Saturday, December 25, 2021

प्राकृतिक आकाशवाणियाँ

                     
 महामारी  और मौसम विज्ञान (वैदिक)                       
 
    प्राकृतिक आकाशवाणियाँ !

     प्राचीनकाल में प्राकृतिक घटनाओं के द्वारा दी जाने वाली सूचनाओं को आकाशवाणी कहा जाता था इसमें प्रकृति एवं जीवन से संबंधित सभी प्रकार की घटनाएँ सम्मिलित  होती हैं | ऐसी प्रकृति एवं जीवन से जुड़ी सभी प्रकार की घटनाएँ  प्रकृति एवं जीवन से संबंधित सभी प्रकार की सूचनाएँ हमेंशा देती रहती हैं | इन सूचनाओं के अभिप्राय को समझने वाले समयवैज्ञानिक लोग प्रकृति एवं जीवन से जुड़ी संभावित भावी घटनाओं के  विषय में पूर्वानुमान लिया करते हैं | प्राचीनकाल में  ऐसे प्रकृति साधकों की अधिकता थी इसलिए सभीप्रकार की प्राकृतिक आपदाओं के विषय में पूर्वानुमान लगा लिया जाता था | ऐसी आपदाओं से बचाव के लिए आगे से आगे उपाय खोज लिए जाते थे | पहले से पता  हो जाने के कारण कुछ में बचाव संभव हो पाता था जबकि कुछ में सहने के लिए तैयार हो  जाया जाता था |

         प्रकृति एवं जीवन से संबंधित सभीप्रकार की घटनाओं के घटित होने का कोई न कोई समय होता है सर्दी गर्मी वर्षा आदि ऋतुएँ भी प्राकृतिक घटनाएँ ही तो हैं इनका क्रम समय अवधि आदि सब कुछ सुनिश्चित होता है जब जिस प्रकार की ऋतु आती हैं तब प्रकृति वैसा व्यवहार करने लगती है | शिशिर ऋतु में जो प्रकृति बर्फ बरस  रही होती है ठंडी ठंडी हवाएँ चल रही होती हैं भीषण ठंड से लोग काँप रहे होते हैं | बिना किसी मनुष्यकृत प्रयास के बाद भी वही प्राकृतिक वातावरण आग उगलने लगता हैं तापमान बढ़ चुका होता है चारों ओर गरम गरम हवाएँ चल रही होती हैं आदि | ऐसे ही गर्मी की ऋतु में नदी तालाब कुएँ आदि प्रायः सूखने लग जाते हैं उसी के कुछ समय बाद इतनी अधिक वर्षा हो जाती है कि वे सब भर जाते हैं |इसमें भी मनुष्यकृत प्रयासों की कोई भूमिका ही नहीं होती है |कुल मिलाकर संपूर्ण प्रकृति ही समय का अनुगमन कर रही है जब जैसा समय चलता है तब तैसा प्राकृतिक वातावरण बनता बिगड़ता रहता है |प्राकृतिक वातावरण का प्रभाव जीवन पर पड़ता है उसी के अनुसार प्राणियों के स्वास्थ्य बनते बिगड़ते देखे जाते हैं | प्राकृतिक वातावरण का संतुलन थोड़ा बिगड़ने से रोग और अधिक बिगड़ने से महारोग अर्थात महामारियों का जन्म होता है |

     प्राकृतिक वातावरण बनने बिगड़ने का कारण समय होता है समय तो बनते बिगड़ते दिखाई नहीं पड़ता है प्रकृति में होने वाले बदलाओं को देखकर ही समय के बनने बिगड़ने का अनुमान लगा लिया जाता है |प्राकृतिक वातावरण का संतुलन जब बहुत अधिक बिगड़ने लग जाए अर्थात शिशिर ऋतु में सर्दी बिल्कुल न पड़े या बहुत अधिक पड़े में ,ग्रीष्म ऋतु में गर्मी की यही स्थिति रहे और वर्षाऋतु में वर्षा का भी संतुलन बहुत अधिक बिगड़ जाए | बार बार भूकंप सुनामी जैसी घटनाएँ घटित होने लगें | वातावरण प्रदूषित होने लगे ,घोर गर्जना के साथ बार बार बादल फटने की घटनाएँ घटित हों ,हिंसक बज्रपात होने लगे | ऐसे ही परिवर्तन नदियों तालाबों समुद्रों आदि में होते दिखाई देने लगें, वृक्षों बनस्पतियों आदि के  स्वभाव प्रभाव में आकस्मिक बदलाव आने लगें | ग्रहों नक्षत्रों नभ मंडल आदि के रंग रूप चाल ढाल में अस्वाभाविक बदलाव होते दिखाई दे तो उसी के अनुशार महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं को अपने समीप आया हुआ समझना चाहिए |

      प्राकृतिक वातावरण को समय चक्र से प्रभावित होना ही होता है वो इससे प्रभावित हुए बिना बच नहीं सकता है | समय का विराट चक्र अनादि काल से निरंतर घूमते रहता है या कभी थकता और रुकता नहीं है | इसके घूमने या रुकने का आदि अंत किसी को पता भी नहीं है यह उसी को पता होगा जिसे समय की शुरुआत का वह विंदु पता होगा जब समय प्रारंभ हुआ था आदि काल में समय के शुरूआती उसी क्षण के साथ जिन प्राकृतिक घटनाओं को वे सभी भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान महामारी आदि प्राकृतिक घटनाएँ उसी समय सूत्र में पिरोई हुई हैंउसी के अनुसार वे सभी भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफ़ान महामारी आदि घटनाएँ आज तक अपने अपने समय पर घटित होती चली जा रही हैं आगे भी  जब तक  सृष्टि है तब तक ऐसा  ही होता चला जाएगा | ऐसी परिस्थिति में उन प्राकृतिक घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान लगाने  के लिए या तो समय का वह आदि विंदु पता हो या फिर वर्तमान समय   घटना को देखकर उसके अनुसार दूसरी अन्य घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है |उन घटनाओं से प्राप्त सांकेतिक चिन्हों को पकड़ते हुए उन्हीं के आधार पर भावी प्राकृतिक घटनाओं के विषय में पूर्वानुमान लगा लिया जाता है | इन्हीं सूचनाओं  को प्राचीनकाल में आकाश वाणी कहा जाता था | प्रकृति कभी प्रत्यक्ष बोलती  नहीं है |                                                  जीवन  और   प्राकृतिक  घटनाएँ 

    भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफान आदि घटनाएँ अक्सर घटित होती रहती हैं महामारियाँ भी आते जाते देखी ही जाती हैं | ऐसी सभी दुर्घटनाओं में एक ही प्रकार से बहुत लोग प्रभावित होते हैं किंतु उस आपदा से पीड़ित होने वालों की संख्या आपदाप्रभावित संपूर्ण पीड़ितों की अपेक्षा काफी कम होती है | पीड़ित होने वालों  में भी कुछ तो सामान्य चोट चभेट खाए हुए होते हैं जो शीघ्र स्वस्थ हो जाते हैं | कुछ गंभीर चोट खाने के कारण उन्हें दीर्घ कालीन चिकित्सा का सहारा लेना पड़ता है जबकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनकी दुर्भाग्य पूर्ण मृत्यु होते देखी जाती है उसी दुर्घटना में एक जैसी परिस्थित का सामना करने वाले कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें खरोंच तक नहीं लगती अपितु वे पूरी तरह से स्वस्थ बने बचे रहते हैं |ऐसी परिस्थिति में एक समय में घटित होने वाली एक प्रकार की प्राकृतिक  आपदा  में एक जैसे शिकार हुए लोगों में से कुछ लोग पूरी तरह स्वस्थ बने रहते हैं जबकि कुछ लोगों की मृत्यु तक हो जाती है | परिणामों में इतना बड़ा अंतर होने कारण खोजा जाना इसलिए आवश्यक है |        

    कोरोना जैसी महामारियों में या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं में रोगी हुए या मृत्यु को प्राप्त हुए  लोगों  के इस परिस्थिति में पहुँचने  के लिए अज्ञानवश  दोष  महामारियों या भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं का दिया जाता है | हमें ऐसा लगता है कि इस प्रकार की प्राकृतिक आपदा या  महामारी आदि यदि न आई होती तो संभवतः उतने  लोगों की जान बच जाती अर्थात वे मृत्यु को प्राप्त नहीं होते |

     ऐसी परिस्थिति  में हमें याद रखना चाहिए कि उन लोगों के पीड़ित होने या मृत्यु होने के लिए जिम्मेदार कारण रूप में जिन प्राकृतिक आपदाओं या कोरोना जैसी महामारियों को  माना जाता है यदि वास्तव में वही  जिम्मेदार होते तो ऐसी घटनाओं से पीड़ित सभी लोगों को किसी एक प्रकार के परिणामों का सामना करना पड़ता जबकि ऐसा होते नहीं देखा जाता है |

     इससे यह बात  पूरी तरह स्पष्ट  हो जाती है कि ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ या कोरोना जैसी महामारियाँ स्वतंत्र प्राकृतिक घटनाएँ होती हैं इनसे किसी की मृत्यु होने  या न होने का कोई संबंध नहीं होता है |इतना अवश्य है कि ये दोनों प्रकार की घटनाएँ संयोगवश उसी प्रकार से  एक साथ घटित हो रही होती हैं जिस प्रकार से सूर्योदय  होना और उसी समय कमल का खिलना या अमावस्या पूर्णिमा  तिथियों का आना और उसी समय ज्वार भाटा जैसी प्राकृतिक घटनाओं का घटित होना | उन दोनों प्रकार की घटनाओं का संबंध आपस में एक दूसरे से न होकर अपितु

 समय के उस विंदु से होता है | पृथ्वी से आकाश की  ओर देखते समय कई बार चंद्र आदि कुछ ग्रह नक्षत्र बिल्कुल पास पास से निकलते दिखाई देते हैं जबकि वे आपस में  दूसरे से बहुत दूर दूर होते हैं केवल दिखाई पास पास दे रहे होते हैं |  इसी प्रकार से भूकंप वर्षा बाढ़ आँधी तूफान आदि घटनाओं या कोरोना जैसी महामारियों के घटित होने और  उसी समय कुछ लोगों की मृत्यु जाने जैसी दोनों प्रकार की घटनाओं को एक साथ जोड़कर देखा जाना ठीक नहीं है | 
                                         बुरे समय का प्रभाव और मनुष्य जीवन !
       इसमें  विशेष बात यह है कि बुरे समय का प्रभाव प्रकृति पर पड़ने से यदि प्रकृति में उथल पुथल मच जाती है जिससे प्राकृतिक वातावरण बिगड़कर प्राकृतिक आपदाओं का स्वरूप धारण कर लेता है तो उसी बुरे समय का प्रभाव  उसी वातावरण में  विद्यमान प्राणियों पर भी अनुपात मेंअनुपात मेंउतने ही अनुपात में पड़  रहा होता है | ऐसी परिस्थिति में प्रकृति की अपेक्षा  प्राणियों  के शरीर तो अधिक सुकोमल और सुकुमार होते हैं इसलिए वो तो रोगी हो ही सकते हैं |  
                                  
    जिस बुरे समय का प्रभाव प्राकृतिक वातावरण पर पड़ने के कारण भूकंप आँधी तूफ़ान बाढ़  या महामारी आदि घटनाएँ घटित होती हैं उसी बुरे समय का प्रभाव प्राणियों पर पड़ने से मनुष्य आदि सभी जीव जंतु रोगी होने लग जाते हैं कुछ लोगों की दुर्भाग्य पूर्ण मृत्यु भी हो जाती है | प्राकृतिक आपदाएँ जिस समय घटित हो रही होती हैं उसी समय मनुष्य पीड़ित होते हैं संक्रमित होते हैं मृत्यु को प्राप्त होते हैं | इन दोनों घटनाओं के एक ही समय में घटित होने पर भी इन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं होता है |

     किसी स्थान पर एक ग्लास पानी रखा है वहीं कटोरी में घी रखा है वहीं कुछ कपड़ा रखा है वहीं एक बकड़ी बाँध दी जाए और इन सबके बीचों  बीच में आग जला दी जाए तो पानी गर्म हो जाएगा घी पिघल जाएगा कपडा जल जाएगा बकड़ी गर्म लगने से उछलकूद करने लगेगी | उस एक आग का उष्ण प्रभाव पड़ने से प्रत्येक पदार्थ में अलग अलग प्रतिक्रिया दिखाई दी किंतु किसी एक पदार्थ पर दिखी प्रतिक्रिया का दूसरे पदार्थ में हो रही प्रतिक्रिया से कोई संबंध नहीं होता है | जैसे ग्लास का पानी आग के  कारण गर्म हुआ  है  न कि घी पिघलने के कारण !इसी प्रकार से कपडा आग से जला है घी पिघलने या बकड़ी के उछलकूद करने से नहीं आदि | 
      ऐसी परिस्थिति में यह तो निश्चित हो ही जाता है कि गर्म हुए ग्लास के जल में ,पिघले घी में,जलते कपडे में या बकड़ी के उछलकूद करने की क्रिया में एक दूसरे से कोई आपसी संबंध भले ही न हो किंतु प्रकारांतर से इनका आपसी संबंध सिद्ध होता है | पानी के गर्म होने या घी के पिघलने का मतलब उसे कहीं ताप का संयोग प्राप्त हुआ है कपडे के जलने का मतलब अग्नि का संयोग है बकड़ी की बेचैनी के अनेक कारण हो सकते हैं इनमें से एक कारण अग्नि का संयोग या ताप भी हो सकता है | ऐसी परिस्थिति में लक्षणों के आधार पर यहाँ अग्नितत्व की उपस्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है |

      हमारे कहने का मतलब जिस प्रकार से आग के संयोग से विभिन्न पदार्थों में अलग अलग बदलाव देखने को मिलते हैं उसी प्रकार से अच्छे या बुरे समय का प्रभाव भिन्न भिन्न तत्वों या शरीरों पर अलग अलग पड़ता है बुरे समय का प्रभाव पृथ्वी पर पड़ता है तो भूकंप आते हैं,वायु पर पड़ता है तो आँधी तूफ़ान चक्रवात वायु प्रदूषण जैसी घटनाएँ घटित होती हैं  बुरे समय का प्रभाव जल तत्व पर पड़ता है तो कहीं सूखा कहीं बाढ़ कभी बादलों का फटना तो कभी ओले गिरने जैसी घटनाएँ घटित होते दिखाई पड़ती हैं | इसी बुरे समय का प्रभाव अग्नि तत्व पर पड़ने से तापमान का अचानक बढ़ना घटना आग लगने की घटनाएँ देखने को मिलती हैं | ऐसे समय का प्रभाव आकाश तत्व पर पड़ने से आकाश का वर्ण धूमिल होना तारों का  टूटना अनपेक्षित शब्द सुनाई देना | आकाश में गन्धर्व नगर दिखाई देना जैसी विकृतियाँ दिखाई पड़ती हैं |

     जिस बुरे समय का प्रभाव प्रकृति पर पड़ने से भूकंप आँधी तूफ़ान बाढ़  या महामारी आदि दुर्घटनाएँ घटित होती हैं  बुरे समय का वही प्रभाव जब प्राणियों पर पड़ता है तब वे संयम सदाचार शिष्टाचार  सत्यभाषण सहयोग सम्मान स्नेह उदारता ईमानदारी की भावना भूलकर भ्रष्टाचार उन्माद, ईर्ष्या, द्वेष, कलह, हिंसा, चुगली,  आलस्य झगड़ालूपन  आदि दोषों से अपनी प्रतिरोधक क्षमता नष्ट कर लिया करते हैं जिससे इनकी शारीरिक क्षमता एवं आयु का तेजी से क्षय होने लगता है ऐसी परिस्थिति में ये स्वयं ही ऐसे असाध्य रोगों से ग्रस्त होने लगते हैं जिनपर औषधियों का कोई असर ही नहीं होता है | ऐसे लोग रोगी होने एवं मृत्यु को प्राप्त होने लगते हैं | 
     असाध्य रोगों का मतलब जिन पर औषधियों का प्रभाव ही न पड़े !असाध्य रोगों के होने का पहला कारण तो पूर्वजन्म कृत कर्म होते हैं दूसरा हमने जो जो कुछ खा पीकर अपने शरीर को धारण कर रखा है वह खान पान की सामग्री जिस धन से ली गई है वह धन यदि सदाचरण एवं परिश्रम पूर्वक ईमानदारी से नहीं कमाया गया होता है तो वो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता विनष्ट करते हुए शरीरों को रोगी बनाने लगता है | उसी प्रकार के धन से चिकित्सा की या करवाई जाती है इसलिए उन लोगों पर उसी चिकित्सा के अच्छे परिणाम नहीं निकल पाते हैं जैसे कि कुछ दूसरे सदाचारी संयमी लोगों पर देखे जाते हैं | 
      किसी जंगल में पेड़ों की आपसी रगड़ से जो आग लगती है उसे बाहरी जल से शांत करना अत्यंत कठिन होता है क्योंकि वे ज्वलनशील कारण उस जंगल में विद्यमान ही होते हैं ऐसी परिस्थिति में ऐसी आग को किसी बाहरी प्रयास से शांत कर भी दिया जाए तो जंगल के आतंरिक  कारणों  से आग पुनः प्रकट होकर उस जंगल को जला देती है | 
      इसीप्रकार से आयुक्षय अथवा सदाचरण भ्रष्ट अवस्था से जूझ रहे शरीर का प्रत्येक अंग उस दहन शील ईंधन की तरह होता है जिसे रोग रूपी कोई छोटी से छोटी चिंगारी मिलते ही रोगों के समूहरूपी आग की बड़ी बड़ी लपटें निकलने लगती हैं ऐसी विकराल आग को शांत करने के लिए  एक ओर औषधिरूपी जल डाला जाता है तो दूसरी और से दूसरी लपट रूपी नई बीमारी निकल आती है |यह सिलसिला तब तक चलता रहता है जब तक शरीर रूपी ईंधन  बना रहता है शरीर रूपी ईंधन समाप्त होते ही  ऐसी मृत्युरूपी भयंकर आग स्वतः पर ही शांत होती है |
                                             प्राकृतिक आपदाएँ और मनुष्य जीवन      
    बुरे समय का प्रभाव प्रकृति पर पड़ने से भूकंप आँधी तूफ़ान बाढ़  या महामारी आदि दुर्घटनाएँ तो घटित हो सकती हैं किंतु प्रकृति पर पड़ने वाले बुरे समय के प्रभाव से लोग रोगी होने लगें या लोगों की मृत्यु होने लगे ऐसा आवश्यक नहीं है क्योंकि उनका अपना जीवन उनके भाग्य और कर्मों पर आश्रित होता है वे प्राकृतिक आपदाओं के भरोसे नहीं अपितु अपने संयम सदाचार शिष्टाचार  सत्यभाषण सहयोग सम्मान स्नेह उदारता ईमानदारी आदि के बल पर स्वस्थ सुखी और जीवित रह रहे होते हैं | 
    भूकंप एवं महामारी जैसी घटनाएँ और मनुष्य जीवन दोनों बिल्कुल अलग अलग परिस्थितियाँ हैं जिस प्रकार से चार बड़े बड़े लोग तेजी से पैदल चले जा रहे हों उनके साथ ही एक बच्चा भी चल रहा हो किंतु उतनी तेजी से न चल पाने के कारण पिछड़ जाने पर वह दौड़ कर उन लोगों के पास पहुँच जाता हो इसके बाद बराबर आ जाने पर फिर चलने लगता हो पिछड़ जाने पर फिर दौड़कर उनके बराबर चलने लगता हो | वही स्थिति समय का अनुगमन करने वाले प्राकृतिक तत्वों की है समय तो कभी रुकता नहीं है अपितु हमेंशा चला करता है किंतु हवाएँचलने  वर्षा होने या भूकंप आने अथवा महामारी फैलने की घटनाएँ एक जैसी हमेंशा तो नहीं घटित होती रहती हैं ये तो कभी कभी ही घटित होती हैं ऐसी परिस्थिति में ये कई बार समय की गति से काफी पिछड़ जाती हैं तब ऋतुओं का चक्र पिछड़ने लगता है मानसून आने जाने का समय बदलता प्रतीत होता है आदि आदि | इस प्रकार से समय से पिछड़ जाने पर तेज हवाएँ आँधी तूफ़ान आदि चल कर हवाएँ समय का साथ पुनः पकड़ती हैं ऐसे ही अधिक वर्षा होकर वर्षा की मात्रा पूरी करती है भूकंपों के माध्यम से पृथ्वी अपना संतुलन व्यवस्थित करती है | 
    ऐसे समय में जब पंचतत्व अपने को भूकंप आँधी तूफ़ान बाढ़  महामारी आदि घटनाओं के माध्यम से अपने को संतुलित कर रहे होते हैं उस समय उनके संपर्क में आ जाने वाले लोगों के साथ अक्सर दुर्घटनाएँ घटित होते देखी  जाती हैं |किसी गाड़ी के साथ चलने वाली कोई दूसरी गाड़ी यदि उससे पिछड़ जाए तो उसे अपनी गति बढ़ानी पड़ती है ऐसी परिस्थिति में गाड़ी गति अत्यंत तेज हो जाने के कारण धचके तेज लगने से अंदर बैठे लोग इधर उधर लुढ़क जाते हैं कई बार चोट भी लग जाती है कई बार धक्का तेज लग जाने से मृत्यु भी होते देखी जाती है | इसी प्रकार से गाड़ी की गति अत्यंत तेज होने पर दुर्घटना की संभावना अधिक रहती है उससे टक्कर खाकर कई लोग चुटहिल हो जाते हैं कुछ लोगों की तो दुर्भाग्य पूर्ण मृत्यु भी होते देखी जाती है गाड़ी की तेज गति के कारण ऐसी दुर्घटनाएँ घटित भले होती हैं किंतु गाड़ी का उद्देश्य लोगों को चुटहिल करना या उनकी मृत्यु का कारण बनना न होकर अपितु अपना संतुलन बनाना होता है | 
   इसीप्रकार से भूकंप आँधी तूफ़ान बाढ़  महामारी आदि प्राकृतिक घटनाएँ अपना अपना संतुलन सुधारने के लिए घटित होती हैं इनका उद्देश्य प्राणियों को परेशान करना नहीं होता है | भाग्य पीड़ित प्राणी यदि इनके चपेट में आ जाते हैं तो उनके रोगी होने या मृत्यु का बहाना ऐसी घटनाएँ भले बन जाती हैं जबकि ऐसी घटनाओं की चपेट में आते वही लोग हैं समय की दृष्टि से जिनका अपना जीवन पूरा हो पूरा होता है | 
    कुल मिलाकर भूकंप आँधी तूफ़ान बाढ़  महामारी सभी प्रकार की प्राकृतिकघटनाएँ ऋतुओं की तरह ही एक निश्चित कालखंड के बाद आती जाती रहती हैं यह क्रम इनका हमेंशा से चला आ रहा है | जिस प्रकार से किसी देश में सरकारों के द्वारा सुविधा के लिए ट्रैनें  चलाई जाती हैं वे अपने उसी निर्धारित समय से आती और जाती रहती हैं उनका उद्देश्य परिवहन की कठिनाइयों को कम करके उन्हें सुख सुविधा पहुँचाना होता है | उनके आने और जाने का समय निश्चित होता है यदि उसी समय कोई आकर उस ट्रेन से टकराकर घायल हो जाए या मृत्यु को प्राप्त हो जाए इसका मतलब यह कतई नहीं कि ट्रेनें लोगों को चुटहिल करने या मारने के लिए चलाई जाती हैं | 
    जिस प्रकार से ट्रेनों का चलना और उनसे टकराकर लोगों का घायल होना या मर जाना बिल्कुल अलग अलग घटनाएँ हैं उसी प्रकार से भूकंप आँधी तूफ़ान बाढ़  महामारी सभी प्रकार की प्राकृतिक घटनाओं का घायल होने वालों एवं मृत्यु प्राप्त करने वालों से कोई संबंध नहीं होता है | 

