Thursday, October 17, 2013

क्या आम आदमी पार्टी का मुख्यमंत्री बनेगा दिल्ली में ?

   कैसा रहेगा आम आदमी पार्टी का चुनावी भविष्य ?  

   दिल्ली के आगामी चुनावी परिदृश्य में ज्योतिषीय  दृष्टि से जहाँ तक बात आम आदमी पार्टी की है इस पार्टी में अरविंद जी के विरोध  में भड़कने वाले असंतोष के कारण इस दल का कोई सबल आस्तित्व  बन पाने से पहले ही काल्पनिक ईमानदार वाद बिखर सकता है ! इससे बचाव के लिए अरविन्द जी को चाहिए कि उनकी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व केवल श्रीमान अरविन्द जी तक ही सीमित न रहे उन्हें अपने ही समान अधिकार प्राप्त कुछ अन्य कार्य कर्ताओं को अपने ही समान शक्ति संपन्न बनाना चाहिए।यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो दिल्ली के चुनावों में उनकी सामर्थ्य उनकी आशा की अपेक्षा बहुत कम रहेगी।
       ऐसी विषम परिस्थिति का सामना आम आदमी पार्टी को करना पड़ेगा ! भाजपा की अपेक्षा इनके लिए एक दरवाजा यह तो खुला है कि इन्हें जो मिलना है सो मिलना ही है खोने को कुछ नहीं है!यद्यपि वर्तमान परिस्थिति में अपनी बढ़ी लोकप्रियता को वोट के रूप में बदलकर अपनी साख बचाए रख पाना  आम आदमी पार्टी लिए भी अत्यंत  कठिन होगा। अत्यधिक तैयारी की आवश्यकता है।इस विषय में और अधिक जानकारी के लिए 
                                  ( आम आदमी पार्टी में अरविन्द जी का भविष्य ?
    नाम से हमारा  लेख Google पर  पढ़ा  जा सकता है। 
  दूसरी ओर चुनावी ज्योतिषीय  दृष्टि से इस चुनावी समर में भाजपा के पाँच विजयों का एक साथ संगठित होकर चुनावी विजय के लिए विशेष परिश्रम पूर्वक काम करके  सफलता हासिल कर पाना यदि असंभव नहीं तो असंभव जैसा जरूर होगा। वैसे भी दिल्ली  भाजपा जब तक अपने पाँचों बिजय बीरों को दिल्ली में एक साथ लगभग समान अधिकारों के साथ जमाए  रखेगी तब तक दिल्ली भाजपा के हाथ में मुख्यमंत्री पद पहुँचना अत्यंत कठिन लगता है !श्रीमान साहब सिंह वर्मा जी के बाद दिल्ली भाजपा में कोई सर्वसम्मान्य नेता उभर ही नहीं पाया।दिल्ली भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर  इन पाँचों बिजय बीरों की समान सहभागिता के कारण आपसी खींचतान से जूझ रही पार्टी का कोई प्रमुख चेहरा नहीं बन पाया जिसके सिद्धांतों से प्रभावित होकर जनता उनके पक्ष में मतदान करे।यही वो प्रमुख कारण है जिससे दिल्ली भाजपा लम्बे समय दिल्ली की सत्ता से बाहर है अन्यथा सोच कर देखा जाए तो अतीत में भाजपा से ऐसी कौन सी बड़ी भूल हुई है जिसका दंड भाजपा को आज तक सत्ता से दूर रहकर मिल रहा है?जनता में भाजपा के विरुद्ध कोई आक्रोश भी नहीं दिखता है भ्रष्टाचार का कोई आरोप लगाकर भी भाजपा को सत्ता से नहीं हटाया गया था।केवल आलू प्याज की महँगाई पर भाजपा को  सत्ता छोडनी पड़ी थी।यदि यही एक कारण भाजपा के सत्ता से हटने का था तो दिल्ली के काँग्रेस शासन में तो ऐसा अक्सर होता रहता है वर्तमान में भी महँगाई चर्म सीमा पर है फिर भी इतने लम्बे समय तक सत्ता में रहे काँग्रेस शासनके विरुद्ध कोई लहर भी बनती नहीं दिख पा रही है!आखिर इसका कारण  क्या है क्यों दिल्ली में भाजपा रही अब तक सत्ता से दूर और आगे आने वाले चुनावों में भाजपा के लिए क्या विशेष हो पाएगा? 
(इस विषय में और अधिक जानकारी के लिए Delhi V.J.P. ke 4 Vijay  नाम से हमारा  लेख Google पर सर्च करके पढ़ा  जा सकता है।)  
  इन पाँचों विजय महानुभावों से वरिष्ठ,प्रभावी,लोकप्रिय  एवं जनता की दृष्टि में विश्वसनीय कोई ऐसा व्यक्ति भाजपा की ओर से आगामी चुनावों में मुख्यमंत्री प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत किया जाए जिसके तत्वाधान में प्रसन्नता पूर्वक पाँचों विजयपूर्ण मनोयोग से काम करने को तैयार हो जाएँ तो आगामी चुनावों में विजयी हो सकती है भाजपा !अन्यथा दिल्ली के आगामी चुनावों में भाजपा की सफलता संदेहास्पद  मानी जानी  चाहिए! 
     इसका प्रमुख कारण यह भी है कि दिल्ली के पाँचों विजयों को एक साथ दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया नहीं जा सकता और इनमें से आगे पीछे कोई बनना नहीं चाहेगा!यदि किसी और को मुख्यमंत्री बनाने के लिए आगे लाया जाएगा तो ये पाँचों विजय उसका दोष भी आपस में ही एक दूसरे पर ही मढेंगे जिसका चुनावी नुकसान भाजपा को ही होगा और फायदा विरोधी पार्टी अर्थात कांग्रेस को होगा इसलिए भाजपा की ओर से इन पाँचों विजयों को पार्टी के प्रति समर्पित करने के लिए यदि गंभीर प्रयास नहीं किए जाते तो काँग्रेस अर्थात शीला दीक्षित जी को पराजित कर भाजपा के लिए आसान नहीं होगा!
   वैसे भी ज्योतिषीय  दृष्टि से शीला दीक्षित जी का कई वर्ष तक अच्छा ही अच्छा समय है। इनकी अपनी ग्रहस्थिति के अनुशार  साधारण तैयारी के द्वारा इन्हें चुनावी समर में पराजित कर पाना विरोधियों के लिए अत्यंत कठिन होगा।
      भाजपा हो या आम आदमी पार्टी दोनों के द्वारा अभी तक की गई चुनावी तैयारियाँ श्रीमती शीला दीक्षित जी को पराजित करने के लिए अपर्याप्त हैं एक ज्योतिष वैज्ञानिक होने के नाते मैं कहना  चाहता हूँ कि श्रीमती शीला दीक्षित जी एक  अजेय चुनावी योद्धा के रूप में आगामी चुनावों में अपने चुनावी प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलते दिख रही हैं।यदि ऐसा हो ही गया तो इसका श्रेय मुख्य मंत्री के रूप में शीला दीक्षित जी की कार्यकुशलता को कम एवं विपक्षी दलों की शिथिल चुनावी तैयारियों को अधिक देना होगा ।

      कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि विपक्षी पार्टियों  के पास उतनी तयारी दिखती नहीं है सफल होने के लिए जिसकी उन्हें आवश्यकता है। यदि हालात ऐसे ही रहे तो चुनावी समर में शीला दीक्षित जी को पराजित कर पाना विपक्षी पार्टियों के लिए अत्यंत कठिन होगा। 

दिल्ली भाजपा के लिए कैसे रहेंगे आगामी चुनाव ?ज्योतिष में ....

दिल्ली भाजपा का कैसा है आगामी चुनावी भविष्य ?  

    ज्योतिषीय  दृष्टि से इस चुनावी समर में भाजपा के पाँच विजयों का एक साथ संगठित होकर चुनावी विजय के लिए विशेष परिश्रम पूर्वक काम करके  सफलता हासिल कर पाना यदि असंभव नहीं तो असंभव जैसा जरूर होगा।
     वैसे भी दिल्ली  भाजपा जब तक अपने पाँचों बिजय बीरों को दिल्ली में एक साथ लगभग समान अधिकारों के साथ जमाए  रखेगी तब तक दिल्ली भाजपा के हाथ में मुख्यमंत्री पद पहुँचना अत्यंत कठिन लगता है !श्रीमान साहब सिंह वर्मा जी के बाद दिल्ली भाजपा में कोई सर्वसम्मान्य नेता उभर ही नहीं पाया।दिल्ली भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर  इन पाँचों बिजय बीरों की समान सहभागिता के कारण आपसी खींचतान से जूझ रही पार्टी का कोई प्रमुख चेहरा नहीं बन पाया जिसके सिद्धांतों से प्रभावित होकर जनता उनके पक्ष में मतदान करे।यही वो प्रमुख कारण है जिससे दिल्ली भाजपा लम्बे समय से दिल्ली की सत्ता से बाहर है अन्यथा सोच कर देखा जाए तो अतीत में भाजपा से ऐसी कौन सी बड़ी भूल हुई है जिसका दंड भाजपा को आज तक सत्ता से दूर रहकर मिल रहा है?
    जनता में भाजपा के विरुद्ध कोई आक्रोश भी नहीं दिखता है भ्रष्टाचार का कोई आरोप लगाकर भी भाजपा को सत्ता से नहीं हटाया गया था।केवल आलू प्याज की महँगाई पर भाजपा को  सत्ता छोडनी पड़ी थी।यदि यही एक कारण भाजपा के सत्ता से हटने का था तो दिल्ली के काँग्रेस शासन में तो ऐसा अक्सर होता रहता है वर्तमान में भी महँगाई चर्म सीमा पर है फिर भी इतने लम्बे समय तक सत्ता में रहे काँग्रेस शासन के विरुद्ध कोई लहर बनती नहीं दिख रही है!आखिर इसका कारण  क्या है क्यों दिल्ली में भाजपा रही अब तक सत्ता से दूर और आगे आने वाले चुनावों में भाजपा के लिए क्या विशेष हो पाएगा? 
(इस विषय में और अधिक जानकारी के लिए Delhi V.J.P. ke 4 Vijay  नाम से हमारा  लेख Google पर सर्च करके पढ़ा  जा सकता है।)  
     अतःकहा जा सकता है कि भाजपा की दिल्ली विजय के लिए आवश्यक है कि इन विजयों में से कुछ विजय महानुभावों का कार्यस्थल बदला जाना चाहिए! भले ही उन्हें भाजपा अपने केन्द्रीय कार्यक्रमों में उनकी सेवाओं का सदुपयोग करे।
    दूसरा एक उपाय और है कि इन पाँचों विजय महानुभावों से वरिष्ठ,प्रभावी,लोकप्रिय  एवं जनता की दृष्टि में विश्वसनीय कोई ऐसा व्यक्ति केंद्रीय भाजपा की ओर से आगामी चुनावों में मुख्यमंत्री प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत किया जाए जिसके तत्वाधान में प्रसन्नता पूर्वक पाँचों विजय पूर्ण मनोयोग से काम करने को तैयार हो जाएँ तो आगामी चुनावों में विजयी हो सकती है भाजपा !यह भी संभव है कि ये लोग ज्योतिष की महत्ता को समझते हुए निजी महत्वाकांक्षाएँ छोड़कर निजी भेदभाव भूल कर केवल पार्टी को विजय दिलाने के लिए कार्य करें तो भी आ सकती है सत्ता में भाजपा? यदि इस प्रकार के तालमेल पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया तो दिल्ली  के आगामी चुनावों में भाजपा की सफलता संदेहास्पद  मानी जानी  चाहिए! 
     इसका प्रमुख कारण यह भी है कि दिल्ली के पाँचों विजयों को एक साथ दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाया नहीं जा सकता और इनमें से आगे पीछे कोई बनना नहीं चाहेगा!यदि किसी और को मुख्यमंत्री बनाने के लिए आगे लाया जाएगा तो ये पाँचों विजय उसका दोष भी आपस में ही एक दूसरे पर ही मढेंगे जिसका चुनावी नुकसान भाजपा को ही होगा और फायदा विरोधी पार्टी अर्थात कांग्रेस को होगा इसलिए भाजपा की ओर से इन पाँचों विजयों को पार्टी के प्रति समर्पित करने के लिए यदि गंभीर प्रयास नहीं किए जाते तो काँग्रेस अर्थात शीला दीक्षित जी को पराजित कर पाना  भाजपा के लिए आसान नहीं होगा!
   वैसे भी ज्योतिषीय  दृष्टि से शीला दीक्षित जी का कई वर्ष तक अच्छा ही अच्छा समय है। इनकी अपनी ग्रहस्थिति के अनुशार  साधारण तैयारी के द्वारा इन्हें चुनावी समर में पराजित कर पाना विरोधियों के लिए अत्यंत कठिन होगा।

