Friday, January 9, 2015

चुनावों के बाद भी दिल्ली बिना सरकार की ही रह जाएगी क्या !

दिल्ली के चुनावी समर में रथी और सारथी से शून्य क्यों है भाजपा ? क्या महारथी मोदी के 'मन की बात' लुभा पाएगी  दिल्ली को !      अबकी बार दिल्ली के चुनावों में किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल  पाना कठिन होगा उसका प्रमुख कारण यह है  कि काँग्रेस के प्रति जनता का क्रोध अब कम हुआ है और आम आदमी पार्टी के प्रति इसलिए बढ़ा है कि उसने स्वयं सरकार बनाई और स्वयं ही गिरा दी !बिना किसी काम काज के केवल शोर मचाती रही ! रही बात भाजपा की तो पिछ्ले कई महीने से भाजपा अप्रत्यक्ष रूप से दिल्ली की सत्ता सँभाले हुए है किंतु जनता का दैनिक जीवन पहले की तरह ही चल रहा है पहले भी सरकारी आफिसों में चक्कर लगाने पड़ते थे और आज भी लगाने पड़ते हैं ,भ्रष्टाचार पहले भी था आज भी है ,बलात्कार जैसे और भी सभी प्रकार के अपराध पहले भी होते थे आज भी होते हैं !रही बात सरकारी स्कूलों की पढ़ाई या सरकारी अस्पतालों की दवाई की वहाँ अभी तक कोई विशेष बदलाव नहीं दिख रहा है ! दिल्ली का नगरनिगम कामचोरी और घूसखोरी के आरोपों से मुक्त नहीं हो पा  रहा है अपने बनाए हुए नियमों के पालन करने या करवाने में सुस्ती निगम की पहचान बनती जा रही है ! सफाई कर्मचारियों  पर अनुशासन न बन पाने की बात तो स्वच्छता अभियान से बनते  दिख रही है अब सफाई जनता स्वयं करेगी ,इसी प्रकार से हो सकता है कि पढ़ाई करने की जिम्मेदारी भी जनता पर ही छोड़ दी जाए अर्थात  पढ़ाना पड़े  और भी कार्यों को जनता कुछ कह लेगी कुछ सह लेगी किन्तु सरकार चलती रहेगी !

       विदेशी मुद्दों पर जनता को अभी तक तो इतना समझ में आ रहा है कि भारत सरकार कुछ देशों में जा रही है और कुछ देश भारत आ रहे हैं सभी देशों से अपने पुराने संबंध खोजे जा रहे हैं सबको समझाया जा रहा है कि आपके साथ हमारे कितने पुराने सम्बन्ध हैं इसलिए हम लोग एक जैसे हैं पडोसी देशों ने सरकार के इस आत्मीय हाथ को उतने उत्साह से नहीं पकड़ रखा है कोई घुस पैठ कर रहा है तो कोई फायरिंग कर रहा है । समाज के सामने अब सबसे  बड़ा प्रश्न यह है कि वो विश्वास किसका करे !और चुने किस सरकार को !

Friday, November 28, 2014

          क्या आप भी मिटाना चाहते हैं अंध विश्वास ! यदि हाँ तो कीजिए ज्योतिष जन जागरण का पुनीत कार्य !
  ज्योतिष अत्यंत कठिन विज्ञान है इसीलिए ज्योतिष को सब्जेक्ट रूप में पढ़ाने के लिए बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी जैसे बड़े विश्व विद्यालयों ने M.A., Ph.D. आदि ज्योतिष में करने की व्यवस्था की गई है फिर भी जो लोग अध्ययन हेतु  वर्षों तक कठोर परिश्रम  नहीं करना चाहते ऐसे लोग बिना पढ़े लिखे ही ज्योतिष के नाम पर झूठे दावे किया करते हैं ऐसे अंध विश्वास फैलाने वाले लोगों से बचकर ज्योतिष विद्वानों की भी ज्योतिष डिग्रियाँ देखकर तब कीजिए उनपर विश्वास !






 भविष्य विज्ञान - भविष्य में आने वाले  अच्छे बुरे समय को जानने के लिए ज्योतिषशास्त्र  को छोड़कर और कोई विद्या नहीं है !



क्या आप भी मिटाना चाहते हैं अंध विश्वास ! यदि हाँ तो कीजिए ज्योतिष जन जागरण का पुनीत कार्य !
  ज्योतिष अत्यंत कठिन विज्ञान है इसीलिए ज्योतिष को सब्जेक्ट रूप में पढ़ाने के लिए बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी जैसे बड़े विश्व विद्यालयों ने M.A., Ph.D. आदि ज्योतिष में करने की व्यवस्था की गई है फिर भी जो लोग अध्ययन हेतु  वर्षों तक कठोर परिश्रम  नहीं करना चाहते ऐसे लोग बिना पढ़े लिखे ही ज्योतिष के नाम पर झूठे दावे किया करते हैं ऐसे अंध विश्वास फैलाने वाले लोगों से बचकर ज्योतिष विद्वानों की भी ज्योतिष डिग्रियाँ देखकर तब कीजिए उनपर विश्वास !और  देखिए यह लिंक - -http://jyotishvigyananusandhan.blogspot.in/p/blog-page_10.html
  