                                                 महामारी और मनुष्यकृत प्रयास    

       कोरोना जैसी महामारी  में भी यदि मनुष्यकृत प्रयासों से कुछ अंकुश लगा पाना यदि संभव  ही होता तो दो वर्ष का समय कोई कम तो नहीं होता है | वैज्ञानिकों ने अत्यंत परिश्रम पूर्वक जो वैक्सीन बनाई है सरकारों ने उसे जन जन तक पहुँचाने में सराहनीय तत्परता दिखाई है | पहले एक  खुराक  दी गई फिर दूसरी खुराक दी गई बताया तो यहाँ तक जा रहा है कि कुछ लोगों ने तीसरी खुराक भी ले ली है इसके बाद भी वे संक्रमित होते देखे  जा रहे हैं | यदि वास्तव में किसी रोग की कोई औषधि खोज ली जाती है उसका प्रभाव उस रोग के रोगियों पर दिखाई भी पड़ता है चिकित्सकों ने बहुत सारे रोगों पर ऐसे प्रयोग करके दिखाए भी हैं किंतु तीन तीन डोज लगा लेने वालों को भी वैक्सीन के बल पर ऐसा कोई  स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया जा सका है कि उन्हें अब कोरोना से कोई खतरा नहीं है | जहाँ तक बात महामारी के समाप्त होने की है तो प्रत्येक रोग के  समाप्त होने की कोई न कोई अवधि तो होती ही है यदि किसी रोग पर औषधि का कोई प्रभाव होना ही है तो औषधि लेते ही वह प्रभाव तुरंत दिखना चाहिए | यदि ऐसा नहीं होता है और रोग अपनी अवधि पर ही समाप्त होता है तो औषधिदान की  भूमिका ही कैसे सिद्ध हो सकेगी | यदि इसी प्रकार से बार बार वैक्सीन आदि प्रयोगों की आवृत्तियाँ जाती रहीं तो जब ऐसे 'समयज' रोग अपने  आप से जब समाप्त होते हैं उस समय जो औषधियाँ दी जा रही होती हैं भ्रम वश  उन्हीं औषधियों को उन रोगों की औषधि मान लिया जाता है | चेचक पोलियो कोरोना जैसे महारोग समय के साथ एक बार आए और समय  के साथ ही चले गए ऐसे महारोगों की आवृत्तियाँ तो सदियों में कभी होती हैं | इसलिए वहाँ तो औषधि संबंधी भ्रम बना रहता है किंतु डेंगू जैसे जो 'समयज' रोग प्रतिवर्ष अपने समय के साथ एक निश्चित समय पर आते और जाते हैं जिन औषधियों से उनकी चिकित्सा की जाती है यदि अगले वर्ष डेंगू न आता तो उन्हीं औषधियों को डेंगू की औषधि मान लिया जाता किंतु इस वर्ष डेंगू  समाप्त होने पर इसका श्रेय जिन औषधियों को दिया जा रहा होता है वही औषधियाँ अगले वर्ष अपना प्रभाव दिखाकर डेंगू को नियंत्रित क्यों नहीं कर पाती हैं तब भी तो डेंगू अपने समय से ही जाते देखा जाता है | 
      ऐसी परिस्थिति में कोरोना महामारी को भी यदि अपने समय से ही समाप्त होना है तो उसके लिए किसी औषधि आदि की आवश्यकता ही क्या है ?जिन देशों में ओमीक्रोन बहुत बढ़ते बताया जा रहा है वैक्सीन तो वहाँ भी लगाई ही गई है आखिर उस प्रकार का रौद्ररूप वहाँ क्यों देखा जा रहा है वैक्सीन बल से उन्हें सुरक्षित कर पाना संभव क्यों  नहीं हो पाया है |
    इसलिए जिस किसी भी औषधि का प्रयोग किया जाता रहा तो जब रोग समाप्त होगा तो इसका श्रेय भी उसी औषधि को दिया जाएगा किंतु  ऐसी महामारी पर अंकुश लगापाना जिस किसी भी औषधि से संभव हो उसका प्रभाव समाज के अनुभव में भी तो  प्रमाणित होना चाहिए | 
       यदि ये माना जाए कि वैक्सीन लगने से लोग संक्रमित तो होंगे किंतु संक्रमण का स्तर पहले से कम होगा तब तो बहुत लोग ऐसे भी होंगे जिन्हें वैक्सीन नहीं लगी है किंतु वे पूरी तरह से स्वस्थ हैं उन पर वैक्सीन का प्रभाव तो नहीं कहा जाएगा | ऐसी परिस्थिति में जिन्हें वैक्सीन लगी और जिन्हें नहीं लगी उनकी कुछ तो अलग पहचान होनी चाहिए |  जिन्हें वैक्सीन की दो या तीन डोज लग चुकी है या बूस्टर डोज लग चुकी है क्या उनके विषय में ऐसा कोई आश्वासन दिया जा सकता है कि वैक्सीन न लगाने वालों की अपेक्षा वैक्सीन लगाने वाले अधिक सुरक्षित रहेंगे इसी प्रकार से और भी जो लोग हैं
                                  
                         स्वास्थ्य समस्याएँ और वैज्ञानिक अनुसंधानों का योगदान !

 
    मनुष्यों को केवल ऐसे शारीरिक रोगों से ही नहीं जूझना पड़ता है जो समय समय पर उत्पन्न होते और शांत होते रहते हैं अपितु उन रोगों से भी जूझना होता है जिनके उत्पन्न होने का कोई कारण ही नहीं समझ में आता है उन पर चिकित्सा आदि उपायों का भी प्रभाव नहीं पड़ता !जब वे प्रारंभ होते हैं तब उनका स्वरूप बहुत छोटा अर्थात सामान्य सा लगता है चिकित्सक भी उसी दृष्टि से चिकित्सा प्रारंभ करते हैं किंतु जैसे जैसे समय बीतता जाता है वैसे वैसे चिकित्सकों की सघन देखरेख में रहते हुए भी वह रोग बढ़ता चला जाता है कई बार तो एक निश्चित समय तक रहने के बाद उससे मुक्ति मिल जाती है कई बार ऐसे रोग जीवन लेकर ही समाप्त होते हैं जबकि चिकित्सा रोग होने के पहले दिन से ही प्रारंभ की जा चुकी होती है उससे रोगी को कितनी मदद पहुँचाई जा सकी और उन पर चिकित्सा हुए सकारात्मक चिकित्सा परिणामों का कैसे अनुमान लगाया जा सकेगा | सामान्य समझ तो यही है कि ऐसे रोगियों पर चिकित्सकीय प्रयास असफल हुए हैं क्योंकि चिकित्सा प्रारंभ होने के बाद ही वे रोग बढ़े होते हैं मनुष्यों को ऐसी समस्याओं से भी जूझना होता है | क्या रोग प्रतिरोधक क्षमता द्वारा या वैज्ञानिक प्रयासों  के द्वारा ऐसे शारीरिक संकटों से बचाव होना संभव है ?    
     महामारी आदि स्वास्थ्य संबंधी संकटों का अंत यहीं नहीं हो जाता है अपितु कई बार भूकंप बाढ़ आँधी तूफ़ान बज्रपात जैसी घटनाएँ घटित होती हैं जिनकी चपेट में आकर बहुत लोग घायल हो जाते हैं उनमें से कुछ लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु भी हो जाती है | महामारी  की तरह ही ऐसे स्वास्थ्य संकटों से बचाव के लिए भी क्या पहले से ऐसा कोई उपाय करके रहा जा सकता है जिससे ऐसे संभावित स्वास्थ्य संबंधी संकटों से अपना बचाव किया जा सके ?
      कई बार कोई दूसरे व्यक्ति के द्वारा किए गए किसी घातक प्रहार से ,बिषप्रयोग से या अन्य हिंसक प्रयास कोई चोट पहुँचा दी जाती है उसकी हत्या कर दी जाती है जिसमें उस व्यक्ति का कोई दोष ही नहीं होता है |  लोगों को ऐसे स्वास्थ्य संकटों से बचाव के लिए हमारे वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा क्या कोई रास्ता खोजा जा सका है ? 
    कई बार किसी हिंसक या जहरीले जीव जंतु के प्रयास से किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य संकट में पड़ जाता है उससे बचाव के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा क्या कोई उपाय खोजा जा सका है जिससे मनुष्यों का प्रयास पूर्वक ऐसे स्वास्थ्य संकटों से बचाव हो सके | 
      कभी कभी अनजाने में हुई मनुष्यों की अपनी गलतियों से कोई चोट चभेट आदि लग जाती है कुएँ में गिर जाने से धोखे से बिजली के तार छू लेने आदि से घायल हो जाते हैं या मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं ऐसे संभावित संकटों से बचाव के लिए अनुसंधानों के द्वारा क्या कोई उपाय खोजे जा सके हैं | 
    कई बार लोग अपने प्रयासों के असफल होने पर ,प्रिय जनों का वियोग होने पर अभिलाषाओं की पूर्ति न होने,या अभिलषित  पद प्रतिष्ठा न मिल पर या अपयश के भय से या भविष्य को लेकर तमाम चिंताएँ बढ़ जाने से या प्रियजनों से विश्वासघात पाकर आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाकर अपने को घायल कर लेते हैं या समाप्त कर लेते हैं ऐसे लोगों के बचाव के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा क्या कोई अग्रिम उपाय खोजे जा सके हैं जिससे ऐसी संभावित दुर्घटनाओं को टाला जा सकता है |
      कुछ लोग अनजाने में ऐसी दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं जिनमें बहुत लोग एक साथ पीड़ित होते हैं जिनसे जीवित बचने की संभावना कम होती है फिर भी एक आध लोग यदि जीवित बच जाते हैं हैं तो उसे कुदरत का चमत्कार मान लिया जाता है आखिर उनका  बचाव होने का कारण वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा क्या कोई खोजा जा सका है | 
    कुलमिलाकर जीवन  में कई बार स्वास्थ्य संबंधी कुछ ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं जिनसे बचाव के लिए अपने खान पान रहन सहन में कुछ अग्रिम बदलाव लाकर उस प्रकार की  घटनाओं से  बचा  जा सकता है इसलिए रोग प्रतिरोधक क्षमता या अग्रिम उपाय करके ऐसे कुछ  रोगों से भले बच लिया जाए किंतु बहुत बड़ी  संख्या  उन रोगों समस्याओं  संकटों की भी है जिनसे स्वास्थ्य संकट तो पड़ता है यहाँ तक कि कई बार जीवन भी समाप्त जाता है  ऐसे संभावित स्वास्थ्य संकटों से बचाव के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा ऐसा क्या खोजा जा सका है जिसका अनुपालन करके स्वास्थ्य संकटों से बचाव हो सकता हो | 
     चिकित्सासंबंधी अनुसंधानों का उद्देश्य कुछ स्वास्थ्य  संकटों से  सुरक्षा करना न होकर अपितु संपूर्ण स्वास्थ्य संकटों का समाधान खोजना  होता है | इसके लिए अग्रिम प्रयास तो ऐसे किए  जाने चाहिए कि शरीर रोगी ही न हो और यदि रोगी हो भी जाए तो रोग के प्रारंभिक काल में उत्तम चिकित्सा से  शरीर रोग मुक्त हो जाए यदि ऐसा न हो सके तो उत्तम चिकित्सा का लाभ मिल जाने के बाद रोग बढ़ना बंद  हो जाए | चिकित्सकीय वैज्ञानिक अनुसंधानों से इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है | 
     अग्रिम उपायों का मतलब ही यही है कि छतरी ले लेने  के बाद वर्षा से कुछ तो बचाव होना ही चाहिए | छाता  लेने के बाद भी यदि भीगना ही है तो वर्षा से बचाव के लिए छतरी की कोई भूमिका ही नहीं रही | 
      कोरोना महामारी के समय बचाव के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान कर्ताओं के द्वारा जो उपाय बताए गए उनका अच्छी प्रकार से पालन जिन लोगों ने किया उन्हें उससे कुछ लाभ तो होना ही चाहिए था किंतु यदि इसके बाद भी वे संक्रमित होते देखे जाएँ तो उन उपायों पर संशय होना स्वाभाविक ही है | 
      इसके बाद वैज्ञानिक अनुसंधान कर्ताओं के द्वारा कोरोना महामारी से बचाव के लिए जो वैक्सीन आदि औषधियों का अग्रिम उपाय बताया गया उसकी दोनों डोज लगा लेने  के बाद भी यदि वह व्यक्ति संक्रमित हो जाता है तो वैक्सीन से हो रहे लाभ का अंदाजा कैसे लगाया जाए कि उससे कोई लाभ हो भी रहा है या नहीं |अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस आदि में जनवरी 2022 में देखे जा रहे कोरोना विस्फोट के कारण क्या हैं उन लोगों ने तो दो दो डोज लगवा रखी है कुछ तीन डोज लेने वाले भी तो संक्रमित होते देखे गए हैं | 
     दिल्ली में दोनों डोज लेने के बाद उसकी सर्टिफिकेट देकर विदेशविदेश जाने की अनुमति पा चुका कोई व्यक्ति यदि जाते समय के परीक्षण में संक्रमित पाया जाता है तो वैक्सीन के प्रभाव पर संशय होना स्वाभाविक है |
    संक्रमितों की संख्या कम होने का श्रेय जो लोग वैक्सीनेशन को देते हैं उन्हें वैज्ञानिक दृष्टि से यह भी सोचना चाहिए मई जून 2020 में बिना किसी वैक्सीनेशन के संक्रमितों की संख्या इतनी ज्यादा  कम  हो गई थी कि वैक्सीन के परीक्षण के लिए रोगी नहीं मिल पा रहे थे | उस समय तो वैक्सीनेशन का पता भी नहीं था | 
       ऐसी परिस्थिति में  इस प्रकार के उपायों से कुछ लाभ होता  भी है या नहीं नहीं वैज्ञानिक अनुसंधान कर्ताओं के द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए | ऐसे उपायों से यदि कोई लाभ नहीं होता है तो भविष्य के लिए चिंता की बात है जिससे समाज ने बहुत आशा लगा रखी है उस विषय में कुछ और सोचा जाना चाहिए | 
 
                मेरे द्वारा किया गया अनुसंधान -
 
  
किंतु बाकी सारे संकट तो वैसे ही बने रहेंगे |रोग प्रतिरोधक क्षमता पैदा कर लेने से उससे मनोबल या आत्मबल तो नहीं बढ़ाया जा सकता है तो इसके अतिरिक्त भी सभी प्रकार के संकटों से सुरक्षा होते देखी जाती है |
 
प्रतिरोधक क्षमता तीन प्रकार की होती है एक शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता दूसरी मानसिक प्रतिरोधक क्षमता और तीसरी आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता |
  शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता :- इस दृष्टि से केवल स्वच्छता का महत्त्व होता है स्वच्छता वह साफ सफाई है जो केवल आँखों से देखी जा सकती है |  इसके अंतर्गत अपने स्वास्थ्य के अनुकूल साफ सुथरा खान पान रहन सहन आदि अपनाना आवश्यक माना जाता है |
मानसिक प्रतिरोधक क्षमता :-  इस दृष्टि से स्वच्छता के साथ साथ शुद्धता का भी पालन करना होता है|शुद्धता से आशय कोई ऐसी अशुद्धि जो देखी न जा सके उसका केवल अनुभव किया जा सकता हो | इसके अंतर्गत कोई साफ सुथरा स्त्रीपुरुष चमकते हुए स्वच्छ बर्तन में लाकर जूठा दूध पीला दे या कुछ खिला दे ,अशुद्ध आसन पर बैठा दे, अशुद्ध वस्त्र पहना दे एवं अशुद्ध हाथों से स्पर्श कर ले  अथवा देखने में स्वच्छ लगने वाले किसी  व्यक्ति वस्तु आदि से स्पर्श हो जाए आदि आदि | ऐसी अशुद्धियों को देखा नहीं अपितु केवल मन से अनुभव किया जा सकता है | किसी जगह किसी ने बल्गम थूक दिया हो तो वह स्थान अस्वच्छ हो जाता है | दूसरा व्यक्ति आकर उस बल्गम पर लघुशंका करके उसको वहाँ से बहा दे जिससे उस स्थान से बल्गम हट जाने के कारण वह चट्टान स्वच्छ भले ही लगने लगे किंतु वह पहले से अधिक अशुद्ध हो गई |ऐसी परिस्थितियों से बचते हुए मानसिक प्रतिरोधक क्षमता का अभ्यास करना होता है |  इसके अंतर्गत किसी दूसरे को पीड़ा पहुँचाए बिना अपने साथ साथ दूसरों की भी सुख सुविधाओं के लिए सात्विक चिंतन पूर्वक प्रयत्न करना होता है | 
आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता :- इसमें स्वच्छता शुद्धता के साथ साथ पवित्रता का भी ध्यान रखना होता है | कोई स्थान गाय के गोबर से लीपने से हो सकता है देखने में अस्वच्छ लगे किंतु वह स्थान पवित्र अधिक होता है |हवन  करने से कुछ लोगों को वायु प्रदूषण भले दिखाई दे किंतु वहाँ का वातावरण पूर्ण पवित्र होता है | किसी स्थान पर साधू संतों की कुटिया हो वहाँ मणिजटित भवन भले न बना हो किंतु वह स्थान पवित्र तीर्थ होता है | गंगा जी जैसी नदियों में नाले गिराकर कोई कितना भी अस्वच्छ क्यों न कर दे किंतु उनकी पवित्रता पर संशय कभी नहीं किया जा सकता |किसी भी विषय से संबंधित कितने भी अच्छे कागज पर अच्छी छपाई से बना कोई ग्रंथ सामान्य कागज पर बने जीर्ण शीर्ण गीता वेद पुराण रामायण भागवत आदि पवित्र ग्रंथों की बराबरी कैसे कर सकता है | तुलसी गाय शालिग्राम पौधा पशु एवं पत्थर होने के कारण नहीं पूजे जाते हैं अपितु पवित्रता के कारण पूजे जाते हैं | 
  हविष्यान्न भोजन स्वच्छ और स्वादिष्ट हो न हो किंतु पवित्र होता चरित्रवान स्त्री पुरुष देखने में स्वच्छ भले न लगें किंतु वे पवित्र होते हैं | न्यायपूर्ण आजीविका से नमक रोटी कमाकर खा लेने वाले पसीने से पवित्र परिश्रमी वर्ग की प्रतिरोधक क्षमता की बराबरी किसी से कैसे की जा सकती है |  महामारी के समय दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों से पलायित श्रमिकों के सामान्य शरीरों को दुनियाँ ने देखा है जिनके पास न मॉक्स था न सैनिटाइजर न दो गज दूरी जिसने जैसे हाथों से जो कुछ दिया वो खाते पचाते चले गए उनके बच्चे बूढ़े माताएँ सद्यः प्रसूताएँ जिन्हें देखकर शारीरिक प्रतिरोधक क्षता की वकालत करने वाले आधे अधूरे वैज्ञानिक अफवाहें फैलाते देखे जा रहे थे कि ये जहाँ जाएँगे वहाँ कोरोना बम बनेंगे किंतु उनकी ये अफवाहें निरर्थक इसीलिए सिद्ध हुईं क्योंकि वे आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता की सामर्थ्य का अनुमान लगाने में असफल रहे |बने ठने साफ सुथरे वस्त्राभूषणों से सुसज्जित सुश्रृंगारित सुगंधित स्त्री पुरुषों से स्थापित किए अवैध संबंध स्वच्छ हो सकते हैं किंतु पवित्र नहीं | किसी सरकारी अधिकारी कर्मचारी के द्वारा घूस लेकर किसी का काम कर देने को पवित्र नहीं माना जा सकता है | 
      प्राचीन काल में आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता का महत्त्व लोगों को पता था इसीलिए वह अपने को बलवान बनाने के लिए कठोर तप किया करते थे उससे निर्मित आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता के बल पर वे बड़े बड़े वीरों को पराजित कर दिया करते थे | श्री राम और लक्ष्मण दो ही लोग थे उन्हें भी लंका के एक से एक बलवान वीरों के विषय में ज्ञात था रावण कुंभकार मेघनाद आदि की वीरता तो किसी से छिपी नहीं थी युद्ध में सहयोगी उनके पास अत्याधुनिक हथियार थे अतिविशाल सेना थी इसके बाद भी श्री राम और लक्ष्मण जी ने बिना भयभीत हुए उनसे युद्ध ठान दिया था और इसी आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता के द्वारा लंका के बड़े बड़े वीरों पर विजय प्राप्त की थी | 
    वृन्दावन से गोपिकाएँ दूध दही बेचने मथुरा आती थीं कंस आदि राक्षस खरीद खरीद कर खूब खाते और अपने शरीरों का बल बढ़ाया करते थे | कंस आदि राक्षस लोग गायों का बध कर दिया करते थे | दूसरी ओर श्री कृष्ण जी गायों की सेवा किया करते थे गाएँ उन्हें आशीर्वाद दिया करती थीं |कंस ने  पिता को कैदखाने में डाल कर सारे अधिकार अपने आधीन कर लिए थे उन्हें बहुत सताया करता था दूसरी ओर श्री कृष्ण अपने माता पिता की आज्ञा का पालन किया करते थे |गायों का दूध दही घी मक्खन आदि खा खाकर बलवान हुए राक्षसों में रोग प्रतिरोधक क्षमता तो थी इसलिए वे रोगी नहीं हुए किंतु  पिता और गायों का उत्पीड़न करने से उनकी आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो चुकी थी | दूसरी ओर श्रीकृष्ण जी ने गायों की सेवा करके एवं अपने माता पिता की आज्ञा का पालन करके गायोंऔर माता पिता से जो आशीर्वाद रूपी बल प्राप्त किया था इससे उनकी आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता अत्यंत मजबूत हो गई थी | संख्याबल और संसाधनात्मक बल में कंस से कमजोर होने के बाद भी इसी आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता के बल पर उन्होंने मथुरा के कंस आदि वीरों को पराजित कर दिया था |
      प्राचीन काल में राक्षस भी बलवान बनने के लिए तपस्या किया करते थे क्योंकि ये उन्हें भी पता होता था कि चरित्रवान किसी वीर को केवल आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता के बल पर ही जीता जा सकता है किंतु राक्षस जितनी तपस्या कर लिया करते थे इसके बाद उसी तपस्या के बलपर सुख साधनों का भोग करके अपनी तपस्या क्षीण किया करते थे उसी समय कोई तपोबली  वीर उनका वध कर दिया करता था | 
       सहस्रार्जुन ने इतनी अधिक यज्ञें की थीं इतना अधिक दान दिया था इतनी अधिक तपस्या की थी वेदाध्ययन किया था कि उस युग में उसकी बराबरी करने वाला दूसरा नहीं था | 
       यज्ञैः दानैः तपोभिश्च विक्रमेण श्रुतेन च | कार्त्तवीर्यार्जुन समो न भूतो न भविष्यति || 
  इतनी तपस्या के बाद भोगों में संलिप्त होकर अपनी आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता समाप्त कर ली थी उसके पास बल था अतिविशाल सेना एवं युद्ध के सहयोगी संसाधन थे | दूसरी ओर तपस्वी परशुराम जी थे उनके पास न सेना थी और न ही युद्ध सहयोगी संसाधन केवल चरित्रबल अर्थात आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता के बल पर उस महावीर वीर से परशुराम जी भिड़ गए और सेना एवं सहयोगियों के साथ कार्त्तवीर्यार्जुन का वध  कर दिया |
     इसी  आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता  के बल पर राक्षसों के बीच एक वर्ष से अधिक सीता जी रहीं किसी राक्षस की हिम्मत नहीं पड़ी कि सीता जी पर कुदृष्टि डाल जाता |यदि चरित्र बल न होता तब तो सीता जी शारीरिक रूप से वहाँ अकेली विवश अबला ही थीं किंतु आध्यात्मिक प्रबल  प्रतिरोधक क्षमता के बल पर सीता जी रावण को भी डाट दिया करती थीं | वो कुछ नहीं कर पाता था सीता जी की सुरक्षा करने के लिए न सुरक्षा कर्मी थे न आज की तरह कानून था और न ही उनकी कोई मदद कर सकता था अपने बल पर उन्होंने अपनी सुरक्षा की थी | 
                                       आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता की महत्ता     
     प्राचीन काल में इसी आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता को 'पुण्य' शब्द से पहचाना जाता था | ऋषियों का मानना था पुण्य करते रहने वाले व्यक्ति की सदैव सभी जगहों पर सुरक्षा होती रहती है | जिस संकट के विषय में हमें पता है पुण्य वहाँ तो हमारी रक्षा करते ही हैं जो संकट हमें नहीं भी पता है पुण्य वहाँ भी हमारी रक्षा करते हैं | "रक्षंति पुण्यानि पुरस्कृतानि !"इसीलिए प्राचीन काल में प्रातः काल से लेकर शयनपर्यन्त जीवन से संबंधित प्रत्येक कार्य को धर्मसम्मत विधि से करने का उपदेश किया गया है सोलह संस्कारों की व्यवस्था की गई है माता पिता गुरुजनों एवं अपने से ज्येष्ठ श्रेष्ठ लोगों का सम्मान एवं छोटों को स्नेह देना सिखाया जाता रहा है | नारियों का सम्मान करने की परंपरा रही है दूसरों को दुःख दिए बिना अपना जीवन जीना सिखाया गया है | 
       कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत दृष्टि से अपराध मुक्त संयमित संस्कार युक्त सदाचारी जीवन जीता है और सात्विक खानपान रहन सहन बात व्यवहार व्यापार आदि जीवनोपयोगी कृत्यों को अपना लेता है उसके अंदर आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण स्वयं ही हो जाता है | इससे भविष्य में संभावित भूकंप बाढ़ बज्रपात आँधी तूफानों  महामारियों आदि के घटित होने पर उसी क्षेत्र में उन्हीं लोगों के बीच उन्हीं परिस्थितियों में रहते हुए उन घटनाओं से पीड़ित नहीं होता है और उनका बचाव होता रहता है | 
     ऐसा पवित्र वातावरण यदि किसी क्षेत्र का बन जाता है तो वहाँ भूकंप बाढ़ बज्रपात आँधी तूफान  महामारी आदि घटनाएँ प्राकृतिक समयचक्र के कारण घटित तो होती हैं किंतु उनसे किसी जीव की हिंसा नहीं होती या कम से कम होती है | महामारी एवं अन्य आकस्मिक प्राकृतिक आपदाओं के घटित होने पर भी उससे हम प्रभावित नहीं होते हैं |
 ऐसी धर्म सम्मत विधि अपनाकर हम अपने वर्तमान को तनाव रहित बना सकते हैं भविष्य के संभावित संकटों से अपने को मुक्त रख सकते हैं | समाज में अपनी प्रतिष्ठा को सुरक्षित रख सकते हैं | ऐसे सदाचरण से हम दूसरों को सुख पहुँचा सकते हैं अपने सगे संबंधियों को अपनी तरफ से तनाव मुक्त रख  सकते हैं उनकी मदद कर  सकते हैं |  
      जिस समाज में अपराध करने से बचने वाले ब्रह्मचर्यव्रती जीवन जीने वाले लोगों की अधिकता होती है वहाँ अपराधी और बलात्कारी होते ही नहीं हैं! उनका पक्ष लेने वाले या बचाव करने वाले लोग भी नहीं होते हैं | ईमानदारी पूर्वक आजीविका अर्जित करने वाले लोगों की अधिकता जहाँ कहीं भी होगी वहाँ भ्रष्टाचार होगा ही नहीं | !अधिकारियों कर्मचारियों के द्वारा जिस दिन घूस मुक्त सेवाएँ प्रदान की जाने लगेंगी उस दिन अपराध मुक्त समाज का निर्माण होना प्रारंभ हो जाएगा !सात्विक आचरण करने वालों की अधिकता होगी तो अपराध करने वाले स्वतः ही समाप्त होते चले जाएँगे |
      कुलमिलाकर कर हमारे प्रत्येक सदाचरण से पुण्यों का निर्माण होता है उन पुण्यों से ही हमारी आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण होता है जिसके प्रभाव से सदैव संकट काल में हमारी रक्षा होती रहती है |
 
संपूर्ण शिक्षा के साथ साथ तपस्या को आवश्यक माना जाता था -"तपः स्वाध्याय निरतं | "
    तपस्या विहीन शिक्षा कई बार व्यक्ति के पतन का कारण बनती है शिक्षित लोग भी अधिकारी कर्मचारी घूस लेकर बड़े बड़े अपराधों में अपराधियों की मदद करते देखे जाते हैं |  समाज में सभी प्रकार की कुरीतियाँ फैलाने के लिए शिक्षित लोग ही जिम्मेदार हैं |शिक्षित लोग भी अपनी पत्नी या पति से तलाक लेते देखे जाते हैं बलात्कार नशाखोरी आतंकवाद जैसे जघन्य कृत्यों में सम्मिलित देखे जाते हैं |हत्या आत्महत्या गालीगलौच करते देखे जाते हैं | 
     सगे संबंधों में असहन शीलता होते ही संबंधों में तनाव बढ़ने लग जाता है कलह होने लगता है और संबंध समाप्त होने लग जाते हैं | अपनों को अपनी बात मनवाने एवं उनमें से न मानने वालों को गलत सिद्ध करने में यूँ ही न जाने कितना समय निरर्थक बिता दिया जाता है | रामायण में भरत जी से कहा गया कि आपकी माता कैकेयी ने श्री राम जी को बनवास दिया है उससे आपके पिता जी स्वर्ग सिधार गए आपका अपयश हुआ आदि और भी बहुत कुछ बिगड़ गया तो आप कैकेयी माँ की निंदा करेंगे क्या ? इस पर भरत जीने कहा कि उसमें कैकेयी माँ का कोई दोष नहीं है क्योंकि यदि वे गलत होतीं तो अन्य लोगों को भी उनका आचरण बुरा लगता उनसे केवल हमें ही तनाव हुआ है इसलिए हमारे अपने कर्मों का ही दोष है | संबंधों का निर्माण अपने ही अच्छे और बुरे कर्मों से होता है पुण्यों से निर्मित संबंध हमें सुख देते हैं और हमारे ही पापों से निर्मित संबंध हमें दुःख देते हैं | इसलिए हमारे पुण्यों से पिता दशरथ एवं श्वसुर जनक जी मिले राम लक्ष्मण जैसे भाई मिले हमारे पुण्य इतने ही रहे होंगे | माँ बनानी भी आवश्यक थी इसलिए हमारे पुण्य न बचने के कारण ब्रह्मा को विवश होकर हमारे पापों से ही हमारी माँ का निर्माण करना पड़ा जिनसे हमें पीड़ा पहुँची है | इस जन्म में कुछ और पुण्य करने का प्रयास करूँगा उनसे हो सकता है अगले जन्म में माँ भी अच्छी मिले उस माँ के व्यवहार से हो सकता है कि ऐसे दुःख के दिन न देखने पड़ें |
      इस प्रकार का सात्विक चिंतन कर लेने से हम संबंधों के तनाव से तो बच ही सकते हैं | इसके साथ साथ उनकी निंदा चुगली आदि करने से बचाव हो सकता है इससे भी हमारे पुण्यों का निर्माण हो सकता है और संबंध जनित आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता तैयार हो सकती है | 
     ऐसे ही ईमानदारी पूर्वक व्यापार करके फल के लिए किसी को बिना दोष दिए ईश्वर पर भरोसा करने से हम पुण्य निर्माण कर सकते हैं अपने साथ बुरा करने वाले के साथ भी बुरा न करके भी हम अपने पुण्यों का निर्माण कर सकते हैं |  ऐसे सभी प्रकार के सत्कृत्यों से सात्विक चिंतन से स्वास्थ्य के अनुकूल खान पान रहन सहन आदि से अपनी शारीरिक ,मानसिक एवं आत्मिक रोग प्रतिरोधक क्षमताका निर्माण कर सकते | उससे शारीरिक मानसिक और आत्मिक संकटों से मुक्ति मिलना आसान होता रहेगा | 

    
 
 
 
-----------
 
          यहाँ ध्यान देने की विशेष बात यह है कि जिस प्रकार से शरीर में कार्यकरने की क्षमता में कमी होना शारीरिक 'रोग' कहलाता है।उसी प्रकार से मानसिक रोग भी होते हैं |उनका मन पर तो प्रभाव पड़ता ही है शरीर पर भी पड़ता है | काम क्रोध लोभ शोक भय हर्ष ईर्ष्या असूया दीनता मात्सर्य इच्छा और द्वेष के भेदों से उत्पन्न  होते हैं सभी प्रकार के रोग मन और शरीर को आश्रय करके होते हैं | ऐसे विकारों के कारण चिंता भय दुःख असफलता प्रियजन वियोग आदि होते देखा जाता है इनके कारण भी प्रतिरोधक क्षमता का ह्रास होता है | 
     प्रतिरक्षा प्रणाली के अध्ययन में जिस प्रतिरक्षा विज्ञान की परिकल्पना की गई है उसके अध्ययन में प्रतिरक्षा प्रणाली संबंधी सभी बड़े-छोटे कारणों की जाँच की जाती है। उससे स्वास्थ्य के लाभदायक और हानिकारक कारणों का ज्ञान किया जाता है किंतु इसमें शारीरिक पक्ष को केंद्र मानकर प्रायः अनुसंधान किए जाते हैं | इसलिए मानसिक रोगों  से बचाव के लिए भी प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ बनाए जाना आवश्यक होता है | 
 
                                               प्रतिरोधक क्षमता का विस्तार
      प्रतिरक्षा प्रणाली केवल रोगों से लड़ने की क्षमता ही प्रदान करती है यह कहना पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि इससे शरीर तो सुदृढ़ होता ही है अपितु यह भविष्य के संभावित संकटों से भी हमारी सुरक्षा करती है |भूकंप आँधी तूफ़ान बाढ़ बज्रपात आदि प्राकृतिक घटनाओं से सुरक्षा होती है | ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ घटित होना यह तो प्राकृतिक नियम है किंतु ऐसी घटनाओं से पीड़ित होना या न होना यह हमारी अपनी प्रतिरोधक क्षमता पर आधारित होता है |  आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता यदि मजबूत होती है तो ऐसी प्राकृतिक घटनाएँ जहाँ जिस समय घटित होनी होती हैं वहाँ हमें जाने ही नहीं देती और यदि पहुँच भी गए तो उस दुर्घटना से प्रभावित होने से बचा देती है | ऐसी दुर्घटनाओं की चपेट में बहुत लोग आ जाते हैं उनमें से कुछ लोगों की मृत्यु हो जाती है कुछ लोग घायल हो जाते हैं जबकि एक जैसी परिस्थिति में शिकार होकर भी कुछ लोग बिल्कुल बच जाते हैं जिन्हें खरोंच भी नहीं लगती | उनकी प्रतिरोधक क्षमता इतनी अच्छी होती है | 
     कई बार मनुष्यकृत दुर्घटनाओं में भी ऐसा होते देखा जाता है जहाँ बम विस्फोट होना होता है वहीं हमें भी जाना होता है किंतु कोई ऐसा आवश्यक कार्य उसी समय पड़ जाता है कि हम वहाँ नहीं पहुँच पाते हैं | किसी ने किसी को गोली मारी किंतु उसका निशाना चूक गया | जिस गाड़ी को दुर्घटना में क्षति ग्रस्त होना था उसी से हमें भी जाना था किंतु अचानक ऐसी परिस्थिति बनी कि हम उस गाडी से नहीं गए और वह गाड़ी तो क्षति ग्रस्त हुई किंतु हमारा बचाव हो गया | जिस दुर्घटना से पीड़ित होकर बचना संभव ही नहीं होता है वैसी दुर्घटना का शिकार होकर भी
बहुत लोग संपूर्ण रूप से सुरक्षित निकल आते हैं | तेज भूकंप की चपेट में आकर जहाँ बहुत लोग मृत्यु को प्राप्त हो गए होते हैं वहीं कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो बिल्डिंगों के मलवे में सप्ताहों तक भूखे प्यासे दबे रहने के बाद भी सुरक्षित निकल आते हैं | यह उस व्यक्ति की अपनी आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता होती है जो उस संकटापन्न परिस्थिति में भी उसकी सुरक्षा किया करती है | 
     यह प्रतिरोधक क्षमता इतनी बलवती होती है कि कोई एक व्यक्ति अपनी आध्यात्मिकी प्रतिरोधक क्षमता का उपयोग अपने उन आत्मीय जनों के लिए भी कर लेता है तो उनकी भी सुरक्षा होते देखी जाती है | जो अपने आत्मीय जन किसी संकट में फँसने जा रहे होते हैं या उनके साथ कोई दुर्घटना घटित होने जा रही होती है या वे हमसे रूठ कर जा रहे होते हैं या वे हमें तथा हमारे आत्मीय जनों को कोई नुक्सान पहुँचाने का प्रयास कर रहे होते हैं | ऐसी परिस्थिति में हमारी बलवती प्रतिरोधक क्षमता उन्हें भी उस संकट से बचा लेती है ताकि उसके कारण हमें कोई दुःख नहीं मिलता है | यही कारण है कि प्राचीनकाल में लोग सुख के साधनों को जुटाने की अपेक्षा सदाचरण पर अधिक ध्यान देते देखे जाते थे | 
     प्राचीन काल में सदाचरण से संपन्न सैनिकों का वरण राजा लोग कठिन युद्धों के लिए किया करते थे उन्हें जीतना शत्रुसेना के लिए अत्यंत कठिन ही नहीं अपितु असंभव भी होता है |
 
