Monday, December 16, 2019

आधुनिक पूर्वानुमान जो गलत हुए !इसलिए पूर्वानुमान और मजाक

आधुनिक पूर्वानुमान जो गलत हुए !इसलिए पूर्वानुमान और मजाक

     अज्ञात स्थितियों में तर्कपूर्ण आकलन (estimation) करने को पूर्वानुमान करना (Forecasting) कहते हैं। जैसे दो दिन बाद किसी स्थान के मौसम के बारे में अनुमान लगाना, एक वर्ष बाद किसी देश की आर्थिक स्थिति के बारे में कहना आदि पूर्वानुमान हैं। पूर्वानुमान के साथ अनिश्चितता और खतरा (Risk) का घनिष्ट सम्बन्ध है। आधुनिक युग में पूर्वानुमान के अनेकानेक उपयोग हैं; जैसे - ग्राहक की मांग की योजना बनाना।

कुछ पूर्वानुमान जो सत्य नहीं हुए

  • रेलगाड़ी के विकास ने विश्व भर में क्रांति ला दी, किन्तु इसे भी कई प्रकार के विरोध का सामना करना पड़ा। यूनिवर्सिटी कालेज, लन्दन के विद्वान प्रोफेसर डा लार्डर ने घोषणा की थी कि तेज गति से रेल यात्रा सम्भव नहीं है।
  • हवा से भारी उड़ने वाली मशीनों का निर्माण असम्भव है : प्रख्यात वैज्ञानिक एवं वहाँ की रायल सोसायटी के अध्यक्ष लार्ड केल्विन ने १८९५ में यह भविष्यवाणी की थी। किन्तु इंसान उड़ा और वह भी सन १९०३ में ही। एडिसन ने भी इसके कुछ वर्ष पहले यह घोषणा की थी कि उड़ने वाली मशीन का निर्माण सम्भव नहीं है।
  • दुनिया में इससे बड़ा विमान कभी नहीं बनेगा : 1933 में बोइंग 247 की उडा़न देखने के बाद बोइंग के एक इंजीनियर ने ये बात कही थी कि इससे बड़ा विमान कभी नहीं बनेगा। उस विमान में 10 लोगों के बैठने की जगह थी। इसी तरह 1904 में प्रोफेसर ऑफ स्ट्रेटजी मार्सेल फर्डिनांड फोच ने कहा था कि एयरोविमान इंटरेस्टिंग खिलौने हैं, लेकिन युद्ध के लिए उनका कोई इस्तमाल नहीं है।
  • जब एडिसन विद्युत बल्ब बनाने की अपनी परियोजना पर काम कर रहे थे तब ब्रिटिश पार्लियामेंट के विद्वान सांसदों की एक समिति ने मजाक करते हुए कहा था कि यह चीज (विद्युत बल्ब) अटलांटिक के पार के हमारे मित्रों (अमेरिकी लोगों) के लिये ठीक हो सकती है, लेकिन विज्ञान एवं व्यावहारिकता (फीजिबिलिटी) की समझ रखने वालों के ध्यान देने लायक नहीं है।
  • जब ग्राहम बेल ने टेलीफोन का आविष्कार किया तो तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रदरफोर्ड हेज ने इसका प्रदर्शन देखकर कहा था कि 'आविष्कार तो ठीक है किन्तु इस चीज को भला कौन इस्तेमाल करना चाहेगा?'
  • पहला परमाणु विखण्डन करने वाले ब्रिटेन के महान वैज्ञानिक रदरफोर्ड ने कहा था कि इसमें निहित ऊर्जा बहुत ही कम है। इसको 'ऊर्जा स्रोत' के रूप में नहीं देखा जा सकता।
  • टीवी ज्यादा दिनों का खेल नहीं है : अकेडमी सम्मान विनर एक्टर, प्रोड्यूशर, डायरेक्टर डेरिल जानुक ने 1946 में कहा था कि टीवी ज्यादा दिन नहीं चलेगा क्योंकि लोग प्लाइवुड के बॉक्स को घूरते-घूरते ऊब जाएंगे। 1926 में अमेरिकी इनवेंटर ली डिफॉरेस्ट ने कहा था कि थ्योरिटिकली तो टेलिविजन का चल पाना संभव है, लेकिन कारोबारी लिहाज से इसका चल पाना नामुमकिन है। इसके बारे में सोचना बेवकूफी है।
  • घर के लिए कंप्यूटर कौन खरीदेगा? : आज से लगभग 31 साल पहले डिजिटल इक्विपमेंट कॉर्प के फाउंडर केन ओस्लॉन ने कहा था कि घरों में कंप्यूटर की कोई जरूरत नहीं है। ऐसी भविष्यवाणी एक और आदमी ने की थी। उनका नाम था थॉमस वाटसन और आईबीएम के चेयरमैन थे। उन्होंने 1943 में कहा था कि दुनिया में पांच कंप्यूटर के लिए भी मार्केट नहीं है। लगभग 10 साल पहले औरेकल के सीईओ लैरी एलिसन ने पीसी को विचित्र डिवाइस करार दिया था। लेकिन आप जानते ही हैं कि पीसी हमारी जिंदगी का कितना महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
  • 640 KB से ज्यादा मेमोरी की किसे जरूरत है? : ऐसा कहा जाता है कि 1981 में बिल गेट्स ने कहा था कि किसी को भी अपने पर्सनल कंप्यूटर के लिए इससे ज्यादा मेमोरी की जरूरत नहीं होगी। हालांकि 1996 में ब्लूमबर्ग को दिए एक इंटरव्यू में बिल गेट्स ने इसका खंडन किया। उन्होंने कहा- मैंने कुछ बेवकूफी की बातें और कुछ गलत बातें कही थीं। लेकिन 640 KB जैसी बात नहीं कही थी। कंप्यूटर की दुनिया से जुड़ा कोई आदमी ये नहीं कह सकता कि इतनी मेमोरी काफी होगी। सॉफ्टवेयर के शक्तिशाली होने और कंप्यूटर के फास्ट होने के साथ मेमोरी की जरूरत बढ़ती जाएगी। बल्कि हर दो साल पर मेमोरी की जरूरत दोगुनी हो जाएगी।
  • यू-ट्यूब (YouTube) चलेगा नहीं : ये बात यूट्यूब के किसी कंपिटिटर ने नहीं, इसके को-फाउंडर स्टीव चेन ने मार्च 2005 में कही थी। उनका कहना था कि मैं जितने वीडियो देखना चाहता हूं, उतने वीडियो हैं ही नहीं। उस समय यू ट्यूब पर सिर्फ 50 वीडियो थे। दो साल बाद यूट्यूब पर 1.32 लाख वीडियो आ गए। यूट्यूब का जादू ऐसा चला कि गूगल ने 1.65 अरब डॉलर के शेयर देकर यूट्यूब को खरीद लिया। हाल ही में एक नामी एनालिस्ट संदीप अग्रवाल ने अंदाजा लगाया है कि इस वीडियो साइट से इस साल 180 से 200 अरब डॉलर की कमाई होगी।
  • आईपॉड? एक साल से पहले ही खत्म हो जाएगा : ये बात ज्यादा पुरानी भी नहीं है। एम्सस्टार्ड के फाउंडर सर एलेन माइकेल सुगर ने फरवरी 2005 में कहा था कि आईपॉड अगले क्रिसमस तक अपनी मौत मर जाएगा। दरअसल एम्सस्टार्ड और एप्पल कंप्यूटर्स में पर्सनल कंप्यूटर मार्केट पर कब्जा जमाने की जंग छिड़ी हुई थी। आप देख ही रहे हैं कि आईपॉड इस समय दुनिया का सबसे पॉपुलर गैजेट्स है
  • और दुनिया इसकी दीवानी है। अक्टूबर में दनिया में 1.1 करोड़ आईपॉड बिके।
  • स्पैम की समस्या खत्म हो जाएगी (बिल गेट्स, २००४ में)
  • चीन में eBay का बोलबाला होगा

Friday, December 13, 2019

पूर्वानुमान

     पूर्वानुमान लगा लिए जाने से भविष्य में घटित होने वाली अच्छी घटनाओं का लाभ अधिक से अधिक लिया जा सकता है और बुरी घटनाओं के दुष्प्रभाव से बचने का प्रयास किया जा सकता है कुछ सहने की हिम्मत की जा सकती है | 
     किसी भी घटना से संबंधित यदि पूर्वानुमान पता नहीं होंगे तो अच्छी संभावनाओं वाला समय भी यूँ ही बीतता चला जाएगा जानकारी के अभाव में उसका अच्छा लाभ नहीं उठाया जा सकेगा एवं बुरे समय में बचाव के प्रयास नहीं किए जा सकेंगे और उस प्रतिकूलता को सहने के लिए भी मानसिक रूप से तैयार होना संभव नहीं हो पाएगा | इसलिए पूर्वानुमानों की आवश्यकता प्रत्येक परिस्थिति में रहती है |
घटनाओं के कारण को समझे बिना उनके विषय में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है !
     संसार की प्रत्येक वस्तु में या प्रत्येक जीवधारी में प्रतिपल कुछ न कुछ बदलाव होते देखे जा रहे हैं इन बदलाओं में से जो प्रकृति में होते हैं उन्हें प्राकृतिक मान लिया जाता है और जिन घटनाओं में मनुष्यकृत प्रयास सम्मिलित होते हैं उन घटनाओं को मनुष्यकृत मान लिया जाता है किंतु वे वास्तव में मनुष्यकृत हैं या वे भी प्राकृतिक ही हैं या उनमें कितनी प्राकृतिक और कितनी मनुष्यकृत हैं इसका निर्णय अनुसंधान पूर्वक किया जाना अभी तक अवशेष है | प्रयास करना मनुष्य का कर्तव्य है इसलिए मनुष्य प्रयास तो किया करता है किंतु जो घटनाएँ घटित होती हैं वे अपने सहज प्रवाह में घटित होती जा रही हैं या मनुष्यकृत प्रयासों के परिणाम भी उन घटनाओं के घटित होने में कुछ सहायक हुए हैं या नहीं |
       महानगरों में कुछ लोग आपस में लड़ झगड़ जाते हैं या किसी अन्य प्रकार से उनको चोट लग जाती है वे घायल हो जाते हैं तो बड़े बड़े चिकित्सालयों में जाकर स्वस्थ हो जाते हैं | दूसरी ओर जंगलों में रहने वाले बनवासी आदिवासी लोग या जंगलों में खुला घूमने वाले जंगली जानवर आदि भी आपस में लड़ते भिड़ते घायल होते हैं वे बिना किसी चिकित्सा के भी स्वस्थ हो जाते हैं उनके घाव भर जाते हैं|ऐसी परिस्थिति में चिकित्सकीय लाभ एक को मिले दूसरे को नहीं मिले फिर भी स्वस्थ तो दोनों हुए |महानगरीय लोगों को मिले स्वास्थ्यलाभ को यदि मनुष्यकृत प्रयासों का फल मान लिया जाए तो जंगलों में घायल हुए लोगों के स्वास्थ्य लाभ होने का कारण क्या हो सकता है |
      ऐसी परिस्थिति में घायल दोनों होते हैं और स्वस्थ दोनों होते हैं इसलिए उन दोनों के स्वस्थ होने का कारण भी कोई एक ही होगा जबकि चिकित्सा को यदि कारण मान लिया जाए तो वो एक को मिली दूसरे को नहीं मिली इस लिए उन दोनों के स्वास्थ्य लाभ की प्रक्रिया में अंतर होना चाहिए था यदि ऐसा नहीं हुआ | इसका मतलब है कि चकित्सा जनित प्रयास इनके स्वास्थ्यलाभ का कारण नहीं है और यदि चिकित्सा नहीं है तो और दूसरा ऐसा कारण  क्या है जिसका समान योगदान दोनों के स्वस्थ होने में रहा हो वह सहायक कारण यदि मनुष्यकृत है तब तो इन दोनों के स्वस्थ होने को मनुष्य कृत प्रयास का फल माना जा सकता है अन्यथा नहीं | इसलिए स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने वाले मुख्य कारण की खोज होनी चाहिए | 
    इसी प्रकार से ऐसे और भी ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें जिस प्रकार की इच्छा लेकर मनुष्य प्रयासपूर्वक सम्मिलित होता है उसमें कुछ कार्य उस प्रकार के हो जाते हैं जैसे वह प्रयास करता है किंतु प्रयास करने के बाद भी कुछ कार्य वैसे नहीं हो पाते हैं और कुछ तो उनके विपरीत हो जाते हैं | ऐसी परिस्थिति में कार्य होने का श्रेय यदि प्रयास करने वाले को दे दिया जाए तो कार्य न होना भी तो कार्य का ही एक स्वरूप है उसका कर्ता किसे माना जाएगा ?
    गंगा जी की तेज धार में एक हरा भरा पेड़ बहता जा रहा था उसे देखकर एक भूखा हाथी उस पेड़ को बाहर खींच लाने के लिए गंगा जी में उतर गया और पेड़ को पकड़कर खींचने लगा किंतु वह  खींच नहीं पाया अपितु उस पेड़ के साथ ही धारा के वेग में बहता चला गया |
     ऐसी परिस्थिति में वह हाथी यदि पेड़ को खींच कर ले आने में सफल होता तब तो इस कार्य के होने का श्रेय उस हाथी को मिल जाता किंतु हाथी उस पेड़ को चाहकर भी खींच कर बाहर नहीं ला पाया !इसका मतलब वह सफल नहीं अपितु असफल हुआ जो सफलता का विलोम है किंतु इसी प्रकरण में सफलता और असफलता से अलग  तीसरी घटना यह घटित हुई कि वह  हाथी उस पेड़ के साथ गंगा जी की प्रबलधार में बहते चला गया यह जो कार्य हुआ उसका कारण किसे माना जाए ? ऐसे कारण की खोज होनी चाहिए |क्योंकि कार्य करने के प्रयास में तो केवल हाथी लगा हुआ था जबकि गंगा जी तो अपने सहज प्रवाह में बहती चली जा रही थीं इसमें हाथी स्वतः आया और बहते चला गया | हाथी का उद्देश्य बहना नहीं था और न ही उसने बहाने के लिए कोई प्रयास ही किया अपितु न बहने के लिए सारे प्रयास करता रहा | उस पेड़ ने भी हाथी को बहाने का प्रयास नहीं किया वह बेचारा तो खुद ही परबश था और गंगा की धारा ने  भी उसे बहाने का प्रयास नहीं किया अपितु वह उसका अपना स्वतंत्र प्रवाह था जिसका उद्देश्य हाथी को बहाना नहीं था |  इस सबके बाद हाथी के बहने के लिए जिम्मेदार वह वास्तविक कारण क्या था जो तट पर खड़े हुए हाथी को बहाकर ले जाने के लिए गंगा जी के अंदर खींच लाया और उसे गंगा जी में बहा देने में सफल हुआ |
    ऐसे ही कोई व्यक्ति हवा में फायरिंग कर रहा होता है वह गोली किसी को लग जाती है और वह मर जाता है जबकि बंदूक चलाने वाले का उद्देश्य यह नहीं था और न ही उसने इसके लिए प्रयास ही किया था किंतु वह मर गया उस व्यक्ति के मरने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारण क्या था ?
     कुल मिलाककर ऐसी बहुत सारी घटनाएँ इस संसार में घटित होते देखी जा सकती हैं जिनके लिए प्रयास भी नहीं किया गया होता है फिर भी वे घटनाएँ घटित होते देखी जाती हैं कुछ घटनाओं में तो प्रयासों के विरुद्ध घटनाएँ घटित होते देखी जाती हैं | ऐसी  परिस्थिति में प्रयासकर्ता अपने को असफल मान लेता है |इसके बाद भी जो कार्य सफल हुआ है | ऐसी परिस्थिति में प्रयास करने वालों में से कुछ लोग अपने को सफल और कुछ लोग अपने को असफल मान लेते हैं जिनके प्रयास के अनुकूल कार्य हुआ उन्हें लगता है कि उनका प्रयास सफल हुआ है किंतु यदि उस कार्य को करने या होने के लिए उन लोगों को कर्ता मान लिया  जाए तब तो प्रयास तो उन दोनों प्रकार की मानसिकता वालों ने ही किया है फिर परिणाम किसी एक के ही पक्ष में क्यों चले गए दूसरे के द्वारा किए गए प्रयास क्या निरर्थक हो गए और यदि हाँ तो ऐसा होने का कारण क्या था ?
       ऐसी परिस्थिति में ऐसा माना जा सकता है कि कोई भी कार्य तो उस अज्ञात कर्ता के द्वारा लिखी गई पट कथा के अनुशार ही हो रहा होता है जिसके करने से कार्य होता है न करने से नहीं होता है इसलिए वास्तविक कर्ता वही है |संसार के प्रत्येक विषय में उसी की इच्छा का सम्मान होता है उसके द्वारा किये जाने वाले प्रयास ही सफल होते देखे जाते हैं | वो दिखाई पड़े या न पड़े किंतु वह जो करता है वही होता है |
     इसीलिए जहाँ मनुष्य रूप में कोई प्रतीकात्मक कर्ता दिखाई नहीं पड़ा रहा होता है ऐसे कार्य भी होते देखे जाते हैं वर्षा होती है बाढ़ आती है आँधी तूफ़ान घटित होता है ऐसी बहुत सारी प्राकृतिक घटनाएँ घटित होती हैं ये भी तो एक प्रकार का कार्य ही है इसलिए इसका भी कोई न कोई कर्ता अवश्य होगा  और वह चेतन होगा जिसके सभी प्रयत्न मानवता के अधिकाँश भाग के लिए सहयोगी सिद्ध होते हैं | इसीलिये प्राकृतिक घटनाएँ जिसकिसी भी रूप में घटित होती हैं उनका स्वरूप अत्यधिक हिंसक भी हो सकता था किंतु ऐसा कभी नहीं होते देखा जाता है | इसलिए शरीर और संसार के प्रत्येक अंश को सही सही समझने के लिए उस कर्ता और उसकी कार्यप्रणाली को खोजना ही होगा यही तो विज्ञान है |इसे खोजने की दो ही प्रक्रियाएँ हैं एक तो उससे मिलकर उसकी कार्यपद्धति की जानकारी ली जाए और दूसरा उसकी कार्यशैली के अनुशार नियमबद्ध ढंग से उसकी प्रक्रिया को समझा जाए क्योंकि शरीर और संसार से संबंधित प्रत्येक घटना या कार्य को करने की पटकथा वही कर्ता ही तैयार करता है उसी के अनुशार वह घटना घटित होते देखी जाती है |
   इसलिए ऐसी सभी प्रकार की घटनाओं के घटित होने के वास्तविक कारणों को खोजे बिना उस विषय को समझपाना संभव नहीं है | ऐसी परिस्थिति में  किसी विषय के वास्तविक कारण को खोजे बिना केवल कल्पना के आधार पर जिस किसी भी वस्तु या परिस्थिति को कारण मान लेना अनुसंधान की दृष्टि से उचित नहीं होगा |
         मनुष्य केवल  प्रयास कर सकता है परिणाम देना उसका काम नहीं !
   चिकित्सक किसी रोगी की चिकित्सा कर सकता है किंतु वह स्वस्थ होगा या नहीं होगा रोगी रहेगा या मर जाएगा इस विषय में उसका कोई बश नहीं चलता है |जीवन के सभी क्षेत्रों में ऐसा ही होते देखा जाता है |  मनुष्य केवल प्रयास किया करता है किंतु उसके प्रयास का संबंध उसकार्य के होने या न होने से नहीं होता है प्रयास केवल प्रयास करने तक ही सीमित रहता है यह प्रकृति का एक प्रकार है इससे बिल्कुल अलग प्रकृति का अपना एक दूसरा स्वतंत्र स्वरूप है जो कार्य के होने  या न होने के रूप में दिखाई पड़ता है |
    जो लोगों के जीवन में घटित होते हैं उन्हें मनुष्यकृत मान लिया जाता है क्योंकि किसी मनुष्य के जीवन में जो कुछ भी घटित होते देखा जा रहा है वह भी अपने आप ही घटित हो रहा है किंतु
    कोई मनुष्य जिस काम को करना चाहता है वो काम करने के लिए प्रयास भी करता है उसकी सीमा यहीं तक होती है | दूसरी ओर वह काम होगा या नहीं होगा यह जिम्मेदारी प्रकृति की दूसरी शक्ति सँभाल रही होती है इसका निर्णय वह शक्ति करेगी | प्रयास करने वाला और परिणाम देने वाला ये किसी नदी के दो तटों पर खड़े किए जाने वाले खंभों (पिलर्स) के समान हैं और परिणाम उस पर बने पुल के समान है |किसी प्रयास का परिणाम हमेंशा प्राणवान अर्थात सजीव होता है सजीव होते ही वह एक आयु की सीमा में बँध जाता है अर्थात परिणाम स्वरूप में प्राप्त हुआ वह आकार प्रकार आदि परिवर्तित होते होते एक न एक दिन विनाश को प्राप्त हो जाता है |
     प्रयास करने वाला उस नदी का एक तट मात्र होता है परिणाम प्राप्त करने की क्षमता उस प्रयास करने वाले के हाथ में नहीं होती है |यही कारण है कि आम के पेड़ों में जितने फूल लगते हैं उन सभी में फल नहीं लगते !बहुत फूल निरर्थक ही झड़ जाते हैं | इसीप्रकार से गर्भ हेतु किए जाने वाले प्रत्येक प्रयास से संतान लाभ होगा ही यह आवश्यक नहीं होता है |चिकित्सक जितने रोगियों की चिकित्सा करते हैं उनमें से सब के सब रोगी स्वस्थ ही नहीं हो जाते हैं | वैज्ञानिक जितने भी अनुसंधान करते हैं वे सब के सब सफल ही नहीं हो जाते हैं | इसी प्रकार से   मनुष्य जीवन से जुड़ी और बहुत सारे प्रयास होते हैं जो प्रयास करने वाले की इच्छा के अनुसार सफल नहीं होते हैं |  
    कुछ घटनाओं का संबंध कुछ दूसरी घटनाओं से होता है यह सच होते हुए भी एक साथ या एक स्थान पर घटित होने वाली दो घटनाओं को घटित होते देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि इनका  आपस में कोई संबंध होगा ही !संभव यह भी है कि वे दोनों एक साथ या एक स्थान पर घटित होने वाली घटनाएँ केवल संयोगवश ही एक दूसरे के साथ घटित हो रही हों !किसी एक स्थान पर किसी प्रयोजन से से खड़े एक स्त्री एक पुरुष को देखकर ये निश्चय नहीं किया जा सकता है कि इनका आपस में भाई बहन पति पत्नी आदि कोई संबंध होगा ही !कई बार बस स्टैंड जैसी सामूहिक जगहों पर अक्सर ऐसा होते देखा जाता है जबकि उन दोनों को एक दूसरे के विषय में कुछ पता भी नहीं होता है दोनों अपनी अपनी बस का इन्तजार कर रहे होते हैं | ऐसे ही प्रकृति या जीवन में कुछ घटनाएँ एक दूसरे के आगे पीछे या साथ साथ घटित होते देखकर वे एक दूसरे से संबंधित लगने लगती हैं किंतु ऐसा होता नहीं है |
    यह जानते हुए भी लोग कुछ घटनाओं का संबंध कुछ घटनाओं से जोड़ दिया करते हैं मनुष्यों का स्वभाव ही संबंधों को जोड़ने वाला है इसलिए वे प्राकृतिक विषयों में भी एक दूसरे के साथ संबंधों को जोड़ना नहीं भूलते हैं | ऐसा ही कुछ दृश्य हैं | प्रातः काल होने पर संयोगवश एक ओर से सूर्य निकल रहा होता है और दूसरी ओर कमल खिल रहा होता है इसीलिए समझा जाने लगा कि सूर्य उगने से कमल खिलते हैं जबकि दोनों अलग अलग प्रकार की प्रकृति के भिन्न भिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए घटित होने वाली घटनाएँ हैं |
      इसीप्रकार से बसंत ऋतु का समय आता है पेड़ों में पतझड़ होकर नए पत्ते निकलने लगते हैं कोयलें कूकने लगती हैं ऐसी घटनाओं का आपस में एक दूसरे से कैसे कोई संबंध जोड़ा जा सकता है |
      समय बीतने के क्रम में क्रमिक रूप से चंद्रमा एक एक कला प्रतिदिन घटता या बढ़ता रहता है इसी क्रम में चंद्रमा का बिंब किसी दिन बिल्कुल नहीं दिखाई पड़ता है और किसी दिन पूर्ण दिखाई पड़ रहा होता है चंद्रमा कब कितना दिखाई पड़ता है ये बात और है किंतु इस कम अधिक दिखाई पड़ने से चंद्रमा के गुण, स्वभाव प्रभाव आदि हमेंशा एक समान ही रहते हैं उसमें आकर्षण विकर्षण क्षमता भी एक समान ही रहती है उसमें यहाँ से कम या अधिक दिखाई पड़ने का कोई असर नहीं होता है |इसके बाद भी आकाश में जब चंद्रमा के पूर्ण या शून्य दिखाई देने की घटना घटती है वह अमावस्या पूर्णिमा आदि का समय होता है उसीसमय समुद्र में जब ज्वार भाँटा की घटना घटती है दोनों का समय एक होने से उन दोनों का संबंध आपस में जोड़ते हुए यह मान लिया जाता है कि ज्वार भाँटा जैसी घटनाएँ घटित होने का कारण चंद्रमा का कम और अधिक दिखाई देना ही है |
     इसी प्रकार से सूर्य और चंद्र ग्रहण अक्सर तभी घटित होते थे जब अमावस्या या पूर्णिमा आदि तिथियाँ होती थीं इससे यह मान लिया गया कि सूर्य और चंद्र ग्रहण अमावस्या और पूर्णिमा आदि तिथियों में ही घटित होते हैं यह धारणा बहुत लंबे समय तक चलती रही इसके बाद एक बार त्रयोदशी तिथि को ग्रहण पड़ा तब इस बात का भ्रम समाप्त हुआ कि सूर्य और चंद्र ग्रहण का संबंध अमावस्या या पूर्णिमा आदि तिथियों से है |
        इसी प्रकार से वर्तमान समय में दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित ईक्वाडोर और पेरु देशों के तटीय समुद्री जल में किसी किसी वर्ष कुछ समय के लिए कुछ गर्म जलधारा बहने लगती है इसका कोई निश्चित वर्ष नहीं है कि किस वर्ष ऐसा होगा और किस वर्ष नहीं होगा |
 एलनिनो - इसे एल नीनो प्रभाव कहा जाता है जो कि विश्वव्यापी मौसम पद्धतियों के विनाशकारी व्यवधानों के लिए जिम्मेदार है।[2] एक बार शुरू होने पर यह प्रक्रिया कई सप्ताह या महीनों चलती है। एल-नीनो अक्सर दस साल में दो बार आती है| वर्षा के प्रमुख क्षेत्र बदल जाते हैं। परिणामस्वरूप विश्व के ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में कम वर्षा और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्यादा वर्षा होने लगती है। कभी-कभी इसके विपरीत भी होता है । यह घटना दक्षिण अमेरिका में तो भारी वर्षा करवाती है लेकिन ऑस्ट्रेलिया और इन्डोनेशिया में सूखे की स्थिति को उत्पन्न कर देती है