   पाखंड मुक्त ज्योतिष  जन जागरण हेतु एवं सभीप्रकार के अंध विश्वास को मिटाने में आप भी सहभागी बनें !
    बंधुओ ! बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी जैसे बड़े विश्व विद्यालयों में ज्योतिष को सब्जेक्ट रूप में पढ़ा कर M.A., Ph.D. आदि  शिक्षा की व्यवस्था मेडिकल की शिक्षा की तरह ही है !इसलिए डॉक्टरों की तरह ही ज्योतिषियों की योग्यता का  परीक्षण भी ज्योतिष सब्जेक्ट में ली गई उनकी डिग्रियों को चेक करके  करें !ऐसा करते समय डिग्री और डिप्लोमा के अंतर एवं विश्वविद्यालय  की प्रामाणिकता  पर अवश्य ध्यान दें !ऐसा न करने का अर्थ है कि आप अंध विश्वास को बढ़ा रहे हैं इसलिए आप स्वयं जागरूक बनें ताकि आपको कोई मिस गाइड न कर सके see more....http://jyotishvigyananusandhan.blogspot.in/p/blog-page_10.html    
!जिससे बचना चाहिए !

बंधुओ ! ज्योतिष एवं धर्म के क्षेत्र में व्याप्त  अंध विश्वास को मिटाने में यदि आप भी सहयोग करना चाहते हैं तो टेलीवीजनीय या मीडियायी ज्योतिषियों के केवल झूठे दावों पर ही विश्वास न करें  अपितु  उनके द्वारा बताई गई बातों के शास्त्रीय प्रमाण उन्हीं से पूछें और डॉक्टरों की तरह ही कीजिए उनकी योग्यता का भी परीक्षण !यदि आप उनकी शास्त्रीय योग्यता से संतुष्ट हैं तब कीजिए अपने भविष्य जानने की बात !देखिए यह लिंक - -http://jyotishvigyananusandhan.blogspot.in/p/blog-page_10.html 
 आदि ज्योतिष में करने की व्यवस्था की गई है फिर भी जो लोग अध्ययन हेतु  वर्षों तक कठोर परिश्रम  नहीं करना चाहते ऐसे लोग बिना पढ़े लिखे ही ज्योतिष के नाम पर झूठे दावे किया करते हैं ऐसे अंध विश्वास फैलाने वाले लोगों से बचकर ज्योतिष विद्वानों की भी ज्योतिष डिग्रियाँ देखकर तब कीजिए उनपर विश्वास !और  देखिए यह लिंक - -http://jyotishvigyananusandhan.blogspot.in/p/blog-page_10.html

                                   भागवत भ्रष्ट लोगों ने बढ़ाया धार्मिक एवं सामाजिक भ्रष्टाचार ! 
          भागवत कथा कहने वाले लोग पहले  भागवत कथाएँ कहकर आत्म रंजन किया करते थे तो फिल्मों से जुड़े लोग नाच गाकर समाज का मनोरंजन कर लिया करते थे तब तक सब कुछ ठीक चल रहा था ,किंतु आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान रूपी भागवत कथा के परं पवित्र क्षेत्र में अचानक कुछ अकर्मण्य एवं आलसी लोगों की दृष्टि पड़ी उन्होंने इस सुशांत क्षेत्र को भी नहीं बक्सा और जगह जगह भागवत कथाओं के बड़े बड़े बैनर लगा लगाकर नाचने कूदने लगे भागवत के सुशांत मंचों पर ये भागवती मल्ल ! इस प्रकार भागवत में ऐसी भगदड़ हुई कि भागवत कथाओं में नचैया गवैया लोगों के समूह तेजी कूदने लगे ! इस प्रकार से कथाओं की कमान किन्नरों के हाथ में पहुँचते ही फिल्मों से जुड़े लोग बेरोजगार होने लगे क्योंकि मनोरंजन वाला उनका काम भागवत वीरों ने छीन लिया था तो उन्होंने एक नया तरीका खोज निकाला  और फिल्मों में बोल्ड सीन, सुपर बोल्ड सीन ,सेक्सी सीन आदि जितने नंगपन के खेल थे जिन्हें गाँव वाले तक फूहड़ मानते थे वे सब फिल्मों के नाम पर  खुले तौर पर खेले जाने लगे !धीरे धीरे फिल्मों का स्वरूप बदलने लगा और फिल्मों से कला गायब होने लगी मांसल सौंदर्य के साथ साथ मल मूत्र मार्गों को छिपा छिपा कर दिखाने का महत्त्व बढ़ने लगा !






















Wednesday, November 5, 2014

राजनैतिक पार्टियाँ हों या सरकारें पार्टटाइम में नहीं चलाई जा सकतीं !

