Friday, November 15, 2013

      

चुनावों के समय किसी ऐतिहासिक, धार्मिक  या   

 

क्या  भारतीय राजनीति में बलिप्रथा अभी भी है 


      हमारे यहाँ भ्रष्टाचार न रुकने का का मुख्य कारण मुद्दों पर चुनावों का न होना है भावना प्रधान ऐतिहासिक धार्मिक आदि मुद्दे उठा कर जीत लिए जाते हैं पता नहीं राजनेताओं को क्यों लगता है कि 
        सतर्क रहो, होशियार रहो, जागते रहो!राजनेता बस्तियों में घुस आए हैं !!!
     जो नेता तुम्हें केवल रोटियों की गारंटी दे रहा है वह अपने लिए खीर पूड़ी की गारंटी आपसे ले रहा है !इनसे बच के सावधान होकर चलने की जरूरत है अन्यथा तुम्हें रोटियों के कुछ टुकड़े पकड़ाकर खुद  खीर पूड़ी लेकर भाग जाएँगे!वर्त्तमान राजनेता  बड़े ही शातिर लोग हैं इन्हें कुछ देना ही होता तो दस साल से सत्ता में थे तब क्यों नहीं दे दिया! तब क्यों नहीं लेकर आए भोजन गारंटी बिल ?झुट्ठे कहीं के !!! 
                                     डॉ.शेष नारायण वाजपेयी 
         संस्थापक -राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान
    
    घूस देकर सत्ता में  आने वाले नेताओं से न्याय की आशा ही नहीं करनी चाहिए !
      यदि हम अपना लालच नहीं रोक सकते तो नेताओं से ऐसी उम्मींद ही क्यों करते हैं कि वो अपना लालच रोक लेंगे !जो हमें जितने प्रतिशत आरक्षण या भोजन आदि जो कुछ भी देगा वह उससे दस गुना अधिक देश को नोचेगा यही अभी तक हो रहा है!इस नोचने को ही  भ्रष्टाचार कहते हैं इसकी जड़ में स्वयं हम लोग और हमारा लोभ ही है। जिसे हम नहीं रोक पा रहे हैं और देश को भ्रष्टाचार और अपराध के गर्त में धकेलते जा रहे हैं! आरक्षण पाने वालों के चेहरे आज भी मुरझाए हुए हैं किन्तु आरक्षण देने वाली बहन जी लोग तीन  तीन करोड़ के घाँघरे पहन कर ठेंगा दिखाती  घूम रही हैं कर ले कोई क्या करेगा ?
                                    डॉ.शेष नारायण वाजपेयी 
         संस्थापक -राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान

       देश के सारे लोग भिखारी हैं क्या ?
कोई भोजन की गारंटी दे रहा है कोई आरक्षण दे रहा है कोई और कुछ दे रहा है बेचारे राजनेता केवल कुछ न कुछ देने के लिए परेशान  हैं जनता को कुछ देने के लिए तो कई नेता लोग देने वाली लाइसेंसी टिकट न मिलने पर अपनी पैतृक पार्टियाँ छोड़ छोड़ कर  देने की टिकट देने वाली पार्टियों की पोशाकें पहन पहन कर उन्हीं की हाँ में हाँ मिलाते घूमने लगे हैं !
   देश की जनता चुनावों में देने की बात सुनते ही पागल हो उठती है उसी को सत्ता सौंप देती है जो कुछ देने की चिकनी चुपड़ी बातें कर लेता है ! यह सब देख सुन कर मैं तो यही कहूँगा कि देने वाले हों या लेने वाले ईश्वर दोनों की आत्मा को शान्ति दे!
   अब भी राष्ट्रवादी लोग फ्री में न किसी से कुछ लेना चाहते हैं न कुछ देना!वे लोग तो केवल अपने परिश्रम  का भरोसा करते हैं और ईश्वर की कृपा से स्वस्थ एवं सानंद रहते हैं माँगने वाले मँगता भी बन जाते हैं मिलता भी कुछ नहीं है लोग समझने भी भिखारी लगते हैं इसलिए इन नेताओं से कुछ भी माँगना बंद किया जाना चाहिए और इनसे कहा जाना चाहिए कि आप केवल राष्ट्र हित में काम कीजिए उसी में हम सभी प्रसन्न रहेंगे !
                            डॉ.शेष नारायण वाजपेयी 
         संस्थापक -राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान


       चुनावों के समय कुछ राजनैतिक दल या लोग आरक्षण देने लगते हैं कुछ माँगने लगते हैं जब तक ये माँगने और देने कि लत नहीं छूटेगी तब तक राजनैतिक शुद्धिकरण होने की सम्भावना ही नहीं दिखती है और न मिटते दिखता है भ्रष्टाचार न ही घटते दिखते हैं अपराध ! 
            डॉ.शेष नारायण वाजपेयी 
         संस्थापक -राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान

  जबकि पिछले चुनावों में जिन  नेता जी के एकाउंट में दो करोड़ रुपए थे वो इस चुनावों में दो सौ करोड़ हो जाते हैं लेकिन सेवा बेचारे जनता की करते हैं !धन्य हो -
डॉ.शेष नारायण वाजपेयी 
         संस्थापक -राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान
                                    क्या राजनीति में बलिप्रथा अभी भी चल रही है ?

    अक्सर आप देखते होंगे कि कोई पार्टी चुनावों में किसी धार्मिक महापुरुष के व्यक्तित्व की बलि देकर चुनाव जीत लेती है तो दूसरी पार्टी किसी व्यक्ति की बलिदेकर जीत लेती है चुनाव !कोई पार्टी अपने दल के किसी सुपूजित परिवार के बहु पूजित किसी सदस्य को ही धार पर लगा देती है!   इस प्रकार से हर चुनाव  में कोई न कोई बलि पशु किसी न किसी बाबा,नेता या नेता पुत्र के रूप में इन लोगों को मिल ही जाता है!जिसे चुनावों तक बहुत पूजते हैं उसकी हर बात सुनते मानते एवं समर्थन करते हैं बात बात में हाँ जी हाँ जी करते हैं चुनावों में उसके व्यक्तित्व की बलि दे दी जाती है इसके बाद दोनों हमेंशा हमेंशा के लिए शांत  हो जाते  हैं !
    ऐसे ही और भी भिन्न भिन्न सिद्धांतों की पार्टियाँ हैं जिनके बड़े बूढ़े कार्यकर्ता लोग भी अपना ज्ञान,गरिमा,शिक्षा ,उम्र,अनुभव आदि सारी मर्यादाएँ  भूल कर जिसकी ओर दंडवत लेटने,प्रणाम करने या जिसे देवी देवताओं की  तरह पूजने लगते हैं चुनावों में जीत दिलाने एवं सत्ता में बना रखने के लिए वह उनका अपना बलिपशु होता है जब तक उसका व्यक्तित्व या उसे मिटा नहीं देते हैं तब तक उसे बात बात में झाड़ पर चढ़ाए ही रहते हैं इस प्रकार से जब पार्टी की छबि घोटालों के कारण बहुत खराब हो जाती है तब इसी  बलि के बल पर चुनाव जीतने  में उन्हें  कोई खास दिक्कत नहीं उठानी पड़ती है। 
    इस प्रकार से ऐसी  पार्टियों  के कार्य कर्ता बेझिझक होकर  सत्ता  सुख भोगते रहते हैं । उन्होंने अपनी विजय का यही मूलमंत्र मान रखा  है।      

Monday, November 11, 2013

श्री हनुमत सुन्दर काण्ड

            अब पहली बार पढ़िए उसी सुन्दर काण्ड की तरह 

                      श्री हनुमत सुन्दर काण्ड

अब पढ़िए श्री हनुमत सुन्दर काण्ड बिलकुल अलग अलग    एवं  शास्त्रीय  शंका  समाधानों  सहित!

