Sunday, December 28, 2025

निवेदन !

प्राचीनविज्ञान और प्राकृतिक घटनाएँ ! 

       महामारी हो या प्राकृतिक आपदाएँ इनमें जनधन का नुक्सान  कहाँ कब कितना हो जाएगा | ये किसी को पता नहीं होता है | यदि पता हो भी जाए तो इसे केवल सहना होता है | इसके अतिरक्त ऐसी घटनाओं का मनुष्य और कर भी क्या सकता है | इतना अवश्य है कि ऐसी घटनाओं के बिषय में यदि पहले से पता कर लिया जाए  तो अपनी सुरक्षा के लिए यथा संभव प्रयत्न किए जा सकते हैं |  
     इसीलिए पूर्वजों ने ऐसी घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान लगाने की परिकल्पना की थी | पौराणिक इतिहास में वर्णन मिलता है कि सनातनधर्मी प्राचीन ऋषि वैज्ञानिक ऐसी घटनाओं के बिषय में लाखों वर्ष पहले पूर्वानुमान लगाने में सफल हो गए थे |उन्हीं अनुसंधानों के बल पर  सुदूर आकाश में घटित होने वाली सूर्य चंद्र ग्रहण जैसी घटनाओं के बिषय में उन्होंने उसी युग में पूर्वानुमान लगा लिया था | उन्होंने महामारी तथा प्राकृतिक आपदाओं के बिषय में पूर्वानुमान लगाकर यह प्रमाणित कर दिया था कि उन्होंने मौसम एवं महामारी जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान  लगाने  की क्षमता हासिल कर ली है | यही ऐसे अनुसंधानों की सार्थकता है |वर्तमानसमय में उन प्राचीनअनुसंधानों की उपेक्षा करके जिन अनुसंधानों की परिकल्पना की गई है || उनसे प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों को समझा जाना संभव ही नहीं हो पा रहा है |
       प्राचीनविज्ञान की उपेक्षा कर देने के कारण ही वर्तमान भूकंप वैज्ञानिकों के  द्वारा भूकंपों के बिषय में,मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा मौसम के बिषय में,पर्यावरण वैज्ञानिकों के द्वारा वायुप्रदूषण के बिषय में  एवं महामारी वैज्ञानिकों के द्वारा महामारी के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाया जाना अभी तक संभव नहीं हो पाया है | प्राचीनविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो भविष्य के दस हजार वर्षों तक ऐसा किया जाना संभव नहीं हो पाएगा | ऐसा इसलिए होगा क्योंकि जिन घटनाओं को समझने के लिए जिस बिषयवस्तु को विज्ञान मानकर अनुसंधानों के नाम पर जो जो कुछ किया जा रहा है | उसके आधार पर प्राकृतिक घटनाओं के न तो स्वभाव समझना संभव है और न ही सही अनुमान पूर्वानुमान लगाया जाना ही संभव है | 
     मैं अपने प्राचीनविज्ञान संबंधी अनुसंधानों के आधार पर विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि जिस दिन ऐसी सभी घटनाओं के वास्तविक विज्ञान को खोज लिया जाएगा | उसके आधार पर ज्ञानवान वैज्ञानिक तैयार कर लिए जाएँगे | उनके द्वारा ऐसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में जो अनुसंधान किए जाएँगे | उनसे प्राकृतिक घटनाओं की प्रकृति का पता तो लगा ही लिया जाएगा | इसके साथ ही साथ प्रकृतिकघटनाओं के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान भी लगा लिया जाएगा | जिस दिन ऐसा हो पाएगा उस दिन जलवायु परिवर्तन ,महामारी के स्वरूप परिवर्तन जैसे भ्रमों का निवारण  स्वतः ही हो जाएगा |                                                

                                       विज्ञान वैज्ञानिकों और अनुसंधानों का योगदान !

        कोरोनामहामारी में  इतने लोगों का मारा जाना कोई साधारण घटना नहीं है | ये बहुत बड़ी आपदा है | इसे बिना किसी निष्कर्ष पर पहुँचे यूँ ही भुला दिया जाना न तो भविष्य के लिए ठीक है और न ही  वर्तमान के लिए हितकर है |विगत कुछ दशकों में भारत को पड़ोसी देशों के साथ तीन युद्ध लड़ने पड़े | उन तीनों में मिलाकर जितने लोगों की दुर्भाग्य पूर्ण मृत्यु हुई थी | उससे कई गुणा अधिक लोग केवल कोरोना महामारी में ही मृत्यु को प्राप्त हुए हैं | 

   वर्तमान समय में अत्यंत उन्नत विज्ञान है, सुयोग्य  वैज्ञानिक हैं, निरंतर चलने वाले अनुसंधान हैं |अनुसंधानों के लिए धन एवं संसाधनों की कमी नहीं होने दी जाती है | जनता का पर्याप्त आर्थिक सहयोग भी मिलता है ,फिर वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा महामारी से पीड़ित जनता की सुरक्षा क्यों नहीं की जा सकी ! आखिर चूक कहाँ हुई !कैसे हुई !समय पर सही निदान क्यों नहीं किया जा सका | अनुमान पूर्वानुमान आदि जो लगाए जाते रहे वे गलत क्यों निकलते जा रहे थे | इस सबका  कारण खोजा जाना चाहिए | ऐसे अनुसंधानों से  उन्हें क्या मिला जिन्होंने महामारी में अपनों को  खोया है | 

     विज्ञान वैज्ञानिकों एवं अनुसंधानों का लक्ष्य महामारी से समाज की सुरक्षा करना था | अत्यंत उन्नत विज्ञान भी है,सुयोग्य  वैज्ञानिक भी हैं, और निरंतर चलने वाले अनुसंधान भी हैं |सबकुछ उच्चकोटि का होते हुए भी कोरोना महामारी से समाज की सुरक्षा नहीं की जा सकी | इसके कारणों को खोजा जाना चाहिए | 

     मेरे बिचार से महामारी संबंधी अनुसंधानों का लक्ष्य महामारी के बिषय में आगे से आगे पूर्वानुमान लगाना था !महामारी के स्वभाव को समझना था !महामारी पीड़ितों को प्रभावी चिकित्सा उपलब्ध करवाना था | महामारी  संबंधी अनुसंधानों के द्वारा  इन आवश्यक लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सका | महामारी में इतनी बड़ी मात्रा में लोगों के संक्रमित होने एवं मृत्यु को प्राप्त होने का यह बड़ा कारण था | 

      ऐसी परिस्थिति में जिन अनुसंधानों के करने कराने का उद्देश्य ही महामारी से समाज की सुरक्षा करना रहा हो | उनके होते हुए भी समाज को सुरक्षित न बचाया जा सका हो |इसमें उन अनुसंधानों की कोई घोषित भूमिका न रही हो | ऐसे अनुसंधानों के सहारे भविष्य को कैसे छोड़ा जा सकता है | महामारियों का आना जाना तो भविष्य में भी लगा रहेगा |हमें ऐसी तैयारी करके रखनी होगी कि कोरोना महामारी जैसी कोई महामारी या उसकी लहर यदि अभी फिर आकर लोगों को संक्रमित करने लगे तो अपनी वैज्ञानिक क्षमता के द्वारा समाज को सुरक्षित बचाया जा सके |  

                                कहाँ हैं महामारी बिषयक इन अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर !

        इतने उन्नतविज्ञान एवं वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा महामारी को समझना संभव होता तो समझ लिया गया होता | विज्ञान के बल पर लोगों को सुरक्षित बचाया जाना संभव होता तो बचा लिया गया होता ! महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाने संभव होते तो लगा लिए गए होते | किसी ने किसी को रोका तो नहीं था | आखिर क्या कारण रहा कि महामारी समाज को रौंदती रही किंतु वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा न तो उसको पहचाना जा सका और न ही उसके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान ही लगाया जा सका ! यहाँ तक कि जो  विशेषज्ञ  लोग महामारी को पराजित कर देने का दावा करते देखे जा रहे थे | उनके द्वारा इन  आवश्यक प्रश्नों के उत्तर भी नहीं खोजे जा सके हैं -

 1. कोरोना महामारी भयंकर थी इसलिए उसे पहचाना नहीं जा सका याकि वैज्ञानिक अनुसंधान इस स्तर के नहीं थे  | जिनसे महामारी की पहचान करना संभव हो पाता ने लायक नहीं थे ?

2.  महामारी का प्रभाव सभी पर एक समान पड़ता है फिर कुछ लोगों के रोगी होने का कारण क्या है !   

3 . प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने के कारण यदि लोग रोगी हुए तो कारण प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना है |  इसमें  महामारी का क्या दोष !

4.महामारीजनित  संक्रमण बढ़ने का कारण प्राकृतिक था या फिर कोविडनियमों के पालन न किए जाने से संक्रमण बढ़ता था  | 

5. महामारी की कोई  लहर के आने के बाद जब वो जाने  लगती थी, लोग संक्रमण मुक्त होने लगते थे |उसका कारण  समय प्रभाव या  कोविडनियमों का पालन  अथवा चिकित्सा का प्रभाव होता था ?

6.मौसम बिगड़ने के कारण महामारी आई या महामारी आने के कारण मौसम असंतुलित हुआ था !जिससे ऋतुएँ अमर्यादित होने लगी थीं ?

7 . महामारी आने पर भूकंप अधिक आए या भूकंप अधिक आने के कारण महामारी आई !

8 .महामारी आने के कारण वायुप्रदूषण बढ़ा या वायुप्रदूषण बढ़ने के कारण महामारी आई !  

9.महामारी आने के कारण तापमान में अधिक उतार चढ़ाव आया या तापमान अचानक घटने बढ़ने से महामारी आई ! 

10. महामारी का सबसे अधिक प्रभाव शरीर के किस अंग पर पड़ा तथा शरीर में किस किस प्रकार का रोग  या दिक्कत होने का कारण महामारी को माना जाए !    

     ऐसे ही महामारी मनुष्यकृत थी या प्राकृतिक,महामारी का विस्तार कितना था ! प्रसार माध्यम क्या था !अंतर्गम्यता कितनी थी !महामारी पर मौसम का प्रभाव पड़ता था था या नहीं !वायु प्रदूषण का प्रभाव पड़ता था या नहीं  !तापमान का प्रभाव पड़ता था या नहीं ! महामारी पैदा होने का कारण क्या था और महामारी समाप्त होने का कारण क्या था ?महामारी पैदा और समाप्त होने में मनुष्यकृत अच्छे बुरे व्यवहारों की क्या भूमिका थी | महामारी संबंधी लहरों के आने और जाने में मनुष्यकृत व्यवहारों की क्या भूमिका थी ?  