               राजनीति में ठेकेदारी बंद होनी चाहिए !
      सरकारों में सम्मिलित लोग सरकार चलावें और पार्टियों में सम्मिलित लोग चलावें पार्टियाँ और लड़ें  चुनाव!जो लोग मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री आदि बनकर समाज सेवा करने की शपथ ले लेते हैं उन्हें अपनी शपथ के पालन में प्राण प्रण से जुटना चाहिए न कि चुनाव लड़ने लड़ाने में ! ऐसे तो उन लोगों को पाँच वर्ष बीत जाते हैं पार्टी के अंदर ही रुतबा ज़माने में अब समाज और सरकार का काम कौन देखे ! पार्टी के अंदर के अन्य लोगों को भी अवसर मिले और उन्हें भी अपनी अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो !
   लोक तांत्रिक की दृष्टि से मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री जैसे इन पवित्र पदों की गरिमा पवित्र ही रहने देनी चाहिए क्योंकि कोई भी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री आदि केवल किसी पार्टी का न होकर अपितु सम्पूर्ण प्रदेश या देश का होता है इसलिए  उसके   स्वाभिमान पूरे प्रदेश और सम्पूर्ण देश का स्वाभिमान जुड़ा होता है जिसे सुरक्षित रखना हर किसी का नैतिक कर्तव्य है !अन्यथा चुनावी राजनैतिक रैलियों में प्रधानमंत्री जिस प्रदेश में भाषण करने जाएँगे उस प्रदेश की सरकार यदि विरोधी पार्टी की है तो उन्हें मुख्यमंत्री की आलोचना करनी ही पड़ेगी जिसके जवाब में वहाँ के मुख्यमंत्री को भी अपने प्रधानमंत्री की आलोचना करनी पड़ेगी ऐसी आलोचनाओं का स्तर अपने यहाँ कितना गिर चुका है इसका अंदाजा इसी से लगाया जाना चाहिए कि पिछले चुनावों में एक पार्टी के प्रधानमंत्री प्रत्याशी को कुत्ता और गधा जैसे कुशब्द  सार्वजनिक मंचों से बड़े नेताओं के द्वारा बोले  गए  जो मीडिया में सुर्खियाँ बनता रहा टेलीवीजन की बहसों में सम्मिलित किया गया क्या ये सब बातें विदेशों के लोगों ने सुनी पढ़ी नहीं होंगी इसके बाद भी हमारे प्रधानमंत्री का सम्मान यदि वो लोग करते हैं तो ये उनकी महानता  है दूसरी बात हमारे पुराने नेताओं के द्वारा किए गए मर्यादित आचरणों के प्रति उनका सम्मान है जिसे आज भी बरकरार रखा जाना चाहिए ।आजकल बारहो महीने चुनाव होते हैं बारहो महीने होती है राजनीति और बनती रणनीति !आज चुनावी राजनीति के कारण हर कोई झूठ बोल रहा है आश्वासन दे रहा है सफाई दे रहा है इससे समाज का वातावरण ही बिगड़ता जा रहा है । नेताओं की देखा देखी कोई बात कहकर मुकर जाना अब आम बात होती जा रही है। 
      हर कोई किसी को अपने चक्रव्यूह में फाँसने के लिए झूठ बोलता है बाद में मुकर जाता है अपना स्वार्थ साधने के लिए आश्वासन देता है बाद में मजबूरियाँ गिनाने लगता है कोई किसी को कितनी भी गहरी चोट देता है और बाद में सॉरी बोलकर निकल जाता है !ऐसे  राजनैतिक वातावरण ने समाज को कितना संवेदना शून्य बना दिया है !इसका कुछ उपाय तो  खोजा  जाना चाहिए और देश के सभी चुनाव एक साथ कराने की पद्धति पर विचार किया जाना चाहिए जिससे पाँच वर्षों में एक बार होली दीपावली के त्यौहार की तरह चुनावी त्यौहार भी हो जाए इसके बाद फुरसत में मीडिया से लेकर सभी राजनैतिक दल एवं सत्तासीन दल और लोग देश एवं समाज के लिए भी कुछ सोचें और कुछ करें भी । ऐसे देश देश में हमेंशा चुनावी वातावरण ही बना रहता है अपना अपना काम छोड़ कर हर कोई चुनावी चिंतन चर्चा जोड़ तोड़ आदि में बेमतलब में ब्यस्त रहता है ये चुनाव के लिए अच्छा हो सकता है किन्तु इसका दुष्प्रभाव आम जनता के बात व्यवहार में घुसकर परिवारों एवं समाज के मधुर संबंधों को जहरीला बनाता जा रहा है । 
     

Monday, October 20, 2014

दिवाली मनाने की परंपरा कब से चली आ रही है जानिए आप भी !

 

आप भी जानिए कब से चली आ रही है दिवाली मनाने की परंपरा ! इस त्यौहार को 'कौमुदी महोत्सव' भी कहते हैं !
   बहुत लोगों को आज भी पता है कि दीपावली का पर्व श्रीराम के बन से वापस आने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है किंतु यह सच नहीं है। यदि ऐसा होता तो दीपावली में श्रीराम सीता लक्ष्मण आदि का पूजन करके उनकी ही आरती उतारी जाती। श्रीगणेश लक्ष्मी जी का इस पर्व से क्या संबंध? वैसे भी सभी धर्मकार्यों में  गणेश जी के साथ  तो  गौरी जी का पूजन होता है यहाँ  लक्ष्मी पूजन क्यों ? दूसरी बात गणेश जी के पूजन में तो लड्डुओं का भोग लगता है जबकि दीपावली में तो ऐसा नहीं होता है?दीपावली प्रकाश का पर्व है, अर्थात सारी पृथ्वी को प्रकाश से नहला देना जबकि श्री गणेश और लक्ष्मी जी की किसी अन्य पूजा में ऐसा होते नहीं देखा गया है। भारतीय शास्त्रीय संपदा के दर्पण में इस  कौमुदी महोत्सव (प्रकाश पर्व) अर्थात दीपावली पर्व का वर्णन किस प्रकार से है देखते हैं ?
     श्रीरामावतार से बहुत पहले इस पृथ्वी पर  राजाबलि का राज्य था वे बहुत प्रतापी राजा थे। भगवान बावन ने उनसे दान में सारा राज्य पाठ ले लिया था, बाद में उनका शरीर भी नाप लिया था यह कथा लगभग सभी लोग जानते हैं।