प्यार और पढाई कैसे हो सकती है एक साथ ?



       फाँसी की जगह सुसंस्कारों की आवश्यकता !किंतु दे कौन ?
    साधू संत साधना में व्यस्त हैं बाबा ब्यापार करने में मस्त है धार्मिक कथा क्षेत्र में नचैयों गवैयों ने कमान सँभाल रखी है शिक्षा में सेक्स एजुकेशन जैसी भावनाएँ भरने की तैयारी है फैशन डिजाइनर नंगा करने पर आमादा हैं फिल्में प्यार परोस रही हैं जवानी के पहले दिन से विवाह पर्यन्त मजबूरीबश समय पास करने के लिए बनाए गये सेक्स साथियों को प्रेमी प्रेमिका समझना और तकरार हो तो उन्हें बलात्कारी बताकर पुलिस प्रशासन को कोसने लगना ,और बलात्कारियों को फाँसी जैसी सजा का प्रावधान !किंतु फाँसी जैसी कठोर सजा पाने वाले बलात्कारियों की बहन ,बेटियाँ, पत्नी, पुत्री , माताओं जैसी महिलाओं की सुरक्षा के लिए आखिर क्या प्रबंध हैं ऐसे कानूनों में ?आखिर उनका दोष क्या होता है ?जबकि सबसे अधिक प्रताड़ना उन्हें सहनी पड़ती है !इसलिए कोई ऐसा रास्ता क्यों न खोज जाए जिससे ऐसी महिलाओं की भी हो सके सुरक्षा !


Saturday, November 9, 2013

987654321

     भाजपा के लिए प्राण प्रण से तपे  तपाए सद्गृहस्थ महात्माओं की उपेक्षा हो रही है और बड़बोले बाबा हरिद्वार से समर्थन के लिए मँगाए जा रहे हैं जो भाजपा की नीतियों के बारे में    

      


इन आचरणों से काँग्रेसी  केंद्र सरकार का निरंकुश होना स्वाभाविक ही था। 

    

   वैसे भाजपा से शिक्षित स्वयंसेवी  जीवितविचारों वाले गैर राजनैतिक लोगों को उम्मीद थी कि भाजपा हमारे  भी बौद्धिक योगदान पर अमल करेगी किन्तु ऐसा नहीं हो सका!और एक बहुत बड़ा वर्ग निराश हुआ है ।इसलिए भाजपा को अब चाहिए कि अपने बचनों और मुद्दों पर कायम रहे । जैसे समान नागरिक संहिता, धारा 370 और राम मंदिर जैसे मुद्दे  कभी एजेंडे में रखे जाते हैं कभी नहीं।आखिर आम जनता क्या समझे कि आप इनके पक्ष में हैं या विपक्ष में ? यह सब क्या है देश सभी राजनैतिक दलों की चालाकी समझता है इसलिए अब बंद होनी चाहिए शार्टकट की तलाश!और निश्चित मुद्दे बनाए जाएं उर उनपर कायम रहा जाए जो आम जनता के विश्वास को मजबूत करेगा । 

    जैसे रामकृष्ण यादव जी ही हैं ! इसलिए वास्तव में भाजपा के शुभ चिंतक हैं तो उन्हें अपनी निश्चित पहचान समाज के सामने प्रस्तुत करनी चाहिए !कि वो किस हैसियत से भाजपा की  मदद करना चाहते हैं क्योंकि किसी के प्रति भी आधा अधूरा समर्पित होना न उसके लिए हितकारी है और न ही अपने लिए !

       बाबाओं को भी अपनी पहचान तो स्पष्ट करनी चाहिए 

    इस समाज में हर कोई स्वतन्त्र है जो लोग अपने को बाबा सिद्ध करना चाहते हैं तो भजन करें ,विरक्त हैं तो दुनियाँ के आडम्बर से क्या लेना देना! योगी हैं तो योग पंथ का प्रचार प्रसार करें, बैद्य हैं तो दवा बनाएँ, व्यापारी हैं तो खुलकर व्यापार करें और यदि देश की इतनी ही चिंता है तो खुल कर आवें न राजनीति में और करें देश की सेवा कौन रोक सकता है किसी को !दश सेवा भी अत्यंत पवित्र काम है !

