरी जाना पड़े भी तो अपमान,अप्रिय व्यवहार उपेक्षा आदि सहने के लिए तैयार होकर जाना चाहिए अन्यथा ये 'नमस्ते'चोर लोग बेइज्जती करते समय इस बात की परवाह नहीं करते कि आपसे मेरा पुराना  सम्बन्ध कैसा था उसे वे चतुर लोग भूलने में ही भलाई समझते हैं !
     सत्तापक्ष के सरकारों में सम्मिलित नेताओं के अप्रिय एवं उपेक्षा पूर्ण व्यवहारों से आहत कार्यकर्ता लोगों की समस्याओं के समाधानों एवं उनकी शिकायतों के निवारण के लिए अक्सर सत्तासीन नेताओं की कुंडी खटखटाना मैं अपना कर्तव्य समझता रहा हूँ अभी भी कुछ ऐसा ही करना पड़ा !कुछ कार्यकर्ताओं की आलोचना से आहत होकर उनकी बात ठीक जगह पहुँचाने के उद्देश्य से मैंने सरकार से संबंधित कुछ जगहों पर और कुछ नेताओं से संपर्क करने के प्रयास किए किंतु परिणाम वास्तव में दुखद थे !सरकारें लोकतान्त्रिक पद्धति से काम पैतृक व्यवसाय की तरह अधिक संचालित की जा रही हैं सेवा भाव तो खोजने पर भी नहीं मिलता शक और शंका की दृष्टि से हर किसी को देखा जा रहा है न जाने क्यों ?ऐसी स्थिति से मैं स्वयं आहत हुआ कि कार्यकर्ता को जो संगठन अपना नहीं समझते कार्यकर्ता ही उन्हें अपना क्यों समझे और कहाँ तक अपनी सेवा भावना की परीक्षा देता रहे !कैसी दुविधा है सच्चे कार्यकर्त्ता के सामने !आलोचना की नहीं जाती उपेक्षा सही नहीं जाती !ऐसा असमंजस !!
    मैं अपनी सनातन हिंदू विचार धारा के समर्थक संगठन के विविध आयामों से सन  1986 से जुड़ा चला आ रहा हूँ !कभी किसी दायित्व की परवाह नहीं की सेवाकार्य समझ कर करते चले गए विचार धारा कभी नहीं बदली !धार्मिक संगठनों के सभी सामाजिक कार्यकर्ता लोग धार्मिक नैतिक आदि मधुर बात व्यवहार करने के लिए जाने जाते रहे हैं एक परिवार की तरह सबका सबसे कितना अपनापन हुआ करता था एक दूसरे के सुख दुःख में लोग बड़े छोटे का भाव भूलकर खड़े हो जाया करते थे कितना उत्साह बर्द्धन किया करते थे वे ! ऐसे श्रेष्ठ संगठन के लिए अपनी क्षमता के अनुशार कोई दायित्व लिए बिना समर्पित रहा हूँ अयोध्या बनारस कानपुर से लेकर दिल्ली तक के जितने भी लोग मुझे जानते हैं वो इसी रूप में जानते हैं ! किसी को संगठन परिवार के प्रति मेरे समर्पण पर संशय नहीं है यहाँ तक कि सोशल साइटों पर मेरे साथ जुड़े हजारों लोग भी मुझे इसी रूप में मानते हैं !
     मेरी तीन फेस बुक और 9 ब्लॉगों पर कुछ हजार आर्टिकल विभिन्न विचारों पर प्रकाशित हैं जो  संगठनात्मक विचारधारा एवं समाज और संगठन की भलाई के लिए सामाजिक सुधार एवं भ्रष्टाचार समाप्ति के लिए विपक्षियों को तर्कयुक्त जवाब आदि से संबंधित हैं | इस प्रकार से संगठन और पार्टी के लिए जो कुछ अच्छा से अच्छा कर सकते थे वो करने का प्रयास मैंने भी प्रभावी रूप से किया है | संगठन के कार्यों में भी सहभागी रहता रहा हूँ | यहाँ तक कि 2013 से चुनावों के लिए एक एक दिन में 14 -14 घंटे लगातार सोशल साइटों पर समर्पित भावना से संगठन और पार्टी के लिए काम किया है |ये क्रम 2 वर्ष लगतार चलता रहा जो अभी कुछ महीने पहले तक चला अब भी जारी है किन्तु निराशा होने के कारण अब  उतना उत्साह नहीं रहा यद्यपि निष्ठा वही है !
      सरकार बने पिछले तीन वर्ष हो गए सरकार के अनेकों मंत्रालयों सांसदों एवं पार्टी पदाधिकारियों के पास मिलने का समय स्वयं मैं माँग चुका हूँ सैकड़ों पत्र डाल चुका हूँ न समय मिला न पत्रों का उत्तर !यहाँ तक कि निजी तौर पर PM साहब और उनके PA श्री ओम प्रकाश जी के भी संपर्क में भी कभी मैं रह चुका हूँ तब माननीय मोदी जी ने मेरी मदद करने के लिए किसी को कभी फोन भी कर दिया करते थे किंतु जब से सरकार बनी तब से तो वे भी अतिव्यस्त हैं ईश्वर करे उनकी भी व्यस्तता बरकरार रहे ... !
       सरकार बनने के बाद ऊपर से नीचे तक सबको न जाने क्या हुआ जा रहा है कि वो विचारधारा वो सहजता वो सत्यवादिता वो सेवाभावना वो जिम्मेदारी के भाव न जाने क्यों छूटते जा रहे हैं |उन्हें  लगता है जैसे केवल उनके अपने और अपनों  के लिए सरकार बनवाई गई थी बाकी सबको आश्वासन लेटर आदि देकर पीछा छुड़ाने में ही लगे हैं विधायक संसद मंत्री आदि लोग | 