     बात यह थी कि दैत्य वंश में उत्पन्न राजा बलि ने संपूर्ण पृथ्वी मंडल को जीत लिया था, स्वर्ग तक उनका शासन चलता था। इंद्र आदि  देवता राज्य विहीन होकर भटक रहे थे। संपूर्ण ऐश्वर्य लक्ष्मी राजाबलि के आधीन थी। सभी देवता स्वर्ग छोड़कर भटक रहे थे। सभी देवताओं की प्रार्थना पर ही भगवान विष्णु ने बावन रूप में प्रकट होकर राजा बलि की यज्ञ में जाकर सारा राजपाठ एवं स्वयं राजाबलि को भी दान की प्रतिज्ञा में बाँधकर अपने आधीन कर लिया था। बलि को समस्त परिवार के साथ सुतल लोक भेज दिया था। इस प्रकार जाते समय बलि से भगवान बावन ने पूछा आपकी कोई इच्छा हो तो कुछ माँग लो क्योंकि मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता। इस पर बलि ने कहा महाराज मैं सुतल लोक को प्रसन्नता पूर्वक प्रस्थान कर रहा हूँ किंतु मेरी इच्छा थी कि एक दिन के लिए हर वर्ष हमारा राज्योत्सव  पृथ्वी पर मनाया जाता रहे और उस दिन सारी पृथ्वी को प्रकाश से पूरित कर दिया जाए। यह दिन बलि राजमहोत्सव के रूप में जाना जाए।
      भगवान बावन ने स्वीकार करते हुए कहा कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को यह पर्व सारे संसार में धूम धाम से मनाया जाएगा। उसी वरदान के प्रभाव से यह परंपरा आज तक प्रचलित है। दीपों के समूह से इस दिन आरती की जाती है इसीलिए इसे दीपावली कहते हैं । 
         दीपैर्नीराजनादत्र सैषा  दीपावली स्मृता। 
                                                           मत्स्य पुराण
   इसीदिन सारे देवताओं सहित लक्ष्मी जी को भी महाराज बलि के कैदखाने से छुड़ाकर भगवान विष्णु वापस क्षीर सागर ले आए थे।
यथा -

   बलिकारागृहाद्देवा      लक्ष्मीश्चापि      विमोचिता।
   लक्ष्म्याः   सार्द्धं  ततो देवा नीता  क्षीरादधौ   पुनः।।

   सभी देवता और लक्ष्मी आदि देवियॉं सभी लोग राजाबलि के कारागार में थे। इसीलिए देवताओं में अग्रगण्य श्री गणेश जी एवं देवियों में अग्रगण्य श्री लक्ष्मी जी का पूजन किया जाता है।

    यथा - 
           तत्र   संपूजयेल्लक्ष्मीं   देवांश्चापि प्रपूजयेत्।
           एवं तु सर्वथा कार्य  बलिराज्य   महोत्सवः ।।

   स्पष्ट लिखा है कि सभी प्रकार से सभी को प्रसन्न कर सभी के साथ मिलजुलकर सभी के लिए खुशी की कामना करते हुए संपूर्ण आनंद के साथ राजाबलि के राजमहोत्सव अर्थात दीपावली को मनावे।

       जो लोग ऐसा मानते हैं कि श्री राम के बन से वापस आने के उपलक्ष्य में दीपावली पर्व प्रारंभ किया गया था। इस विचार में थोड़े सुधार के साथ सोचने की आवश्यकता है। वस्तुतः बात यह थी कि जब श्रीराम बन चले गए थे, तब महाराज दशरथ की मृत्यु हो गयी थी, माताएँ विधवा हुईं भरत जी नंदी ग्राम में विरक्त होकर रहने लगे। सारी अयोध्या के लोग राजपरिवार की इस दुखद स्थिति से अत्यंत व्याकुल थे।

            लागति अवध भयावनि भारी।
                     मानहुँ कालरात्रि अँधियारी।।
            घर मशान परिजन जुनुभूता।
                      सुत हित मीत मनहुँ  यमदूता।।
      शमशान की तरह घर तथा प्रजालोग भूत प्रेतों की तरह एवं संतान, हितकारी लोग और मित्र वर्ग यमराज के दूतों की तरह दुखदायी लग रहे थे।