     बिरक्ति में मन न लगने के कारण जिससे  भजन नहीं होता है तो कोई बात नहीं भजन करना कौन आसान है भजन के नाम पर जबर्दश्ती अपनी नाक पकड़ कर क्यों बैठना ?यदि बेचनी ही दवा है करना ही व्यापार या राजनीति है तो ब्यर्थ की सधुअई में  समय बर्बाद क्यों करना?दाड़ा झोटा बढ़ाने की आखिर मज़बूरी क्या है जब भजन में मन नहीं लगता है वैसे भी सांसारिक प्रपंचों में फँसे लोग भजन करते कब हैं? इस लिए अपनी इस तथाकथित  मनमानी सधुअई  से वास्तविक विरक्त संतसमाज को संकट में नहीं डालना चाहिए जिनको सांसारिक प्रपंचों से कुछ लेना देना ही नहीं होता है उन्हें क्यों फँसाना ?अपनी पहचान स्पष्ट कर देने से विरक्त संतों की गरिमा तो बची रह जाएगी जिन बेचारों का दीन दुनियाँ से कुछ लेना देना ही नहीं है ऐसे बाबाओं की सजा वे सदाचारी बीतरागी तपस्वी ज्ञानवान दीन दुनियां से दूर केवल ईश्वर भजन में लगे लोग भी भुगतते हैं !

 

इसलिए रामकृष्ण यादव जी को अपनी पहचान स्पष्ट कर देनी चाहिए तब भाजपा को इनका साथ लेने का लाभ मिल सकता है । 

     अभी तक तो एक ही प्रश्न है कि वो हैं क्या?यदि उनका उद्देश्य अपना काला मन सम्हालने के लिए स्वामी बनना था तो रामदेव बने ठीक किया किन्तु क्या उनके विरक्त जीवन लक्ष्य पूरा हो गया?क्या ठीक हो गया उनका काला मन! और यदि अपना काला मन ठीक नहीं कर सके तो वही करते रहते मुद्दा क्यों बदल दिया आखिर क्यों बीच में उठा लिया काले तन अर्थात बीमार शरीरों को स्वस्थ करने का मुद्दा न केवल बड़ी बड़ी बातें करने अपितु रोगों कि लम्बी लम्बी लिस्टें पढने लगे टी. वी. चैनलों पर बड़े दिन पेट हिलाया क्या सब लोग स्वस्थ हो गए और यदि नहीं तो वही करते रहते अर्थात बीमारियाँ घटी नहीं तो मुद्दा क्यों बदल दिया ? आखिर क्यों बीच में उठा लिया काले धन को विदेशों से भारत लाने का मुद्दा ? कब तक टिकेंगे इस पर कह पाना कठिन है । 

    अब सुना है कि आजकल मोदी जी के समर्थन में उतरे हैं किन्तु जिसके अपने समर्थक ही नहीं हैं वह किसी का समर्थन करके सहयोग क्या करेगा? यदि समर्थक होते तो उस दिन सरकारी मशीनरी के विरुद्ध कुछ न कुछ दिन तो धरना प्रदर्शन करते जब रात में  रामदेव को खदेड़ा गया था। वो रामदेव मोदी जी की  हिम्मत बँधा रहे हैं जिनकी अपनी हिम्मत इतनी आसानी से टूट जाती है यदि थोड़ा  भी साहस होता तो बाबाओं के कपड़े  छोड़ कर औरतों के कपड़ों में कभी न भागते !उसके बाद क्या अद्भुत रुदन था उन  रामकृष्ण यादव जी  और बाल कृष्ण जी का !जब रोते हुए मीडिया के चैनलों पर प्रकट हुए थे!