        दूसरी बात आम आदमी पार्टी की है इस पार्टी में अरविंद जी के विरोध  में भड़कने वाले असंतोष के कारण इस दल का कोई सबल आस्तित्व  बन पाने से पहले ही काल्पनिक ईमानदार वाद बिखर जाएगा!  दिल्ली के चुनावों में उनकी सामर्थ्य उनकी आशा की अपेक्षा  बन भी सकती है फिर भी उसे बरक़रार रख पाना कठिन होगा।इसलिए ज्योतिषीय  दृष्टि से इनसे भयभीत होने की आवश्यकता भाजपा को नहीं है किन्तु लौकिक दृष्टि से ये लोग भी वोट तो भाजपा का ही काटेंगे ये भाजपा का निजी नुकसान आम आदमी पार्टी के कारण होगा!
    इन सभी बातों को भाजपा अपनी संगठनात्मक कमजोरियों के कारण  ही श्रीमती शीला दीक्षित जी से आगामी चुनावों में पिछड़ते हुए फिलहाल अभी तो दिख रही है।यदि ऐसा हो ही गया तो इसका श्रेय मुख्यमंत्री के रूप में शीला दीक्षित जी की कार्यकुशलता को कम एवं विपक्षी दलों की शिथिल चुनावी तैयारियों को अधिक देना होगा ।   

     कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि दिल्ली भाजपा के पास अभी तक  उतनी तयारी दिखती नहीं है आगामी चुनावों में सफल होने के लिए जितनी तैयारी की उन्हें आवश्यकता है!

Saturday, October 12, 2013

टी.वी.चैनलों ने धर्म के क्षेत्र में बड़ा काम किया है

मीडिया इनका  नाम करे या बदनाम मीडिया का फायदा दोनों ही परिस्थियों में होता है 

       हमारी मीडिया  और टी.वी.चैनलों  ने धर्म के क्षेत्र में बड़ा काम  किया है छोटे छोटे लोगों का बहुत बड़ा बड़ा नाम किया है  कृपाबाँटने वाले मलमल बाबा हों या कुछ लुटे पिटे फिल्मी लोगों की कृपा के बल पर  बीज मन्त्रों से उद्धार करने वाले सुकुमार स्वामी आदि इनके आलावा और भी जितने भी बाबा, तांत्रिक, ज्योतिषी, योगगुरु , वास्तुशास्त्री, आत्मज्ञानी ब्रह्म ज्ञानी आदि बिना पढे लिखे शास्त्रीय योग्यता बिहीन, सदाचरण बिहीन, तपस्या बिहीन, धार्मिक धर्म गुरु मीडिया के द्वारा तैयार किए गए हैं दुर्भाग्य वश उन पर विश्वास करने वालों को धोखा ही मिला है

  जिन लोगों को प्रचारित करके जिनके चार चार  करोड़ अनुयायी  बनाए जा चुके हों और उनमें से बहुत बड़ा वर्ग आज भी उनके प्रतिपूर्ण समर्पित हो वह यह मानने को तैयार ही न हो कि उनके  गुरु जी गलत हो सकते हैं उन्हें लगता हो कि वे फंसाए जा रहे हैं इसलिए हमें उनका साथ देना चाहिए और यदि इस भावना से भावित होकर उन चार  करोड़ अनुयायियों   में से  चार लाख अनुयायी  भी ऐसा करने पर तुल ही जाते हैं तो उन्हें कैसे समझाया जाएगा?आखिर मीडिया उन्हें अपने मातहत क्यों रखना चाहता है कि किसी के विषय में जब तक मीडिया कहे ठीक तो ठीक जिस दिन मीडिया कहे  गलत तो गलत मान लेना चाहिए आखिर ऐसा क्यों करें आम लोग? उन्हें भी आपनी बुद्धि से  जांचने परखने का  मौका क्यों न दिया जाए!रही बात किसी आरोपी के विषय में कानून अपना काम करता रहेगा जो फैसला आएगा उसे मानने के लिए है हर कोई बाध्य है क्योंकि कानूनी हर फैसले के आधारभूत जो तर्क निकलकर सामने आते हैं उसमें समाज को मानने के लिए पर्याप्त सामग्री होती है मीडिया कि तरह नहीं होता है कि जिसे टी.वी. चैनल पर दिखने  का मन हो वह आकर मीडिया के बनाए नियमों के अनुशार सम्बंधित व्यक्ति की निंदा करने लगे  तो मीडिया उसे  भी सम्बंधित व्यक्ति का राजदार सेवादार आदि बताने लगता है आखिर क्या प्रमाण होते हैं मीडिया के पास ?
      योगासन सिखाने वालों को योग गुरु कहकर  प्रचारित कर रहा है मीडिया!किसी भी विश्व विद्यालय से जिसने  तंत्र, ज्योतिष,वास्तु आदि की कोई डिग्री ही न ली हो ऐसे झोला छाप लोगों को इन  तंत्र, ज्योतिष,वास्तु आदि विषयों में बकवास करने का मौका ही नहीं देना चाहिए किन्तु मीडिया में  योग्यता पर ध्यान ही किसका होता है वहाँ तो सारा  ध्यान ही पैसे पर होता है जो पैसे देता है वही छपता है और वही टी.वी. पर भी दिखता भी है| 

       इसीप्रकार कामदेव को  योगगुरु कहने लगा मीडिया आखिर  योगगुरु कहने का क्या आधार था किस संत सम्मलेन में कामदेव को  किसने थी योगगुरु की उपाधि? वैसे भी जो योगासन सिखाता है वो योगी कैसे कहा जा सकता है!फर्जी एवं अयोग्य लोगों को धार्मिक आस्थावान लोग संत,जगद गुरु शंकराचार्य आदि झूठी पद पदवी धारण करने वाले फर्जी लोगों को केवल  पैसे के बल पर मन चाही पद पदवियों से संबोधित करता है मीडिया आखिर ऐसा खिलवाड़ सनातन  धर्म के साथ ही क्यों ?
     यह दोष मीडिया का है या उन लोगों का यह तो जाँच का विषय हो सकता है किन्तु एक बात तो प्रत्यक्ष प्रमाणित है ही कि ऐसे लोगों से हर हालत में फायदा मीडिया का ही होता है।मीडिया इनका  नाम करे या बदनाम मीडिया का फायदा दोनों ही परिस्थियों में होता है  अर्थात  अपने दन्द  फन्द का प्रचार करने के लिए भी  ये लोग मीडिया  और टी.वी.चैनलों  को ही  पैसे  देते हैं और बदनाम करने पर तो टी.आर. बनती ही है|फिर भी इन मीडिया  पुरुषों को इतनी भी समाई नहीं होती है कि क़ानूनी जाँच के परिणाम सामने आने तक  प्रतीक्षा  ही कर ली  जाए !ऐसे धार्मिक प्रकरण चूँकि जन भावना से जुड़े होते हैं इसलिए उनका भी आदर होना ही चाहिए जो नहीं हो पा रहा है!

         इससे भी गंभीर विषय यह है कि धर्म एवं धर्म शास्त्रों के नाम से पैसे के बल पर मीडिया  और टी.वी.चैनलों की कृपा से  प्रसिद्ध हो चुके किसी भी अच्छे बुरे  व्यक्ति की एकदम निचले स्तर के शब्दों से निंदा अचानक की जाने लगे  यह स्वस्थ पत्रकारिता नहीं है| मानवीय भूल की गुंजाइस तो हर जगह बनी ही रहती है कम से कम एक प्रतिशत गुंजाइस भी यदि किसी के निर्दोष निकलने की हो तो  भी उसकी प्रतीक्षा की जानी चाहिए इसीलिए किसी भी व्यक्ति के विषय में क़ानूनी जाँच के परिणाम आने से पूर्व  मीडिया के द्वारा सीधे सजा नहीं सुना देनी चाहिए| किसी आरोपी को सैतान कह देना कामी या बलात्कारी  कहने लगना या और भी अपमान जनक शब्दों का प्रयोग करने लगना आदि सोचकर कई बार लगता है कि आखिर मीडिया को इतनी जल्दी क्यों है!क्या उन्हें न्याय व्यवस्था पर विश्वास नहीं है फैसला आने तक प्रतीक्षा की जानी चाहिए थी जो संयम मीडिया में नहीं दिख रहा है |
    यह सब देखकर लगता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि मीडिया का कोई कमजोर विन्दु आरोपियों के पास होता हो जिस पोल को खुलने के भय से मीडिया इन्हें ऐसी नौबत आने से पूर्व ही समाज की निगाहों में अविश्वसनीय बना देना चाहता है ताकि ऐसे लोग यदि कोई सच बात भी बोलें तो भी उसका कोई भरोसा न करे !
     अपनी बात जन जन तक पहुँचाने के लिए मीडिया के आलावा किसी के पास और  कोई दूसरा विकल्प तो है नहीं !इसलिए क्या ऐसा माना जाए की किसी केस का फैसला आने से पूर्व होने वाली बेइज्जती से यदि  अपने को बचाना है तो मीडिया पूजन जरूरी है !