      आप स्वयं सोचिए जिस घर परिवार राज्य आदि पर ऐसी विपत्ति का समय चल रहा हो वहाँ क्या होली क्या दिवाली आदि महोत्सव क्या और कोई हर्ष उल्लास का त्योहार? जब अपने मन में खुशी होती है तभी सब अच्छे लगते हैं। इसलिए संपूर्ण नगरवासियों ने राजपरिवार के दुख में दुखी रहकर चैदह वर्षों तक समस्त उत्सव रोक जैसे रखे थे किंतु प्रभु श्रीराम के बन से वापस आते ही उस वर्ष सभी त्योहार बड़े धूमधाम से मनाए गये थे मानो खुशियों का पारावार न रहा हो। इसमें भी प्रभु श्रीराम के बन से वापस आने के बाद पहला बड़ा त्योहार दीपावली ही पड़ा था। इसलिए खुशियों का समुद्र उमड़ना स्वाभाविक भी था।
                                        डॉ. शेष नारायण वाजपेयी
                                                                         संस्थापक  
                                                      राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान

Sunday, August 17, 2014

आखिर श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत पर विवाद क्यों और क्यों मनाया जाए दो दिन यह व्रत !

    जन्माष्टमी व्रत पर आचार्यों की लापरवाही से सनातन धर्मी समाज बहुत भ्रमित है आखिर वो क्या करे इसमें उसका तो कोई वश भी नहीं है निर्णय तो आचार्यों को ही करना है !

    अनेकों मत मतान्तरों को समाहित करते हुए  निर्णय सिंधु, धर्मसिन्धु, व्रतराज एवं षोडश संस्कार विधौ आदि संग्रह ग्रंथों के आधार किसी भी ऐसे प्रश्न का निर्णय निकाल पाना काफी कठिन होता है क्योंकि उनमें प्रायः पारस्परिक अंतर तो होता ही है कई बार एक दूसरे के विरोधी वाक्य भी सामने आते हैं ऐसी स्थिति में अपने देश काल परिस्थिति के अनुशार उनका सार स्वरूप अपनी विद्या बुद्धि  एवं विचारों के आधार पर मैं लिख रहा हूँ ये हमारा हमारे अनुशार निश्चय किया गया शास्त्रीय सच है यदि किसी को हमारे किसी भी बचन पर आशंका हो तो वो निश्चिन्त होकर शंका समाधान कर सकता है और यदि किसी का कोई सुझाव हो तो उस पर भी विचार किया जा सकता है किन्तु इस सच को अब संदिग्ध नहीं रहने देना चाहिए क्योंकि अब तो समाज में भी इस बात के लिए प्रश्न उठने लगे हैं कि आखिर हमारे त्यौहार दो दो दिन क्यों होने लगे हैं ?इसलिए उन्हें उत्तर तो मिलना चाहिए !

     बंधुओ!हमारे यहाँ बहुत पहले से मान्यता है कि किसी का भी जन्म दिन तिथियों के आधार पर ही मनाया जाता है न कि नक्षत्रों और दिनों के आधार पर !तो फिर श्री कृष्ण जी के जन्म दिन में नक्षत्र और दिन को डालकर इसे विवादित क्यों बनाया जा रहा है !

     व्रतराज में स्पष्ट किया गया है कि जो लोग अष्टमी रोहिणी युक्त खोजते हैं उन्हें यह समझना होगा कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी तो अष्टमी तिथि में  ही होगी उसे कोई नवमी में कैसे कर देगा ! हाँ यदि उसमें रोहिणी नक्षत्र भी आ जाए तो उसका फल बढ़ जाएगा इसी प्रकार उसी दिन बुधवार भी आ जाए तो उसका फल तीन गुणा हो जाएगा किन्तु यह याद रहना चाहिए कि तीन गुणा फल के चक्कर में त्यौहार का मूल स्वरूप कहीं बिगड़ तो नहीं रहा है ! इसलिए यह सारा संयोग बनना अष्टमी को ही चाहिए क्योंकि अष्टमी तिथि मुख्य है बाक़ी अष्टमी के साथ जो मिल जाए सो ठीक है किन्तु फल के लिए त्यौहार के मूल स्वरूप को नहीं बिगड़ने देना चाहिए अर्थात अष्टमी का त्यौहार नवमी दशमी में नहीं मनाने लगना चाहिए !यदि नवमी को बुधवार हो और दशमी को रोहिणी नक्षत्र हो तब दिन को महत्त्व देने वाले नवमी को मनाएँगे और नक्षत्र निष्ठा वाले लोग दशमी को मनाएँगे जन्माष्टमी किन्तु उसे बोलेंगे जन्माष्टमी ही अरे !ऐसी क्या मजबूरी है उनकी वो सीधे क्यों नहीं रोहिणी को ही मान लेते हैं और जिस दिन रोहिणी नक्षत्र हो उसी दिन मनावें और वही बतावें ताकि ये अष्टमी भ्रम समाप्त हो अन्यथा बोलेंगे जन्माष्टमी और मनाएंगे दशमी को तो इससे संशय  तैयार होगा ही हर कोई सोचता है कि दशमी या नवमी  तिथि में जन्माष्टमी कैसी !  जैसे अबकी बार हो रहा है काशी के एक प्रमाणित पंचांग में रविवार को दिन में 10.41बजे तक सप्तमी तिथि है जबकि समाज में प्रचलित अन्य कई पंचांगों में सिद्धांत भेद से यह समय और कम अर्थात सूर्योदय के आस पास तक ही सप्तमी तिथि है स्वाभाविक है कि रविवार को यहीं से अष्टमी लगेगी और अगले दिन अर्थात सोमवार को सूर्योदय के आस पास ही अष्टमी तिथि समाप्त भी हो जाएगी !फिर सोमवार की जन्माष्टमी औचित्य आखिर रह क्या जाएगा ?जिस दिन अष्टमी ही नहीं होगी उस दिन जनमाष्टमी कैसी !

