Friday, December 21, 2012

लाल किताब के नाम पर काले बहम !

इसमें गोदान तक को रोका गया है और कुत्ता पालना तक सिखाया गया है !ऐसी धर्म विरोधी लाल पीली किताबें ज्योतिष कैसे हो सकती हैं ? 

  अनंत काल से चली आ  रही  दान की अवधारणा  को भी लाल किताब में रोका गया है । 

       "आखिर क्या है लालकिताब? ज्‍योतिष के मूल रूप से दो भाग हैं। इनमें से एक है सिद्धांत और दूसरा है फलित। सिद्धांत पक्ष में ज्‍योतिष का वह भाग है जो खगोलीय गणनाओं से संबंधित है और इन गणनाओं में से ज्‍योतिष के उपयोग में आने वाली गणनाओं का इस्‍तेमाल किया गया है। जैसे कि आकाश को 360 डिग्री में बाँटकर उसका 12 बराबर भागों में विभाजन, नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों की गति और ग्रहण जैसी घटनाएँ। आकाशीय घटनाओं की पुख्‍ता जानकारी मिलने के बाद उनका मानव जीवन पर असर के बारे में अध्‍ययन ज्‍योतिष का फलित हिस्‍सा है।"

लाल किताब ज्योतिष की पारम्परिक प्राचीतम विद्या का ग्रंथ  नहीं है।वस्तुतः इस ग्रन्थ का कोई प्रमाणिक ऐसा अभी तक सामने नहीं आ पाया है जिससे ज्योतिष की प्राचीन प्रमाणित विधा से इसका कोई सम्बन्ध सिद्ध हो सके इसी लिए प्राचीन  ज्योतिष शास्त्र के विद्वानों ने इसे कभी महत्व नहीं दिया न केवल इतना अपितु इस विधा से जुड़ा कोई प्रमाणित विद्वान् इसे किसी सभा में सिद्ध ही कर सका कि ये कितना प्रमाणित एवं विश्वसनीय ग्रन्थ है।इसी लिए इसे संस्कृत विश्व विद्यालयों के ज्योतिष पाठ्य क्रमों में भी सम्मिलित नहीं किया जा सका है।

   वस्तुतः प्राचीन ज्योतिष वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आज भी खरा उतरता है लाल किताब में कोई ऐसी विधा ही नहीं है जिसे  अध्ययन अनुशीलन या शोध का विषय बनाया जा सके।अतःयह विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है कि लाल किताब का ज्योतिष की पारम्परिक प्राचीतम विद्या से कोई सम्बन्ध नहीं है।

         इससे जुड़े  प्रायः वो लोग हैं जो ज्योतिष नहीं  जानते हैं वो अक्सर किसी अन्य कार्य व्यापार से जुड़े  या अपने व्यवसाय में असफल होने के बाद कुछ लोग इस लाल किताब के धंधे से जुड़े।कुछ आर्थिक दृष्टि से अत्यंत सक्षम लोग बिना पढ़े लिखे सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्ति के लालच में ऐसी लाल पीली किताबों के मनोरंजन से जुड़ गए, रहे होंगे और भी कारण किन्तु मुख्य कारण यही है कि इसमें कुछ पढ़ना लिखना नहीं पड़ता है।दूसरा कारण यह है कि इसमें घर गृहस्थी से लेकर सब्जी दाल रोटी के द्वारा भाग्य सुधारने के रास्ते बताए जाते हैं।बुरा समय सुधरेगा तो नहीं ही इससे पार करने में सफलता अवश्य मिलती है जैसे किसी को कोई उपाय 41दिन के लिए बोला गया तो इसी सहारे में उस बुरे समय के 41दिन तो कट गए पैसे भी नहीं खर्च हुए।

         इसमें कोई एक प्रमाणित किताब नहीं है इस लिए किसी के भविष्य के लिए कुछ भी बको कोई भी उपाय बताओ कौन किससे प्रमाण माँगेगा सब की अपनी अपनी लाल पीली किताबें हैं कोई क्या कर लेगा ?

    उचित होता यदि ऐसी किताबों से जुड़े लोगों ने किसी अधिकृत विश्व विद्यालय से भी ज्योतिष का कोर्स भी किया होता फिर इन किताबों को भी पढ़ता तो कुछ सही तथ्य निकालने में सुविधा होती किन्तु लाल टके की बात यह है कि जो शास्त्रीय ज्योतिष पढ़ लेगा वो उस सजीव विज्ञान को छोड़ कर इस प्रपंच में पड़ेगा ही क्यों ?इसी लिए मैंने तो लाल किताब वाले बहुत लोगों से पूछा कि क्या आपने ज्योतिष पढ़ी भी है आपके पास है किसी किसी अधिकृत विश्व विद्यालय से  ज्योतिष के  कोर्स की कोई प्रमाणित डिग्री ?किन्तु मुझे तो आज तक कोई मिला नहीं आप भी पता कीजिए ।यद्यपि ऐसे किसी प्रमाणित व्यक्ति से मिलकर मुझे प्रसन्नता होगी आखिर पता तो लगे कि इस विषय में उसकी शास्त्रीय सोच क्या है ?

     हिमाचल से एक प्राचीन पांडुलिपि प्राप्त हुई थी तब उक्त पांडुलिपि का उन्होंने अनुवाद किया था।बताया जाता है कि इस विद्या के बिखरे सूत्रों को इकट्ठा कर जालंधर निवासी पंडित रूपचंद जोशी ने सन् 1939 को 'लाल किताब के फरमान' नाम से एक किताब प्रकाशित की। इस किताब के कुल 383 पृष्ठ थे बाद में इस किताब का नया संस्करण 1940 में 156 पृष्ठों का प्रकाशित हुआ, जिसमें कुछ खास सूत्रों को ही शामिल किया गया माना जाता है। फिर 1941 में अगले-‍पिछले सारे सूत्रों को मिलाते हुए 428 पृष्ठों की किताब प्रकाशित ‍की गई। इस तरह क्रमश: 1942 में 383 पृष्ठ और 1952 में 1171 पृष्ठों का संस्करण प्रकाशित हुआ। 1952 के संस्करण को अंतिम माना जाता है।

     चूँकि उक्त विधा का प्रचलन  उत्तरांचल और हिमाचल क्षेत्र से हिमालय के सुदूर इलाके तक फैली थी। बाद में इसका प्रचलन पंजाब से अफगानिस्तान के इलाके तक हुआ।इस किताब को मूल रूप से प्रारंभ में उर्दू और फारसी भाषा में लिखा गया था। इस कारण ज्योतिष के कई प्रचलित और स्थानीय शब्दों की जगह इसमें उर्दू-फारसी के शब्द शामिल हैं यहाँ ध्यान देने वाली विशेष बात यह भी है कि कई जगह इसमें हिन्दुओं के पुराने सनातन शास्त्रों के विरोध में भी विचार मिलते हैं।जैसे कुत्ता पालने का सनातन  शास्त्र तो विरोध करते हैं किन्तु लाल किताबी लोग समर्थन करते देखे जाते हैं ।इसी प्रकार दान या गोदान आदि को सनातन धर्म तो पुण्य का काम मानता है किन्तु लाल किताबी लोग समर्थन करते देखे जाते हैं।इसी प्रकार और भी बहुत सारे सनातन धर्मं विरोधी या अज्ञान जन्य विचार हैं ।मुझे यह कहने में भी कोई संकोच नहीं है कि इस पर अन्य देशों एवं भाषाओं का ही असर नहीं है अपितु उन धर्मों का भी असर हो सकता है जिनकी भाषा में मूल रूप से यह पुस्तक मिली थी।संभवतः इसी धर्म द्वेष के कारण ही वहाँ गोदान आदि को रोका गया है।

      बताया जाता है कि इसके अनुसार राशियों की चाल का कोई महत्‍व नहीं है। लग्‍न हमेशा मेष राशि होगी और इसी तरह बारह भावों में बारह राशियाँ  स्थिर कर दी गई हैं। उदाहरण के तौर पर मिथुन लग्‍न के जातक की कुण्‍डली भी बनाई जाए तो भी लग्‍न मेष ही रहेगा। शेष ग्रह जिस भाव में बैठे हैं उन्‍हीं का इस्‍तेमाल किया जाएगा। ऐसे में कोई ग्रह उच्‍च या नीच का होगा तो भावों में स्थिति की वजह से होगा। 