Thursday, October 10, 2013

बलात्कारों में फँसने फंसाने में कितने दोषी हैं बाबा और कितना है समाज?

बाबाओं को  ब्यभिचार के लिए धन देने वालों ने धन दिया,मन देने वालों ने मन दिया तन देने वालों ने तन दिया कुछ लोगों ने तो जीवन ही दे दिया है ये सच्चाई है फिरभी  दोष केवल बाबाओं का ही है क्या?       

       जहाँ तक मेरी निजी धारणा है मैं ऐसे सभी धर्म व्यापारी बाबाओं के आचरणों से आहत हूँ मेरा विश्वास है कि ऐसे सभी अविरक्त महात्माओं से किसी भी रूप में जुड़े रहने वाले किसी भी स्त्री पुरुष को तब तक विश्वसनीय नहीं माना जाना चाहिए जब तक जाँच रिपोर्ट न आ जाए क्योंकि वैराग्य विहीन बाबाओं के आश्रमों में एक रात भी किसी ने क्या सोच कर गुजारी?यह बात मानी जा सकती है कि किसी को शुरू के दो चार दिन  चारित्र्यिक प्रदूषण का शिकार न बनाया गया हो किन्तु वहाँ का वातावरण कैसा है इसका आभास तो प्रारंभ में हो ही जाता है फिर भी वहाँ महीनों या वर्षों बिताना कहाँ तक उचित था?खैर एक शिकायत मुझे मीडिया से भी है कि बिना बैराग्य वाले धनी सभी बाबाओं  में धन का सुख भोगने कि भावना तो आ ही जाती है जो सब में ही है फिर मीडिया का क्रोध केवल आशाराम पर ही क्यों हैं  यदि मीडिया का उद्देश्य वास्तव में धर्म रक्षा है  तो खुल कर एक बार आ जाना चाहिए सामने!
     एक और चिंता कि बात है कि आज तक किसी टी.वी. चैनल पर किसी परिचर्चा में कोई संत नहीं लाया गया जो अपना पक्ष भी रखता ? ये जो आर्टिफिशियल बाबा परिचर्चाओ  में सम्मिलित किए भी जा रहे हैं उनका धर्म से क्या लेना देना? कोई भाजपा का बाबा होता है कोई कांग्रेस या किसी अन्य दल का कुछ लुटे पिटे पत्रकार या वकील रह चुके होते हैं,या कुछ बाबा होने के बाद भी किसी सभा सोसायटी के अध्यक्ष बने फिरते हैं   किन्तु इन बवालियों का मन  भजन में तो  लगता नहीं है इसलिए लाल कपड़ों में शरीर तो लिपेट लिया है किन्तु मन अपनी पुरानी आदतें छोड़ने को तैयार नहीं है आजतक ऐसे सभी असफल आशाराम ही आशाराम की आलोचनाओं में ज्यादा रुचि ले रहे हैं बाकी चरित्रवान संतों  के पास समय  कहाँ है कि वे ऐसे प्रपंचों में फंसें !
    इसी प्रकार  चरित्रवान आम स्त्री पुरुषों के पास न तो समय बाबाओं के पीछे पीछे घूमने का  है और न ही उनकी निंदा या समर्थन में साथ देने का | ऐसी  महंगाई में जीवन चला पाना ही कितना कठिन है फिर भले लोगों के पास बबई गिरी के लिए समय कहाँ है !
     अब समय आ गया है जब ऐसी हरकतों पर लगाम लगनी  चाहिए जिससे धर्म  की हानि  संभव हो अन्यथा इन लोगों का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा किन्तु कुछ लोगों की ऐसी हरकतों से सच्चरित्र साधुओं पर भी अंगुलियाँ उठने लगी हैं जो सबसे बड़ा  चिंता का विषय है!
     इन सब बातों के साथ साथ यह स्वीकार करने में भी अब संकोच नहीं  होना चाहिए कि अब समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग सेक्स के प्रति समर्पित हो चुका है जिसमें नेताओं से लेकर बाबाओ तक ने बढचढ कर  भाग ले रखा है| सेक्स के प्रति  समर्पण में स्त्री पुरुषों में लगभग समानता दिखती  है  अगर बाबा दुश्चरित्र हैं तो उनके प्रति समर्पित होने वाली भीड़ का समर्पण भी देखते ही बनता है!
    मलमल बाबा की तथाकथित कृपा लूटने के लिए लालायित गिडगिडा  रहे  भक्तों को देखकर कई बार मैं सोचने लगता हूँ कि आज मलमल दरवार में  बात बात में रोने वाली भक्ताएं कल चिल्लाती घूमेंगी! आखिर इस सच को समाज समझने के लिए तैयार क्यों नहीं है कि अब युग बदल चुका है ये कलियुग है इसका प्रभाव बाबाओं पर भी पड़ा है सदाचार का उपदेश देने वाले बाबा अब दुराचार में जेलों बंद हो रहे हैं इस लिए बहुत संभल कर चलने कि जरुरत है !
      अब समाज की सोच बिलकुल बदल चुकी है आज  सेक्स से जुड़े अधिकांश अपराधों में दोनों तरफ से पहले तो सब कुछ ठीक चलता है किन्तु बाद में जब आपसी असंतोष  पनपता है तब स्त्री निरपराध और पुरुष अपराधी घोषित कर दिया जाता है!
        गैंग रेप के अधिकांश केशों में भी कुछ ऐसा ही घटित होता है किसी सार्वजानिक स्थल पर अपने प्रेमी नाम के सेक्स क्षुधा से पीड़ित लड़के की अश्लील हरकतें  हँस  हँस कर सहने या उसमें साथ देने वाली लड़की को देखकर  देखने वालों का बेचैन होना स्वाभाविक  है इन्हीं दर्शको में  यदि शरारती किस्म के कुछ लड़के एक जैसी मानसिकता के हुए तो ऐसे जोड़ों के पीछे लग जाते हैं और जहाँ एकांत मिला वहीँ उस अकेले प्रेमी नाम के सेक्सालु को पकड़ कर बांध देते हैं क्योंकि वे कई होते हैं और फिर लड़की के साथ करते हैं मनमानी!
     मेट्रो के फुटेज देखने के बाद तो यह और साफ हो चुका है कि प्रेमी जोड़े मेट्रो  में भी ऐसी हरकतें करते हैं जिनके सुधरे बिना  ऐसी दुर्घटनाओं  पर कानून के बल पर लगाम लगा पाना निजी तौर पर हमें दिवा स्वप्न से अधिक कुछ नहीं लगता है !खैर...हमें तो यही कहना है की  सबके  सुधरने पर ही सुधर संभव हो सकता है जादू या किसी भी  प्रकार  के चमत्कार की उम्मीद तो प्रशासन से भी नहीं की जानी चाहिए! 

Monday, October 7, 2013

चल गुरु हो जा शुरू. जैसी फिल्में बनाने का उद्देश्य क्या है ?

 आधुनिक बाबाओं एवं आधुनिक नेताओं पर जरुरी है कठोर नियंत्रण ! 

     ऐसी  फिल्मों  का निर्माण उसी परिस्थिति में हितकर हो सकता है जब कि केवल आशाराम को ही केन्द्रित न  किया जाए अपितु इस तरह की सम्पूर्ण विचारधारा को कटघरे में खड़ा करना चाहिए क्योंकि संतों की वेष  भूषा धारण करना,संतों की तरह बातें  करने लगना,बिना पढ़े लिखे ज्योतिषी बनने का नाटक करने लगना,वास्तु की जानकारी लिए बिना अपने को वास्तु शास्त्री सिद्ध कर देना, इसीप्रकार  हाथ पैर मोड़ने लगने से अपने को योगी सिद्ध कर देना,ताली बजा बजा कर मुख मटकाने वाले नचैया गवैयों का अपने को भागवत वक्ता कहना प्रारंभ  कर देना इस प्रकार के सभी पाखंडों का पर्दाफास किया जाए तब तो धार्मिक जगत का भला होगा अन्यथा फ़िल्म के नाम पर धर्म एवं धार्मिक विषयों का उपयोग हँसने हँसाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए|एक और विशेष बात का ध्यान रखा  जाना चाहिए  कि पाखंडी बाबाओं के राजनैतिक लोगों से संबंधों को उजागर किया जाना चाहिए साथ ही स्पष्ट किया जाना चाहिए कि बाबाओं के पास इतना धन कहाँ से आता है जो लोग देते हैं उनका क्या स्वार्थ क्या होता है? कहीं ये बाबाओं नेताओं एवं धनी लोगों का यह आपसी गठजोड़  बासनात्मक ही तो नहीं है !इसीप्रकार जब यह बात सबको पता है कि जो वास्तविक चरित्रवान संतों के लिए महिलाओं से दूरी बनाकर रहने के लिए ही कहा गया है  और वे इसीप्रकार से रहते भी हैं किन्तु जो भ्रष्ट बाबा हैं वो कथा कीर्तन आदि सारे ड्रामे ऐसे  ही करेंगे जिससे महिलाओं के बीच अधिक से अधिक घुसने  चिपकने आदि को मिले !ये महिलाओं को अपने जाल में फँसा लेते हैं या महिलाएँ इन्हें फँसा लेती हैं या इनके चंगुल में स्वयं फँस जाती हैं यह शंका मुझे इस लिए हो रही है कि जब चरित्रवान संत  महिलाओं से मध्यम दूरी बनाकर रहते हैं तो जो ऐसा नहीं करते उन बाबाओं को सच्चरित्र  कैसे माना जा सकता है फिर भी चरित्रवती महिलाएँ  ऎसे  भ्रष्ट बाबाओं पर भरोसा क्यों करती हैं ?
     दूसरी ओर वर्षों तक उनसे  जुड़े रहने के बाद भी जो महिलाएँ उन्हें अपना गुरु बताती हैं तो वहां पवित्रता की परिकल्पना कैसे और क्यों की जा सकती है?इसलिए इन सभी बिन्दुओं पर प्रकाश  डालती हुई फ़िल्म बनें जो सबको सबकी गलतियों का एहसास कराने में सहायक हो सके और उन्हें सुधरने का रास्ता सुझावे तो यह वर्तमान परिस्थियों की  न केवल सर्वोत्तम लोकप्रिय फ़िल्म होगी अपितु लोक हितकारी भी होगी| भाग्य वश यदि ऐसा हो पाता है तो हमारे राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संसथान की ओर से अग्रिम बधाई! धन्यवाद !!!