     काशी के पंचांग के अनुशार अष्टमी रविवार प्रातः 10.41बजे से सोमवार को प्रातः 10.08 बजे तक अष्टमी तिथि है अब ध्यान इस बात का देना है कि रविवार को प्रातः 10.41बजे से श्री कृष्ण जन्माष्टमी तो लग गई किन्तु आप अज्ञान वश आम दिनों की तरह ही सब कुछ खाते पीते और सारे आचार व्यवहार भी आम दिनों की तरह ही बनाए रहे, रविवार के दिन की सारी अष्टमी तथा रविवार की रात की सारी अष्टमी तो आपने व्रत विहीन होकर सब कुछ खाते पीते बिता दी और सोमवार  को प्रातः 10.08  जब नवमी लग गई तब आप व्रत करने बैठें केवल किसलिए रोहिणीयुक्ता अष्टमी होगी तो फल अधिक मिलेगा इसीलिए न किन्तु जब अष्टमी बीत ही गई तो फिर श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रती होने का फल किस बात का ?अब तो आपने रोहिणी नक्षत्र का व्रत किया है वही आपको सोमवार की अर्द्ध रात्रि में मिलेगा अष्टमी तो न दिन में है न रात्रि में अब तो रोहिणी युक्त नवमी का व्रत होगा यही न !केवल फल अधिक मिलने के चक्कर में !

     दूसरी बात किसी के भी जन्म और मृत्यु के प्रकरण में तात्कालिक तिथि ही ग्रहण की जाती है क्योंकि जन्म दिन मनाते समय तिथि के अधिष्ठाता देवता की पूजा करने का विधान है इसी प्रकार से मृत्यु प्रकरण में `उसी तिथीश के आधार पर श्राद्ध और पिंड दान आदि किया जाता है अतएव जन्म और मृत्यु प्रकरण में तिथि टाली नहीं जा सकती !

       यही कारण है कि हमारे सम्पूर्ण त्यौहार तिथियों से बँधे हैं न कि नक्षत्रों और दिनों से जन्मदिन भी तिथियों  से ही जुड़े हैं श्री राम का प्राकट्य नवमी तिथि को हुआ था तो उसे आज भी श्री राम नवमी के रूप में ही मनाया जाता है जिस दिन दोपहर को नवमी होती है उसी दिन श्री राम नवमीमना  लेते हैं इसी प्रकार से श्री परशुराम जी का वैशाख शुक्ल तृतीया को मना लेते हैं होली रक्षाबंधन पूर्णिमा को और दीपावली अमावस्या  को मना लेते हैं हर श्राद्ध तिथियों के हिसाब से मनाते हैं दक्षिण भारत में श्रावण महीने की पूर्णिमा तिथि के आस पास श्रवण नक्षत्र आता है उसी दिन वो लोग ओणम मनाते हैं क्योंकि उन्होंने तिथि को नहीं अपितु नक्षत्र को पकड़ रखा है इसलिए वो नक्षत्र को ही मानते हैं । 

      बंधुओ ! जब  तिथि  नक्षत्र और वार  अर्थात  दिनों का आपसी ताल मेल निश्चित नहीं होता है तो कब कौन नक्षत्र पड़ेगा और कब कौन दिन होगा इसे प्रमुखता न देते हुए श्री कृष्ण जन्माष्टमी में भी अष्टमी को ही प्रमुखता  दी गई है 

      इसलिए अष्टमी को पकड़कर  चलना ही हमारे लिए उचित होगा अर्थात जब अर्द्धरात्रि में अष्टमी होगी तभी श्री कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी हाँ ,यह सुखद संयोग होगा कि यदि उस अर्द्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र भी हो और उसी दिन बुधवार भी पड़ जाए यह अत्यंत सौभाग्य का विषय होगा किन्तु इसका ये कतई मतलब नहीं है कि बुधवार और रोहिणी नक्षत्र को पकड़ने के लिए हम अष्टमी के आस्तित्व को ही भुला दें अन्यथा यदि हम इतना ही रोहिणी नक्षत्र को महत्व देते हैं तो जब अष्टमी के दो तीन दिन बाद भी रोहिणी नक्षत्र आता है तभी हमें मनानी चाहिए श्री कृष्ण जन्माष्टमी आखिर एक तो पकड़ कर हमें चलना ही होगा और एक को ही पकड़ कर हम चल भी सकते हैं  सबको पकड़ कर चलने में समाज हमेंशा दिग्भ्रमित ही होता रहेगा |और अन्य धर्मों के लोगों को उपहास का अवसर मिलता रहेगा ।