एलनिनो गर्म जलधारा है जिसके आगमन पर सागरीय जल का तापमान सामान्य से ३-४° बढ़ जाता है। पेरू के तट के पास जल ठंडा होता है एवं पोषक-तत्वों से समृद्ध होता है जो कि प्राथमिक उत्पादकों, विविध समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों एवं प्रमुख मछलियों को जीवन प्रदान करता है। एल नीनो के दौरान, व्यापारिक पवनें मध्य एवं पश्चिमी प्रशांत महासागर में शांत होती है। इससे गर्म जल को सतह पर जमा होने में मदद मिलती है जिसके कारण ठंडे जल के जमाव के कारण पैदा हुए पोषक तत्वों को नीचे खिसकना पड़ता है और प्लवक जीवों एवं अन्य जलीय जीवों जैसे मछलियों का नाश होता है तथा अनेक समुद्री पक्षियों को भोजन की कमी होती है। और कभी-कभी तीन बार भी। एल-नीनो हवाओं के दिशा बदलने, कमजोर पड़ने तथा समुद्र के सतही जल के ताप में बढोत्तरी की विशेष भूमिका निभाती है। एल-नीनो का एक प्रभाव यह होता है कि  यह पेरु की ठंडी जलधारा को विस्थापित करके गरम जलधारा को विकसित करती है ।[3]



 


लोगों को लगने लगता है कि

उसका



 किसी मनुष्य के अपने जीवन में उस मनुष्य का अपना अधिकार कितना होता है अर्थात जीवन में दो प्रकार की घटनाएँ घटित होती हैं एक वे जिनके लिए वो प्रयास करता है दूसरी वे जिनके लिए वो प्रयास नहीं करता है वैसा हो जाने से उसे उसके प्रयास से घटित होती हैं तो दूसरी वे जिनके लिए वो न तो इच्छा करता है और न ही कोई प्रयास करता है !

जो व्यक्ति व्यापार करता है उसमें उसे लाभ और हानि दोनों होने की संभावना रहती है इसके बाद भी वो प्रयास तो लाभ के लिए ही करता है किंतु अनुमान दोनों प्रकार के लगाकर चलता है |उसे लगता है कि इस काम से लाभ और हानि दोनों हो सकते हैं इसलिए वह दोनों प्रकार का पूर्वानुमान लगाकर चलता है और दोनों प्रकार की परिस्थितियाँ सहने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहता है | 
     विशेष बात यह है कि कोई मनुष्य जिसप्रकार के लाभ के लिए जैसी सोच बनाकर जो कार्य करता है यदि काम वैसा ही अर्थात उसकी इच्छा के अनुकूल ही हो जाता है तब तो काम करने का श्रेय उस मनुष्य को यह सोचकर मिलना चाहिए कि वह मनुष्य काम करने में सक्षम है इसलिए वह व्यक्ति ही जो करेगा वही होगा अन्यथा नहीं होगा तो कर्ता उस व्यक्ति को माना जा सकता है |
       ऐसे कार्यों का पूर्वानुमान लगाने के लिए उस व्यक्ति से बात व्यवहार करके उसके स्वभाव को समझकर उसके प्रयासों को देखकर उसकी आवश्यकताओं का अनुभव करके उसकी शक्ति संपन्नता आदि सभी प्रकार की क्षमताओं को ध्यान में रख कर ही उसके द्वारा किए जाने वाले कार्यों के विषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है | 
      प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत कार्य ऐसे घटित होते हैं जो वो करना नहीं चाहता जिनके विषय में उसने प्रयास करना तो दूर सोचा भी नहीं होता है !कई कार्य तो ऐसे हो जाते हैं जिन्हें वह प्रयास पूर्वक अपने जीवन की संपूर्ण क्षमता लगाकर भी नहीं कर सकता है फिर भी वे उसके जीवन में घटित हो रहे होते हैं वो कार्य आखिर कौन कर रहा होता है किसकी इच्छा से हो रहे होते हैं उनमें किसकी ताकत लग रही होती है |
       कोई व्यक्ति दुखी होता है, पराजित होता है रोगी होता है मर जाता है ऐसी घटनाएँ जिस व्यक्ति के जीवन में घटित हो रही होती हैं उसने ऐसी इच्छा नहीं की इसके लिए प्रयास भी नहीं किया और वह ऐसा सहना भी नहीं चाहता था फिर भी उसके जीवन में ऐसी जो घटनाएँ घटित हो रही हैं उसका कर्ता कौन है जिसका इतना अधिक हस्तक्षेप किसी व्यक्ति के जीवन में होता है और वो उस कर्ता के विषय में जानता भी नहीं है और यह सच है कि उसे जब तक उसके जीवन में हस्तक्षेप करने वाले कर्ता के विषय में पूर्ण जानकारी नहीं होगी तब तक कोई व्यक्ति इस बात का पूर्वानुमान नहीं लगा सकता है कि उसके जीवन में अगले क्षण क्या घटित होने वाला है | 
        किसी के जीवन में हस्तक्षेप करने वाले कर्ता की खोज किए बिना चिकित्सक लोग जिस रोगी को स्वस्थ करने के लिए चिकित्सा कर रहे होते हैं उस रोगी की अगले क्षण मृत्यु होते देखी जाती है क्योंकि चिकत्सक लोग उस रोगी का शरीर तो देख रहे थे किंतु उसके जीवन के कर्ता की इच्छा का ज्ञान उन्हें नहीं था इसीलिए अगले क्षण क्या होने वाला है इसकी भनक तक उन्हें नहीं लग पायी | 
       इसी कर्तापुरुष को प्राचीन काल में सर्व सक्षम मानकर अधिष्ठातृ देवता कहा जाता था | उसी अधिष्ठातृ देवता की गतिविधियों को समझने का प्रयास करके पूर्वानुमान लगाया जाता था उसकी पूजा करके अनिष्ट को टालने का प्रयास किया जाता था | 
      समुद्र का वृक्षों का अधिष्ठातृ देवता होता है 


  मौसम के क्षेत्र में जलवायुपरिवर्तन जैसे काल्पनिक कारणों की भरमार !
        
      पृथ्वी पर जब से सृष्टि विस्तार हुआ तब से अभी तक वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान आदि से संबंधित प्राकृतिक घटनाएँ हमेंशा एक जैसी कभी भी किसी कालखंड में घटित हुई ही नहीं हैं हमेंशा भिन्न भिन्न प्रकार से अलग अलग क्षेत्रों में घटित होती रही हैं उनका वितरण एक समान कभी भी अर्थात किसी भी कालखंड में नहीं रहा है |
    कभी कहीं वर्षा तो कभी किसी दूसरे स्थान पर वर्षा कहीं कम वर्षा तो कहीं अधिक वर्षा कहीं सूखा तो कहीं भीषण बाढ़ की घटनाएँ हमेंशा से घटित होते देखी जाती रही हैं |किसी वर्ष किसी स्थान में वर्षा अधिक होती है तो कभी किसी स्थान में सर्दी या गर्मी अधिक होते देखी जाती है तो कभी किसी कालखंड में इनका प्रभाव घटते देखा जाता है | किसी वर्ष कहीं आँधी तूफ़ान आदि की घटनाएँ अधिक घटित होती हैं तो किसी वर्ष कम | किसी वर्ष मानसून किसी एक तारीख को आता या जाता है तो दूसरे वर्ष किन्हीं दूसरी तारीखों में मानसून के आने जाने की घटनाएँ घटित होते देखी जाती हैं |तापमान कभी बढ़ता है तो कभी घटता है |
     इसी प्रकार से कभी किसी कालखंड में ग्लेशियरों पर बर्फ जमने की प्राकृतिक परिस्थितियाँ बनने लगती हैं जिस कारण से ग्लेशियर जमने लगते हैं तो कभी किसी दूसरे कालखंड में ग्लेशियरों के पिघलने के अनुकूल प्राकृतिक परिस्थितियाँ बनती हैं तो ग्लेशियर पिघलने लग  जाते हैं | यदि ये पिघलेंगे नहीं तो बर्फ के बड़े बड़े पहाड़ होकर जगह घेरते चले जाएँगे दूसरी ओर नदियाँ सूखती चली जाएँगी |उससे जीवन के लिए आवश्यक जल की आपूर्ति नहीं हो पाएगी भूखे प्यासे जीव जंतु कैसे रह पाएँगे कृषि संबंधी कार्यों का होना कठिन होता जाएगा |       इसलिए ग्लेशियरों के जमने और पिघलने की क्रिया भी तो सृष्टि का एक उसी प्रकार का क्रम है जैसे कभी सर्दी कभी गर्मी कभी सूखा और कभी वर्षा कभी दिन और कभी रात कभी सुख और कभी दुःख कभी स्वस्थ तो कभी अस्वस्थ कभी संयोग तो कभी वियोग कभी संपन्नता तो कभी विपन्नता  आदि देखी जाती है | ये सब सृष्टि के सभी क्षेत्रों में अनंतकाल से चलता हुआ चला आ रहा एक सुनिश्चित क्रम है | इसीलिए ग्लेशियरों पर  बर्फ का जमना जितना आवश्यक होता है उतना ही आवश्यक होता है इन पर जमी हुई बर्फ का पिघलना |कुलमिलाकर संचय और क्षय ये प्रकृति का स्वभाव है जिसका पालन सृष्टि की प्रायः प्रत्येक अवस्था में होते देखा जाता है |   
      पेड़ पौधों पर फूल और फल समय से पहले लगने घटनाएँ अक्सर हजारों वर्ष पहले से घटित होती रही हैं पशु पक्षी स्थान बदल बदल कर रहते हमेंशा से देखे जा रहे हैं इसमें कुछ नया नहीं है किंतु जिन्होंने ऐसी घटनाओं को पहली बार देखा सुना है वे ऐसा होने के लिए भी जलवायु परिवर्तन को ही काल्पनिक कारण बताते देखे जाते हैं | उनके द्वारा कल्पनाएँ की जा रही हैं कि जानवर अपने अपने क्षेत्रों से पलायन कर दूसरी जगह जा सकते हैं और जलवायु परिवर्तन का असर मनुष्यों के साथ साथ वनस्पतियों तथा जीव जंतुओं पर भी देखने को मिल सकता है | वे कहते हैं कि जंगलों की कटाई ने इस समस्या को और अधिक बढ़ाया है जबकि आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए लकड़ी पहली भी जंगलों से ही ली जाती थी |
      प्रकृति और जीवन में कोई घटना एक जैसी एक ही स्थान पर प्रत्येक वर्ष में घटित हो ही नहीं सकती कुछ न कुछ अंतर अवश्य बना ही रहेगा ऐसा अंतर होने का कारण क्या है यह जानने के लिए लोग अपने अपने हिसाब से कल्पनाएँ करते रहे हैं |
    प्रकृति की इस अनिश्चितता या विषमता को समझने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों की आवश्यकता है किंतु विज्ञान के नाम पर ऐसा घटित होने के पीछे का काल्पनिककारण जलवायुपरिवर्तन को मान लिया जाता है समाज के ऐसे वर्ग का कहना है कि जलवायु परिवर्तन औसत मौसमी दशाओं के पैटर्न में ऐतिहासिक रूप से बदलाव आने को कहते हैं ऐसे बदलावों का अनुभव पृथ्वी के इतिहास को दीर्घ अवधियों में बाँट कर किया जाता है। जलवायु की दशाओं में यह बदलाव प्राकृतिक और मानव के क्रियाकलापों का परिणाम दोनों हो सकता है इस विषय में ऐसी उन्हें आशंका है किंतु ऐसा हुआ कब से कबतक है के बीच में है ।
     जलवायुपरिवर्तन होने के लक्षणों के विषय में कल्पना की गई है कि पिछली कुछ सदियों से हमारी जलवायु में धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है. यानी, दुनिया के विभिन्न देशों में सैकड़ों सालों से जो औसत तापमान बना हुआ था, वह अब बदल रहा है| पृथ्वी का औसत तापमान पूर्व में ये बहुत अधिक या कम रहा होगा | ऐसी कल्पना की जा रही है |
     कुछ लोगों के द्वारा की गई कल्पनाएँ विज्ञान के नाम पर परोसी जा रही हैं जिनका कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में जलवायु में अचानक तेज़ी से बदलाव हो रहा है | इसीलिए अब मौसम का ढंग बदलता जा रहा है उन्हें लगने लगा है कि अब गर्मियाँ लंबी होती जा रही हैं  और सर्दियाँ छोटी होती जा रही हैं ऐसा पूरी दुनिया में हो रहा है ऐसी उन्हें आशंका है | ऐसे लोगों अपने इस भ्रम को 'जलवायुपरिवर्तन' नाम दिया है |उनके इस जलवायुपरिवर्तन  का असर किस रूप में कितना होगा इस बारे में निश्चित तौर पर उनसे कुछ कहते नहीं बन रहा है फिर भी उन्हें आशंका है कि इससे पीने के पानी की कमी हो सकती है, खाद्यान्न उत्पादन में कमी आ सकती है, बाढ़, तूफ़ान, सूखा और गर्म हवाएँ चलने की घटनाएँ बढ़ सकती हैं | उन्हें लगता है कि इससे एक ख़ास तरह के मौसम में रहने वाले पेड़ और जीव-जंतुओं के विलुप्त होने का ख़तरा बढ़ जाएगा |
   

Wednesday, December 4, 2019

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                                            मौसमविज्ञान का सारांश 
       मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने की दो प्रमुख विधाएँ हैं एक वेदविज्ञान के आधार पर मौसम पूर्वानुमान लगाया जाता है तो दूसरा बाइबल के आधार पर पूर्वानुमान लगाया जाता है |वेदविज्ञान मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने की दृष्टि से अत्यंत प्राचीन प्रक्रिया है !
      वेदविज्ञान के आधार पर महीनों वर्षों पहले के प्राकृतिक लक्षणों को देखकर उसके अनुसार या फिर गणित के आधार पर पूर्वानुमान लगा लिया जाता है यह गणित के आधार पर लगाया जाने वाला मौसम संबंधी पूर्वानुमान ग्रहण की तरह ही सैकड़ों वर्ष पहले भी लगाया जा सकता है जो सही एवं सटीक निकलता है |
      बाइबल में मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने का जो वर्णन  मिलता है इसके अनुशार बाइबल के ज़माने में आँखों को जो नज़र आता था, उसी से मौसम का अनुमान लगाया जाता था। (मत्ती 16:2,3)
      आधुनिक मौसम पूर्वानुमान लगाने की प्रक्रिया बाइबल की इसी दृष्टि का अनुगमन करती है जो दिखेगा वो माना जाएगा | किसी ट्रेन की गति देखकर ये अंदाजा लगा लेना कि ये किस समय कहाँ पहुँचेगी |ऐसे ही नहर में छोड़े गए पानी या नदी में आने वाली बाढ़ के पानी को देखकर यह अंदाजा लगा लेना कि यह पानी किस दिन कहाँ पहुँचेगा उसी तरह की आधुनिक विज्ञान के द्वारा मौसम पूर्वानुमान लगाने की प्रक्रिया है |
   बाइबिल के मत से बादल आँधी तूफ़ान आदि की घटनाएँ एक जगह घटित होते देखकर उनकी गति और दिशा का अंदाजा लगा लेने मात्र को भविष्यवाणी मान लिया जाता है| बादल आँधी तूफ़ान आदि की घटनाएँ देखने के लिए यंत्रों की आवश्यकता पड़ी तो दो ढाई सौ वर्ष पूर्व ऐसे यंत्रों का निर्माण किया गया |यंत्रों से प्राप्त जानकारी सुरक्षित रखने के लिए बीसवीं शती के उत्तरार्ध में कम्प्यूटर का इस्तेमाल प्रारंभ हुआ | कुछ ज़रूरी यंत्रों से वायु दाब, तापमान, नमी और हवा को मापा जाता है।
      इस समय मौसम कैसा है यह जानना काफी आसान है। लेकिन, इसकी तुलना में अगले घंटे, दिन या सप्ताह का मौसम कैसा होगा इसका अनुमान लगाना इतना आसान नहीं है।
    द वर्ल्ड बुक इंसाइक्लोपीडिया कहती है, “जो फार्मूले कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं वे वायुमंडल की स्थिति के बारे में सिर्फ अंदाज़े हैं।”इसे वास्तविकता समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए | 
      संभवतः इसीलिए इस बाइबल पद्धति से की जाने वाली मौसम संबंधी अधिकाँश भविष्यवाणियाँ गलत होते देखी जाती हैं | इसीलिए प्राकृतिक आपदाओं का  पूर्वानुमान लगा पाना अभी तक असंभव बना हुआ है | वैज्ञानिक न इनके कारण बता पाते हैं और न ही पूर्वानुमान !एक आध तीर तुक्कों को छोड़ दिया जाए तो इस प्रक्रिया में मौसम पूर्वानुमान के लिए कुछ भी नहीं है या यूँ कह लिया जाए कि आधुनिक मौसम विज्ञान पद्धति में विज्ञान का एक छोटा से छोटा अंश भी नहीं है |
      अब बाद वेद विज्ञान की इसके आधार पर जो मौसम संबंधी पूर्वानुमान लगाया जाता है इस प्रक्रिया में जो दिखाई पड़ता है उसके विषय में तो पूर्वानुमान लगाया ही जाता है जो नहीं दिखाई पड़ता है उसका भी पूर्वानुमान लगा लिया जाता है वो विशुद्ध वैज्ञानिक प्रक्रिया है वो आज भी सही एवं सटीक घटित हो रहा है | ग्रहण संबंधी सौ वर्ष पूर्व का पूर्वानुमान लगाते समय उस समय की संभावित सूर्य चंद्र पृथ्वी आदि की परिस्थिति देख पाना बिल्कुल संभव नहीं होता है इसके बाद भी इसके बाद भी ग्रहण संबंधी पूर्वानुमान सही एवं सटीक निकलते हैं |
    भारत सरकार का मौसमविज्ञान विभाग वेद विज्ञान को विज्ञान मानता ही नहीं है  जबकि उसकी अपनी अधिकाँश भविष्यवाणियाँ  गलत निकल जाती हैं |
     आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से मौसम पूर्वानुमान लगाने की प्रक्रिया में चूँकि भविष्य झाँकने की कोई विधि  ही नहीं है और किसी भी घटना का पूर्वानुमान जानने के लिए भविष्य विज्ञान एक मात्र विकल्प है !इसके बिना आधुनिक विज्ञान के द्वारा भविष्य के विषय में किसी भी घटना का पूर्वानुमान लगा पाना संभव ही नहीं  है |
  मौसमसंबंधी समाचारों को ही मौसमसंबंधी भविष्यवाणी कहा जाता है !
     आधुनिक विज्ञान प्रक्रिया में तो केवल मौसमसंबंधी समाचार बाचन किया जाता है | जिसमें अन्य समाचारों की तरह ही आशंकाएँ संभावनाएँ व्यक्त करनी होती हैं जिनके गलत होने के बाद भी उनकी किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती है |
     राजनैतिक या सामाजिक समाचारों की प्रक्रिया भी तो यही है कि वहाँ ऐसा ऐसा हुआ है और यदि वहाँ ऐसा हो रहा है तो यहाँ भी ऐसा होने की संभावना या आशंका है | यहाँ सांप्रदायिक दंगा भड़का है तो ये पूरे देश में फैल सकता है | इस वर्ष महँगाई बढ़ सकती है | मद्यावधि चुनाव हो सकते हैं !इस पार्टी की सरकार बन सकती है | उस पार्टी में फूट पड़ने की आशंका है एक नया गठबंधन तैयार होने की आशंका है | आगामी सत्र में सरकार इस प्रकार का बिल ला सकती है !इस व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है |
     ऐसी आशंकाओं संभावनाओं को यदि राजनीति और समाज में भविष्यवाणी नहीं माना जाता है तो मौसम के क्षेत्र में ऐसे समाचारों को भविष्यवाणी कैसे माना जा सकता है जिनका कोई आधार या अनुसंधान प्रक्रिया ही न हो किसी की जवाबदेही न हो केवल आशंकाओं संभावनाओं की भरमार हो |
      इस वर्ष सर्दी  ने इतने वर्ष का रिकार्ड तोड़ा गर्मी ने उतने वर्ष का और वर्षा ने इतने दशकों का तोड़ा !यहाँ इतने सेंटीमीटर बारिश हुई वहाँ इस नाम का तूफ़ान आया | तीन दिनों तक वर्षा हो सकती है उसके बाद कह दिया जाता है दो दिनों तक और वर्षा हो सकती है इसके बाद फिर कह दिया जाता है तीन दिन और वर्षा हो सकती है जैसी जय वर्षा आँधी तूफ़ान आदि होने की घटनाएँ घटित होते जाते हैं वैसी वैसी आशंकाएँ संभावनाएँ आदि व्यक्त करते जाते हैं ऐसी मौसमी भविष्यवाणियों और राजनैतिक समाचारों में क्या अंतर है |
     वर्षा अधिक हो सकती है या गर्मी अधिक पड़ने की संभावना है या सर्दी कम या अधिक पड़ने की आशंका या संभावना है ऐसी भविष्यवाणियाँ करने वालों की न तो कोई जवाबदेही होती है और न ही इनके गलत हो जाने के बाद उनसे जवाब भी नहीं माँगा जा सकता कि ये गलत क्यों हो गईं !यदि जवाब माँगा भी जाए तो जवाब दिया भी क्या जाएगा जब ऐसी भविष्यवाणियों का कोई आधार ही नहीं है |यदि आधार हो तब भविष्यवाणियों के गलत होने पर त्रुटियाँ खोजी जा सकती हैं कि आखिर हमसे गलती कहाँ छूट गई है किंतु आधार विहीन भविष्यवाणियों के गलत होने पर केवल यह कह दिया जाएगा कि इसमें रिसर्च की आवश्यकता है !ऐसे समय बरका देने के अतिरिक्त और दूसरा विकल्प बचता भी क्या है ? 
       राजनैतिक भविष्यवाणियों में जिस प्रकार से कुछ लक्षणों संकेतों संपर्कों के आधार पर राजनीति के बनते बिगड़ते समीकरणों के विषय में आवश्यकताएँ संभावनाएँ आदि व्यक्त की जाती हैं ऐसा हो सकता है वैसा होने की आशंका है सरकार बनने की संभावना है  किंतु राजनीति में कई बार कुछ घटनाएँ अचानक घटित हो जाती हैं जो क्रमिक प्रक्रिया में नहीं होती हैं इसलिए उनके विषय में किसी को कानोकान कोई खबर नहीं होती है | इसलिए ऐसी ख़बरों के विषय में कोई आशंका संभावना आदि व्यक्त करना संभव नहीं होता है | बिना किसी सुगबुगाहट के किसी सरकार के गिरने की घोषणा हो जाए या बन जाए तो राजनैतिक पत्रकारों या भविष्य वक्ताओं के पास कोई जवाब नहीं होता है वे केवल आश्चर्य प्रकट कर रहे होते हैं |
        राजनैतिक भविष्यवाणियों की तरह ही मौसम के क्षेत्र में जब ऐसी कोई प्राकृतिक घटनाएँ अचानक घटित होने लगती हैं जो क्रम से अलग हटकर होती हैं इसीलिए उनके विषय में भी आशंका संभावना आदि व्यक्त करना संभव नहीं होता है  तो ऐसी घटनाओं को आधुनिक मौसमविज्ञान की भाषा में अप्रत्याशित बता दिया जाता है और ऐसा होने का कारण जलवायु परिवर्तन बता दिया जाता है | 
        कुलमिलाकर ये राजनैतिक समाचारों की तरह ही मौसमसंबंधी समाचार ही हैं जिन्हें मौसम पूर्वानुमान या भविष्यवाणियों के नाम पर परोसा जाता है और समाज को स्वीकार करना पड़ता है |