   आधुनिक बाबाओं एवं आधुनिक नेताओं की भ्रामक गतिविधियों पर सरकारी स्तर पर निगरानी रखी जानी चाहिए| 

     इन्हें धन की आवश्यकता क्यों है ?और यदि इनके जीवन का  वास्तविक लक्ष्य धन कमाना ही था तो आम आदमी की तरह परिश्रम पूर्वक भी कमा सकते थे योग का ढोंग या जनसेवा का ढोंग करने की क्या जरुरत थी? इसके लिए  इन्हें नेता  और बाबा बनने की आवश्यकता ही क्या थी? हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि  जो लोग  धर्म एवं राजनीति से अपराध पूर्वक धन इकठ्ठा कर हैं और इसके बाद ये लोग शुरू करते हैं ऐय्यासी!

    इस प्रकार से नेताओं एवं  बाबाओं की बासना का शिकार महिलाएँ या लड़कियाँ शुरू में इनके दिए हुए  लालच में फँस जाती हैं किन्तु नेता और बाबा लोग सच तो बोलते नहीं हैं इसलिए शिकार हुई महिलाओं को देर सबेर पता लग ही जाता है कि उनके साथ धोखा हुआ है तब तक देर हो चुकी होती है!

    आजकल देश के प्रसिद्ध एक बाबा के ऊपर ऐसे  ही आरोप लग रहे हैं जिसमें एक लड़की ने आरोप लगाया है कि उसके साथ बाबा जी ने सन २००१ से सन २००७ तक अपने अलग अलग आश्रमों में अलग अलग समयों पर कई बार बलात्कार किए हैं !अरे! जहाँ संदेह हो गया था वहाँ इतने दिन तक रुकना ही नहीं चाहिए था !किन्तु रही होंगी कुछ मजबूरियाँ!

    खैर आवश्यक है कि कलियुगी बाबाओं एवं कलियुगी नेताओं दोनों पर ही कठोर नियंत्रण किया जाए दोनों ही समुदाय देश की मर्यादाओं को तार तार करने में लगे हुए हैं बिगत कुछ वर्षों से दोनों ने समाज को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हुई है! नेताओं ने देश को और बाबाओं  ने धर्म को लाकर चौराहे पर खडा कर दिया है जब तक इनकी गतिविधियों पर नियंत्रण  नहीं किया जाता तब तक कितना भी कठोर कानून क्यों न बना लिया जाए अपराध घट नहीं सकते  क्योंकि सारा अपराधी इन्हीं दोनों से संरक्षित है नेताओं को कोठी और काम के लिए एवं बाबाओं को आश्रमों के लिए दूसरों की जमीनों पर बलपूर्वक  कब्जे करने होते हैं इस काम में दोनों को ही अपराधियों की मदद की शक्त जरुरत होती है|अपराधी इनका साथ इसलिए देते हैं कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा एक नेता है इसलिए! दूसरा बाबा है इसलिए बड़े बड़े मंत्रियों से सम्बन्ध हैं! पैसे नेताओं एवं बाबाओं दोनों के पास होते ही हैं इस प्रकार से नेताओं एवं बाबाओं के सान्निध्य में रहने के कारण इन्हीं दोनों से  अपराधियों की सारी आवश्यकाएँ पूरी होती रहती हैं ये करते रहते हैं अपराध! ऐसे  में क्या कर लेगी कानून की कठोरता ? 

     इन दोनों समुदायों से जुड़े दुष्कर्मियों  के कारण ही समाज का  भरोसा आज दोनों से ही  बुरी तरह  टूटा है दोनों ने समाज के साथ गद्दारी की है दोनों ने समाज को धोखा दिया है! शारीरिक सुरक्षा एवं सुविधाओं के लिए समाज राजनेताओं की ओर देखता है इसीप्रकार  मानसिक सुख सुविधाओं  सात्विकता आदि के लिए बाबाओं की ओर देखता है दोनों से  दोनों प्रकार का सहयोग लेने के लिए दोनों को टैक्स देता है समाज! बात और है कि नेताओं का टैक्स घोषित होता है तो बाबाओं का अघोषित!अन्यथा  नेताओं या बाबाओं  के पास बिना कमाए इतना अधिक पैसा आता कहाँ से है ?

     आधुनिक बाबाओं और नेताओं में बहुत सारी समानताएँ  होती हैं स्वयं देखिए -बिना किसी परिश्रम के सुख सुविधा पूर्ण जीवन जीने के लिए बड़ी बड़ी रैलियाँ करके धन कमाना दोनों को बहुत पसंद है रैलियों में केवल भाव विहीन भाषण होते हैं इनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता है |जैसे -




यदि आप धार्मिक भाषण दे कर लूटते हैं तो महात्मा !
यदिआप राजनैतिक भाषण दे कर लूटते हैं तो नेता !! 

   यदि  आप मंच पर प्रेम पूर्वक किसी की आलोचना करते हैं तो  महात्मा !
यदि  आप मंच पर क्रोध पूर्वक किसी की आलोचना करते हैं तो  नेता !

जो वेद शास्त्रों की दुहाई देकर जनता को झकझोरते हैं वे महात्मा!
जो संबिधान की दुहाई देकर जनता को झकझोरते हैं वे नेता !

जो ईश्वर भक्ति की दुहाई दें वे महात्मा!
जो देश भक्ति की दुहाई दें वे नेता !!

 जो परलोक का भय देकर लूटें वे महात्मा!
 जो इस लोक का भय देकर लूटें वे नेता !

 जो शिष्य बनाकर  जनता को जोड़ें वो महात्मा !
जो सदस्य बनाकर   जनता को जोड़ें वो नेता !
     
      जो लाल वर्दी पहन लेते हैं तो महात्मा !
      जो सफेद वर्दी पहनते हैं तो नेता!

   जो ईश्वर भक्ति की बात करते हैं तो महात्मा!
   जो देश   भक्ति  की  बात  करते हैं तो नेता !


    सबसे पहली बड़ी समानता यह कि दोनों के हाथ पैर दुरुस्त शरीर स्वस्थ होने पर भी दोनों बिना मेहनत के पराई कमाई खाने, सेहत बनाने एवं दूसरे के धन के बल पर ही अपनी शौक शान पूरी करने वाले होते हैं।  जैसे रैलियों के शौक़ीन दोनों होते  हैं।
      आधुनिक नेता हों या महात्मा दोनों को मीडिया बनाता है और मीडिया ही नष्ट कर देता है। 
        अक्सर जब महात्मा फँसता है तो नेता उसकी वकालत करने लगते हैं इसीप्रकार से नेता फँसता है तो महात्मा लोग उसकी वकालत करने लगते हैं क्योंकि दोनों की पोल दोनों के पास दबी होती है इसीप्रकार दोनों अपने अपने अनुयायी एक दूसरे के पीछे लगाए रहते हैं।दोनों के खाने से शौच जाने तक का खर्च आम जनता बहन करती है नेता इतिहास की कहानियाँ सुनाकर जनता का यह लोक ठीक करने की बात करते  हैं इसीप्रकार से महात्मा लोग पुराणों की कथाएँ सुनाकर जनता का पर लोक ठीक करने का सपना दिखाते हैं। नेता जब खूब धन कमा लेता है फिर एकांत में शांति में कुटिया बना लेता है ताकि इसका भी आनंद लेता रहे इसीप्रकार पापी महात्मा अपना पाप एवं अपनी पाप की कमाई छिपाने के लिए राजनैतिक दखल बनाने लगते हैं।महात्मा जब अपने किसी गुप्त पाप से भयभीत होता है तो राजनैतिक ताकत तैयार करता है।इसीप्रकार नेता बदनाम होता है तो संन्यास लेने की बात करता है अभी भी एक बन्दर  बाबा हैं जो अभी तक पेट दिखाकर पैसे माँगता था अब भय  है कि पाप की कमाई कहीं कोई छीन न ले जाए इस लिए अब लोक सभा की तीन सौ सीटें जेब में  लिए घूम रहा है एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रत्याशी को प्रधान मंत्री बनाने के लिए !आखिर ये सब क्या है ?
  
   दोनों ही अपनी अच्छी बुरी कैसी भी बात को समाज पर जबरदस्ती थोपने के लिए भीड़ का सहारा लेते  हैं ।भीड़ को बुलाया तो कुछ और समझा करके जाता है, भाषण किसी और बात के दिए जा रहे होते हैं, उद्देश्य  कुछ और होता है,परिणाम कुछ और होता है।      
     इसीप्रकार रैली में सम्मिलित होने वाले लोग भी समझने कुछ और आते हैं किंतु समझकर कुछ और चले जाते हैं।जहॉं तक भीड़ की बात है। भीड़ तो पैसे देकर भी इकट्ठी की जा रही है वो समाज का प्रतिनिधित्व तो नहीं कर सकती।
    जो पैसे देकर भीड़ बुलाएगा वो भीड़ से ही पैसे कमाएगा भी। तो राजनीति या धर्म में भ्रष्टाचार  होगा ही। किसी भी प्रकार का आरक्षण या छूट के लालची लोग अथवा कर्जा माफ करवाने के शौकीन लोग भ्रष्ट नेताओं को जन्म देते  हैं।इसी प्रकार बहुत सारा पापकरके  पापों से मुक्ति चाहने वाले चतुर लोग ही भ्रष्ट बाबाओं को जन्म देते हैं।ऐसी परिस्थिति में धर्म और राजनैतिक भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार आखिर कौन ?