 जो ग्रह खराब प्रभाव वाले हैं उन्‍हें अपने स्‍थान से हटाकर दूसरे स्‍थानों पर ले जाया जा सकता है। अगर सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो हकीकत में खगोलीय पिण्‍डों को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर खिसकाना असंभव है, लेकिन लाल किताब कहती है कि ग्रहों को भले ही न खिसकाया जा सकता हो, लेकिन जातक की कुण्‍डली में उसके प्रभाव को बदला जा सकता है। हर ग्रह के प्रभाव को बदलने के लिए लाल किताब ने तय सिद्धांत भी बनाए हैं। मसलन किसी ग्रह को लग्‍न में लाने के लिए उससे संबंधित रत्‍न, धातु अथवा वस्‍तु को गले में पहनना होगा। इससे ग्रह का असर ऐसा होगा कि वह लग्‍न में बैठा है। इसी तरह दूसरे भाव में पहुंचाने के लिए घर में वस्‍तु स्‍थापित करें, तीसरे भाव के लिए हाथ में, चौथे के लिए बहते पानी में, पांचवे के लिए स्‍कूल में, छठे के लिए कुएं में, सातवें के लिए जमीन में, आठवें के लिए श्‍मशान में, नौंवे के लिए धर्मस्‍थान में, दसवें के लिए सरकारी प्‍लाट या भवन में और बारहवें भाव में किसी वस्‍तु तो पहुंचाने के लिए छत पर संबंधित वस्‍तुओं को रखना होगा। लाल किताब कहती है कि ग्‍यारहवाँ  भाव आय या लाभ का होता है, इस भाव के लिए कोई उपचार नहीं है। उपायों से ग्रहों को अपने पक्‍के या बेहतर लाभ देने वाले भावों में पहुंचाने और खराब प्रभाव देने वाले ग्रहों को हटाने का प्रयास किया।

 मसनुई ग्रह  

पारंपरिक ज्‍योतिष के इतर लाल किताब ग्रहों की युति यानी दो या अधिक ग्रहों के एक ही भाव में बैठने को मसनुई ग्रह की उपाधि देती है। इसके अनुसार अगर किसी भाव में दो या इससे अधिक ग्रह बैठे हैं तो उन सभी का प्रभाव किसी अन्‍य ग्रह की तरह होने लगेगा। ग्रहों की युति किसी अन्‍य ग्रह को सहायता भी कर सकती है और उसके प्रभाव को खराब भी कर सकती है। उदाहरण के तौर पर गुरु और सूर्य एक भाव में बैठकर चंद्रमा का प्रभाव पैदा करते हैं, इसी तरह बुध और शुक्र से सूर्य, सूर्य और बुध से मंगल, शुक्र और गुरु से शनि का प्रभाव पैदा होता है। इसी के आधार पर संबंधित ग्रह का उपचार कर दिया जाता है।

विशिष्‍ट शब्‍दावली -इनकी  अपनी विशिष्‍ट शब्‍दावली भी  है। जैसे पक्‍का घर। हर ग्रह का अपना पक्‍का घर होता है। यह वह भाव होता है जहाँ  ग्रह अपने सबसे अच्‍छे प्रभाव के साथ होता है। शक्‍की हालत का ग्रह उसे कहते हैं जो अपने निश्चित भाव को छोड़कर किसी और भाव में बैठा हो। सोया हुआ ग्रह उसे कहते हैं जब कोई ग्रह ऐसे भाव में बैठा हो जिससे सातवें भाव में कोई ग्रह न हो। इसके साथ ही ग्रहों के बलिदान के बारे में भी बताया गया है। इसके अनुसार किसी ग्रह की स्थिति खराब होने पर उससे संबंधित दूसरे ग्रहों का प्रभाव खराब हो जाता है। इस हालत में लाल किताब के अनुसार बलिदान दे रहे ग्रहों का उपचार किए जाने की जरूरत होती है।। दान, पूजन और साधना के जरिए दीर्धकाल में मिलने वाले लाभ की तुलना में लोग लाल किताब के तुरत फुरत उपचार करने में अधिक सहज महसूस करते हैं। 

      इसकी सबसे बड़ी विशेषता ग्रहों के दुष्प्रभावों से बचने के लिए जातक को ‘टोटकों’ का सहारा लेने का संदेश देना है। ये टोटके इतने सरल हैं कि कोई भी जातक इनका सुविधापूर्वक सहारा लेकर अपना कल्याण कर सकता है। काला कुत्ता पालना, कौओं को खिलाना, क्वाँरी कन्याओं से आशीर्वाद लेना, किसी वृक्ष विशेष को जलार्पण करना, कुछ अन्न या सिक्के पानी में बहाना, चोटी रखना, सिर ढँक कर रखना इत्यादि । ऐसे कुछ टोटकों के नमूने हैं, जिनके अवलम्बन से जातक ग्रहों के अनिष्टकारी प्रभावों से अनायास की बचा जाता है। कीमती ग्रह रत्नों (मूंगा, मोती, पुखराज, नीलम, हीरा आदि। में हजारों रुपयों का खर्च करने के बजाय जातक इन टोटकों के सहारे बिना किसी खर्च के (मुफ्त में) या अत्यल्प खर्च द्वारा ग्रहों के दुष्प्रभावों से अपनी रक्षा कर सकता है।ऐसा समझाया जा सकता है किन्तु जिस पुस्तक की प्रामाणिकता पर ही संदेह हो कौन लेखक है कब लिखी गई है क्या प्रमाण हैं क्या विषय है प्रतिपादित विषय के समर्थन में क्या तर्क हैं ? केवल सभी प्रकार के ग्रह दोषों से बचाव के लिए सैकड़ों टोटकों का मन गढ़ंत विधान बताया गया  है इसमें जीवन का कोई ऐसा पक्ष नहीं है, जिससे संबंधित टोटके न बतलाये गये हों किन्तु उनकी प्रामाणिकता हमेंशा संदेह के घेरे में रही है ।

     इस लिए धर्मवान लोगों को अपने सनातन धर्म  एवं धर्म ग्रंथों के विरुद्ध किसी भी कही सुनी बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए ।

Thursday, December 20, 2012

भ्रष्टाचार और संत !

                     भ्रष्टाचार और संत एवं  मीडिया

   

सन्तों, सत्यवादियों, सदाचारियों एवं शास्त्रों का प्रभाव घटते ही अपराध एवं भ्रष्टाचार बढ़ने लगता है। आज भ्रष्टाचारी एवं अपराधी वर्ग समाज के हर क्षेत्र में घुस चुका है यहॉं तक कि धर्म क्षेत्र जैसे आश्रमों, यज्ञों, सत्संगों तीर्थों, प्रवचनों, भागवत कथाओं, साधकों, सिद्धों, भविष्यवक्ताओं, तांत्रिकों, योगियों आदि के रूप में चारों ओर ऐसे ही लोग धार्मिकों के प्रतीक बनते जा रहे हैं ये ही शास्त्रीय प्रतिनिधियों के रूप में धन के बल पर शिविर समागम सत्संगों के नाम पर बड़े बड़े आयोजन करने में सफल हैं। ऐसी आधारहीन बकवास ही आज शास्त्रीयमत के रूप में प्रतिष्ठित होती जा रही है। प्रायः धन इन्हीं के पास होता है इसलिए विज्ञापन भी इन्हीं लोगों का होता है। वर्तमान में शिक्षित, शिक्षक, सत्यवादी, सदाचारी, विद्वान, सन्त एवं अन्य समस्त शास्त्रीय विषयों के जानकार महापुरूषों  ने या तो समाज से किनारा कर लिया है या समाज ने ही उन्हें किनारे लगा दिया है।
      मीडिया के प्रायः सभी वर्ग मोटाधन लेकर पहले इनका शोर मचा मचाकर प्रचार प्रसार करते हैं। आपसी डील बिगड़ते ही चिल्ला चिल्लाकर निंदा करते हैं तरह तरह से पोल खोलने का दावा करते हैं। मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि जरा जरा सी बात में बाल में खाल निकालने वाले मीडिया के महापुरूषों को क्या पहले पता नहीं था कि धर्म के नाम पर ये ठगी हो रही है, यदि मान भी लिया जाए कि इन्हें पता नहीं था तो क्या इन्हें पारदर्शी  शास्त्रों का अध्ययन करके स्व शास्त्रीय विवेक के आधार पर ईमानदारी पूर्वक निर्णय करके ही प्रचार प्रसार नहीं करना चाहिए था।आखिर बहुपठित परिश्रमशील पत्रकारों की योग्यता का लाभ समाज को धार्मिक क्षेत्र में भी मिलना ही चाहिए।ऐसा लगता है कि ऐसे मीडिया के महापुरूषों  ने भी  या तो समाज से किनारा कर लिया है या समाज ने उन्हें किनारे लगा दिया है।