     वर्तमानसमय में महामारी शांत है यह प्राकृतिक कारणों से शांत हुई है या कोविडवैक्सीन लगाए जाने से अथवा कोविडनियमों के पालन से ! वर्तमानसमय में जिन चिकित्सकीय प्रयोगों को  कोरोना महामारी से मुक्ति दिलाने में सक्षम मान लिया गया है | क्या वे वास्तव में सक्षम हैं या केवल मान ही लिया गया है | ऐसा इसलिए सोचा जाना आवश्यक है !क्योंकि प्लाज्माथैरेपी  को भी तो कुछ समय तक महामारीजनित संक्रमण से मुक्ति दिलाने में सक्षम मान लिया गया था | दूसरी लहर आने पर वह अनुमान गलत निकला !

     इसी प्रकार से संभव है कि महामारी का वेग शांत होने में चिकित्सा वैक्सीन आदि  मनुष्यकृत प्रयत्नों की कोई भूमिका ही न रही हो |महामारी  संबंधी संक्रमण स्वतः शांत हो रहा हो |प्लाज्मा थैरेपी की तरह ही एक बार फिर से ऐसा कोई भ्रम ही पाल लिया गया हो |सच्चाई क्या है ये तो तभी पता लग पाएगा ,जब महामारी की कोई दूसरी लहर आएगी |प्लाज्माथैरेपी को भी पहली लहर के समय संक्रमण से मुक्ति दिलाने में प्रभावी मान लिया  गया था | दूसरी लहर न आती तो  ये भ्रम न टूटता | दूसरी लहर आते ही सच्चाई सामने आ गई कि प्लाज्माथैरेपी महामारी से  मुक्ति दिलाने में सक्षम नहीं है | 

    इसीप्रकार से महामारी की जब तक कोई अन्य लहर नहीं आती है तब तक यह कहा जाना उचित नहीं होगा कि कोरोना महामारी से मुक्ति दिलाने में वैक्सीन आदि मनुष्यकृत प्रयत्नों से कोई मदद मिली है या नहीं  |

                                                कहाँ है महामारी को समझने का विज्ञान ! 

     चिकित्सासिद्धांत के अनुसार  कोरोनामहामारी से समाज की सुरक्षा करने के लिए महामारी को अच्छी प्रकार से समझा जाना आवश्यक था | इसलिए महामारी को समझकर जो जो अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जा रहे थे | वे सही निकलने चाहिए थे,तब तो ये मानलिया जाता कि महामारी को समझ लिया गया है ! किंतु वे गलत निकलते चले गए | इसका मतलब था कि कोरोना महामारी को  समझने के जो दावे किए जा रहे थे | वे  सच नहीं थे | लोग संक्रमित होते जा रहे थे | उनमें से बहुतों की मृत्यु होती जा रही थी | महामारी संबंधी अनुमान आदि निरंतर गलत निकलते जा रहे थे | जो महामारी संबंधी समझ पर निरंतर प्रश्न चिन्ह लगाते जा रहे थे | 

     कुलमिलाकर महामारी के बिषय में अनुसंधानों के आधार पर वैज्ञानिक जो जो अनुमान लगाते रहे !वो गलत निकलते जा रहे थे |कहा गया कि तापमान कम होने पर कोरोना बढ़ेगा, किंतु ऐसा नहीं हुआ !कोरोना की तीन लहरें तब आईं जब तापमान बढ़ा हुआ था | केवल तीसरी लहर सर्दी में अर्थात जनवरी 2022 में आई थी | ऐसे में यह कैसे कहा जाए कि कोरोना संक्रमण का तापमान बढ़ने घटने से कोई संबंध था या नहीं !  

    ऐसे ही  बताया गया कि  वायुप्रदूषण बढ़ने पर कोरोना बढ़ेगा ,किंतु ऐसा हुआ तो नहीं |सन 2020 के अक्टूबर नवंबर में जब वायुप्रदूषण दिनोंदिन बढ़ता जा रहा था किंतु कोरोनासंक्रमण  दिनोंदिन कम होता जा रहा था | दूसरी ओर मार्च  अप्रैल 2021 में जब वातावरण इतना  स्वच्छ था कि पंजाब के अमृतशर एवं बिहार के  सीतामढ़ी से हिमालय दिखाई देने लगा था ! इसी समय कोरोना की सबसे भयानक दूसरी लहर आई थी |  

     इसी प्रकार से कोविड  नियमों का पालन न करने से कोरोना संक्रंमण बढ़ने की बात कही गई थी किंतु  बिहार बंगाल की चुनावी रैलियों में ,दिल्ली के किसान आंदोलन में दिल्ली मुंबई  सूरत आदि से पलायित श्रमिकों में ,घनी बस्तियों में, सामूहिक रहन सहन में कोविड नियमों का पालन न होने पर भी संक्रमण दिनोंदिन घटता जा रहा था |  

    प्लाज्मा थैरेपी से कोरोना नियंत्रित होगा !रेमडेसिविर इंजेक्शन से कोरोना नियंत्रित  होगा | ऐसे जितने भी अनुमान या पूर्वानुमान लगाए जाते रहे |  वे गलत निकल  जाते रहे | उनका सही न निकलना विशेषज्ञों की महामारी संबंधी समझ पर संशय पैदा करता रहा है | 

      ऐसे में महामारी  संबंधी  अध्ययनों अनुसंधानों के आधार पर जिन महामारी विशेषज्ञों के द्वारा  जो अनुमान  पूर्वानुमान आदि लगाए गए थे | वे यदि सही निकलते तो उन्होंने महामारी के स्वभाव को समझ लिया है  | ऐसा विश्वास हो जाता | ऐसा हुआ नहीं ! उन्हीं अनुसंधानों के आधार पर उन्हीं विशेषज्ञों के द्वारा महामारी के बिषय में जो जो कुछ और बताया जाता रहा !वो सही नहीं निकला | इससे उन बातों पर भी संशय होना स्वाभाविक है |  महामारी के  बिषय में जो  विशेषज्ञों के द्वारा कही जाती रही हैं | 

    कुल मिलाकर  महामारी को पराजित कर देने या कोरोना को खदेड़ देने या महामारी पर विजय प्राप्त कर लेने जैसे बड़े बड़े दावे  न जाने किस वैज्ञानिक बल पर किए जा रहे थे | कोरोना महामारी को समझने एवं उसपर विजय प्राप्त कर लेने लायक ऐसी कौन सी क्षमता हासिल कर ली गई थी | जिसके बलपर महामारी को बार बार ललकारा जा रहा था |  

                                         सामान्य रोगों और महामारी में अंतर !

    किसी को कोई भी रोग जब होता है तो उस रोगी को रोग से मुक्ति दिलाने के लिए रोग की प्रकृति को समझना आवश्यक होता है | उसी के आधार पर औषधिदान या चिकित्सा आदि का निर्णय लिया जाता है|रोग के निदान के अनुसार ही चिकित्सा करने से रोग से  मुक्ति मिल जाती है |रोग के परीक्षण में मशीनों से बड़ी मदद मिल जाती है |चिकित्सा का निर्णय लेना आसान होता है | तैयार औषधियाँ मिल जाती हैं | इसके अतिरिक्त भी जिन जिन आवश्यक औषधियों संसाधनों आदि की आवश्यकता होती है | वो पर्याप्त मात्रा में मिल जाती हैं |सुयोग्य चिकित्सक आसानी से सुलभ हो जाती हैं | 

   महामारी  में ऐसा नहीं होता है | महामारी में बहुत लोग एक साथ अस्वस्थ होते हैं | उन सबकी जाँच उसी समय उसी प्रकार से किया जाना संभव नहीं  हो पाता है | किसी एक व्यक्ति को होने वाले  रोग की अपेक्षा महामारी में होने वाले रोगों  में बहुत अंतर होता है | 

 1. एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों का रोग परीक्षण तुरंत कर लिया जाता है किंतु महामारी संक्रमितों का परीक्षण इतना आसान नहीं होता है !महामारियों में रोग इतने भ्रामक होते हैं कि उनका परीक्षण उतना आसान नहीं होता है |इसलिए रोग को समझने एवं उससे मुक्ति दिलाने की औषधि का निर्णय लेने में काफी समय लग जाता है | 

 2. कुछ व्यक्तियों की चिकित्सा के लिए निर्मित औषधियाँ मिल जाती हैं किंतु महामारी संक्रमितों की संख्या बहुत अधिक होती है | इसलिए उतनी बड़ी मात्रा में औषधियों का तुरंत निर्माण करना होता है |औषधीय द्रव्यों का संग्रह करना होता है | औषधि निर्माण के लिए उतनी बड़ी मात्रा में संसाधनों की आवश्यकता होती है | निर्मित औषधियों को जनजन तक पहुँचाने की चुनौती होती है | इसके लिए काफी समय चाहिए होता है |   

3. महामारी का वेग इतना अधिक होता है कि तेजी से लोग संक्रमित होने लगते हैं कुछ लोगों की मृत्यु होते देखी  जाती है | ऐसे कठिन समय में औषधियाँ चिकित्सा आदि तुरंत उपलब्ध हो तब भी लोगों की पूरी तरह से सुरक्षा नहीं की जा सकती है | 

 4. महामारी संबंधी पूर्वानुमानों के अभाव में महामारी के आने की सूचना ही तब मिल पाती है जब बड़ी संख्या में लोग रोगी होने लगते हैं | उस समय महारोग की प्रकृति पहचानने,रोग का परीक्षण करने ,चिकित्सा का निर्णय लेने में ,औषधीय द्रव्यों का संग्रह करने में, इतनी अधिक मात्रा में औषधि निर्माण करके उसे जनजन तक पहुँचाने में जितना समय लगता है | उतने समय तक महामारी प्रतीक्षा तो नहीं करती रहेगी | तब तक तो बहुत बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हो चुके होते हैं | 

     इसलिए महामारी आने से उतने पहले तो  महामारी आने के बिषय में पता लगा ही लिया जाना चाहिए | जितना समय महामारी से सुरक्षा करने की तैयारी प्रक्रिया में लगता है | जो महामारी से सुरक्षा के लिए की जाती है | महामारी की किसी भी लहर के आने से पहले  उसके बिषय में यदि पूर्वानुमान पता लगाए जा पाते तो कोविड  नियमों का पालन करके या अन्य आवश्यक सावधानियाँ बरतकर लोगों की सुरक्षा के लिए कुछ प्रभावी प्रयत्न किए जा सकते थे |पूर्वानुमान पता न होने से जो आवश्यक सावधानियाँ बरती जा सकती थीं वो नहीं  किया जा सका |                                         

     किसी रोगी की चिकित्सा करने के लिए रोग रोगी एवं औषधि एवं महामारी संबंधी बिषाणुओं  के अनुसार उस योग्य औषधियों का प्रयोग करना होता है | यही तैयारी  महामारी से सुरक्षा के लिए करनी हो तो बड़े स्तर पर संसाधनों की आवश्यकता होती है | ऐसी तैयारियों में समय काफी अधिक समय लग जाता है |इसलिए  महामारियों के आ जाने पर यह सब कुछ तुरंत किया जाना संभव नहीं हो  पाता है | इसके लिए उतना समय चाहिए, जितने में इतनी बड़ी तैयारी की जा सकती हो | वह समय तभी मिल सकता है जब पहले से सही पूर्वानुमान पता लग सके | 

                                पूर्वानुमानों के बिना महामारी से सुरक्षा असंभव !