      उसे पकड़े और सुधारे  बिना भ्रष्टाचार के विरुद्ध खोखले नारे लगाने, नेताओं की तथाकथित पोल खोलने से कुछ नहीं होगा।जब तक भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट बाबाओं के विरुद्ध संयुक्त जनजागरण अभियान नहीं चलाया जाएगा।तब तक इसे मिटा पाना संभव नहीं है,क्योंकि भ्रष्टाचार सोचा मन से और किया तन से जाता है।सोच पर लगाम लगाने के लिए धर्म एवं उसकी क्रिया पर लगाम लगाने के लिए कानून होता है।धर्म तो धार्मिक लोगों के आधीन एवं कानून नेताओं के आधीन हो गया है। ऐसे में किसी एक पर लगाम लगाने पर भी अपराध पर अधूरा नियंत्रण हो पाएगा जो उचित नहीं है।
     नेता और तथाकथित संतों में बहुत सारी समानताएँ  होती हैं इन संतों के पास ईश्वर भक्ति नहीं होती है। इन नेताओं में देश  भक्ति नहीं होती है।दोंनों अपने  अनुयायिओं की भीड़ के बल पर फूलते हैं। भीड़ देखकर दोनों  ही पागल हो जाते हैं चाहें वह किराए की ही हो।अनाप सनाप कुछ भी बोलने बकने लगते हैं।दोनों को लगता है कि सारा देश  उनके पीछे ही खड़ा है।दोनों की गिद्धदृष्टि  पराई संपत्ति सहित पराई सारी चीजों को भोगने की होती है।दोनों वेष  भूषा  का पूरा ध्यान रखते हैं एक नेताओं की तरह दिखने की  दूसरा महात्माओं की तरह दिखने की पूरी कोशिश   करता है। दोनों रैलियॉं करने के आदी होते हैं।दोनों मीडिया प्रेमी होते हैं इसलिए पैसे देकर भी दोनों टी.वी.टूबी पर खूब बोलते हैं।बातों में दम हो न हो पैसे का दम जरूर दिखता है पैसे के ही बल पर बोलते हैं। नेता जब भ्रष्ट  होता है तो कहता कि यदि ये आरोप सही साबित हुए तो संन्यास ले लूँ गा।जैसे उसे पता हो कि भ्रष्ट लोग ही संन्यासी होते हैं।मजे की बात यह है कि संन्यासी चुप करके सुना करते हैं कोई विरोध दिखाई सुनाई नहीं पड़ता।मानो पोलखुलने के भय से संन्यासी भयभीत हों कि कहीं कोई पोल न खुल जाए।इसी प्रकार कोई संन्यासी भ्रष्टहोता है तो नेता बन जाता है।क्योंकि   बिना पैसे ,बिना परिश्रम और बिना जिम्मेदारी के उत्तमोत्तम सुख सुविधाओं का भोग इन्हीं दो जगहों पर संभव है।   

      इसप्रकार धार्मिक लोगों की गतिविधियों को भी शास्त्रीय संविधान की सीमाओं के दायरे में बॉंधकर रखने की भी कोई तो सीमा रेखा होनी ही चाहिए। स्वामी जी रैलियॉं कर रहे हैं, आज स्वामी जी साड़ी बॉंट रहे हैं।स्वामी जी स्वदेशी  के नाम पर सब कुछ बेच रहे हैं , स्वामी जी उद्योग धंधे लगा रहे हैं, स्वामी जी चुनाव लड़ रहे हैं, स्वामी जी मंत्री भी हैं।ऐसे लोगों के पर्दे के पीछे के भी बहुत सारे अच्छे बुरे आचरण देखने सुनने को मिलते हैं।ये सब गंभीर चिंता के बिषय हैं ।

       इनकी दृष्टि में  क्या सारे पापों का कारण पत्नी ही होती है?केवल विवाहिता पत्नी का परित्याग करके या अविवाहित रह कर हर कुछ कर सकने का परमिट मिल जाता है इन्हें ?वो कितना भी बड़ा पाप ही क्यों न हो? मन पर नियंत्रण न करने पर कैसे विरक्तता संभव  है? साधुत्व के अपने अत्यंत कठोर नियम होते हैं उन्हें हर परिस्थिति में नहीं निभाया जा सकता है जबकि राजनीति हर परिस्थिति में निभानी पड़ती है। अपने सदाचारी तपस्वी संयमी जीवन से सारी समाज को ठीक रखने की जिम्मेदारी संतों की ही है।ऐसे में शास्त्रों एवं संतों की गरिमा रक्षा के लिए शास्त्रीय विरक्त संतों को ही आगे आकर यह शुद्धीकरण करना होगा। साथ ही तथाकथित बाबाओं  पर लगाम कैसे लगे?यह संतों को ही सोचना होगा।जो धार्मिक व्यवसायी लोग कहते हैं कि हमारा गुरुमंत्र जपो सारे पाप नष्ट हो जाएँगे इसका मतलब क्या यह नहीं निकाला जा सकता है कि ये पाप करने का परमिट बाँट रहे हैं ?कितना अभद्र है यह बयान ?         
     जैसे स्वामी जी के किसी प्रवचन में एक पति पत्नी सतसंग करने गए थे पैसे पास नहीं थे काम धाम चलता नहीं था।सोचा चलो सतसंग से ही शांति मिलेगी। वहॉं जाकर सजे धजे मजनूँ टाइप के बाबा को मुख मटका मटका कर नाचते गाते बजाते या या तथा कथित प्रवंचन करते देखा, बहुत सारा सोना पहने बाबाजी और बहुत सारा ताम झाम देखकर उसने सोचा बाबाजी का भी कोई उद्योग धंधा तो है नहीं ,बाबा जी ने  समझादारी से काम लिया है।इस देश  की जनता धर्म केवल सुनना चाहती है सुनाओ दिखाओ अच्छा अच्छा करो चाहे कुछ भी! जो इस देश की जनता को पहचान सका उसने पेट हिलाकर पैसे बना लिए कौन पूछता है कि बाबाजी योग के विषय में आप खुद क्या जानते हैं?बाबाजी को धर्म की बात बताना आता है करते चाहें जो कुछ भी हों इस पर जनता का ध्यान नहीं जाता है। जब बाबाजी का भी कोई उद्योग धंधा तो है नहीं तो बाबा जी ने भी कुछ किया नहीं तो धन आया कहॉं से?आखिर जनता को भी पता है।वैसे भी जो लोग हमारा पेमेंट नहीं देते वो बाबा जी को फ्री में क्यों दे देगें?अब मैं भी वही करूँगा और उसने भी बाबा बनने की ठानी इसप्रकार वह भी अच्छा खासा अपराधी बन गया।क्योंकि अब उसका लक्ष्य धन कमाना ही हो गया था।इसी प्रकार तथाकथित सतसंगों के कई और भी कुसंग होते हैं। इसी जगह यदि किसी चरित्रवान संत का संग होता है तो कई जन्म के कुसंगों का दोष  नष्ट भी हो जाता है किन्तु ऐसे कुसंगों के कारण ही बसों में बलात्कार हो रहे हैं।यदि इन्हें सत्संग माना जाए तो बढ़ रही सतसंगों की भीड़ें आखिर 
सतसंगों से सीख क्या रही हैं ?अपराधों का ग्राफ दिनों दिन बढ़ता जा रहा है इसका कारण आखिर क्या है ?
     इसी प्रकार नेताओं की एक बार की चुनावी विजय के बाद हजारों रूपए के नेता करोड़ों अरबों में खेलने लगते हैं।इन्हें देखकर भी लोग सतसंगी लोगों की तरह ही बहुत बड़ी संख्या में प्रेरित होते हैं।ईश्वर भक्त संतों एवं देश भक्त नेताओं के दर्शन दिनों दिन दुर्लभ होते जा रहे हैं।बाकी राजनेताओं की बिना किसी बड़े व्यवसाय के दिनदूनी रात चैगुनी बढ़ती संपत्ति सहित सब सुख सुविधाएँ  बढ़ते अपराधों की ओर मुड़ते युवकों के लिए संजीवनी साबित हो रही हैं ।

राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान की सेवाएँ 

यदि आप ऐसे किसी बनावटी आत्मज्ञानी, बनावटी ब्रह्मज्ञानी, ढोंगी,बनावटी तान्त्रिक,बनावटी ज्योतिषी, योगी उपदेशक या तथाकथित साधक आदि के बुने जाल में फँसाए जा  चुके हैं तो आप हमारे यहाँ कर सकते हैं संपर्क और ले सकते हैं उचित परामर्श ।

       कई बार तो ऐसा होता है कि एक से छूटने के चक्कर में दूसरे के पास जाते हैं वहाँ और अधिक फँसा लिए जाते हैं। आप अपनी बात किसी से कहना नहीं चाहते। इन्हें छोड़ने में आपको डर लगता है या उन्होंने तमाम दिव्य शक्तियों का भय देकर आपको डरा रखा है।जिससे आपको  बहम हो रहा है। ऐसे में आप हमारे संस्थान में फोन करके उचित परामर्श ले सकते हैं। जिसके लिए आपको सामान्य शुल्क संस्थान संचालन के लिए देनी पड़ती है। जो आजीवन सदस्यता, वार्षिक सदस्यता या तात्कालिक शुल्क  के रूप में  देनी होगी, जो शास्त्र  से संबंधित किसी भी प्रकार के प्रश्नोत्तर करने का अधिकार प्रदान करेगी। आप चाहें तो आपके प्रश्न गुप्त रखे जा सकते हैं। हमारे संस्थान का प्रमुख लक्ष्य है आपको अपनेपन के अनुभव के साथ आपका दुख घटाना,बाँटना  और सही जानकारी देना।


 

धर्म में डालडा मत मिलाओ Dr.S.N.Vajpayee

  अशास्त्रीय बाबा एवं सेवाभाव विहीन नेता एक जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं !

   आधुनिक बाबाओं एवं आधुनिक नेताओं की भ्रामक गतिविधियों पर सरकारी स्तर पर निगरानी रखी जानी चाहिए| 

     इन्हें धन की आवश्यकता क्यों है ?और यदि इनके जीवन का  वास्तविक लक्ष्य धन कमाना ही था तो आम आदमी की तरह परिश्रम पूर्वक भी कमा सकते थे योग का ढोंग या जनसेवा का ढोंग करने की क्या जरुरत थी? इसके लिए  इन्हें नेता  और बाबा बनने की आवश्यकता ही क्या थी? हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि  जो लोग  धर्म एवं राजनीति से अपराध पूर्वक धन इकठ्ठा कर हैं और इसके बाद ये लोग शुरू करते हैं ऐय्यासी!

    इस प्रकार से नेताओं एवं  बाबाओं की बासना का शिकार महिलाएँ या लड़कियाँ शुरू में इनके दिए हुए  लालच में फँस जाती हैं किन्तु नेता और बाबा लोग सच तो बोलते नहीं हैं इसलिए शिकार हुई महिलाओं को देर सबेर पता लग ही जाता है कि उनके साथ धोखा हुआ है तब तक देर हो चुकी होती है!

    आजकल देश के प्रसिद्ध एक बाबा के ऊपर ऐसे  ही आरोप लग रहे हैं जिसमें एक लड़की ने आरोप लगाया है कि उसके साथ बाबा जी ने सन २००१ से सन २००७ तक अपने अलग अलग आश्रमों में अलग अलग समयों पर कई बार बलात्कार किए हैं !अरे! जहाँ संदेह हो गया था वहाँ इतने दिन तक रुकना ही नहीं चाहिए था !किन्तु रही होंगी कुछ मजबूरियाँ!