    आज भाजपा का समर्थन कर रहे हैं वो भाजपा अभी इतनी कमजोर नहीं हुई है जो ऐसे कमजोर बाबाओं के बल पर चुनावों में जाए !ऐसे बड़बोले लोगों की  बातों से भाजपा का नुकसान तो हो सकता है फायदा नहीं इसलिए भाजपा को अपने बल पर आगे बढ़ना चाहिए वैसे भी  वैराग्य बिहीन बनावटी बाबाओं के बिरुद्ध समाज में आज आक्रोश है !समाज महात्मा को केवल विरक्त ही देखना चाहता है समाज का सीधा सा प्रश्न है कि जब सारा प्रपंच करना ही है तो बाबा किस बात के?वैसे भी बाबा वेष  में धन कमाने के लिए किसने कहाँ  कितना बड़ा पाप कर रखा है किसी को क्या पता ?भाजपा इनकी वकालत किस मुद्दे पर किस सीमा तक कर पाएगी यह भी सोचना चाहिए 

Friday, November 8, 2013

भाजपा सरकार की जगह मोदी सरकार क्यों ? भाजपा कहने में कोई दोष है क्या ?

मोदी मन्त्र जपते जपते फील गुड की ओर बढ़ रही है भाजपा !    

   केवल मोदी जी का गुणगान करने से भला नहीं होगा !क्या हम लोग एक बार फिर फीलगुड की ओर नहीं बढ़ते जा रहे हैं ?केवल मोदी जी के गुणगान  कर लेने भर से भला नहीं होगा अपितु हमें भी राष्ट्र के लिए समर्पित सामाजिक वातावरण तैयार करने का संकल्प लेना होगा ।मोदी माहात्म्य इतना अधिक बढ़ा चढ़ा कर महिमा मंडित किया जा चुका है कि यदि भाग्यवश सरकार बन ही जाए तो जनता से किए गए वायदे समय सीमा पर पूरा करना काफी टेढ़ी खीर होगी और रही बात जनाकांक्षांओं की किन्तु उन पर खरा  उतर पाना ऐसे तो काफी कठिन होगा,जिसके लिए सभी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को मिल जुल कर समर्पण एवं जिम्मेदारी पूर्वक काम करना होगा । 

        जो  लोग मोदी सरकार समझकर यह सोचते हैं कि मोदी जी अकेले जादू की छड़ी घुमाकर सब कुछ ठीक कर देंगे यह भावना बिलकुल ठीक नहीं है ।कई बार देश में देश की सरकार या प्रदेशों में प्रांतीय सरकारों के बदलने पर भी काम पहले की तरह ही चलता रहता है  यहाँ तक कि पिछली सरकार की जिन नीतियों का विरोध करके नई सरकार आई होती है किन्तु कार्यशैली सारी पिछली सरकार की तरह ही बनी रहती है अब दिल्ली नगर निगम को ही लें यहाँ तो भाजपा है तो क्या हुआ पहले भी बिना घूस दिए काम नहीं होता था आज भी नहीं होता है पहले भी निगम स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती थी आज भी वे घनघोर अकर्मण्यता के शिकार हैं निगम से जुड़े अधिकाँश अधिकारी कर्मचारी यहाँ तक कि निगम स्कूलों के शिक्षक अपने बच्चे भी निगम स्कूलों में नहीं पढ़ाते हैं आखिर क्यों ! इसी प्रकार से आज भी निगम स्कूलों से लेकर  चिकित्सालय  तक  सब निरुद्देश्य होकर भटक रहे हैं !दिल्ली नगर निगम में आखिर क्यों नहीं हो पा रहा है सुधार !यहाँ तो नगर निगम में भाजपा ही है यदि सुधार कर पाना भाजपा के बश में है तो दिल्ली नगर निगम में पारदर्शिता लाई जानी चाहिए और सुधार दिखना भी चाहिए ! और यदि भाजपा के बश में नहीं है तो फिर बात हो सकती है मोदी जी की ,और मानना पड़ेगा कि भाजपा के पदाधिकारी और कार्यकर्ता  अब भाजपा की कार्यशैली से निराश हो चुके हैं इसीलिए अब वे भाजपा का नाम भी कम ले रहे हैं या लेने से बच रहे हैं और भाजपा सरकार की जगह मोदी सरकार की बात करने  लगे हैं आखिर भाजपा सरकार ही बनती तो क्या नुकसान हो जाता !मोदी सरकार से उनका अभिप्राय क्या है ?