                    भारत का प्राचीन मौसम विज्ञान     

     भारत में मौसम विज्ञान का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है।उसी के आधार पर मौसम संबंधी भविष्यवाणियाँ सफलता पूर्वक की जाती रही हैं |इसमें प्राकृतिक लक्षणों और गणित के आधार पर भविष्यवाणियाँ की जाती थीं जो सही सटीक घटित होती थीं | वेदों उपनिषदों दार्शनिक विवेचनों में बादलों के गठन और बारिश के विषय में वर्णन मिलता है पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है ऋतुचक्र की प्रक्रिया के बारे में  गंभीर चर्चा की गई है !500 ईस्वी के लगभग वाराहमिहिर द्वारा निर्मित वृहद्संहिता इस बात का सुपुष्ट प्रमाण है कि वायु मंडलीय प्रक्रियाओं का गहरा ज्ञान उस समय भी आस्तित्व में था !कहा गया है - आदित्याज्जायते वृष्टिः अर्थात सूर्य से वर्षा का  निर्माण होता है | कौटिल्य के अर्थशास्त्र में देश के राजस्व और राहत कार्य के लिए वर्षा के वैज्ञानिक मापन और उसके उपयोग की सूची सम्मिलित है ! सातवीं शताब्दी के आसपास कालिदास ने अपने महाकाव्य 'मेघदूत' के माध्यम से भारत के मध्य भाग में मानसून आने के समय का संकेत किया है एवं बादलों के मार्ग का भी वर्णन किया है !1753 में महान मौसम वैज्ञानिक महाकवि 'घाघ' हुए जिनके द्वारा की गई भविष्यवाणियों से प्रभावित जन जन की जबान पर घाघ की कहावतें विद्यमान हैं |कुलमिलाकर भारत में मौसम विज्ञान की शुरुआत अत्यंत प्राचीन काल में हो गई थी |
 विदेशों में भी यंत्रों के बिना ही मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाए जाते थे ! 
      उस समय विदेशी विद्वान भी बिना यंत्रों के ही मौसमसंबंधी घटनाओं का पूर्वानुमान सफलता पूर्वक लगाया करते थे | विदेशी विद्वानों में भी 350 ईसा पूर्व में अरस्तु ने मौसम विज्ञान पर लिखा था।15अक्टूबर 1987 को ब्रिटेन में एक औरत ने एक टी.वी. स्टेशन को बताया कि उसने सुना है कि तूफान आ रहा है। लेकिन मौसम का अनुमान लगानेवाले ने अपने दर्शकों को पूरा भरोसा दिलाया: “चिंता मत कीजिए। कोई तूफान नहीं आनेवाला है।” मगर उसी रात को दक्षिणी इंग्लैंड पर ऐसा भयंकर तूफान आया जिससे भारी जनधन की हानि हुई |
      ब्रिटेन के मौसम-विज्ञानी लूइस रिचर्डसन ने सोचा चूँकि वायुमंडल भौतिक नियमों पर आधारित है, तो क्यों न वह मौसम का अनुमान लगाने में गणित का इस्तेमाल करे। लेकिन गणित के फार्मूले इतने पेचीदा थे और हिसाब करने में इतना समय ज़ाया होता था |इसलिए उनकी वो प्रक्रिया प्रचलन में नहीं आ सकी !किंतु गणित से मौसम पूर्वानुमान लगाया जा सकता है ऐसा वे भी मानते थे |
     स्वदेश से लेकर विदेश तक जिस प्रक्रिया के द्वारा हजारों वर्षों तक मौसम संबंधी पूर्वानुमान लगाए जाते रहे और समाज उससे संतुष्ट भी था यदि ऐसा न होता तो मध्य भारत में घाघभंडरी की कहावतें आज जन जन की वाणी पर नहीं होतीं !वे अनुभव आज भी उनके काम आया करते हैं |वो मौसम संबंधी अत्यंत प्राचीन प्रक्रिया जो अब तक प्रचलित रही वो अचानक गलत कैसे हो गई !
      कुल मिलाकर भारतवर्ष में ऋषियों मुनियों ने सदियों पहले ही वो ज्ञान अर्जित कर लिया था जिससे मौसम के बारे में सटीक भविष्यवाणी की जाती रही है जिन दिनों योरोप ने मौसम विज्ञान की ओर  पहला कदम भी नहीं बढ़ाया था जब अमेरिका में विज्ञान का कोई नाम लेवा भी नहीं था तब ही घाघ जैसे मौसम वैज्ञानिक ने संसार के सर्वाधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक वर्षा वेत्ता की ख्याति अर्जित कर ली थी वे सटीक एवं अचूक भविष्यवाणी किया करते थे |
      प्राचीन ऋषियों की विशेषता एक और थी जब कोई प्राकृतिक घटना क्रम से अलग घटित होती थी तो उसका पूर्वानुमान लगाना भी वे आवश्यक समझा करते थे इसलिए उसके विषय में भी अनुसंधान पूर्वक न केवल पूर्वानुमानलगाते थे अपितु वैसा होने के पीछे के कारण खोजकर उस घटना को भी नियमबद्ध कर दिया करते थे |
     प्रकृति में चंद्रमा का थोड़ा थोड़ा घटना या बढ़ना रहा हो या सूर्य चंद्र ग्रहण की घटनाएँ या फिर समुद्र में उठने वाला ज्वार भाँटा हो ये घटनाएँ प्रतिदिन नहीं घटित होती हैं कभी कभी घटित होने के बाद भी उन्होंने अनुसंधान पूर्वक इस बात की खोज कर ली कि ये कब कब किन किन तिथियों में घटित होती हैं | ज्वार भाँटा प्रत्येक अमावस्या पूर्णिमा को भले घटित होता हो किंतु ग्रहण अमावस्या पूर्णिमा में घटित होने के बाद भी प्रत्येक अमावस्या पूर्णिमा में नहीं घटित होते कभी कभी घटित होते हैं उनका पूर्वानुमान लगाने में एवं ऐसी घटनाओं को भी गणित बढ़ करने में उन्होंने अनुसंधान पूर्वक सफलता प्राप्त की थी |
    आधुनिक मौसम विज्ञान में भी यदि वैज्ञानिकता का थोड़ा भी अंश होता तो भूकंपों के घटित होने के कारण और पूर्वानुमान खोजकर उन्हें भी नियमबद्ध या गणितबद्ध करने के विषय में कोई न कोई सफल अनुसंधान हो चुका होता इसके साथ ही अलनीनो ,लानीना, जलवायुपरिवर्तन ,ग्लोबल वार्मिंग एवं वायु प्रदूषण के होने न होने या बढ़ने घटने के विषय में खोज की जा चुकी होती एवं मौसम पर पड़ने वाले इनके प्रभाव के विषय में अब तक कोई न कोई सफल अनुसंधान कर लिया गया होता !कब अर्थात किस वर्ष ऐसी घटनाएँ घटित होंगी कब नहीं घटित होंगी आदि के पूर्वानुमान लगाने की विधि खोज ली गई होती उसे नियमबद्ध या गणितबद्ध कर दिया गया होता ताकि भावी पीढ़ियों को वर्तमान समय की तरह भ्रम की स्थिति से नहीं जूझना पड़ता |
         आधुनिक मौसम विज्ञान की पूर्वानुमान क्षमता !
 
     उन दिनों मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए अत्याधुनिक मशीनें नहीं थीं फिर भी महाकवि घाघ ने प्रकृति के कार्य में हस्तक्षेप के बिना प्रकृति को पढ़ने की व्यवस्था खोज ली थी |इसप्रकार से अपने देश में ही मानसून की चाल को सही सही पढ़ने वाला विज्ञान विद्यमान है फिर भी भारत में इन दिनों पाश्चात्य जगत के विज्ञान का अंधानुशरण हो रहा है मानसून के मन में क्या है इसे जानने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन में बनी मशीनों का उपयोग हो रहा है |
     इसके आधार पर मूसलाधार बारिश का अनुमान लगाया जाता है तब बूंदाबांदी होकर निकलजाता है कई बार बूँदा बाँदी की भविष्यवाणी की जाती है और मूसलाधार बारिश हो जाती है | कई बार आँधी तूफ़ान आने की भविष्यवाणी की जाती है किंतु हवा का एक झोंका भी नहीं आता है कई बार बिना किसी भविष्यवाणी के ही भीषण आँधी तूफ़ान आ जाता है |
       निकट समय में घटित हुई ऐसी ही कुछ प्राकृतिक घटनाएँ -

       ये भूकंप जैसी उस प्रकार की घटनाएँ नहीं हैं जिनके विषय में विश्व वैज्ञानिकों ने पहले से कह रखा है कि हम पूर्वानुमान लगाने में असमर्थ हैं अपितु ये उस प्रकार की वर्षा आँधी तूफ़ान आदि से संबंधित घटनाएँ हैं जिनके विषय में पूर्वानुमान लगा लेने का दावा किया जाता है फिर भी इनके विषय में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका !यदि इनके विषय में कोई विज्ञान विकसित किया जा सका होता तो संभवतः ऐसा नहीं होता !आप स्वयं देखिए -

  1. केदारनाथ जी में  16 जून 2013 में केदारनाथ जी में भीषण वर्षा का सैलाव आया हजारों लोग मारे गए  किंतु इसका पूर्वानुमान पहले से बताया गया होता तो जनधन की हानि को कम किया जा सकता था किंतु ऐसा नहीं हो सका ! 
  2. 21अप्रैल 2015 की रात्रि में बिहार में काफी बड़ा तूफ़ान आया था जिससे भारत के बिहार आदि प्रांतों में जन धन की बहुत हानि हुई थी जिसके विषय में कोई भविष्यवाणी नहीं की गई थी ! 
  3.  बनारस में 28 जून 2015 को एवं 16 जुलाई 2015 को भीषण बारिश हुई जिसके कारण बनारस में संभावित तत्कालीन प्रधानमंत्री जी की सभाएँ लगातार दो करनी थीं किंतु वर्षा अधिक होने के कारण दोनों सभाएँ रद्द कर देनी पड़ी थीं जिसके विषय में पहले कोई पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था |
  4. सन2015 के नवंबर महीने में मद्रास में कई दिनों तक लगातार भीषण बारिश हुई थी जिसके कारण मद्रास में भीषण बाढ़ से त्राहि त्राहि मची हुई थी किंतु इसका भी पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था !
  5.  सन 2016 के अप्रैल मई आदि में भारत में अधिक गर्मी पड़ने की घटना घटित हुई थी  नदी कुएँ तालाब आदि तेजी से सूखते चले जा रहे थे ट्रैन से कुछ स्थानों पर पानी भेजा गया था |इसी समय में  आग लगने की घटनाएँ बहुत अधिक संख्या में घटित हुई थीं इसलिए विहार सरकार की ओर से दिन में हवन  न करने एवं चूल्हा न जलाने की सलाह दी गई थी ,किंतु समाज यदि जानना चाहे कि ऐसा इस वर्ष हुआ क्यों?इसका कारण क्या था तथा ऐसा कब तक होता रहेगा ? इनविषयों में कभी कुछ भी नहीं बताया जा सका था | 
  6.  2 मई 2018 को पूर्वी भारत में भीषण आँधी तूफान आया उसके बाद भी उसी मई में कुछ बड़े आँधी तूफ़ान और भी आए जिनमें बड़ी संख्या में जनधन की हानि हुई किंतु उसके विषय में कभी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकी थी | 
  7.   7 और 8 मई 2018 को बड़े आँधी तूफ़ान आने की भविष्यवाणी की भी गई थी  जिस कारण दिल्ली और उसके आसपास के स्कूल कालेज बंद करा दिए गए थे किंतु उस दिन कोई तूफ़ान क्या आँधी भी नहीं आई  ऐसा कई बार हुआ क्यों ? 
  8. केरल की भीषण बाढ़ - 7 से 15 अगस्त 2018 तक  केरल में भीषण बरसात हुई जिससे केरल वासियों को भारी नुक्सान उठाना पड़ा था जबकि 3 अगस्त 2018 को सरकारी मौसम विभाग के द्वारा अगस्त सितंबर में सामान्य बारिश होने की भविष्यवाणी की गई थी जो गलत साबित हुई |बाद में भी इसके विषय में कोई स्पष्ट पूर्वानुमान नहीं दिया जा सका था ऐसा वहाँ के मुख्यमंत्री ने भी अपने वक्तव्य में स्वीकार किया था |  
  9.  17 अप्रैल 2019 को मध्यभारत में अचानक भीषण बारिश आँधी तूफ़ान आदि आया बिजली गिरने की घटनाएँ हुईं जिसमें लाखों बोरी गेहूँ भीग गया और लाखों एकड़ में खड़ी हुई तैयार फसल बर्बाद हो गई !इस घटना के विषय में भी पहले कभी कोई पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था ! 
  10. सितंबर 2019 के अंतिम सप्ताह में बिहार में भीषण बारिश और बाढ़ की घटना घटित हुई जिसके विषय में कोई स्पष्ट पूर्वानुमान नहीं दिया गया था ऐसा वहाँ के मुख्यमंत्री ने भी अपने वक्तव्य में स्वीकार किया है | इस भीषण बारिस का पूर्वानुमान एवं ऐसा होने का विश्वसनीय कारण मौसम विभाग के द्वारा न बता पाने एवं ढुलमुल भविष्यवाणियों से निराश मुख्यमंत्री एवं केंद्र के एक राज्यमंत्री ने ऐसी भीषण बारिश होने का कारण  हथिया नक्षत्र को बताया था !
       ऐसी और भी कुछ बड़ी प्राकृतिक घटनाएँ घटित हुई हैं जिनके विषय में पूर्वानुमान बताया नहीं जा सका है |उनमें भी जनधन की हानि हुई है उनके विषय में यदि पूर्वानुमान पता होते तो उनके द्वारा हुई जन धन संबंधी हानि की मात्रा को कुछ कम किया जा सकता था | 
     मानसून आने जाने की तारीखें एक आध बार छोड़कर कभी सच नहीं हुईं अब कहा जा रहा है मौसम चक्र बदल गया है इसलिए मानसून आने जाने की तारीखों में बदलाव किया जाएगा | ऐसा ही सभी जगह किया जाता है | 

                मौसमपूर्वानुमान के अभाव से होने वाले नुक्सान !


       वर्षा के बिना सरकारें नहीं चलती हैं देश की आयव्यय का लेखा जोखा वजट का पूरा तामझाम  मौसम की मर्जी पर निर्भर करता है | विज्ञान मौसम की चाल को पढ़ने का सही एवं सटीक विज्ञान नहीं खोज पाया है जिसके कारण कृषि योजना बनाने में किसानों को कठिनाई आती है इसलिए किसानों का हर वर्ष नुक्सान होता है इसीलिए हर वर्ष सैकड़ों किसान आत्महत्या करते हैं | 

    वर्तमान वैज्ञानिक मानसून का तिलस्म नहीं तोड़ पाए हैं और न ही मौसम विज्ञान का मर्म ही समझ पाए हैं | कुछ वैज्ञानिकों ने घोषणा कर दी है कि मौसम की सटीक भविष्यवाणी संभव ही नहीं है |महावैज्ञानिक प्राचीन ऋषियों मुनियों ने अकाल और सुकाल सभी प्रकार का पूर्वानुमान लगाने में सफलता प्राप्त की थी !देश वासी इस पर विश्वास  करते हैं किंतु सरकार इसे नहीं मानती है  प्राचीन विज्ञान के हिसाब से पूर्वानुमान लगाया जाता तो हजारों किसानों  की जान बच सकती थी |
     आपदा प्रबंधन  की दृष्टि से भी ऐसी प्राकृतिक घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान लगाने की क्षमता का अभाव अत्यंत चिंतनीय है उचित होगा कि मौसम संबंधी अनुसंधानों के नाम पर अभी तक जो समय निरर्थक बीतते आया है उसके विषय में कुछ सार्थक पहल की जाए और मौसम संबंधी वास्तविक प्राकृतिक विज्ञान का अनुसंधान किया जाए !
      विशेष बात यह है कि प्राकृतिक आपदाओं के विषय में आँकड़े अनुभव आदि जुटाकर पूर्वानुमान लगाने के लिए 1875 में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए की गई थी तब से लेकर अभी तक लगभग 144 वर्ष बीत चुके हैं| प्राकृतिक आपदाओं के विषय में हमारा कितना विकास हुआ है | अभी भी प्राकृतिक आपदाओं के विषय में हम या तो पूर्वानुमान नहीं लगा पाते हैं और यदि लगा पाते हैं तो गलत निकल जाते हैं |
      किसी न किसी रूप में लगातार अनुसंधान चलाए जा रहे हैं इनसे संबंधित मंत्रालय संचालित किए जा रहे हैं अधिकारियों कर्मचारियों वैज्ञानिकों आदि पर एवं उनके द्वारा किए जाने वाले अनुसंधानों पर भारी भरकम धनराशि एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए खर्च की जा रही है कि प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित सही और सटीक पूर्वानुमान लगाए जा सकें किंतु ऐसा नहीं हो पा रहा है | 

     5 अक्टूबर 1864 में कलकत्ता में आए भयंकर चक्रवात से लगभग 60,000 लोगों की मौत हो गई थी इसके अतिरिक्त 1866 एवं 1871 में अकाल पड़ा था बताया जाता है कि उसमें भी काफी जन धन की हानि हुई थी !ऐसी घटनाएँ अचानक घटित होने के कारण प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया था इसलिए जन धन की हानि काफी अधिक हो गई थी |अब भी लगभग वही स्थिति है अभी हाल के वर्षों में जितने बार भी प्राकृतिक आपदाएँ घटित हुई हैं उनके विषय में पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सके हैं |
  