    चिकित्सा में किस रोग से मुक्ति दिलाने के लिए  किस प्रकार की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए | औषधिनिर्माण के लिए किस प्रकार के औषधीय द्रव्यों का संग्रह करना होगा |इसका निर्णय उस रोग की प्रकृति पहचानकर लेना होता है |इसके लिए तरह तरह से रोग महारोग औषधि एवं शरीरों की तत्कालीन परिस्थिति समझना  आवश्यक होता है | उसी के आधार परमहामारी पीड़ितों की सुरक्षा की जा सकती है | इसके लिए समय चाहिए |  

    महामारी के अचानक आ जाने पर लोग तेजी से संक्रमित होने एवं मृत्यु को प्राप्त होने लगते हैं ,तब इतना समय कहाँ होता है कि लोगों की सुरक्षा के लिए इतनी सारी परीक्षण प्रक्रिया का पालन किया जा सके | इस प्रक्रिया में जितना समय लगता है | उतने में तो महामारी जनधन का बहुत अधिक नुकसान कर चुकी होती है |जिसे देखकर औषधियों टीकों आदि का प्रयोग सभी लोगों पर एक जैसा  कर दिया जाता है ,किंतु सभी लोग न तो एक जैसे रोगी होते हैं और न ही उन्हें एक जैसी औषधि की आवश्यकता होती है | उन सभी के शरीर भी एक जैसी प्रतिरोधक क्षमता से युक्त नहीं होते हैं | थोड़ा बहुत अंतर तो सभी में होता है फिर एक जैसी औषधि एक जैसी मात्रा में सभी को देकर उन्हें स्वस्थ कैसे किया जा सकता है | 

    अंदाजे से दी जाने वाली ऐसी औषधियों टीकों आदि से वे तो स्वस्थ हो  जाते हैं | जिन्हें उनकी आवश्यकता होती है|जिन शरीरों को ऐसी औषधियों टीकों आदि की आवश्यकता बिल्कुल ही नहीं होती है | उनमें  इनके सेवन से छोटे बड़े तमाम प्रकार के दुष्प्रभाव प्रकट होते हैं | कोरोना महामारी के बाद भी बहुत स्वस्थ लोगों की मृत्यु होते  देखी जाती रही है |ऐसे दुष्प्रभावों से बचने के लिए चिकित्सा से पूर्व रोग औषधि एवं शरीरों की प्रकृति का अध्ययन करना आवश्यक होता होता है |महामारी के अचानक आ जाने पर इतने कम समय में न तो इस प्रकार के अध्ययन किए जा सकते हैं और न ही औषधीय द्रव्यों का संग्रह किया जा सकता है | औषधि निर्माण करने में , निर्मित औषधियों  का परीक्षण करने में ,परीक्षित औषधियों  को जन जन तक पहुँचाने में  बहुत समय लग जाता है| 

   महामारी जैसी घटनाओं के समय ये व्यवस्था बहुत बड़े स्तर पर करनी होती है | जितने बड़े स्तर पर करनी होती है | उतना अधिक समय लगता है | यही व्यवस्था राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जानी हो तो सामग्री, परिश्रम एवं संसाधनों के साथ साथ इसमें समय भी बहुत अधिक लग जाता है | 

   इतने समय तक महामारी  रुककर  प्रतीक्षा  तो  नहीं करती रहेगी | संक्रमितों पर मनुष्यकृत प्रयत्नों का प्रभाव पड़ने के लिए जो समय चाहिए वो कैसे मिल पाता | इतने कम समय में संक्रमितों की चिकित्सा हेतु  औषधि कैसे तैयार कर ली जाएगी | इतनी अधिक मात्रा में औषधि निर्माण के लिए अधिक संसाधनों को जुटाया जाना कैसे संभव हो पाएगा |  

   इसीलिए महामारी आ रही है या महामारी कब आ रही है | इसका पहले से पता लगाया जाना ही एक मात्र विकल्प है | जिससे महामारी आने से पूर्व वह सब तैयारी करके रखी जा सके जो महामारी से सुरक्षा के लिए आवश्यक होती है | ऐसा तभी किया जा सकता है जब महामारी जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमानु लगाने के लिए कोई मजबूत वैज्ञानिक प्रक्रिया हो | ऐसी किसी प्रक्रिया के अभाव में इसके शुरू होने का पता ही तभी लग पाता है ,जब लोग पीड़ित होने शुरू हो जाते हैं तब तो सभी को अपनी अपनी जान बचाने की पड़ी होती है | उस समय इतनी बड़ी अनुसंधान प्रक्रिया का पालन कैसे कर लिया जाएगा | इसके लिए समय ही नहीं होता है |  

 

 

कहाँ है पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान !     

    महामारी में वैज्ञानिक अनुसंधानों से कोई मदद न मिल पाने के कारण  समाज को विवश होकर अपना  एवं अपनों का जीवन महामारी के आगे परोस देना पड़ा ! अक्सर लगता है कि पूर्वानुमानों के गलत निकलने का कारण पूर्वानुमान लगाने में कोई गलती छूट गई होगी ,किंतु ऐसा नहीं था |पूर्वानुमान लगाने के लिए जब कोई विज्ञान ही नहीं है तो पूर्वानुमान लगाया ही कैसे जा सकता है | 

   विश्व में अभी तक ऐसा कोई विज्ञान नहीं है |जिससे भविष्य में झाँका जा सकता हो |भविष्य को देखे समझे पूर्वानुमान लगाए बिना भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है  | इसीलिए तो आज तक पूर्वानुमान लगाने में विश्व का कोई भी वैज्ञानिक सफल नहीं हो पाया है |भविष्य में भी ऐसी आशा नहीं की जानी चाहिए |  

     किसी घटना के बिषय में सही अंदाजा(पूर्वानुमान ) लगाने का सामान्य नियम तो यह होता है कि उस घटना के बिषय में जितना जो कुछ पता हो उसके आधार पर जो न पता हो उसे पता लगाने का प्रयत्न किया जाए | यदि वह सही घटित होने लगे तो उसी के आधार पर यह  समझ लिया जाए कि यह अंदाजा जनहित के उद्देश्य से  कितना उपयोगी है | 

    प्राकृतिक घटना के बिषय में सब कुछ पता करने के लिए उस कुछ के आधार पर भविष्य संबंधी अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाते हैं | वे अनुमान पूर्वानुमान यदि सही निकल जाते हैं ! इसका मतलब उस घटना के बिषय में जो कुछ पहले से पता लगाया गया  था वो सही था | जो सही निकला  वही विज्ञान है | वे अनुमान पूर्वानुमान यदि गलत निकल जाते हैं तो इसका मतलब उस घटना के बिषय में जो जो कुछ समझा गया है वो  सही नहीं है |इसलिए विज्ञान नहीं है | 

    इसी प्रक्रिया के अनुसार महामारी को समझकर उसके आधार पर महामारी के बिषय में कुछ अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए गए थे | यदि वे सही निकल जाते तो  मान लिया जाता कि महामारी को समझने में सफलता मिल गई है | उसी के आधार पर महामारी से सुरक्षा के लिए या संक्रमण से मुक्ति दिलाने के लिए औषधि टीका आदि बनाए जा सकते थे | महामारी के स्वभाव को समझा ही नहीं जा सका तो उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि कैसे लगाए जा सकते थे |इसीलिए जो लगाए गए वे सही नहीं निकले | कोई औषधि वैक्सीन आदि बनाने के लिए भी पहले महामारी को समझा जाना आवश्यक था | 

    महामारी को समझ लेने के वैज्ञानिकों के द्वारा दावे किए जा रहे थे | उसी  जानकारी के आधार पर कोरोना महामारी के बिषय में विशेषज्ञों के द्वारा जितने भी अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जाते रहे वे गलत  निकल जाते रहे | जिससे यह प्रमाणित हो जाता है कि उनके द्वारा महामारी के बिषय में जो जो कुछ समझा गया था वो सही नहीं था | इसीलिए उस समझ के आधार पर महामारी के बिषय में जो जो कुछ बताया जा रहा था वो भी सही नहीं निकल रहा था | इसलिए उस जानकारी के आधार पर  महामारी से मुक्ति दिलाने के लिए प्रभावी औषधि वैक्सीन आदि कैसे बनाई जा सकती थी | 

     

   


       इतना उन्नत विज्ञान और इतने भ्रामकपूर्वानुमान !

      विश्व के अधिकाँश देशों में प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई कोई विज्ञान नहीं है इसलिए वैज्ञानिक भी नहीं हैं | इसीलिए अनुसंधान भी नहीं होते हैं | सारे काम अंदाजे से चलाए जा रहे हैं | ऐसी स्थिति में समाज को मौसम या  महामारी वैज्ञानिक कैसे मिलें | जो प्राकृतिक आपदाओं या महामारियों से जनता की सुरक्षा करने में कुछ तो  समर्थ हों | 

    प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित वैज्ञानिकों का योगदान इतना नगण्य होता है कि उनके पूर्वानुमानों से जनता को कोई लाभ नहीं मिल पाता है | ये ध्यान देने की बात है कि यदि मौसम वैज्ञानिकों को मौसम के बिषय में कुछ न पता हो,भूकंप वैज्ञानिकों को भूकंपों के बिषय में कुछ न  पता हो एवं महामारी वैज्ञानिकों को महामारी के बिषय में कुछ न पता हो तो उससे संबंधित वैज्ञानिकों की जनहित में उपयोगिता ही क्या बचती है | 

    भूकंपों के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई विज्ञान नहीं है ,फिर भी समय  समय पर  वैज्ञानिकों को यह कहते सुना जाता है कि निकट भविष्य में हिमालय में बहुत बड़ा भूकंप आएगा | कब आएगा !ये नहीं बताया जाता है| ऐसी भविष्यवाणियों का आधार क्या होता है ?इसका  विज्ञान कहाँ है ?ऐसी अफवाहें फैलाई क्यों  जाती हैं | अकारण ऐसा बोलने की आवश्यकता क्या है | ऐसा कोई  विज्ञान नहीं है | जिससे भूकंप को समझा जा सका हो |अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाए जा सके हों |  इसके बाद भी भूकंप वैज्ञानिक होते हैं |उनमें वैज्ञानिकता क्या है | 

     ऐसे ही  मौसमविज्ञान के आधार पर  लगाए गए मौसमसंबंधी पूर्वानुमान सही निकलेंगे | ये विश्वास पूर्वक नहीं कहा जा सकता है| दीर्घावधि पूर्वानुमान प्रायः गलत निकलते देखे  जाते हैं|ऐसी स्थिति में जिनके द्वारा दो चार दिन पहले  के लगाए गए  पूर्वानुमान नहीं निकल पाते हैं | उन्हीं मौसम वैज्ञानिकों को यह कहते सुना जाता है कि जलवायुपरिवर्तन के कारण आज के सौ दो सौ वर्ष बाद सूखा पड़ेगा ! बार बार आँधी तूफ़ान आएँगे ! तरह तरह के रोग महारोग फैलेंगे !तापमान बहुत अधिक बढ़ जाएगा ! ग्लेशियर पिघल जाएँगे आदि आदि ! यदि भविष्य में झाँकने के लिए कोई विज्ञान ही नहीं है तो  ऐसा सब कुछ कहे  जाने का  आधार क्या होता है |

     ऐसा विज्ञान कहाँ है जिसके आधार पर हिमालय में किसी  भूकंप के आने की  संभावना पता लगा ली जाती है | जलवायु परिवर्तन के परिणाम स्वरूप सौ दो सौ वर्ष बाद  कैसी कैसी प्राकृतिक घटनाएँ घटित होंगी | यह कैसे पता लगा लिया जाता है | महामारी की लहरों के बिषय में विभिन्न वैज्ञानिकों के  द्वारा अनुमान पूर्वानुमान बदल बदल कर बार बार बताए जा रहे होते हैं | इन सबका विज्ञान कहाँ है |     

     कहने को तो उन्नत विज्ञान है किंतु भविष्य में झाँकने के लिए कोई विज्ञान नहीं है | इसलिए वैज्ञानिकों के पूर्वानुमानों में और जनता के अंदाजे में कोई अंतर नहीं होता है| ऐसी स्थिति में  आधुनिक विज्ञान संबंधी अनुसंधानों के द्वारा यदि प्राकृतिक घटनाओं महामारियों आदि के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना संभव नहीं है तो भारत के प्राचीन विज्ञान का सहयोग लेकर ऐसी घटनाओं से लोगों की सुरक्षा कर ली जानी चाहिए | 

 विशेषज्ञों के द्वारा जब ऐसे पूर्वानुमान लगाए जाते हैं | उनके  सही निकलने पर उन्हें पूर्वानुमान और गलत निकलने पर इसका कारण जलवायु परिवर्तन बताया जाता है | ऐसे ही महामारी बिषयक पूर्वानुमानों के गलत निकलने के लिए महामारी के स्वरूप परिवर्तन को जिम्मेदार बता दिया जाता है |इस प्रक्रिया से महामारी जैसे प्राकृतिक संकटों  से जनधन की सुरक्षा किया जाना संभव नहीं है | 

 अनुसंधान  के लिए यदि ऐसी कोई वैज्ञानिकप्रक्रिया होती जिससे महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना संभव होता तो लगा लिया गया होता |महामारी को नियंत्रित किया जाना संभव होता तो ऐसा कर लिया गया होता | महामारी का स्वभाव समझा जाना संभव होता तो समझ लिया गया होता ! 

    कारण की उपेक्षा और कार्य का पूर्वानुमान ! असंभव !!

     कारण का अर्थ जो  घटना जिस कारण से घटित हो रही होती है | उस घटना को समझने के लिए उस कारण को समझना होता है | महामारी को समझने के लिए महामारी के पैदा होने या महामारी संबंधित संक्रमण बढ़ने के लिए या महामारी को शांत करने का उपाय खोजने के लिए उस कारण को ही समझना पड़ेगा !उसी के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना पड़ेगा | कारण का अध्ययन जितना सही सटीक होगा | महामारी को भी उतने ही अच्छी प्रकार से समझा जा सकेगा | कारण के आधार पर  ही महामारी को समझने  या उससे लोगों का बचाव करने अथवा संक्रमितों को महामारी से मुक्ति दिलाने के लिए उपाय खोजा जाना था ,किंतु महामारी के निश्चित कारण को खोजा  नहीं जा सका | 
    प्रकृति की जिस घटना को महामारी पैदा होने या उससे संबंधित संक्रमण बढ़ने घटने के लिए जिम्मेदार कारण बताया गया |उसका महामारी से कोई संबंध सिद्ध नहीं किया जा सका | दूसरी बात उस कारण को समझने,उसकी प्रकृतिखोजने एवं  उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने आदि के लिए कोई विज्ञान नहीं है | इसलिए ऐसा सब कुछ खोजा जाना संभव न हो सका | यदि ऐसा करने के लिए कोई विज्ञान होता तो ऐसा किया गया होता |किसी ने ऐसा करने से रोका नहीं था | 
      महामारीविशेषज्ञों के द्वारा समय समय पर कहा जाता रहा है कि महामारी आने या महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने घटने का कारण मौसमसंबंधी गतिविधियाँ हैं|इसका मतलब महामारी को समझने के लिए मौसम को समझना होगा | महामारी की प्रकृति (स्वभाव )को समझने के लिए  मौसम की प्रकृति को समझना होगा | महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए मौसम संबंधी घटनाओं के बिषय  में  सही  पूर्वानुमान आदि लगाना  होगा | महामारी को शांत करने के लिए  लिए  मौसम संबंधी उस प्रकार के दुष्प्रभाव शांत करने होंगे या उनसे बचना होगा | 
 
   मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने में यदि गलती रह गई तो उसके आधार पर लगाए  गए महामारी बिषयक  पूर्वानुमान भी गलत निकल जाएँगे  |मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने में जब गलती हो जाती है तो वे गलत निकल जाते हैं | पूर्वानुमान लगाने में हुई गलती स्वीकार करने के बजाए | इसके लिए जलवायुपरिवर्तन को जिम्मेदार बता दिया जाता है | मौसम संबंधी ऐसी गलती के कारण उसके आधार पर लगाए गए महामारी संबंधी पूर्वानुमान  भी गलत निकल जाते हैं |इसके लिए महामारी के स्वरूपपरिवर्तन को जिम्मेदार माना जाता है ,जबकि ऐसे अनुमानों पूर्वानुमानों के गलत निकलने का कारण पूर्वानुमान लगाने  वाले विज्ञान  का अभाव है | इसीलिए कारण  के बिषय में  पूर्वानुमान लगाने में गलती होने का प्रभाव कार्य अर्थात उस घटना  के बिषय में पूर्वानुमान लगाने पर भी पड़ेगा |          

   इसीप्रकार से महामारी आने जाने एवं उससे संबंधित संक्रमण बढ़ने घटने के लिए यदि तापमान बढ़ने घटने या वायुप्रदूषण बढ़ने घटने को जिम्मेदार माना जाएगा तो भी मौसम जैसी अनुसंधान समस्या का ही सामना करना होगा | महामारी संबंधी पूर्वानुमान लगाने के लिए पहले तापमान या वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के बिषय में पूर्वानुमान लगाना होगा | यदि वह सही निकलेगा तभी उसके आधार पर महामारी के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा | यदि तापमान बढ़ने घटने के बिषय में अभी तक पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं हो पाया है तो महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना कैसे संभव हो पाएगा | ऐसे ही वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के बिषय में पूर्वानुमान लगाना तो दूर अभी तक इसके बढ़ने घटने के लिए जिम्मेदार कारण ही नहीं खोजे जा सके हैं,तो इसके बिषय में पूर्वानुमान कैसे लगाए जा सकेंगे |ऐसा किए बिना महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना संभव न हो  पाएगा |

       कुल मिलाकर अभी तक ऐसा कोई विज्ञान खोजा ही नहीं जा सका है |जिसके आधार पर मौसम तथा महामारी को समझा जाना संभव हो |अभी तक  मौसम के प्रभाव से प्रभावित होने वाली महामारी को समझना एवं उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना संभव ही नहीं  हो पाया है |इसीलिए महामारी  के विभिन्न विशेषज्ञों के  द्वारा महामारी की लहरों के आने और जाने  के बिषय  में लगाए गए सैकड़ों पूर्वानुमान लगातार गलत निकलते चले गए !जो मीडिया के विभिन्न माध्यमों में  विद्यमान हैं | 
    मेरा उद्देश्य विज्ञान के गौरव को घटाना नहीं है प्रत्युत कुछ ऐसा प्रयत्न करना है | जिससे विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में  कुछ महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई जा सके | जिसके आधार पर  भविष्य के लिए सही दिशा में कुछ प्रभावी कदम उठाए  जा सकें | जो ऐसी घटनाओं में होने वाली जनधन हानि को कम करने में सहायक हो सकें |


 

      कुल मिलाकर  महामारी से जनधन की सुरक्षा करने के लिए यदि कुछ भी नहीं था तो फिर महामारी पर विजय प्राप्त कर लेने के दावे या महामारी को पराजित कर देने की बातें |किस बल पर की जा रही थीं | महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए जब विज्ञान ही नहीं है तो  समय समय पर जो पूर्वानुमान बताए जा रहे थे |  उनका आधार  यदि विज्ञान नहीं है तो और क्या था | 

 

 

 

 

 महामारी की प्रत्येक लहर के बिषय में मैंने सही पूर्वानुमान लगाए तथा पीएमओ की मेल पर आगे से आगे भेजे भी वे सही भी  निकले ! किंतु  उन पर न तो बिचार किया गया और न मुझसे संपर्क ही किया गया | इसलिए मेरे द्वारा लगाए गए पूर्वानुमानों का लाभ न तो जनता को मिल सका और न सरकारों को ही योजना बनाने में उससे सहयोग मिल पाया |मुझे छोड़कर विश्व के किसी भी वैज्ञानिक ने महामारी की किसी भी लहर के बिषय में पहले से कोई पूर्वानुमान लगाया हो और वह सही निकला हो | ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता है |

     ऐसी परिस्थिति में महामारी जैसे स्वास्थ्य संकटों से यदि जनधन की रक्षा की जानी है तो किसी एक विज्ञान और वैज्ञानिकता का अभिमान छोड़कर मुख्य ध्यान उस समस्या पर देना होगा |जिससे जनधन की सुरक्षा करने के लिए अनुसंधान किए  जाते हैं |  इसलिए  वास्तव में यदि महामारियों में होने वाली जनधन हानि को कम करने का लक्ष्य है तो सबसे पहले  यह पता लगाना होगा कि महामारी से जनधन की सुरक्षा करने में कितना समय लगेगा | रोग का सही निदान और चिकित्सकीय उपाय करने के लिए जितना समय चाहिए | महामारी आने से उतने पहले महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान पता लगा लेना आवश्यक होता है | जिससे महामारी से सुरक्षा की तैयारियाँ पहले से करके रखी जा सकें |  


       किसी भी रोग या महारोग से मुक्ति पाने या दिलाने के लिए उस रोग के अनुसार ही औषधि देनी होती है | किस रोग के लिए कैसी औषधि दी जानी चाहिए | इसका निर्णय उस रोग की प्रकृति पहचानकर लेना होता है | यदि रोग की प्रकृति ही न पहचानी जा सकी हो तो औषधि का निर्माण किस आधार पर कर लिया जाता और कैसे कर ली जाती संक्रमितों की चिकित्सा ! औषधि निर्माण के लिए बड़ी मात्रा में औषधीय द्रव्यों का संग्रह करना होता है |औषधि निर्माण के लिए अधिक संसाधनों को जुटाया जाना होता है | सही औषधि को समझे बिना औषधीय द्रव्यों का संग्रह किया जाना कठिन था |  इसके बाद औषधि निर्माण किए  जाने या  निर्मित औषधि का परीक्षण किए  जाने आदि में  काफी  समय लग जाता है | इसके बाद उस औषधि को जन जन तक पहुँचाना होता है |इसमें  बहुत समय लग जाता है | 

      इस प्रकार की व्यवस्था जितने बड़े स्तर पर करनी होती है | उतना अधिक समय लगता है | राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर की जानी हो तो सामग्री, परिश्रम एवं संसाधनों के साथ साथ इसमें समय भी बहुत अधिक लग जाता है | इतने समय तक महामारी  रुककर  प्रतीक्षा  तो  नहीं करती रहेगी | महामारी  के प्रारंभ होते ही लोग तेजी से संक्रमित होने एवं मृत्यु को प्राप्त होने लगते हैं ,तब इतना समय कहाँ होता है कि लोगों की सुरक्षा के लिए इतनी सारी प्रक्रिया का पालन किया जा सके |इस प्रक्रिया में जितना समय लगता है|उतने में तो महामारी जनधन का बहुत नुकसान कर चुकी होती है | 

    इसलिए  महामारियों में होने वाली जनधन हानि को यदि कम करना है तो महामारी प्रारंभ होने से उतने पहले उससे सुरक्षा की तैयारियाँ करके रखनी होंगी | रोग का सही निदान और चिकित्सकीय उपाय करने के लिए जितना समय चाहिए | महामारी आने से उतने पहले महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान पता लगा लेना आवश्यक होता है | जिससे महामारी से सुरक्षा की तैयारियाँ पहले से करके रखी जा सकें | 
      ऐसा तभी किया जा सकता है जब महामारी जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमानु लगाने के लिए कोई मजबूत वैज्ञानिक प्रक्रिया हो | ऐसी किसी प्रक्रिया के अभाव में इसके शुरू होने का पता ही तभी लग पाता है ,जब लोग पीड़ित होने शुरू हो जाते हैं तब तो सभी को अपनी अपनी जान बचाने की पड़ी होती है | उस समय इतनी प्रक्रिया का पालन करने के लिए समय ही नहीं होता है | 
    कोरोना महामारी के समय में फैले रोग की प्रकृति की पहचान होनी थी | जो नहीं की जा सकी | इसीलिए महारोग के बिषय में जो जो अनुमान या पूर्वानुमान आदि लगाए गए | वे सब के सब गलत निकलते जा रहे थे  | यदि महामारी की प्रकृति को  ही पहचाना नहीं जा सका तो महामारी से सुरक्षा के लिए प्रभावी प्रयत्न कैसे किए जा सकते थे |    
     वर्तमान अनुसंधानों के आधार पर महामारी का स्वभाव समझा जाना संभव होता तो समझ लिया गया होता ! महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना संभव होता तो लगा लिया गया होता | पूर्वानुमान लगाने के लिए कोई विज्ञान होता तो उसका सहारा ले लिया गया होता | आधुनिक विज्ञान में यदि अनुसंधान की ऐसी कोई प्रक्रिया होती जिससे महामारी को नियंत्रित किया जाना संभव हो पाता तो उससे मदद मिल सकती थी | 
      कुल मिलाकर  महामारी संबंधी रोगियों की चिकित्सा के लिए यदि कुछ भी नहीं था तो फिर महामारी पर विजय प्राप्त कर लेने के दावे या महामारी को पराजित कर देने की बातें |किस बल पर की जा रही थीं | महामारी के बिषय में समय समय पर जो पूर्वानुमान बताए जा रहे थे | उन्हें लगाने के लिए विज्ञान कहाँ है ये सोचने की बात है |  
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कोरोनामहामारी पर प्रभावी है प्राचीनविज्ञान

      प्राकृतिक आपदाएँ महामारियाँ आदि तो प्राचीनकाल से ही घटित होती रही होंगी | सृष्टि के आरंभिक काल में तो जनसंख्या बहुत कम  रही होगी | प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदि को उस युग में यदि जनधन का इतना नुक्सान करने दिया गया होता,तब तो सृष्टि का क्रम इतने आगे तक बढ़ पाना संभव ही न था | उस युग के सक्षम  वैज्ञानिकों ने उसी समय बिना किसी आधुनिक उपकरण के जब सूर्य चंद्र ग्रहणों के बिषय में सही सटीक पूर्वानुमान लगाने का विज्ञान खोज लिया था तो वे प्राकृतिक आपदाओं महामारियों के बिषय में क्या पूर्वानुमान नहीं लगा पाए होंगे | जिनसे मनुष्य जीवन को सीधे जूझना पड़ता था |प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदिके बिषय में वे न केवल पूर्वानुमान लगा लेते रहे होंगे,प्रत्युत ऐसी प्राकृतिक घटनाओं से जनजीवन की सुरक्षा करने के उपाय भी खोज लिए होंगे | इसीलिए तो सृष्टि का क्रम इतने आगे तक बढ़ना संभव हो पाया है |

      ऐसे सक्षम प्राचीन ज्ञानविज्ञान की उन उपलब्धियों पर विश्वास करके मैंने भी उसी प्राचीन विज्ञान के आधार पर उसी प्रकार के अनुसंधान करने का निश्चय किया था | जिससे प्राकृतिक आपदाओं महामारियों आदि के बिषय में पूर्वानुमान लगाने के साथ साथ ऐसी आपदाओं से जनधन की सुरक्षा करने का न केवल लक्ष्य निश्चित किया ,प्रत्युत कोरोना महामारी की सभी लहरों के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाने के लिए जो प्रयत्न किए वे सफल हुए |इसके प्रमाण पीएमओ की मेल पर विद्यमान हैं |  

      मेरे प्राचीन वैज्ञानिक अनुसंधानों का दूसरा लक्ष्य महामारी से  समाज को सुरक्षित बचाना था | इसलिए कोरोना महामारी की दूसरी लहर का वेग जब बहुत अधिक बढ़ने लगा तो उसे घोषणापूर्वक मैंने तुरंत नियंत्रित करने का प्रयत्न जैसे ही प्रारंभ किया वैसे ही महामारी की दूसरी लहर तुरंत नियंत्रत होने लगी थी | इसके प्रमाण पीएमओ की मेल पर अभी भी सुरक्षित हैं | 

   विश्व में  मुझे छोड़कर किसी दूसरे व्यक्ति या वैज्ञानिक को इतनी बड़ी सफलता नहीं मिली है | मुझे भी यह सफलता केवल इसलिए मिली है ,क्योंकि मैंने भारत के प्राचीन विज्ञान के आधार पर अनुसंधान पूर्वक महामारी संबंधी पूर्वानुमान लगाए हैं | इसलिए वे सही निकले हैं | 

                              प्राचीन विज्ञान के आधार पर मेरे अनुसंधान

    प्राचीनविज्ञान  के आधार पर मैं पिछले 35 वर्षों से अनुसंधान  करता आ रहा हूँ | जिससे मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में तो पूर्वानुमान लगाता ही रहा हूँ | उसी के आधार पर मैं महामारी पैदा और समाप्त होने के सही कारणों की पहचान कर  पाया  हूँ | 

     कोरोनामहामारी के बिषय में विश्ववैज्ञानिकों ने जिन बातों को बहुत बाद में कहा या स्वीकार किया है | कुछ बिंदुओं पर तो वे अभी तक दुविधा में हैं | ऐसी सभी बातें मैंने 19 मार्च 2020 को ही लिखकर  पीएमओ की मेल पर भेज दी थीं | मैंने उसमें लिखा था - 

      "ऐसी महामारियों को सदाचरण स्वच्छता उचित आहार विहार आदि धर्म कर्म ,ईश्वर आराधन एवं ब्रह्मचर्य आदि के अनुपालन से जीता जा सकता है |"(बाद में कोविड  नियमों में स्वच्छता को सम्मिलित किया गया था "

"इसमें चिकित्सकीय प्रयासों का बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा | क्योंकि महामारियों में होने वाले रोगों का न कोई लक्षण होता है न निदान और न ही कोई औषधि होती है |"

"किसी भी महामारी की शुरुआत समय के बिगड़ने से होती है और समय के सुधरने पर ही महामारी की समाप्ति होती है | "

 "बुरे समय का प्रभाव सबसे पहले ऋतुओं पर पड़ता है | ऋतुओं का प्रभाव पर्यावरण पर पड़ता है उसका प्रभाव वृक्षों बनस्पतियों फूलों फलों फसलों आदि समस्त खाने पीने की वस्तुओं पर पड़ता है वायु और जल पर भी पड़ता है इससे वहाँ के कुओं नदियों तालाबों  आदि का जल प्रदूषित हो जाता है | इन परिस्थितियों का प्रभाव जीवन पर पड़ता है इसलिए शरीर ऐसे रोगों से पीड़ित होने लगते हैं |"   इसलिए महामारी प्राकृतिक है| 

     कुलमिलाकर मैंने ये सब कुछ उस मेल में लिखकर भेजा था | इसके  साथ ही साथ  महामारी की सभी लहरों के बिषय में पूर्वानुमान लगाकर  आगे से आगे पीएमओ की मेल पर भेजता रहा हूँ | जो सही निकलते रहे हैं | साक्ष्यरूप में वे अभी तक सुरक्षित रखे गए हैं | 

    दूसरी लहर का वेग जब बहुत अधिक बढ़ चुका था | संक्रमितों एवं मृतकों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी | इसका पूर्वानुमान 19 अप्रैल 2021 को ही मैंने पीएमओ की मेल पर भेज दिया था | जो सही निकला है | यह प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान के द्वारा ही संभव हो पाया है |    दूसरी लहर के बिषय में मैंने उस मेल में यह लिखा था -    

   " यज्ञ प्रभाव के विषय में मेरा अनुमान है कि ईश्वरीय कृपा से 20 अप्रैल 2021 से ही महामारी पर अंकुश लगना प्रारंभ हो जाएगा ! 23 अप्रैल के बाद महामारी जनित संक्रमण कम होता दिखाई भी पड़ेगा !और 2 मई के बाद से पूरी तरह से संक्रमण समाप्त होना प्रारंभ हो जाएगा |"        

 " 20 अप्रैल 2021 को  यज्ञ प्रारंभ  होते ही महामारी का वेग रुकने लगा था  23 अप्रैल से संक्रमण बढ़ना रुक गया था | वह यज्ञ 11 दिवसीय था |इसलिए  11 हवें दिन अर्थात 1 मई को यज्ञ की पूर्णाहुति होते ही उसी दिन से दिल्ली में संक्रमितों की संख्या कम होने लगी थी | राष्ट्रीय कोरोना ग्राफ में भी 6 मई से राष्ट्रीय स्तर पर संक्रमण कम होते देखा जा रहा था | 

     कुल मिलाकर  प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान वर्तमान समय में भी प्राकृतिक घटनाओं को समझने एवं उनके बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने में प्राचीनकाल की तरह ही अभी भी प्रासंगिक हैं | सनातन धर्म की इस वैज्ञानिक सामर्थ्य का उपयोग करके प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से समाज की सुरक्षा अभी भी की जा सकती है | 

     वैदिक विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो महामारी का मैंने जो  निदान निकाला था | वो बिल्कुल सही घटित हुआ है | इसीप्रकार से महामारी के बिषय में जितने भी प्रकार के पूर्वानुमान लगाकर मैंने पीएमओ की मेल पर भेजे थे वे सभी सही निकले हैं | 

      इससे यह सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में ऐसा विज्ञान था | जिसके द्वारा उस युग से अभीतक प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से जनता की सुरक्षा की जाती रही है | इसीलिए सृष्टिक्रम आगे बढ़ पाया है | प्रकृति के स्वभाव को समझकर प्राकृतिकघटनाओं के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने की दृष्टि से प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान वर्तमान समय में भी उतना ही प्रासंगिक है |जितना प्राचीनकाल में था | बीते कुछ  सौ वर्ष पूर्व  हुए महाकवि घाघ जिन्होंने उसी प्राचीन ऋतुविज्ञान  के आधार पर मौसम के स्वभाव को समझा तथा समाज को समझाया था | उन्होंने उसी  प्राचीन विज्ञान से संबंधित अपने अनुसंधानों अनुभवों के आधार पर वर्षा बिषयक पूर्वानुमान लगाने के लिए  जिन सूत्रों का निर्माण किया था  | जिनके आधार पर लगाए गए मौसमसंबंधी पूर्वानुमान अभी भी सही निकलते देखे जाते हैं |इसीलिए तो किसानों एवं ग्रामीणों में उनकी लोकप्रियता अभी भी  बनी हुई है | 

      प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में भारतीय प्राचीनविज्ञान एवं परंपराविज्ञान से संबंधित  अनुसंधान न किए जाने के कारण समाज को इससे होने वाला लाभ नहीं मिल पा रहा है | कोरोना महामारी के बिषय में यदि  प्राचीनविज्ञान के आधार पर अनुसंधान किए गए होते तो समाज को महामारी से इतना पीड़ित नहीं होना पड़ता | 

         इसप्रकार से महामारी को समझना जब संभव हो पायगा तभी वर्तमान महामारी से लोगों को सुरक्षित बचाने में कुछ मदद मिल सकती है | भावी महामारियों से लोगों की सुरक्षा के लिए उपाय भी तभी  किए जा  सकते हैं |       

                                                                इस लघुशोध संग्रह के बिषय में - 
   
     कोरोनामहामारी प्रारंभ कब और कैसे पैदा हुई थी | इसे यदि प्राचीनवैज्ञानिक अनुसंधानों के आधार पर देखा जाए तो समय हमेंशा बदलता रहता है| समय में  अच्छे तो कभी बुरे परिवर्तन होते देखे जाते हैं |अच्छे परिवर्तन होने पर प्रकृति और जीवन में  अच्छी अच्छी घटनाएँ घटित होने लगती हैं|समय में जब बुरे परिवर्तन होने लगते  हैं तब प्राकृतिक आपदाएँ एवं महामारी जैसी घटनाएँ घटित  होने लगती हैं | 
      सन 2014 के बाद से महामारी पैदा  होने के योग्य प्राकृतिक वातावरण बनना प्रारंभ हो गया  था |सन 2018 के अक्टूबर नवंबर महीनों से ही कोरोना महामारी संबंधी बिकार पृथ्वी के वातावरण को  प्रदूषित करना प्रारंभ कर चुके थे |पेड़ पौधे फल फूल शाक सब्जियों समेत समस्त खाद्य पदार्थों में महामारी संबंधी बिकार आने प्रारंभ हो गए थे| जिन्हें खाने पीने से लोगों के शरीरों में प्रतिरोधक क्षमता दिनोंदिन क्षीण होने लगी थी | ऐसे वायुमंडल में साँस लेने के कारण लोग दिनोंदिन दुर्बल  होते जा  रहे  थे | महामारी संबंधी बिकारों से  धीरे धीरे लोग संक्रमित होते जा रहे थे | कोरोनामहामारी आने से पूर्व महामारी का एक सामान्य सा झोंका आया था | जिसके लक्षण प्रत्यक्ष भले कम दिखाई पड़ रहे थे ,किंतु सॉंस फूलने जैसे रोग पैदा होने लगे थे | इसका पूर्वानुमान 20 अक्टूबर 2018 को ही मैंने पीएमओ की मेल पर भेज दिया था | उस मेल का चित्र प्रारंभ में ही लगाया गया है |
     इसके बाद महामारी की कुल 11 लहरें आई थीं | इनमें से 5 पूर्ण लहरें एवं 6 अर्द्धलहरें आई थीं | इन सभी लहरों के बिषय में पूर्वानुमान लगाकर मैं आगे से आगे पीएमओ की मेल पर भेजता  रहा हूँ | मेरे पूर्वानुमान सही घटित होते रहे हैं |मेरे द्वारा भेजे गए 5 पूर्ण लहरों से संबंधित पूर्वानुमानों का मिलान कोरोना ग्राफ से करने पर यह सच्चाई प्रमाणित होती है | 
     इसीप्रकार से अर्द्धलहरों के पूर्वानुमान भी पीएमओ की मेल पर भेजे थे | वे  भी सही निकले थे किंतु इन अर्द्धलहरों के कोरोनाग्राफ न मिलने के कारण उनका मिलान उस समय के समाचार पत्रों में प्रकाशित कोरोना संबंधी समाचारों से किया गया है  | जिसमें मेरे पूर्वानुमान सही घटित होते रहे हैं | उस समय के अखवारों की हेडिंग और उनके लिंक मेरे पास अभी भी सुरक्षित हैं | उन समाचारों से यह   पता लगता है कि इस समय कोरोना संबंधी संक्रमण बढ़ा  था | उसी के  नीचे  उससे संबंधित मेरी मेल का चित्र लगाया गया है | जिससे  यह पता लगता है कि इस समय बढ़े हुए कोरोना संक्रमण का पूर्वानुमान मैंने पहले ही पीएमओ की मेल  पर भेज दिया था |जो सही निकला है |   
     इसके बाद महामारी का पूर्ण परिचय दिया गया है | जिसमें  महामारी के प्रत्येक पक्ष को समझने समझाने का प्रयत्न किया गया है | 
    इसके बाद "वैक्सीन लगेगी तो महामारी बढ़ेगी " नामक शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया गया है | 
   इसके बाद "यज्ञ के द्वारा शांत की गई थी कोरोना की दूसरी लहर !" नाम से एक लेख प्रकाशित करके इस ग्रंथ  को पूर्ण किया गया है | 
 
                                                                     बुक 
 

                                     कोरोनामहामारी मौसम और  महामारीविज्ञान  !

         प्राचीनकाल में जब आधुनिक विज्ञान नहीं था तब भी तो उसी विज्ञान के आधार पर प्राकृतिक आपदाओं एवं महामारियों से जनधन की रक्षा की जाती रही है |वर्तमान समय में भी ऐसा किया जा सकता है | व्यक्तिगत रूप से मैं उसी प्राचीनविज्ञान के आधार पर महामारी की प्रत्येक लहर के बिषय में आगे से आगे न केवल पूर्वानुमान लगाता रहा हूँ ,प्रत्युत उन्हें पीएमओ की मेल पर भेजता भी रहा हूँ |उनका कोरोनाग्राफ एवं मीडिया के विभिन्न माध्यमों में प्रकाशित समाचारों से  मिलान भी करता रहा हूँ | जो सही घटित होते रहे हैं | वे यहाँ प्रमाण पूर्वक प्रस्तुत किए जा रहे हैं |  
 
 
                                                   
   प्राचीनविज्ञान और मेरे अनुसंधान 

      अनुसंधानों का उद्देश्य यदि प्राचीन विज्ञान से वर्तमानविज्ञान को बड़ा सिद्ध करना नहीं है तो विज्ञान के उन विकल्पों पर बिचार किया जाना चाहिए | जिनसे प्राकृतिक आपदाओं या महामारियों से पीड़ित लोगों को अधिक से अधिक मदद मिल सके |प्राकृतिक आपदाओं महामारियों के समय जो अनुसंधान लोगों के जनधन की सुरक्षा  करने में जितने अधिक  सहायक हो सकें | अनुसंधानों के उद्देश्य से ऐसे वैज्ञानिकों  को अधिक मदद दी जानी चाहिए  | जो संकट के समय समाज को सुरक्षित बचाने के लिए न  केवल प्रयत्न करते हों ,प्रत्युत उसमें सफल भी होते हों |ऐसे  अनुसंधानों से प्राप्त परिणामों को जनसुरक्षा की कसौटी पर कसा जाना चाहिए | किन अनुसंधानों से समाज को कितनी  मदद मिलती है | यह देखा जाना चाहिए आधुनिकविज्ञान या प्राचीनविज्ञान से  संबंधित भेद भाव नहीं होना चाहिए | 

    महामारी तथा उसकी लहरों के आने जाने के बिषय में किसी ने भी यदि पहले से सही पूर्वानुमान लगाए हों ,तो उसकी सच्चाई का परीक्षण  किया  जाए | जो पूर्वानुमान सही निकल जाते हैं |उनका वैज्ञानिक आधार पूछे बिना सभी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर ऐसे पूर्वानुमानों का जनहित में उपयोग किया जाना चाहिए ,क्योंकि अनुसंधानों का उद्देश्य जनहित खोजना ही है | 

     आधुनिकविज्ञान अभी कुछ सौ वर्ष पहले आया है | इससे पहले तो प्राचीन विज्ञान ही था |प्राकृतिक आपदाएँ और महामारियाँ समय संबंधी घटनाएँ हैं | जो हमेंशा से घटित होती रही हैं | भारत के प्राचीनविज्ञान के द्वारा  हमेंशा से प्राकृतिकआपदाओं तथा महामारियों से समाज की सुरक्षा की जाती रही है| इससे ये सिद्ध होता है कि प्राचीनविज्ञान से संबंधित अनुसंधानों के द्वारा  प्राकृतिकआपदाओं तथा महामारियों से  समाज की सुरक्षा अभी भी की जा सकती है | 

     आधुनिकविज्ञान की तरह ही प्राचीनविज्ञान  का भी पठन पाठन भारत सरकार अपने संस्कृतविश्वविद्यालयों में करवाती है |उसी तरह प्राचीन विज्ञान से संबंधित बिषयों में भी एम.ए. पीएचडी जैसी डिग्रियाँ करवाई जाती हैं | ऐसे अनुसंधानों का भी प्राकृतिकआपदाओं एवं महामारी जैसे संकटों से समाज की  सुरक्षा के लिए उपयोग किया जाए तो  संभव है ,उससे कुछ ऐसा  समाधान मिल जाए जो प्राकृतिकआपदाओं एवं महामारी जैसे संकटों से समाज की  सुरक्षा करने में सहायक हो |जिन प्राकृतिक संकटों का समाधान अभी तक आधुनिकविज्ञान के आधार पर निकाला नहीं जा सका है | उन प्राकृतिक संकटों का समाधान निकालने के लिए प्राचीन विज्ञान का भी उपयोग किया जाना चाहिए |

      इसी उद्देश्य से मैंने सरकारी संस्कृत विश्व विद्यालय से प्राचीनविज्ञान से संबंधित बिषयों में उच्चकोटि की शिक्षा ली है | उसी के  आधार पर मैं बीते 35 वर्षों से अनुसंधान करता आ रहा  हूँ | उसके आधार पर प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारी जैसी आपदाओं के बिषय में जो निष्कर्ष निकाले हैं | वे सही निकलते रहे  हैं | महामारी के बिषय  में मेरे लगाए हुए पूर्वानुमान सही निकलते रहे हैं | मेरे अतिरिक्त विश्व में किसी अन्य के द्वारा कोरोना महामारी के बिषय में सही पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सके हैं |इसलिए इन अनुसंधानों को जनहित में विशेष प्रोत्साहन मिलना चाहिए | 

    कोरोनामहामारी संबंधी मेरी अनुसंधान प्रक्रिया के अनुसार महामारी की कुल 11 लहरें आई थीं | इन ग्यारहों लहरों  में से प्रत्येक लहर के पूर्वानुमान मैं आगे से आगे पीएमओ की मेल पर भेजता आ रहा  हूँ | पूर्वानुमानों में प्रत्येक लहर के आने और जाने की स्पष्ट तारीखें लिखी गई हैं | जिनका मिलान कोरोना ग्राफ तथा उस समय के समाचार पत्रों से करने पर मेरे द्वारा लगाए गए पूर्वानुमान सही घटित हुए  हैं |

       ऐसी परिस्थिति में  मेरा विनम्र निवेदन है कि अनुसंधानों का उद्देश्य यदि जनहित करना ही है तो जिस किसी भी विज्ञान के द्वारा जनहित से जुड़े अनुसंधानकार्यों में सफलता मिले | उन्हें अपनाया जाना चाहिए |भारत के जिस  प्राचीनविज्ञान  के द्वारा प्राकृतिक आपदाओं तथा महामारियों से मनुष्यों की सुरक्षा की जाती रही है |  उसके द्वारा अभी भी ऐसा किया जा सकता है  | प्राचीन विज्ञान यदि जनधन की सुरक्षा करने में सहायक  हो सकता है तो उसके आधार पर अनुसंधान करने में संकोच नहीं किया जाना चाहिए |                                    

                               

                                        महामारी के बिषय में  गंभीर प्रयास की आवश्यकता 

     समय प्रभाव से महामारीजनित संक्रमण जब स्वयं समाप्त होने लगता है तब सभी रोगी स्वतः संक्रमण मुक्त होने लगते  हैं |ऐसे समय  जिन्होंने चिकित्सकीय उपाय किए हैं वे स्वस्थ  हुए हैं तो कुछ ने उपायों के नाम पर भिन्न भिन्न प्रकार के खानपान रहन सहन आदि अपनाए हैं | वे  भी  स्वस्थ हुए हैं | ऐसे भी बहुत लोग  हैं | जिन्होंने उपायों  के नाम पर  कुछ भी नहीं किया है |वे  भी स्वस्थ हुए हैं | 

     विशेष  बात  यह है कि भिन्न भिन्न प्रकार के उपायों को करने या न करने के परिणाम एक  जैसे नहीं निकल सकते हैं| यदि ऐसा होता है तो इसका मतलब उन  सभी के स्वस्थ होने  का कारण वे उपाय न होकर प्रत्युत वह समयसुधार है |जिसका प्रभाव सभी पर एक समान रूप से पड़ रहा होता है | वे सभी समान रूप से स्वस्थ  हो  रहे होते हैं |ऐसे समय रोग स्वतः समाप्त हो ही  रहा होता है | समय प्रभाव को न समझने वाले लोग स्वस्थ होने का श्रेय अपने अपने उपायों को देने लगते हैं |चिकित्सा का लाभ ले रहे रोगियों के  स्वस्थ होने का  श्रेय  चिकित्सक अपनी चिकित्सा को देने  लगते हैं | ऐसे भ्रम की अवस्था में ही प्लाज्मा थैरेपी जैसे प्रयोगों को महामारी से मुक्ति दिलाने में समर्थ मान लिया जाता है | 

      इसके बाद समय प्रभाव से जब संक्रमण स्वतः बढ़ने लगता है | उस समय सभी लोगों का अपने अपने उपायों से संबंधित अपना भ्रम टूटने लगता है | रेमडिसिविर प्लाज्मा थैरेपी आदि के कोरोना महामारी से मुक्ति दिलाने संबंधी प्रभाव पर विश्वास घटने लगता है | 

                                               अनुसंधानों का लक्ष्य है जनधन की सुरक्षा !

     प्राचीन काल में अनुसंधानकर्ताओं के द्वारा खोजे गए प्राकृतिक घटनाओं के कारणों अनुमानों पूर्वानुमानों से राजाओं शासकों सरकारों का संतुष्ट होना तो आवश्यक होता ही था | इसके साथ साथ  उन अनुसंधानों से देश वासियों को संतुष्ट किया जाना आवश्यक माना जाता था |जनता की आवश्यकताओं अपेक्षाओं पर अनुसंधानों को खरा उतरना पड़ता था | वस्तुतः जिन अनुसंधानों  पर किए जाने वाले व्यय का  वहन जनता  करती है | उन अनुसंधानों को जनता की आवश्यकताओं पर खरा उतरना होता था |  

     प्राचीनकाल में जो वैज्ञानिक जिस घटना से संबंधित होता था | उसे उसप्रकार की घटनाओं  के घटित होने के कारण अनुमान पूर्वानुमान आदि पता लगाकर पहले से सार्वजनिक रूप से घोषित  करने होते थे | जनता की दृष्टि में यदि  वे सही  निकल जाते थे तो उन्हें उस बिषय का वैज्ञानिक मान लिया जाता था |इसप्रकार से प्रत्येक वैज्ञानिक को सार्वजनिक रूप से अपनी वैज्ञानिकता प्रमाणित करनी होती थी | इसमें  यदि वे सफल  हो जाते थे तब उन्हें वैज्ञानिकपद प्रतिष्ठा प्रदान की जाती थी | 

   उदाहरण के रूप में  भूकंपवैज्ञानिकों का चयन करते समय भूकंप को समझने एवं उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान  लगाने की परीक्षा में सफल होने पर उसे भूकंपवैज्ञानिक के रूप में पद प्रतिष्ठा पारिश्रमिक आदि प्रदान किया जाता था |  वर्तमान भूकंप वैज्ञानिकों ने  भूकंपों के बिषय में अभीतक ऐसी  क्या खोज की है|  जिसके द्वारा भूकंप आने पर होने वाले जन धन के नुक्सान को कम किया जा सका हो | 

