Sunday, September 8, 2013

कलियुगी बाबाओं एवं कलियुगी नेताओं ने देश को निराश किया है !

  अशास्त्रीय आचरण करने वाले बाबाओं एवं असंवैधानिक और अनैतिक आचरण करने वाले नेताओं पर होना चाहिए अंदर से ही नियंत्रण !

     इन्हें इतने अधिक धन की आवश्यकता क्यों होती है ?और यदि इनके जीवन का  वास्तविक लक्ष्य धन कमाना ही था तो आम आदमी की तरह परिश्रम पूर्वक भी कमा सकते थे योग का ढोंग या जनसेवा का ढोंग करने की क्या जरूरत ही क्या थी? इसके लिए  इन्हें नेता  और बाबा बनने की आवश्यकता ही क्या थी? हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि लोग  धर्म एवं राजनीति से अनैतिकता पूर्वक धन इकठ्ठा कर रहे हैं और इसके बाद ये लोग शुरू करते हैं उस धन का सभी प्रकार से भोग ! 

    इस प्रकार से नेताओं एवं  बाबाओं की बासना का शिकार महिलाएँ या लड़कियाँ शुरू में इनके दिए हुए  लालच में फँस जाती हैं किन्तु ऐसे नेता और बाबा लोग सच तो बोलते नहीं हैं इसलिए शिकार हुई महिलाओं को देर सबेर पता लग ही जाता है कि उनके साथ धोखा हुआ है तब तक देर हो चुकी होती है!

    आजकल देश के प्रसिद्ध एक बाबा के ऊपर ऐसे  ही आरोप लग रहे हैं जिसमें एक लड़की ने आरोप लगाया है कि उसके साथ बाबा जी ने सन २००१ से सन २००७ तक अपने अलग अलग आश्रमों में अलग अलग समयों पर कई बार बलात्कार किए हैं !अरे! जहाँ संदेह हो गया था वहाँ इतने दिन तक रुकना ही नहीं चाहिए था !किन्तु रही होंगी कुछ मजबूरियाँ!

    खैर आवश्यक है कि कलियुगी बाबाओं एवं कलियुगी नेताओं दोनों पर ही नियंत्रण उनकी अपनी सात्विक समाज के द्वारा किया जाना चाहिए क्योंकि दोनों ही समुदायों के शिथिल लोग देश की मर्यादाओं को तार तार करने में लगे हुए हैं । बिगत कुछ वर्षों से दोनों ने समाज को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हुई है! नेताओं ने देश को और बाबाओं  ने धर्म को लाकर चौराहे पर खड़ा कर दिया है जब तक इनकी गतिविधियों पर नियंत्रण  नहीं किया जाता तब तक कितना भी कठोर कानून क्यों न बना लिया जाए अपराध घट नहीं सकते  क्योंकि सारा अपराधी इन्हीं दोनों से संरक्षित है ऐसे नेताओं को कोठी और काम के लिए एवं ऐसे बाबाओं को आश्रमों के लिए दूसरों की जमीनों पर बलपूर्वक  कब्जे करने होते हैं इस काम में दोनों को ही अपराधियों की मदद की शक्त जरूरत होती है|अपराधी इनका साथ इसलिए देते हैं कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा एक नेता है इसलिए! दूसरे बाबा हैं इसलिए बड़े बड़े मंत्रियों से सम्बन्ध हैं! पैसे नेताओं एवं बाबाओं दोनों के पास होते ही हैं इस प्रकार से नेताओं एवं बाबाओं के सान्निध्य में रहने के कारण इन्हीं दोनों से  अपराधियों की सारी आवश्यकाएँ पूरी होती रहती हैं ये करते रहते हैं अपराध! ऐसे  में क्या कर लेगी कानून की कठोरता ? 

     इन दोनों समुदायों से जुड़े दुष्कर्मियों  के कारण ही समाज का  भरोसा आज दोनों से ही  बुरी तरह  टूटा है दोनों ने समाज के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया है दोनों ने समाज को धोखा दिया है! शारीरिक सुरक्षा एवं सुविधाओं के लिए समाज राजनेताओं की ओर देखता है इसीप्रकार  मानसिक सुख सुविधाओं  सात्विकता आदि के लिए बाबाओं की ओर देखता है दोनों से  दोनों प्रकार का सहयोग लेने के लिए दोनों को टैक्स देता है समाज! बात और है कि नेताओं का टैक्स घोषित होता है तो बाबाओं का अघोषित!अन्यथा  नेताओं या बाबाओं  के पास बिना कमाए इतना अधिक पैसा आता कहाँ से है ?

  आधुनिक बाबाओं और नेताओं में बहुत सारी समानताएँ  होती हैं स्वयं देखिए -बिना किसी परिश्रम के सुख सुविधा पूर्ण जीवन जीने के लिए बड़ी बड़ी रैलियाँ करके धन कमाना दोनों को बहुत पसंद है रैलियों में केवल भाव विहीन भाषण होते हैं इनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता है |जैसे -





यदि आप धार्मिक भाषण दे कर समाज को ठगते हैं तो बाबा !
यदिआप राजनैतिक भाषण दे कर ठगते हैं तो नेता !! 

   यदि  आप मंच पर प्रेम पूर्वक किसी की आलोचना करते हैं तो  बाबा !
यदि  आप मंच पर क्रोध पूर्वक किसी की आलोचना करते हैं तो  नेता !

जो वेद शास्त्रों की दुहाई देकर जनता को झकझोरते हैं वे बाबा !
जो संबिधान की दुहाई देकर जनता को झकझोरते हैं वे नेता !

जो ईश्वर भक्ति की दुहाई देकर माँगे वे बाबा !
जो देश भक्ति की दुहाई देकर माँगे वे नेता !!

 जो परलोक का भय देकर लूटें वे बाबा !
 जो इस लोक का भय देकर लूटें वे नेता !

 जो शिष्य बनाकर  जनता को सपने बेचें  वो बाबा !
जो सदस्य बनाकर   जनता को सपने बेचें वो नेता !
     
      जो लाल वर्दी पहनकर रौब जमावें वे बाबा !
      जो सफेद वर्दी पहनकर रौब जमावें वे नेता!

जो ईश्वर भक्ति की बात करके समाज को प्रभावित करें वे बाबा !
   जो देश   भक्ति  की  बात  करके समाज को प्रभावित करें वे नेता !