    किसी की मृत्यु जैसी घटना घटित होने वाली है चोट चभेट लगने वाली है या कोई बड़ा रोग होने वाला है कोई बड़ा संकट आने वाला है किसी स्वजन का वियोग होने वाला है कोई बड़ा नुक्सान पहुँचाने वाला है किसी से धोखा मिलने वाला है कोई हमला करने वाला है कोई जहर देने वाला है है किसी दवा का दुष्प्रभाव होने वाला है किसी के साथ कोई दुर्घटना घटित होने वाली है भूकंप बाढ़ आँधी तूफ़ान बज्रपात महामारी आदि प्राकृतिक आपदा से या किसी मनुष्यकृत दुर्घटना से जीवन में कोई बड़ा संकट आने वाला है तो रोग प्रतिरोधक क्षमता से कैसे मदद मिल सकती है  | इसके लिए तो आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता की ही आवश्यकता होती है ये सब पर भारी पड़ती है | 
    शरीरों की दृष्टि से देखा जाए तो निशाचरों राक्षसों असुरों अपराधियों आतंकवादियों आततायियों अत्याचारियों के शरीर बहुत बलिष्ट हुआ करते थे केवल शरीरों एवं संसाधनों के बल से इन्हें जीतना संभव ही नहीं होता है तभी तो कंस रावण कौरव आदि साधन संपन्न महा बलिष्टवीरों को पराजित करने के लिए तपस्या आदि का सहारा लेना पड़ा 
श्रम इसलिए बलवान शत्रुओं को जीतने के लिए काम क्रोध लोभ शोक भय ईर्ष्या असूया दीनता मात्सर्य इच्छा द्वेष आदि दोषों से जीतकर संयम सदाचार शिष्टाचार  सत्यभाषण सहयोग सम्मान स्नेह उदारता ईमानदारी तथा त्याग तपस्या आदि के द्वारा अपनी आध्यात्मिक प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करके शत्रु को जीतना होता है | 

     प्रतिरोधक क्षमता से संपन्न लोगों पर सामान्य चिकित्सा के भी परिणाम बहुत अच्छे होते देखे जाते हैं | प्रतिरोधक क्षमता विहीन लोग कितनी भी मेवा मिष्ठान्न खाएँ घी पिएँ ,विटामिन लें कितने भी चिकित्सकों के संपर्क में रहकर चिकित्सा का लाभ लें किंतु उनमें सुधार की संभावना प्रतिरोधक क्षमता से संपन्न लोगों की अपेक्षा बहुत कम होती है | 

 


 


      इस प्रतिरोधक क्षमता का निर्माण बहुत कुछ अच्छा पौष्टिक खाने पीने आदि से नहीं होता है अपितु जो खाया पिया जाए वो अपने परिश्रम ईमानदारी सदाचरण आदि के द्वारा बिना किसी को नुक्सान पहुँछाए प्राप्त किया गया हो वह नमक रोटी ही क्यों न हो उसे खाकर संयम सदाचार शिष्टाचार  सत्यभाषण सहयोग सम्मान स्नेह उदारता ईमानदारी आदि का अनुपालन करते हुए कोई भी व्यक्ति अपने शरीरों में प्रतिरोधक क्षमता तैयार कर सकता है| कोरोना काल में महानगरों से पलायन करने वाले श्रमिक इसी प्रतिरोधक क्षमता के बलपर बिना किसी भय के घर छोड़ छोड़ निकल पड़े थे उन्हें जुकाम भी नहीं हुआ | 

   धनी लोगों के यहाँ परिश्रम के सारे कार्य उनके नौकर चाकर करते हैं इसलिए उन्हीं की प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है महामारी का सामना करने में भी वही सक्षम हो पाते हैं |




 
युक्त होकर रोग, महारोग एवं मृत्यु जैसी घटनाएँ घटित होते देखी जाती हैं |ऐसे  किसी के अपने पुण्यों को ही प्रतिरोधक क्षमता के नाम से जाना जाता है ने पुण्यों को नष्ट कर लिया करते हैं तामसी स्वभाव दोषों से
आदि
एक समय किसी एक घटना का संबंध किसी दूसरी घटना से केवल इसलिए जोड़ देना ठीक नहीं होता है कि वे दो या दो से अधिक घटनाएँ एक साथ ही घटित हो रही होती हैं

  प्राकृतिक वातावरण का समयचक्र आदि काल में जिस भी समयविंदु पर प्रारंभ  हुआ होगा वह समस्त सृष्टि का जन्म समय होगा किंतु  समस्त प्राणियों  का जन्म समय एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न  होता है इसलिए जीवन पर पड़ने वाला अच्छा और बुरा समय प्रत्येक प्राणी का अपना अपना एवं अलग अलग होता है |एक ही  समय में कुछ प्राणियों का समय अच्छा चल रहा होता है तो कुछ का सामान्य समय होता है जबकि कुछ का समय बहुत विपरीत बीत रहा होता है |

    ऐसे में जिनका जब अपना समय बहुत विपरीत चल रहा होता है  उस समय उन्हें शारीरिक मानसिक आदि कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ता है उसका कारण भला कुछ भी बने | बाढ़ भूकंप महामारी कोई मनुष्य कृत दुर्घटना घटित होने पर उसमें मृत्यु उन्हीं की  होती है जिनकी आयु  पूरी हो चुकी होती है | जिनका अपना समय अच्छा चल रहा होता है उनकी प्रतिरोधक क्षमता इतनी अच्छी होती है कि महामारी जैसी आपदा में भी जिन परिस्थितियों में जहाँ कुछ लोग संक्रमित हो रहे होते हैं उन्हीं परिस्थितियों में यहाँ तक कि संक्रमितों के संपर्क में आने पर भी वे स्वस्थ एवं सुरक्षित बने रहते हैं केवल संक्रमण से ही बचाव नहीं होता है अपितु  भूकंप आदि बड़ी से बड़ी दुर्घटना का  शिकार बनकर भी ऐसे लोग स्वस्थ और सुरक्षित बचकर निकल आते हैं |  

      इसलिए महामारी आदि दुर्घटनाओं का घटित होना एवं उनसे पीड़ित होना दोनों अलग अलग बातें हैं

 

अपना अपना होता है का प्रभाव   अच्छे बुरे समय का प्रभाव जिस प्रकार से प्रकृति पर पड़ता है उसी प्रकार से प्राणियों के जीवन पर भी पड़ता है |

        किसी बड़े कारखाने में जिस प्रकार एक बहुत बड़े बेलन में लगा कोई पहिया घूम रहा होता है | कई अन्य दूसरे तीसरे आदि अनेकों ऐसे पहिये जिनका बेलन से प्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं होता है वे भी उसी घूमते हुए बेलन के स्पर्श से उसके साथ ही घूमने लग जाते हैं उसके साथ जब तक जुड़े रहते हैं तब तक तो  घूमते रहते हैं उसके बाद जैसे ही उससे अलग होते हैं वैसे ही रुक जाते हैं |यही प्राणियों का जीवन है जो इस महा समय चक्र के साथ जुड़ते और छूटते रहते हैं क्योंकि वे जन्म मृत्यु चक्र  के आधीन होते हैं | इसलिए ये सीमित समय  महाचक्र के साथ जुड़कर चल  सकते हैं | उनका  ये घूमना और रुकना उस महा बेलन(समय चक्र) के आधीन है जिसे कभी रुकना ही  नहीं है |

    प्रत्येक प्राणी का छोटा छोटा जीवन चक्र अल्पकालिक एवं अलग अलग होता है इसीलिए प्रत्येकप्राणी के जीवन में अलग अलग प्रकार की घटनाएँ घटित होते देखी  जाती हैं | कोई चक्र कभी भी चल या रुक सकता है प्रत्येक प्राणी का जन्म होते ही उसका जीवन चक्र प्रारंभ जाता है मृत्यु होते ही वह जीवन चक्र समाप्त हो जाता है जबकि उस समय भी कई अन्य  छोटे बड़े जीवन चक्र उसी महा बेलन(समय चक्र) के आधीन होकर उसी साथ घूम रहे होते हैं | वे छोटे छोटे जीवन चक्र समय के उस महाचक्र साथ जिस  समय जुड़ते हैं वही उन उन प्राणियों का जन्म समय होता   है | उस जुड़ने के समय के आधार पर उसका उससे छूटना निश्चित होता है |  जीवन चक्र के साथ कब कैसी घटनाएँ घटित होंगी यह भी निश्चित होता है |

  अपने जन्म के साथ प्रारंभ होता है कर्म

महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं की

 

 

प्राकृतिक  

समय जैसे जैसे बदलते जाता है

 स

उसी वही लोग ग्रीष्म घटनाओं का आपस में कोई न कोई क्रम होता है कि किस घटना के कितनी देर बाद में उससे संबंधित किस प्रकार की प्रकृति एवं जीवन से संबंधित कौन सी घटना घटित होने की संभावना होती है

 

जीवन की विशेषता यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन समय का अनुगमन करता है

से जुड़ा