ऐसी परिस्थिति में वेद विज्ञान के द्वारा यदि मौसम संबंधी अनुसंधान सरकार की देख रेख में पुनः प्रारंभ किए जाएँ तो इससे मौसम संबंधी पूर्वानुमान  में क्रांति लाई जा सकती है | 


              मेरे द्वारा किए गए कुछ पूर्वानुमान -

  मैं प्रत्येक महीना प्रारंभ होने से पूर्व अगले महीने के पूर्वानुमान पहले भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के निदेशक डॉ के जे रमेश जी के जीमेल पर भेज दिया करते थे उन्होंने कहा था कि हमारे पूर्वानुमान यदि सही निकलेंगे तो वो मुझे लिखित फीडबैक देंगे !इसलिए अपने पूर्वानुमान परीक्षणार्थ मैं उन्हें भेज रहा था जो सही निकलते जा रहे थे !इसी विषय में मेरी उनसे अक्सर बात भी होती थी | इसी क्रम में अगस्त 2018 के विषय में मैंने जुलाई में ही उनके जीमेल पर पूर्वानुमान डाल दिया था जिसमें 1 से 11 और 7 से 14 अगस्त में बीच दक्षिण भारत में भीषण वर्षात होने का पूर्वानुमान लिखा था जिसमें कुछ दशकों का रिकार्ड टूटने की बात भी लिखी थी | जबकि मौसम विज्ञान विभाग ने 3 अगस्त को जो प्रेसविज्ञप्ति जारी की थी उसमें अगस्त और सितम्बर में सामान्य वर्षा होने की भविष्यवाणी की गई थी | जबकि इसी बीच केरल आदि दक्षिण भारत में बहुत अधिक वर्षा हुई थी | भारतीय मौसम विज्ञानविभाग ने 3 अगस्त को जो प्रेसविज्ञप्ति जारी की थी वो भविष्यवाणी गलत हो गई थी मेरे द्वारा अपनी भविष्यवाणी की  तुलना उससे किए जाने के कारण उनसे  हमारी बातचीत बंद हो गई | ये दोनों जीमेल मैं आपको भेज रहा हूँ | इसके विषय में उन्होंने जो फीडबैक दिया है भले उसमें हमारी भविष्यवाणियों को सही न स्वीकार किया गया हो किंतु मैं उन्हें आपको भेज रहा हूँ | 
       इसी विषय में मैं एक दिन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तत्कालीन मंत्री जी से मिला उन्होंने मुझे सेकेटरी साहब के पास यह कहते हुए भेजा कि यदि कुछ हो सकता होगा तो वही करेंगे !मैं राजीवन जी के पास गया तो उन्होंने एडवाइजर गोपाल रमन जी से मिलाया और हमारी बात सुनने को कहा | गोपाल रमन जी ने हमसे वो तकनीक और वह प्रक्रिया लिखकर देने के लिए कहा जिसके आधार पर और जिस प्रकार से मैं पूर्वानुमान लगाता हूँ !मैंने ज्योतिष आदि गणित पक्ष को उद्धृत  किया तो वहाँ ज्योतिष के कुछ पंचांग रखे हुए थे उनकी ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि अमावस्या संक्रांति के आसपास वर्षा होती है इसके अलावा  मौसम का पूर्वानुमान तुम कैसे लगाते हो !इससे लगा कि वहाँ पूर्वानुमान लगाने में ज्योतिष पंचांगों का उपयोग तो किया जाता है किंतु स्वीकार नहीं किया जाता है कि यह भी विज्ञान है | 
     इसके  अतिरिक्त स्काई मेट के  वैज्ञानिक डॉ रजनीश जी को भी मैं पूर्वानुमान भेजता था !उन्होंने मेरे द्वारा किए जाने वाले पूर्वानुमानों की सच्चाई स्वीकार करते हुए  आपदा प्रबंधन विभाग को एक पत्र भी लिखा था मैं वो भी संलग्न कर रहा हूँ | 
    मैंने वायु प्रदूषण के विषय में भी जो पूर्वानुमान लगाए हैं वे भी काफी हद तक सही निकले हैं जिससे यह बात प्रमाणित होती है कि वायु प्रदूषण बढ़ने में समय की भी बड़ी भूमिका है | मैं वो मेल भी आपको भेज रहा हूँ | 
     आँधी तूफानों एवं चक्रवातों के विषय में मेरे द्वारा किए जाने वाले पूर्वानुमान लगभग सच सिद्ध हो रहे हैं | 
   इसके अतिरिक्त मैं दिसंबर 2019 महीने के विषय में भी पूर्वानुमान आपके पास भेज रहा हूँ | 
        आपसे मेरा विनम्र निवेदन है कि आप इस विधा पर भी विचार करें एवं इसी विषय में मुझे मिलने के लिए समय दें !


 

 

Tuesday, December 3, 2019

भारत में मौसम विज्ञान की शुरुआत

आदरणीय प्रधानमंत्री जी
                                   सादर नमस्कार !
विषय :वेदविज्ञान संबंधी मौसम पूर्वानुमान के विषय में -

 महोदय ,
 
      मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने की दृष्टि से वेदविज्ञान अत्यंत प्राचीन तो  है ही इसके साथ साथ यह आज भी अत्यंत सही एवं सटीक घटित होते देखा जा रहा है| इसकी एक विशेषता और है कि इस प्रक्रिया से मौसम संबंधी पूर्वानुमान कितने भी पहले लगाया जा सकता है इसलिए यह कृषि जैसे कार्यों के लिए अत्यंत उपयोगी है | अनुसंधान पूर्वक इसके द्वारा मानसून आने और जाने के विषय में सफलता पूर्वक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है |वर्षा आँधी तूफानों चक्रवातों आदि के विषय में तथा वायुप्रदूषण बढ़ने के विषय में सफलता पूर्वक सही एवं सटीक पूर्वानुमान लगा लिया जाता है जो प्रत्येक महीना प्रारंभ होने से पहले प्रत्येक महीने भर का मौसम संबंधी पूर्वानुमान आपके मेल पर हमारे द्वारा डाल दिया जाता है |
      वैदिक विज्ञान संबंधी मौसम पूर्वानुमान  की सुविधाएँ आधुनिक मौसमविज्ञान में नहीं दिखाई सुनाई पड़ती हैं | इसीलिए तो बीते 6 वर्षों में जितनी भी बड़ी प्राकृतिक आपदाएँ घटित हुई हैं उनमें से किसी के विषय में भविष्यवाणी या तो की नहीं जा सकी है और यदि की भी गई है तो वह भविष्यवाणी गलत सिद्ध हुई है |एक दो घटनाओं में संयोग बश तीर तुक्के लग गए हैं वो सही अवश्य होते दिखी हैं किंतु उनका तर्कसंगत कोई वैज्ञानिक आधार नहीं रहा है ये सूची मैंने इसी प्रपत्र में संलग्न की हुई है |
    आधुनिक मौसम संबंधी मंत्रालय संचालन से लेकर अनुसंधान तक समस्त प्रक्रिया पालन पर सरकार के द्वारा अत्यंत भारी भरकम धनराशि खर्च की जाती है इसके बाद भी इस प्रक्रिया से मौसम संबंधी पूर्वानुमान इतने सच नहीं मिल पाते हैं जो कृषि आदि कार्यों के लिए लिए सहायक हो सकें !किसानों की आत्महत्याएँ चिंता पैदा करने वाली हैं उनमें यदि थोड़ा भी कारण मौसम संबंधी गलत पूर्वानुमान भी है तो ये अत्यंत दुखद है | देशवासी अपने खून पसीने की कमाई से जो धन टैक्स के रूप में देते हैं मौसमपूर्वानुमान संबंधी उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति भी होनी चाहिए |  
    महोदय ! वेदवैज्ञानिक मौसमपूर्वानुमान प्राकृतिक लक्षणों और गणित के आधार पर ग्रहण की तरह ही लगाए जाते हैं इसके आधार पर सैकड़ों वर्ष पहले का मौसम संबंधी पूर्वानुमान भी लगा लिया जाता है जो सही एवं सटीक निकलता है |इसके बाद भी मौसम विज्ञान विभाग से अभी तक जो कुछ मेरा संवाद या पत्रों का आदान प्रदान हुआ है उसमें उनके द्वारा यही कहा गया है कि चूँकि वेदविज्ञान को विज्ञान नहीं माना जा सकता है इसलिए हम आपकी वेदवैज्ञानिक बातों पर विचार नहीं कर सकते !वे कागज़ भी इसके साथ संलग्न हैं |
     श्रीमान जी !सरकारी पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई करके एवं परीक्षाएँ देकर बनारसहिंदूयूनिवर्सिटी से हमने अपनी शिक्षा पूरी की है |  मैंने BHU से Ph.D. भी की है |पिछले 25 वर्षों से मैं इसी अनुसंधान में लगा हुआ हूँ |इसके हमारे पास अत्यंत मजबूत प्रमाण और अनुभव हैं जो आज भी सही एवं सटीक घटित हो रहे हैं |हमारे द्वारे मौसम संबंधी पूर्वानुमान  वेदविज्ञान के आधार पर ही लगाए जाते हैं | अब यह कहना कि वेदविज्ञान को विज्ञान नहीं माना जा सकता है यह कितना न्यायसंगत है वो भी तब जबकि खुद वो काम न कर पा रहे हों !
     ऐसी परिस्थिति में वेदविज्ञान पद्धति से मौसम के विषय में अपने द्वारा किए गए  अनुसंधानों को मैं आपके सामने प्रस्तुत करने हेतु एवं इस अनुसंधान को और अधिक विस्तार देने के लिए तथा संसाधन उपलब्ध करवाने हेतु मैं आपसे मिलने के लिए समय और सहयोग चाहता हूँ |
              निवेदक -
 डॉ.शेष नारायण वाजपेयी
                                                                                                  



           मौसम पूर्वानुमान विज्ञान में विज्ञान की खोज 

      बाइबल में मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने का वर्णन  मिलता है इसके अनुशार बाइबल के ज़माने में आँखों को जो नज़र आता था, उसी से मौसम का अनुमान लगाया जाता था। (मत्ती 16:2,3)
      बाइबिल के मत से बादल आँधी तूफ़ान आदि की घटनाएँ एक जगह घटित होते देखकर उनकी गति और दिशा का अंदाजा लगा लेने मात्र को भविष्यवाणी मान लिया जाता है|
     आधुनिक मौसमविज्ञान संबंधी  इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए बादल आँधी तूफ़ान आदि घटनाएँ देखने हेतु यंत्रों की आवश्यकता पड़ी तो दो ढाई सौ वर्ष पूर्व ऐसे यंत्रों का निर्माण किया गया |यंत्रों से प्राप्त जानकारी सुरक्षित रखने के लिए बीसवीं शती के उत्तरार्ध में कंप्यूटर का इस्तेमाल प्रारंभ हुआ |आज  कुछ ज़रूरी यंत्रों से वायु दाब, तापमान, नमी और हवा को माप लिया  जाता है किंतु इस सारी प्रक्रिया का अनुपालन करते हुए भी ये सही कितने प्रतिशत होता है यह ध्यान देने वाली बात है ।
    आधुनिक मौसम पूर्वानुमान के द्वारा यह जानना काफी आसान है।इस समय मौसम कैसा है  लेकिन, इसकी तुलना में अगले घंटे, दिन या सप्ताह का मौसम कैसा होगा इसका अनुमान लगा पाना अत्यंत कठिन एवं कुछ मामलों में असंभव भी है ।
    द वर्ल्ड बुक इंसाइक्लोपीडिया कहती है, “जो फार्मूले कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं वे वायुमंडल की स्थिति के बारे में सिर्फ अंदाज़े हैं।”इसे वास्तविकता समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए | 
    संभवतः इसीलिए इस बाइबल पद्धति से की जाने वाली आधुनिक मौसम संबंधी अधिकाँश भविष्यवाणियाँ गलत होते देखी जाती हैं | इसीलिए प्राकृतिक आपदाओं का  पूर्वानुमान लगा पाना अभी तक असंभव सा बना हुआ है | मौसम वैज्ञानिक न इनके कारण बता पा रहे हैं और न ही पूर्वानुमान !एक आध तीर तुक्कों को छोड़ दिया जाए तो इस प्रक्रिया में मौसम पूर्वानुमान के लिए कुछ भी नहीं है या यूँ कह लिया जाए कि आधुनिक मौसम विज्ञान पद्धति में विज्ञान का एक छोटा से छोटा अंश भी नहीं उपयोग में नहीं आता है |  

                    भारत का प्राचीन मौसम विज्ञान     
     भारत में मौसम विज्ञान का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है।उसी के आधार पर मौसम संबंधी भविष्यवाणियाँ सफलता पूर्वक की जाती रही हैं |इसमें प्राकृतिक लक्षणों और गणित के आधार पर भविष्यवाणियाँ की जाती थीं जो सही सटीक घटित होती थीं | वेदों उपनिषदों दार्शनिक विवेचनों में बादलों के गठन और बारिश के विषय में वर्णन मिलता है पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है ऋतुचक्र की प्रक्रिया के बारे में  गंभीर चर्चा की गई है !500 ईस्वी के लगभग वाराहमिहिर द्वारा निर्मित वृहद्संहिता इस बात का सुपुष्ट प्रमाण है कि वायु मंडलीय प्रक्रियाओं का गहरा ज्ञान उस समय भी आस्तित्व में था !कहा गया है - आदित्याज्जायते वृष्टिः अर्थात सूर्य से वर्षा का  निर्माण होता है | कौटिल्य के अर्थशास्त्र में देश के राजस्व और राहत कार्य के लिए वर्षा के वैज्ञानिक मापन और उसके उपयोग की सूची सम्मिलित है ! सातवीं शताब्दी के आसपास कालिदास ने अपने महाकाव्य 'मेघदूत' के माध्यम से भारत के मध्य भाग में मानसून आने के समय का संकेत किया है एवं बादलों के मार्ग का भी वर्णन किया है !1753 में महान मौसम वैज्ञानिक महाकवि 'घाघ' हुए जिनके द्वारा की गई भविष्यवाणियों से प्रभावित जन जन की जबान पर घाघ की कहावतें विद्यमान हैं |कुलमिलाकर भारत में मौसम विज्ञान की शुरुआत अत्यंत प्राचीन काल में हो गई थी |
      उस समय विदेशी विद्वान भी बिना यंत्रों के ही मौसम संबंधी घटनाओं का पूर्वानुमान सफलता पूर्वक लगाया करते थे | विदेशी विद्वानों में भी 350 ईसा पूर्व में अरस्तु ने मौसम विज्ञान पर लिखा था।बताया जाता है कि 15अक्टूबर 1987 को ब्रिटेन में एक औरत ने एक टी.वी. स्टेशन को बताया कि उसने सुना है कि तूफान आ रहा है। लेकिन मौसम का अनुमान लगानेवाले ने अपने दर्शकों को पूरा भरोसा दिलाया: “चिंता मत कीजिए। कोई तूफान नहीं आनेवाला है।” मगर उसी रात को दक्षिणी इंग्लैंड पर ऐसा भयंकर तूफान आया जिससे भारी जनधन की हानि हुई थी |
      ब्रिटेन के मौसम-विज्ञानी लूइस रिचर्डसन ने सोचा चूँकि वायुमंडल भौतिक नियमों पर आधारित है, तो क्यों न वह मौसम का अनुमान लगाने में गणित का इस्तेमाल करे, लेकिन गणित के फार्मूले इतने पेचीदा थे और हिसाब करने में इतना समय ज़ाया होता था |इसलिए उनकी वो प्रक्रिया प्रचलन में नहीं आ सकी ,किंतु गणित से मौसम पूर्वानुमान लगाया जा सकता है ऐसा वे भी मानते थे उसकी सरल प्रक्रिया नहीं खोज पाए ये और बात है |
       कुल मिलाकर भारतवर्ष में ऋषियों मुनियों ने सदियों पहले ही वो ज्ञान अर्जित कर लिया था जिससे मौसम के बारे में सटीक भविष्यवाणी की जाती रही है | उन दिनों योरोप ने मौसमविज्ञान की ओर  पहला कदम भी नहीं बढ़ाया था जब अमेरिका में विज्ञान का कोई नाम लेवा भी नहीं था तब ही घाघ जैसे मौसम वैज्ञानिक ने संसार के सर्वाधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक वर्षावेत्ता की ख्याति अर्जित कर ली थी वे सटीक एवं अचूक भविष्यवाणी किया करते थे |
         आधुनिक मौसम विज्ञान की पूर्वानुमान क्षमता !
 
   भारत में इन दिनों पाश्चात्य जगत के विज्ञान का अंधानुशरण हो रहा है मानसून के मन में क्या है इसे जानने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन में बनी मशीनों का उपयोग किया जा रहा है |विदेशी मशीनों के उपयोग किए  जाने मात्र से इसे विज्ञान सिद्ध कर दिया जाता है इससे परिणाम कितना निकल पाता  है इसके विषय में भी समीक्षा की जानी चाहिए |
     ये सारी कसरत कवायद जिस मौसम पूर्वानुमान लगाने के लिए की जाती है इतनी भारी भरकम मशीनों का उपयोग किया जाता है मंत्रालय संचालन किया जाता है अधिकारी कर्मचारी वैज्ञानिक आदि नियुक्त किए जाते हैं उनके द्वारा किए जाने वाले अनुसंधानों पर भारी भरकम धन राशि खर्च की जाती है इसके बाद भी उनके द्वारा किए जाने वाले मौसम संबंधी पूर्वानुमानों के नाम पर कई बार मूसलाधार बारिश होने की भविष्यवाणी की जाती है और बूंदाबांदी होकर निकल जाता है कई बार बूँदा बाँदी की भविष्यवाणी की जाती है और मूसलाधार बारिश हो जाती है | ऐसी परिस्थिति में सरकार का कर्तव्य बन जाता है कि वो अपने मौसम पूर्वानुमान संबंधी अनुसंधान प्रक्रिया पर पुनर्विचार करे |
      अपने देश में ही मानसून की चाल को सही सही पढ़ने वाला ज्ञान विद्यमान है | जिन दिनों मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए अत्याधुनिक मशीनें नहीं थीं आधुनिक विज्ञान सक्रिय नहीं था उस समय भी महान पूर्वानुमान वेत्ता 'घाघ' ने प्रकृति के कार्य में हस्तक्षेप के बिना प्रकृति को पढ़ने की व्यवस्था खोज ली थी उन प्राचीन पद्धतियों का प्रयोग किए जाने में आज संकोच क्यों है ?
       निकट समय में घटित हुई ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ -

       ये उस प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ हैं जिनका या तो पूर्वानुमान नहीं किया जा सका और यदि किया भी गया तो गलत निकल गया | विशेष बात यह है कि ये भूकंप जैसी उस प्रकार की घटनाएँ नहीं हैं जिनके विषय में विश्व वैज्ञानिकों ने पहले से कह रखा है कि हम पूर्वानुमान लगाने में असमर्थ हैं अपितु ये उस प्रकार की वर्षा आँधी तूफ़ान आदि से संबंधित घटनाएँ हैं जिनके विषय में पूर्वानुमान लगा लेने का दावा किया जाता है फिर भी इनके विषय में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका या लगाए जाने वाले पूर्वानुमान भी गलत निकल गए !यदि इनके विषय में कोई विज्ञान विकसित किया जा सका होता तो संभवतः ऐसा नहीं होता !आप स्वयं देखिए -
  1. केदारनाथ जी में  16 जून 2013 में केदारनाथ जी में भीषण वर्षा का सैलाव आया हजारों लोग मारे गए  किंतु इसका पूर्वानुमान पहले से बताया गया होता तो जनधन की हानि को कम किया जा सकता था किंतु ऐसा नहीं हो सका ! 
  2. 21अप्रैल 2015 की रात्रि में बिहार में काफी बड़ा तूफ़ान आया था जिससे भारत के बिहार आदि प्रांतों में जन धन की बहुत हानि हुई थी जिसके विषय में कोई भविष्यवाणी नहीं की गई थी ! 
  3.  बनारस में 28 जून 2015 को एवं 16 जुलाई 2015 को भीषण बारिश हुई जिसके कारण बनारस में संभावित तत्कालीन प्रधानमंत्री जी की सभाएँ लगातार दो करनी थीं किंतु वर्षा अधिक होने के कारण दोनों सभाएँ रद्द कर देनी पड़ी थीं जिसके विषय में पहले कोई पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था |
  4. सन2015 के नवंबर महीने में मद्रास में कई दिनों तक लगातार भीषण बारिश हुई थी जिसके कारण मद्रास में भीषण बाढ़ से त्राहि त्राहि मची हुई थी किंतु इसका भी पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था !
  5.  सन 2016 के अप्रैल मई आदि में भारत में अधिक गर्मी पड़ने की घटना घटित हुई थी  नदी कुएँ तालाब आदि तेजी से सूखते चले जा रहे थे ट्रैन से कुछ स्थानों पर पानी भेजा गया था |इसी समय में  आग लगने की घटनाएँ बहुत अधिक संख्या में घटित हुई थीं इसलिए विहार सरकार की ओर से दिन में हवन  न करने एवं चूल्हा न जलाने की सलाह दी गई थी ,किंतु समाज यदि जानना चाहे कि ऐसा इस वर्ष हुआ क्यों?इसका कारण क्या था तथा ऐसा कब तक होता रहेगा ? इनविषयों में कभी कुछ भी नहीं बताया जा सका था | 
  6.  2 मई 2018 को पूर्वी भारत में भीषण आँधी तूफान आया उसके बाद भी उसी मई में कुछ बड़े आँधी तूफ़ान और भी आए जिनमें बड़ी संख्या में जनधन की हानि हुई किंतु उसके विषय में कभी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकी थी | 
  7.   7 और 8 मई 2018 को बड़े आँधी तूफ़ान आने की भविष्यवाणी की भी गई थी  जिस कारण दिल्ली और उसके आसपास के स्कूल कालेज बंद करा दिए गए थे किंतु उस दिन कोई तूफ़ान क्या आँधी भी नहीं आई  ऐसा कई बार हुआ क्यों ? 
  8. केरल की भीषण बाढ़ - 7 से 15 अगस्त 2018 तक  केरल में भीषण बरसात हुई जिससे केरल वासियों को भारी नुक्सान उठाना पड़ा था जबकि 3 अगस्त 2018 को सरकारी मौसम विभाग के द्वारा अगस्त सितंबर में सामान्य बारिश होने की भविष्यवाणी की गई थी जो गलत साबित हुई |बाद में भी इसके विषय में कोई स्पष्ट पूर्वानुमान नहीं दिया जा सका था ऐसा वहाँ के मुख्यमंत्री ने भी अपने वक्तव्य में स्वीकार किया था |  
  9.  17 अप्रैल 2019 को मध्यभारत में अचानक भीषण बारिश आँधी तूफ़ान आदि आया बिजली गिरने की घटनाएँ हुईं जिसमें लाखों बोरी गेहूँ भीग गया और लाखों एकड़ में खड़ी हुई तैयार फसल बर्बाद हो गई !इस घटना के विषय में भी पहले कभी कोई पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था ! 
  10. सितंबर 2019 के अंतिम सप्ताह में बिहार में भीषण बारिश और बाढ़ की घटना घटित हुई जिसके विषय में कोई स्पष्ट पूर्वानुमान नहीं दिया गया था ऐसा वहाँ के मुख्यमंत्री ने भी अपने वक्तव्य में स्वीकार किया है | इस भीषण बारिस का पूर्वानुमान एवं ऐसा होने का विश्वसनीय कारण मौसम विभाग के द्वारा न बता पाने एवं ढुलमुल भविष्यवाणियों से निराश मुख्यमंत्री एवं केंद्र के एक राज्यमंत्री ने ऐसी भीषण बारिश होने का कारण  हथिया नक्षत्र को बताया था !
       ऐसी और भी कुछ बड़ी प्राकृतिक घटनाएँ घटित हुई हैं जिनके विषय में पूर्वानुमान बताया नहीं जा सका है |उनमें भी जनधन की हानि हुई है उनके विषय में यदि पूर्वानुमान पता होते तो उनके द्वारा हुई जन धन संबंधी हानि की मात्रा को कुछ कम किया जा सकता था | 
     मानसून आने जाने की तारीखें एक आध बार छोड़कर कभी सच नहीं हुईं अब कहा जा रहा है मौसम चक्र बदल गया है इसलिए मानसून आने जाने की तारीखों में बदलाव किया जाएगा | ऐसा ही सभी जगह किया जाता है |
                मौसमपूर्वानुमान के अभाव से होने वाले नुक्सान !