    खैर आवश्यक है कि कलियुगी बाबाओं एवं कलियुगी नेताओं दोनों पर ही कठोर नियंत्रण किया जाए दोनों ही समुदाय देश की मर्यादाओं को तार तार करने में लगे हुए हैं बिगत कुछ वर्षों से दोनों ने समाज को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी हुई है! नेताओं ने देश को और बाबाओं  ने धर्म को लाकर चौराहे पर खडा कर दिया है जब तक इनकी गतिविधियों पर नियंत्रण  नहीं किया जाता तब तक कितना भी कठोर कानून क्यों न बना लिया जाए अपराध घट नहीं सकते  क्योंकि सारा अपराधी इन्हीं दोनों से संरक्षित है नेताओं को कोठी और काम के लिए एवं बाबाओं को आश्रमों के लिए दूसरों की जमीनों पर बलपूर्वक  कब्जे करने होते हैं इस काम में दोनों को ही अपराधियों की मदद की शक्त जरुरत होती है|अपराधी इनका साथ इसलिए देते हैं कि कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा एक नेता है इसलिए! दूसरा बाबा है इसलिए बड़े बड़े मंत्रियों से सम्बन्ध हैं! पैसे नेताओं एवं बाबाओं दोनों के पास होते ही हैं इस प्रकार से नेताओं एवं बाबाओं के सान्निध्य में रहने के कारण इन्हीं दोनों से  अपराधियों की सारी आवश्यकाएँ पूरी होती रहती हैं ये करते रहते हैं अपराध! ऐसे  में क्या कर लेगी कानून की कठोरता ? 

     इन दोनों समुदायों से जुड़े दुष्कर्मियों  के कारण ही समाज का  भरोसा आज दोनों से ही  बुरी तरह  टूटा है दोनों ने समाज के साथ गद्दारी की है दोनों ने समाज को धोखा दिया है! शारीरिक सुरक्षा एवं सुविधाओं के लिए समाज राजनेताओं की ओर देखता है इसीप्रकार  मानसिक सुख सुविधाओं  सात्विकता आदि के लिए बाबाओं की ओर देखता है दोनों से  दोनों प्रकार का सहयोग लेने के लिए दोनों को टैक्स देता है समाज! बात और है कि नेताओं का टैक्स घोषित होता है तो बाबाओं का अघोषित!अन्यथा  नेताओं या बाबाओं  के पास बिना कमाए इतना अधिक पैसा आता कहाँ से है ?

     आधुनिक बाबाओं और नेताओं में बहुत सारी समानताएँ  होती हैं स्वयं देखिए -बिना किसी परिश्रम के सुख सुविधा पूर्ण जीवन जीने के लिए बड़ी बड़ी रैलियाँ करके धन कमाना दोनों को बहुत पसंद है रैलियों में केवल भाव विहीन भाषण होते हैं इनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं होता है |जैसे -





यदि आप धार्मिक भाषण दे कर लूटते हैं तो महात्मा !
यदिआप राजनैतिक भाषण दे कर लूटते हैं तो नेता !! 

   यदि  आप मंच पर प्रेम पूर्वक किसी की आलोचना करते हैं तो  महात्मा !
यदि  आप मंच पर क्रोध पूर्वक किसी की आलोचना करते हैं तो  नेता !

जो वेद शास्त्रों की दुहाई देकर जनता को झकझोरते हैं वे महात्मा!
जो संबिधान की दुहाई देकर जनता को झकझोरते हैं वे नेता !

जो ईश्वर भक्ति की दुहाई दें वे महात्मा!
जो देश भक्ति की दुहाई दें वे नेता !!

 जो परलोक का भय देकर लूटें वे महात्मा!
 जो इस लोक का भय देकर लूटें वे नेता !

 जो शिष्य बनाकर  जनता को जोड़ें वो महात्मा !
जो सदस्य बनाकर   जनता को जोड़ें वो नेता !
     
      जो लाल वर्दी पहन लेते हैं तो महात्मा !
      जो सफेद वर्दी पहनते हैं तो नेता!

   जो ईश्वर भक्ति की बात करते हैं तो महात्मा!
   जो देश   भक्ति  की  बात  करते हैं तो नेता !


    सबसे पहली बड़ी समानता यह कि दोनों के हाथ पैर दुरुस्त शरीर स्वस्थ होने पर भी दोनों बिना मेहनत के पराई कमाई खाने, सेहत बनाने एवं दूसरे के धन के बल पर ही अपनी शौक शान पूरी करने वाले होते हैं।  जैसे रैलियों के शौक़ीन दोनों होते  हैं।
      आधुनिक नेता हों या महात्मा दोनों को मीडिया बनाता है और मीडिया ही नष्ट कर देता है। 
        अक्सर जब महात्मा फँसता है तो नेता उसकी वकालत करने लगते हैं इसीप्रकार से नेता फँसता है तो महात्मा लोग उसकी वकालत करने लगते हैं क्योंकि दोनों की पोल दोनों के पास दबी होती है इसीप्रकार दोनों अपने अपने अनुयायी एक दूसरे के पीछे लगाए रहते हैं।दोनों के खाने से शौच जाने तक का खर्च आम जनता बहन करती है नेता इतिहास की कहानियाँ सुनाकर जनता का यह लोक ठीक करने की बात करते  हैं इसीप्रकार से महात्मा लोग पुराणों की कथाएँ सुनाकर जनता का पर लोक ठीक करने का सपना दिखाते हैं। नेता जब खूब धन कमा लेता है फिर एकांत में शांति में कुटिया बना लेता है ताकि इसका भी आनंद लेता रहे इसीप्रकार पापी महात्मा अपना पाप एवं अपनी पाप की कमाई छिपाने के लिए राजनैतिक दखल बनाने लगते हैं।महात्मा जब अपने किसी गुप्त पाप से भयभीत होता है तो राजनैतिक ताकत तैयार करता है।इसीप्रकार नेता बदनाम होता है तो संन्यास लेने की बात करता है अभी भी एक बन्दर  बाबा हैं जो अभी तक पेट दिखाकर पैसे माँगता था अब भय  है कि पाप की कमाई कहीं कोई छीन न ले जाए इस लिए अब लोक सभा की तीन सौ सीटें जेब में  लिए घूम रहा है एक राष्ट्रीय पार्टी के प्रत्याशी को प्रधान मंत्री बनाने के लिए !आखिर ये सब क्या है ?
  
   दोनों ही अपनी अच्छी बुरी कैसी भी बात को समाज पर जबरदस्ती थोपने के लिए भीड़ का सहारा लेते  हैं ।भीड़ को बुलाया तो कुछ और समझा करके जाता है, भाषण किसी और बात के दिए जा रहे होते हैं, उद्देश्य  कुछ और होता है,परिणाम कुछ और होता है।      
     इसीप्रकार रैली में सम्मिलित होने वाले लोग भी समझने कुछ और आते हैं किंतु समझकर कुछ और चले जाते हैं।जहॉं तक भीड़ की बात है। भीड़ तो पैसे देकर भी इकट्ठी की जा रही है वो समाज का प्रतिनिधित्व तो नहीं कर सकती।
    जो पैसे देकर भीड़ बुलाएगा वो भीड़ से ही पैसे कमाएगा भी। तो राजनीति या धर्म में भ्रष्टाचार  होगा ही। किसी भी प्रकार का आरक्षण या छूट के लालची लोग अथवा कर्जा माफ करवाने के शौकीन लोग भ्रष्ट नेताओं को जन्म देते  हैं।इसी प्रकार बहुत सारा पापकरके  पापों से मुक्ति चाहने वाले चतुर लोग ही भ्रष्ट बाबाओं को जन्म देते हैं।ऐसी परिस्थिति में धर्म और राजनैतिक भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार आखिर कौन ?

      उसे पकड़े और सुधारे  बिना भ्रष्टाचार के विरुद्ध खोखले नारे लगाने, नेताओं की तथाकथित पोल खोलने से कुछ नहीं होगा।जब तक भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट बाबाओं के विरुद्ध संयुक्त जनजागरण अभियान नहीं चलाया जाएगा।तब तक इसे मिटा पाना संभव नहीं है,क्योंकि भ्रष्टाचार सोचा मन से और किया तन से जाता है।सोच पर लगाम लगाने के लिए धर्म एवं उसकी क्रिया पर लगाम लगाने के लिए कानून होता है।धर्म तो धार्मिक लोगों के आधीन एवं कानून नेताओं के आधीन हो गया है। ऐसे में किसी एक पर लगाम लगाने पर भी अपराध पर अधूरा नियंत्रण हो पाएगा जो उचित नहीं है।
     नेता और तथाकथित संतों में बहुत सारी समानताएँ  होती हैं इन संतों के पास ईश्वर भक्ति नहीं होती है। इन नेताओं में देश  भक्ति नहीं होती है।दोंनों अपने  अनुयायिओं की भीड़ के बल पर फूलते हैं। भीड़ देखकर दोनों  ही पागल हो जाते हैं चाहें वह किराए की ही हो।अनाप सनाप कुछ भी बोलने बकने लगते हैं।दोनों को लगता है कि सारा देश  उनके पीछे ही खड़ा है।दोनों की गिद्धदृष्टि  पराई संपत्ति सहित पराई सारी चीजों को भोगने की होती है।दोनों वेष  भूषा  का पूरा ध्यान रखते हैं एक नेताओं की तरह दिखने की  दूसरा महात्माओं की तरह दिखने की पूरी कोशिश   करता है। दोनों रैलियॉं करने के आदी होते हैं।दोनों मीडिया प्रेमी होते हैं इसलिए पैसे देकर भी दोनों टी.वी.टूबी पर खूब बोलते हैं।बातों में दम हो न हो पैसे का दम जरूर दिखता है पैसे के ही बल पर बोलते हैं। नेता जब भ्रष्ट  होता है तो कहता कि यदि ये आरोप सही साबित हुए तो संन्यास ले लूँ गा।जैसे उसे पता हो कि भ्रष्ट लोग ही संन्यासी होते हैं।मजे की बात यह है कि संन्यासी चुप करके सुना करते हैं कोई विरोध दिखाई सुनाई नहीं पड़ता।मानो पोलखुलने के भय से संन्यासी भयभीत हों कि कहीं कोई पोल न खुल जाए।इसी प्रकार कोई संन्यासी भ्रष्टहोता है तो नेता बन जाता है।क्योंकि   बिना पैसे ,बिना परिश्रम और बिना जिम्मेदारी के उत्तमोत्तम सुख सुविधाओं का भोग इन्हीं दो जगहों पर संभव है।   

      इसप्रकार धार्मिक लोगों की गतिविधियों को भी शास्त्रीय संविधान की सीमाओं के दायरे में बॉंधकर रखने की भी कोई तो सीमा रेखा होनी ही चाहिए। स्वामी जी रैलियॉं कर रहे हैं, आज स्वामी जी साड़ी बॉंट रहे हैं।स्वामी जी स्वदेशी  के नाम पर सब कुछ बेच रहे हैं , स्वामी जी उद्योग धंधे लगा रहे हैं, स्वामी जी चुनाव लड़ रहे हैं, स्वामी जी मंत्री भी हैं।ऐसे लोगों के पर्दे के पीछे के भी बहुत सारे अच्छे बुरे आचरण देखने सुनने को मिलते हैं।ये सब गंभीर चिंता के बिषय हैं ।