     पार्टी परिवार में अपनों के साथ इतना उदासीन वर्ताव किया जा रहा है ऊपर से नीचे तक ! पार्टी पदाधिकारी हों या सरकार में सम्मिलित लोग !इनके स्वभाव पहले तो ऐसे तो नहीं थे !माना कि व्यस्तता बढ़ी है किंतु इसका मतलब ये भी तो नहीं है कि सेवा भावना से जुड़े पार्टी के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की बात सुनने के लिए किसी की कोई जिम्मेदारी और  जवाबदेही  ही न समझी जाए ! समाज के जो लोग हमारे संपर्क में रहे हैं आज वो हमारे पास काम के लिए संपर्क करते हैं मैं उनके नैतिक काम भी करवा पाने की स्थिति में नहीं हूँ | 
     पार्टी की उदासीनता के शिकार ऐसे बहुत लोग होंगे !स्वयं मुझे अपने जरूरी कामों के लिए कई बार घूस माँगने वाले अफसरों का सामना पड़ता  है वो साफ कहते हैं कि ये पैसा ऊपर तक जाता है ! ऐसी परिस्थिति में मैं अपनी पार्टी और सरकार के अच्छे कामों का प्रचार प्रसार कैसे करूँ और सरकार के किन गुणों की प्रशंसा करूँ ?कहाँ तक सूखा सूखा फीलगुड करूँ !
     इतना ही नहीं वैदिकविज्ञान के द्वारा मनोरोग चिकित्सा मौसम और भूकंप जैसे रहस्यमय विषयों पर मैंने सार्थक शोधकार्य किया है उससे इन विषयों में चल रहे शोध कार्यों को बड़ी मदद मिल सकती है किंतु इन विभागों से जुड़े लोग मेरी बात इसलिए सुनने के लिए तैयार इसलिए नहीं हैं क्योंकि वो वैदिक विज्ञान को विज्ञान मानने को तैयार ही नहीं हैं जबकि सरकार वैदिक विज्ञान एवं भारत की प्राचीन संस्कृति का प्रचार प्रसार करने के लिए पूँछ उठाए घूम रही है बड़े बड़े दावे ठोंक रही है किंतु वे वैदिकशोध को शोध लायक विषय ही नहीं मानते और उनकी शिकायत की किससे  जाए और अपना विषय रखा किसके सामने जाए !|मुझे अपने जरूरी शोधकार्य  को और आगे बढ़ाने के लिए सरकार से मदद चाहिए किंतु मदद तो दूर सरकार या पार्टी में कोई कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं तीन वर्ष हो गए भटकते भटकते !वैदिक विषयों पर पूर्ववर्ती सरकार की उदासीनता तो समझ में आती थी किंतु वर्तमान अपनी सरकार तो संस्कृति के लिए समर्पित है उसमें भी उपेक्षा !आश्चर्य !!सत्ता का सुख जो न करा दे सो थोड़ा !!
पहले हमारी विचारधारा से संबंधित सभी लोग जिन बातों विचारों व्यवहारों के लिए सत्तारूढ़ अन्य दलों और उनके नेताओं की आलोचना किया करते थे उन्हें कहा करते थे कि वे सत्ता मूर्छित लोग हैं !किंतुआज... !
     कई बार ऐसा लगता है कि क्या ये दोष उस समय उन पार्टियों और नेताओं का नहीं था जिन्हें हम सभी लोग गलत समझकर जिनकी निंदा करते करते जिन्हें सत्ता से बाहर धकेला गया !वस्तुतः ये दोष सत्ता देवी का ही है जो भी सत्ता में आएगा वो ऐसा हो ही जाता है !किंतु अटल जी की सरकार में विभन्न मंत्रियों और सांसदों के यहाँ मैं भी मिलने गया सबके यहाँ न केवल सहजता दिखती थी अपितु होती भी थी बातें सुनी भी जाती थीं और मानी भी जाती थीं जवाब भी दिए जाते थे !ये राजनीति है इसमें अपने मन की बात सुनाने से अधिक जनता के मन की बात पता लगानी होती है !क्योंकि अपने मन की बात तो प्रायोजित हो सकती है जबकि जनता के मन की बात तो वास्तविकता है जिसे वो जी रही है !जो अपने भोजनालय के लिए अन्न नहीं जुटा पाते वे शौचालय बनाने की व्यवस्था कैसे कर लें और कर भी लें तो क्या भोजनालय से अधिक आवश्यक  है शौचालय !स्वच्छता अभियान केवल झाड़ू बुहारू कर लेने से सफल हो जाएगा क्या ?महोदय जनता की भी तो  सुनो !साफ सफाई से रहना जनता को भी आता है गंदगी में कोई नहीं रहना चाहता किंतु आर्थिक अभाव के कारण जिनके जीवन में सब कुछ अव्यस्थित हो वो केवल झाड़ू लगाकर कैसे स्वच्छ भारत का निर्माण करलें !घर भर के कपड़ों से बदबू आती हो विस्तर गंध दे रहे हों छतों से पानी टपक रहा हो !दरवाजे पर जानवरों की खूंदन हो ऐसे में कैसे हो स्वच्छ भारत का निर्माण !झाड़ू तो केवल नेता लगा सकते हैं क्योंकि उन्हें लगानी नहीं अपितु झाड़ू पकड़कर दिखानी होती है किंतु जिन्हें वास्तव में लगानी होती है वो दिखाना नहीं चाहते वैसे भी दिखावें किसको और देखेगा कौन !वैसे भी उनका तो प्रतिदिन का काम ही है झाड़ू लगाना !ऋषियों का भारत केवल स्वच्छ ही नहीं अपितु पवित्र भी था वो पवित्रता आज न जाने क्यों घटी है जिसे वापस  लाने की आवश्यकता है !