       वर्षा के बिना सरकारें नहीं चलती हैं देश की आयव्यय का लेखा जोखा वजट का पूरा तामझाम  मौसम की मर्जी पर निर्भर करता है | विज्ञान मौसम की चाल को पढ़ने का सही एवं सटीक विज्ञान नहीं खोज पाया है जिसके कारण कृषि योजना बनाने में किसानों को कठिनाई आती है संभवतः इसलिए किसानों का हर वर्ष नुक्सान होता है इसीलिए हर वर्ष सैकड़ों किसान आत्महत्या करते हैं क्योंकि पहले ऐसा नहीं होते देखा जाता था ऐसा अब क्यों होने लगा इसका कारण भी खोजना भी अनुसंधान का विषय है | 
    वर्तमान वैज्ञानिक अभी तक मानसून का तिलस्म नहीं तोड़ पाए हैं और न ही मौसम विज्ञान का मर्म ही समझ पाए हैं | कुछ वैज्ञानिकों ने घोषणा कर दी है कि मौसम की सटीक भविष्यवाणी संभव ही नहीं हैं  |महावैज्ञानिक प्राचीन ऋषियों मुनियों ने अकाल और सुकाल सभी प्रकार का पूर्वानुमान लगाने में सफलता प्राप्त की थी !देशवासी इस पर विश्वास  करते हैं किंतु सरकार इसे नहीं मानती है मुझे विश्वास है कि प्राचीन विज्ञान के हिसाब से यदि पूर्वानुमान लगाया जाता तो हजारों किसानों  की जान बच सकती थी |
     आपदा प्रबंधन  की दृष्टि से भी ऐसी प्राकृतिक घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान लगाने की क्षमता का अभाव अत्यंत चिंतनीय है उचित होगा कि मौसम संबंधी अनुसंधानों के नाम पर अभी तक जो समय निरर्थक बीतते आया है उसके विषय में कुछ सार्थक पहल की जाए और मौसम संबंधी वास्तविक प्राकृतिक विज्ञान का अनुसंधान किया जाए | 
      विशेष बात यह है कि प्राकृतिक आपदाओं के विषय में आँकड़े अनुभव आदि जुटाकर पूर्वानुमान लगाने के लिए 1875 में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए की गई थी तब से लेकर अभी तक लगभग 144 वर्ष बीत चुके हैं| प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान लगाने के विषय में हमारा कितना विकास हुआ है | अभी भी प्राकृतिक आपदाओं के विषय में हम या तो पूर्वानुमान नहीं लगा पाते हैं और यदि लगा पाते हैं तो गलत निकल जाते हैं |
      किसी न किसी रूप में लगातार अनुसंधान चलाए जा रहे हैं इनसे संबंधित मंत्रालय संचालित किए जा रहे हैं अधिकारियों कर्मचारियों वैज्ञानिकों आदि पर एवं उनके द्वारा किए जाने वाले अनुसंधानों पर भारी भरकम धनराशि एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए खर्च की जा रही है कि प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित सही और सटीक पूर्वानुमान लगाए जा सकें किंतु ऐसा नहीं हो पा रहा है | 

     5 अक्टूबर 1864 में कलकत्ता में आए भयंकर चक्रवात से लगभग 60,000 लोगों की मौत हो गई थी इसके अतिरिक्त 1866 एवं 1871 में अकाल पड़ा था बताया जाता है कि उसमें भी काफी जन धन की हानि हुई थी !ऐसी घटनाएँ अचानक घटित होने के कारण प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया था इसलिए जन धन की हानि काफी अधिक हो गई थी |अब भी लगभग वही स्थिति है अभी हाल के वर्षों में जितने बार भी प्राकृतिक आपदाएँ घटित हुई हैं उनके विषय में पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सके हैं |
  
ऐसी परिस्थिति में वेद विज्ञान के द्वारा यदि मौसम संबंधी अनुसंधान सरकार की देख रेख में पुनः प्रारंभ किए जाएँ तो इससे मौसम संबंधी पूर्वानुमान  में क्रांति लाई जा सकती है | 

                         मेरे द्वारा किए गए कुछ पूर्वानुमान -
  मैं वेद विज्ञान के आधार पर मौसम संबंधी पूर्वानुमान लगाने पर पिछले 25 वर्षों से अनुसंधान करते आ रहे हैं | प्रत्येक महीना प्रारंभ होने से पूर्व अगले महीने के पूर्वानुमान पहले भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के निदेशक डॉ के जे रमेश जी के जीमेल पर भेज दिया करते थे इसके बाद प्रधानमंत्री जी के मेल पर भेज दिया करते हैं | 
       भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के निदेशक डॉ के जे रमेश जी उस समय कहा था कि हमारे पूर्वानुमान यदि सही निकलेंगे तो वो मुझे लिखित फीडबैक देंगे !इसलिए अपने पूर्वानुमान परीक्षणार्थ मैं उन्हें भेज रहा था जो सही निकलते जा रहे थे !इसी विषय में मेरी उनसे अक्सर बात भी होती थी | इसी क्रम में अगस्त 2018 के विषय में मैंने जुलाई में ही उनके जीमेल पर पूर्वानुमान डाल दिया था जिसमें 1 से 11 और 7 से 14 अगस्त में बीच दक्षिण भारत में भीषण वर्षात होने का पूर्वानुमान लिखा था जिसमें कुछ दशकों का रिकार्ड टूटने की बात भी लिखी थी | जबकि मौसम विज्ञान विभाग ने 3 अगस्त को जो प्रेसविज्ञप्ति जारी की थी उसमें अगस्त और सितंबर में सामान्य वर्षा होने की भविष्यवाणी की गई थी | जबकि इसी बीच केरल आदि दक्षिण भारत में बहुत अधिक वर्षा हुई थी | भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने 3 अगस्त को जो प्रेसविज्ञप्ति जारी की थी वो भविष्यवाणी गलत हो गई थी मेरे द्वारा अपनी भविष्यवाणी की  तुलना उससे किए जाने के कारण उनसे  हमारी बातचीत बंद हो गई | ये वो दोनों जीमेल मैं आपको भेज रहा हूँ | इसके विषय में उन्होंने जो फीडबैक दिया है भले उसमें हमारी भविष्यवाणियों को सही न स्वीकार किया गया हो किंतु मैं उन्हें भी आपको भेज रहा हूँ | 
       इसी विषय में मैं एक दिन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तत्कालीन मंत्री जी से मिला उन्होंने मुझे सेकेटरी साहब के पास यह कहते हुए भेजा कि यदि कुछ हो सकता होगा तो वही करेंगे !मैं राजीवन जी के पास गया तो उन्होंने एडवाइजर गोपाल रमन जी से मिलाया और हमारी बात सुनने को कहा , गोपाल रमन जी ने हमसे वो तकनीक और वह प्रक्रिया लिखकर देने के लिए कहा जिसके आधार पर और जिस प्रकार से मैं पूर्वानुमान लगाता हूँ !मैंने ज्योतिष आदि गणित पक्ष को उद्धृत  किया तो वहाँ ज्योतिष के कुछ पंचांग रखे हुए थे उनकी ओर इशारा करते हुए उनके एक सहयोगी पांडेय जीने कहा कि अमावस्या संक्रांति के आसपास वर्षा होती है इसके अलावा  मौसम का पूर्वानुमान तुम कैसे लगाते हो !इससे लगा कि वहाँ पूर्वानुमान लगाने में ज्योतिष पंचांगों का उपयोग तो किया जाता है किंतु स्वीकार नहीं किया जाता है कि यह भी विज्ञान है | 
     इसके  अतिरिक्त स्काईमेट के  वैज्ञानिक डॉ रजनीश जी को भी मैं पूर्वानुमान भेजता था !उन्होंने मेरे द्वारा किए जाने वाले पूर्वानुमानों की सच्चाई स्वीकार करते हुए  आपदा प्रबंधन विभाग को एक पत्र भी लिखा था मैं वो भी संलग्न कर रहा हूँ | 
    मैंने वायु प्रदूषण के विषय में भी जो पूर्वानुमान लगाए हैं वे भी काफी हद तक सही निकले हैं जिससे यह बात प्रमाणित होती है कि वायु प्रदूषण बढ़ने में समय की भी बड़ी भूमिका है | मैं वो मेल भी आपको भेज रहा हूँ | 
     आँधी तूफानों एवं चक्रवातों के विषय में मेरे द्वारा किए जाने वाले पूर्वानुमान लगभग सच सिद्ध हो रहे हैं | इसके अतिरिक्त मैं दिसंबर 2019 महीने के विषय में भी पूर्वानुमान आपके पास भेज रहा हूँ | 
        आपसे मेरा विनम्र निवेदन है कि आप इस विधा पर भी विचार करें एवं इसी विषय में मुझे मिलने के लिए समय दें !


 
 

Sunday, December 1, 2019

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                                                           दो शब्द
                                                     मेरे द्वारा किए गए कुछ पूर्वानुमान -
  मैं प्रत्येक महीना प्रारंभ होने से पूर्व अगले महीने के पूर्वानुमान पहले भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के निदेशक डॉ के जे रमेश जी के जीमेल पर भेज दिया करते थे उन्होंने कहा था कि हमारे पूर्वानुमान यदि सही निकलेंगे तो वो मुझे लिखित फीडबैक देंगे !इसलिए अपने पूर्वानुमान परीक्षणार्थ मैं उन्हें भेज रहा था जो सही निकलते जा रहे थे !इसी विषय में मेरी उनसे अक्सर बात भी होती थी | इसी क्रम में अगस्त 2018 के विषय में मैंने जुलाई में ही उनके जीमेल पर पूर्वानुमान डाल दिया था जिसमें 1 से 11 और 7 से 14 अगस्त में बीच दक्षिण भारत में भीषण वर्षात होने का पूर्वानुमान लिखा था जिसमें कुछ दशकों का रिकार्ड टूटने की बात भी लिखी थी | जबकि मौसम विज्ञान विभाग ने 3 अगस्त को जो प्रेसविज्ञप्ति जारी की थी उसमें अगस्त और सितम्बर में सामान्य वर्षा होने की भविष्यवाणी की गई थी | जबकि इसी बीच केरल आदि दक्षिण भारत में बहुत अधिक वर्षा हुई थी | भारतीय मौसम विज्ञानविभाग ने 3 अगस्त को जो प्रेसविज्ञप्ति जारी की थी वो भविष्यवाणी गलत हो गई थी मेरे द्वारा अपनी भविष्यवाणी की  तुलना उससे किए जाने के कारण उनसे  हमारी बातचीत बंद हो गई | ये दोनों जीमेल मैं आपको भेज रहा हूँ | इसके विषय में उन्होंने जो फीडबैक दिया है भले उसमें हमारी भविष्यवाणियों को सही न स्वीकार किया गया हो किंतु मैं उन्हें आपको भेज रहा हूँ | 
       इसी विषय में मैं एक दिन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तत्कालीन मंत्री जी से मिला उन्होंने मुझे सेकेटरी साहब के पास यह कहते हुए भेजा कि यदि कुछ हो सकता होगा तो वही करेंगे !मैं राजीवन जी के पास गया तो उन्होंने एडवाइजर गोपाल रमन जी से मिलाया और हमारी बात सुनने को कहा | गोपाल रमन जी ने हमसे वो तकनीक और वह प्रक्रिया लिखकर देने के लिए कहा जिसके आधार पर और जिस प्रकार से मैं पूर्वानुमान लगाता हूँ !मैंने ज्योतिष आदि गणित पक्ष को उद्धृत  किया तो वहाँ ज्योतिष के कुछ पंचांग रखे हुए थे उनकी ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि अमावस्या संक्रांति के आसपास वर्षा होती है इसके अलावा  मौसम का पूर्वानुमान तुम कैसे लगाते हो !इससे लगा कि वहाँ पूर्वानुमान लगाने में ज्योतिष पंचांगों का उपयोग तो किया जाता है किंतु स्वीकार नहीं किया जाता है कि यह भी विज्ञान है | 
     इसके  अतिरिक्त स्काई मेट के  वैज्ञानिक डॉ रजनीश जी को भी मैं पूर्वानुमान भेजता था !उन्होंने मेरे द्वारा किए जाने वाले पूर्वानुमानों की सच्चाई स्वीकार करते हुए  आपदा प्रबंधन विभाग को एक पत्र भी लिखा था मैं वो भी संलग्न कर रहा हूँ | 
    मैंने वायु प्रदूषण के विषय में भी जो पूर्वानुमान लगाए हैं वे भी काफी हद तक सही निकले हैं जिससे यह बात प्रमाणित होती है कि वायु प्रदूषण बढ़ने में समय की भी बड़ी भूमिका है | मैं वो मेल भी आपको भेज रहा हूँ | 
     आँधी तूफानों एवं चक्रवातों के विषय में मेरे द्वारा किए जाने वाले पूर्वानुमान लगभग सच सिद्ध हो रहे हैं | 
   इसके अतिरिक्त मैं दिसंबर 2019 महीने के विषय में भी पूर्वानुमान आपके पास भेज रहा हूँ | 
        आपसे मेरा विनम्र निवेदन है कि आप इस विधा पर भी विचार करें एवं इसी विषय में मुझे मिलने के लिए समय दें !
            
                                            मौसमविज्ञान का सारांश 
       मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने की दो प्रमुख विधाएँ हैं एक वेदविज्ञान के आधार पर मौसम पूर्वानुमान लगाया जाता है तो दूसरा बाइबल के आधार पर पूर्वानुमान लगाया जाता है |वेदविज्ञान मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने की दृष्टि से अत्यंत प्राचीन प्रक्रिया है !
      वेदविज्ञान के आधार पर महीनों वर्षों पहले के प्राकृतिक लक्षणों को देखकर उसके अनुसार या फिर गणित के आधार पर पूर्वानुमान लगा लिया जाता है यह गणित के आधार पर लगाया जाने वाला मौसम संबंधी पूर्वानुमान ग्रहण की तरह ही सैकड़ों वर्ष पहले भी लगाया जा सकता है जो सही एवं सटीक निकलता है |
      बाइबल में मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाने का जो वर्णन  मिलता है इसके अनुशार बाइबल के ज़माने में आँखों को जो नज़र आता था, उसी से मौसम का अनुमान लगाया जाता था। (मत्ती 16:2,3)
      आधुनिक मौसम पूर्वानुमान लगाने की प्रक्रिया बाइबल की इसी दृष्टि का अनुगमन करती है जो दिखेगा वो माना जाएगा | किसी ट्रेन की गति देखकर ये अंदाजा लगा लेना कि ये किस समय कहाँ पहुँचेगी |ऐसे ही नहर में छोड़े गए पानी या नदी में आने वाली बाढ़ के पानी को देखकर यह अंदाजा लगा लेना कि यह पानी किस दिन कहाँ पहुँचेगा उसी तरह की आधुनिक विज्ञान के द्वारा मौसम पूर्वानुमान लगाने की प्रक्रिया है |
   बाइबिल के मत से बादल आँधी तूफ़ान आदि की घटनाएँ एक जगह घटित होते देखकर उनकी गति और दिशा का अंदाजा लगा लेने मात्र को भविष्यवाणी मान लिया जाता है| बादल आँधी तूफ़ान आदि की घटनाएँ देखने के लिए यंत्रों की आवश्यकता पड़ी तो दो ढाई सौ वर्ष पूर्व ऐसे यंत्रों का निर्माण किया गया |यंत्रों से प्राप्त जानकारी सुरक्षित रखने के लिए बीसवीं शती के उत्तरार्ध में कम्प्यूटर का इस्तेमाल प्रारंभ हुआ | कुछ ज़रूरी यंत्रों से वायु दाब, तापमान, नमी और हवा को मापा जाता है।
      इस समय मौसम कैसा है यह जानना काफी आसान है। लेकिन, इसकी तुलना में अगले घंटे, दिन या सप्ताह का मौसम कैसा होगा इसका अनुमान लगाना इतना आसान नहीं है।
    द वर्ल्ड बुक इंसाइक्लोपीडिया कहती है, “जो फार्मूले कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं वे वायुमंडल की स्थिति के बारे में सिर्फ अंदाज़े हैं।”इसे वास्तविकता समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए | 
      संभवतः इसीलिए इस बाइबल पद्धति से की जाने वाली मौसम संबंधी अधिकाँश भविष्यवाणियाँ गलत होते देखी जाती हैं | इसीलिए प्राकृतिक आपदाओं का  पूर्वानुमान लगा पाना अभी तक असंभव बना हुआ है | वैज्ञानिक न इनके कारण बता पाते हैं और न ही पूर्वानुमान !एक आध तीर तुक्कों को छोड़ दिया जाए तो इस प्रक्रिया में मौसम पूर्वानुमान के लिए कुछ भी नहीं है या यूँ कह लिया जाए कि आधुनिक मौसम विज्ञान पद्धति में विज्ञान का एक छोटा से छोटा अंश भी नहीं है |
      अब बाद वेद विज्ञान की इसके आधार पर जो मौसम संबंधी पूर्वानुमान लगाया जाता है इस प्रक्रिया में जो दिखाई पड़ता है उसके विषय में तो पूर्वानुमान लगाया ही जाता है जो नहीं दिखाई पड़ता है उसका भी पूर्वानुमान लगा लिया जाता है वो विशुद्ध वैज्ञानिक प्रक्रिया है वो आज भी सही एवं सटीक घटित हो रहा है | ग्रहण संबंधी सौ वर्ष पूर्व का पूर्वानुमान लगाते समय उस समय की संभावित सूर्य चंद्र पृथ्वी आदि की परिस्थिति देख पाना बिल्कुल संभव नहीं होता है इसके बाद भी इसके बाद भी ग्रहण संबंधी पूर्वानुमान सही एवं सटीक निकलते हैं |
    भारत सरकार का मौसमविज्ञान विभाग वेद विज्ञान को विज्ञान मानता ही नहीं है  जबकि उसकी अपनी अधिकाँश भविष्यवाणियाँ  गलत निकल जाती हैं |
     आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से मौसम पूर्वानुमान लगाने की प्रक्रिया में चूँकि भविष्य झाँकने की कोई विधि  ही नहीं है और किसी भी घटना का पूर्वानुमान जानने के लिए भविष्य विज्ञान एक मात्र विकल्प है !इसके बिना आधुनिक विज्ञान के द्वारा भविष्य के विषय में किसी भी घटना का पूर्वानुमान लगा पाना संभव ही नहीं  है |
  मौसमसंबंधी समाचारों को ही मौसमसंबंधी भविष्यवाणी कहा जाता है !
     आधुनिक विज्ञान प्रक्रिया में तो केवल मौसमसंबंधी समाचार बाचन किया जाता है | जिसमें अन्य समाचारों की तरह ही आशंकाएँ संभावनाएँ व्यक्त करनी होती हैं जिनके गलत होने के बाद भी उनकी किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती है |
     राजनैतिक या सामाजिक समाचारों की प्रक्रिया भी तो यही है कि वहाँ ऐसा ऐसा हुआ है और यदि वहाँ ऐसा हो रहा है तो यहाँ भी ऐसा होने की संभावना या आशंका है | यहाँ सांप्रदायिक दंगा भड़का है तो ये पूरे देश में फैल सकता है | इस वर्ष महँगाई बढ़ सकती है | मद्यावधि चुनाव हो सकते हैं !इस पार्टी की सरकार बन सकती है | उस पार्टी में फूट पड़ने की आशंका है एक नया गठबंधन तैयार होने की आशंका है | आगामी सत्र में सरकार इस प्रकार का बिल ला सकती है !इस व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है |
     ऐसी आशंकाओं संभावनाओं को यदि राजनीति और समाज में भविष्यवाणी नहीं माना जाता है तो मौसम के क्षेत्र में ऐसे समाचारों को भविष्यवाणी कैसे माना जा सकता है जिनका कोई आधार या अनुसंधान प्रक्रिया ही न हो किसी की जवाबदेही न हो केवल आशंकाओं संभावनाओं की भरमार हो |
      इस वर्ष सर्दी  ने इतने वर्ष का रिकार्ड तोड़ा गर्मी ने उतने वर्ष का और वर्षा ने इतने दशकों का तोड़ा !यहाँ इतने सेंटीमीटर बारिश हुई वहाँ इस नाम का तूफ़ान आया | तीन दिनों तक वर्षा हो सकती है उसके बाद कह दिया जाता है दो दिनों तक और वर्षा हो सकती है इसके बाद फिर कह दिया जाता है तीन दिन और वर्षा हो सकती है जैसी जय वर्षा आँधी तूफ़ान आदि होने की घटनाएँ घटित होते जाते हैं वैसी वैसी आशंकाएँ संभावनाएँ आदि व्यक्त करते जाते हैं ऐसी मौसमी भविष्यवाणियों और राजनैतिक समाचारों में क्या अंतर है |
     वर्षा अधिक हो सकती है या गर्मी अधिक पड़ने की संभावना है या सर्दी कम या अधिक पड़ने की आशंका या संभावना है ऐसी भविष्यवाणियाँ करने वालों की न तो कोई जवाबदेही होती है और न ही इनके गलत हो जाने के बाद उनसे जवाब भी नहीं माँगा जा सकता कि ये गलत क्यों हो गईं !यदि जवाब माँगा भी जाए तो जवाब दिया भी क्या जाएगा जब ऐसी भविष्यवाणियों का कोई आधार ही नहीं है |यदि आधार हो तब भविष्यवाणियों के गलत होने पर त्रुटियाँ खोजी जा सकती हैं कि आखिर हमसे गलती कहाँ छूट गई है किंतु आधार विहीन भविष्यवाणियों के गलत होने पर केवल यह कह दिया जाएगा कि इसमें रिसर्च की आवश्यकता है !ऐसे समय बरका देने के अतिरिक्त और दूसरा विकल्प बचता भी क्या है ?
       राजनैतिक भविष्यवाणियों में जिस प्रकार से कुछ लक्षणों संकेतों संपर्कों के आधार पर राजनीति के बनते बिगड़ते समीकरणों के विषय में आवश्यकताएँ संभावनाएँ आदि व्यक्त की जाती हैं ऐसा हो सकता है वैसा होने की आशंका है सरकार बनने की संभावना है  किंतु राजनीति में कई बार कुछ घटनाएँ अचानक घटित हो जाती हैं जो क्रमिक प्रक्रिया में नहीं होती हैं इसलिए उनके विषय में किसी को कानोकान कोई खबर नहीं होती है | इसलिए ऐसी ख़बरों के विषय में कोई आशंका संभावना आदि व्यक्त करना संभव नहीं होता है | बिना किसी सुगबुगाहट के किसी सरकार के गिरने की घोषणा हो जाए या बन जाए तो राजनैतिक पत्रकारों या भविष्य वक्ताओं के पास कोई जवाब नहीं होता है वे केवल आश्चर्य प्रकट कर रहे होते हैं |
        राजनैतिक भविष्यवाणियों की तरह ही मौसम के क्षेत्र में जब ऐसी कोई प्राकृतिक घटनाएँ अचानक घटित होने लगती हैं जो क्रम से अलग हटकर होती हैं इसीलिए उनके विषय में भी आशंका संभावना आदि व्यक्त करना संभव नहीं होता है  तो ऐसी घटनाओं को आधुनिक मौसमविज्ञान की भाषा में अप्रत्याशित बता दिया जाता है और ऐसा होने का कारण जलवायु परिवर्तन बता दिया जाता है | 
        कुलमिलाकर ये राजनैतिक समाचारों की तरह ही मौसमसंबंधी समाचार भी हैं जिन्हें मौसम पूर्वानुमान या भविष्यवाणियों के नाम पर परोसा जाता है और समाज को स्वीकार करना पड़ता है |