         जो लोग ऐसा मानते हैं कि उदया तिथि में होगी तो वही सारे दिन और रात्रि में मानी जाएगी किन्तु यह विधा सही नहीं है इसका पहला कारण तो यह है कि जन्म दिन में उदया तिथि न चलकर अपितु तात्कालिकी तिथि मानी जाती है । दूसरी बात ज्योतिष और धर्म शास्त्र के सैद्धांतिक पक्ष से जुडी हुई है इसमें जो व्रत और त्यौहार दिन में मनाए जाते हैं उनमें सूर्योदय कालीन तिथि ग्रहण की जाती है किन्तु जो व्रत और  त्यौहार रात्रि  में मनाए जाते हैं उनमें चंद्रोदय कालीन तिथि ही उदय कालीन होगी इसलिए यही ग्रहण की जानी चाहिए । 

       विशेष परिस्थितियों में जैसे सूर्यास्त तक अष्टमी हो और उसी दिन बुधवार भी पड़ रहा हो और रोहिणी भी हो ऐसी परिस्थिति में तो तीन योग मिल जाने के कारण इस दिन का महत्त्व बन जाएगा क्योंकि रात्रि के प्रारंभिक काल अर्थात सूर्यास्त काल में तो अष्टमी रह ही चुकी होगी शेष दो योग रात्रि में भी होंगें इसलिए इस दिन किया जा सकता है श्री कृष्ण जन्माष्टमीव्रत । 

      इसमें एक और बात है कि अष्टमी में पारण नहीं किया जाना चाहिए तो इसे अपनी अपनी सुविधानुशार बचा जाना चाहिए जैसे अबकी बार तो सोमवार  को प्रातः 10.08  जब नवमी लग रही है तो नवमी में पारण आसानी से किया जा सकता है किन्तु जब ऐसा नहीं होता है तब भी पारण नवमीं में ही करना चाहिए क्योंकि अष्टमी व्रत का अर्थ ही है जन्म तिथि का व्रत फिर उसमें भोजन कैसा ?

         यहाँ एक बात और ध्यान रखी जानी चाहिए कि रात्रि बारह बजे ही कृष्ण जन्म का कोई विधान नहीं है क्योंकि घड़ियों में बजने वाला समय सरकारों के द्वारा स्वीकार किया गया एक मानक समय होता है इसलिए सरकारें चाहें तो इस समय को अपनी सुविधानुशार घटा बढ़ा भी सकती हैं किन्तु श्री कृष्ण का जन्म समय ऐसे किसी मानक समय के आधीन नहीं हो सकता !इसलिए इसकी दो विधाएँ स्वीकार की जा सकती हैं पहली तो रात्रिमान का आधा करके सूर्यास्त में जोड़कर अर्धरात्रि का समय निकाले दूसरा चंद्रोदय के समय को प्रमाण मान लें जो प्रायः पंचांगों में लिखा रहता है । आदि आदि ॥



   



  



Monday, August 4, 2014

जनसंसद से केजरीवाल की ललकार, हिम्मत है तो चुनाव कराए भाजपा-dainik jagaran

  किन्तु केजरीवाल जी चुनाव होना तो रूटीन प्रोसेस है इसमें हिम्मत की क्या बात है और रूटीन प्रोसेस के लिए आप ललकार क्यों रहे हैं ?आप ने दिल्ली के चुनावों ललकारा फिर बहुमत नहीं मिला फिर वाराणसी में मोदी जी को ललकारा किन्तु वहाँ से पराजित होकर  भाग आए अब दिल्ली में चुनाव कराने के लिए ललकार रहे हैं आखिर चुनाव जीतने के लिए क्या तैयारी है आपकी !इतने दिनों में क्या कोई सेवाकार्य किए हैं आपने या केवल कुछ झूठ साँच आरोप लगाए हैं उनका जनता पर असर क्या हुआ ये परखने के लिए चुनाव कराना चाहते हैं आप !अरे !केजरीवाल जी हो सके तो जनता की सेवा कीजिए भावनाओं से खेलना बंद कीजिए !

Thursday, July 31, 2014

शंकराचार्य जी का आह्वान साईं घुसपैठियों से सावधान !

 साईं घुसपैठिए जगद्गुरू शंकराचार्य जी के जन जागरण से भयभीत क्यों हैं ?                  

    शंकराचार्य जी ने साईं घुसपैठियों को धार्मिक तस्करी करने से रोककर गलत क्या किया है ! कोई चोर रँगे हाथों पकड़ा जाए तो उसे बुरा तो लगेगा ही लगे तो लगने दो किसी को बुरा लगने के भय से हम अपनी धार्मिक मान्यताएँ क्या मिट जाने देंगे !