       यही PMO था !अटल जी से मिलने के लिए मैंने समय माँगा था तो बाकायदा हमारे नाम पत्र भेजकर  हमें यह  कहकर मना कर दिया था कि अभी वे व्यस्त हैं किंतु  उसी दिन शाम 8 बजे मैंने पुनः फ़ोन किया और कल का ही  समय लेने  की जिद कर दी ये  उनके लिए कितना कठिन रहा होगा कि रात 12 बजे PMO से फोन आया कि आप कल 13. 40 पर पहुँच जाओ !मैं गया और वे मिले ! 
      तब तो माननीय जोशी जी ,श्री अडवाणी जी , श्रद्धेय रज्जू भैया जी ,माननीय अशोक सिंघल जी के पास भी पहुँच कर अपनी बात आसानी से कही जा सकती थी अब तो पूरी सरकार और संगठन बिल्कुल पैक है आखिर क्यों ? सामान्य कार्यकर्ता को भी समझाइए सबसे अधिक उसी को जूझना पड़ता है जनता से !
     अब तो न किसी की कोई सुनेगा न उनके समाधान के विषय में कुछ बोलेगा और न कुछ देखेगा !केवल सरकार दौड़े जा रही है क्यों ?आखिर क्या किया जाए ऐसी मैराथनों  का !सरकार है तब उसकी उपेक्षा सरकार न हो तब तो उपेक्षा होती ही है ! 
     सरकार बनाने के लिए पार्टी के द्वारा चलाए जा रहे प्रयासों में एक एक कार्यकर्ता अपनी संपूर्ण सामर्थ्य से समर्पित रहा है फिर भी यदि सरकार उसके लिए नहीं है तो वो सरकार के लिए क्यों होगा !ऐसे भोजन बैठक और विश्राम के नाम पर बहुमूल्य स्वाँसें ब्यर्थ में क्यों नष्ट करेगा !
   इसलिए पार्टी और सरकार के जिम्मेदार शीर्ष लोगों से निवेदन है कि यदि संभव हो तो कार्यकर्ता की ओर भी देंखें उसे भी  समय दें कुछ उसके भी काम करें क्योंकि कार्यकर्ता उचित अनुचित बिचार किए बिना पार्टी और सरकार के साथ खड़ा होता है | फिर भी आप कार्यकर्ता का अनुचित काम मत कीजिए उचित तो कीजिए अन्यथा जिम्मेदारी से उत्तर तो दीजिए कारण और निवारण के उपाय तो बताइए !कोई  बताइए जहाँ कार्यकर्त्ता भी पहुँच कर अपनी बात रख सके और उसे आम जनता से कुछ तो अधिक अपनापन मिले !
    विशेष -मेरा उद्देश्य सरकार की आलोचना करना कतई नहीं हैं किंतु आम आदमी हो या कार्यकर्ता उसकी बात उठाना भी अपना धर्म है !सैद्धांतिक रूप से इसी विचार धारा से जुड़े होने के कारण जो बात मुझे निजी तौर पर रखनी चाहिए थी वो सार्वजनिक तौर पर यहाँ रखनी पड़ी क्योंकि वो लोग हमें विचार भी देने लायक नहीं समझते ऐसी जगह जुड़ना या न जुड़ना बराबर सा लगता था इसीलिए तटस्थ भूमिका मजबूरी में अपनानी पड़ी अन्यथा मेरे जैसे लोग भी पार्टी संगठन आदि में कहीं कुछ अपना योगदान दे सकते थे लेकिन मालिक लोग ऐसा करना उचित नहीं समझ रहे होंगे होगा कोई कारण !वो लोग हमारे जैसे लोगों को किसी लायक नहीं समझते इसलिए अपने विचार रखने के लिए कोई न कोई मंच तलाशना पड़ा !आज भी सरकार में वा संगठन में बैठे बड़े लोगों से निवेदन है कि यदि सरकार कोई समाधान निकालकर कोई ऐसा मंच संस्था या फोन नंबर उपलब्ध कराती है जो जिम्मेदारी पूर्वक आम कार्यकर्ता के साथ वर्ताव कर सके या आम समाज से प्रतिभाओं को प्रेरित करके राजनैतिक क्षेत्र की ओर रुझान पैदा कर सके !ये देश और समाज के हित में होगा !जिससे संपूर्ण रूप से नैतिक कार्यों में कार्यकर्ता और आम जनता की मदद की जा सके और अनैतिक कार्यों के लिए साफ साफ मना किया जा सके तो मुझे ख़ुशी होगी और मैं सम्पूर्ण निष्ठा के साथ उस संपर्क सूत्र का प्रचार प्रसार करके सरकार की छवि को अधिक से अधिक स्वच्छ और बेदाग़ बनाने के लिए प्रचार प्रसार करने की अपनी प्रतिज्ञा से संकल्पबद्ध हूँ वो करता रहूँगा !
     

संस्थापकः-  राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोधसंस्थान seemore....http://jyotishvigyananusandhan.blogspot.in/2014/06/blog-post_3979.html
हमारी शिक्षा -
व्याकरणाचार्य (एम.ए.)संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी
ज्योतिषाचार्य (एम.ए.ज्योतिष)संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी
एम.ए. हिन्दी कानपुर विश्व विद्यालय
पी.जी.डिप्लोमा पत्रकारिता ,उदय प्रताप कॉलेज वाराणसी
पी.एच.डी. हिन्दी (ज्योतिष)बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी बी. एच. यू. वाराणसी(काशी हिंदू विश्वविद्यालय) 
विशेष योग्यताः- वेद, पुराण, ज्योतिष, रामायणों तथा समस्त प्राचीन वाङ्मय एवं राष्ट्र भावना से जुड़े साहित्य का लेखन और स्वाध्याय
हमारेलिखी हुई पुस्तकें-
प्रकाशितः- पाठ्यक्रम की अत्यंत प्रचारित प्रारंभिक कक्षाओं की हिन्दी की किताबें
   कारगिल विजय (काव्य )
श्री राम रावण संवाद (काव्य )
श्री दुर्गा सप्तशती (काव्य अनुवाद )
श्री नवदुर्गा पाठ (काव्य)
श्री नव दुर्गा स्तुति (काव्य )
श्री परशुराम (एक झलक)
श्री राम एवं रामसेतु
(21 लाख 15 हजार 108 वर्षप्राचीन)
कुछ मैग्जीनों में संपादन, सह-संपादन, स्तंभ लेखन आदि।
अप्रकाशित साहित्यः- श्री शिव सुंदरकांड, श्री हनुमत सुंदरकांड,
संक्षिप्त निर्णय सिंधु, ज्योतिषायुर्वेद, श्री रुद्राष्टाध्यायी, वीरांगना द्रोपदी, दुलारी राधिका, ऊधौ-गोपी संवाद, श्रीमद्भगवद् गीता‘ काव्यानुवाद’
रुचिकर विषयः- प्रवचन, भाषण, मंचसंचालन, काव्य लेखन, काव्य पाठ एवं शास्त्रीय विषयों पर नित्य नवीन खोजपूर्ण लेखन तथा राष्ट्रीय भावना के विभिन्न संगठनों से जुड़कर कार्य करना।
जन्मतिथिः 9.10.1965
जन्म स्थानः- पैतृक गाँव - इंदलपुर, पो.- संभलपुर, जि.- कानपुर,उत्तर प्रदेश
तत्कालीन पता :
के -71, छाछी बिल्डिंग चौक,
कृष्णा नगर, दिल्ली-110051
दूरभाष : 01122002689, 01122096548,
मो. 9811226973, 9968657732
ई - मेल : vajpayeesn @gmail.com 
आदरणीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी एवं श्री श्याम बिहारी मिश्र जी के साथ 
आचार्य डॉ.शेष नारायण  वाजपेयी

श्रद्धेय श्री रज्जू भइया जी के साथ आचार्य डॉ.शेष नारायण वाजपेयी 

आदरणीय  डॉ. मुरली मनोहर जोशी जी के साथ 
आचार्य डॉ. शेष नारायण वाजपेयी                श्रीमान कुशाभाऊ ठाकरे जी के साथ आचार्य डॉ. शेष नारायण वाजपेयी
श्रीमती सुषमा स्वराज जी के साथ आचार्य डॉ. शेष नारायण वाजपेयी
        श्री मदनलाल खुराना जी के साथ आचार्य डॉ.शेष नारायण वाजपेयी




                                          



                            
                                                                                                                                                                                                                                                     

    

Tuesday, October 31, 2017

दलितों का शोषण कब किसने कहाँ कैसे किया और दलितों ने सहा क्यों होगा उनकी तो संख्या भी अधिक थी !

   दलित शब्द का अर्थ क्या होता है मनुष्यों के किसी भी वर्ग को दलित कहने का अभिप्राय क्या है ?गरीब होना अलग बात है और दलित होना अलग !आरक्षण गरीबों को मदद पहुँचाने का प्रयास हो भी सकता है किंतु इससे दलितों की मदद कैसे की जा सकती है इस परिश्रमी वर्ग को दलित क्यों कहा जाए ? 
   इतने वर्षों के आरक्षण से विकास हुआ क्यों नहीं ?चूँकि आरक्षण किसी समस्या का समाधान है ही नहीं !बोतल से दूध पिलाकर किसी को जीवित भले ही रख लिया जाए किंतु पहलवान नहीं बनाया जा सकता !जातिगत आरक्षण वस्तुतः अकर्मण्य सत्ता लोभी नेताओं की भारतवर्ष को प्रतिभाविहीन बनाने की साजिश है जिससे वे चुनाव जीतते रहें ! 
किसी के घर में बच्चा न हो रहा हो तो उसके लिए पड़ोसी को दोषी ठहरा दिया जाएगा क्या ?और पड़ोसी का इलाज करा देने से उसके यहाँ बच्चा कैसे हो जाएगा ! इसी प्रकार दलितों का विकास न होने के लिए सवर्ण दोषी क्यों ?इतने वर्षों से आरक्षण मिलने पर भी दलितों का विकास नहीं हुआये इस बात का प्रमाण है कि आरक्षण किसी समस्या का समाधान नहीं है ! सवर्णों की लड़कियों को कोई कैसे बाध्य कर सकता है कि वे दलितों के साथ विवाह करें वो बकड़ियाँ तो नहीं हैं जो किसी के गले से बाँध दी जाएँ !सवर्ण लड़कियों को भी अपना भविष्य चुनने का अधिकार है वे आरक्षण माँगने वालों  से विवाह करना ही नहीं चाहतीं !माँगने मूँगने वाला ब्राह्मण ही क्यों न हो उससे भी लड़कियाँ विवाह नहीं करना चाहती हैं अविकसित ब्राह्मणों के लड़के भी कुँआरे बैठे रहते हैं !ऐसी परिस्थिति में कोई लड़की किसी ऐसे कायर व्यक्ति से विवाह क्यों कर ले जिसे अपने पुरुषार्थ पर भरोसा ही न हो अपने विकास के लिए स्वयं क्यों न प्रयास किया जाए !सवर्ण लोग भी गरीब होते हैं बिना किसी आरक्षण के अपना विकास करके दिखा देते हैं इसी लिए उनका सम्मान बढ़ता है !स्वाभिमानी दलित वर्ग के लोगों में भी बहुत ऐसे कर्मठ परिश्रमी स्वाभिमानी चरित्रवान ईमानदार लोग हैं जिन्होंने अपने परिश्रम के बल पर अपना उच्चतम विकास किया है ऐसे कई लोग ऊँचे ऊँचे पदों तक भी पहुँचे हैं उन्हें तो कोई सवर्ण रोकने नहीं आया !बाकी लोग क्यों सवर्णों को बदनाम करते घूमते हैं ! 

 दलित शब्द का अर्थ क्या होता है ये जानने के लिए मैंने शब्दकोश देखा जिसमें टुकड़ा,भाग,खंड,आदि अर्थ दलित शब्द के  किए गए हैं।मूल शब्द दल से दलित शब्द बना है।मैं कह सकता हूँ कि टुकड़ा,भाग,खंड,आदि शब्दों का प्रयोग कोई किसी मनुष्य के लिए क्यों करेगा?इसके बाद दल का दूसरा अर्थ समूह भी होता है।जैसे कोई भी राजनैतिक या गैर राजनैतिक दल, इन दलों में रहने वाले लोग दलित कहे जा सकते हैं।इसी दल शब्द से ही दाल  बना है।चना, अरहर आदि दानों के दल बना दिए जाते हैं जिन्हें दाल कहा जाता है।इस प्रकार दलित शब्द के टुकड़े,भाग,खंड,आदि और कितने भी अर्थ निकाले जाएँ  किंतु दलित शब्द का अर्थ दरिद्र या गरीब नहीं हो सकता है।  

     राजनैतिक साजिश के तहत यदि इस शब्द का अर्थ अशिक्षित,पीड़ित,दबा,कुचला आदि  करके ही कोई राजनैतिक लाभ लेना चाहे तो यह शब्द ही बदलना पड़ेगा,क्योंकि इस शब्द का अर्थ शोषित,पीड़ित,दबा,कुचला आदि करने पर यह ध्यान देना होगा कि इसमें जिन जिन प्रकारों का वर्णन है वो सब कोई अपने आप से भले बना हो किंतु किसी के दलित बनने में किसी और का दोष  कैसे हो सकता है?यदि किसी और ने किसी का शोषण करके उसे दलित बनाया होता तो दलित की जगह दालित होता।जब बनाने वाला कोई और होता है तो आदि अच की वृद्धि होकर जैसे चना, अरहर आदि दानों के दल बना दिए जाते हैं जिन्हें दाल कहा जाता है क्योंकि चना आदि यदि चाहें भी कि वे अपने आप से दाल बन जाएँ  तो नहीं बन सकते।जैसेः- तिल से बनने के कारण उसे तैल कहा जाता है।बाकी सारे तैलों का तो नाम रख लिया गया है तैल तो केवल तिल से ही पैदा हो सकता है।ऐसे ही वसुदेव के पुत्र होने के कारण ही तो वासुदेव कहे गए। इसी प्रकार दलित की जगह दालित होता। चूँकि शब्द दलित है इसलिए किसी और का इसमें क्या दोष ?वैसे भी किसी ने क्या सोच कर दलित कहा है यह तो वही जाने किंतु इस ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि  में कम से कम हम तो किसी को दलित नहीं कह सकते ऐसा कहना तो उस ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि का अपमान है।हमारा तो भाव है कि

          सीय राम मय सब जग जानी । 

          करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।

     मैं तो ईश्वर का स्वरूप समझकर सबको प्रणाम करता हूँ  और अपने हिस्से का प्रायश्चित्त भी करने को न केवल तैयार हूँ बल्कि दोष का पता लगे बिना ही मैंने इस जीवन को धार पर लगाकर प्रायश्चित्त किया भी है।यदि हमारे पूर्वजों के कारण समाज का कोई वर्ग अपने को बेरोजगार,गरीब या धनहीन समझता है तो मैं अपने हिस्से का जो भी मुनासिब प्रायश्चित्त हो आगे भी करना चाहता हूँ ।मेरी सविनय यह ईच्छा भी है कि मुझे इस आरोप के लिए जो भी उचित दंड हो मिलना चाहिए इसके बाद हम अपने परिजनों को इस आरोप से अलग करना चाहते हैं ।साथ ही हमारा यह भी निवेदन है कि हम अपने विषय में जो जानकारियाँ  दे रहे हैं उनकी सच्चाई के लिए किसी भी एजेंसी से जाँच कराने को तैयार हैं । 

  मैंने चार विषय से एम.ए.किया,बी.एच.यू. से पी.एच.डी. भी की।किसी डिग्री कालेज में नौकरी मिल सकती थी किंतु सन् 1989-90 में चले आरक्षण आंदोलन में पूर्वजों पर लगे शोषण के आरोपों को मैं सह नहीं सका।मैं अक्सर तनाव में रहने लगा और एक ही बिचार मन में चलता रहा कि हमारे पूर्वजों ने आखिर किसी शोषण क्यों किया?

    हमें आज तक इन बातों के जवाब नहीं मिले।मैंने एक व्रत लिया था कि इस निपटारे से पूर्व मैं किसी भी  सरकारी सेवा के लिए कभी कोई आवेदन नहीं करूँगा।मुझे गर्व है कि ईश्वर कृपा से मैं आज तक व्रती हूँ । न ही मुझे जवाब मिले न ही मैंने नौकरी मॉगी।न केवल सरकारी प्राइवेट किसी कंपनी आदि में भी कभी कोई नौकरी के लिए साइन नहीं किए ।संघर्ष बहुत हैं बहुतों ने  शिक्षा सहित मुझे अक्सर अपमानित किया है ।फिरभी सहनशीलता सबसे बड़ी मित्र है।जो  देवताओं की कृपा एवं पूर्वजों के पुण्यों का प्रसाद है ।

     ये  बातें  मैं बड़ी जिम्मेदारी से कह रहा हूँ , आखिर सवर्ण कही जाने वाली जातियों में ही मेरा भी जन्म हुआ है, जिसमें मेरा कोई वश नहीं था।जन्म मृत्यु तो ईश्वर के आधीन हैं।इसमें कोई क्या कर सकता है?अपने जन्म,जीवन,जन्मभूमि पर हर किसी को गर्व करना ही चाहिए मैं करता भी हूँ ।

     ईश्वर ने जो कुछ भी किया है।उसे ईश्वर का उपहार समझकर स्वीकार किया है और उपहार में शिकायत कैसी ?मैं इतने जीवन में जगह जगह धक्के खाकर सारी दुर्दशाएँ  भोगकर यह बात विश्वास से कह सकता हूँ कि जाति का इस जीवन में आर्थिक और व्यवसायिक आदि किसी प्रकार का कोई लाभ नहीं होता।जो कमाता है उसके पेट में जाता है उसकी जाति वालों को अकारण क्यों परेशान करना? जाति क्षेत्र समुदाय संप्रदाय की बातें तो कमजोर लोगों में ही कहते सुनते देखी जाती हैं ।बड़े आदमियों की जाति तो उनका अपना आर्थिक बड़ापन होता है, जिसके आगे वे अपने धनहीन घर खानदान के लोगों को पहचानने से मना कर देते हैं। ऐसे में जाति की चर्चा तो मूर्खता ही कही जाएगी जिसका कोई मतलब ही नहीं बचा है।

  जहाँ तक जातिगत आरक्षण की बात है यह भी भारतवर्ष को प्रतिभाविहीन बनाने का प्रयास है।सवर्णवर्ग के लोग यह सोच लेंगे कि क्यों पढ़ना आरक्षण के कारण नौकरी तो मिलनी नहीं है इसी प्रकार असवर्ण लोग भी सोच सकते हैं कि क्यों पढ़ना नौकरी तो मिलनी ही है।अंततः नुकसान तो देश का ही हो रहा है। वैसे भी समृद्ध देश की संकल्पना में सभी भेद भावों से ऊपर उठकर गरीब और पठनशील लोगों को स्वतंत्र शैक्षणिक सहयोग मिलना चाहिए।इससे हर वर्ग के विद्यार्थी अपना जीवन सुधारने का प्रयास तो कम से कम कर ही सकते हैं परिणाम तो ईश्वर के ही हाथ है।समान व्यवस्था प्राप्त करके भी दुर्भाग्य से यदि कोई असफल हुआ ही तो वह इसके लिए किसी और को नहीं कोसेगा।यह उसकी अपनी लापरवाही मानी जाएगी।

      अन्यथा आज असवर्ण कहे जाने वाले लोग सवर्णों को कोस रहे हैं कल सवर्ण कहे जाने वाले लोग अपनी दुर्दशा  के लिए असवर्णों को कोसेंगे।जहॉं तक राजनेताओं की बात है ये कल को सवर्णों को आरक्षण का एलान कर देंगे। इस प्रकार सवर्णों के मसीहा बनकर असवर्णों को गालियॉं देंगे।अपने को गरीबों का बेटा बेटी कह कर तीन तीन करोड़ का घाँघरा पहनकर घूँमेंगे।कितने शर्म की बात है?आज अरबों पति लोग अपने को दलित कहते हैं!क्या उनसे पूछा जा सकता है कि वे आखिर गरीबों का मजाक क्यों उड़ा रहे हैं?कौन सी ऐसी अदालत है जो इस प्रकार से अपमानित लोगों की दशा  पर भी दया पूर्वक बिचार करेगी?

      मैं पॉंच वर्ष का था जब मेरे पिता जी का देहांत हो गया था । मेरे भाई साहब सात वर्ष के थे मेरी माता जी घरेलू परिश्रमशील स्वाभिमानी महिला थीं।किसी संबंधी का कोई सहारा नहीं मिला उस अत्यंत संघर्ष पूर्ण समय में भी माँ के पवित्र आँचल में लिपट कर आनंद पूर्ण बचपन बिताया हम दोनों भाइयों ने।धन के अत्यंत अभाव में जो दुर्दशा होनी थी वह तो सहनशीलता से ही सहना संभव था न किसी से कोई शिकायत न शिकवा हर परिस्थिति में मैं अपने कर्मों और अपने भाग्य का ही दोष  देता हूँ  और किसी पर क्या बश ?कोई चाहे तो दो कदम साथ चल ले न चाहे तो अकेले का अकेला किसी से क्या आशा ?