                    भारत का प्राचीन मौसम विज्ञान     
     भारत में मौसम विज्ञान का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है।उसी के आधार पर मौसम संबंधी भविष्यवाणियाँ सफलता पूर्वक की जाती रही हैं |इसमें प्राकृतिक लक्षणों और गणित के आधार पर भविष्यवाणियाँ की जाती थीं जो सही सटीक घटित होती थीं | वेदों उपनिषदों दार्शनिक विवेचनों में बादलों के गठन और बारिश के विषय में वर्णन मिलता है पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है ऋतुचक्र की प्रक्रिया के बारे में  गंभीर चर्चा की गई है !500 ईस्वी के लगभग वाराहमिहिर द्वारा निर्मित वृहद्संहिता इस बात का सुपुष्ट प्रमाण है कि वायु मंडलीय प्रक्रियाओं का गहरा ज्ञान उस समय भी आस्तित्व में था !कहा गया है - आदित्याज्जायते वृष्टिः अर्थात सूर्य से वर्षा का  निर्माण होता है | कौटिल्य के अर्थशास्त्र में देश के राजस्व और राहत कार्य के लिए वर्षा के वैज्ञानिक मापन और उसके उपयोग की सूची सम्मिलित है ! सातवीं शताब्दी के आसपास कालिदास ने अपने महाकाव्य 'मेघदूत' के माध्यम से भारत के मध्य भाग में मानसून आने के समय का संकेत किया है एवं बादलों के मार्ग का भी वर्णन किया है !1753 में महान मौसम वैज्ञानिक महाकवि 'घाघ' हुए जिनके द्वारा की गई भविष्यवाणियों से प्रभावित जन जन की जबान पर घाघ की कहावतें विद्यमान हैं |कुलमिलाकर भारत में मौसम विज्ञान की शुरुआत अत्यंत प्राचीन काल में हो गई थी |
 विदेशों में भी यंत्रों के बिना ही मौसमसंबंधी पूर्वानुमान लगाए जाते थे ! 
      उस समय विदेशी विद्वान भी बिना यंत्रों के ही मौसमसंबंधी घटनाओं का पूर्वानुमान सफलता पूर्वक लगाया करते थे | विदेशी विद्वानों में भी 350 ईसा पूर्व में अरस्तु ने मौसम विज्ञान पर लिखा था।15अक्टूबर 1987 को ब्रिटेन में एक औरत ने एक टी.वी. स्टेशन को बताया कि उसने सुना है कि तूफान आ रहा है। लेकिन मौसम का अनुमान लगानेवाले ने अपने दर्शकों को पूरा भरोसा दिलाया: “चिंता मत कीजिए। कोई तूफान नहीं आनेवाला है।” मगर उसी रात को दक्षिणी इंग्लैंड पर ऐसा भयंकर तूफान आया जिससे भारी जनधन की हानि हुई |
      ब्रिटेन के मौसम-विज्ञानी लूइस रिचर्डसन ने सोचा चूँकि वायुमंडल भौतिक नियमों पर आधारित है, तो क्यों न वह मौसम का अनुमान लगाने में गणित का इस्तेमाल करे। लेकिन गणित के फार्मूले इतने पेचीदा थे और हिसाब करने में इतना समय ज़ाया होता था |इसलिए उनकी वो प्रक्रिया प्रचलन में नहीं आ सकी !किंतु गणित से मौसम पूर्वानुमान लगाया जा सकता है ऐसा वे भी मानते थे |
     स्वदेश से लेकर विदेश तक जिस प्रक्रिया के द्वारा हजारों वर्षों तक मौसम संबंधी पूर्वानुमान लगाए जाते रहे और समाज उससे संतुष्ट भी था यदि ऐसा न होता तो मध्य भारत में घाघभंडरी की कहावतें आज जन जन की वाणी पर नहीं होतीं !वे अनुभव आज भी उनके काम आया करते हैं |वो मौसम संबंधी अत्यंत प्राचीन प्रक्रिया जो अब तक प्रचलित रही वो अचानक गलत कैसे हो गई !
      कुल मिलाकर भारतवर्ष में ऋषियों मुनियों ने सदियों पहले ही वो ज्ञान अर्जित कर लिया था जिससे मौसम के बारे में सटीक भविष्यवाणी की जाती रही है जिन दिनों योरोप ने मौसम विज्ञान की ओर  पहला कदम भी नहीं बढ़ाया था जब अमेरिका में विज्ञान का कोई नाम लेवा भी नहीं था तब ही घाघ जैसे मौसम वैज्ञानिक ने संसार के सर्वाधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक वर्षा वेत्ता की ख्याति अर्जित कर ली थी वे सटीक एवं अचूक भविष्यवाणी किया करते थे |
      प्राचीन ऋषियों की विशेषता एक और थी जब कोई प्राकृतिक घटना क्रम से अलग घटित होती थी तो उसका पूर्वानुमान लगाना भी वे आवश्यक समझा करते थे इसलिए उसके विषय में भी अनुसंधान पूर्वक न केवल पूर्वानुमानलगाते थे अपितु वैसा होने के पीछे के कारण खोजकर उस घटना को भी नियमबद्ध कर दिया करते थे |
     प्रकृति में चंद्रमा का थोड़ा थोड़ा घटना या बढ़ना रहा हो या सूर्य चंद्र ग्रहण की घटनाएँ या फिर समुद्र में उठने वाला ज्वार भाँटा हो ये घटनाएँ प्रतिदिन नहीं घटित होती हैं कभी कभी घटित होने के बाद भी उन्होंने अनुसंधान पूर्वक इस बात की खोज कर ली कि ये कब कब किन किन तिथियों में घटित होती हैं | ज्वार भाँटा प्रत्येक अमावस्या पूर्णिमा को भले घटित होता हो किंतु ग्रहण अमावस्या पूर्णिमा में घटित होने के बाद भी प्रत्येक अमावस्या पूर्णिमा में नहीं घटित होते कभी कभी घटित होते हैं उनका पूर्वानुमान लगाने में एवं ऐसी घटनाओं को भी गणित बढ़ करने में उन्होंने अनुसंधान पूर्वक सफलता प्राप्त की थी |
    आधुनिक मौसम विज्ञान में भी यदि वैज्ञानिकता का थोड़ा भी अंश होता तो भूकंपों के घटित होने के कारण और पूर्वानुमान खोजकर उन्हें भी नियमबद्ध या गणितबद्ध करने के विषय में कोई न कोई सफल अनुसंधान हो चुका होता इसके साथ ही अलनीनो ,लानीना, जलवायुपरिवर्तन ,ग्लोबल वार्मिंग एवं वायु प्रदूषण के होने न होने या बढ़ने घटने के विषय में खोज की जा चुकी होती एवं मौसम पर पड़ने वाले इनके प्रभाव के विषय में अब तक कोई न कोई सफल अनुसंधान कर लिया गया होता !कब अर्थात किस वर्ष ऐसी घटनाएँ घटित होंगी कब नहीं घटित होंगी आदि के पूर्वानुमान लगाने की विधि खोज ली गई होती उसे नियमबद्ध या गणितबद्ध कर दिया गया होता ताकि भावी पीढ़ियों को वर्तमान समय की तरह भ्रम की स्थिति से नहीं जूझना पड़ता |
         आधुनिक मौसमविज्ञान की पूर्वानुमान क्षमता !
 
     उन दिनों मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए अत्याधुनिक मशीनें नहीं थीं फिर भी महाकवि घाघ ने प्रकृति के कार्य में हस्तक्षेप के बिना प्रकृति को पढ़ने की व्यवस्था खोज ली थी |इसप्रकार से अपने देश में ही मानसून की चाल को सही सही पढ़ने वाला विज्ञान विद्यमान है फिर भी भारत में इन दिनों पाश्चात्य जगत के विज्ञान का अंधानुशरण हो रहा है मानसून के मन में क्या है इसे जानने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन में बनी मशीनों का उपयोग हो रहा है |
     इसके आधार पर मूसलाधार बारिश का अनुमान लगाया जाता है तब बूंदाबांदी होकर निकलजाता है कई बार बूँदा बाँदी की भविष्यवाणी की जाती है और मूसलाधार बारिश हो जाती है | कई बार आँधी तूफ़ान आने की भविष्यवाणी की जाती है किंतु हवा का एक झोंका भी नहीं आता है कई बार बिना किसी भविष्यवाणी के ही भीषण आँधी तूफ़ान आ जाता है |
       निकट समय में घटित हुई ऐसी ही कुछ प्राकृतिक घटनाएँ -

       ये भूकंप जैसी उस प्रकार की घटनाएँ नहीं हैं जिनके विषय में विश्व वैज्ञानिकों ने पहले से कह रखा है कि हम पूर्वानुमान लगाने में असमर्थ हैं अपितु ये उस प्रकार की वर्षा आँधी तूफ़ान आदि से संबंधित घटनाएँ हैं जिनके विषय में पूर्वानुमान लगा लेने का दावा किया जाता है फिर भी इनके विषय में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका !यदि इनके विषय में कोई विज्ञान विकसित किया जा सका होता तो संभवतः ऐसा नहीं होता !आप स्वयं देखिए -
  1. केदारनाथ जी में  16 जून 2013 में केदारनाथ जी में भीषण वर्षा का सैलाव आया हजारों लोग मारे गए  किंतु इसका पूर्वानुमान पहले से बताया गया होता तो जनधन की हानि को कम किया जा सकता था किंतु ऐसा नहीं हो सका ! 
  2. 21अप्रैल 2015 की रात्रि में बिहार में काफी बड़ा तूफ़ान आया था जिससे भारत के बिहार आदि प्रांतों में जन धन की बहुत हानि हुई थी जिसके विषय में कोई भविष्यवाणी नहीं की गई थी ! 
  3.  बनारस में 28 जून 2015 को एवं 16 जुलाई 2015 को भीषण बारिश हुई जिसके कारण बनारस में संभावित तत्कालीन प्रधानमंत्री जी की सभाएँ लगातार दो करनी थीं किंतु वर्षा अधिक होने के कारण दोनों सभाएँ रद्द कर देनी पड़ी थीं जिसके विषय में पहले कोई पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था |
  4. सन2015 के नवंबर महीने में मद्रास में कई दिनों तक लगातार भीषण बारिश हुई थी जिसके कारण मद्रास में भीषण बाढ़ से त्राहि त्राहि मची हुई थी किंतु इसका भी पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था !
  5.  सन 2016 के अप्रैल मई आदि में भारत में अधिक गर्मी पड़ने की घटना घटित हुई थी  नदी कुएँ तालाब आदि तेजी से सूखते चले जा रहे थे ट्रैन से कुछ स्थानों पर पानी भेजा गया था |इसी समय में  आग लगने की घटनाएँ बहुत अधिक संख्या में घटित हुई थीं इसलिए विहार सरकार की ओर से दिन में हवन  न करने एवं चूल्हा न जलाने की सलाह दी गई थी ,किंतु समाज यदि जानना चाहे कि ऐसा इस वर्ष हुआ क्यों?इसका कारण क्या था तथा ऐसा कब तक होता रहेगा ? इनविषयों में कभी कुछ भी नहीं बताया जा सका था | 
  6.  2 मई 2018 को पूर्वी भारत में भीषण आँधी तूफान आया उसके बाद भी उसी मई में कुछ बड़े आँधी तूफ़ान और भी आए जिनमें बड़ी संख्या में जनधन की हानि हुई किंतु उसके विषय में कभी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकी थी | 
  7.   7 और 8 मई 2018 को बड़े आँधी तूफ़ान आने की भविष्यवाणी की भी गई थी  जिस कारण दिल्ली और उसके आसपास के स्कूल कालेज बंद करा दिए गए थे किंतु उस दिन कोई तूफ़ान क्या आँधी भी नहीं आई  ऐसा कई बार हुआ क्यों ? 
  8. केरल की भीषण बाढ़ - 7 से 15 अगस्त 2018 तक  केरल में भीषण बरसात हुई जिससे केरल वासियों को भारी नुक्सान उठाना पड़ा था जबकि 3 अगस्त 2018 को सरकारी मौसम विभाग के द्वारा अगस्त सितंबर में सामान्य बारिश होने की भविष्यवाणी की गई थी जो गलत साबित हुई |बाद में भी इसके विषय में कोई स्पष्ट पूर्वानुमान नहीं दिया जा सका था ऐसा वहाँ के मुख्यमंत्री ने भी अपने वक्तव्य में स्वीकार किया था |  
  9.  17 अप्रैल 2019 को मध्यभारत में अचानक भीषण बारिश आँधी तूफ़ान आदि आया बिजली गिरने की घटनाएँ हुईं जिसमें लाखों बोरी गेहूँ भीग गया और लाखों एकड़ में खड़ी हुई तैयार फसल बर्बाद हो गई !इस घटना के विषय में भी पहले कभी कोई पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था ! 
  10. सितंबर 2019 के अंतिम सप्ताह में बिहार में भीषण बारिश और बाढ़ की घटना घटित हुई जिसके विषय में कोई स्पष्ट पूर्वानुमान नहीं दिया गया था ऐसा वहाँ के मुख्यमंत्री ने भी अपने वक्तव्य में स्वीकार किया है | इस भीषण बारिस का पूर्वानुमान एवं ऐसा होने का विश्वसनीय कारण मौसम विभाग के द्वारा न बता पाने एवं ढुलमुल भविष्यवाणियों से निराश मुख्यमंत्री एवं केंद्र के एक राज्यमंत्री ने ऐसी भीषण बारिश होने का कारण  हथिया नक्षत्र को बताया था !
       ऐसी और भी कुछ बड़ी प्राकृतिक घटनाएँ घटित हुई हैं जिनके विषय में पूर्वानुमान बताया नहीं जा सका है |उनमें भी जनधन की हानि हुई है उनके विषय में यदि पूर्वानुमान पता होते तो उनके द्वारा हुई जन धन संबंधी हानि की मात्रा को कुछ कम किया जा सकता था | 
     मानसून आने जाने की तारीखें एक आध बार छोड़कर कभी सच नहीं हुईं अब कहा जा रहा है मौसम चक्र बदल गया है इसलिए मानसून आने जाने की तारीखों में बदलाव किया जाएगा | ऐसा ही सभी जगह किया जाता है | 

                मौसमपूर्वानुमान के अभाव से होने वाले नुक्सान !

       वर्षा के बिना सरकारें नहीं चलती हैं देश की आयव्यय का लेखा जोखा वजट का पूरा तामझाम  मौसम की मर्जी पर निर्भर करता है | विज्ञान मौसम की चाल को पढ़ने का सही एवं सटीक विज्ञान नहीं खोज पाया है जिसके कारण कृषि योजना बनाने में किसानों को कठिनाई आती है इसलिए किसानों का हर वर्ष नुक्सान होता है इसीलिए हर वर्ष सैकड़ों किसान आत्महत्या करते हैं | 
    वर्तमान वैज्ञानिक मानसून का तिलस्म नहीं तोड़ पाए हैं और न ही मौसम विज्ञान का मर्म ही समझ पाए हैं | कुछ वैज्ञानिकों ने घोषणा कर दी है कि मौसम की सटीक भविष्यवाणी संभव ही नहीं है |महावैज्ञानिक प्राचीन ऋषियों मुनियों ने अकाल और सुकाल सभी प्रकार का पूर्वानुमान लगाने में सफलता प्राप्त की थी !देश वासी इस पर विश्वास  करते हैं किंतु सरकार इसे नहीं मानती है  प्राचीन विज्ञान के हिसाब से पूर्वानुमान लगाया जाता तो हजारों किसानों  की जान बच सकती थी |
     आपदा प्रबंधन  की दृष्टि से भी ऐसी प्राकृतिक घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान लगाने की क्षमता का अभाव अत्यंत चिंतनीय है उचित होगा कि मौसम संबंधी अनुसंधानों के नाम पर अभी तक जो समय निरर्थक बीतते आया है उसके विषय में कुछ सार्थक पहल की जाए और मौसम संबंधी वास्तविक प्राकृतिक विज्ञान का अनुसंधान किया जाए ! 
      विशेष बात यह है कि प्राकृतिक आपदाओं के विषय में आँकड़े अनुभव आदि जुटाकर पूर्वानुमान लगाने के लिए 1875 में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए की गई थी तब से लेकर अभी तक लगभग 144 वर्ष बीत चुके हैं| प्राकृतिक आपदाओं के विषय में हमारा कितना विकास हुआ है | अभी भी प्राकृतिक आपदाओं के विषय में हम या तो पूर्वानुमान नहीं लगा पाते हैं और यदि लगा पाते हैं तो गलत निकल जाते हैं |
      किसी न किसी रूप में लगातार अनुसंधान चलाए जा रहे हैं इनसे संबंधित मंत्रालय संचालित किए जा रहे हैं अधिकारियों कर्मचारियों वैज्ञानिकों आदि पर एवं उनके द्वारा किए जाने वाले अनुसंधानों पर भारी भरकम धनराशि एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए खर्च की जा रही है कि प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित सही और सटीक पूर्वानुमान लगाए जा सकें किंतु ऐसा नहीं हो पा रहा है | 

     5 अक्टूबर 1864 में कलकत्ता में आए भयंकर चक्रवात से लगभग 60,000 लोगों की मौत हो गई थी इसके अतिरिक्त 1866 एवं 1871 में अकाल पड़ा था बताया जाता है कि उसमें भी काफी जन धन की हानि हुई थी !ऐसी घटनाएँ अचानक घटित होने के कारण प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया था इसलिए जन धन की हानि काफी अधिक हो गई थी |अब भी लगभग वही स्थिति है अभी हाल के वर्षों में जितने बार भी प्राकृतिक आपदाएँ घटित हुई हैं उनके विषय में पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सके हैं |
  
ऐसी परिस्थिति में वेद विज्ञान के द्वारा यदि मौसम संबंधी अनुसंधान सरकार की देख रेख में पुनः प्रारंभ किए जाएँ तो इससे मौसम संबंधी पूर्वानुमान  में क्रांति लाई जा सकती है |
          
   वैदिक मौसम पूर्वानुमान की नई तकनीक !