     विखरते परिवार एवं नष्ट  होता बचपन भ्रष्ट  होता समाज आदि । बढती आपराधिक वारदातें मन से होती हैं तन पर अंकुश  लगाना कानून का काम  है तथा मन पर अंकुश लगाने के रास्ते शास्त्रों में बताए गए हैं जिन्हें विद्वान और महात्मा पढ़ते थे एवं अपने जीवन में उनका पालन करते थे। ऐसे लोगों के संयम सदाचार देख सुनकर लोग प्रेरित होते थे। वैराग्य तो अब बीते दिनों की बात हो गई है। वैराग्य की बातें सुन सुनकर कान पक रहे हैं देखने को कुछ मिलता नहीं है। आज भी शास्त्रों और संतों के प्रति समाज में असीम आदर की भावना है।वस्तुतः भटकाव लोंगों में नहीं है प्रत्युत तथा कथित संत भटक गए हैं । बंधुओं! ये कलियुग है किसी का क्या दोष  ? वेशर्मी का आलम यह है कि  भागवत या रामायण की पवि़त्र कथाओं के नाम पर कपोल कल्पित कथा कीर्तन करने या नाचने गाने वाले तरह तरह की वेष  भूषा  बनाए बहुरूपिए एवं भविष्य  बकने वाले लोग अपने को संत कहने लगे हैं । जनता बेचारी करे भी तो क्या?वो तो रामायण और भागवत आदि जो भी ग्रंथ अपने आप से पढ़ पाती है उसमें जो साधु संतों की महिमा बताई गई है उसी रूप में वह हर किसी बहुरूपिए को भी देखने लगती है उसके पास न तो समय है और न ही अच्छे बुरे की पहिचान।वास्तव में संत एक बहुत बड़ी उपाधि पदवी या स्थिति है जिसकी प्रथम शर्त वैराग्य संयम सदाचार आदि है धन के आधीन तो गृहस्थ होता है धन की आधीनता न स्वीकार करने के कारण ही तो वे गृहस्थ नहीं हुए। आश्रम बनाकर चेला चेलियों में फॅंसना ही पड़ा तो गृहस्थ की तरह वो भी एक आश्रम कथा प्रवचन विद्यालय चिकित्सालय आदि लोगों को खुश  करने वाले उसी के दायरे में फॅंस कर रह गए। ये काम तो समाज स्वयं भी कर सकता है केवल प्रभावी चरित्रवान प्रेरक की आवश्यकता होती है पहले से ऐसा ही होता भी आया है। आखिर पैसा तो समाज का ही लगना है कोई बाबा और कहॉं से कमा कर लाएगा ? उनका तो एक ही बल है गरीबों की भीड़ और  भाषण तथा धनियों का भोजन और दक्षिणा। इसी धन से धंधा करना और धंधे में अपने पुराने परिवार को सम्मिलित कर लेना या नया परिवार बना लेना पैसे से परिवार भी सुंदर बन जाता है। पत्नी या शिष्या  भी सुंदर मिल जाती हैं वो तब तक साथ देती हैं जब तक प्रसिद्धि और पैसा रहता है अन्यथा बाद में चरित्र शोषण का आरोप और मुकदमा कर देती हैं। जो लोग अपनी एक्टिविटी से प्रसिद्धि और पैसा बरकरार रख लेते हैं उनका सब कुछ आजीवन ढका चला करता है।
     वैसे भी पूज्य साधक संतों  के पास नाचने गाने उछलने कूदने का समय ही कहॉं होता है उन्हें किसी को खुश  करने की आवश्यकता ही क्या है ?महात्मा तो केवल ईश्वर के लिए ही जीवन धारण करते हैं। जिन संतों की महिमा से वेद पुराण भरे पड़े हैं उनका जीवन कुछ तो अलग होना ही चाहिए । जो गृहस्थ न कर सकता हो। नाचना, गाना, उछलना, कूदना, रामायण और भागवत आदि कथा प्रवचन या अन्य सभी प्रकार के धार्मिक कार्य तो गृहस्थ भी कर लेते हैं। श्रृद्धेय मालवीय जी ने काशी  हिंदू विश्व विद्यालय जैसा शिक्षा का विशाल तीर्थ स्थापित किया। जहॉं तक नाचने गाने बजाने की बात है फिल्मीजगत से जुड़े लोग किसी और की अपेक्षा यह कार्य अधिक अच्छा कर सकते हैं इन लोगों के पहुँचने मात्र से भीड़ अपने आप लग जाएगी। वैसे भी संत ही जब नाचने गाने उछलने कूदने लग जाएँगे तो फिल्मों से जुडे लोग गीता प्रवचन तो करेंगे नहीं। नग्नता फूहडता अश्लीलता आदि में उन्हें घुसना ही पड़ेगा़ आखिर उनका तो ये धंधा है।
      गोशाला बनाने से यदि कोई संत बन जाता तो ग्वाले क्या बुरे थे ? आसन सिखाने से कोई संत होता तो किसान या मजदूर आदि परिश्रमी वर्ग के लोग क्या बुरे थे ? जिन्हें दिनभर में कई कई बार ये सब आसन करने पड़ते हैं।योग के नाम पर भोग के साधन जुटा कर कोई योगी कैसे हो सकता है ?यदि नहीं तो हजारों करोड़ का होगा क्या ? कंचन कीर्ति कामिनी  को त्यागने के लिए लोग योगी या संत बनते हैं।कंचन का अर्थ होता  है धन,इसे इकट्ठा करने के लिए जो पागलों की तरह जुटा पड़ा हो, कीर्ति का अर्थ है यश के लिए जो चैनलों से ही चिपका रहता हो।और यदि कंचन और कीर्ति के विषय में संयम न रख सका हो तो तीसरे का संयम राम भरोषे।कामिनी का विषय तो ऐसा है एक पति या पत्नी व्रत या बहु पति या पत्नी व्रत अथवा कोई ब्याभिचारी भी बासना का सेवन तो एकांत में ही करते हैं।कोई किसी को नहीं देखता है तो सब संयमी हैं सब योगी हैं किसी के भी बारे में क्या कहा जा सकता है ? 

            आखिर,  त्याग, तपस्या, चरित्र और संयमी जीवन की पावन प्रेरणा अब समाज को कौन देगा ? जो कथा प्रवचनों से ही नहीं अपितु आचरण से मिलती है यह दिव्य संतों  के अलावा कहीं और से नहीं मिल पाती जिससे प्रभावित होकर  उन संतों की दिव्य दिनचर्या में समाज अपने जीवन मूल्य स्वयं ढूँढ़ लेता है। जिसका अनुभव लोगों  को स्वयं हो जाता है। आज सबसे बड़ी चिंता इसी बात की है कौन मिटाएगा समाज की यह भूख कैसे सुधरेंगे संस्कार?इसके बिना अपराधमुक्त समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है ?
     अपराध सोचे मन से जाते हैं  करता शरीर है। अपराधी को मृत्युदंड देकर भी अपराध के विषय में सोचने पर नियंत्रण नहीं लगाया जा सकता है। दंड के नाम पर मृत्युदंड से बढ़कर कानून और कुछ नहीं दे सकता है यह दंड तो अपराध करने के बाद अक्सर अपराधी स्वयं चुन लेते हैं । यह सबसे अधिक चिंता का  विषय है।जन्म जन्मान्तर के संस्कारों पुण्यों से किसी किसी को अपने प्राचीन पापों का पता लग पाता है। अपने काले मन को धोने के लिए कोई कोई चरित्रवान, व्रती, विद्वान, वैरागी और भक्त ही इस पथ पर अग्रसर होता है।यह पंथ आसान नहीं है अत्यंत कठिन है बड़ों बड़ों का मन डोल जाता है। इस प्रकार अदृढ़ वैराग्यवान लोग भटक जाते हैं और काले मन का मुद्दा बीच में ही छोड़कर काले तन अर्थात औरों का स्वास्थ्य ठीक करने का नारा देकर टी.वी.चैनलों पर बैठकर  रोगों की लंबी लंबी लिस्टें पढ़ते हैं उन्हें ठीक करने का दावा ठोकते हैं। योग केbbb नाम पर आसन सिखाना,दवा के नाम पर कुछ भी बेचकर धन इकट्ठा करना,फिर उसे सुरक्षित करने की चिंता होनी स्वाभाविक बात है। अब अपने धन एवं अपनी सुरक्षा हेतु सरकार पर दबाव बनाने के लिए मुद्दा बदल दिया अबकी काले धन का नारा दिया और रथ यात्रा के बहाने मनोरथ यात्रा लेकर निकल पडे़ जिसमें औरों के काले धन पर बडे़ बडे़ भाषण देने लगे।
     शायद ये भूल ही गए कि संत समाज शास्त्रीय संविधान के प्रति जवाबदेय होता है। जहॉं संतों को कंचन कामिनी से बचने की सलाह दी गई है इस दृष्टि  से साधुओं का सारा धन ही काला होता है। साधुवेष  या भिक्षावृत्ति से संगृहीत धन को कमाया हुआ धन कैसे कहा जा सकता है?साधु संतों को व्यवसाय की अनुमति शास्त्र देता नहीं है। ऐसे संगृहीत धन को क्या कहा जाएगा मैं आप सबसे पूछता हूँ ?कोई व्रह्मचारी यदि अपने साधु स्वरूप से लोगों को प्रभावित करके धन इकट्ठा करले फिर किसी अपने से आधी उम्र की चेली से कोर्टमैरिज करके बच्चे पैदा करे तो हो सकता है कि कानूनी  दृष्टि  से यह गलत न हो किंतु   शास्त्रीय संविधान इस दुकृत्य की घोर निंदा करता है। केवल यदि नेताओं या अन्य नागरिकों से संविधान सम्मत जीवन जीने की अपेक्षा की जाती है तो साधु महात्माओं को भी  शास्त्रीय संविधान का परिपालन ईमानदारी पूर्वक स्वयमेव करना चाहिए तभी वे संत महात्मा कहलाने के अधिकारी हैं। चरित्रवाऩ  तपस्वी शास्त्रीय संविधान सम्मत संतों के सत्व पर ही समाज टिका हुआ है ऐसे संत पुनः  प्रकट  होकर समाज को सॅंभालें यही अपेक्षा एवं आशा  तथा ईश्वर से  प्रार्थना है।  

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु  ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी नीतिगत  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

Wednesday, December 19, 2012

फर्जी शंकराचार्यों का कुंभ .....!!!

 बिना वैराग्य के संन्यासी कैसा बिना संन्यास के  

                       कैसे   कैसे  शंकराचार्य ....!!!

 

     नकली शंकराचार्यों ने असली शंकराचार्य को कुम्भ से बाहर जाने पर मजबूर कर दिया और नकली शंकराचार्यों का प्रशासन पर दबदबा भी  दिखाई दे रहा है ।आज संन्यासी भी दो प्रकार के होने लगे हैं एक असली और दूसरे नकली ।नकली संन्यासी असली वालों से ज्यादा बन ठन कर रहते हैं इनमें साधुत्व तो होता ही नहीं है प्रत्युत संन्यास का गौरव भी गिरा रहे होते हैं।इनके सारे आचार व्यवहार गृहस्थों के सामान होते हैं केवल गृहस्थ को  किसी से माँगने में अच्छा नहीं लगता था घर वाले बेइज्जती महसूस करते होंगे इसलिए साधू बनकर माँगने में वह शर्म भी छूट जाती है। अब कहीं भी कुछ भी किसी से भी बेहिचक माँगा जा सकता है उससे धर्म और समाज सेवा के नाम सारे सुख सुविधा के साधन  जोड़ लिए जाते हैं ।योग पीठ, आश्रमी होटल कथा कीर्तन के नाम पर नाच गाना विद्यालय गोशाला भोग भंडारा किसी संगठन के अध्यक्ष, महामंत्री आदि कुछ भी बन जाते हैं कुछ लोग तो सांसद मंत्री सब कुछ बन जाते हैं अपनी हर भोग भावना भक्तों की  ईच्छा पर डाल कर सुख सुविधा युक्त जीवन जीते हैं ।

        बात बनारस की है भक्तों की  ईच्छा का सम्मान करते हुए एक साधू महराज ने एक सुंदरी को शिष्या बनाया फिर उसे अपना सब कुछ बना लिया जब कोई पूछे तो सहज स्वभाव से अपनी बात बता देते कि क्या करें भक्त नहीं मानें उन्होंने कहा कि महाराज जी आप अकेले रहते हो आपका जीवन हम सबके लिए बहुमूल्य है आपको सेविका तो चाहिए ही इतना तो बनता भी है । भक्त नहीं माने इस लिए मैंने इसे रख लिया क्या करता ?वैसे भी रखते तो लगभग सभी लोग हैं किन्तु हमारा आश्रम छोटा होने के कारण कुछ छिप नहीं पाता है।इस प्रकार भक्तों की  ईच्छा का सम्मान करने के नाम पर आधुनिक  साधू महाराज सारी  सुख सुविधाएँ जोड़ लेते हैं ।इसमें उनकी कोई गलती नहीं है ।बंधुओं !वैराग्य इतना आसान भी नहीं होता है ।सबसे कठिन होता है वैराग्य!तभी तो उस वेष का सम्मान आज है पहले था आगे भी रहेगा।जिनका पूर्व जन्म के पापों के प्रभाव से इस जन्म में भी पूजन भजन में मन ही नहीं लगता है ।ऐसे ही लोग पूर्व में कहे गए सारे प्रपंचों में अपने को फँसा कर अपना समय पास किया करते हैं। 

         पूर्व जन्म के पाप से हरि चर्चा न सोहात। 

    नेता और नकली संन्यासी दोनों एक जैसे होते हैं दोनों समाज के लिए बहुत कुछ करने का नाटक करते हैं किन्तु करते सब अपने लिए ही  हैं ।

        दोनों की अपनी अपनी पोशाक होती है एक की खादी तो दूसरे की भगवा ।इसीप्रकार दोनों दूसरे की कमाई पर जीवित रहकर भी दूसरों के लिए बहुत कुछ करने का दिखावा किया करते हैं।दोनों को भाषण देने की बड़ी लत होती है।दोनों  पदवी पाने के लिए प्राण दे रहे होते हैं।नेता चाहे कूड़ा उठाने वालों का ही अध्यक्ष बनें किन्तु बिना अध्यक्ष बने नहीं रह सकता है इसीप्रकार नकली संन्यासी बिना किसी पद के नहीं रह सकता है चाहे  मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, महंत श्री महंत या फर्जी शंकराचार्य आदि ही बनने का आडंबर

क्यों न किया  हो।

असली शास्त्रीय संन्यासियों के लक्षण 

    संन्यासियों या किसी भी प्रकार के महात्माओं को काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य   आदि विकारों पर नियंत्रण तो रखना ही चाहिए यदि पूर्ण नियंत्रण न रख सके तब भी प्रयास तो पूरा होना ही चाहिए।वैराग्य की दृढ़ता दिखाने के लिए कहा गया कि स्त्री यदि लकड़ी की भी बनी हो तो भी वैराग्य व्रती उसका स्पर्श न करे.....!

              दारवीमपि  मा  स्पृशेत्||

              माता स्वस्रा दुहित्रा वा .... ! 

   माता, मौसी ,बहन,पुत्री आदि के साथ भी अकेले न बैठे। 

   शंकराचार्य जी कहा कि विरक्तों के लिए नरक का प्रधान द्वार नारी है-

              द्वारं किमेकं नरकस्य नारी 

इसी प्रकार 

      शूरान् महा शूर तमोस्ति को वा 

              प्राप्तो न मोहं ललना कटाक्षैः||     -शंकराचार्य

         का श्रंखला  प्राण भृतां हि नारी       -शंकराचार्य

मत्स्य पुराण में कहा गया है कि बशीभूत मन वालेसंन्यासियों को साल के आठ महीने तक विचरण करना चाहिए अर्थात पूरे देश में भ्रमण करना चाहिए।वर्षा के चार महीने एक स्थान पर रह कर चातुर्मास व्रत करे ।

    अत्रि ऋषि ने कहा है कि ये छै चीजें नृप दंड के समान मानकर संन्यासी अवश्य करे   -

1. भिक्षा माँगना

2.जप करना

3.स्नानकरना

4.ध्यानकरना

5.शौच अर्थात पवित्र रहना

6.देवपूजन करना  

      इसीप्रकार न करने वाली छै बातें बताई गई हैं -

1.शय्या अर्थात बिस्तर पर सोना 

2.सफेद वस्त्र पहनना 

3.स्त्रियोंसे संबधित चर्चा करना या सुनना एवंस्त्रियोंके पास रहना वा स्त्रियों को अपने पास रखना 

4.चंचलता का रहन सहन 

5.दिन में सोना 

6. यानं अर्थात बाहन    



    किसी भी प्रकार से ये छै चीजें अपनाने से संन्यासी पतित अर्थात भ्रष्ट हो जाते हैं।यथा -

   मञ्चकं शुक्ल वस्त्रं च स्त्रीकथा  लौल्य मेव च |

   दिवास्वापं  च  यानं  च  यतीनां पतनानि षट् || 

                                                          -अत्रि ऋषि 

इसीप्रकार ब्राह्मण गृहस्थ जीवन की सांसारिक उठापटक से मुक्त निर्विकार निर्लिप्त रहने वाले स्वाभाविकआचरण वाले ब्रह्म-जीवी थे। इन्हें विप्र कहा जाता है। जिनको भी मिलना होता इनके घर आते थे।संन्यास काअधिकार ब्राह्मणों को दिया गया है ।

आत्मन्यग्नीन्समारोप्य  ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् | 

                                                              जाबालश्रुतेः 

     वैष्णव सम्प्रदाय में नियम था कि जो महंत होगा वह तो अविवाहित होगा ही होगा अन्य लोग चाहें तो अविवाहित भी रह सकते थे और विवाह भी कर सकते थे | शैव सम्प्रदाय की सभी जातियों के लिए नियम थे कि वे गाँव, बस्ती में प्रवेश नहीं करते थे। आचार्य शंकर ने संन्यासी सम्प्रदाय को काल-स्थान-परिस्थिति के अनुरूप एक नई दशनामी व्यवस्था दी और इनको दस वर्गों में विभाजित किया|ये दस नाम इस प्रकार हैं:-