       इनकी दृष्टि में  क्या सारे पापों का कारण पत्नी ही होती है?केवल विवाहिता पत्नी का परित्याग करके या अविवाहित रह कर हर कुछ कर सकने का परमिट मिल जाता है इन्हें ?वो कितना भी बड़ा पाप ही क्यों न हो? मन पर नियंत्रण न करने पर कैसे विरक्तता संभव  है? साधुत्व के अपने अत्यंत कठोर नियम होते हैं उन्हें हर परिस्थिति में नहीं निभाया जा सकता है जबकि राजनीति हर परिस्थिति में निभानी पड़ती है। अपने सदाचारी तपस्वी संयमी जीवन से सारी समाज को ठीक रखने की जिम्मेदारी संतों की ही है।ऐसे में शास्त्रों एवं संतों की गरिमा रक्षा के लिए शास्त्रीय विरक्त संतों को ही आगे आकर यह शुद्धीकरण करना होगा। साथ ही तथाकथित बाबाओं  पर लगाम कैसे लगे?यह संतों को ही सोचना होगा।जो धार्मिक व्यवसायी लोग कहते हैं कि हमारा गुरुमंत्र जपो सारे पाप नष्ट हो जाएँगे इसका मतलब क्या यह नहीं निकाला जा सकता है कि ये पाप करने का परमिट बाँट रहे हैं ?कितना अभद्र है यह बयान ?         
     जैसे स्वामी जी के किसी प्रवचन में एक पति पत्नी सतसंग करने गए थे पैसे पास नहीं थे काम धाम चलता नहीं था।सोचा चलो सतसंग से ही शांति मिलेगी। वहॉं जाकर सजे धजे मजनूँ टाइप के बाबा को मुख मटका मटका कर नाचते गाते बजाते या या तथा कथित प्रवंचन करते देखा, बहुत सारा सोना पहने बाबाजी और बहुत सारा ताम झाम देखकर उसने सोचा बाबाजी का भी कोई उद्योग धंधा तो है नहीं ,बाबा जी ने  समझादारी से काम लिया है।इस देश  की जनता धर्म केवल सुनना चाहती है सुनाओ दिखाओ अच्छा अच्छा करो चाहे कुछ भी! जो इस देश की जनता को पहचान सका उसने पेट हिलाकर पैसे बना लिए कौन पूछता है कि बाबाजी योग के विषय में आप खुद क्या जानते हैं?बाबाजी को धर्म की बात बताना आता है करते चाहें जो कुछ भी हों इस पर जनता का ध्यान नहीं जाता है। जब बाबाजी का भी कोई उद्योग धंधा तो है नहीं तो बाबा जी ने भी कुछ किया नहीं तो धन आया कहॉं से?आखिर जनता को भी पता है।वैसे भी जो लोग हमारा पेमेंट नहीं देते वो बाबा जी को फ्री में क्यों दे देगें?अब मैं भी वही करूँगा और उसने भी बाबा बनने की ठानी इसप्रकार वह भी अच्छा खासा अपराधी बन गया।क्योंकि अब उसका लक्ष्य धन कमाना ही हो गया था।इसी प्रकार तथाकथित सतसंगों के कई और भी कुसंग होते हैं। इसी जगह यदि किसी चरित्रवान संत का संग होता है तो कई जन्म के कुसंगों का दोष  नष्ट भी हो जाता है किन्तु ऐसे कुसंगों के कारण ही बसों में बलात्कार हो रहे हैं।यदि इन्हें सत्संग माना जाए तो बढ़ रही सतसंगों की भीड़ें आखिर 
सतसंगों से सीख क्या रही हैं ?अपराधों का ग्राफ दिनों दिन बढ़ता जा रहा है इसका कारण आखिर क्या है ?
     इसी प्रकार नेताओं की एक बार की चुनावी विजय के बाद हजारों रूपए के नेता करोड़ों अरबों में खेलने लगते हैं।इन्हें देखकर भी लोग सतसंगी लोगों की तरह ही बहुत बड़ी संख्या में प्रेरित होते हैं।ईश्वर भक्त संतों एवं देश भक्त नेताओं के दर्शन दिनों दिन दुर्लभ होते जा रहे हैं।बाकी राजनेताओं की बिना किसी बड़े व्यवसाय के दिनदूनी रात चैगुनी बढ़ती संपत्ति सहित सब सुख सुविधाएँ  बढ़ते अपराधों की ओर मुड़ते युवकों के लिए संजीवनी साबित हो रही हैं ।

राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान की सेवाएँ 

यदि आप ऐसे किसी बनावटी आत्मज्ञानी, बनावटी ब्रह्मज्ञानी, ढोंगी,बनावटी तान्त्रिक,बनावटी ज्योतिषी, योगी उपदेशक या तथाकथित साधक आदि के बुने जाल में फँसाए जा  चुके हैं तो आप हमारे यहाँ कर सकते हैं संपर्क और ले सकते हैं उचित परामर्श ।

       कई बार तो ऐसा होता है कि एक से छूटने के चक्कर में दूसरे के पास जाते हैं वहाँ और अधिक फँसा लिए जाते हैं। आप अपनी बात किसी से कहना नहीं चाहते। इन्हें छोड़ने में आपको डर लगता है या उन्होंने तमाम दिव्य शक्तियों का भय देकर आपको डरा रखा है।जिससे आपको  बहम हो रहा है। ऐसे में आप हमारे संस्थान में फोन करके उचित परामर्श ले सकते हैं। जिसके लिए आपको सामान्य शुल्क संस्थान संचालन के लिए देनी पड़ती है। जो आजीवन सदस्यता, वार्षिक सदस्यता या तात्कालिक शुल्क  के रूप में  देनी होगी, जो शास्त्र  से संबंधित किसी भी प्रकार के प्रश्नोत्तर करने का अधिकार प्रदान करेगी। आप चाहें तो आपके प्रश्न गुप्त रखे जा सकते हैं। हमारे संस्थान का प्रमुख लक्ष्य है आपको अपनेपन के अनुभव के साथ आपका दुख घटाना,बाँटना  और सही जानकारी देना।


 

Wednesday, October 2, 2013

दुर्गा सप्तशती को घर घर और जन जन तक पहुँचाने की पवित्र पहल में आप भी सहभागी बनें-

  आप सभी स्वजनों को मंगलमय प्रभात के  शुभ अवसर पर अनंतानंत शुभ कामनाएँ !
माता दुर्गा के उपासकों के लिए आवश्यक सूचना -
   जो संस्कृत भाषा में दुर्गा  सप्तशती नहीं पढ़ सकते हैं वो अब हिंदी भाषा दोहा चौपाई में सुन्दर काण्ड की तरह पढ़ें -
अयोध्या में श्री राममंदिर निर्माण के लिए शुभ समय और ज्योतिष-(19.6.2014 से प्रारम्भ होकर 14.7.2015 तक) see  more...http://snvajpayee.blogspot.in/2013/08/blog-post_24.html
      माता दुर्गा प्रातः काल का प्रणाम निवेदित करते हुए असंख्य मंगल कामनाएँ !इस  परम पवित्र अवसर पर  भगवती दुर्गा के उपासक आप सभी सुधी साधकों को बहुत बहुत बधाई ! माता दुर्गा सपरिवार  आप सभी  को उत्तम स्वास्थ्य एवं धनधान्य से पूर्ण करें- साथ ही समस्त समाज,देश एवं समस्त चराचर जगत के लिए मंगल कामना-                              
निवेदक -                                                                  
              राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोधसंस्थान    
  इस परं पवित्र नवरात्र पर्व के शुभ अवसर पर अत्यंत  आत्मीय और प्रेरक सन्देश .....
  अब दुर्गासप्तशती आदि भी रामचरितमानस एवं सुंदरकांड की ही  तरह हिंदी दोहा चौपाई में पढ़िए राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोधसंस्थान की ओर से  शास्त्रीय ज्ञानविज्ञान  को घर घर जन जन तक पहुँचाने की पवित्र पहल में  आप भी सहयोगी बनें-

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दुर्गा सप्तशती की पुस्तक संस्कृत भाषा  में होने के कारण बड़े  यज्ञ यागादि  तो वैदिक ब्राह्मणों से कराने  ही होते रहे हैं।जो लोग संस्कृत भाषा में दुर्गा सप्तशती नहीं पढ़ पाते हैं उनकी सुविधा के लिएअब

            राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोधसंस्थान  से 

     उसी दुर्गा सप्तशती ग्रंथ का  हिंदी दोहा चौपाई में प्रमाणित अनुवाद किया गया है इसे अब आसानीपूर्वक सुंदरकांड  या राम चरित मानस की तरह  हिंदी कविता में अकेले या कुछ लोगों के समूह में बैठ कर  बिना संगीत या संगीत के द्वारा भी पढ़ा जा सकता है।

    समाज में जो अपराध की भावना बड़ी है उसी कारण से प्राकृतिक विप्लव कहीं बाढ़, कहीं सूखा,भूकंप आदि के द्वारा भारी नरसंहार के भयावह दृश्य देखने को मिल रहे हैं।इसीप्रकार से बम विस्फोट, आतंकवाद,  महामारी आदि सामूहिक या पारिवारिक विपदाओं से बचने के लिए अभी भी सँभलने का समय है। ऐसे में दुर्गा जी की आराधना ही एक मात्र सरल उपाय है जो कोई संस्कृत भाषा में न पढ़ सके उसे  हमारे संस्थान से प्रकाशित दुर्गा सप्तशती की इस सबसे अधिक प्रमाणित पुस्तक से ही पाठ करना  चाहिए,यह सबसे सरल और प्रमाणित उपाय है।

       कुछ लोगों ने पहले भी इस पुस्तक को या दुर्गा जी की और भी ऐसी पुस्तकें अपनी अपनी भाषा शैली में श्रृद्धापूर्वक लिखने के प्रयास किए हैं।उनमें जो कमियाँ छूट गई हैं उन्हें पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है। 

      पहली बात उनमें भाषा की गलतियाँ देखी गई हैं दूसरी बात किताब को सरल बनाने के लिए बहुत विषय छोड़ दिया गया है वो छोटी छोटी पतली पतली पुस्तकें पढ़ने में आसान ज़रूर हैं,किन्तु खंडित होने के कारण उन्हें पढ़ने का लाभ क्या है?वो प्रचलित पुस्तकें कितनी प्रमाणित हैं इसकी तुलना आप गीता प्रेस की प्रमाणित पुस्तक को देखकर स्वयं भी कर सकते हैं। 

    तीसरी बात यह है कि उनमें से कुछ पुस्तकों में लेखक लोगों ने हर पेज में अपनी फोटो एवं हर लाइन में अपना नाम डाल रखा है।यह विधा इसलिए ठीक नहीं है कि पाठ करने वाला लेखक की नहीं अपितु दुर्गा माता की पूजा करना चाहता है इसलिए उस पाठ के बीच - बीच में लेखक की अपनी फोटो एवं हर लाइन में उसके नाम की  जरूरत क्या है और इससे पाठ भी खंडित होता है जिससे करने वाले को दोष तो लगता ही होगा !