   कई प्राचीन वैज्ञानिक विधाओं के संयुक्त अध्ययनों अनुसंधानों से प्रकट हुई  मौसम पूर्वानुमान लगाने की बिल्कुल नई तकनीक है | यह विशेष कर योग सांख्य आयुर्वेद तथा खगोल विज्ञान के संयुक्तअनुसंधान से इस तकनीक को खोजा गया है |इसके द्वारा प्रकृति के सभी अंगों का अनुसंधान करके वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान चक्रवात आदि  प्राकृतिक घटनाओं का बहुत पहले से पूर्वानुमान लगा लिया जाता है |यह वही अनुसंधान पद्धति है जिसके द्वारा सुदूर आकाश में घटित होने वाले सूर्य चंद्र ग्रहणों के विषय में सही सही पूर्वानुमान सैकड़ों वर्ष पहले के लगा लिया जाता है |जो आज भी सही एवं सटीक होते देखे जाते हैं |
     यदि थोड़ी बहुत कहीं कुछ कमी रह भी गई है तो इसके लिए इस विज्ञान के प्रति सरकार एवं समाज की उदासीनता एक बड़ा कारण रही है | इसीलिए इस क्षेत्र में अनुसंधान का निरंतर अभाव रहा है |भारत के परतंत्र होने से पूर्व राजा महाराजा लोग इन विषयों के विद्वान हुआ करते थे इसीलिए उन्हें ऐसे विषयों में रूचि होती थी | ऐसे विद्वानों का संग्रह किया करते थे और ऐसे अनुसंधानों को प्रोत्साहित करने में योगदान दिया करते थे |इसलिए उस समय भारत विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित था |भारत के वैज्ञानिक अनुसंधानों का  महत्वपूर्ण स्थान था | पृथ्वी के गर्भ से लेकर सुदूर आकाश तक की ग्रह गतिविधियों का अनुसंधान कर लिया जाता था | ग्रहण आदि का पूर्वानुमान उसी प्रकार के अनुसंधानों की उपज थी |
      जिस विज्ञान के द्वारा सुदूर आकाश में घटित होने वाली ग्रह जनित परिस्थितियों संचार आदि का पूर्वानुमान लगा लिया जाता है उस विज्ञान के द्वारा यदि बादलों(वर्षा) या आँधी तूफानों के संचार का पूर्वानुमान लगा लिया जाए तो इसमें आश्चर्य क्या है ? पृथ्वी पर घटित होने वाली भूकंपीय हलचल या सुनामी आदि प्राकृतिक उपद्रवों के विषय में पूर्वानुमान लगा लेने में कठिनाई की बात क्या है ?
     देश परतंत्र हुआ उसमें हमारी कुछ वैज्ञानिक विधाएँ विलुप्त हो गईं और जब देश स्वतंत्र हुआ तब उन अनुसंधान के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाए गए जिससे उनमें से जिन्हें बचाया जा सकता था वे भी नहीं बचाई जा सकीं जो बचीं उन्हीं के सहारे अनुसंधान पूर्वक अपनी विलुप्त विद्याओं को पुनः प्राप्त किया जा सकता है | 
       आधुनिक विज्ञान की तरह ही भारत के प्राचीन ज्ञान विज्ञान से संबंधित अनुसंधानों पर यदि इतना ध्यान दिया गया होता तो अब तक परिस्थितियाँ बहुत बदल चुकी होतीं और प्राकृतिक घटनाओं के विषयों में सरकार एवं समाज की पूर्वानुमान संबंधी आवश्यकताओं का समाधान किया जा चुका होता | इससे प्राकृतिक आपदाओं के विषय में समय पूर्व ही पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और बचाव कार्यों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है |
    आधुनिक विज्ञान के  उपग्रहों रडारों के द्वारा किसी एक स्थान पर बादलों की घटाएँ वर्षा एवं आँधी तूफानों आदि की घटनाएँ घटित होती देखकर उन्हीं की गति और दिशा के अनुशार इस बात का अंदाजा लगा लिया जाता है कि ये उड़कर किधर को किस गति से जा रहे हैं वही बता दिया जाता है कि ये कब कहाँ पहुँच रहे हैं | इसमें मौसम पूर्वानुमान विज्ञान जैसा तो कुछ भी नहीं है |
       किसी नहर में छोड़ा गया पानी या किसी नदी में आया बाढ़ का पानी या किसी स्टेशन से छोड़ी गई ट्रेन आदि कब किस शहर में पहुँच सकेंगे इस बात का भी अंदाजा लगा लिया जाता है यदि वो विज्ञान नहीं है तो बादलों और आँधी तूफानों से संबंधित ऐसे अंदाजे को विज्ञान की श्रेणी में कैसे रखा जा सकता  है |  
       इसलिए प्राचीन विज्ञान से संबंधित इस नई तकनीक के द्वारा प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने से बहुत पहले उस प्रकार की घटनाओं के घटित होने वाले संभावित समय का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है कि किस प्रकार की प्राकृतिक घटना या आपदा के घटित होने का समय कब होगा |
      इस प्रकार से प्राकृतिक घटनाओं के घटित  होने के समय का पूर्वानुमान लग जाने पर उपग्रहों रडारों के द्वारा सतर्कता पूर्वक उस समय निरीक्षण किया जा सकता है कि इस समय उत्पन्न हुई घटनाओं से हमारा क्षेत्र कितना प्रभावित हो रहा है |

                आधुनिक मौसमविज्ञान की पूर्वानुमान क्षमता !
    मौसम संबंधी प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने का पूर्वानुमान लगाने के लिए आधुनिक मौसम पूर्वानुमान की परिकल्पना की गई है | आधुनिक विज्ञान में पूर्वानुमान लगाने की प्रक्रिया क्या है इसकी वैज्ञानिक क्षमता कितनी है आदि बातें स्पष्ट नहीं हैं |इतना ही नहीं अपितु मौसम विज्ञान  के नाम से प्रसिद्ध विधा में विज्ञान क्या है यह अभी तक स्पष्ट नहीं किया गया है |
     इसमें सब कुछ कल्पना के आधार पर मान लिया गया है जिसका वैज्ञानिक सच्चाई से कितना संबंध है यह अनुसंधान का विषय है ,क्योंकि उन कल्पनाओं का अधिकाँश  प्राकृतिक घटनाओं के साथ कोई ताल मेल नहीं बैठ पाता है |इसीलिए इसके द्वारा लगाए जाने वाले पूर्वानुमान बहुत कम सही निकलते हैं जो सही निकलते भी हैं उनकी संख्या इतनी कम होती है कि वे किसी वैज्ञानिक सच्चाई की उपज हैं या कुछ तीर तुक्के ही लग गए हैं इसका अंदाजा लगाना भी अत्यंत कठिन होता है | 
इस विषय में कुछ सर्व विदित प्रत्यक्ष उदाहरण  इस प्रकार हैं -
 1.  अलनीनों लानीना की कल्पना की गई और बताया गया कि इसका मौसम पर बहुत बड़ा असर पड़ता है | इससे दीर्घावधि मौसम पूर्वानुमान प्रभावित होते हैं | ऐसा मानकर सुदूर समुद्र में घटित होने वाली अलनीनों लानीना जैसी घटनाओं को मौसम पूर्वानुमान अनुसंधान की प्रक्रिया में सम्मिलित किया गया आशा थी कि इसके बाद मौसम संबंधी दीर्घावधि पूर्वानुमान सही एवं सटीक होने लगेंगे किंतु अभी तक न तो दीर्घावधि मौसम पूर्वानुमानों को सही होते देखा गया और न ही मानसून के आने जाने से संबंधित पूर्वानुमानों को कभी सही होते देखा गया है इसीलिए अब मानसून के आने जाने की तारीखों में बदलाव करने पर बिचार किया जाने लगा है | ये इस बात का प्रमाण है कि अलनीनों लानीना जैसी कल्पनाओं का मौसम संबंधी घटनाओं से कोई संबंध सिद्ध नहीं हो सका है |
     ऐसी परिस्थिति में रिसर्च तो इस बात पर होनी चाहिए मानसून आने जाने के लिए निश्चित की गई तारीखों को छोड़कर उससे अलग तारीखों में मानसून आने जाने का कारण क्या है ? मानसून की तारीखें निश्चित करने में पहले ही कोई चूक हुई है या मौसम के चक्र में कोई बदलाव आया है !यदि मौसम के चक्र में ही कोई बदलाव आया है तो पीछे ऐसे कितने वर्ष बीत चुके हैं जिनमें मानसून आने जाने की घटनाएँ निर्धारित तारीखों में घटित हुआ करती थीं |  
    2. जलवायु परिवर्तन नाम से जो कल्पना की गई है उसके लक्षण एवं मौसम पर पड़ने वाले प्रभाव के विषय में स्पष्टताका अभाव है |जलवायुपरिवर्तन का मौसम संबंधी किस पूर्वानुमान पर कितना असर पड़ेगा !इसके असर से वैज्ञानिकों के द्वारा की जाने वाली मौसम संबंधी कौन सी भविष्यवाणी कितनी तक गलत हो सकती है इसका कोई स्पष्ट विवेचन नहीं किया  गया है |
   जलवायु परिवर्तन शब्द का उपयोग अक्सर तभी करते देखा जाता है जब मौसम वैज्ञानिकों की कोई भविष्यवाणी गलत होजाती है तो उसका कारण जलवायुपरिवर्तन को बता दिया जाता है या फिर जिन प्राकृतिक घटनाओं के अचानक घटित हो जाने के कारण उसके विषय में कोई झूठ या सच भविष्यवाणी करने से वे चूक गए थे | इसलिए उनके अचानक घटित होने का कारण जलवायुपरिवर्तन को बता दिया जाता है |
      ऐसी परिस्थिति में रिसर्च तो इस बात पर होनी चाहिए कि मौसम संबंधी भविष्यवाणियाँ गलत होने का कारण आखिर क्या है ?ये कोई मौसम संबंधी बदलाव है या पूर्वानुमान लगाने में ही चूक हुई है यदि चूक हुई है तो क्या और यदि बदलाव आया है तो किस प्रकार का और कितना !ऐसा अतीत में कब कब हुआ है और भविष्य में किस वर्ष होने की संभावना है ?वस्तुतः ऐसी घटनाओं का कारण जलवायुपरिवर्तन या और जो कुछ भी हो उसे घटना घटित होने से पहले बताया जाना चाहिए बाद में बताने से ये पता नहीं लग पता है कि इसका कारण जलवायुपरिवर्तन है भी या नहीं या भविष्यवाणी गलत हो जाने के कारण ही ऐसी लीपा पोती की जा रही है |
      जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के विषय में बताया जाता है कि भविष्य में  आँधी तूफ़ान वर्षा बाढ़ सूखा आदि से संबंधित घटनाएँ अधिक घटित होंगी और भी ऐसा बहुत कुछ !किंतु हमेंशा हर कालखंड में ऐसा ही होता रहा है परिवर्तन प्रकृति का नियम है इसलिए इसे जलवायु परिवर्तन के नाम पर अलग से चिन्हित किया जाना किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक  है |इसका कोई स्पष्ट उत्तर मिलता नहीं है |
      ऐसी परिस्थिति में यह लगभग निश्चित है कि मौसमसंबंधी कोई भी विज्ञान अभी तक खोजा नहीं जा सका है | इसीलिए वर्षा आँधी तूफान आदि सभी प्रकार की प्राकृतिक घटनाएँ जब एक जगह घटित होने लगती हैं तो उनकी गति और दिशा उपग्रहों या रडारों पर देख ली जाती है उसी के अनुसार इस बात का अंदाजा लगा लिया जाता है कि ये कितने समय में किस देश प्रदेश या शहर  में पहुँच  सकती हैं किंतु इस प्रक्रिया से किया गया अंदाजा दो एक घटनाओं को छोड़कर अक्सर गलत निकल जाता है क्योंकि हवा का रुख कब किधर मुड़ जाएगा इसको परखने के लिए अभी तक कोई विधा विकसित नहीं की जा सकी है |
    मौसम भविष्यवाणियाँ गलत होने का कारण मौसमसंबंधी किसी विज्ञान का न होना है !
     मौसम विज्ञान के नाम पर कुछ ऐसे जुगाड़ किए गए हैं इन जुगाड़ों को वैज्ञानिक अनुसंधानों जैसा सम्मान मिला हुआ है इसमें अध्ययन और अनुसंधान क्या है ये समझ में आना अत्यंत कठिन है | 
     पिछले वर्ष इस तारीख़ को मानसून आया या गया था अबकी उस तारीख में नहीं आया गया तो जलवायु परिवर्तन !
     पिछले वर्ष इस सप्ताह या महीने में यहाँ इतने सेंटीमीटर बारिस हुई थी अबकी उतनी नहीं हुई इसका मतलब जलवायु परिवर्तन !
      पिछले वर्ष इस महीने बर्फ बारी शुरू हो गई थी अबकी नहीं हुई इसका मतलब जलवायु परिवर्तन हो रहा है | 
  पिछले वर्ष इतने आँधी तूफ़ान नहीं आए थे अबकी आ रहे हैं इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है | 
इसमें कौन सा विज्ञान है ?कैसा अनुसंधान और ऐसे अनुसंधानों से आज तक उपलब्ध क्या हुआ है ?
  अनुसंधानों का उद्देश्य चक्रवातों के विषय में पूर्वानुमान लगाना था किंतु पूर्वानुमान लगाया नहीं जा सका इसलिए चक्रवातों के नाम रखे जाने लगे!इसे मौसमवैज्ञानिकअनुसंधानों की उपलब्धि कैसे माना जा सकता है | 
     सैटेलाइट से समुद्र में उठे आँधी तूफानों या बादलों को देखकर उसकी गति और दिशा के हिसाब से ये कब किस देश प्रदेश या शहर आदि में पहुँचेंगे इस बात का अंदाजा लगा लेने को विज्ञान नहीं माना जा सकता ! 
       पूर्वानुमान का मतलब है जो घटनाएँ किसी भी रूप में घटित होने से पूर्व अनुमान लगा लिया जाए तब तो पूर्वानुमान अन्यथा किसी घटना के प्रकट हो जाने पर उसे किसी भी संसाधन की मदद से देखकर उसके विषय में कोई अंदाजा लगा लेने से कभी कभी मदद मिल जाती है किंतु पूर्वानुमान विज्ञान या मौसम विज्ञान  जैसा इस प्रक्रिया में कुछ भी नहीं है | 
   सर्दी गर्मी या वर्षा संबंधी भविष्यवाणियों का सच !
      मौसम वैज्ञानिक लोग सर्दी गर्मी वर्षा आँधी तूफ़ान आदि के विषय में भविष्यवाणी करते अक्सर सुने जाते हैं किंतु यही लोग भूकंपों के विषय में कभी कोई भविष्यवाणी  न करते हैं और न ही ऐसा कर पाने का दावा ही करते देखे जाते हैं इसका मुख्यकारण मौसम या भूकंपों से संबंधित किसी वैज्ञानिक अनुसंधान का अभाव ही है        सर्दी गर्मी वर्षा आँधी तूफ़ान आदि प्राकृतिक घटनाएँ हों या भूकंप हों इनसे संबंधित घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने के लिए अभी तक कोई विज्ञान विकसित ही नहीं किया जा सका है अंतर केवल इतना है कि सर्दी गर्मी वर्षा आँधी तूफ़ान आदि की ऋतुएँ निश्चित हैं कि किस प्रकार की घटनाएँ किस ऋतु में घटित होने की संभावना अधिक होती है जैसे वर्षा ऋतु में वर्षा और बाढ़ की संभावना अधिक होती है इसलिए वर्षाऋतु में वर्षा संबंधी भविष्यवाणी कर दी जाती है क्योंकि इतना विश्वास होता है कि वर्षा ऋतु है तो वर्षा तो होगी ही भले कुछ कम हो या अधिक किंतु होगी वर्षा ही इस ऋतु में सर्दी तो नहीं ही होने लगेगी !इसलिए ऋतुओं से मिलती जुलती भविष्यवाणियाँ कर दी जाती हैं ऐसी भविष्यवाणियाँ यदि गलत हो भी जाती हैं तो उसे अलनीनों लानिना ,जलवायु परिवर्तन आदि काल्पनिक कारण  बता कर सही सिद्ध कर लिया जाता है |
    भूकंपों की अपनी कोई ऋतु  नहीं होती है इसलिए इनके विषय में गलत भविष्यवाणियों को भी सही सिद्ध करने वाली अलनीनों लानिना ,जलवायु परिवर्तन जैसी सुविधाओं का लाभ नहीं लिया जा सकता है तभी तो इसमें तीर तुक्के चल नहीं पाते हैं यही कारण है कि भूकंपों से संबंधित पूर्वानुमान लगाने के विषय में सभी लोग अपनी असमर्थता प्रकट कर देते हैं जबकि वर्षा आँधी तूफ़ान आदि के विषय में अक्सर तरह तरह की भविष्यवाणियाँ करते देखा जाता है | 
   वस्तुतः किसी भी प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान लगाने का अभी तक कोई विज्ञान विकसित ही नहीं किया जा सका है |  
    सर्दी गर्मी वर्षा आँधी तूफ़ान आदि ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ जो अपनी अपनी ऋतुओं में प्रतिवर्ष घटित हुआ करती हैं मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा उन्हीं के विषय में तीर तुक्के भी लगाए जा सकते हैं क्योंकि उससे जन धन की अधिक हानि नहीं होने पाती है इसलिए इधर लोगों का ध्यान भी कम जाता है |
    इसी प्रकार की ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ जो भूकंपों की तरह कभी कभी ही घटित होते देखी जाती हैं  और भूकंपों की तरह ही भारी जन धन की हानि करने के लिए जानी जाती हैं इसलिए इन्हें भी भूकंपों की तरह ही प्राकृतिक आपदाओं की श्रेणी में रखा जाता है |
      प्राकृतिक आपदाओं के विषय में तीर तुक्के नहीं चल पाते हैं इसीलिए ऐसी घटनाओं को अप्रत्याशित एवं इनके घटित होने का कारण जलवायु परिवर्तन आदि को बता दिया जाता है | बहुत अधिक दबाव पड़ा तो ऐसी घटनाओं के विषय में रिसर्च की आवश्यकता है ऐसा कहकर बात टाल दी जाती है बाद में पूछता कौन है !

      निकट समय में घटित हुई ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ -

       ये भूकंप जैसी उस प्रकार की घटनाएँ नहीं हैं जिनके विषय में विश्व वैज्ञानिकों ने पहले से कह रखा है कि हम पूर्वानुमान लगाने में असमर्थ हैं अपितु ये उस प्रकार की वर्षा आँधी तूफ़ान आदि से संबंधित घटनाएँ हैं जिनके विषय में पूर्वानुमान लगा लेने का दावा किया जाता है फिर भी इनके विषय में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सका !यदि इनके विषय में कोई विज्ञान विकसित किया जा सका होता तो संभवतः ऐसा नहीं होता !आप स्वयं देखिए -       
  1. केदारनाथ जी में  16 जून 2013 में केदारनाथ जी में भीषण वर्षा का सैलाव आया हजारों लोग मारे गए  किंतु इसका पूर्वानुमान पहले से बताया गया होता तो जनधन की हानि को कम किया जा सकता था किंतु ऐसा नहीं हो सका ! 
  2. 21अप्रैल 2015 की रात्रि में बिहार में काफी बड़ा तूफ़ान आया था जिससे भारत के बिहार आदि प्रांतों में जन धन की बहुत हानि हुई थी जिसके विषय में कोई भविष्यवाणी नहीं की गई थी ! 
  3.  बनारस में 28 जून 2015 को एवं 16 जुलाई 2015 को भीषण बारिश हुई जिसके कारण बनारस में संभावित तत्कालीन प्रधानमंत्री जी की सभाएँ लगातार दो करनी थीं किंतु वर्षा अधिक होने के कारण दोनों सभाएँ रद्द कर देनी पड़ी थीं जिसके विषय में पहले कोई पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था |
  4. सन2015 के नवंबर महीने में मद्रास में कई दिनों तक लगातार भीषण बारिश हुई थी जिसके कारण मद्रास में भीषण बाढ़ से त्राहि त्राहि मची हुई थी किंतु इसका भी पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था !
  5.  सन 2016 के अप्रैल मई आदि में भारत में अधिक गर्मी पड़ने की घटना घटित हुई थी  नदी कुएँ तालाब आदि तेजी से सूखते चले जा रहे थे ट्रैन से कुछ स्थानों पर पानी भेजा गया था |इसी समय में  आग लगने की घटनाएँ बहुत अधिक संख्या में घटित हुई थीं इसलिए विहार सरकार की ओर से दिन में हवन  न करने एवं चूल्हा न जलाने की सलाह दी गई थी ,किंतु समाज यदि जानना चाहे कि ऐसा इस वर्ष हुआ क्यों?इसका कारण क्या था तथा ऐसा कब तक होता रहेगा ? इनविषयों में कभी कुछ भी नहीं बताया जा सका था | 
  6.  2 मई 2018 को पूर्वी भारत में भीषण आँधी तूफान आया उसके बाद भी उसी मई में कुछ बड़े आँधी तूफ़ान और भी आए जिनमें बड़ी संख्या में जनधन की हानि हुई किंतु उसके विषय में कभी कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकी थी | 
  7.   7 और 8 मई 2018 को बड़े आँधी तूफ़ान आने की भविष्यवाणी की भी गई थी  जिस कारण दिल्ली और उसके आसपास के स्कूल कालेज बंद करा दिए गए थे किंतु उस दिन कोई तूफ़ान क्या आँधी भी नहीं आई  ऐसा कई बार हुआ क्यों ? 
  8. केरल की भीषण बाढ़ - 7 से 15 अगस्त 2018 तक  केरल में भीषण बरसात हुई जिससे केरल वासियों को भारी नुक्सान उठाना पड़ा था जबकि 3 अगस्त 2018 को सरकारी मौसम विभाग के द्वारा अगस्त सितंबर में सामान्य बारिश होने की भविष्यवाणी की गई थी जो गलत साबित हुई |बाद में भी इसके विषय में कोई स्पष्ट पूर्वानुमान नहीं दिया जा सका था ऐसा वहाँ के मुख्यमंत्री ने भी अपने वक्तव्य में स्वीकार किया था |  
  9.  17 अप्रैल 2019 को मध्यभारत में अचानक भीषण बारिश आँधी तूफ़ान आदि आया बिजली गिरने की घटनाएँ हुईं जिसमें लाखों बोरी गेहूँ भीग गया और लाखों एकड़ में खड़ी हुई तैयार फसल बर्बाद हो गई !इस घटना के विषय में भी पहले कभी कोई पूर्वानुमान नहीं बताया जा सका था ! 
  10. सितंबर 2019 के अंतिम सप्ताह में बिहार में भीषण बारिश और बाढ़ की घटना घटित हुई जिसके विषय में कोई स्पष्ट पूर्वानुमान नहीं दिया गया था ऐसा वहाँ के मुख्यमंत्री ने भी अपने वक्तव्य में स्वीकार किया है | इस भीषण बारिस का पूर्वानुमान एवं ऐसा होने का विश्वसनीय कारण मौसम विभाग के द्वारा न बता पाने एवं ढुलमुल भविष्यवाणियों से निराश मुख्यमंत्री एवं केंद्र के एक राज्यमंत्री ने ऐसी भीषण बारिश होने का कारण  हथिया नक्षत्र को बताया था !
       ऐसी और भी कुछ बड़ी प्राकृतिक घटनाएँ घटित हुई हैं जिनके विषय में पूर्वानुमान बताया नहीं जा सका है |उनमें भी जनधन की हानि हुई है उनके विषय में यदि पूर्वानुमान पता होते तो उनके द्वारा हुई जन धन संबंधी हानि की मात्रा को कुछ कम किया जा सकता था |
      आपदा प्रबंधन  की दृष्टि से भी ऐसी प्राकृतिक घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान लगाने की क्षमता का अभाव अत्यंत चिंतनीय है उचित होगा कि मौसम संबंधी अनुसंधानों के नाम पर अभी तक जो समय निरर्थक बीतते आया है उसके विषय में कुछ सार्थक पहल की जाए और मौसम संबंधी वास्तविक प्राकृतिक विज्ञान का अनुसंधान किया जाए ! 
      विशेष बात यह है कि प्राकृतिक आपदाओं के विषय में आँकड़े अनुभव आदि जुटाकर पूर्वानुमान लगाने के लिए 1875 में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की स्थापना जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए की गई थी तब से लेकर अभी तक लगभग 144 वर्ष बीत चुके हैं| प्राकृतिक आपदाओं के विषय में हमारा कितना विकास हुआ है | अभी भी प्राकृतिक आपदाओं के विषय में हम या तो पूर्वानुमान नहीं लगा पाते हैं और यदि लगा पाते हैं तो गलत निकल जाते हैं |
      किसी न किसी रूप में लगातार अनुसंधान चलाए जा रहे हैं इनसे संबंधित मंत्रालय संचालित किए जा रहे हैं अधिकारियों कर्मचारियों वैज्ञानिकों आदि पर एवं उनके द्वारा किए जाने वाले अनुसंधानों पर भारी भरकम धनराशि एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए खर्च की जा रही है कि प्राकृतिक घटनाओं से संबंधित सही और सटीक पूर्वानुमान लगाए जा सकें किंतु ऐसा नहीं हो पा रहा है |इसका कारण क्या है ?
   5 अक्टूबर 1864 में कलकत्ता में आए भयंकर चक्रवात से लगभग 60,000 लोगों की मौत हो गई थी इसके अतिरिक्त 1866 एवं 1871 में अकाल पड़ा था बताया जाता है कि उसमें भी काफी जन धन की हानि हुई थी !ऐसी घटनाएँ अचानक घटित होने के कारण प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाया था इसलिए जन धन की हानि काफी अधिक हो गई थी |अब भी लगभग वही स्थिति है अभी हाल के वर्षों में जितने बार भी प्राकृतिक आपदाएँ घटित हुई हैं उनके विषय में पूर्वानुमान नहीं लगाए जा सके हैं |


    ऐसी परिस्थिति में इस बात की समीक्षा तो होनी ही चाहिए कि इतने लंबे समय से चले आ रहे अनुसंधानों द्वारा प्राकृतिक आपदाओं का पूर्वानुमान लगा लेने में भारत की क्षमता में कितना विकास हुआ है ?