(1) तीर्थ (2) आश्रम (3) सरस्वती (4) भारती (5) वन (6) अरण्य (7) पर्वत (8) सागर (9) गिरि (10) पुरी

इनमें अलखनामी और दण्डी दो विशेष सम्मानित शाखाये थीं। दण्डी वे संन्यासी होते थे जो ब्राह्मण से संन्यासी बनते थे। इनके हाथ में दण्ड[डण्डा] होता था। ये आत्म-अनुशासित थे

         हिन्दू धर्म की मान्यताओं, परम्पराओं में आ रही गिरावट को देखते हुए आदि शंकराचार्य ने ज्ञानमार्गी परम्परा को पुनर्जीवित किया और अद्वैत दर्शन की मूल अवधारणा ‘बृह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ को स्थापित किया। इसके लिए उन्होने समूचे देश में अद्वैत और वेदांत का प्रसार किया। काशी के महान विद्वान मंडनमिश्र के साथ उनका शास्त्रार्थ, इस सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ी थी, जिसने उन्हें समूचे देश में धर्म दिग्विजयी के रूप में स्थापित कर दिया।

        शंकराचार्य ने  प्राचीन आश्रम और मठ परम्परा में नए प्राण फूँके। शंकराचार्य ने अपना ध्यान संन्यास आश्रम पर केंद्रित किया और समूचे देश में दशनामी संन्यास परम्परा और अखाड़ों की नींव डाली।

दशनामी परम्परा:

आदि शंकराचार्य ने संन्यासियों की आदि-व्यवस्था, अद्वैतवाद और वेदांत दर्शन के संस्थापक महर्षि वेदव्यास के पुत्र बालयोगी शुकदेव ने की थी। शुकदेव ने पिता से प्रेरित होकर यह कार्य किया था। पौराणिक काल से वह व्यवस्था चली आ रही थी, जिसका पुनरुद्धार आदि शंकराचार्य ने दशनामी सम्प्रदाय बनाकर किया। पहले सभी दशनामी शैव मत में दीक्षित एवं शास्त्र-प्रवीण होते थे ,जिससे धर्म-परम्परा विस्मृत समाज को दिशा मिल  पाती थी। यह भी कहा जाता है कि शंकराचार्य के सुधारवाद का तत्कालीन समाज में खूब विरोध भी हुआ था और साधु समाज को उग्र और हिंसक साम्प्रदायिक विरोध से जूझना पड़ता था। काफी सोच-विचार के बाद शंकराचार्य ने वनवासी समाज को दशनामी परम्परा से जोड़ा, ताकि उग्र विरोध का सामना किया जा सके। वनवासी समाज के लोग अपनी रक्षा करने में समर्थ थे, और शस्त्र प्रवीण भी। इन्हीं शस्त्रधारी वनवासियों की जमात नागा साधुओं के रूप में सामने आई।

      शंकराचार्य ने दशनामी परम्परा को महाम्नाय के अनुशासन से बाँधा। आम्नाय का अर्थ है रीति, वैदिक ज्ञान, पुण्य-प्रेरित ज्ञान, कुल तथा राष्ट्र की परम्पराएँ।

आदि शंकराचार्यजी  ने देश के चार कोनों में जिसमें  दक्षिण में श्रंगेरी, पूर्व में पुरी , पश्चिम में द्वारका व उत्तर में बद्रीनाथ में मठ स्थापित किए,चारों दिशाओं में स्थापित मठों को जब महाम्नाय अर्थात सनातन हिन्दुत्व की नवोन्मेषी धारा से बाँधा गया, तो उसे मठाम्नाय कहा गया। इन्हीं मठाम्नायों के साथ दशनामी संन्यासी संयुक्त हुए। वन, अरण्य, नामधारी संन्यासी उड़ीसा के जगन्नाथपुरी स्थित गोवर्धन पीठ से संयुक्त हुए। पश्चिम में द्वारिकापुरी स्थित शारदापीठ के साथ तीर्थ एवं आश्रम नामधारी संन्यासियों को जोड़ा गया। उत्तर स्थित बद्रीनाथ के ज्योतिर्पीठ के साथ गिरी, पर्वत और सागर नामधारी संन्यासी जुड़े, तो सरस्वती, पुरी और भारती नामधारियों को दक्षिण के श्रृंगेरी मठ के साथ जोड़ा गया।

सैनिक संन्यासियों का स्वरूप:

इन मठाम्नायों के साथ अखाड़ों की परम्परा भी लगभग इनकी स्थापना के समय से ही जुड़ गई थी। चारों पीठों की देशभर में उपपीठ स्थापित हुई। कई शाखाएँ-प्रशाखाएँ बनीं, जहाँ धूनि, मढ़ी अथवा अखाड़े जैसी व्यवस्थाएँ  बनीं। जिनके जरिए, स्वयं संन्यासी पोथी, चोला का मोह छोड़ कर, थोड़े समय के लिए शस्त्रविद्या सीखते थे, साथ ही आमजन को भी इन अखाड़ों के जरिये आत्मरक्षा के लिए सामरिक कलाएँ सिखाते थे। इस तरह अखाड़ों के जरिए धर्मरक्षक सेना का एक स्वरूप बनता चला गया। अखाड़ों का यह स्वरूप प्रायः हर धर्म-सम्प्रदाय में रहा है। दुनियाँ भर के धार्मिक आंदोलनों के साथ अखाड़ा अर्थात आत्मरक्षा से जुड़ी तकनीक को ध्यान-प्राणायाम से जोड़कर अपनाया गया। हर धार्मिक सम्प्रदाय के साथ शस्त्रधारी रहे हैं और धर्म या पंथ अथवा मठ पर आए खतरों का सामना इन्होंने किया है। जिसे बाद में आत्मरक्षा की कला के तौर पर मान्यता दे दी गई।             मध्यकाल में चारों पीठों से जुड़ी दर्जनों पीठिकाएँ  सामने आईं, जिन्हें मठिका कहा गया। इसका देशज रूप मढ़ी प्रसिद्ध हुआ। देशभर में दशनामियों की ऐसी कुल 52 मढ़ियाँ हैं, जो चारों पीठों द्वारा नियंत्रित हैं।

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

 


 

 


  


 

   

   

 


कौन बन सकता है मण्डलेश्वर ?

 बिना वैराग्य के संन्यासी कैसा बिना संन्यास के  

                       कैसे   कैसे  शंकराचार्य ....!!!

   वास्तविक संत झूठ फरेब धोखाधड़ी चोरी छिनारा बदमाशी ब्याभिचार आदि सभी प्रकार के प्रपंचों से दूर रहने वाले विरक्त संत न तो किसी नेता की चाटुकारिता करते हैं और न ही किसी धनी सेठ साहूकार की! इसी लिए उन्हें भी न कभी कोई नेता घास डालता है और न ही कोई धनी सेठ साहूकार आदि! किन्तु उन्हें इसकी परवाह भी नहीं होती है वो शास्त्रों के अनुशार जीना चाहते हैं और भगवान के भरोसे रहना चाहते हैं जो मिला जहाँ मिला वहाँ अपने संन्यास धर्म की मर्यादा के अनुशार उसे ईच्छा हुई तो स्वीकार किया अन्यथा बिना परवाह किए छोड़ कर चल दिए !ये संन्यासी हमारे प्रणम्य महापुरुष हैं। 

     दूसरे  नकली संन्यासी असली वालों से ज्यादा बन ठन कर रहते हैं  इनमें साधुत्व तो होता ही नहीं है प्रत्युत संन्यास का गौरव भी गिरा रहे होते हैं।अबकी बार नकली साधुओं ने असली साधुओं को कुम्भ जैसे मेले बाहर जाने पर मजबूर कर दिया!नकली साधुओंका प्रशासन पर भी दबदबा इतना अधिक दिखाई देता है कि जो वो कहते हैं वो प्रशासन मानता है और प्रशासन कहता वो ये मानते हैं!नकली साधुओं के सारे आचार व्यवहार गृहस्थों के सामान होते हैं केवल गृहस्थ किसी से माँगने में अच्छा नहीं लगता था घर वाले बेइज्जती महसूस करते होंगे इसलिए साधू बनकर माँगने में वह शर्म भी छूट जाती है अब कहीं भी कुछ भी किसी से भी बेहिचक माँगा जा सकता है उससे धर्म और समाज सेवा के नाम सारे सुख सुविधा के साधन  जोड़ लिए जाते हैं ।योग पीठ, आश्रमी होटल कथा कीर्तन के नाम पर नाच गाना विद्यालय गोशाला भोग भंडारा किसी संगठन के अध्यक्ष, महामंत्री आदि कुछ भी बन जाते हैं कुछ लोग तो सांसद मंत्री सब कुछ बन जाते हैं अपनी हर भोग भावना भक्तों के ईच्छा पर डाल कर सुख सुविधा युक्त जीवन जीते हैं ।

        बात बनारस की है भक्तों की  ईच्छा का सम्मान करते हुए एक साधू महराज ने एक सुंदरी को शिष्या बनाया फिर उसे अपना सब कुछ बना लिया जब कोई पूछे तो सहज स्वभाव से अपनी बात बता देते कि क्या करें भक्त नहीं मानें उन्होंने कहा कि महाराज जी आप अकेले रहते हो आपका जीवन हम सबके लिए बहुमूल्य है आपको सेविका तो चाहिए ही इतना तो बनता भी है । भक्त नहीं माने इस लिए मैंने इसे रख लिया क्या करता ?वैसे भी रखते तो लगभग सभी लोग हैं किन्तु हमारा आश्रम छोटा होने के कारण कुछ छिप नहीं पाता है।इस प्रकार भक्तों की  ईच्छा का सम्मान करने के नाम पर आधुनिक  साधू महाराज सारी  सुख सुविधाएँ जोड़ लेते हैं ।इसमें उनकी कोई गलती नहीं है ।बंधुओं !वैराग्य इतना आसान भी नहीं होता है ।सबसे कठिन होता है वैराग्य!तभी तो उस वेष का सम्मान आज है पहले था आगे भी रहेगा।जिनका पूर्व जन्म के पापों के प्रभाव से इस जन्म में भी पूजन भजन में मन ही नहीं लगता है ।ऐसे ही लोग पूर्व में कहे गए सारे प्रपंचों में अपने को फँसा कर अपना समय पास किया करते हैं। 

         पूर्व जन्म के पाप से हरि चर्चा न सोहात। 

    नेता और नकली संन्यासी दोनों एक जैसे होते हैं दोनों समाज के लिए बहुत कुछ करने का नाटक करते हैं किन्तु करते सब अपने लिए ही  हैं ।

        दोनों की अपनी अपनी पोशाक होती है एक की खादी तो दूसरे की भगवा ।इसीप्रकार दोनों दूसरे की कमाई पर जीवित रहकर भी दूसरों के लिए बहुत कुछ करने का दिखावा किया करते हैं।दोनों को भाषण देने की बड़ी लत होती है।दोनों  पदवी पाने के लिए प्राण दे रहे होते हैं।नेता चाहे कूड़ा उठाने वालों का ही अध्यक्ष बनें किन्तु बिना अध्यक्ष बने नहीं रह सकता है इसीप्रकार नकली संन्यासी बिना किसी पद के नहीं रह सकता है चाहे  मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर, महंत श्री महंत या फर्जी शंकराचार्य आदि ही बनने का आडंबर

क्यों न किया  हो।

असली शास्त्रीय संन्यासियों के लक्षण 

    संन्यासियों या किसी भी प्रकार के महात्माओं को काम क्रोध लोभ मोह मद मात्सर्य   आदि विकारों पर नियंत्रण तो रखना ही चाहिए यदि पूर्ण नियंत्रण न रख सके तब भी प्रयास तो पूरा होना ही चाहिए।वैराग्य की दृढ़ता दिखाने के लिए कहा गया कि स्त्री यदि लकड़ी की भी बनी हो तो भी वैराग्य व्रती उसका स्पर्श न करे.....!

              दारवीमपि  मा  स्पृशेत्||

              माता स्वस्रा दुहित्रा वा .... ! 

   माता, मौसी ,बहन,पुत्री आदि के साथ भी अकेले न बैठे। 

   शंकराचार्य जी कहा कि विरक्तों के लिए नरक का प्रधान द्वार नारी है-

              द्वारं किमेकं नरकस्य नारी 

इसी प्रकार 

      शूरान् महा शूर तमोस्ति को वा 

              प्राप्तो न मोहं ललना कटाक्षैः||     -शंकराचार्य

         का श्रंखला  प्राण भृतां हि नारी       -शंकराचार्य

मत्स्य पुराण में कहा गया है कि बशीभूत मन वालेसंन्यासियों को साल के आठ महीने तक विचरण करना चाहिए अर्थात पूरे देश में भ्रमण करना चाहिए।वर्षा के चार महीने एक स्थान पर रह कर चातुर्मास व्रत करे ।

    अत्रि ऋषि ने कहा है कि ये छै चीजें नृप दंड के समान मानकर संन्यासी अवश्य करे   -

1. भिक्षा माँगना

2.जप करना

3.स्नानकरना

4.ध्यानकरना

5.शौच अर्थात पवित्र रहना

6.देवपूजन करना  

      इसीप्रकार न करने वाली छै बातें बताई गई हैं -

1.शय्या अर्थात बिस्तर पर सोना 

2.सफेद वस्त्र पहनना 

3.स्त्रियोंसे संबधित चर्चा करना या सुनना एवंस्त्रियोंके पास रहना वा स्त्रियों को अपने पास रखना 

4.चंचलता का रहन सहन 

5.दिन में सोना 

6. यानं अर्थात बाहन

    किसी भी प्रकार से ये छै चीजें अपनाने से संन्यासी पतित अर्थात भ्रष्ट हो जाते हैं।यथा -

   मञ्चकं शुक्ल वस्त्रं च स्त्रीकथा  लौल्य मेव च |

   दिवास्वापं  च  यानं  च  यतीनां पतनानि षट् || 

                                                          -अत्रि ऋषि 

   इसीप्रकार ब्राह्मण गृहस्थ जीवन की सांसारिक उठापटक से मुक्त निर्विकार निर्लिप्त रहने वाले स्वाभाविकआचरण वाले ब्रह्म-जीवी थे। इन्हें विप्र कहा जाता है। जिनको भी मिलना होता इनके घर आते थे।संन्यास काअधिकार ब्राह्मणों को दिया गया है ।

आत्मन्यग्नीन्समारोप्य  ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् | 

                                                              जाबालश्रुतेः 

     वैष्णव सम्प्रदाय में नियम था कि जो महंत होगा वह तो अविवाहित होगा ही होगा अन्य लोग चाहें तो अविवाहित भी रह सकते थे और विवाह भी कर सकते थे | शैव सम्प्रदाय की सभी जातियों के लिए नियम थे कि वे गाँव, बस्ती में प्रवेश नहीं करते थे। आचार्य शंकर ने संन्यासी सम्प्रदाय को काल-स्थान-परिस्थिति के अनुरूप एक नई दशनामी व्यवस्था दी और इनको दस वर्गों में विभाजित किया|ये दस नाम इस प्रकार हैं:-

(1) तीर्थ (2) आश्रम (3) सरस्वती (4) भारती (5) वन (6) अरण्य (7) पर्वत (8) सागर (9) गिरि (10) पुरी

इनमें अलखनामी और दण्डी दो विशेष सम्मानित शाखाये थीं। दण्डी वे संन्यासी होते थे जो ब्राह्मण से संन्यासी बनते थे। इनके हाथ में दण्ड[डण्डा] होता था। ये आत्म-अनुशासित थे

         हिन्दू धर्म की मान्यताओं, परम्पराओं में आ रही गिरावट को देखते हुए आदि शंकराचार्य ने ज्ञानमार्गी परम्परा को पुनर्जीवित किया और अद्वैत दर्शन की मूल अवधारणा ‘बृह्म सत्यं जगन्मिथ्या’ को स्थापित किया। इसके लिए उन्होने समूचे देश में अद्वैत और वेदांत का प्रसार किया। काशी के महान विद्वान मंडनमिश्र के साथ उनका शास्त्रार्थ, इस सिलसिले की महत्वपूर्ण कड़ी थी, जिसने उन्हें समूचे देश में धर्म दिग्विजयी के रूप में स्थापित कर दिया।

        शंकराचार्य ने  प्राचीन आश्रम और मठ परम्परा में नए प्राण फूँके। शंकराचार्य ने अपना ध्यान संन्यास आश्रम पर केंद्रित किया और समूचे देश में दशनामी संन्यास परम्परा और अखाड़ों की नींव डाली।

दशनामी परम्परा:

आदि शंकराचार्य ने संन्यासियों की आदि-व्यवस्था, अद्वैतवाद और वेदांत दर्शन के संस्थापक महर्षि वेदव्यास के पुत्र बालयोगी शुकदेव ने की थी। शुकदेव ने पिता से प्रेरित होकर यह कार्य किया था। पौराणिक काल से वह व्यवस्था चली आ रही थी, जिसका पुनरुद्धार आदि शंकराचार्य ने दशनामी सम्प्रदाय बनाकर किया। पहले सभी दशनामी शैव मत में दीक्षित एवं शास्त्र-प्रवीण होते थे ,जिससे धर्म-परम्परा विस्मृत समाज को दिशा मिल  पाती थी। यह भी कहा जाता है कि शंकराचार्य के सुधारवाद का तत्कालीन समाज में खूब विरोध भी हुआ था और साधु समाज को उग्र और हिंसक साम्प्रदायिक विरोध से जूझना पड़ता था। काफी सोच-विचार के बाद शंकराचार्य ने वनवासी समाज को दशनामी परम्परा से जोड़ा, ताकि उग्र विरोध का सामना किया जा सके। वनवासी समाज के लोग अपनी रक्षा करने में समर्थ थे, और शस्त्र प्रवीण भी। इन्हीं शस्त्रधारी वनवासियों की जमात नागा साधुओं के रूप में सामने आई।

      शंकराचार्य ने दशनामी परम्परा को महाम्नाय के अनुशासन से बाँधा। आम्नाय का अर्थ है रीति, वैदिक ज्ञान, पुण्य-प्रेरित ज्ञान, कुल तथा राष्ट्र की परम्पराएँ।

आदि शंकराचार्यजी  ने देश के चार कोनों में जिसमें  दक्षिण में श्रंगेरी, पूर्व में पुरी , पश्चिम में द्वारका व उत्तर में बद्रीनाथ में मठ स्थापित किए,चारों दिशाओं में स्थापित मठों को जब महाम्नाय अर्थात सनातन हिन्दुत्व की नवोन्मेषी धारा से बाँधा गया, तो उसे मठाम्नाय कहा गया। इन्हीं मठाम्नायों के साथ दशनामी संन्यासी संयुक्त हुए। वन, अरण्य, नामधारी संन्यासी उड़ीसा के जगन्नाथपुरी स्थित गोवर्धन पीठ से संयुक्त हुए। पश्चिम में द्वारिकापुरी स्थित शारदापीठ के साथ तीर्थ एवं आश्रम नामधारी संन्यासियों को जोड़ा गया। उत्तर स्थित बद्रीनाथ के ज्योतिर्पीठ के साथ गिरी, पर्वत और सागर नामधारी संन्यासी जुड़े, तो सरस्वती, पुरी और भारती नामधारियों को दक्षिण के श्रृंगेरी मठ के साथ जोड़ा गया।

सैनिक संन्यासियों का स्वरूप:

इन मठाम्नायों के साथ अखाड़ों की परम्परा भी लगभग इनकी स्थापना के समय से ही जुड़ गई थी। चारों पीठों की देशभर में उपपीठ स्थापित हुई। कई शाखाएँ-प्रशाखाएँ बनीं, जहाँ धूनि, मढ़ी अथवा अखाड़े जैसी व्यवस्थाएँ  बनीं। जिनके जरिए, स्वयं संन्यासी पोथी, चोला का मोह छोड़ कर, थोड़े समय के लिए शस्त्रविद्या सीखते थे, साथ ही आमजन को भी इन अखाड़ों के जरिये आत्मरक्षा के लिए सामरिक कलाएँ सिखाते थे। इस तरह अखाड़ों के जरिए धर्मरक्षक सेना का एक स्वरूप बनता चला गया। अखाड़ों का यह स्वरूप प्रायः हर धर्म-सम्प्रदाय में रहा है। दुनियाँ भर के धार्मिक आंदोलनों के साथ अखाड़ा अर्थात आत्मरक्षा से जुड़ी तकनीक को ध्यान-प्राणायाम से जोड़कर अपनाया गया। हर धार्मिक सम्प्रदाय के साथ शस्त्रधारी रहे हैं और धर्म या पंथ अथवा मठ पर आए खतरों का सामना इन्होंने किया है। जिसे बाद में आत्मरक्षा की कला के तौर पर मान्यता दे दी गई।             मध्यकाल में चारों पीठों से जुड़ी दर्जनों पीठिकाएँ  सामने आईं, जिन्हें मठिका कहा गया। इसका देशज रूप मढ़ी प्रसिद्ध हुआ। देशभर में दशनामियों की ऐसी कुल 52 मढ़ियाँ हैं, जो चारों पीठों द्वारा नियंत्रित हैं।

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

 


 

 


 

 नित्यानंद को आनंद ही आनंद है


 

   

   

 


Tuesday, December 18, 2012

संघ संस्कारों पर टिकी कांग्रेस गुजरात में

   शंकर सिंह बघेला, केशू भाई पटेलएवं   नरेंद्र मोदी

  

  गुजरात परिवर्तन पार्टी  के प्रमुख केशू भाई पटेल एवं  गुजरात में कांग्रेस के प्रमुख नेता शंकर सिंह बघेला के विषय में सबको पता है कि ये पूर्व भाजपाई हैं। नरेंद्र मोदी जी तो वर्तमान में भी भाजपाई  ही हैं ।

        भाजपा के लिए इससे अधिक प्रसन्नता  और दुःख का विषय दूसरा  और क्या हो सकता है कि वह  ही गुजरात में तीनों रूपों में विद्यमान  है।

      प्रसन्नता यह कि गुजरात में भाजपा के सुसंस्कार ही पल्लवित हो सके कांग्रेस को  वहाँ अपने संस्कारों का सक्षम नेतृत्व खड़ा करने में उतनी सफलता नहीं मिलने दी गई जितनी मिल सकती थी ।

     भाजपा के लिए दूसरा दुःख का विषय यह है कि यदि पार्टी में आपसी असंतोष रोका जा सका होता तो

भाजपा के लिए वर्तमान चुनाव और अधिक प्रसन्नता प्रदान करने वाले होते ।

 

गुजरात भाजपा तीन रूपों में

   शंकर सिंह बघेला, केशू भाई पटेलएवं   नरेंद्र मोदी

  

  गुजरात परिवर्तन पार्टी  के प्रमुख केशू भाई पटेल एवं  गुजरात में कांग्रेस के प्रमुख नेता शंकर सिंह बघेला के विषय में सबको पता है कि ये पूर्व भाजपाई हैं। नरेंद्र मोदी जी तो वर्तमान में भी भाजपाई  ही हैं ।

        भाजपा के लिए इससे अधिक प्रसन्नता  और दुःख का विषय दूसरा  और क्या हो सकता है कि वह  ही गुजरात में तीनों रूपों में विद्यमान  है।

      प्रसन्नता यह कि गुजरात में भाजपा के सुसंस्कार ही पल्लवित हो सके कांग्रेस को  वहाँ अपने संस्कारों का सक्षम नेतृत्व खड़ा करने में उतनी सफलता नहीं मिलने दी गई जितनी मिल सकती थी ।

     भाजपा के लिए दूसरा दुःख का विषय यह है कि यदि पार्टी में आपसी असंतोष रोका जा सका होता तो

भाजपा के लिए वर्तमान चुनाव और अधिक प्रसन्नता प्रदान करने वाले होते ।

 

T.V. Program Aur Mahilaen

 महिलाएँ एवं महिला संगठन भी जिम्मेदारी निभाएँ 

   देश की राजधानी दिल्ली में एक लड़के लड़की का जोड़ा जिस तरह से कुछ अपराधियों के अत्याचार का शिकार हुआ वह अत्यंत शर्मनाक है।निःसंदेह ऐसे किसी भी दुर्व्यवहार की न केवल निंदा करनी चाहिए  अपितु कठोर से कठोर कानूनी कार्यवाई भी होनी चाहिए जिसे देख सुनकर ऐसे अपराधियों के हृदय  हिल जाएँ।आखिर यह क्या हो रहा है अपने  देश में?कौन है इस बिगड़ती कानून व्यवस्था  का जिम्मेदार ! यदि संभव हो तो ऐसी किसी भी अप्रिय वारदात की पुनरावृत्ति रोकी ही जानी चाहिए ।

      ऐसे जोड़े में चलने वाले  लड़के लड़कियों से भी यहाँ मेरा एक निवेदन है कि पार्कों,बाजारों, रेस्टोरेंटों,मैट्रो स्टेशनों एवं मैट्रो जैसी  सार्वजनिक जगहों पर जितने ऐसे तथाकथित प्रेमी प्रेमिका होते हैं इन्हें भी अत्यंत संयम से मर्यादा पूर्वक रहना चाहिए। कई बार ये लोग भी अपने आचार व्यवहार में सारी मर्यादा की सीमाएँ लाँघ जाते हैं और इनके पारस्परिक बात व्यवहार में बहुत शिथिलता होती है जिसे ये लोग मानते हैं कि कोई देख ही नहीं रहा है किन्तु देखने सुनने  वाले देख सुन रहे होते हैं।दोनों एक दूसरे को नोंचने खोचने  चिपटने चाटने में इतना  समर्पित होते हैं कि इन्हें खुद होश नहीं होता है कि ये कर क्या रहे हैं।सच्चाई ये है कि विवाहित लोग  भी  इतने स्नेह से कमरे के अन्दर भी कम ही देखे जाते होंगे जितने स्नेह से ऐसे विवाहेतर संबंधी या अविवाहित लोग रहते हैं। दोनों का दोनों के प्रति पूर्ण समर्पण होता है।दोनों इतना खुश  होते हैं कि वे एक नहीं सात नहीं सात सौ जन्म भी एक साथ रहने का वायदा करते देखे जा सकते हैं।