      हमारे उस छोटे से परिवार ने भयंकर मुशीबत उठा कर मुझे पढ़ने बनारस भेजा।इसमें हमारे लिए अत्यंत आवश्यक संसाधन जुटाने में भाई जी की भी शिक्षा रुक गई थी माता जी के लिए भी बहुत  संघर्ष तो था  ही। 

     भूख पर लगाम लगाकर मैंने चार विषय से एम.ए.किया,बी.एच.यू. से पी.एच.डी. भी की।किसी डिग्री कालेज में नौकरी मिल सकती थी हमारे बहुत हमसे छोटे छात्र मित्र सरकारी नौकरियों में अच्छे अच्छे पदों पर हैं जो अक्सर हमारी परिश्रमशीलता एवं वैदुष्य की प्रशंसा करके हमें सुख पहुँचाते हैं जिनके लिए मैं हमेशा उनका आभारी हूँ ।कई बार अमीरों से अपमानित और आहत होने पर ऐसी प्रशंसाएँ बड़ा संबल बनती हैं बड़ा सहारा देती हैं।लगता है चलो किसी को पता तो है कि मैं भी सम्मान एवं आर्थिक विकास का अधिकारी  था ।

    किंतु सन् 1989-90 में चले आरक्षण आंदोलन में पूर्वजों पर लगे शोषण के आरोपों को मैं सह नहीं सका।मैं अक्सर तनाव में रहने लगा और एक ही बिचार मन में चलता रहा कि हमारे पूर्वजों ने आखिर किसी का शोषण क्यों किया? पचासों विद्वानों शिक्षाविदों से मिला उनसे हमारे बस इतने ही प्रश्न  होते थे।

1.  हमारे पूर्वजों ने किसी का शोषण  क्यों किया?

2.वह शोषण का धन गया कहॉं आखिर हमें इतनासंघर्ष  क्यों करना पड़ा? 

3. संख्या बल में सवर्णों से अधिक होने पर भी असवर्णों  के पूर्वजों ने शोषण सहा क्यों?

4.  सजा अपराधी को दी जाती है उसके परिजनों को नहीं पूर्वजों का यदि कोई अपराध हो ही तो उसका दंड हमें  क्यों?

5. यदि अपराध की आशंका है ही तो अपराध के प्रकार की जॉंच होनी चाहिए और हम लोगों की तलाशी  की जानी चाहिए और जातीय ज्यादती के द्वारा प्राप्त ऐसा कोई धन यदि प्रमाणित हो जाए तो जब्त किया जाना चाहिए। इस प्रकार से सवर्ण वर्ग का  शुद्धिकरण करके ये फाँस हमेंशा के लिए समाप्त कर देनी चाहिए।आखिर कितनी पीढ़ियॉं और शहीद की जाएँगी इस तथाकथित शोषण पर?कब तक ढोया जाएगा इस शोषण कथा को?आखिर शोषण का आरोप सहते सहते और कितने लोगों की बलि ली जाएगी ?  

    हमें आज तक इन बातों के जवाब नहीं मिले।मैंने एक व्रत लिया था कि इस निपटारे से पूर्व मैं किसी सरकारी सेवा के लिए कोई आवेदन नहीं करूँगा मैं आज तक व्रती हूँ।न मुझे जवाब मिले न ही मैंने नौकरी माँगी।

     स्वजनों अर्थात तथा कथित सवर्णों ने हमारा और हमारी शिक्षा का शोषण करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।किसी को किताबें लिखानी थीं किसी को मैग्जीन,किसी ने देश सेवा की दुहाई दी किसी ने हमारे और हमारे परिवार के भविष्य सुधारने का लालच दिया।कुछ लोगों ने बड़े लालच देकर बड़े बड़े काम लिए दस बारह घंटे दैनिक परिश्रम के बाद वर्षोँ तक सौ दो सौ रुपए मजदूरों की भाँति देते रहे एक आध ने तो यह लालच देकर काम लिया कि हम तुम्हें एक स्कूल खोल कर दे देंगे उसको परिश्रम पूर्वक चला लेना जिससे तुम्हारा जीवन यापन हो जाएगा किंतु काम निकलने के बाद में उन्होंने भी मुख फेर लिया यह कैसे और किसको किसको कहें कि वे बेईमान हो गए आखिर शिक्षा से जुड़ा हूँ , मर्यादा तो ढोनी ही है।पेट और परिवार का पालन करना है

      आज क्या मुझे मान लेना चाहिए कि ब्राहमण या सवर्ण था इसलिए ऐसे लोग  हम पर इस प्रकार की कृपा करते रहे।सरकारी नौकरी न माँगने का व्रत है तो जीवन ढोने के लिए किसी पर विश्वास तो करना ही पड़ेगा।अनुभव लेते लेते जीवन गुजरा जा रहा है। 

     किसी और की अपेक्षा अपने जीवन को मैंने इसलिए उद्धृत किया है कि गरीब सवर्णों को भी अमीरों के शोषण का उतना ही शिकार होना पड़ता है जितना किसी और को वह अमीर किसी भी जाति,समुदाय, संप्रदाय आदि का क्यों न हो।अमीर केवल अमीर होता है इसके अलावा कुछ नहीं ।यह हमारे अपने अनुभव का सच है मेरा किसी से ऐसा आग्रह भी नहीं है कि वो मुझसे या मेरी बातों से सहमत ही हो।