प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने से संबंधित कारणों की खोज का अभाव !
       प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने का पूर्वानुमान लगाने के लिए सबसे पहले आवश्यकता इस बात की है कि घटनाओं के घटित होने के आधार भूत वे कारण खोजे जाएँ जो तर्कों की कसौटी पर खरे उतर सकें | और उन कारणों का अन्योन्याश्रित संबंध उस प्रकार की संबंधित घटनाओं के साथ सिद्ध हो सके किंतु ऐसा अभी तक हो नहीं पाया है |    
      कई बार कुछ प्राकृतिक घटनाएँ कुछ दिनों या सप्ताहों तक बार बार घटित होती जाती हैं एक घटना समाप्त होती है दूसरी घटित होने लगती है|ऐसी घटनाओं के घटित होने के पीछे का कारण एवं उनके विषय में पूर्वानुमान खोजने के लिए कुछ भी नहीं है | 
     कभी कभी किसी क्षेत्र में भीषण बाढ़ आने से पूर्व जब वर्षा प्रारंभ होती है तो उपग्रहों रडारों आदि से आकाश में एक निश्चित दूरी तक फैले हुए बादल दीखने लगते हैं और वे किस दिशा में कितनी गति से आगे बढ़ रहे हैं इसका अंदाजा लगा लिया जाता है उसके हिसाब से ये बता दिया जाता है कि 24,48 या 72 घंटे अभी और बरसेगा ये अंदाजा केवल उतने बादलों को ध्यान में रखकर लगाया गया होता है जो उस समय आकाश में दिखाई पड़ रहे होते हैं किंतु 72 घंटे बीतने के बाद भी जब बादलों की श्रंखला समाप्त नहीं होती है तो तीन दिन और वर्षा होने की भविष्यवाणी कर दी जाती है इसके बाद भी आवश्यकता पड़ती है तो भविष्यवाणी और आगे बढ़ा दी जाती है |    ये क्रम ऐसे ही चला करता है और वो क्षेत्र बाढ़ से डूबने उतराने लगता है |
     ऐसी परिस्थिति में पहले तीन दिनों तक बारिश होने की भविष्यवाणी सुनकर जिन लोगों ने तीन दिनों के लिए अपनी आवश्यकता की सामग्री का संग्रह किया था तीन दिन बीतने के बाद उनके द्वारा संग्रहीत आवश्य सामग्री भी समाप्त हो गई और बारिश का पानी तब तक इतना अधिक भर चुका होता है कि उनके घरों की पहली मंजिल डूब जाती है | इसके बाद वे अपने भरोसे सामग्री लेने जाने लायक भी नहीं बचते  हैं और सामाग्री भी समाप्त हो चुकी होती है | ऐसे लोगों को मौसम संबंधी भविष्यवाणियों से कितना लाभ पहुँच पाता  है | 
      इसी प्रकार से किसी क्षेत्र में कुछ कुछ दिनों के अंतराल में बार बार आँधी तूफ़ान चक्रवात आदि घटित होने लगते हैं | ऐसी परिस्थिति में जब जो आँधी तूफ़ान चक्रवात आदि उपग्रहों रडारों से आकाश में आते हुए दिखाई पड़ जाता है उसके विषय में बता दिया जाता है कि एक तूफ़ान आ रहा है दूसरा दिखाई देता है तो दूसरे के विषय में बता दिया जाता है कि दूसरा तूफ़ान आ रहा है ऐसे ही तीसरा चौथा आदि क्रम चला करता है किंतु ये तूफ़ान इतनी जल्दी जल्दी बार बार क्यों आ रहे हैं और कब तक आते रहेंगे ?इसी वर्ष ऐसा क्यों हो रहा है |इन प्रश्नों का  कोई उत्तर किसी मौसम भविष्यवक्ता के पास इसलिए नहीं होता है क्योंकि ये घटनाएँ घट क्यों रही हैं इसका कारण अभी तक खोजा ही नहीं जा सका है और कारण पता लगे बिना उसके विषय में पूर्वानुमान लगा पाना संभव नहीं है | 
     ऐसा ही सुनामी भूकंप बज्रपात आदि सभी प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं के साथ में होते देखा जाता है |ऐसी घटनाओं के लिए बताए जाने वाले कारण ही इस बात के प्रमाण हैं |   
 भूकंपों के घटित होने के लिए बताए जाने वाले जिम्मेदार कारण !
       भूकंप सुनामी वर्षा या आँधी तूफ़ान जैसी घटनाएँ घटित होने का निश्चित कारण खोजे जाने अभी तक अवशेष हैं | पृथ्वी के अंदर गैसों के भरे भण्डार के कारण भूकंप घटित होता है ऐसा कहा जाता है लावा पर तैरतीं भूमिगत प्लेटों के आपस में टकराने से भूकंप आता है ऐसा बताया जाता है किंतु यदि यह सही है तो जिस प्रकार से गैसों के भण्डार को खोजा गया या प्लेटों के आपस में टकराने की बात पता की गई उसी प्रक्रिया से इनके विषय में पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है क्योंकि किसी घटना के विषय में पूर्वानुमान लगाने के लिए उस घटना के घटित होने का कारण ज्ञात करना आवश्यक होता है !
       दूसरी बात हिमालय के नीचे गैसों का बहुत बड़ा संचित भण्डार बताया जाता है इसके कारण कभी भी कोई 9 के आसपास की तीव्रता का बड़ा भूकंप आ सकता है ऐसा पिछले कुछ दशकों से कहा जा रहा है यह भी कहा गया कि ऐसा भयंकर भूकंप सन 2018 में आएँगे किंतु ऐसा कुछ हुआ तो नहीं !इसका मतलब कारण निर्धारित करने में कोई चूक हो रही है | रही बात भूकंप आने की तो कहीं भी कभी भी कितना भी बड़ा भूकंप आ सकता है उसका ऐसी भविष्यवाणियों या अनुसंधानों से कोई संबंध कैसे सिद्ध किया जा सकता है | 
      ऐसे ही महाराष्ट्र में भूकंप कम आया करते थे किंतु 1967 में कोयना झील में पानी भरा गया उसके बाद से वहाँ अनेकों भूकंप आए !जिससे उन भूकंपों का संबंध उस पानी भरे जाने से कुछ तो सिद्ध हुआ किंतु जब यह कहा गया कि इस झील के  जल भार से भूमिगत प्लेटों में कंपन होने लगा उसी के कारण भूकंप आने लगे तो फिर प्रश्न उठा स्वाभाविक था कि टिहरी आदि अन्य झीलें जो बनीं जलभार तो उसमें भी है वहाँ गैसों का भारी दबाव भी बताया जा रहा है तो वहाँ ऐसा कुछ न होने का कारण क्या है और कोयना में ऐसा होने का कारण क्या है ?ऐसा ही अन्य कुछ जगहों पर होते देखा जाता है | 
      भूकंपों के घटित होने का कारण यदि जमीन के अंदर संचित गैसों या भूमिगत प्लेटों के टकराने को ही सच मान लिया जाए और विश्वास कर लिया जाए कि भूकंप आने के कारण जमीन के अंदर ही हैं तो फिर एक दूसरा प्रश्न उठता है कि कईबार ऐसा अनुभव किया जाता है कि जहाँ कहीं भूकंप आने या सुनामी आने का समय हुआ है तो उसके कुछ पहले ही वहाँ रहने वाले बनबासी आदिवासी ग्रामीण लोग वह स्थान छोड़कर वहाँ से जा चुके थे कुछ पशु पक्षी आदि वह स्थान छोड़कर चले गए थे कुछ पशुओं पक्षियों के आचार व्यवहार बोली भाषा आदि में अनेकों प्रकार के अस्वाभाविक से परिवर्तन आते देखे गए थे | 
     ऐसी परिस्थिति में यदि भूकंप आदि आने के कारण जमीन के अंदर ही होते हैं तो फिर ऐसे मनुष्यों या जीव जंतुओं को ऐसी घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान कैसे पता लगा जाता है ?यदि उन्हें लग सकता है तो आधुनिक विज्ञान संबंधी समस्त संसाधनों से संपन्न लगातार रिसर्च में लगे रहने वाले वैज्ञानिकों को वो बात क्यों नहीं समझ में आ पा रही है जो उन बिना पढ़े लिए बनवासियों या जीव जंतुओं को समझ में आ जा रही है | इसका कारण कहीं ये तो नहीं है कि जिस प्रक्रिया को हम भूकंप विज्ञान समझ रहे हैं वो भूकंप विज्ञान हो ही न जिससे संबंधित अनुसंधानों में समय संपत्ति एवं संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है | 
    सुनामीके घटित होने के लिए बताए जाने वाले जिम्मेदार कारण !

    समुद्री भूकंपों की वजह से सुनामी पैदा होती है। ऐसा माना जाता है किंतु 22 दिसंबर 2018 की रात्रि में  इंडोनेशिया में जो सुनामी आयी उसका कारण भूकंप तो नहीं था क्योंकि भूकंप आया ही नहीं | ऐसा घटित होने के पीछे के कारणों का अंदाजा लगाने वाले वैज्ञानिकों ने आशंका व्यक्त की कि "ज्वालामुखी में विस्फोट के बाद पानी के भीतर या तो भूस्खलन हुआ होगा या फिर पूर्णिमा के कारण समंदर में हाई टाइड यानी लहरों का ऊंचा उठना रहा होगा !"लेकिन ये दोनों बातें केवल आशंका मात्र हैं ये किसी वैज्ञानिक अनुसन्धान पर आधारित नहीं कही जा सकती हैं |
     इसमें भी प्रत्यक्षदर्शी फोटो ग्राफर एंडरसन बताते हैं, "इन ख़तरनाक लहरों के तट पर पहुँचने से पहले, किसी तरह की हलचल (ज्वालामुखी) नहीं थी, चारों तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा था."
     दूसरी बात पूर्णिमा की तो कहा जाता है कि "समुद्र में लहरे चाँद-सूरज और ग्रहों के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से उठती हैं, लेकिन सुनामी लहरें इन आम लहरों से अलग होती हैं.!"
      इंडोनेशिया की आपदा नियंत्रण एजेंसी के प्रमुख सुतोपो पूर्वोनूग्रोहो का कहना है कि "आमतौर पर इस शांत खाड़ी में सूनामी नहीं आती, और न ही क्रेकाटोआ ज्वालामुखी में बड़े विस्फोट होते रहे हैं. कुछ कम तीव्रता के भूकंप इस इलाक़े में ज़रूर आते रहे हैं.किंतु यह सुनामी आने का कारण भूकंप नहीं है क्योंकि भूकंप कोई  आया ही नहीं है !सुनामी की असल वजह का पता करने में  ये सबसे बड़ी मुश्किल है !"
    ऐसी परिस्थिति में विश्व स्तर पर चलाए जा रहे इतने बड़े बड़े अनुसंधानों के बाद भी इंडोनेशिया में भारी सुनामी आई जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है किंतु इसका न पूर्वानुमान पता लगाया जा सका और न ही इसके घटित होने का कारण ही पता लगाया जा सका है |केवल आशंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं जो आम आदमी भी व्यक्त कर लेता है किंतु इनमें समस्त संसाधनों से संपन्न विशेषज्ञ वैज्ञानिकों या उनके द्वारा किए जाने वाले अनुसंधानों का वैज्ञानिक योगदान आखिर क्या है ?
     वर्षा आँधी तूफ़ान आदि -
    मानसून आने जाने का कारण अलनीनो लानीना का प्रभाव जलवायुपरिवर्तन वायुमंडल में आर्द्रता घनत्व ग्लोबलवार्मिंग आदि अनेकों प्रकारों को वर्षा आँधी तूफ़ान आदि से संबंधित अध्ययनों में सम्मिलित किया जाता है किंतु जब आवश्यकता पड़ती है तब केवल उपग्रह से प्राप्त चित्र ही काम आते हैं जिनसे ये देख लिया जाता है कि बादल या आँधी तूफ़ान किस दिशा में किस गति से जा रहे हैं इस आधार पर ये कब कहाँ पर पहुँच सकते हैं | उसके अनुसार भविष्यवाणियाँ कर दी जाती हैं हवाओं का रुख यदि बदला तो भविष्यवाणियाँ गलत भी हो जाती हैं |ऐसी परिस्थितियों में बाकी सभी प्रकार के मौसम संबंधी अध्ययनों अनुसंधानों का उपयोग आखिर और क्या है ?  
    वायुप्रदूषण बढ़ने  के लिए बताए जाने वाले जिम्मेदार कारण !

      वायुप्रदूषण जब बढ़ने लग जाता है उस समय जहाँ कहीं भी धुआँ धूल आदि उड़ती दिखाई देती है उसे ही वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है |  
      दशहरे में रावण जलने को , दिवाली में पटाके जलने से,  होली में होली जलने से वायुप्रदूषण बढ़ता है ऐसा मान लिया जाता है | सर्दी में हवा के धीमे  चलने को ,गर्मी में हवा के तेज चलने को,धान काटने के समय पराली जलने को वायु प्रदूषण बढ़ने का कारण बता दिया जाता है !ऐसे ही ज्वालामुखी फटने या फ्रिज, एयर कंडीशनर और दूसरे कूलिंग मशीनों की सीएफसी गैसों के ऊत्सर्जन के कारण वायु प्रदूषण बढ़ना बताया जाता है | इसी प्रकार गाड़ियों के धुएँ से ,उद्योगों से। घर बनने से,ईंट भट्ठे चलने से,हुक्का पीने से,महिलाओं के स्प्रे करने से या भौगोलिक कारणों से वायु प्रदूषण बढ़ता है ऐसा भी कहा जाता है | 
    इस विषय में जितने भी कारण गिनाए या बताए जा रहे हैं वो किसी वैज्ञानिक अनुसंधान की उपज नहीं हैं ये केवल आधार विहीन कल्पना मात्र हैं यही कारण है कि इनके विषय में दृढ़ता पूर्वक यह नहीं कहा जा सकता है कि वायु प्रदूषण बढ़ने की सच्चाई यह है | वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार जब जो कारण बताए जाते हैं उस समय उन कारणों के बीतने पर भी वायु प्रदूषण बढ़ता दिखता है तो उन कारणों को छोड़कर दूसरे कारण पकड़ लिए जाते हैं | कई बार जो कारण बताए जाते हैं उनके रहते हुए भी वायु प्रदूषण घटने लगता है तो उसके लिए कोई अन्य कारण  गिना दिए जाते हैं |   
      इस प्रकार से वायुप्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार बताए जाने वाले कारणों की संख्या इतनी अधिक बताकर कर ऐसी भ्रम की स्थिति पैदा कर दी गई है कि किसी को इस बात का पता ही नहीं है कि वायु प्रदूषण बढ़ने के लिए जिम्मेदार वास्तविक कारण क्या हो सकते हैं जिन्हें रोकने के लिए सरकार के साथ साथ आम जनता भी अपने स्तर से प्रयत्न करे | 
      इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वायुप्रदूषण प्राकृतिक कारणों से बढ़ता है या इसके लिए मनुष्यकृत कारण जिम्मेदार हैं इस प्रश्न का उत्तर अभी तक किसी वैज्ञानिक अनुसंधान के द्वारा नहीं खोजा जा सका है | केवल तरह तरह की आशंकाएँ व्यक्त की जा रही हैं |ऐसी परिस्थिति में वायुप्रदूषण बढ़ने का कारण किसे माना जाए और क्यों माना जाए !किसी प्रक्रिया को कारण मानने के पीछे कुछ विश्वसनीय तर्क भी तो दिए जाने चाहिए किंतु ऐसा नहीं किया जा सका है |
    
इस विषय में विचारणीय बात यह है कि एक ही समय में बहुत सारे देशों शहरों में एक साथ ही वायु प्रदूषण बढ़ता है जबकि सभी जगह कारण एक जैसे नहीं होते हैं !दूसरा जो कारण बताए जाते हैं उनके समाप्त होने के बाद तो वायु प्रदूषण कम होना चाहिए किंतु ऐसा नहीं होता है तब तक दूसरे कारण गिना दिए जाते हैं ऐसे ही समय बीतता जाता है जब जब वायुप्रदूषण बढ़ता है तब तब कोई न कोई कारण बता दिए जाते हैं !
      यह स्थिति पर्यावरण और मौसम पर किए जा रहे हमारे अनुसंधानों की है !किसी विषय पर इतनी ढुलमुल बातों में विज्ञान कहाँ है और यदि इन्हें विज्ञान मानना प्रारंभ कर दिया जाएगा तो ऐसी आधारविहीन कल्पनाएँ तो कोई भी कर सकता है !इनके लिए विज्ञान की आवश्यकता क्या है ?

     मौसम भविष्यवाणियों  से किसानों को कितना लाभ हो पा रहा है ?
   वर्तमान समय में वर्षा संबंधी की जाने वाली भविष्यवाणियाँ अधिकतम पाँच दिन पहले तक के विषय में ही की जा सकती हैं जबकि दो दिन पहले तक के विषय में  की गई भविष्यवाणी ही सही होने की संभावना होती है क्योंकि रडारों उपग्रहों के द्वारा इससे अधिक दूर के बादल दिखाई ही नहीं पड़ पाते हैं |
    वर्षा संबंधी मौसम पूर्वानुमानों की सबसे अधिक आवश्यकता कृषिकार्यों के लिए दीर्घावधि मौसम पूर्वानुमानों के लिए होती है |किसानों को कृषि योजना बनाने के लिए वर्षा संबंधी पूर्वानुमान होने चाहिए कि आगामी वर्षा ऋतु में कैसी बारिश होगी | यदि अधिक बारिश होनी होती है तो वे धान आदि ऐसी फसलें बोने का चयन करते हैं जिन्हें अधिक बारिश की आवश्यकता होती है और यदि माध्यम बारिस होनी होती है तो मका आदि की फसलें बो दिया करते हैं यदि बहुत कम वर्षा की संभावना होती है तो गन्ना ज्वार बाजरा अरहर उड़द मूँग आदि कम पानी में हो जाने वाली फसलें बो दिया करते हैं |
      वर्षा के विषय में की गई कोई भविष्यवाणी यदि पाँच दिन पहले तक सही हो भी जाए तो वो किसानों के लिए किस किस प्रकार से कितनी लाभप्रद हो सकती है | 
      1. प्रायः किसान लोग मार्च अप्रैल में फसल तैयार होने के बाद रख रखाव की व्यवस्थाएँ कम होने के कारण या अपनी आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपनी उपज को आवश्यकता भर के लिए रखकर बाकी बेच लिया करते हैं इसके लिए उन्हें वर्षा ऋतु में होने वाली वर्षा के अनुशार निर्णय लेना होता है | वर्षा ऋतु में वर्षा जैसी होगी उसके अनुसार ही उस समय की फसल होगी स्वाभाविक है और अग्रिम फसल यदि अच्छी होने की संभावना होती है तब तो वो आनाज एवं पशुओं के लिए भूसा आदि का कम संरक्षण करते हैं क्योंकि उन्हें अगली फसल से सहारा हो जाता है और यदि ऐसा नहीं होता है तो उन्हें पूरे वर्ष के विषय में सोच कर निर्णय लेना होता है | इसलिए उन्हें वर्षा संबंधी पूर्वानुमानों की आवश्यकता आगे से आगे होती है | 
  2. अधिकाँश किसानों के खेत अलग अलग कई स्थानों पर होते हैं उनमें से कुछ ऊंचाई पर और कुछ निचले स्थानों पर होते हैं | ऊपर के खेतों में पानी रुकता नहीं है और नीचे वाले खेतों में पानी सूखता नहीं है ऐसी परिस्थिति में वर्षाऋतु में जैसी वर्षा होनी होती है किसान उसी के अनुसार ऊँचे नीचे खेतों में बीज बोने का निर्णय करते हैं इसलिए खेत में जितने समय तक फसल रहेगी तब तक बारिस की परिस्थिति कब कैसी रहेगी इसका पूर्वानुमान लगाकर उसके अनुसार ही फसल बोने का निर्णय लेना पड़ता है |इसके लिए उन्हें कुछ महीने आगे तक के वर्षा संबंधी पूर्वानुमानों की आवश्यकता होती है जबकि मौसम भविष्य वक्ता लोग दो तीन दिन पहले का ही मौसम पूर्वानुमान बता पाते हैं | 
  3. धान लगाने के लिए किसानों को लगभग 30 से 45 दिन पहले बीज बोने होते हैं उनसे बेड़ अर्थात धान के पौधों को तैयार होने में 30 से 45 दिन लग जाते हैं उसके बाद धान की रोपाई की जाती है | ऐसी परिस्थिति में यदि पाँच दिन पहले तक का पूर्वानुमान सही हो भी जाए तो वो किसानों के लिए कैसे और कितना लाभ परैड हो सकता है | 
      4 .  कई बार वर्षा ऋतु कुछ पहले समाप्त हो जाती है इसलिए बीज बोने के समय खेत सूख जाते हैं जिससे बीज उग नहीं पाते हैं | इसलिए उनमें पानी देकर पलेवा की जाती है|उसके 10 से 15 दिन के बाद खेत बोने लायक हो पाता है इस समय किसानों का एक एक दिन बहुमूल्य होता है | ऐसी परिस्थिति में यदि 10 दिन बाद वर्षा हो जाती है तो खेत लंबे समय तक गीला बना रहा है जिससे पलेवा में पैसा लगता है वो अलग इसके आलावा फसल बहुत पिछड़ जाती है जिसका असर उसकी पैदावार पर भी पड़ता है | ऐसे ही कई बार आलू आदि फसलों में एक ओर सिंचाई कर दी जाती है तो दूसरी ओर वर्षा भी हो जाती है एक ओर सिंचाई करने में पैसा लगता है तो दूसरी ओर पैदावार पर भी उसका असर पड़ता है | 
       ऐसी परिस्थिति में मौसम भविष्यवक्ता लोग दो या तीन दिन पहले की भविष्यवाणी कर पाते हैं इसके अतिरिक्त उनके पास ऐसी कोई तकनीक नहीं है जिसके आधार पर मौसम संबंधी भविष्यवाणी करके ऐसे परिस्थितियों में वे किसानों की मदद कर सकें |