    ऐसे दृश्य देखने सुनने वाले कुछ तो फैशन, जमाना, या आधुनिकता को गालियाँ दे रहे होते हैं।कुछ आनंद ले रहे होते हैं कुछ पागल हो रहे होते हैं।और कुछ उसे  पाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हो रहे होते हैं।ऐसे लोग या तो कुछ लोगों के साथ होते हैं या तो कुछ लोगों को साथ बुला लेते हैं और किसी बहाने से उस अकेले प्रेमी से झगड़ा  करते हैं वो बेचारा अकेला क्या करे?चूँकि हमला करने वाले कई होते हैं तो उन्हें जीतना ही होता है।और उनके जीतने का मतलब कम से कम प्रेमी का पिटना और प्रेमिका से सामूहिक  बलात्कार होता है।क्योंकि वे होते ही समूह में हैं और ऐसे किसी उन्मादी से अच्छे आचरण की उम्मींद ही क्यों करनी?उन उन्मादियों में भी कोई ईमानदार, चरित्रवान,दयालु आदि होगा ऐसी आशा ही क्यों करनी ?सरकार के बस में होता तो अब तक नियंत्रण हो जाता किन्तु घटनाएँ घटती चली जा  रही हैं।आखिर सरकार को  केवल कोसने  से भी बात बनते नहीं दिख रही है ।

बेबस पुलिस 

       ऐसी प्रेमी प्रेमिका के प्रसंग से जुड़ी किसी अप्रिय घटना के घटने से पहले यदि पुलिस शिकंजा कसने लगे तो प्यार पर पहरा  नाम का शोर मचता है बाद में पुलिस पहुँचे तो क्राइम रोक पाने में  नाकाम पुलिस नाम का  शोर मचता है। इसलिए हमें भी शर्दी गर्मी बरसात में दिन और रात में जहाँ पुकारो वहाँ हाजिर होने वाली पुलिस पर भी हमेंशा नकारात्मक आरोप लगाकर उनका मनोबल नहीं गिराना चाहिए ,अपितु अपराध रोकने के लिए हमें अपने भी सकारात्मक सुझाव देकर अपराध मुक्त समाज बनाने में सहयोग करना चाहिए।

      खैर और  सब कुछ हो या न हो इसमें सबका अपना अपना मत हो सकता है।जहाँ तक कानून व्यवस्था की बात है वह चुस्त दुरुस्त होनी ही चाहिए यह भी सच है  किन्तु अपनी सुरक्षा के लिए अपनी तरफ से भी सामाजिक मर्यादाओं के परिपालन का ध्यान भी लड़के लड़कियों की तरफ से रखा जाना चाहिए ।

   आखिर यहॉं या ऐसे ऐकान्तिक मामलों में क्या करे सरकार?कितनी कितनी, किसको किसको, कहॉं कहॉं, क्या क्या, कैसे कैसे सुरक्षा मुहैया करावे सरकार? 

    आखिर मर्यादा लाँघते समय ये तो उन जोड़ों को  भी पता होता है कि हम शरीरों की नुमाईश बनाने जा रहे हैं फिर क्या करे सरकार?

  विज्ञापनों में महिला शरीर

     इसी तरह किसी भी प्रकार की किसी भी चीज के विज्ञापनों में, कोई प्रोडक्ट बेचने के लिए महिलाओं के शरीरों को भड़कीला बनाकर अर्द्धवस्त्रों में उन शरीरों को दर्शनार्थ  परोसकर अपने प्रोडक्ट बेच रहे होते हैं लोग। क्या ये गलत नहीं है ?क्या महिला माने केवल शरीर एवं शारीरिक सुन्दरता ही है जिसे दिखा कर सामने वाले के मन को आकर्षित करके अपना प्रोडक्ट बेच लेना।आखिर इससे बचेगा  नारी सम्मान क्या? 

   ऐसे आधे अधूरे कपड़ों में शरीर लपेट कर रहने  वाली सुंदरियॉं पूरे होश  हवाश में अपने शरीरों के शिथिल प्रदर्शन का बाकायदा तय शुदा पेमेंट लेती हैं। जो लोग देखकर पागल होते हैं और पैसा खर्च करते हैं कुछ लोग प्रोडक्ट खरीदने में, कुछ उस विज्ञापिका को  देखने छूने  एवं पाने के लिए प्रयत्नशील हो जाते हैं।कोई इसप्रकार का अपना पागलपन किसी और  पर निकालता है जो जब जहॉं शिकार बनता है वो सरकार को दोषी  ठहराता है। क्या करे सरकार, क्या करे कानून व्यवस्था ? आखिर ये तो उसे भी पता है कि हम शरीर की नुमाईश बनाने जा रहे हैं फिर क्या करे सरकार?कितनी कितनी किसको किसको, कहॉं कहॉं, क्या क्या, कैसे कैसे, सुरक्षा मुहैया करावे सरकार ?

रिसेप्सनों  पर कोई न कोई  सुंदर युवा लड़की

   लगभग हर संस्था रिसेप्सन पर कोई न कोई  सुंदर युवा लड़की न केवल बैठाती हैं  बल्कि उसकी वेष भूषा ऐसी रखती हैं ताकि उसे देखने वाले लोगों को पूरा दर्शन सुख मिले।

बाबाओं ज्योतिषियों की सहायता में ----

    आज  बाबाओं को भी आगे बढ़ने के लिए सुंदरियों की जरूरत पड़ती है जब तक ऐसी वैसी कुछ सुंदरी नायिकाएँ  योग सीखने नहीं आती हैं तब तक बाबाजी अच्छे योगी नहीं माने जाते हैं ।  जब तक सुंदर चेली साथ में न हो तब तक साधुता जमती नहीं है इसी प्रकार ज्योतिष आदि को भी व्यवसाय की दृष्टि से देखने वाले लोग भी केवल अपनी विद्या के बल पर समाज में नहीं उतरते हैं।उन्हें भी इस तरह के ग्लेमर की जरूरत पड़ती है।वो  भी विज्ञापनीय झूठ बोलने के लिए एक ऐसी लड़की साथ लिए बिना आगे नहीं बढ़ते हैं।

         कामेडी में महिलाएँ !

 हँसना हँसाना इतना ज़रूरी है क्या ?

      साहित्य शास्त्रों में कला की सीमा वहीं तक मानी गई है जहॉं तक बड़ी बडी़ बातें गीतों और इशारों में ही होती हैं।जब खुला नंगपन शुरू हो जाए तो उसे कला कैसे कहा जा सकता है?आज कॉमेडी के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है वो फूहड़पन के अलावा कुछ और दिखाई सुनाई ही नहीं देता है। अपनी बीबी बेटी मॉं बाप भाई बहन का नाम किसी और के साथ बेशक मजाक में जोड़ दिया जाता है किंतु इससे क्या सिखाने का प्रयास किया जा रहा है?

      इसीप्रकार टी.वी. पर आने वाले कई कार्यक्रमों में लड़कियों को बहुत छिछले ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा होता है।वो भी हॅंसते हॅंसते वो रोल पैसे के कारण निभा रही होती हैं।सोहागरात जैसे शब्द तो आम होते जा रहे हैं।एक लड़का कामेडी के नाम पर दूसरी आधे अधूरे कपड़ों वाली लड़की की चिकनी टॉंगों की बात आसानी से बता रहा होता है।लोग हँस रहे होते हैं केवल इसीलिए न वो किसी और की लड़की है कभी सोच के देखो अपनी होती तो निकल पाती हँसी ऐसी छिछली बातों पर !सोहागरात और सोहागरात पर दूध के गिलास की चर्चा तो धीरे धीरे अधिकांश  कार्यक्रमों में दिखने लगी है।कामेडी के नाम पर मिसे जा रहे होते हैं एक दूसरे के शरीर, बोले जा रहे होते हैं एक दूसरे के माता, पिता, भाई, बहनों के विषय में अश्लील वाक्य!मांसल मंथन इतना अधिक बोला जा रहा होता है कि उसमें कला तो कहीं दिखाई सुनाई ही नहीं पड़ती है।सारी भाषा  ही एक दूसरे को गाली गलौच देने की होती जा रही है। अरे! यह कैसी कामेडी?यदि एक दूसरे को बेइज्जत करके ही हॅंसाना जरूरी है तो यह तो आम चौराहों पर भी हो रहा  है।

    इसी प्रकार और जितने भी बासनात्मक व्यवसाय बना लिए गए हैं वहॉं भी लड़के लड़कियॉं जो भी हों सब बॉंधकर ही नहीं लाए गए होते हैं।सब में मिलाजुला कुछ ऐसा ही होता है लड़कियॉ स्वयं रुचि लेती दिखती हैं।

     इन सारी बातों को कहने के पीछे हमारा उद्देश्य मात्र इतना है कि स्वाभिमान एवं सदाचार प्रिय महिलाएँ  अपने शरीर की नुमाईस लगाकर उसे अर्थोपार्जन का माध्यम बनाती ही क्यों हैं ?अपने गुणों एवं शिक्षा कला को आगे करके गौरव पूर्वक कमाएँ या आगे बढ़ें तो शायद ज्यादा सुरक्षित रह सकती हैं ।

 

    राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु  ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी नीतिगत  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

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