    कोई कितना भी अच्छा प्रधान मंत्री क्यों न आ जाए लट्ठ के बल पर शासन वह भी नहीं चला सकता है।इस समय सामाजिक माहौल इतना अधिक बिगड़ चुका है सहन शीलता बिलकुल समाप्त हो रही है परिवारों संस्कारों स्वजनों के प्रति आत्मीय भावनाएं बिलकुल मरती जा रही हैं आज तो समाज में संस्कारों का सृजन करने वाले बाबा लोग भी बलात्कार और व्यापार करते पाए जा रहे हैं स्वदेशी के नाम पर दवा दारू सब बेच रहे हैं व्यापार आदि सब कुछ करने लगे हैं विदेश से कालाधन लाने के लिए उछलते घूम रहे हैं किन्तु समाज में संस्कार सृजन जो उनका मुख्य काम था उसमें उनका मन नहीं लगता है जिस गाय के पास दूध होता है वही पेन्हाती है इसी प्रकार जिस बाबा के पास संस्कार होंगे उसी का मन संस्कार बाँटने में लगेगा जिसके अपने ही संस्कार ख़राब होंगे वो क्या दूसरे का संस्कार सुधारेंगे ? बाबाओं की गिद्ध दृष्टि अब धन पर लगी है किसी को काला  पीला धन  किसी को जमीन में गड़ा  हुआ  धन चाहिए !

         कथा बाचक लोगों का काम संस्कार देना था वो भागवत कथाओं के नाम पर भोगवत कथाएँ   करते नाचते गाते घूम रहे हैं ये लोग  योग और संस्कारों को सिखाने के नाम पर लाखों रूपए माँगते हैं । 

       सरकारी प्राइमरी स्कूलों में चले जाओ कोई अध्यापक पढ़ाना ही नहीं चाहता जो पढ़ाना भी चाहते हैं उन्हें  भी उन्हीं के बीच के काम चोर अध्यापक पढ़ाने ही नहीं देते। बच्चों के भविष्य से कैसे खेल रहे हैं  ये लोग ? अध्यापक समय से स्कूल नहीं जाते ,कक्षाओं में नहीं जाते केवल मीटिंग चला करती हैं कि बच्चों को पढ़ाया कैसे जाए किन्तु बच्चों से कभी किसी अध्यापक का लेना देना ही नहीं होता ऐसी  कामचोरी के चंगुल से निकले बच्चे क्या चरित्रवान ईमानदार निकलेंगे ?और निकल ही आवें तो वो उनका भाग्य और उनके परिवार के संस्कार! अधिकारी इतने लापरवाह हैं कि स्कूलों में झाँकने नहीं जाते हैं जाते होते तो कुछ तो असर होता !अंधे पीसें कुत्ते खाएं  वाली दशा है कोई बात कहो तो कहते हैं लिखित कम्प्लेन दो! क्या बिना कम्प्लेन उनका अपना कोई कर्तव्य नहीं है ?

    राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्कारों से सुसंस्कारित भाजपा का कब्ज़ा दिल्ली के दो एम.सी. डी.जोन में है एम.सी. डी.के स्कूलों में शिक्षा की क्या दुर्दशा है वहाँ जाकर देखा जा सकता है । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि जहाँ काँग्रेस का कब्ज़ा है वहाँ सब ठीक है वहाँ भी वही दुर्दशा है ! इसलिए यदि एक जैसी स्थिति ही रहनी है तो क्या काँग्रेस क्या भाजपा ?भाजपा यदि देश में सुशासन देने का दावा करती है तो उसे चाहिए कि कम से कम राष्ट्रीय राजधानी के एम.सी. डी.स्कूलों में ही कुछ अच्छा करके दिखाए तो जनता खुद चिल्लाती फिरेगी कि भाजपा अच्छा काम  कर रही है उसी से भला होगा, अपने मुख मियां मिट्ठू बनने से कुछ नहीं होगा !स्कूलों में जाकर देखा जा सकता है कि  शिक्षा विभाग के एम.सी. डी.दुलारे क्या गुल खिला रहे हैं !भाजपा के किसी व्यक्ति का इस ओर ध्यान जाता नहीं दिख रहा है।भाजपा कार्यकर्ताओं पर संघ के शिक्षा संस्कार एम.सी. डी.के स्कूलों की शिक्षा के विषय में  निष्फल दिख रहे हैं !

     धर्म से लेकर शिक्षा तक से जुड़े धर्म एवं कर्तव्य भ्रष्ट लोगों ने समाज को ऐसे रसातल में पहुंचा दिया है कि आज दो दो वर्ष की बच्चियों से बलात्कार हो रहे हैं कितने शर्म की बात है !ऐसी बीमार परिस्थिति में अकेले नरेंद्र मोदी जी क्या कर लेंगे ? निस्संदेह वो बहुत अच्छे एवं कर्तव्य के प्रति समर्पित व्यक्ति हैं उनकी परिश्रम शीलता एवं ईमानदारी पर शक करने की कोई गुंजाइस ही नहीं है उनकी टीम भी उनके अनुरूप होनी चाहिए जो अभी तक नहीं है अन्यथा राजधानी के एम.सी. डी.स्कूलों में शिक्षा की यह हालत नहीं होती!

       इसलिए सुधारना सबको होगा और सबको संकल्प लेकर हर घर हर वर्ग हर समाज के प्रतिष्ठित बयोवृद्ध  लोगों में संतों की  परिकल्पना करनी होगी और ईमानदारी पूर्वक सबसे प्रार्थना करनी होगी कि सभी लोग मिलजुल कर समाज को सबसे पहले बलात्कार भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने में मदद करें ! इसके बाद देखा जाएगा कि क्या करेगी सरकार !अन्यथा किसी सरकार से जादू की छड़ी लेकर आने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए - धन्यवाद

Thursday, November 7, 2013

महिला सुरक्षा के लिए क्या किया जाए ?

महिलाओं को भी अपनी सुरक्षा के विषय में विशेष सतर्कता रखनी ही चाहिए ।

     

     स्वभाव बदलता नहीं है आदत बदल जाती है पानी नीचे की ओर जाता है आग की लव ऊपर की ओर जाती है जैसे इन्हें बदला नहीं जा सकता है उसी प्रकार से स्त्री पुरुषों में भी परस्पर आकर्षण होता ही है इस आकर्षण पर नियंत्रण करने की क्षमता पुरुषों में नहीं होती है फिर भी चारित्रिक संयम पूर्वक रहने के लिए पुरुषों को बहुत सारे अभ्यास शास्त्रों में बताए गए हैं किन्तु  नारियों में एक विशेष गुण कहा गया है कि धैर्येण योषितः अर्थात स्त्रियां धैर्य पूर्वक अपनी बासना पर नियंत्रण  कर लेने में समर्थ होंगी!फिर भी स्त्री पुरुषों के मन में एक दूसरे के प्रति स्वाभाविक आकर्षण होने के कारण  आपस  में इतनी मध्यम  दूरी बनाकर रहना ही चाहिए कि सामने वाले के मन में यदि उसके प्रति कोई विकार आ ही जाए तो भी अपने को सम्पूर्ण सुरक्षित बचाया जा सके बाकी सारी बात बाद में!क्योंकि इस सच्चाई को हमें मानना ही होगा कि कानून व्यवस्था कितनी भी चुस्त क्यों न हो फिर भी वह हमारे हर एकांत में हमारा साथ नहीं दे सकती!जो लोग पहले तो आधुनिकता के नाम पर एक दूसरे से चिपके रहेंगे फिर कोई दुर्घटना घटने पर कानून व्यवस्था को कोसेंगे यह आदत ठीक नहीं है कानून का साथ जब हम देंगे तब कानून हमारा हमारा साथ दे सकता है !