      ऐसे लोगों ने रद्दी कागज में घटिया टाइटल लगाकर केवल पैसे कमाने के लिए कमजोर किताबें बनाई हैं ताकि जल्दी फट जाएँ और उनकी नई किताबें बिक सकें!

       इन सबसे ऊपर उठकर मैंने सोचा कि फिल्मी मैग्जीनें तो अच्छे अच्छे कागजों और कवर में छापी बनाई जाती हैं जबकि दुर्गा जी के साहित्य लिए ऐसी तुच्छ श्रृद्धा !इसलिए मैंने सबसे महँगी लागत लगाकर किताब बनाई है आखिर जगत जननी माता दुर्गा के प्रति आस्था विश्वास का सवाल है । हम माता के सम्मान एवं प्रामाणिकता के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं कर सकते,शास्त्रीय ज्ञान विज्ञान के साथ समझौता करना अपने स्वभाव में ही नहीं है !

       बहुत से बुक सेलरों ने हमारी पुस्तकों को बेचने से इसलिए मना कर दिया है कि उन्हें कमीशन कम मिलता है यदि हम किताबों की क्वालिटी घटा दें तो उनका कमीशन बढ़ जाए!बंधुओं,आज भी  तीस प्रतिशत कमीशन देकर हम लगभग लागत दाम पर उन्हें पुस्तकें उपलब्ध करवाते हैं फिर भी उन्हें संतोष नहीं हो रहा है,किताबों की क्वालिटी घटाने का हम पर दबाव बना रहे हैं।  

     बंधुओं,इसी प्रकार के कुछ लोगों के विरोधी विचारों से मैं आहत हूँ,महँगे महँगे विज्ञापन दे पाना अपने बस का नहीं है अतएव आप सभी दुर्गा जी के भक्तों से निवेदन है कि आप हमारे संस्थान के इस तरह के कार्यक्रमों में सहयोग करने के लिए आगे आएँ और आम जनता से सीधे जुड़ने में हमारा  कृपा पूर्ण सहयोग करें आप अपनी श्रृद्धा एवं शक्ति के अनुशार हमारा आर्थिकादि सहयोग की आपसे भी अपेक्षा है ।यदि उचित समझें तो इस पवित्र कार्य के लिए आप अन्य लोगों को भी प्रेरित कर सकते हैं |लागत मूल्य पर ये पुस्तकें संस्थान से खरीद कर भक्तों को बाँटने के लिए भी लोगों को प्रेरित किया जा सकता है |

        इस प्रकार की पाँच पुस्तकों के सेट हमारे यहाँ बनाए गए हैं जो हमारे एकाउंट में पैसे जमा करवाकर डाक द्वारा ये पुस्तकें संस्थान से भी मँगवा सकते हैं।

      हमारा अभियान केवल इतना ही नहीं अपितु जन जन तक शास्त्रीय ज्ञान विज्ञान को पहुँचाना है सनातन धर्म के समस्त श्रृद्धालुओं से मेरी प्रार्थना है कि इस अत्यंत पवित्र कार्य में आप भी हमारे सहयोगी बनें।

        वैसे भी पुराणों में कहा गया है कि कोई भी  व्यक्ति जब तक प्रतिदिन भगवती दुर्गा की पूजा नहीं करता तब तक वह और कितने भी प्रकार के दूसरे  पुण्य कर्म क्यों न कर ले किन्तु  उनका कोई फल नहीं मिलता है अपितु  भगवती दुर्गा  स्वयं उन सारे पुण्यों को भस्म कर देती हैं। जैसे -

     यो न पूजयते नित्यं चण्डिकां भक्त वत्सलाम् ।

     भस्मी कृत्यास्य  पुण्यानि निर्दहेत् परमेश्वरी ।।

                                                                 -पुराण 

      इसलिए भगवती दुर्गा की आराधना हर किसी को प्रतिदिन करनी चाहिए साथ ही हर घर में प्रतिदिन होनी चाहिए।हर गाँव, नगर ,समाज,शहर ,देश आदि में सामूहिक रूप से की जानी चाहिए। मंदिरों के पंडित पुजारियों को चाहिए कि वे इस पूजन विधान को प्रतिदिन करें । इससे उस क्षेत्र में रहने वालों को कभी किसी प्रकार के संकट का सामना नहीं करना पड़ता है। इससे सामाजिक दुष्प्रवृत्तियाँ एवं विप्लव आदि रोकने में विशेष सहयोग मिलेगा।

    जैसे किसी दुर्घटना के घटने पर सरकार राहत सामग्री पहुँचाती है साथ ही सहयोग राशि देती है किन्तु सरकार हो या संसार का कोई और दूसरा व्यक्ति हो किन्तु कोई दुर्घटना घटने के बाद ही उसके विषय में सबको पता लगता है किन्तु दुर्गा जी की आराधना तो कोई दुर्घटना घटने ही नहीं देती है।इसलिए जीवन में सभी प्रकार की सुख शांति समृद्धि  पूर्वक जीने के लिए  क्यों न दुर्गा जी की ही आराधना की जाए ! 

       इसके लिए दुर्गा सप्तशती एवं नवदुर्गा स्तुति हमारे संस्थान से प्रकाशित हैं इनका पाठ अधिक से अधिक करना चाहिए।इसमें खर्च की समस्या भी बहुत कम होती है क्योंकि किसी बाबा ,पंडित, पुजारी आदि से इसका पाठ नहीं कराना पड़ता है आप स्वयं इसका पाठ कर सकते हैं।   

      चूँकि संस्कृत की दुर्गा सप्तशती की पुस्तक कठिन है संस्कृत  विद्वानों के अलावा और कोई इसका पाठ नहीं कर सकेगा। अशुद्ध पाठ करना नहीं चाहिए। धन की कमी के कारण हर कोई विद्वान् ब्राह्मणों से इसका पाठ करा नहीं सकता।उसके लिए ज्यादा धन की आवश्यकता होती है।

      वैसे भी पूजापाठ स्वयं करना ही अधिक श्रेयस्कर रहता है, उससे पुण्यलाभ के साथ साथ संस्कार भी सुधरते हैं । इसलिए समाज की सुविधा को ध्यान में रखते हुए ही संस्कृत दुर्गा सप्तशती का हिन्दी कविता अर्थात दोहा चौपाई में अनुवाद किया गया है।

      दुर्गा जी की पूजा सामूहिक रूप से की जाए तो बहुत ज्यादा प्रभावी होगी।आप अपने नाते रिश्तेदारों तथा हेती व्यवहारियों को एवं समाज के विभिन्न वर्ग के लोगों को साथ जोड़कर सामूहिक पाठ का आयोजन कर सकते हैं, न अधिक संभव हो तो यह आयोजन वर्ष में एक बार तो हर कहीं किया ही जा सकता है और करना भी चाहिए । यह तो धर्म, पुण्य एवं जनहित का काम है,इसलिए तन मन धन से प्रसन्नता पूर्वक करना ही चाहिए।ऐसा करने के लिए अन्य लोगों को भी प्रेरित करना चाहिए।हमारे संस्थान से लागत दाम पर दुर्गा सप्तशती आदि लेकर उन लोगों को बाँटनी चाहिए जो इन्हें पढ़ने  की रूचि रखते हों । लोगों को सामूहिक पाठ करने या करवाने के लिए प्रेरित भी करना चाहिए।

       हमारे संस्थान की ओर से इस प्रकार के कार्यक्रम अक्सर अलग अलग जगहों पर चलाए जाते रहते हैं उनमें सम्मिलित होने के लिए यदि आप धन का सहयोग करना चाहें तो आप हमारे संस्थान के पता एवं फोन नंबर पर संपर्क कर सकते हैं।  इस प्रकार के पवित्र प्रयास वाले पर भगवती दुर्गा असीम कृपा करती रहती  हैं ऐसे भक्त की सभी मनोकामनाएँ पूरी करती रहती हैं ।

      इससे एक अथवा अनेकों स्त्री-पुरुष आदि एक साथ बैठ कर स्वयं ही बड़ी आसानी से संयम पूर्वक हजारों पाठ करके शत चंडी यज्ञ, सहस्र चंडी यज्ञ  या इसीप्रकार लक्षचंडी यज्ञ भी आप स्वयं ही आम आदमी के सहयोग से कर सकते हैं। 

   शत चंडी यज्ञ के लिए आपको दुर्गा सप्तशती के सौ पाठ करने होते हैं,सहस्र चंडी यज्ञ में आपको दुर्गा सप्तशती के एक हजार पाठ करने होते हैं इसीप्रकार लक्षचंडी यज्ञ के लिए आपको दुर्गा सप्तशती के एक लाख पाठ करने होते हैं। दस पाँच या सैकड़ों स्त्री पुरुष इस पाठ में सम्मिलित किए जा सकते हैं वो जितने भी पाठ एक दिन में कर लें वो लिख ले इस प्रकार शत चंडी यज्ञ,सहस्र चंडी यज्ञ आदि कुछ भी आप स्वयं संपन्न कर सकते हैं।इसके लिए यदि किसी को कोई जानकारी लेनी तो बिना किसी हिचक के आप हमारे यहाँ फोन कर सकते हैं या फिर समय समय पर लगने वाले हमारे प्रशिक्षण शिविरों में भाग लेकर इस विषय की जानकारी समझ सकते हैं ।  

     नवदुर्गा स्तुतिःइसीप्रकार जिनके पास समय का अभाव है उनके लिए नवरात्र के अलग अलग दिनों में पढ़ने के लिए नव देवियों की नव स्तुतियॉं प्रमाणित रूप से हमारे श्री नवदुर्गा स्तुति नामक ग्रंथ में लिखी गई हैं। यह हमारे संस्थान से प्रकाशित है इसका पाठ अधिक से अधिक करना चाहिए। एक तो यह प्रमाणित है दूसरा रामचरित मानस की तरह ही इसका भी पाठ किया जा सकता है। तीसरी सुविधा यह है कि जिनके पास समय नहीं होता है उन्हें नवरात्र के प्रतिदिन भी दिनों के हिसाब से अर्थात नवरात्र के किस दिन में किस देवी का  पाठ कितना करना होता है ?यह जानकारी  भी सबिधि दी गई है। 

    इन्हें  प्राप्त करने के लिए अथवा किसी प्रकार की अन्य जानकारी के लिए आप हमारे राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोधसंस्थान  में बिना किसी हिचक के संपर्क कर सकते हैं | 

ठीक इसी प्रकार से

            अब पहली बार पढ़िए उसी सुन्दर काण्ड की तरह 

                      श्री हनुमत सुन्दर काण्ड

अब पढ़िए श्री हनुमत सुन्दर काण्ड बिलकुल अलग अलग    एवं  शास्त्रीय  शंका  समाधानों  सहित!

  राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोधसंस्थान 09811226973

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