    सबसे पहली बड़ी समानता यह कि दोनों के हाथ पैर दुरुस्त शरीर स्वस्थ होने पर भी दोनों बिना मेहनत के दूसरे के धन के बल पर ही अपनी शौक शान पूरी करने वाले होते हैं।  जैसे रैलियों के शौक़ीन दोनों होते  हैं।
      आधुनिक नेता हों या महात्मा दोनों को मीडिया बनाता है और मीडिया ही नष्ट कर देता है। 
        अक्सर जब बाबा फँसते हैं तो नेता उसकी वकालत करने लगते हैं इसीप्रकार से नेता फँसते हैं तो बाबा  लोग उसकी वकालत करने लगते हैं क्योंकि दोनों की पोल दोनों के पास दबी होती है इसीप्रकार दोनों अपने अपने अनुयायी एक दूसरे के पीछे लगाए रहते हैं।दोनों के खाने से शौच जाने तक का खर्च आम जनता बहन करती है नेता इतिहास की कहानियाँ सुनाकर जनता का यह लोक ठीक करने की बात करते  हैं इसीप्रकार से बाबा लोग पुराणों की कथाएँ सुनाकर जनता का पर लोक ठीक करने का सपना दिखाते हैं। नेता जब खूब धन कमा लेता है फिर एकांत में शांति में कुटिया बना लेता है ताकि इसका भी आनंद लेता रहे इसीप्रकार बाबा  अपना कमाई छिपाने के लिए राजनैतिक दखल बनाने लगते हैं।बाबा जब अपने किसी पाप से भयभीत होते हैं तो राजनैतिक ताकत तैयार करते हैं । इसीप्रकार नेता अपने किसी पाप से भयभीत होते हैं अपनी धार्मिक ताकत तैयार करते हैं अर्थात संन्यास लेने की बात करते हैं ।   
  बाबा हों या नेता  दोनों ही अपनी अच्छी बुरी कैसी भी बात को समाज पर जबरदस्ती थोपने के लिए भीड़ का सहारा लेते  हैं ।भीड़ को बुलाया तो कुछ और समझा करके जाता है, भाषण किसी और बात के दिए जा रहे होते हैं, उद्देश्य  कुछ और होता है,परिणाम कुछ और होता है।      
     इसीप्रकार रैली में सम्मिलित होने वाले लोग भी समझने कुछ और आते हैं किंतु समझकर कुछ और चले जाते हैं।जहॉं तक भीड़ की बात है। भीड़ तो पैसे देकर भी इकट्ठी की जा रही है वो समाज का प्रतिनिधित्व तो नहीं कर सकती।
    जो पैसे देकर भीड़ बुलाएगा वो भीड़ से ही पैसे कमाएगा भी। तो राजनीति या धर्म में भ्रष्टाचार  होगा ही। किसी भी प्रकार का आरक्षण या छूट के लालची लोग अथवा कर्जा माफ करवाने के शौकीन लोग भ्रष्ट नेताओं को जन्म देते  हैं।इसी प्रकार बहुत सारा पापकरके  पापों से मुक्ति चाहने वाले चतुर लोग ही भ्रष्ट बाबाओं को जन्म देते हैं।ऐसी परिस्थिति में धर्म और राजनैतिक भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार आखिर कौन ?

      उसे पकड़े और सुधारे  बिना भ्रष्टाचार के विरुद्ध खोखले नारे लगाने, नेताओं की तथाकथित पोल खोलने से कुछ नहीं होगा।जब तक भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट बाबाओं के विरुद्ध संयुक्त जनजागरण अभियान नहीं चलाया जाएगा।तब तक इसे मिटा पाना संभव नहीं है,क्योंकि भ्रष्टाचार सोचा मन से और किया तन से जाता है।सोच पर लगाम लगाने के लिए धर्म एवं उसकी क्रिया पर लगाम लगाने के लिए कानून होता है।धर्म तो धार्मिक लोगों के आधीन एवं कानून नेताओं के आधीन हो गया है। ऐसे में किसी एक पर लगाम लगाने पर भी अपराध पर अधूरा नियंत्रण हो पाएगा जो उचित नहीं है।
  कलियुगी नेताओं  और तथाकथित बाबाओं में बहुत सारी समानताएँ  होती हैं इन बाबाओं के पास ईश्वर भक्ति नहीं होती है। इन नेताओं में देश  भक्ति नहीं होती है।दोंनों अपने  अनुयायिओं की भीड़ के बल पर फूलते हैं। भीड़ देखकर दोनों  ही पागल हो जाते हैं चाहें वह किराए की ही हो।अनाप सनाप कुछ भी बोलने बकने लगते हैं।दोनों को लगता है कि सारा देश  उनके पीछे ही खड़ा है।दोनों की गिद्धदृष्टि  पराई संपत्ति सहित पराई सारी चीजों को भोगने की होती है।दोनों वेष  भूषा  का पूरा ध्यान रखते हैं एक राष्ट्र भक्त नेताओं की तरह दिखने की दूसरे  ईश्वरभक्त विरक्त महात्माओं की तरह दिखने की पूरी कोशिश करते हैं । दोनों रैलियॉं करने के आदी होते हैं।दोनों मीडिया प्रेमी होते हैं इसलिए पैसे देकर भी दोनों टी.वी.टूबी पर खूब बोलते हैं।बातों में दम हो न हो पैसे का दम जरूर दिखता है पैसे के ही बल पर बोलते हैं। नेता जब भ्रष्ट  होता है तो कहता कि यदि ये आरोप सही साबित हुए तो संन्यास ले लूँ गा।जैसे उसे पता हो कि भ्रष्ट लोग ही संन्यासी होते हैं।मजे की बात यह है कि संन्यासी चुप करके सुना करते हैं कोई विरोध दिखाई सुनाई नहीं पड़ता।मानो पोलखुलने के भय से संन्यासी भयभीत हों कि कहीं कोई पोल न खुल जाए।इसी प्रकार कोई संन्यास भ्रष्टहोता है तो नेता बन जाता है।क्योंकि   बिना पैसे ,बिना परिश्रम और बिना जिम्मेदारी के उत्तमोत्तम सुख सुविधाओं का भोग इन्हीं दो जगहों पर संभव है।   

    इसप्रकार धार्मिक लोगों की गतिविधियों को भी शास्त्रीय संविधान की सीमाओं के दायरे में बॉंधकर रखने की भी कोई तो सीमा रेखा होनी ही चाहिए। बाबा  जी रैलियॉं कर रहे हैं, आज बाबा जी साड़ी बॉंट रहे हैं।बाबा जी स्वदेशी  के नाम पर सब कुछ भी बेच रहे हैं , बाबा जी उद्योग धंधे लगा रहे हैं, बाबा जी चुनाव लड़ रहे हैं, बाबा जी मंत्री भी हैं।ऐसे लोगों के पर्दे के पीछे के भी बहुत सारे अच्छे बुरे आचरण देखने सुनने को मिलते हैं।ये सब गंभीर चिंता के बिषय हैं ।

       इनकी दृष्टि में  क्या सारे पापों का कारण पत्नी ही होती है?केवल विवाहिता पत्नी का परित्याग करके या अविवाहित रह कर हर कुछ कर सकने का परमिट मिल जाता है इन्हें ?वो कितना भी बड़ा पाप ही क्यों न हो? मन पर नियंत्रण न करने पर कैसे विरक्तता संभव  है? साधुत्व के अपने अत्यंत कठोर नियम होते हैं जिन्हें आज भी तीर्थक्षेत्रों में या अन्य जगहों पर संयमशील पूज्य साधूसंत जन निर्वाह कर रहे हैं संन्यास व्रत के अत्यंत कठोर नियमों को हर परिस्थिति में नहीं निभाया जा सकता है जबकि राजनीति हर परिस्थिति में निभानी पड़ती है। अपने सदाचारी तपस्वी संयमी जीवन से सारी समाज को ठीक रखने की जिम्मेदारी संतों की ही है।ऐसे में शास्त्रों एवं संतों की गरिमा रक्षा के लिए शास्त्रीय विरक्त संतों को ही आगे आकर यह शुद्धीकरण करना होगा। साथ ही तथाकथित बाबाओं  पर लगाम कैसे लगे?यह पूज्य शास्त्रीय संतों को ही सोचना होगा।जो धार्मिक व्यवसायी लोग कहते हैं कि हमारा गुरुमंत्र जपो सारे पाप नष्ट हो जाएँगे इसका मतलब क्या यह नहीं निकाला जा सकता है कि ये पाप करने का परमिट बाँट रहे हैं ?कितना अभद्र है यह बयान ?         
     जैसे किसी बाबा जी के किसी प्रवचन में एक पति पत्नी सतसंग करने गए थे पैसे पास नहीं थे काम धाम चलता नहीं था।सोचा चलो सतसंग से ही शांति मिलेगी। वहॉं जाकर देखा कि मिठाई की दूकान की तरह सजे धजे मजनूँ टाइप के बाबा को मुख मटका मटका कर नाचते गाते बजाते या तथा कथित प्रवंचन करते देखा, बहुत सारा सोना पहने बाबाजी और बहुत सारा ताम झाम देखकर उसने सोचा बाबाजी का भी कोई उद्योग धंधा तो है नहीं ,बाबा जी ने  समझदारी से काम लिया है।इस देश  की जनता धर्म केवल सुनना चाहती है सुनाओ दिखाओ अच्छा अच्छा करो चाहे कुछ भी! जो इस देश की जनता को पहचान सका उसने पेट हिलाकर पैसे बना लिए कौन पूछता है कि बाबाजी योग के विषय में आप खुद क्या जानते हैं?बाबाजी को धर्म की बात बताना आता है करते चाहें जो कुछ भी हों इस पर जनता का ध्यान नहीं जाता है। जब बाबाजी का भी कोई उद्योग धंधा तो है नहीं तो बाबा जी ने भी कुछ किया नहीं तो धन आया कहॉं से?आखिर जनता को भी पता है।वैसे भी जो लोग हमारा पेमेंट नहीं देते वो बाबा जी को फ्री में क्यों दे देगें?अब मैं भी वही करूँगा और उसने भी बाबा बनने की ठानी इसप्रकार वह भी अच्छा खासा धनवान बाबा बन गया।क्योंकि अब उसका लक्ष्य धन कमाना ही हो गया था।इसी प्रकार तथाकथित सतसंगों के कई और भी कुसंग होते हैं। इसी जगह यदि किसी चरित्रवान संत का संग होता है तो कई जन्म के कुसंगों का दोष  नष्ट भी हो जाता है किन्तु ऐसे कुसंगों के कारण ही बसों में बलात्कार हो रहे हैं।यदि इन्हें सत्संग माना जाए तो बढ़ रही सतसंगों की भीड़ें आखिर 
सतसंगों से सीख क्या रही हैं ?अपराधों का ग्राफ दिनों दिन बढ़ता जा रहा है इसका कारण आखिर क्या है ?
     इसी प्रकार नेताओं की एक बार की चुनावी विजय के बाद हजारों रूपए के नेता करोड़ों अरबों में खेलने लगते हैं।इन्हें देखकर भी लोग सतसंगी लोगों की तरह ही बहुत बड़ी संख्या में प्रेरित होते हैं।ईश्वर भक्त संतों एवं देश भक्त नेताओं के दर्शन दिनों दिन दुर्लभ होते जा रहे हैं।बाकी राजनेताओं की बिना किसी बड़े व्यवसाय के दिनदूनी रात चैगुनी बढ़ती संपत्ति सहित सब सुख सुविधाएँ  बढ़ते अपराधों की ओर मुड़ते युवकों के लिए संजीवनी साबित हो रही हैं ।

राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान की सेवाएँ 

यदि आप ऐसे किसी बनावटी आत्मज्ञानी, बनावटी ब्रह्मज्ञानी, ढोंगी,बनावटी तान्त्रिक,बनावटी ज्योतिषी, योगी उपदेशक या तथाकथित साधक आदि के बुने जाल में फँसाए जा  चुके हैं तो आप हमारे यहाँ कर सकते हैं संपर्क और ले सकते हैं उचित परामर्श ।

       कई बार तो ऐसा होता है कि एक से छूटने के चक्कर में दूसरे के पास जाते हैं वहाँ और अधिक फँसा लिए जाते हैं। आप अपनी बात किसी से कहना नहीं चाहते। इन्हें छोड़ने में आपको डर लगता है या उन्होंने तमाम दिव्य शक्तियों का भय देकर आपको डरा रखा है।जिससे आपको  बहम हो रहा है। ऐसे में आप हमारे संस्थान में फोन करके उचित परामर्श ले सकते हैं। जिसके लिए आपको सामान्य शुल्क संस्थान संचालन के लिए देनी पड़ती है। जो आजीवन सदस्यता, वार्षिक सदस्यता या तात्कालिक शुल्क  के रूप में  देनी होगी, जो शास्त्र  से संबंधित किसी भी प्रकार के प्रश्नोत्तर करने का अधिकार प्रदान करेगी। आप चाहें तो आपके प्रश्न गुप्त रखे जा सकते हैं। हमारे संस्थान का प्रमुख लक्ष्य है आपको अपनेपन के अनुभव के साथ आपका दुख घटाना,बाँटना  और सही जानकारी देना।


 

Saturday, September 7, 2013

नव रात्र क्यों मनाए जाते हैं ?

             नवरात्रों के विषय में यह भी जानिए

    दुर्गा पूजा के विषय में अथर्वेद में वर्णन मिलता है कि  माता दुर्गा का पूजन करना  इसलिए और अधिक महत्त्व पूर्ण है क्योंकि पृथ्वी से लेकर समस्त देवी देवताओं का अधिष्ठान भगवती दुर्गा में है अतएव  भगवती दुर्गा का पूजन कर लेने से सभी देवी देवताओं के पूजन का फल मिलता है।दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में भी वर्णन है कि सभी देवताओं के तेज से ही भगवती दुर्गा प्रकट हुई हैं।उनके ही नव स्वरूप माने गए हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी,चन्द्रघंटा, कूष्मांडा, स्कन्धमाता, कात्यायनी,कालरात्रि,महागौरी,सिद्धिदात्री आदि नामों से भगवती नव दुर्गा प्रसिद्ध हैं, नवरात्रों में प्रत्येक दिन के क्रम से इन्हीं नव स्वरूपों की पूजा होती है यद्यपि परम्पराएँ दोनों तरह की प्रचलित हैं कुछ लोग नव स्वरूपों की पूजा नवरात्र  के नव दिनों में क्रमशः  शैल पुत्री आदि देवियों के क्रम से करते हैं तो कुछ लोग प्रतिदिन सभी स्वरूपों की पूजा करते हैं। 

     पहले के समय में वर्ष का प्रारंभ शरद ऋतु से माना जाता था इसलिए भगवती दुर्गा की पूजा वर्ष के प्रारंभ अर्थात आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से अष्टमी पर्यंत नवरात्रियों में की जाती थी चूँकि ये नवरात्र शरद ऋतु में होता है इसलिए इसे शारदीय नवरात्र कहा जाने लगा, इसके बाद जब वर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाने लगा तो भगवती दुर्गा की पूजा इसी प्रतिपदा से अष्टमी पर्यंत नवरात्रियों में की जाने लगी  यह  नवरात्र बसंत ऋतु में होने के कारण इसे बासंती नवरात्र कहा जाने लगा।

         यहाँ एक विशेष बात और ध्यान देने लायक है कि शास्त्रों में रात्रि काल की देवी पूजा का विशेष फल माना गया है "रात्रौ देवीं च पूजयेत् " क्योंकि देवी रात्रि स्वरूपा हैं शिव को दिन स्वरूप माना गया है इसीलिए इस नवरात्र ब्रत में रात्रि व्रत का विधान है -

                       रात्रि रूपा यतो देवी दिवा रूपो महेश्वरः|

                      रात्रि व्रतमिदं देवी सर्व पाप प्रणाशनम् || 

    यही कारण है कि प्रतिपदा से अष्टमी तक दिन तो आठ ही होते हैं फिर प्रत्येक दिन के क्रम से नव देवियों की पूजा कर पाना संभव न हो पाता!इसका यह मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि देवी की पूजा दिन में नहीं की जा सकती! भक्ति और श्रद्धा पूर्वक माता की पूजा दिन और रात्रि में कभी भी की जा सकती है।वस्तुतः शिव और शक्ति में कोई भेद नहीं है इतना अवश्य याद रखे कि नव देवियों की पूजा अवश्य की जानी चाहिए अन्यथा दिन के क्रम से पूजा करने पर प्रतिपदा से अष्टमी तक तो आठ दिन ही हो पाते हैं इस प्रकार से आठ देवियों की पूजा तो हो जाती है नवमी सिद्धिदात्री देवी की पूजा छूट जाती है जो उचित नहीं है इसलिए नवमी के दिन प्रातः काल माता सिद्धिदात्री की पूजा करने के बाद हवन कन्या पूजन आदि का शुभारंभ करना चाहिए ।

                 

दुर्गासप्तशती भी रामचरितमानस एवं सुंदरकांड की तरह ही हिंदी दोहा चौपाई में !

   अब  दुर्गासप्तशती   भी  रामचरितमानस एवं सुंदरकांड   की तरह ही  हिंदी दोहा चौपाई  में पढ़िए -

          राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोधसंस्थान 

                                   


https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhMmbcy2dSP4ZFzHOyKGc_o9PDlIFyn2JajjmS7rXB_UVGy19Aem1SL8v1oB9epcnj4kxO_WwSmwJHD4Xhvgjf4lj38tykbjWF8FP8wtJtxoSLkSkK1_i2DgkyY16-6mNAUoo4TIDqit7M/s1600/durga.bmp


जो लोग संस्कृत नहीं पढ़ पाते हैं वो संस्कृत भाषा  में लिखी गई दुर्गा सप्तशती नहीं पढ़ पाते हैं ऐसे सभी भक्त लोगों की  सुविधा के लिए उसी दुर्गा सप्तशती का  प्रमाणित अनुवाद अब हिंदी भाषा की दोहा चौपाइयों में किया गया है जो पूरी तरह से रामचरितमानस और सुंदरकांड   की तरह ही पढ़ा जा सकता है इसे अकेले या कुछ लोगों के समूह में बैठ कर  बिना संगीत या संगीत के द्वारा भी पढ़ा जा सकता है।    सामाजिक या पारिवारिक विपदाओं से बचने के लिए दुर्गा जी की आराधना ही एक मात्र सरल उपाय है।  चंडी यज्ञ के लिए आपको दुर्गा सप्तशती के सौ पाठ करने होते हैं,सहस्र चंडी यज्ञ में आपको दुर्गा सप्तशती के एक हजार पाठ करने होते हैं इसीप्रकार लक्षचंडी यज्ञ के लिए आपको दुर्गा सप्तशती के एक लाख पाठ करने होते हैं। दस पाँच या सैकड़ों स्त्री पुरुष इस पाठ में सम्मिलित किए जा सकते हैं वो जितने भी पाठ एक दिन में कर लें वो लिख ले इस प्रकार शत चंडी यज्ञ,सहस्र चंडी यज्ञ आदि कुछ भी आप स्वयं संपन्न कर सकते हैं।इसके लिए यदि किसी को कोई जानकारी लेनी तो बिना किसी हिचक के आप हमारे यहाँ फोन कर सकते हैं

      कुछ लोगों ने पहले भी  दुर्गा सप्तशती को अपनी अपनी भाषा शैली में श्रृद्धापूर्वक लिखने के प्रयास किए हैं।कुछ में तो भाषा की गलतियाँ देखी गई हैं, कुछ में सरल करने के लोभ से आवश्यक विषय छोड़ दिए गए हैं इससे ये पढ़ने में आसान ज़रूर हो गई हैं,किन्तु खंडित होने के कारण उन्हें पढ़ने का लाभ नहीं है?कुछ पुस्तकों में अन्य कमियाँ तो हैं ही साथ ही लेखक ने हर पेज में अपनी फोटो एवं हर लाइन में अपना नाम डाल रखा है।यह विधा इसलिए ठीक नहीं है क्योंकि कोई लेखक की नहीं अपितु दुर्गा माता की पूजा करना चाहता है ! इससे पाठ खंडित होता है। इस प्रकार से उनमें जो कमियाँ छूट गई हैं।उन्हें शास्त्र प्रमाणित विधि से पूरा करने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया  है।गीता प्रेस की प्रमाणित पुस्तक को देखकर स्वयं भी कर सकते हैं।   

  



  


  

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                                            नव रात्रों के विषय में यह भी जानिए
    दुर्गा पूजा के विषय में अथर्वेद में वर्णन मिलता है कि  माता दुर्गा का पूजन करना  इसलिए और अधिक महत्त्व पूर्ण है क्योंकि पृथ्वी से लेकर समस्त देवी देवताओं का अधिष्ठान भगवती दुर्गा में है अतएव  भगवती दुर्गा का पूजन कर लेने से सभी देवी देवताओं के पूजन का फल मिलता है।दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में भी वर्णन है कि सभी देवताओं के तेज से ही भगवती दुर्गा प्रकट हुई हैं।उनके ही नव स्वरूप माने गए हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी,चन्द्रघंटा, कूष्मांडा, स्कन्धमाता, कात्यायनी,कालरात्रि,महागौरी,सिद्धिदात्री आदि नामों से भगवती नव दुर्गा प्रसिद्ध हैं, नवरात्रों में प्रत्येक दिन के क्रम से इन्हीं नव स्वरूपों की पूजा होती है यद्यपि परम्पराएँ दोनों तरह की प्रचलित हैं कुछ लोग नव स्वरूपों की पूजा नवरात्र  के नव दिनों में क्रमशः  शैल पुत्री आदि देवियों के क्रम से करते हैं तो कुछ लोग प्रतिदिन सभी स्वरूपों की पूजा करते हैं। 
     पहले के समय में वर्ष का प्रारंभ शरद ऋतु से माना जाता था इसलिए भगवती दुर्गा की पूजा वर्ष के प्रारंभ अर्थात आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से अष्टमी पर्यंत नवरात्रियों में की जाती थी चूँकि ये नवरात्र शरद ऋतु में होता है इसलिए इसे शारदीय नवरात्र कहा जाने लगा, इसके बाद जब वर्ष का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाने लगा तो भगवती दुर्गा की पूजा इसी प्रतिपदा से अष्टमी पर्यंत नवरात्रियों में की जाने लगी  यह  नवरात्र बसंत ऋतु में होने के कारण इसे बासंती नवरात्र कहा जाने लगा।
         यहाँ एक विशेष बात और ध्यान देने लायक है कि शास्त्रों में रात्रि काल की देवी पूजा का विशेष फल माना गया है "रात्रौ देवीं च पूजयेत् " क्योंकि देवी रात्रि स्वरूपा हैं शिव को दिन स्वरूप माना गया है इसीलिए इस नवरात्र ब्रत में रात्रि व्रत का विधान है -
                          रात्रि रूपा यतो देवी दिवा रूपो महेश्वरः|
                          रात्रि व्रतमिदं देवी सर्व पाप प्रणाशनम् || 
    यही कारण है कि प्रतिपदा से अष्टमी तक दिन तो आठ ही होते हैं फिर प्रत्येक दिन के क्रम से नव देवियों की पूजा कर पाना संभव न हो पाता!इसका यह मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि देवी की पूजा दिन में नहीं की जा सकती! भक्ति और श्रद्धा पूर्वक माता की पूजा दिन और रात्रि में कभी भी की जा सकती है।वस्तुतः शिव और शक्ति में कोई भेद नहीं है इतना अवश्य याद रखे कि नव देवियों की पूजा अवश्य की जानी चाहिए अन्यथा दिन के क्रम से पूजा करने पर प्रतिपदा से अष्टमी तक तो आठ दिन ही हो पाते हैं इस प्रकार से आठ देवियों की पूजा तो हो जाती है नवमी सिद्धिदात्री देवी की पूजा छूट जाती है जो उचित नहीं है इसलिए नवमी के दिन प्रातः काल माता सिद्धिदात्री की पूजा करने के बाद हवन कन्या पूजन आदि का शुभारंभ करना चाहिए ।

Friday, September 6, 2013

नवरात्रों में व्रत करना क्यों आवश्यक है ?

      नवरात्र व्रत एवं उसके रीति रिवाजों का महत्त्व 

      आदि शक्ति माता दुर्गा की पूजा वैसे तो हमेंशा की जाती है जिसे जब जैसा समय हो वैसे लोग अपनी अपनी परंपराओं के अनुशार करते रहते हैं। नवरात्र पर्व पर इस पूजा का विशेष महत्त्व होता है। मुख्य रूप से चैत्र और आश्विन मास में नवरात्र  मनाए जाते हैं।दो गुप्त नवरात्र भी माने जाते हैं जो आषाढ़ और पौष मास में होते हैं ।चूँकि भारत कृषि प्रधान देश रहा  है इसलिए चैत्र में गेहूँ की फसल और आश्विन में धान की फसल होने के कारण ये दो नवरात्र धूमधाम से मना लिए जाते थे इसीलिए चैत्र और आश्विन के नवरात्र ही विशेष प्रचलन में रह गए तथा आषाढ़ और पौष मास के नवरात्र गुप्त होते चले गए! अतः इन्हें गुप्त नवरात्र भी कहा जाता है।

     पहले अपने यहाँ चैत्र में होने वाली गेहूँ की फसल की अपेक्षा आश्विन में धान की फसल अधिक अच्छी होती थी इसलिए चैत्र की अपेक्षा आश्विन के नवरात्र विशेष धूम धाम से मनाए जाने की परंपरा सी पड़ती चली गई। यहाँ तक कि देश के कई क्षेत्र ऐसे भी हैं जहाँ चैत्र के नवरात्रों का प्रचलन अत्यंत कम है केवल आश्विन के नवरात्र ही मुख्य रूप से मनाए जाते हैं।

       यद्यपि सभी नवरात्र पर्व अपनी परिस्थिति के अनुशार धूम धाम से मनाए जाने चाहिए इससे भगवती की कृपा का विशेष फल तो होता  ही है साथ ही स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इनका विशेष महत्त्व है। 

        आयुर्वेद में कहा गया है कि ऋतु संधियों में अर्थात मौसम बदलते समय स्वास्थ्य बिगड़ने की विशेष संभावना रहती है इसलिए इन समयों में वमन विरेचन आदि पंच कर्म करने का विधान है इससे शरीर शुद्ध हो जाता है और रोग होने की संभावना भी नहीं रह जाती है                    "असाध्य भेषजैः व्याधिः पथ्यादेव निवर्तते "

       अर्थात व्रती भाव से फल फूल खाकर नियम संयम पूर्वक रहने से दवा के द्वारा न ठीक हो सकने वाले रोग भी पथ्य भोजन अर्थात व्रत करने मात्र से ठीक हो जाते हैं।  इसी समय यदि दुर्गा जी की आराधना भी की जाए तब तो तन मन धन आदि सभी दृष्टियों से अत्यंत उत्तम हो जाने में क्या संदेह है !

      देवी भागवत में इसी बात को बताते हुए व्यास जी ने जन्मेजय जी  से कहा है कि शरद और बसन्त ये दोनों ऋतुएँ "यमदंष्ट्र" अर्थात यम राज के दाँत की तरह भयंकर मानी गई हैं।इन ऋतुओं में संसार के प्राणियों में बड़े बड़े रोग जन्म लेते हैं,अतः चैत्र और आश्विन के पवित्र महीनों में यत्न पूर्वक दुर्गार्चन किया जाए तो भगवती सभी प्राणियों की रक्षा करती रहती हैं।(व्यवहार में भी डेंगू आदि तरह तरह के होने वाले ज्वरों एवं अतिसार आदि रोगों का प्रकोप भी नवरात्र तक ही विशेष देखा जाता है।)

    इसीलिए देश के विभिन्न भागों  की दुर्गा पूजा परम्पराओं, पद्धतियों एवं उत्सव मनाने के रीति रिवाजों में भले ही कुछ अंतर हो किंतु नियम संयम से व्रती रहकर सात्विक भावना से श्रद्धा पूर्वक भगवती की आराधना करने का विधान सभी जगह एक समान ही देखने को मिलता है।इसलिए हर किसी को तन मन धन की कुशलता के लिए माता दुर्गा की पूजा अवश्य करनी चाहिए।

Thursday, September 5, 2013

असली शास्त्रीय संन्यासियों के लक्षण ?

         शास्त्रीय साधू  संन्यासियों के लिए धन संग्रह एवं सामाजिक प्रपंच अशास्त्रीय है शास्त्रीय प्रमाण देने को मैं तैयार हूँ  

                                         संन्यासियों या किसी भी प्रकार के महात्माओं को काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य   आदि विकारों पर नियंत्रण तो रखना ही चाहिए यदि पूर्ण नियंत्रण न रख सके तब भी प्रयास तो पूरा होना ही चाहिए।वैराग्य की दृढ़ता दिखाने के लिए कहा गया कि स्त्री यदि लकड़ी की भी बनी हो तो भी वैराग्य व्रती उसका स्पर्श न करे.....!

              दारवीमपि  मा  स्पृशेत्||

              माता स्वस्रा दुहित्रा वा .... ! 

   माता, मौसी ,बहन,पुत्री आदि के साथ भी अकेले न बैठे। 

   शंकराचार्य जी कहा कि विरक्तों के लिए नरक का प्रधान द्वार नारी है-

              द्वारं किमेकं नरकस्य नारी 

इसी प्रकार 

      शूरान् महा शूर तमोस्ति को वा 

              प्राप्तो न मोहं ललना कटाक्षैः||     -शंकराचार्य

         का श्रंखला  प्राण भृतां हि नारी       -शंकराचार्य

मत्स्य पुराण में कहा गया है कि बशीभूत मन वालेसंन्यासियों को साल के आठ महीने तक विचरण करना चाहिए अर्थात पूरे देश में भ्रमण करना चाहिए।वर्षा के चार महीने एक स्थान पर रह कर चातुर्मास व्रत करे ।

    अत्रि ऋषि ने कहा है कि ये छै चीजें नृप दंड के समान मानकर संन्यासी अवश्य करे   -

1. भिक्षा माँगना

2.जप करना

3.स्नानकरना

4.ध्यानकरना

5.शौच अर्थात पवित्र रहना

6.देवपूजन करना  

      इसीप्रकार न करने वाली छै बातें बताई गई हैं -

1.शय्या अर्थात बिस्तर पर सोना 

2.सफेद वस्त्र पहनना 

3.स्त्रियोंसे संबधित चर्चा करना या सुनना एवंस्त्रियोंके पास रहना वा स्त्रियों को अपने पास रखना 

4.चंचलता का रहन सहन 

5.दिन में सोना 

6. यानं अर्थात बाहन    


    किसी भी प्रकार से ये छै चीजें अपनाने से संन्यासी पतित अर्थात भ्रष्ट हो जाते हैं।यथा -

   मञ्चकं शुक्ल वस्त्रं च स्त्रीकथा  लौल्य मेव च |

   दिवास्वापं  च  यानं  च  यतीनां पतनानि षट् || 

                                                          -अत्रि ऋषि 

इसीप्रकार ब्राह्मण गृहस्थ जीवन की सांसारिक उठापटक से मुक्त निर्विकार निर्लिप्त रहने वाले स्वाभाविकआचरण वाले ब्रह्म-जीवी थे। इन्हें विप्र कहा जाता है। जिनको भी मिलना होता इनके घर आते थे।संन्यास काअधिकार ब्राह्मणों को दिया गया है ।

आत्मन्यग्नीन्समारोप्य  ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् | 

                                                              जाबालश्रुतेः 

     वैष्णव सम्प्रदाय में नियम था कि जो महंत होगा वह तो अविवाहित होगा ही होगा अन्य लोग चाहें तो अविवाहित भी रह सकते थे और विवाह भी कर सकते थे | शैव सम्प्रदाय की सभी जातियों के लिए नियम थे कि वे गाँव, बस्ती में प्रवेश नहीं करते थे। आचार्य शंकर ने संन्यासी सम्प्रदाय को काल-स्थान-परिस्थिति के अनुरूप एक नई दशनामी व्यवस्था दी और इनको दस वर्गों में विभाजित किया|ये दस नाम इस प्रकार हैं:-

(1) तीर्थ (2) आश्रम (3) सरस्वती (4) भारती (5) वन (6) अरण्य (7) पर्वत (8) सागर (9) गिरि (10) पुरी

इनमें अलखनामी और दण्डी दो विशेष सम्मानित शाखाये थीं। दण्डी वे संन्यासी होते थे जो ब्राह्मण से संन्यासी बनते थे। इनके हाथ में दण्ड[डण्डा] होता था। ये आत्म-अनुशासित थे

         हिन्दू धर्म की मान्यताओं, परम्पराओं में आ रही गिरावट को देखते हुए आदि शंकराचार्य ने ज्ञानमार्गी परम्परा को पुनर्जीवित किया और अद्वैत दर्शन की मूल अवधारणा ‘बृह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ को स्थापित किया। इसके लिए उन्होने समूचे देश में अद्वैत और वेदांत का प्रसार किया। काशी के महान विद्वान मंडनमिश्र के साथ उनका शास्त्रार्थ, इस सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ी थी, जिसने उन्हें समूचे देश में धर्म दिग्विजयी के रूप में स्थापित कर दिया।

        शंकराचार्य ने  प्राचीन आश्रम और मठ परम्परा में नए प्राण फूँके। शंकराचार्य ने अपना ध्यान संन्यास आश्रम पर केंद्रित किया और समूचे देश में दशनामी संन्यास परम्परा और अखाड़ों की नींव डाली।                   

                            

       सभी पत्रकार बंधुओं को शास्त्रीय साधू संतों की मर्यादा पर सार्थक बहस के लिए बहुत बहुत बधाई !

          धार्मिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं और धार्मिक एवं शास्त्रीय भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलते ही समाज सात्विक होगा तब जाकर राजनैतिक शुद्धीकरण संभव है। इस पाखंड मुक्त धर्म युद्ध में धर्म रक्षा हेतु हमारे लायक शास्त्रीय सेवा के लिए मैं सदैव उपस्थित हूँ -

                                          डॉ.शेष नारायण वाजपेयी

          संस्थापक -राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान 

                                                             9811226973


 

शिक्षक दिवस पर शिक्षकों को बधाई ! किंतु शिक्षक हैं कहाँ ?

  लापरवाह शिक्षक आखिर सुधरेंगे कैसे या वो बच्चों के भविष्य   के साथ ऐसे ही खिलवाड़ करते रहेंगे !
              हरइ शिष्य धन शोक न हरई । 
                 सो गुरु घोर नरक महुँ परई ॥ 
   शिष्यों को शिक्षित करने के नाम पर मोटी  मोटी  सैलरी उठाने वाले शिक्षक यदि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं तो क्या ये उनका दोष नहीं है !उन पर शक्ति करके उन्हें कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित करना कुशल प्रशासक का कर्तव्य होता है अपने कर्तव्य के पालन से बंचित प्रशासक यदि इस गलत फहमी  का शिकार हो कि वो बहुत अच्छा बोल लेता है इसलिए उसे केवल भाषण देकर ही सबको खुश कर देना चाहिए तो आखिर बच्चों का भविष्य सुधारेगा कौन !आज शिक्षक दिवस पर शिक्षा के समर्थन में कोई कठोर संकल्प लेने का दिन है केवल कोरा भाषण देने का नहीं ! 
   बंधुओ !दिल्ली जैसी जगह पर एम.सी.डी.या सरकारी प्राथमिक स्कूलों में शिक्षक अपने शिष्यों के भविष्य के प्रति इतने अधिक लापरवाह हैं तो पूरे देश की  क्या स्थिति होगी ये सहज अनुमान लगाया जा सकता है !       प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक शिक्षिकाओं को  किस दिन स्कूल जाना है कितने घंटे के लिए जाना है कब स्कूल छोड़कर चल देना है स्कूल जाकर भी क्लास जाना है या नहीं जाना है क्लास जाकर भी पढ़ाना है या नहीं पढ़ाना है इन सभी बातों के लिए वो स्वछंद होते हैं ? इस प्रकार से ग़रीबों के बच्चों का भविष्य बिगड़ने के बदले जो भारी भरकम सैलरी मिलती है उससे अपने बच्चों का भविष्य सुधारना चाहते हैं वे !कितनी गद्दारी की जाती है बच्चों के भविष्य के साथ !और समाज में अपराध यूँ ही नहीं बढ़ रहे हैं इसमें लापरवाह शिक्षकों का महत्वपूर्ण योगदान है । यदि समाज संस्कारवान  होता है तो इसका श्रेय शिक्षकों को जाता है किन्तु यदि समाज अपराधी भ्रष्टाचारी आदि होता है तो इसका श्रेय भी शिक्षकों को जाता है और यदि शिक्षकों के अपने आचरण ही नैतिकता पूर्ण नहीं होंगे अपितु छल कपट धोखाधड़ी के होंगे तो अपने शिष्यों का वे भविष्य सुधारेंगे इसकी आशा ही क्यों की जाए !आखिर क्या कारण  है कि सरकारते  हैं यहाँ तक कि पचास पचास हजार की सैलरी लेने वाले शिक्षक भी अपने बच्चे पाँच पाँच दस दस हजार सैलरी लेने वाले प्राइवेट शिक्षकों के यहाँ पढ़ाते हैं 
    मैंने चार विषय से एम.ए.एवं बी.एच.यू. से पी.एच.डी.की है विभिन्न विषयों की करीब सौ पुस्तकों का लेखक हूँ।मेरी लिखी हुई कई पुस्तकें पाठ्यक्रम में पढ़ाई भी जा रही हैं।मेरी बच्चियॉं एम.सी.डी.के स्कूल में ही पढ़ती हैं।एक अभिभावक होने के नाते मेरी यह पीड़ा भी है और प्रश्न भी!कि प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों की अपेक्षा एम.सी.डी.के प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक अधिक शिक्षित एवं  ट्रेंड होते हैं फिर भी क्या कारण हैं कि प्रायःशिक्षित लोग,संपन्न लोग,संभ्रात लोग, शिक्षा मंत्री से लेकर सांसद,विधायक आदि लोग प्राइवेट विद्यालयों में ही अपने बच्चे पढ़ातेहैं सरकारी या निगम स्कूलों में नहीं !
     एम.सी.डी.के अधिकारी कर्मचारी यहॉं तक कि एम.सी.डी.के प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक शिक्षिकाऍ यदि काम चोर न होकर ईमानदार हैं तो  अपने बच्चे एम.सी.डी.के स्कूलों में क्यों नहीं पढ़ाते प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं क्यों?
    अधिकारियों की लापरवाही एवं शिक्षकों के द्वारा बच्चों के भविष्य के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार के अलावा एम.सी.डी.के स्कूलों में और क्या क्या  ठीक नहीं हैं?क्या इसी अकर्मण्यता की सैलरी मिलती है उन्हें ?आखिर ये लापरवाही क्यों 

2.एम.सी.डी.स्कूलों में शिक्षा के नाम पर इतना विज्ञापन होता है शिक्षा की न केवल बड़ी बड़ी बातें होती हैं अपितु इन स्कूलों में  फ्री शिक्षा, फ्री भोजन, फ्री किताबें और भी बहुत सारी सरकारी सुविधाएं  फ्री में मिलती हैं किंतु अत्यंत दुःख की बात है कि शिक्षा नहीं मिलती है!

    शिक्षा व्यवस्था को अच्छे ढंग से चलाने के लिए बड़े बड़े अधिकारियों की भारी भरकम फौज होती है आखिर किस लिए क्या करते हैं वे अधिकारी? कभी बच्चों एवं बच्चों के अभिभावकों की आँखों से भी देखें अपने  शिक्षकों की शैक्षणिक लापरवाही को!

    प्रतिदिन स्कूल नहीं जाना,जाना तो समय से नहीं पहुँचना,देर सबेर पहुँचना,पहुँचकर भी कक्षा में नहीं पहुँचना,आफिस में बैठे बातें करते रहना,कक्षा में जाना भी तो समय से नहीं जाना देर सबेर जाना,वहाँ  फ़ोन पर लगे रहना फिर आफिस पहुँच जाना,समय से पहले घर चले जाना यदि नहीं जाना तो जल्दी छुट्टी कर देना।कभी कई कई दिनों की छुट्टी कर लेना!बच्चे घूमा करते हैं!पढ़ाई के नाम पर कभी किसी कापी की नक़ल कभी किसी किताब की नक़ल करने को बता देना जो जितनी रँग लेता है अपनी कापियाँ वही उनकी पढ़ाई मान ली जाती है।इंग्लिश और मैथ जैसे विषयों का तो कहना ही क्या है?कम्पटीशन के इस युग में जहाँ अच्छी से अच्छी पढ़ाई करने पर भी तो गुजारा नहीं है वहाँ बच्चों के भविष्य के साथ यह खिलवाड़ कितना सही है?जनता की कमाई इन शिक्षा शेरों पर निरर्थक लुटाई जा रही होती है इस काम चोरी के मिलते हैं उन्हें चालीस से पचास हजार रूपए महीने ! 

     प्राइवेट स्कूलों की अपेक्षा इनके शिक्षक काफी महँगे होते हैं ।इस सारी व्यवस्था को करने में एवं इन अधिकारियों,कर्मचारियों तथा शिक्षकों को दी जाने वाली सैलरी आदि में कितनी बड़ी धनराशि खर्च होती होगी!फिर भी यहॉं की शिक्षा और शिक्षा व्यवस्था पर यदि एम.सी.डी.के  अधिकारी,कर्मचारी एवं शिक्षकों का ही विश्वास नहीं है ,यदि एम.सी.डी.के शिक्षक अपने शिक्षाकर्म से अपने अधिकारियों,कर्मचारियों एवं अपने आप को ही संतुष्ठ  नहीं कर सके तो यहॉं की शिक्षा व्यवस्था पर आम आदमी कितना और क्यों भरोसा करे?ऐसी शैक्षणिक व्यवस्था को आम समाज के साथ धोखा एवं वहॉं पढ़ने वाले बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ तथा इन स्कूलों पर खर्च होने वाली विशाल धनराशि को धन का दुरुपयोग क्यों न माना जाए?

    बच्चों के एडमीशन के लिए मैं स्वयं सरकारी वा एम.सी.डी.के कई स्कूलों में गया,लगभग हर स्कूल के शिक्षकों ने हमें यह समझाने की कोशिश की कि यदि आप अपनी बच्चियों को वास्तव में पढ़ाना चाहते हैं तो इन्हें प्राइवेट में पढ़ा लें ,हमारे यहाँ इनकी जिंदगी मत बरबाद करें?यदि आपको केवल एडमीशन चाहिए वो हो जाएगा!फ्री भोजन, फ्री किताबें और जो भी सरकारी सुविधाएँ मिलती हैं वो आपकी बच्चियों को भी मिलेंगी!पढ़ें न पढ़ें पास कर दी जाएँगी लेकिन पढ़ाई न हो उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूँ  हमसे मत कहना!एक स्कूल में तो एक शिक्षिका ने हमें डाँटते हुए यहाँ तक कहा कि आपको लड़के लड़की में इतना भेद भाव नहीं करना चाहिए!यदि ये लड़कियाँ न होतीं इनकी जगह लड़के होते तो उन्हें भी क्या आप पढ़ाते एम.सी.डी.या सरकारी स्कूलों में!सच कहूँ तो यह सुनकर हमें प्राणों से प्यारी बच्चियाँ  हमारे मुख की ओर देखने लगीं मैं उनसे आँखें मिलाने का साहस नहीं कर पा रहा था मुझे लग रहा था कि जमीन फट जाए मैं समा जाऊँ!जहाँ के शिक्षक ही अपने स्कूलों के विषय में ऐसी बातें करते हों वहाँ कैसी शिक्षा और कैसा शिक्षा अधिकार कानून?सरकार की जब नियत ही ठीक नहीं है तो कानून बनाने से क्या होगा?जैसे कानून बना किंतु शिक्षा नहीं हो रही है इससे तो यही लगता है कि कानून बने क्या इससे बंद होंगे बलात्कार,क्या करेगा भोजन का कानून सब सरकारी मशीनरी ही खा पी जाएगी!

  अस्तु,ऐसे स्कूलों में कोई थोड़ा भी सक्षम अभिभावक कैसे पढ़ा पाएगा अपने बच्चे?उसे भी इसी समाज में रहना जीना है!बच्चों के काम काज भी करने हैं?यदि एम.सी.डी.और सरकारी स्कूलों की यही प्रतिष्ठा रही तो कौन थाम्हेगा यहाँ पढ़ने वाली बच्चियों का हाथ और कैसा होगा यहाँ पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य ?