     श्री राम के राज्य में हाथी और सिंह एक घाट पर पानी पीते थे किसी को किसी से कोई भय नहीं होता था फिर भी वो हाथी एक घाट पर पानी  भले पीते थे किन्तु सिंह के स्वभाव में चूँकि हिंसा है इसलिए उसके साथ निश्चित दूरी बनाकर रहते थे। इसका प्रमुख कारण यह था कि अहिंसा या हिंसा का निर्णय तो सिंह के ऊपर है वह हिंसा का पालन करे या अहिंसा का व्रत ले! अथवा अहिंसा का व्रती सिंह अपना व्रत कब तोड़ दे।ये उसी को पता है हाथियों से परामर्श लेकर कोई निर्णय तो वो लेगा नहीं !

     इसके लिए वो ऐसी परिस्थिति में व्रती सिंह अपना व्रत कब तोड़ दे तो हाथी की जान पर बन आएगी उस समय अचानक हाथी क्या कर लेगा ? इसलिए सिंह जैसे चाहे वैसे रहे किन्तु हाथी अपनी ओर से  सावधानी तो रखते  ही थे । ये उदाहरण अहिंसक समाज का है।

    इसी प्रकार महिलाओं से बलात्कार  तो चारित्रिक हिंसा की परिधि में आता है मेरा निवेदन यह है कि जैसे हाथी पर हमला करना सिंह की कमजोरी है उसीप्रकार महिलाओं के प्रति बासनात्मक दृष्टि रखना पुरुषों की कमजोरी है। इस भावना की पुराणकाल से लेकर अभी तक असंख्य बार परीक्षा भी हो चुकी है लगभग हर बार पुरुष वर्ग इस विषय में महिलाओं से हारता रहा है। 

    इसलिए पुरुषों को संयम पूर्वक रहना ही चाहिए कानून व्यवस्था भी चुस्त होनी ही चाहिए साथ ही महिलाओं को भी अपनी सुरक्षा के विषय में विशेष सतर्कता रखनी ही चाहिए ।

सेक्सालु लोग प्यार का नाटक क्यों करते हैं ?


 प्यार किया जिस जिस ने अब तक मर मर कर जीवन पाता है । 

तभी    पुराने  जख्म    भूलता    नया     जख्म जब हो जाता है ॥ 

प्रेम     पंथ    जख्मों   की दुनियाँ   सभी     बेहोशी   में  जीते हैं । 

प्रेम   मूर्च्छितों   को    जब     देखो     बेचारे    आँसू    पीते   हैं ॥ 

हँसना     रोना     आहें     भरना     घुट    घुट कर जीना होता है ।

अच्छी    भली    जिंदगी    चौपट    करके    सब   पीना होता है ॥ 

इसीलिए  इस प्रेम जाल    में    फँसने    की      मज़बूरी    क्या  !

जीवन    को     अच्छे    से    जीओ     सड़ते    ब्यर्थ जरूरी क्या ?

जिन्हें   प्रेम    के  भूत     लगे    उनके    जीवन    बेस्वाद   हुए  । 

माता     पिता     भाई     बहनें     बीबी      बच्चे    बरबाद   हुए ॥ 

किसी  एक   की   बलि   लेकर  ही   सदा प्रेम खुजली मिटती  है !

प्रेम    न    है,   है   सेक्स   भावना   घी   से   कहीं आग बुझती है ?

                         निवेदक -डॉ.एस.एन. वाजपेयी 

                 संस्थापक -राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान