Wednesday, October 19, 2022

चक्रवात के विषय में पूर्वानुमान !

                                   विषय : चक्रवात के विषय में पूर्वानुमान : सन 2022 (वैदिक) 

    सन 2022 के नवंबर महीने में चक्रवातों की घटनाएँ अधिक घटित हो सकती हैं | इस दृष्टि से संपूर्ण नवंबर का महीना विशेष कठिन है | 5 नवंबर 2022 से समुद्रीक्षेत्रों में चक्रवातों का निर्माण होना प्रारंभ होगा इसके बाद यह क्रम 30 नवंबर 2022 तक चलेगा | 6 से 10 नवंबर के बीच में समुद्र जल आंदोलित होकर चक्रवातों का निर्माण करेगा | उसके बाद अपनी गति और दिशा के हिसाब से चक्रवात कुछ देशों प्रदेशों में पहुँचेंगे | 21नवंबर से 26 नवंबर के बीच समुद्र तल से अत्यंत तीव्र हवाएँ प्रकट होंगी, जो सुदूर आकाश तक समुद्र जलों को उछालेंगी | जिससे बड़े चक्रवातों का जन्म होने की संभावना है |यही  चक्रवात कुछ समुद्र तटीय देशों प्रदेशों के लिए काफी हिंसक सिद्ध हो सकते हैं | 1दिसंबर 2022 से इस प्रकार का संकट कुछ कम होना प्रारंभ होगा और धीरे धीरे समाप्त होता चला जाएगा |

 

 

 

उसमें भी 24 अक्टूबर 2022 से वायु प्रदूषण बढ़ना प्रारंभ होगा !  27 से 31 अक्टूबर के बीच वायु प्रदूषण बढ़कर 60 प्रतिशत पहुँचेगा ! 1से 6 नवंबरके बीच वायु प्रदूषण कुछ कम होकर 50 प्रतिशत रहेगा |

 इसके बाद 7 नवंबर से 30 नवंबर तक वायु प्रदूषण अत्यंत तेजी से बढ़ते हुए अतिशीघ्र  100  प्रतिशत तकपहुँच जाएगा | इसमें भी 22 नवंबर से 27 नवंबर तक वायु प्रदूषण का सबसे अधिक भयावह स्वरूप होगा !यह 2022 \ 23 की  सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने का सर्वाधिक स्तर होगा | इस वर्ष वायु प्रदूषण बढ़कर बीते कुछ वर्षों का रिकार्ड तोड़ेगा ऐसी संभावना है |

   हमारे द्वारा किए जाने वाले वायु प्रदूषणसंबंधी अनुमानों पूर्वानुमानों में विशेष बात यह है कि इस अध्ययन की प्रक्रिया में धुआँ धूल जैसे प्रत्यक्ष कारणों को सम्मिलित नहीं किया गया है | इनका आधार विशुद्ध वैज्ञानिक है | उसी गणितीय पद्धति से इसे अनुसंधान पूर्वक पता लगाया जाता है जिससे सूर्य और चंद्र ग्रहण के विषय में बहुत पहले पूर्वानुमान लगा लिया जाता है | ग्रहण की तरह ही वायुप्रदूषण बढ़ने घटने के विषय में भी इस गणितीय पद्धति से हजारों वर्ष पहले अनुमान पूर्वानुमान लगाया जा सकता है |

    हमारे मत में पराली जलाने या उद्योगों वाहनों आदि से निकलने वाले धुआँ धूल जैसे प्रत्यक्ष कारणों के घटने बढ़ने के विषय में निश्चित मात्रा पता नहीं लगाई जा सकती है इसलिए इसके आधार पर वायुप्रदूषण बढ़ने के विषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना संभव ही नहीं है | ये तो पूर्वानुमान लगाने के नाम पर समय और पैसे की बर्बादी एवं वायुप्रदूषण के विषय में कुछ करते हुए दिखने की खाना पूर्ति मात्र है | ऐसे अनुसंधानों से न तो अभी तक समाज को कोई लाभ पहुँचाया जा सका है और न ही भविष्य के लिए ऐसी कोई आशा की जानी चाहिए |

            महोदय,

माननीय प्रधानमंत्री जी !

                            सादर नमस्कार 

बिषय :  विषय : चक्रवात के विषय में पूर्वानुमान : सन 2022 (वैदिक) 

    सन 2022 के नवंबर महीने में चक्रवातों की घटनाएँ अधिक घटित हो सकती हैं | इस दृष्टि से संपूर्ण नवंबर का महीना विशेष कठिन है | 5 नवंबर 2022 से समुद्रीक्षेत्रों में चक्रवातों का निर्माण होना प्रारंभ होगा इसके बाद यह क्रम 30 नवंबर 2022 तक चलेगा | 6 से 10 नवंबर के बीच में समुद्र जल आंदोलित होकर चक्रवातों का निर्माण करेगा | उसके बाद अपनी गति और दिशा के हिसाब से चक्रवात कुछ देशों प्रदेशों में पहुँचेंगे | 21नवंबर से 26 नवंबर के बीच समुद्र तल से अत्यंत तीव्र हवाएँ प्रकट होंगी, जो सुदूर आकाश तक समुद्र जलों को उछालेंगी | जिससे बड़े चक्रवातों का जन्म होने की संभावना है |यही  चक्रवात कुछ समुद्र तटीय देशों प्रदेशों के लिए काफी हिंसक सिद्ध हो सकते हैं | 1दिसंबर 2022 से इस प्रकार का संकट कुछ कम होना प्रारंभ होगा और धीरे धीरे समाप्त होता चला जाएगा |

                                                      निवेदक :

                                    -डॉ.शेष नारायण वाजपेयी

                                 A-7\41  कृष्णानगर -दिल्ली - 51 

                                  मोबाईल :   9811226983 

Tuesday, October 11, 2022

महामारी को समझने के लिए किया जाएगा मौसम का अध्ययन !(इसका उपयोग समय विज्ञान में किया जाएगा !)

 

                 महामारी को समझने के लिए किया जाएगा मौसम का अध्ययन !

   22 दिसंबर 2020 को प्रकाशित : पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा एक ऐसी विशिष्ट प्रारंभिक स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली (Early Health Warning System) विकसित की जा रही है, जिससे देश में किसी भी रोग के प्रकोप की संभावना का अनुमान लगाया जा सकेगा।गौरतलब है कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) भी इस विशिष्ट प्रणाली की विकास अध्ययन और प्रक्रिया में शामिल है।पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) द्वारा विकसित किया जा रहा मॉडल मौसम में आने वाले परिवर्तन और रोग की घटनाओं के बीच संबंध पर आधारित है।ज्ञात हो कि ऐसे कई रोग हैं, जिनमें मौसम की स्थिति अहम भूमिका निभाती है।विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली एक ऐसी निगरानी प्रणाली है, जो त्वरित सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप को संभव बनाने के लिये ऐसे रोगों से संबंधित सूचना एकत्र करती है, जो भविष्य में महामारी का रूप ले सकते हैं।

     प्रारंभिक स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली के आधार पर ऐसे रोगों से संबंधित सूचना एकत्र की जाती है, जो भविष्य में महामारी का रूप ले सकते हैं। चिकनगुनिया, मलेरिया, डायरिया, डेंगू, पीत ज्वर/येलो फीवर और चेचक रोग तथा कोरोना जैसी महामारियों के पैदा होने में मौसम की स्थिति भी अहम भूमिका निभाती है।इसी प्रकार से हृदय और श्वसन संबंधी बीमारियाँ भी हीट वेव तथा पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि से जुड़ी हुई हैं। इस प्रकार से मौसम की महत्ता समझते हुए भारतीय  मौसम विज्ञान विभाग (IMD) भी इस विशिष्ट प्रणाली के विकास अध्ययन और अनुसंधान प्रक्रिया में शामिल किया गया है।

   पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) द्वारा विकसित किया जा रहा मॉडल मौसम में आने वाले परिवर्तनों और रोग की घटनाओं के बीच संबंधों  पर आधारित है।माना जाता है कि इसी कारण वायु प्रदूषण तापमान और वर्षा पैटर्न के माध्यम से इसके प्रकोप के बारे में आसानी से पता लगाया जा सकता है | 
    मौसम के कारण अनेकों प्रकार के रोग पैदा होते हैं अपितु प्रारंभिक स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली के माध्यम से मौसम के आधार पर ही रोगों एवं महारोगों  के विषय में अनुसंधान भी प्रारंभ कर दिए गए हैं |
    रोगों और महारोगों(महामारियों) के विषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए मौसमसंबंधी घटनाओं का अनुसंधान किया जाएगा| यह मॉडल मौसम में आने वाले परिवर्तन और रोग की घटनाओं के बीच संबंधों पर आधारित है। महामारी संबंधी अनुसंधानों की इस प्रक्रिया में भारतीय  मौसम विज्ञान विभाग (IMD) को भी इसीलिए शामिल किया गया है।उनका मानना है कि  महामारी पैदा होने का कारण यदि मौसम ही है तो मौसम के आधार पर ही महामारी के विषय में भी पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | इस दृष्टि से महामारी संबंधी अनुसंधानों में  मौसम संबंधी अनुसंधानों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है स्वाभाविक ही है क्योंकि इस प्रक्रिया में महामारी संबंधी अनुसंधान मौसम संबंधी अनुसंधानों पर ही होंगे | 
     इसलिए इसमें मौसम संबंधी अनुसंधान जितने प्रतिशत सही होंगे उन अनुसंधानों के आधार पर किए गए महामारी से संबंधित अनुसंधान भी उतने ही प्रतिशत सच होंगे |ऐसी आशा की जानी चाहिए | यदि मौसम संबंधी अनुमान पूर्वानुमान सच नहीं होंगे तो उसके आधार पर किए गए महामारी से संबंधित अनुसंधान कैसे सच हो सकते है | संभवतः इसीलिए अनुसंधानों की इस प्रक्रिया में भारतीय  मौसम विज्ञान विभाग को सम्मिलित किया गया है|अब महामारी संबंधी अनुसंधानों का सब कुछ मौसम संबंधी अनुसंधानों पर आकर टिका हुआ है | मौसम संबंधी अनुसंधान सही होंगे तभी महामारी संबंधी अनुसंधान सही हो सकते हैं|इसप्रकार की "प्रारंभिक स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली" यदि वास्तव में अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होती है तो यह प्रणाली महामारी जैसे सामूहिक रोगों और उनके स्वभाव कारण आदि को समझने की दृष्टि से बरदान  सिद्ध हो सकती है |  
     विशेष बात यह है कि  प्रारंभिक स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली जैसी यह पूर्वानुमान प्रक्रिया मौसम में आने वाले परिवर्तनों और रोग की घटनाओं के बीच संबंधों पर आधारित है। इसलिए इस प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि मौसमसंबंधी प्राकृतिक घटनाओं के वास्तविक स्वभाव की समझ विकसित की जाए तथा प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के पीछे के आधारभूत वास्तविक कारणों को खोजा जाए एवं सूखा वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में प्रकृति के स्वभाव के आधार पर सही एवं सटीक मौसम पूर्वानुमान लगाने की प्रक्रिया विकसित की जाए |मौसम संबंधी पूर्वानुमान जितने प्रतिशत सच निकलेंगे उतने प्रतिशत ही वे महमारी संबंधी अनुसंधानों के लिए सहयोगी सिद्ध होंगे | इसके अतिरिक्त केवल अनुसंधान प्रक्रिया में भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) को सम्मिलित कर लेने मात्र से इस लक्ष्य को हासिल करना संभव नहीं होगा जब तक कि वहाँ के मौसम वैज्ञानिक सूखा वर्षाबाढ़ आँधी तूफ़ान जैसी प्राकृतिक घटनाओं के बिषय में सही एवं सटीक पूर्वानुमान लगाने में सक्षम नहीं होंगे |   

                       मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाले वैज्ञानिक मिलना आसान है क्या ?

  भारतीय  मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के जिन वैज्ञानिकों को महामारी में मौसम संबंधी भूमिका का अध्ययन करने के लिए सम्मिलित किया गया है वे ऐसा तभी कर पाएँगे जब मौसम संबंधी घटनाओं के विषय में सही सटीक अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने में सक्षम हों | 

    इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले एक दो दशकों में जितनी भी प्राकृतिक आपदाएँ घटित हुईं उनमें से लगभग किसी के भी बिषय में मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा सही एवं सटीक पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका है ऐसी परिस्थिति में ऐसे लोगों को सम्मिलित कर लेने से भी स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली जैसी पूर्वानुमान प्रक्रिया को सफल कैसे बनाया जा सकता है फिर भी प्रयत्न किया जाना चाहिए | कहीं ऐसा न हो जैसा सभी प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं के घटित होने पर जनता का ध्यान भटकाने के लिए एक नए प्रकार के रिसर्च की घोषणा करने का रिवाज सा पड़ा हुआ है |इसके तहत उस प्राकृतिक आपदा से संबंधित रिसर्च को बढ़ावा देने की घोषणा कर दी जाती है | इसके लिए कुछ फंड पास कर लिया जाता है कुछ सुपर कंप्यूटर खरीद लिए जाते हैं कुछ स्थानों पर उपग्रह रडारों आदि की अतिरिक्त व्यवस्था करने की घोषणा कर दी जाती है |

     भूकंप जैसी बड़ी घटनाओं के बाद कुछ स्थानों पर रिसर्च के नाम पर कुछ गड्ढे खोदे जाने लगते हैं कुछ जगहों पर जमीन के अंदर कुछ मशीने लगाईं जाने लगती हैं | जनता का ध्यान भटकाने के लिए ऐसा बहुत कुछ किया जाता है जिस प्रकार से अभी महामारी आई है तो सरकार के द्वारा एक ऐसी विशिष्ट प्रारंभिक स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली विकसित करने की बात भी कहीं उसी प्रकार के रीति रिवाजों का निर्वाह जनता का ध्यान भटकाने मात्र के लिए ही तो नहीं किया जा रहा है | ऐसा हमें इसलिए भी सोचना पड़ रहा है क्योंकि 1864 में चक्रवात के कारण कलकत्ता में हुई क्षति तथा 1866 एवं 1871 के अकाल के बाद, मौसम संबंधी विश्लेषण और संग्रह कार्य एक ढ़ांचे के अंतर्गत आयोजित करने का निर्णय लिया गया। नतीजतन, 1875 में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुई थी लगभग 145 वर्ष बीत चुके हैं उस लक्ष्य को हासिल करने में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग आजतक आंशिक रूप से भी सफल नहीं हो पाया है |ऐसी परिस्थिति में उससे संबंधित लोगों को सम्मिलित करके  जनता के लिए अत्यंत आवश्यक स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली जैसी पूर्वानुमान प्रक्रिया को सफल कैसे बनाया जा सकता है ?

मौसम संबंधी इन घटनाओं के नहीं बताए जा सके पूर्वानुमान !1008

  

 मुंबई में आई भीषण बाढ़:2005 में मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में भीषण बाढ़ आई थी!|इसमें करीब 850 से ज्यादा लोगों की मौतें हुई थीं. अकेले मुंबई में मरने वालों की संख्या करीब 400 से ज्यादा थी |

 सन 2013 में 16 \17 जून की रात केदारनाथ जी में भयंकर सैलाव आया था | लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के प्रतीक तीर्थस्थल केदारनाथ और इसके आसपास भारी बारिश, बाढ़ और पहाड़ टूटने से सबकुछ तबाह हो गया और हजारों लोग मौत के आगोश में समा गए थे। इसके  बिषय में मौसमवैज्ञानिकों के द्वारा पहले से कोई पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था |

 जम्मू कश्मीर में आई भीषण बाढ़: सितंबर 2014 में मूसलाधार मानसूनी वर्षा के कारण भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर ने अर्ध शताब्दी की सबसे भयानक बाढ़ आई। यह केवल जम्मू और कश्मीर तक ही सीमित नहीं थी अपितु पाकिस्तान नियंत्रण वाले आज़ाद कश्मीर, गिलगित-बल्तिस्तान व पंजाब प्रान्तों में भी इसका व्यापक असर दिखा। 8 सितंबर 2014 तक, भारत में लगभग 200 लोगों तथा पाकिस्तान में 190 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। 450 गाँव जल समाधि ले चुके थे।

       भीषण वर्षा के कारण बनारस में प्रधानमंत्री जी की दो दो सभाएँ रद्द करनी पड़ीं !

28 जून 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की वाराणसी में सभा होने वाली थी किंतु भीषण वर्षा के कारण उस सभा को रद्द करना पड़ा |वही सभी दूसरी बार 16 जुलाई 2015 को वर्षा से निपटने की अधिक तैयारियों के साथआयोजित की गई वो भी भीषण वर्षा के कारण रद्द करनी पड़ी |
     चिंता की बात तो यह है कि भीषण वर्षा के कारण प्रधानमंत्री जी के बहुमूल्य समय का उपयोग नहीं किया जा सका | दूसरी चिंता की बात यह है कि प्रधानमंत्री जी की सभाओं का आयोजन मामूली बात नहीं होती है बड़ी व्यवस्थाएँ बनानी पड़ती हैं जिन पर भारी भरकम धनराशि खर्च की जाती है | इसके बाद भी भीषण वर्षा के कारण आगे पीछे दो दो सभाएँ रद्द करनी पड़ीं ये बहुत बड़ी चिंता की बात इसलिए भी है कि जनता के खून पसीने की कठोर कमाई से प्राप्त टैक्स के पैसे मौसम पूर्वानुमान संबंधी जिन अनुसंधानों पर व्यय किए जाते हैं वे अनुसंधान आखिर किस काम आ सके |इस घटना में मौसम विभाग की सार्थकता आखिर क्या रही |  दोनों सभाओं के आयोजन पर खर्च की गई भारी भरकम धनराशि मौसम विभाग की भविष्यवाणी गलत होने के कारण निरर्थक चली गई |
मद्रास में भीषण बाढ़ : नवंबर 2015 में चैन्नई में भीषण बाढ़ एक महीने से अधिक समय तक रही थी !उसमें भी काफी जनधन की हानि हुई थी ,किंतु इनमें से किसी भी बाढ़ के बिषय में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका था | 2016 अप्रैल मई में आग लगने की भीषण दुर्घटनाएँ : अप्रैल मई जून आदि के महीनों में गर्मी तो हर वर्ष होती है किंतु  2016 के अप्रैल मई में आधे भारत में गरमी से संबंधित अचानक अलग प्रकार की घटनाएँ घटित होने लगीं ! जमीन के अंदर का जलस्तर तेजी से नीचे जाने लगा बहुत इलाके पीने के पानी के लिए तरसने लगे | पानी की कमी के कारण ही पहली बार पानी भरकर दिल्ली से लातूर एक ट्रेन भेजी गई थी |गर्मी का असर केवल जमीन के अंदर ही नहीं था अपितु प्राकृतिक वातावरण में इतनी अधिक ज्वलन शीलता विद्यमान थी कि आग लगने की घटनाएँ बहुत अधिक घट रही थीं | यह स्थिति उत्तराखंड के जंगलों में तो 2 फरवरी 2016  से ही प्रारंभ हो गई थी जो  क्रमशः धीरे धीरे बढ़ती चली जा रही थी 10 अप्रैल 2016 के बाद ऐसी घटनाओं में बहुत तेजी आ गई थी ! ऐसा होने के पीछे का कारण किसी को समझ में नहीं आ रहा था |इस वर्ष आग लगने की घटनाएँ इतनी अधिक घटित हो रही थीं इस बिषय में संबंधित वैज्ञानिक कुछ कहने की स्थिति में नहीं थे उन्हें खुद कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था | अंत में आग लगने की घटनाओं से हैरान परेशान होकर 28 अप्रैल 2016 को बिहार सरकार के राज्य आपदा प्रबंधन विभाग ने ग्रामीण इलाकों में सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक खाना न पकाने की सलाह दी थी . इतना ही नहीं अपितु इस बाबत जारी एडवाइजरी में इस दौरान पूजा करने, हवन करने, गेहूँ  का भूसा और डंठल जलाने पर भी पूरी तरह रोक लगा दी गई थी |   इस बिषय में जब वैज्ञानिकों से पूछा गया कि इसी वर्ष ऐसा क्यों हो रहा है और यदि ऐसा होना ही था तो इसका पूर्वानुमान क्यों नहीं लगाया जा सका ?तो उन्होंने कहा कि इस बिषय में हमें स्वयं ही कुछ नहीं पता है कि इस वर्ष ऐसा क्यों हुआ !ये तो रिसर्च का बिषय है इसलिए ऐसे बिषयों पर अनुसंधान की आवश्यकता है |वैसे इसका कारण ग्लोबलवार्मिंग  हो सकता है |   
 असम में भीषण वर्षा और बाढ़ : इसी वर्ष में 13 अप्रैल 2016 से असम आदि पूर्वोत्तरीय प्रदेशों में भीषण वर्षा और बाढ़ का भयावह दृश्य था त्राहि त्राहि मची हुई थी |यह वर्षा और बाढ़ का तांडव 60 दिनों से अधिक समय तक लगातार चलता रहा था |

   इस विषय में  वैज्ञानिकों के वक्तव्य :     सन 2016 के अप्रैल मई में घटित हुई परस्पर विरोधी इन दोनों घटनाओं के बिषय में वैज्ञानिकों से पत्रकारों ने पूछा कि इन दोनों घटनाओं के बिषय में पहले से कोई पूर्वानुमान क्यों नहीं बताया जा सका था | इस पर वैज्ञानिकों ने कहा कि असम आदि पूर्वोत्तरीय प्रदेशों में हो रही भीषण वर्षा और बाढ़ का कारण जलवायु परिवर्तन है तथा बिहार उत्तर प्रदेश राजस्थान मध्यप्रदेश महाराष्ट्र आदि में अधिक गर्मी एवं आग लगने की अधिक घटनाओं का कारण ग्लोबल वार्मिंग है | जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता | 

2018 के अप्रैल मई में हिंसक आँधी तूफानों की घटनाएँ बार बार घटित हो रही थीं 2 मई की रात्रि में आए तूफ़ान से काफी जन धन हानि हुई थी | ऐसे तूफानों के बिषय में किसी को कुछ पता ही नहीं था मौसम वैज्ञानिकों को कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि ऐसे बिषयों में क्या बोला जाए !इनके बिषय में कभी कोई पूर्वानुमान बताया ही नहीं जा पा रहा था वैज्ञानिक लोगों ने भविष्यवाणियाँ करने के लिए कुछ तीर तुक्के लगाए भी किंतु वे पूरी तरह से गलत निकलते चले गए !यहाँ तक कि 7 और 8 मई 2018 को उन्होंने दिल्ली और उसके आस पास भीषण तूफ़ान की भविष्यवाणी बड़े जोर शोर से कर दी यह सुन कर कुछ प्रदेशों की भयभीत सरकारों ने अपने अपने प्रदेशों में स्कूल कालेज बंद कर दिए किंतु उन दो दिनों में हवा का एक झोंका भी नहीं आया !बताया जाता है कि इस बिषय को बाद में पीएमओ ने संज्ञान भी लिया था | इसी घटना के बिषय में एक निजी टीवी चैनल के साथ परिचर्चा में मौसम विज्ञान विभाग के महा निदेशक महोदय डॉ.के जे रमेश जी से एक पत्रकार महोदय ने प्रश्न कर दिया कि क्या कारण है कि आपका विभाग इतने भयंकर आँधी तूफानों के बिषय में कोई पूर्वानुमान नहीं लगा सका और जो लगाए भी गए वे गलत निकलते चले गए !इस पर डॉ.के जे रमेश जी ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ऐसे तूफ़ान आ रहे हैं इसीलिए इनके बिषय में पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं हो पा रहा है और अचानक आ जा रहे हैं आँधी तूफ़ान पता ही नहीं लग पा रहा है | अगले दिन कई अखवारों में हेडिंग छपी थी -"चुपके चुपके से आते हैं चक्रवात !"

केरल में भीषण बाढ़ :3 अगस्त 2018 को मौसम विज्ञान विभाग की ओर से जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई उसमें भविष्यवाणी की गई थी कि अगस्त और सितंबर महीने में दक्षिण भारत में सामान्य वर्षा की संभावना है !जबकि 5 अगस्त से ही भीषण बारिश प्रारंभ हो गई थी जिससे केरल कर्नाटक आदि दक्षिण भारत में त्राहि त्राहि माही हुई थी | जिसके बिषय में केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री जी ने स्वीकार भी किया कि यदि मौसम विभाग की भविष्यवाणी झूठी न निकली होती तो बाढ़ से जनता इतनी अधिक पीड़ित न हुई होती | इसके बिषय में मौसम निदेशक डॉ.के. जे. रमेश से एक टीवी चैनल ने पूछा तो उन्होंने कहा कि केरल की बारिश अप्रत्याशित थी इसलिए इसके बिषय में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका था | इसका कारण जलवायु परिवर्तन है जबकि दक्षिण भारत में 2018 के अगस्त महीने में हुई | 

   इसी भीषण वर्षा के बिषय में 2018 के अगस्त महीने का मौसम पूर्वानुमान मैंने मौसम विभाग के निदेशक डॉ.के जे रमेश जी की मेल पर 29 जुलाई 2018 को ही भेज दिया था !उसमें लिखा है कि अगस्त की एक से ग्यारह तारीख के बीच इतनी भीषण वर्षा दक्षिण भारत में होगी कि बीते कुछ दशकों का रिकार्ड टूटेगा !वर्षा का स्वरूप इतना अधिक डरावना होगा कि बचाव के लिए सरकारों के द्वारा किए जाने वाले अधिकतम प्रयास निरर्थक होंगे !"यह पूर्वानुमान हमारी मेल पर अभी भी पड़ा है जिसे उन्होंने स्वीकार भी किया था कि मेरा वर्षा पूर्वानुमान सही निकला है किंतु उसे प्रोत्साहित नहीं किया है |

     बिहार में आई भीषण बाढ़ :सितंबर 2019 में बिहार में आई भीषण बाढ़ के बिषय में कोई पूर्वानुमान बताने में मौसम विभाग असफल रहा था !मौसम पूर्वानुमान बताने वाले लोग कुछ बता ही नहीं पा  रहे थे और जो बता रहे थे वो गलत होता जा रहा था तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने पत्रकारों से बात करते हुए स्वीकार किया था कि मौसम विभाग वाले लोग कुछ बता ही नहीं पा  रहे हैं वर्षा के बिषय में वे सुबह कुछ कहते हैं दोपहर में कुछ दूसरा कहते हैं और शाम होते होते कुछ और कहने लगते हैं | पत्रकारों ने पूछा तो इस बाढ़ के बिषय में आप जनता से क्या कहना चाहेंगे तो नीतीश जी ने कहा कि मेरा मानना है कि हथिया नक्षत्र के कारण यह अधिक बारिश हो रही है | इसीप्रकार से स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे जी ने भी पत्रकारों के पूछने पर यही कहा था कि हथिया नक्षत्र के कारण ही बिहार में  अधिक बारिश हो रही है | मौसम विज्ञान पर विश्वास न करके ज्योतिष की नक्षत्र विद्या के ही गुण गाने लगे थे |  

सर्दियों के बिषय में  मौसम विभाग की गलत हुई भविष्यवाणी : सन 2019 \2020 की सर्दियों के बिषय में  मौसम विभाग की पुणे इकाई ने सामान्य से कम सर्दी का अनुमान व्यक्त किया था लेकिन सर्दी ने तो सौ साल के रिकार्ड तोड़ दिए । इस पर पत्रकारों ने मौसम विभाग की उत्तर क्षेत्रीय पूर्वानुमान इकाई के प्रमुख डॉ. कुलदीप श्रीवास्तव से पूछा कि सर्दी की दस्तक से पहले मौसम विभाग ने कहा था कि इस साल सर्दी सामान्य से कम रहेगी,लेकिन सर्दी ने तो सौ साल के रिकार्ड तोड़ दिए। पूर्वानुमानों में इतनी बड़ी गलती कि पूर्वानुमान सीधे सीधे इतने विपरीत चले गए |  

अधिक सर्दी होने की भविष्यवाणी गलत हुई :2020-21 में  लानीना का प्रभाव बताकर शीतऋतु में अधिक सर्दी होने की भविष्यवाणी की गई थी किंतु इस बार तो जनवरी माह से ही तापमान बढ़ने लग गया था | ऐसा होने के पीछे का कारण जब उन भविष्यवक्ताओं से पूछा गया तब उन्होंने वही जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग को कारण बता दिया था |

अत्यधिक बारिश हुई जिसका पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका !:

   सन 2020 के अप्रैल मई में  इतनी अधिक बारिश हुई जितनी पहले कभी नहीं हुई थी। इन दो माह में अब तक कुल 51.4 मिमी बारिश हो चुकी है।इसके बाद मौसम विभाग की ओर से और अधिक बारिश होने का अनुमान बताया गया | 

13 May 2020-इस बार पड़ेगी सूरज के तपिश की मार नहीं पड़ेगी , इस वर्ष ज्यादा गर्मी के आसार नहीं हैं !ये मौसमवैज्ञानिकों  के द्वारा बताया गया पूर्वानुमान तब  घोषित किया गया जब  गर्मी का आधा समय निकल  गया था | इसमें पूर्वानुमान क्या है और ऐसे पूर्वानुमान बताने के लिए वैज्ञानिकों की आवश्यकता कहाँ है |  
19 -9- 2020- सितंबर में पड़ रही अप्रैल-मई जैसी गर्मी, मौसम विभाग ने बताई आखिर क्या है वजह !प्रादेशिक मौसम विज्ञान केंद्र के प्रमुख कुलदीप श्रीवास्तव ने बताया कि इन दिनों आसमान में बादल बहुत कम हैं। बीच में कोई अवरोधक न होने से सूरज की रोशनी सीधे भी जमीन तक पहुँच रही है।

15 Oct 2020 : इस साल पड़ेगी कड़ाके की सर्दी !मौसम विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय मोहापात्रा ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी एनडीएमए की तरफ से 'शीत लहर के खतरे में कमी' पर आयोजित वेबिनार को संबोधित करते हुए कहा कि इस साल कड़ाके की ठंड पड़ सकती है। पिछले साल सर्दी के मौसम के दौरान शीत लहर अधिक लंबा खिंची थी। इसके बाद एक बार फिर गलत हुई मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी !

   2020-21 में  वैज्ञानिकों के द्वारा लानीना का प्रभाव बताकर शीतऋतु में अधिक सर्दी होने की भविष्यवाणी की गई थी किंतु इस बार तो जनवरी से ही तापमान बढ़ने लग गया था ऐसा होने के पीछे का कारण जब उन भविष्यवक्ताओं से पूछा गया तब उन्होंने वही जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग को कारण बता दिया था | इस साल कड़ाके की ठंड पड़ने की क्या वजह बताई कि इस साल ला नीना की स्थिति के कारण कड़ाके की ठंड पड़ सकती है। 

     मौसम वैज्ञानिकों के वक्तव्य : 

  मानसून और सर्दी संबंधी पूर्वानुमान लगातार  गलत साबित होते रहने पर मौसम विभाग की उत्तर क्षेत्रीय पूर्वानुमान इकाई के प्रमुख डॉ. कुलदीप श्रीवास्तव से पूछा गया कि पहले मानसून और अब सर्दी का पूर्वानुमान भी गलत साबित हुआ क्यों ?   इस प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि कड़ाके की ठंड मौसम की चरम गतिविधि का नतीजा है  जिसका सटीक पूर्वानुमान लगाना संभव ही नहीं है |भारत जैसे ऊष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्र में मौसम के इस तरह के अनपेक्षित और अप्रत्याशित रुझान का सटीक पूर्वानुमान लगाने की तकनीक दुनिया में कहीं भी नहीं है।सर्दी ही नहीं, अतिवृष्टि और भीषण गर्मी जैसी मौसम की चरम गतिविधियों का दीर्घकालिक अनुमान संभव ही नहीं है।मौसम की चरम गतिविधियों के दौरान, मौसम का मिजाज तेजी से बदलने की प्रवृत्ति प्रभावी होने के कारण अल्पकालिक अनुमान भी मुश्किल से ही सटीक साबित होता है| मौसम के तेजी से बदलते मिजाज को देखते हुये चरम गतिविधियों का दौर भविष्य में और अधिक तेजी से देखने को मिल सकता है। इनकी आवृत्ति में भी तेजी देखी जा सकती है। ऐसे में बारिश के अनुकूल परिस्थिति बनने पर मूसलाधार बारिश होना या गर्मी का वातावरण तैयार होने पर अचानक तापमान में उछाल या गिरावट जैसी घटनायें भविष्य में बढ़ सकती हैं। मौसम संबंधी शोध और अनुभव से स्पष्ट है कि इस तरह की घटनाओं का समय रहते पूर्वानुमान लगाना भी मुश्किल है। ऐसे में पूर्वानुमान के गलत साबित होने की संभावना भी रहेगी। 

 04 Mar 2021-साल 1901 में जब से भारतीय मौसम विभाग ने रिकॉर्ड रखना शुरू किया, तब से आज तक कुल 120 सालों में इस साल की सर्दी तीसरी सबसे गर्म सर्दी रही यानी तीसरा सबसे कम सर्दी वाला मौसम रहा। खास बात यह कि शीतलता प्रदान करने वाली भौगोलिक घटना ला-नीना के असर के बावजूद जनवरी से फरवरी के बीच सर्दी गर्म रही।

5 Jan 2021- 1901 के बाद आठवां सबसे ज्यादा गर्म साल 2020 रहा !भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) कहा कि 1901 के बाद से 2020 आठवां सबसे अधिक गर्म वर्ष रहा !
          महामारी को समझने के लिए मौसम का अध्ययन होगा किंतु मौसम को कैसे समझा जाएगा  ?
      महामारी से बचाव के लिए जो आवश्यक उपाय करने हैं उनकी जानकारी करने के लिए कोई वैज्ञानिक आधार पूर्ण तर्कसंगत व्यवस्था नहीं खोजी जा सकी है | कोरोना से मुक्ति दिलाने वाली औषधियों का निर्माण भी तभी संभव है जब महामारी को ठीक ठीक प्रकार से समझा जा सके | महामारी को अच्छी प्रकार से समझे बिना इससे बचाव के लिए उपाय खोजना या औषधि आदि उपचार खोजना संभव ही नहीं है | 
     महामारी को ठीक ठीक प्रकार से समझने के लिए बहुत से वैज्ञानिकों ने मौसम संबंधी विविध प्रकार की घटनाओं को जिम्मेदार माना है | उन्हें लगता है कि महामारी को प्रभावित करने में मौसम की भूमिका भी हो सकती है | अक्सर मौसम बदलते समय रोग पैदा होते देखे जाते हैं | मौसम संबंधी वातावरण में अचानक आने वाले बदलावों से कई बार रोगों को पनपते देखा जाता है किंतु उन मौसमी परिवर्तनों का समाज को अनुभव भी है और सहने का अभ्यास भी है इसलिए लोग स्वतः अपने आहार बिहार खान पान पर संयम रखते हुए अपनी सुरक्षा कर लिया करते हैं कई बार कुछ औषधियों का भी सेवन करना पड़ता है | 
     महामारी के लिए भी लगता है कि यह शायद मौसम संबंधी ही किसी अप्रत्यक्ष परिवर्तन का परिणाम हो |जो वैज्ञानिक अनुभवों अनुसंधानों से ही समझा जा सकता हो | इसके लिए महामारी वैज्ञानिकों को मौसम संबंधी घटनाओं के विषय में सही सटीक अनुमान पूर्वानुमान आदि चाहिए |इस मदद की अपेक्षा मौसम वैज्ञानिकों से ही की जा सकती है |मौसम वैज्ञानिक लोग यदि मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के विषय में ही सही सही अनुमान पूर्वानुमान आदि नहीं लगा पाएँगे तो महामारी संबंधी संक्रमण के घटने बढ़ने या महामारी के पैदा और समाप्त होने में मौसम संबंधी भूमिका के विषय में अनुसंधान किया जाना संभव ही नहीं है |
            मौसम संबंधी अधूरे अनुसंधानों से महामारी को समझना संभव नहीं है |
    ये दुर्भाग्य ही है कि  महामारी जैसा इतना बड़ा संकट जब उपस्थित हुआ तब महामारी संबंधी अनुसंधान इतने सक्षम नहीं  हैं कि उनके द्वारा महामारी को समझना संभव हो |इसके लिए मौसम संबंधी अनुसंधानों का सहयोग नहीं मिल पा रहा है | 
   वर्षा ऋतु के चार महीनों में से किस महीने में वर्षा कैसी होगी कृषि कार्यों के लिए यह बहुत उपयोगी एवं आवश्यक होता है | सभी प्रकार के मौसम संबंधी या प्राकृतिक आपदाओं से संबंधित अनुमान पूर्वानुमान आदि पता लग जाने से मनुष्यजीवन की कठिनाइयाँ तो कम होती ही हैं  इससे उसे काफी सहयोग भी मिल जाता है | 
लगभग 145 वर्ष पूर्व  मौसम संबंधी कुछ बड़ी घटनाएँ घटित होने के कारण काफी अधिक मात्रा में जनधन की हानि हुई थी | उन्हीं से आहत होकर भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना की आवश्यकता समझी गई थी | लगभग 145 वर्ष बीत चुके हैं अभी तक सही सही दीर्घावधि मौसम पूर्वानुमान किसानों को उपलब्ध नहीं करवाया जा सका है | ये चिंता की बात होनी चाहिए | किसान मार्च अप्रैल के महीने में एक फसल पूरी हो जाने के बाद जुलाई अगस्त में बोई जाने वाली दूसरी फसल के बिषय में योजना बनाते हैं | वर्षाऋतु में जिसप्रकार की वर्षा होने की संभावना होती है उसी के अनुसार फसलों का चयन किया जाता है उसी के हिसाब से ऊँचे नीचे आदि खेतों के हिसाब से इस वर्ष में किस प्रकार की फसल बोना हितकर होगा |इसके साथ ही वर्षाऋतु में जिसप्रकार की वर्षा होने की संभावना होती है उसी के अनुसार ही वे एक वर्ष के लिए आनाज भूसा आदि का संरक्षण करते हैं बाक़ी मार्च अप्रैल के महीने में ही फसल पूरी हो जाने पर खर्चे के लिए बेच लिया करते हैं | कृषिक्षेत्र के अतिरिक्त सैन्य आदि अन्य क्षेत्रों में भी दीर्घावधि मौसम पूर्वानुमानों की आवश्यकता होती है | 

     अल्पावधि मौसम पूर्वानुमान की यह स्थिति है कि इसमें वैज्ञानिक अनुसंधान भावना का कोई विशेष योगदान नहीं होता है इसमें तो रडारों एवं उपग्रहों के सहयोग से जो घटना एक जगह घटित होते देख ली जाती है उसकी गति और दिशा के हिसाब से अंदाजा लगा लिया जाता है कि ये इतने दिन में उस देश प्रदेश या जिले आदि में पहुँच सकती है | बीच में हवाओं का रुख बदल जाने से लगाया हुआ अंदाजा गलत हो जाता है | वैसे भी जो बादल जिधर जिधर जाते हैं सभी जगह तो नहीं बरसते हैं कुछ जगहों पर बरसकर वापस लौट जाते हैं | तूफानों चक्रवातों में ऐसे कैमरों से मिली तस्बीरें कई बार काम आ जाती हैं जिनसे कुछ तीर तुक्के सही फिट भी हो जाते हैं,कभी नहीं भी होते हैं तो वर्षा संबंधी अल्पावधि भविष्यवाणियाँ भी गलत होती हैं ऐसा होने पर नुक्सान भी होता है |  

     कई बार कहीं वर्षा होना जब शुरू हो जाता है उसके साथ मौसम भविष्यवक्ता लोग भी शुरू हो जाते हैं जैसे जैसे वर्षा होती चली जाती है वैसे वैसे  वे भी दो दो दिन बढ़ाते चले जाते हैं अभी दो दिन और बरसेगा लोग समझते हैं दो दिन बाद बंद हो जाएगा फिर कह दिया जाता है अभी तीन दिन और बरसेगा लोग सोचते हैं कि चलो तीन दिन और बरसेगा काम चला लेते हैं तो घर में पानी भर जाने के बाद भी लोग छत पर काम चलाने के लिए रह जाते हैं उसके बाद भी पानी बरसते रहता है तो ये कहते हैं तीन दिन और बरसेगा तब तक पानी छत के करीब आ चुका होता है ऐसी परिस्थिति में तब लोग घर छोड़कर कहीं जाने लायक भी नहीं रह जाते हैं और न छत पर ही रहने की परिस्थिति रह पाती है ! लोगों का सामान भी सड़ जाता है और खुद भी हादसे के शिकार होते हैं ! ऐसे तीरतुक्कों को मौसम पूर्वानुमान कैसे कहा जा सकता है और इसमें विज्ञान कहाँ होता  है ! 2015 के नवंबर महीने में मद्रास में हुई भीषण बारिश और बाढ़ का कारण कुछ ऐसा ही होना था | प्रशांत महासागर से चली बादलों की श्रृंखला जिस और जिस गति से जाती है उस गति से उस दिशा के हिसाब से अनुमान लगा लिया जाता है किंतु तब तक जितने बादल दिखाई पड़ रहे होते हैं उतने के बिषय में ही अंदाजा लगाया जा सकता है तीन दिन बाद भी यदि बादलों की श्रृंखला टूटती नहीं है तो तीन दिन और बरसेगा उसके बाद भी बादल दिखाई पड़ते रहें तो तीन दिन और बरसेगा ऐसे अंदाजे लगाए जाते रहते हैं | 

    ऐसे अनुमान यदि मौसम विज्ञान के आधार पर लगाए जा रहे होते तो बिना बादलों को देखे ही पहले से पता होता कि बादल कितने दिनों तक बरस सकते हैं | ऐसा विज्ञान महामारियों से संबंधित अनुसंधानों में मदद कर सकता है किंतु ऐसा करने की योग्यता रखने वाले मौसम वैज्ञानिक हैं कहाँ जिन की योग्यता पर भरोसा करके महामारी से संबंधित अनुसंधान प्रारंभ किए जा सकते हैं | 

 जलवायु परिवर्तन और मौसम !

      वैज्ञानिकों के द्वारा स्थापित मान्यता के अनुशार जलवायुपरिवर्तन मौसम को प्रभावित करता है और मौसम स्वास्थ्य को प्रभावित करता है मौसम संबंधी बड़े उत्पात महामारियों की उत्पत्ति के कारण बनते हैं |इसलिए महामारियों से संबंधित किसी भी अनुसंधान के लिए मौसम संबंधी घटनाओं का अध्ययन अनुसंधान पूर्वक पूर्वानुमान लगाया  जाना बहुत आवश्यक है | चूँकि मौसम संबंधी घटनाओं पर जलवायुपरिवर्तन का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है इसलिए जलवायु परिवर्तन के मौसम पर पड़ने वाले प्रभाव के बिषय में सही सही अनुसंधान किए बिना मौसम से प्रभावित होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सही एवं सटीक अध्ययन कैसे किया जा सकता है और महामारियों के बिषय में पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है |

      विशेष बात यह है मौसम का जो सहज क्रम बना हुआ है जिसमें सर्दी के समय में उचित मात्रा में सर्दी होती है और गर्मी की ऋतु में उचित मात्रा में गरमी होती है तथा वर्षा के समय उचित मात्रा में वर्षा होती है | जब तक ऐसा क्रम अपने सहज प्रवाह में चलता रहता है तब तक न तो मौसम पूर्वानुमान लगाने की विशेष आवश्यकता होती है और न ही ऐसे समय में महामारियों के ही पैदा होने की दूर दूर तक कोई संभावना रहती है |

     सर्दी की ऋतु  सर्दी बहुत कम या बहुत अधिक होने लगे या उसकी समयावधि बहुत अधिक घट या बढ़ जाए !ऐसा ही वर्षाऋतु में वर्षा को लेकर हो और गर्मी के समय में ऐसा ही गर्मी के संबंध में असंतुलन  देखा जाए तो वैज्ञानिक भाषा में ऐसी घटनाओं को जलवायु परिवर्तन के नाम से जाना जाता है | उन्हीं के द्वारा कहा जाता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण घटित हुई  घटनाओं के बिषय में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है और यदि सभी घटनाएँ संतुलित मात्रा में ही घटित होती रहें तो पूर्वानुमानों की आवश्यकता ही क्या है वो तो सबको वैसे ही पता है |

      अनंतकाल से चला आ रहा मौसम का यह क्रम जब टूटता है और वह जिस सीमा तक टूटता है उसी स्तर के प्राकृतिक रोग प्रारंभ होने की संभावना होती है और जब बड़े प्राकृतिक विप्लव होते हैं तब महामारियों का निर्माण होने की संभावना होती है | 

     मौसम वैज्ञानिकों की समस्या यह है कि मौसम का क्रम टूटने या प्राकृतिक विप्लवों को वो जलवायु परिवर्तन मान चुके हैं और जलवायु परिवर्तन का पूर्वानुमान लगाया नहीं जा सकता ऐसा पहले ही कहा जा चुका है | जलवायु परिवर्तन के कारण घटित घटनाओं का स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है | यदि उनका पूर्वानुमान वे लगा ही नहीं सकेंगे तो पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा कल्पित विशिष्ट प्रारंभिक स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली (Early Health Warning System) संबंधी अनुसंधान प्रक्रिया में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग को सम्मिलित किए जाने का उद्देश्य क्या होगा और उस प्रकार के अध्ययनों में उनकी सार्थक भूमिका किस प्रकार की होगी |

     सामान्यतौर पर प्रत्येक वर्ष के अप्रैल मई जून तक अधिक गरमी पड़ती है इसी प्रकार से नवंबर दिसंबर जनवरी आदि में अधिक सर्दी बढ़ती है|प्रकृति के इसी समय चक्र से समाज सुपरिचित है यही हमेंशा से चला आ रहा है इसी समय क्रम को स्थायी मानकर इसी के आधार पर चिकित्सा वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि सन 2020 के अप्रैल मई जून आदि में अधिक गरमी  पड़ेगी और  अधिक तापमान में वायरस कमजोर पड़ जाता है इसलिए सन 2020 के अप्रैल मई जून आदि में कोरोना संक्रमण समाप्त जाएगा  किंतु ऐसा हुआ नहीं मई तक तो वर्षा और बर्फबारी ही होते देखी सुनी जाती रही इसलिए तापमान उतना अधिक बढ़ा ही नहीं जितने बढ़ने पर कोरोना संक्रमण  समाप्त होने  की संभावना थी | 

     इसी प्रकार से नवंबर दिसंबर जनवरी आदि में अधिक सर्दी पड़ती है|समय जनित मौसम के इसी स्वभाव से समाज सुपरिचित भी है और यही हमेंशा से चला भी आ रहा है इसे ही सच मानकर वैज्ञानिकों ने कह दिया कि 2020 की सर्दी अर्थात नवंबर दिसंबर आदि में कोरोना संक्रमण काफी अधिक बढ़ जाएगा !दिल्ली  के बिषय में अनुमान लगाया गया कि 15 हजार बिस्तरों की आवश्यकता पड़ सकती है |उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि इस वर्ष की सर्दियों में जनवरी फरवरी से ही तापमान बढ़ना प्रारंभ हो जाएगा जिससे सर्दियों के समय में भी सर्दी कम पड़ेगी | 

      ऐसी परिस्थिति में चिकित्सा वैज्ञानिकों के द्वारा गरमी की ऋतु में कोरोना संक्रमण घटने एवं सर्दी के समय में कोरोना संक्रमण बढ़ने के बिषय में लगाया गया पूर्वानुमान संपूर्ण रूप से गलत निकल गया | वस्तुतः चिकित्सा वैज्ञानिकों के द्वारा लगाए गए इस पूर्वानुमान का आधार तो मौसम था मौसम का पूर्वानुमान उन्हें पता नहीं था इसलिए चिकित्सा वैज्ञानिकों के द्वारा लगाए गए  पूर्वानुमान के गलत निकल जाने का एक कारण यह भी हो सकता है | इसलिए बिना किसी सार्थक अनुसंधान के यह मान लेना उचित नहीं होगा कि सर्दी में कोरोना बढ़ा नहीं और गर्मी में कम नहीं हुआ | इसका मतलब मौसम का महामारी से कोई संबंध ही नहीं है |ऐसा निश्चय किया जाना तब संभव था जब हर वर्ष की तरह ही सर्दी के समय सर्दी पड़ी होती और गर्मी के समय गर्मी पड़ी होती | ऐसे समय यदि मौसम संबंधी अनुसंधानों का सही सहयोग मिला होता तो महामारी को समझने में और अधिक सुविधा हो सकती थी |    

    वर्तमान मौसम वैज्ञानिक इस  परिस्थिति में चिकित्सा वैज्ञानिकों का सहयोग करने में कितने सक्षम थे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 2019\20 की सर्दियों में कम सर्दी होने का पूर्वानुमान लगाया था जबकि 2020\21की सर्दियों में अधिक सर्दी होने का पूर्वानुमान लगाया था ,किंतु उनके द्वारा लगाए गए ये दोनों पूर्वानुमान ही न केवल गलत निकल गए अपितु अनुमानों के विरुद्ध घटनाएँ घटित होते देखी जाती रहीं | जिस वर्ष सर्दी कम होने का पूर्वानुमान लगाया गया उस वर्ष सर्दी इतनी अधिक हुई कि दशकों के रिकार्ड टूटे और जिस वर्ष सर्दी अधिक होने का पूर्वानुमान लगाया उस वर्ष आधी सर्दी से ही तापमान बढ़ने लग गया ऐसा दशकों बाद हुआ है यह उन्हीं लोगों ने बताया है जिन्होंने अधिक सर्दी होने की भविष्यवाणी की थी | 

      ऐसी परिस्थिति में भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा जो विशिष्ट प्रारंभिक स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली (Early Health Warning System) विकसित की जा रही है, जिससे देश में किसी भी रोग के प्रकोप की संभावना का अनुमान लगाया जा सकेगा।भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) भी इस विशिष्ट प्रणाली की अध्ययन और अनुसंधान प्रक्रिया में शामिल किया गया है।यह भी उचित दिशा में अच्छी नियत से उठाया कदम माना जा सकता है किंतु प्रारंभिक स्वास्थ्य चेतावनी प्रणाली जैसे बड़े संकल्प को पूरा करने के लिए इस प्रक्रिया में भारतमौसमविज्ञानविभाग को केवल सम्मिलित कर लेना ही पर्याप्त नहीं होगा अपितु उनमें से उन लोगों को ही सम्मिलित करना उचित होगा जिन मौसम वैज्ञानिकों को मौसम के बिषय में कुछ समझ भी हो |जिनके द्वारा पहले की गई मौसम संबंधी कुछ भविष्यवाणियाँ सही एवं सटीक घटित हो चुकी हों |

    स्वास्थ्य संबंधी अध्ययनों के लिए मौसमसंबंधी प्रकृति के स्वभाव को समझने वाले सक्षम मौसमवैज्ञानिक ही कुछ योगदान दे सकते हैं |ऐसे अध्ययनों अनुसंधानों में उपग्रहों रडारों से की जाने वाली आँधी तूफानों एवं बादलों की जासूसी वाला विज्ञान उपयोगी नहीं होगा और न ही सुपरकंप्यूटरों से प्राप्त गणनाएँ ही उपयोगी रहेंगी !इसके अतिरिक्त यदि मौसम के स्वभाव को समझने के बिषय में मौसमवैज्ञानिकों के पास यदि कोई वैज्ञानिक पद्धति भी हो तभी उनके योगदान से ऐसे अनुसंधानों को आगे बढ़ाने में कुछ मदद मिल सकती है |

जुगाड़ और वैज्ञानिक अनुसंधानों में अंतर होता है !

 जुगाड़ तो केवल जुगाड़ ही होता है ये विज्ञान नहीं हो सकता है | जिसमें दीर्घकालीन अनुसंधान भावना न होकर प्राप्त परिस्थिति में जिस किसी प्रकार से काम चला लेना जुगाड़ होता है जो किसी वैज्ञानिक सिद्धांत पर आधारित न होने के कारण उभयपक्षी होता है | उसमें सही गलत हानि लाभ दोनों होने की संभावना होती है | काम बनेगा तो बनेगा अन्यथा बिगड़ तो रहा ही है | इस भावना से किसी विषय में जुगाड़ पद्धति अपनाई जाती है | जुगाड़ प्रक्रिया किसी सिद्धांत से न बँधी होने के कारण  ये सही गलत दोनों ही होती है | एक ही प्रक्रिया एक बार सही तो दूसरी बार गलत हो जाती है | मौसम हो या महामारी जुगाड़ विज्ञान दोनों ही जगह काम नहीं आया है |

  उदाहरण -किसी जंगल में हाथी बहुत रहा करते थे वे आस पास के गाँवों में कभी कभी उपद्रव मचा आया करते थे | जिससे काफी नुक्सान हो जाया करता था | इससे बचाव के लिए हैरान परेशान होकर गाँव वालों ने अपने गाँव में पहरा देना शुरू कर दिया किंतु कब तक ऐसा करते कोई अवधि तो थी नहीं | 

    परेशान  होकर गाँव वालों ने गाँव के बाहर जंगल की ओर मुख करके कुछ  कैमरे लगा दिए फिर जब हाथियों का झुंड गाँव की ओर आते दिखाई पड़ता था तो गाँव वाले इकट्ठे होकर हाथियों को जंगल में ही खदेड़ आते थे जिससे गाँव वालों का नुक्सान होने से कभी कभी बच जाया करता था| कभी बचाव होने और कभी न होने का कारण यह था कि गाँव वालों ने अपने अपने गाँवों में कैमरे केवल जंगल की तरफ लगवा रखे थे उधर से ही हाथियों के आने की अधिक संभावना रहती थी|इसलिए जब उधर से आते थे तब तो हाथियों का झुंड दिखाई पड़ जाता था  उन्हें खदेड़ कर अपना बचाव कर लिया जाता था |यह एक जुगाड़ मात्र है इसे हाथीविज्ञान नहीं कहा जा सकता है |कभी कभी हाथियों का झुंड जगल की ओर से प्रवेश न करके किसी दूसरी ओर से गाँव में घुस कर उपद्रव मचा दिया करता था जिससे काफी नुक्सान हो जाया करता था |ऐसे समय में यह जुगाड़ निष्फल हो जाया करता था |  

     इसी प्रकार से मौसम विज्ञान है जो उपग्रहों रडारों के आधीन है जो उससे दिखाई देता है वो पता हो जाता है |बादल आँधी तूफ़ान आदि तो दिखाई दे जाते हैं तो उनके विषय में कुछ सही गलत अंदाजा लगा भी लिया जाता है किंतु भूकंप बज्रपात जैसी घटनाएँ उनसे नहीं देखी  जा सकती हैं इसलिए उनके विषय में कुछ भी कहना संभव नहीं हो पा रहा है |वस्तुतः मौसम विज्ञान के नाम से जिसे जाना जाता है वह मौसमसंबंधी घटनाओं के विषय में अंदाजा लगाने का एक जुगाड़ मात्र है यह विज्ञान नहीं है | यदि यह वैज्ञानिक पद्धति होती तब तो मौसम संबंधी पूर्वानुमान लगाने की वह पद्धति खोजी जाती जिससे इस बात का पूर्वानुमान लगाया जाता कि वर्षा किस दिन कैसी होगी !किस महीने कैसी होगी और किस वर्ष कैसी होगी | ये पूर्वानुमान कहे जाते किंतु किसी एक स्थान पर घटित होती घटनाओं को देखकर उनके दूसरे स्थान पर पहुँचने के विषय में अंदाजा लगा लेने में न कोई विज्ञान है और न ही पूर्वानुमान है |

     इसमें यदि वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई जाती तो मौसम के आधारभूत वे कारण खोजे जाते जिनसे मौसम संबंधी घटनाएँ न सिर्फ पैदा होती हैं अपितु प्रभावित भी होती हैं उन्हें खोजकर लगाए जाने वाले मौसम संबंधी अनुमान पूर्वानुमान आदि सही होते देखे जाते हैं |

     इसी प्रकार से हाथियों के स्वभाव का अध्ययन किया जाता उसके अनुशार यह पता लगाने का प्रयत्न किया जाता कि हाथी अपनी किस आवश्यकता की पूर्ति के लिए गाँव की ओर आते हैं !आते भी हैं तो ऐसा उपद्रव क्यों करते हैं इससे उन्हें क्या मिलता है | यदि वे सुविधाएँ उन्हें जंगल में ही मिलने लगें तो संभव है कि हाथी जंगलों से निकलें ही नहीं और न किसी गाँव में घुसें और न ही उनका नुक्सान करें | 

      हाथी जंगलों से बाहर निकलते क्यों हैं ?  