    इतने भारी भरकम खर्चे के बाद भी लगभग सभी एम.सी.डी.के स्कूलों में पढ़ाई न होने जैसी बातों का कारण समझने के लिए मैं एक स्कूल में बिना बच्चों को लिए एक दिन अकेला ही गया तो आफिस में कई शिक्षिकाएँ  बैठी हुई थीं चपरासी महोदय बाहर बैठे थे मैंने उनसे पूछा यहाँ कैसी पढ़ाई होती है?उसने कहा कि ये सब मैडमें आफिस में ही बैठकर बातें किया करती हैं थोड़ी बहुत देर के लिए कक्षाओं में चली भी गईं तो राइटिंग वगैरह लिखने को बता आईं बाकी बच्चे शोर  मचाते रहते हैं कभी कभी हमें बोल देती हैं तो मैं जाकर बच्चों को डाँट देता हूँ वे थोड़ी बहुत देर के लिए शांत हो जाते हैं बस फिर वही!तुम्हीं जाकर देखो नौ बज रहे हैं अभी तक तो सब आफिस में ही हैं कभी कोई चक्कर मार आई हो तो पता नहीं!अब अभी आधे घंटे बाद लंच हो जाएगा, जो लगभग साढे़ दस तक चलेगा।इसके बाद बारी बारी से किसी न किसी शिक्षक को रोज जरूरी काम लगा करता है किसी को दवा लेनी होती है आदि आदि।स्कूल टाइम में ही शिक्षिकाएं  निपटा रही होती हैं अपने अपने काम!जो छुट्टी पर रहती हैं उन्हें बीमार बताने के लिए हमसे कहा गया है जो मार्केट जाती हैं उन्हें मीटिंग में गई हैं ऐसा बताने को बोला गया है!कुछ शिक्षक छुट्टी करने को स्कूल में बैठे रहते हैं किंतु अभिभावकों को पहले ही समझाया जा चुका है कि साढ़े बारह बजे छुट्टी होनी है उसके एक भी मिनट बाद आपके बच्चे की हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है!इस बात से भयभीत अभिभावक बारह बजे से ही स्कूल से अपने बच्चे ले जाने लगते हैं!इसप्रकार से धीरे धीरे बिना छुट्टी किए ही हो जाती है छुट्टी!खैर मैं अंदर आफिस में गया तो देखा दरवार सजा था वहॉं भी शिक्षा को लेकर वही पुरानी बातें सुनकर मैंने पूछा कि आखिर यहॉं क्यों नहीं होती है पढ़ाई? उन्होंने समझाया कि आफिसियल वर्क हम लोगों पर इतना अधिक होता है कि हमलोगों को उसी से समय नहीं मिलता है तो बच्चों को कैसे पढ़ाएं ! हमने कहा कि आपके स्कूलों के गेट पर तो लिखा है कि यहॉं अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई होती है।यह सुनकर उन्होंने हमारा खूब उपहास उड़ाया।साथ ही सरकारी किताबों की बिषय सामग्री का मजाक उड़ाते हुए उन्होंने कहा कि इनमें पढ़ाने लायक है ही क्या?आदि आदि। 

   मैं जानना चाहता हूँ  कि क्या शिक्षा एवं बच्चों के भविष्य के साथ यह मजाक ठीक है!यदि नहीं तो इसमें लापरवाही किसकी है और उस पर नियंत्रण किया नहीं जा रहा या हो नहीं पा रहा है यदि किया नहीं  जा रहा तो क्यों यदि हो नहीं पा रहा तो क्यों?

   एक दिन ग्यारह बजे पूर्वी दिल्ली कृष्णा नगर के एम.सी.डी.के एक नर्सरी स्कूल में गया मेरे साथ एक और मित्र थे दो वहीं की और अध्यापिकाएँ भी आ गईं अध्यापिका नहीं थी बच्चों को रखाकर कोई और बैठा था! हम सब लोग काफी जोर जोर से बात कर रहे थे हम लोगों ने देखा कि सारे बच्चे एक साथ बैठे बैठे मेज पर शिर रख कर बेसुध होकर सो रहे थे।नींद वह भी ऐसी कि बच्चे जगना तो दूर हिले डुले भी नहीं थे। मैंने उनको पूछा कि इतने सारे बच्चे एक साथ अचानक कैसे सो गए तो उन्होंने बताया बच्चे हैं सो जाते हैं खैर मैंने उनसे कहा कि ये ठीक नहीं है आप पढ़ाया करो खिलाया करो,सुलाया मत करो !

    बंधुओं,एक दिन मैंने किसी दूसरे  स्कूल के विषय में टी.वी.पर देखा था कि छोटे बच्चों को स्कूल पहुँचते ही सीरप पिलाया दिया जाता है तो बच्चे सोया करते हैं उस दिन जब यहाँ देखा तो वो बात याद आ गई सच्चाई तो ईश्वर ही जानें!किन्तु सरकारी या नगर निगम के स्कूलों से जुड़े शिक्षकों पर से अब विश्वास तो सबका उठ रहा है किंतु धनहीन लोग अच्छे स्कूलों में पढ़ा नहीं सकते सरकारी और नगर निगम के शिक्षक पढ़ाना नहीं चाहते।

          एक दिन नगर निगम के किसी स्पेक्टर को ये सब बातें बताने गया तो पता लगा कि उन्हें पहले से पता है किंतु उन्होंने हमें नाम न बताने की शर्त पर कहा कि वहाँ कोई शिक्षिका पढ़ाना नहीं चाहती मैं क्या कर सकता हूँ सभी जगह का यही हाल है सरकारी स्कूलों में भी तो पढ़ाई नहीं होती है तो मैंने पूछा कि फिर ये विद्यालय चलते क्यों हैं क्यों दी जाती है शिक्षकों को सैलरी ?यह कहकर चला आया!

   प्राइवेट स्कूलों में तो लाखों रुपए एडमीशन फीस एवं हजारों रुपए महीने की फीस होती है जहॉं शिक्षकों के लिए उच्चशिक्षा एवं ट्रेंड होने की अनिवार्यता भी नहीं होती इनकी सैलरी भी एम.सी.डी.के स्कूलों के शिक्षकों की अपेक्षा काफी कम होती है।प्राइवेट स्कूलों में कोई अधिकारी नहीं होता है बस अकेला स्कूल मालिक ही होता है वह भी जरूरी नहीं कि शिक्षित या खास शिक्षित हो!फिर भी प्राइवेट स्कूलों का विश्वास इतना अधिक क्यों है कि लाखों रुपए खर्च करके भी हर कोई अपने बच्चे वहॉं पढ़ाना चाहता है?प्राइवेट स्कूलों से और अधिक अच्छे क्यों नहीं हो सकते एम.सी.डी.के और सरकारी स्कूल?यदि हो सकते हैं तो देर क्या है उसके लिए प्रयास क्या किए जा रहे हैं?या ऐसा कोई बिचार ही नहीं है या जैसा चल रहा है उससे संतुष्ट  है एम.सी.डी.या सरकारी स्कूल प्रशासन?

    एम.सी.डी.स्कूलों के मध्यान्ह भोजन के बिषय में लोगों का अनुमान है कि भोजन में गंदगी कीड़े मकोड़े केंचुए छिपकलियॉं आदि निकलने का कारण केवल यहॉं के शिक्षकों की लापरवाही है!यदि सरकारी  स्कूलों के  अधिकारी,कर्मचारी,शिक्षक शिक्षिकाओं के अपने बच्चे भी इन्हीं एम.सी.डी.और सरकारी स्कूलों में ही पढ़ रहे होते तो भी क्या होती शिक्षा में लापरवाही और मिलती भोजन में गंदगी?इसलिए यदि ऐसा करने से शिक्षा और भोजन दोनों का ही सुधार संभव है तो सरकारी  स्कूलों के अधिकारी, कर्मचारी, शिक्षक शिक्षिकाएं  एम.सी.डी.और सरकारी स्कूलों   में ही क्यों नहीं पढ़ाते हैं अपने भी बच्चे?