    इसीप्रकार से वर्षाविशेषज्ञों अर्थात मौसमविशेषज्ञों को चयनित करने के लिए उन्हें प्राकृतिकघटनाओं  के  बिषय में अनुमान पूर्वानुमान  आदि लगाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी | सौ दो  वर्ष पहले की भविष्यवाणी करने से पहले उन्हें एक वर्ष पहले की मौसम संबंधी घटनाओं के  बिषय में  पूर्वानुमान बताने होते थे |  वे  यदि सही निकल  जाते थे, तो उन्हें 10  वर्ष पहले के मौसमसंबंधी पूर्वानुमान घोषित करने  होते थे | यदि  वे भी सही निकल जाते थे तब उनपर विश्वास किया जाता था कि ये प्रकृति के स्वभाव को  समझने में सक्षम हैं | इनके द्वारा सौ दो सौ वर्ष पहले की मौसमसंबंधी घटनाओं के बिषय में बताए जा रहे  पूर्वानुमान सच हो सकते हैं |इसी विश्वास पर  ऐसे लोगों को वर्षा(मौसम)  वैज्ञानिक  या ऋतुवैज्ञानिक  होने जैसी पद प्रतिष्ठा प्रदान की जाती  थी |       

        सनातनधर्म के प्राचीनग्रंथों में प्रकृति और जीवन के बिषय में पूर्वानुमान लगाने की अनेकों विधियाँ बताई गई हैं | ऐसा करने के लिए ही अनुसंधानों की परिकल्पना की गई  है | आयुर्वेद के शीर्षग्रंथ चरकसंहिता में  इसी का उपदेश किया गया है | यदि ऐसा हो पाता है तब तो महामारी के समय अनुसंधानों से समाज को सुरक्षित बचाया जा सकता है या संक्रमितों को रोगमुक्त किया जा सकता है ,अन्यथा उस महामारी में उन अनुसंधानों की उपयोगिता ही क्या  बचती है  |     

   शिवसंहिता, नरपतिजयचर्या, शिवस्वरोदय,ज्ञानस्वरोदय पवनस्वरोदय आदि योग के ग्रंथों में ऐसी घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान लगाने की विधियाँ  बताई गई हैं |निरंतर योगाभ्यास करने वाले साधकों के द्वारा महामारी  बिषय में पूर्वानुमान लगाया जाना चाहिए था | 

 


 
    

 
                                       
                                 कारण की उपेक्षा और कार्य का पूर्वानुमान ! असंभव !!
     कारण का अर्थ जो  घटना जिस कारण से घटित हो रही होती है | उस घटना को समझने के लिए उस कारण को समझना होता है | महामारी को समझने के लिए महामारी के पैदा होने या महामारी संबंधित संक्रमण बढ़ने के लिए या महामारी को शांत करने का उपाय खोजने के लिए उस कारण को ही समझना पड़ेगा !उसी के बिषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना पड़ेगा | कारण का अध्ययन जितना सही सटीक होगा | महामारी को भी उतने ही अच्छी प्रकार से समझा जा सकेगा | कारण के आधार पर  ही महामारी को समझने  या उससे लोगों का बचाव करने अथवा संक्रमितों को महामारी से मुक्ति दिलाने के लिए उपाय खोजा जाना था ,किंतु महामारी के निश्चित कारण को खोजा  नहीं जा सका | 
    प्रकृति की जिस घटना को महामारी पैदा होने या उससे संबंधित संक्रमण बढ़ने घटने के लिए जिम्मेदार कारण बताया गया |उसका महामारी से कोई संबंध सिद्ध नहीं किया जा सका | दूसरी बात उस कारण को समझने,उसकी प्रकृतिखोजने एवं  उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान लगाने आदि के लिए कोई विज्ञान नहीं है | इसलिए ऐसा सब कुछ खोजा जाना संभव न हो सका | यदि ऐसा करने के लिए कोई विज्ञान होता तो ऐसा किया गया होता |किसी ने ऐसा करने से रोका नहीं था | 
      महामारीविशेषज्ञों के द्वारा समय समय पर कहा जाता रहा है कि महामारी आने या महामारी संबंधी संक्रमण बढ़ने घटने का कारण मौसमसंबंधी गतिविधियाँ हैं|इसका मतलब महामारी को समझने के लिए मौसम को समझना होगा | महामारी की प्रकृति (स्वभाव )को समझने के लिए  मौसम की प्रकृति को समझना होगा | महामारी के बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए मौसम संबंधी घटनाओं के बिषय  में  सही  पूर्वानुमान आदि लगाना  होगा | महामारी को शांत करने के लिए  लिए  मौसम संबंधी उस प्रकार के दुष्प्रभाव शांत करने होंगे या उनसे बचना होगा | 
 
   मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने में यदि गलती रह गई तो उसके आधार पर लगाए  गए महामारी बिषयक  पूर्वानुमान भी गलत निकल जाएँगे  |मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने में जब गलती हो जाती है तो वे गलत निकल जाते हैं | पूर्वानुमान लगाने में हुई गलती स्वीकार करने के बजाए | इसके लिए जलवायुपरिवर्तन को जिम्मेदार बता दिया जाता है | मौसम संबंधी ऐसी गलती के कारण उसके आधार पर लगाए गए महामारी संबंधी पूर्वानुमान  भी गलत निकल जाते हैं |इसके लिए महामारी के स्वरूपपरिवर्तन को जिम्मेदार माना जाता है ,जबकि ऐसे अनुमानों पूर्वानुमानों के गलत निकलने का कारण पूर्वानुमान लगाने  वाले विज्ञान  का अभाव है | इसीलिए कारण  के बिषय में  पूर्वानुमान लगाने में गलती होने का प्रभाव कार्य अर्थात उस घटना  के बिषय में पूर्वानुमान लगाने पर भी पड़ेगा |          

   इसीप्रकार से महामारी आने जाने एवं उससे संबंधित संक्रमण बढ़ने घटने के लिए यदि तापमान बढ़ने घटने या वायुप्रदूषण बढ़ने घटने को जिम्मेदार माना जाएगा तो भी मौसम जैसी अनुसंधान समस्या का ही सामना करना होगा | महामारी संबंधी पूर्वानुमान लगाने के लिए पहले तापमान या वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के बिषय में पूर्वानुमान लगाना होगा | यदि वह सही निकलेगा तभी उसके आधार पर महामारी के बिषय में सही पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा | यदि तापमान बढ़ने घटने के बिषय में अभी तक पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं हो पाया है तो महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना कैसे संभव हो पाएगा | ऐसे ही वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के बिषय में पूर्वानुमान लगाना तो दूर अभी तक इसके बढ़ने घटने के लिए जिम्मेदार कारण ही नहीं खोजे जा सके हैं,तो इसके बिषय में पूर्वानुमान कैसे लगाए जा सकेंगे |ऐसा किए बिना महामारी के बिषय में पूर्वानुमान लगाना संभव न हो  पाएगा |

       कुल मिलाकर अभी तक ऐसा कोई विज्ञान खोजा ही नहीं जा सका है |जिसके आधार पर मौसम तथा महामारी को समझा जाना संभव हो |अभी तक  मौसम के प्रभाव से प्रभावित होने वाली महामारी को समझना एवं उसके बिषय में सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना संभव ही नहीं  हो पाया है |इसीलिए महामारी  के विभिन्न विशेषज्ञों के  द्वारा महामारी की लहरों के आने और जाने  के बिषय  में लगाए गए सैकड़ों पूर्वानुमान लगातार गलत निकलते चले गए !जो मीडिया के विभिन्न माध्यमों में  विद्यमान हैं | 
    मेरा उद्देश्य विज्ञान के गौरव को घटाना नहीं है प्रत्युत कुछ ऐसा प्रयत्न करना है | जिससे विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं एवं महामारियों के बिषय में  कुछ महत्वपूर्ण जानकारी जुटाई जा सके | जिसके आधार पर  भविष्य के लिए सही दिशा में कुछ प्रभावी कदम उठाए  जा सकें | जो ऐसी घटनाओं में होने वाली जनधन हानि को कम करने में सहायक हो सकें |   

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   बिषाणुओं का प्रभाव सब पर एक जैसा नहीं पड़ता है और  चिकित्सा का प्रभाव भी सभी शरीरों पर एक जैसा नहीं पड़ता है | यही कारण है कि कोरोना महामारी में कुछ लोग संक्रमित हुए, कुछ लोग मृत्यु को प्राप्त हुए, तो कुछ लोग बिल्कुल स्वस्थ घूमते रहे | उन्हें जुकाम भी नहीं हुआ | 

    इसी प्रकार से कोरोनाकाल काल में कुछ लोग स्वस्थ बने रहे,कुछ लोग अस्वस्थ हुए ! उनमें से कुछ बिना किसी चिकित्सा के ही  स्वस्थ हो गए तो कुछ चिकित्सा से स्वस्थ हुए ! कुछ चिकित्सा का लाभ लेकर भी स्वस्थ नहीं हुए तो कुछ अच्छी से अच्छी चिकित्सा का लाभ लेकर भी मृत्यु को प्राप्त हो गए 

     इसीलिए संक्रमित  होने के बाद कुछ लोग बिना किसी चिकित्सा के ही स्वस्थ हो गए |कुछ लोग  चिकित्सा होने के बाद स्वस्थ हुए तो कुछ चिकित्सा के बाद भी  अस्वस्थ ही बने रहे ,जबकि कुछ लोगों को अच्छी से अच्छी चिकित्सा करके भी बचाया नहीं जा सका है | वे मृत्यु को प्राप्त हो गए |

 

    कुल मिलाकर कोई औषधि कितनी भी अच्छी क्यों न हो फिर भी वो सभी लोगों को सभी रोगों में सदा ही लाभप्रद नहीं होती है | जिस औषधि के अच्छे  प्रभाव से कुछ लोगों के जीवन की रक्षा होती है | उसी औषधि के बुरे प्रभाव से कुछ लोगों को नुक्सान पहुँचता है |गुण दोष तो सभी में होते हैं | उनका संतुलन बैठाकर ही चिकित्सा के उद्देश्य से औषधियों का प्रयोग करना होता है |