     इसमें वैज्ञानिक अनुसंधान तो यह जानने के लिए करना होगा कि हाथी जंगलों से निकलते कब हैं ? दूसरी बात हाथी जंगलों से बाहर निकलते क्यों हैं ?तीसरी बात हाथियों का झुंड जंगलों से निकलकर योजनाबद्ध ढंग   से सीधे गाँव की ओर ही क्यों आता है | इन बातों को ठीक ढंग से समझने के लिए हाथियों के स्वभाव का अध्ययन करना होगा | तभी यह पता लग पाएगा कि जंगलों में जब हाथियों के खाने के लिए चारा और पीने के लिए  पानी नहीं बचता है तब वे जंगलों से निकलकर गाँवों की ओर जाने का रुख करते हैं ?ऐसा पता लगा करके जंगलों में ही चारा पानी को पर्याप्त बनाए रखने का प्रयत्न करना होगा तो हाथी जंगलों में ही संतुष्ट बने रहेंगे न जंगलों से बाहर निकलेंगे और न ही गाँव की ओर आएँगे |  

      ऐसे अनुसंधानों को यदि और अधिक गंभीर बनाना है तो यह पता लगाना पड़ेगा कि जंगलों में हाथियों के खाने पीने की कमी वर्ष के किन किन महीनों में होने की संभावना रहती है | अनुसंधान पूर्वक यह पता लगाया गया कि ग्रीष्म ऋतु में जब तालाब सूख जाते हैं नदियों में पानी बहुत कम हो जाता है उस समय पेड़ पौधे झुलसने लग जाते हैं तब हाथियों को भोजन और पानी दोनों की समस्या हो जाती है | ऐसे समय में हाथियों जंगलों से बाहर निकलने की संभावना अधिक रहती है|उसमें भी जिस दिन तापमान जितना अधिक होगा उस दिन व्याकुलता भी उतनी अधिक होगी |उस दिन अन्य दिनों की अपेक्षा  हाथियों के जंगलों से बाहर निकलने की संभावना विशेष अधिक रहती है |इन सभी बिंदुओं पर अध्ययन पूर्वक हाथियों के जंगलों से बाहर निकलने के विषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | 

     इसमें भी यदि पता लग जाए कि सबसे अधिक गर्मी होने की संभावना तब होती है जबतक  सूर्य मृगशिरा नक्षत्र में रहता है | प्रतिवर्ष कब से कब तक सूर्य मृगशिरा नक्षत्र में रहता है | खगोलीय गणित विज्ञान के द्वारा इसकी गणना करके वर्षों पहले इस बात का पूर्वानुमान लगा लिया जाता है इसी के आधार पर वर्षों पहले इस बात का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है कि किस वर्ष के किस महीने के किन किन दिनों में हाथियों के जंगलों से बाहर निकलने की संभावना अधिक रहेगी |   

     किसी किसी वर्ष ही वर्षा ठीक होती है तो कुछ वर्षों में बहुत अधिक और कुछ वर्षों में वर्षा बहुत कम होकर बिल्कुल सूखा जैसे हालात बन जाते हैं | जिन वर्षों में वर्षा ठीक होती है उन वर्षों में तो आवश्यकता के अनुरूप चारा पानी जंगलों में बना रहता है किंतु वर्षा का संतुलन बिगड़ते ही चारा पानी का भी संतुलन बिगड़ जाता है |  ऐसी परिस्थिति में किस वर्ष कैसी वर्षा होगी इसका सही सही पूर्वानुमान पता लगना आवश्यक हो जाता है |  

    जिस प्रकार से यह पद्धति हाथियों के विषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए वैज्ञानिक होगी उसी प्रकार से वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा लगाए जाने वाले मौसम संबंधी पूर्वानुमान सही एवं सटीक होते देखे जाते हैं |महामारी संबंधी अनुसंधानों के लिए भी इसी प्रकार की वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धति अपनाई जानी चाहिए |





Comme

Sunday, October 9, 2022

अपने विषय में परिचय

 हमारा -परिचय :

     आचार्य डॉ.शेषनारायण वाजपेयी  

     ज्योतिषाचार्य,व्याकरणाचार्य,एम.ए.,

    पीएच.डी. ( द्वारा - काशी हिंदू विश्व विद्यालय)        

    अनुसंधान कार्य :ज्योतिष शास्त्र के द्वारा प्रकृति एवं जीवन से संबंधित मौसम महामारी आदि विभिन्न विषयों पर अनुसंधान !

हमारी अनुसंधान पद्धति : प्रकृति एवं जीवन में घटित होने वाली प्रायः सभी घटनाएँ समय के अनुशार ही घटित होती हैं | 

   प्राकृतिक घटनाओं को देखा जाए तो सर्व प्रथम समय बदलता है उसके अनुशार संपूर्ण प्रकृति में परिवर्तन होते हैं | मौसम महामारी एवं  परिवर्तन जैसी घटनाएँ समय से  प्रभावित होकर ही घटित होती हैं | इनके विषय में अनुसंधान करने या अनुमान पूर्वानुमान  लगाने के लिए गणित विज्ञान ही सर्वोत्तम है |जिस गणितविज्ञान के आधार पर सूर्य और चंद्र ग्रहण जैसी घटनाओं के विषय में सही सही  पूर्वानुमान लगाए जाते रहे हैं उसके आधार पर मौसम मानसून आँधी तूफान महामारी आदि घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान लगा लिया जाता है |

    जीवन में घटित होने वाली घटनाओं को देखा जाए तो प्रत्येक व्यक्ति का समय अपना अपना होता है उसमें भी परिवर्तन होते हैं | समय के अनुशार सोच बनती है सुख दुःख मिलता है उन्नति अवनति होती है | पद प्रतिष्ठा  मिलती और समाप्त होती है | गणित विज्ञान के आधार पर ऐसी सभी घटनाओं के विषय में अनुमान पूर्वानुमान  आदि लगा लिया जाता है |   

ज्योतिष शास्त्र संबंधी अनुसंधानों की आवश्यकता : विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधानों की निरंतर आवश्यकता रहती है ज्योतिष विज्ञान में लंबे समय से ऐसा किया जाना संभव नहीं रहा है | उपेक्षा के कारण पढ़े लिखे लोग इस क्षेत्र में आते नहीं हैं और बिना पढ़े लिखे लोग अनुसंधान करने योग्य नहीं हैं |इससे जनहितकारी इतने बड़े विज्ञान का उपहास होता दिख रहा है | महामारी जैसे संकट के समय में यह विज्ञान बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता था किंतु इसका उपयोग ही  जा सका | 

    मौसम संबंधी घटनाओं के  विषय में भी  ऐसा ही होते देखा जा रहा है ज्योतिष विज्ञान की उपेक्षा के कारण आज तक मौसम संबंधी सही अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाना संभव नहीं हो पाया है | मौसम संबंधी बड़ी  प्राकृतिक आपदाएँ घटित होती हैं उनके विषय में पहले से किसी को  कुछ पता ही नहीं होता है | 

    हमारे द्वारा किए गए प्रयास के विषय में -मैं अपने सीमित साधनों के द्वारा ज्योतिष विज्ञान के आधार पर प्रकृति और जीवन के विषय में पिछले तीस वर्षों से अनुसंधान करता आ रहा हूँ | जिससे विभिन्न घटनाओं के विषय में प्राप्त होने वाले पूर्वानुमान प्रायः सही निकलते हैं उन्हें  मेल के माध्यम से सरकार के संबंधित मंत्रालयों विभागों एवं पीएमओ को भेजता भी हूँ वे प्रायः सही निकलते हैं किंतु उनका जनहित में उपयोग नहीं हो पाता है | दूसरी बात ऐसे अनुसंधानों को यदि पर्याप्त संधाधनों से संचालित किया जाए तो पूर्वानुमानों में और अधिक सच्चाई लाई जा सकती | इसी उद्देश्य से मैं सरकार तक अपनी बात पहुँचाने के लिए प्रयत्न करता आ रहा हूँ | 

मेरे द्वारा किए गए कुछ मुख्य प्रयास :

    मौसम विज्ञान विभाग महानिदेशक श्री के जे रमेश  जी के द्वारा  संभावित प्राकृतिक घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान भेजने को कहा गया ! मैं प्रत्येक महीना प्रारंभ होने से एक दो दिन पहले आगामी एक महीने के पूर्वानुमान भेज देता रहा हूँ | जो प्रायः सही निकलते रहे हैं किंतु ज्योतिष विज्ञान नहीं है ऐसा कहकर उन्होंने इसे प्रोत्साहित नहीं किया जबकि पहले उन्होंने ऐसा करने के लिए हमें आश्वासन भी दिया था | 

    इसके बाद मंत्री डॉ.हर्ष बर्धन जी ने मेरी मदद करने के लिए राजीवन जी से बात की !उनके बुलाने पर मैं उनके पास  गया तो राजीवन जी ने कुछ अधिकारियों के साथ बैठा कर मेरी चर्चा करवाई ! जिसमें उन अधिकारियों ने पूर्वानुमान सच होने की बात तो स्वीकारी किंतु मेरे अनुसंधान को प्रोत्साहित करने से यह कहकर मना कर दिया कि ज्योतिष विज्ञान नहीं है इसलिए इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है |उन्होंने यह भी कहा कि यदि आप समाज को लाभान्वित ही करना चाहते हैं तो आप इसे करते कैसे हैं वह प्रक्रिया हमलोगों को बता दीजिए ! मैंने कहा यह ज्योतिष है पंचांग की गणित है तो वे आठ दस पंचांग उठा लाए और मेरे सामने रखकर कहा कि इनका उपयोग मैं भी करता हूँ और मौसम संबंधी पूर्वानुमान लगाने में इनसे बड़ी मदद मिलती है | आप अपनी शोध प्रक्रिया के विषय में भी हमें  समझा दीजिए |हम स्वयं ही जनहित में इसका उपयोग करते रहेंगे | यह सुनकर मैं वापस चला आया | 

    इसी बीच मैंने मौसम पूर्वानुमान लगाने वाली निजी संस्था स्काइमेट से संपर्क किया !वहाँ भी यही कहा गया कि आप अपने द्वारा किए जाने वाले मौसम संबंधी पूर्वानुमान आगे से आगे हमें भेजते रहें इसके बाद हम आपके विषय में सोचेंगे | मैं लगभग वर्ष भर उन्हें भी पूर्वानुमान भेजता रहा जिनसे वे इससे प्रभावित हुए !उन्होंने कुछ टीवी चैनलों में हमारा संपर्क करवाने के लिए प्रयत्न भी किया ताकि इस वैज्ञानिक विधा से भी लोग परिचित हों | इसके साथ ही साथ उन्होंने हमारे शोध के उपयोगी होने के विषय में मौसम विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा जी को एक पत्र लिखा ताकि मेरे अनुसंधान का जनहित में उपयोग हो सके किंतु वहाँ से कोई उत्तर नहीं आया |

    मौसम से लेकर महामारी तक के सभी अनुमान पूर्वानुमान एवं अनुसंधानों के प्रोत्साहन  हेतु मैं पीएमओ को भी मेल पर पत्र एवं पूर्वानुमान भेजता आ रहा हूँ | इसी क्रम में एक बार मुझे इंडियननालेजसिस्टमविभाग बसंतकुञ्ज  से फोन आया, जिसमें यह कह कर बुलाया गया कि पीएमओ से हमें आपके अनुसंधान के विषय में आपसे बात करने को कहा गया है | मैं वहाँ गया और निदेशक श्री ए.बी.शुक्ल जी के सामने भी मैंने अपने वे पूर्वानुमान रखे जिनसे वे प्रभावित हुए | उन्होंने भी हमसे हमारी शोध प्रक्रिया देने या बताने को कहा कि तुम जिस प्रकार से अनुसंधान करते हो वह संपूर्ण प्रक्रिया हमें लिखित रूप में देनी होगी | ऐसा करने से मैं सहमत नहीं हुआ इसलिए वहाँ से भी मुझे कोई प्रोत्साहन नहीं मिला | 

       ऐसे अनुभव कई अन्य मंत्रालयों विभागों प्रांतीय सरकारों एवं स्थापित लोगों से संपर्क करने पर हुए हैं | पीटीआई के द्वारा हमारी अधिकाँश मेलों को लेकर अनुसंधान पूर्वक एक लेख भी प्रकाशित किया था | वो भी इसके साथ भेज रहा हूँ |

        महामारी संबंधी अनुमानों पूर्वानुमानों के विषय में -

    मैंने ज्योतिष के द्वारा स्वास्थ्य संबंधी अपने अनुसंधानों के विषय में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय में कई पत्र भेजे जिनका कोई उत्तर न मिलने पर मैं वहाँ स्वयं गया! किसी मित्र के माध्यम से उनसे मुलाक़ात करके उनके सामने अपने महामारी संबंधी पूर्वानुमान रखे | जो उन्हें ठीक लगे किंतु इस प्रकार के ज्योतिषीय अनुसंधानों के लिए वहाँ से कोई सहयोग संभव नहीं है ऐसा कहकर उन्होंने भविष्य पर बात टाल दी | 

    इसके बाद किसी शुभ चिंतक सहयोगी ने मुझे सीसीआरएएस के डीजी प्रो. वैद्य केएस धीमान जी से मिलवाया उन्होंने  अपने कुछ सहयोगियों के साथ बैठकर हमसे चर्चा की और पूछा कि आप अपने अनुसंधान के द्वारा चिकित्सा के क्षेत्र में क्या सहयोग कर सकते हो तो मैंने कहा किसी रोग या महारोग(महामारी) के पैदा होने या फैलने के विषय में अनुमान पूर्वानुमान लगाने के लिए आयुर्वेद के चरक संहिता आदि ग्रंथों में जो ज्योतिषीय विधि बताई गई है उसके आधार पर रोगों महारोगों (महामारी) आदि के विषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने में हमारे शोध सहायक हो सकते हैं | महामारी काल में भी कौन संक्रमित होगा और कौन नहीं होगा या कितना होगा !चिकित्सा का प्रभाव किस रोगी पर कैसा पड़ेगा आदि विषयों में हमारे अनुसंधानों से मदद मिल सकती है | उन्होंने हमसे इस विषय के कागज लेकर बाद में सूचित करने के लिए कहा किंतु बाद में कोई प्रोत्साहन नहीं मिला |

    महामारी की चारों लहरों के आने और  जाने के विषय में मैं जो जो अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाकर पीएमओ की मेल पर भेजता रहा हूँ वे गूगल के कोरोना चार्ट से मिलान करने पर प्रायः सही निकलते रहे हैं |

       ज्योतिष शास्त्रीय अनुसंधान पद्धति की वैज्ञानिकता !

   वेद वैज्ञानिक मान्यता है कि समय बीतने के साथ बदलता रहता है समय के बदलाव के साथ प्रकृति और जीवन में भिन्न भिन्न प्रकार की घटनाएँ घटित होती रहती हैं | प्रकृति में ऋतुओं का परिवर्तन समय के कारण होता है | प्राकृतिक आपदाएँ या अच्छी बुरी सभी प्रकार की घटनाएँ समय के कारण घटित होती हैं |

   ऐसे ही जीवन में शारीरिक स्वास्थ्य मानसिक स्वास्थ्य का बनना बिगड़ना,जीवन से संबंधित संबंधों का बनना बिगड़ना,उन्नति अवनति होना ये सब समय के कारण ही संभव है | यहाँ तक कि सुदूर आकाश में घटित होने वाली सूर्य और चंद्र ग्रहण जैसी घटनाएँ परिवर्तनशील समय के साथ साथ घटित होती रहती हैं |

    प्रकृति एवं जीवन में घटित होने वाली सभी प्रकार की घटित होने वाली संभावित घटनाओं के विषय में अनुमान पूर्वानुमान आदि लगाने के लिए समय के संचार को समझा जाना आवश्यक है | समय को समझने के लिए गणित विज्ञान को ही सर्वोत्तम विकल्प माना जाता रहा है | 

   जिस  गणितविज्ञान को सूर्य और चंद्र ग्रहण जैसी घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए सर्वोत्तम विकल्प माना जाता रहा है |उसीगणित विज्ञान के आधार पर प्रकृति एवं जीवन में घटित होने वाली घटनाओं के विषय में भी सही सही पूर्वानुमान लगाए जा सकते हैं | 

    इसी निश्चय के साथ पिछले तीस वर्षों से मैं प्रकृति में घटित होने वाली एवं लोगों के जीवन में घटित होने वाली दोनों ही प्रकार की घटनाओं के विषय में न केवल अनुसंधान करता आ रहा हूँ अपितु पूर्वानुमान लगता आ रहा हूँ जो प्रायः सही निकल रहे हैं | इस वैज्ञानिक विधा से मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं एवं आपदाओं के विषय में लगाए गए पूर्वानुमान प्रायः सही निकलते रहे हैं | कोरोना जैसी महामारी के विषय में लगाए गए पूर्वानुमान सही निकले हैं यहाँ तक कि महामारी संबंधित संक्रमण से किसे कितने प्रतिशत संक्रमित होने की संभावना है | इस प्रकार के अनुमान भी प्रायः सही निकले हैं |

    ऐसे अनुसंधानों से संपूर्ण समाज को लाभान्वित किया जा सकता है | संसाधनों के अभाव में व्यक्तिगत स्तर पर मेरे द्वारा यह सब किया जाना संभव नहीं है | इसलिए मैंने अनुसंधान से संबंधित अलग अलग विषयों से संबंधित सरकार के संबंधित मंत्रालयों एवं विभागों में संपर्क करने के प्रयत्न किए जहाँ तक पहुँच हो सकी वहाँ तक अपनी बात पहुँचाई |