   "साईं संप्रदाय का सबसे बड़ा झूठ  'साईं डे ' अर्थात  साईं बाबा का दिन "

     बृहस्पति वार से साईं का सम्बन्ध क्या है ?इस दिन अनंत काल से बृहस्पति देवता एवं भगवान विष्णु की पूजा होती चली आ रही है सारी  दुनियाँ जानती भी इस दिन को इसी नाम से है ये करोड़ों वर्षों की शास्त्रीय संस्कृति भी है और परंपराओं  में भी यही माना जाता रहा है और अभी तक यही माना जा रहा है इसी बात के प्रमाण भी हैं किन्तु अभी कुछ वर्षों से साईं के घुसपैठियों ने इस बृहस्पति वार में साईं बुड्ढे को जबर्दश्ती घुसाना शुरू कर दिया है इसके पीछे इन लोगों के पास न कोई तर्क है न कोई प्रमाण न और कोई आधार !है तो केवल निर्लज्जता !!

  बृहस्पति वार को साईंवार कहने के नुक्सान !

      ज्योतिषीय दृष्टि से बृहस्पति  देवता के दिन को किसी ऐरे गैरे के नाम ऐसे कैसे कर दिया जाएगा और जो करेगा उससे बृहस्पति  देवता को बुरा तो लगेगा ही इससे बृहस्पति  देवता क्रोधित तो होंगे ही और ऐसे लोगों की जन्म पत्रियों में बृहस्पति देवता अच्छे की जगह अपना बुरा फल देने लगते हैं जिससे लोगों का नुक्सान होता है ! ऐसे लोगों  को बृहस्पतिदेवता से सम्बंधित जो जो लाभ मिलने चाहिए उनसे वे  बंचित रह जाते हैं और बृहस्पति देवता से सम्बंधित जो लाभ होने चाहिए उन्हीं उन्हीं  क्षेत्रों से जुड़े लाभ न होकर नुक्सान होने लगते हैं ! 

  

बृहस्पति के क्रोधित होने से नुक्सान क्या हो सकते हैं ?

बंधुओ! बृहस्पति के क्रोधित होने से हृदय रोग होने लगता है,घर से शिक्षा का वातावरण समाप्त होने लगता है, पढ़ने में मन नहीं लगता, भगवानों की पूजा में मन नहीं लगता,बड़े बूढ़ों का सम्मान समाप्त होने लगता है घर में कलह बढ़ने लगता है, विवाह विच्छेद होते देखे जाते हैं, बच्चे बच्चियों का सुख समाप्त होने लगता है बेटा बेटियाँ माता पिता के पदों को सस्पेंड करके शादी सम्बन्धी ऊँच नीच फैसले स्वयं करने लगते हैं जिससे गृह क्लेश बढ़ता है !संतान होने में बाधा होती है ऐसे लोगों को बृहस्पति सम्बन्धी कार्यों में नुक्सान होने लगता है जैसे सोना पीतल आदि से जुड़े पीले रंग के कार्य धन हानि करते हैं इनसे जुड़ी संपत्ति के खोने का भय बना रहता है और सबसे बड़ी बात कि सामाजिक प्रतिष्ठा समाप्त होने लगती है आदि आदि ! इसलिए बृहस्पतिवार को बृहस्पतिवार ही कहा जाए इसी में भलाई है और समाज के लिए यही शुभ फलदायक है !

 जब साईं  नाम का कोई ग्रह ही नहीं है तो साईंवार कैसे हो सकता है?

   साईं घुसपैठियों का बृहस्पतिवार को साईं वार कहने का ड्रामा !बृहस्पतिवार को साईं वार कहना कितना सही है !आप स्वयं सोचिए कि ग्रहों के दिन वही हो सकते हैं जिनके नाम के आकाश में ग्रह होते हैं वो ग्रह अपने अपने दिनों में शुभ या अशुभ फल दिया करते हैं किन्तु साईं वार का मतलब क्या है क्या इन्होंने साईं नाम का कोई ग्रह बनवाकर साईं पत्थरों को मंदिरों में घुसाने की तरह ही आकाश में भी साईं पत्थर घुसा कर टाँग रखा है क्या ?और यदि नहीं तो फिर ये धोखाधड़ी क्यों !आखिर क्यों मिस गाइड किया जा रहा है समाज को ? जब साईं  नाम का कोई ग्रह ही नहीं है तो साईं वार कैसे हो सकता है !फिर भी साईं घुस पैठियों के द्वारा शास्त्रीय मान्यताओं से समाज को भटकाने का उद्देश्य आखिर क्या है इसकी जाँच होनी चाहिए ! 

   

    साईं पत्थरों को मंदिरों में रखने से हानियाँ !

   मंदिरों में नाक मुख आँखें कान आदि बनाकर रखे गए साईं नाम के पत्थर पूजने से अनेकों प्रकार के नुक्सान हैं !मंदिरों में रखे गए साईं पत्थरों को पूजने से समाज को भारी  भ्रम होगा और कहीं आगामी पीढ़ियाँ भगवानों की प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियों को भी साईं पत्थरों की तरह ही पत्थर न समझने लगे जिससे अनादि कालीन सनातन संस्कृति से जुड़ी संतानें  भ्रमित होकर भटक न जाएँ इसलिए सनातन धर्मियों को मिलजुलकर अपने मंदिरों से साईं पत्थरों को जल्दी से जल्दी बाहर करना होगा अन्यथा सनातन मंदिरों का आस्तित्व ही समाप्त होता दिख रहा है कई सनातन धर्म के देव मंदिर आज साईं मंदिरों के नाम से प्रसिद्ध होने लगे हैं ये चिंता का विषय है !