Tuesday, December 3, 2013

कर्म पर विश्वास करना चाहिए राशियों पर नहीं क्या ये सही है ?

    जिस विद्या या विषय को हमने पढ़ा ही न हो और न ही उस विषय में हमारा कोई अनुभव हो इस प्रकार से 
  आज फेस बुक पर ही किसी मित्र ने लिखा है कि 
  कर्म पर विश्वास करना चाहिए राशियों  पर नहीं 
क्योंकि राम- रावण ,कृष्ण -कंस ,गाँधी- गोडसे ,ओसामा -ओवामा आदि की राशियाँ एक होते हुए भी कर्म अलग अलग थे !ऐसा और भी कुछ लोग भी कहा सुना करते हैं ऐसी शंकाएं प्रायः उन लोगों को होती हैं जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र स्वयं तो पढ़ा नहीं है और किसी पढ़े लिखे के संपर्क में रहने का सौभाग्य भी नहीं मिला है तो शंकाएँ होना स्वाभाविक ही है  !!!
 इस पर मेरा निवेदन यह है कि -
     अज्ञान के कारण जो बात हमें समझ में न आवे उसे गलत मानने की अपेक्षा अपने अज्ञान को स्वीकार कर लेना चाहिए और उसे जानने का प्रयास करना चाहिए ज्योतिष शास्त्र अत्यंत प्राचीन विद्या है ये यदि सही न होती तो इतने वर्षों तक टिक ही नहीं पाती ! आपने देखा ही होगा कि   बहुत लोग काम चोर होते हुए भी भाग्यवान होते हैं !जैसे लापरवाह सरकारी कर्मचारी !
      कर्म एक जैसा हो और फल अलग अलग तो क्या कर्म छोड़ कर फल को पकड़ कर बैठ जाना चाहिए? प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक ही लें सरकारी स्कूलों के शिक्षक पता नहीं पढ़े नहीं होते या पढ़ाते नहीं या पढ़ा नहीं पाते हैं फिर भी सैलरी बहुत मोटी  मोटी  उठा रहे होते हैं।  वहीँ निजी स्कूलों के शिक्षक बहुत परिश्रम पूर्वक पढ़ाते हैं  इसीलिए सरकारी शिक्षक भी अपने बच्चे उन्हीं के स्कूलों में पढ़ने भेजते हैं ये उनकी उत्तम शिक्षा का ही  प्रमाण है फिर भी सरकारी शिक्षकों की अपेक्षा निजी स्कूल के शिक्षकों की सैलरी बहुत कम होती है ,अन्यथा कर्म तो प्राइवेट शिक्षकों का अच्छा होता है किन्तु फल सरकारी शिक्षकों को अधिक  मिल रहा होता  है। ऐसा ही अन्य क्षेत्रों में भी होता है!यह भाग्य का ही दोष है !इसलिए ज्योतिष शास्त्र को समझ कर ही उस पर टिप्पणी की जानी चाहिए । 
        जो उदाहरण आपने दिए हैं वो सभी अपने अपने क्षेत्र के महारथी थे और उन उन क्षेत्रों में अपने को ही सर्वोच्च पद पर स्थापित करने के लिए वे सभी प्रयासरत थे उसी में वो मारे भी गए उनके कर्म में अंतर हो सकता है किन्तु भावना एक ही थी वो भी अपने अपने को स्थापित करने की।
इसलिए उसे भी ज्योतिष सिद्धांतों के अनुरूप ही समझा जाना चाहिए ।

Friday, November 29, 2013

सुंदरता क्या है ?

           सुन्दर स्त्री पुरुषों की पहचान क्या है ?

 साहित्य शास्त्र में कहा गया कि

 क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैति तदैव रूपं रमणीयतायाः।

अर्थात जिसे देखने में हर क्षण कुछ नए प्रकार का आनंद मिले वही सर्वोत्तम सुंदरता है।  

1.     जिसकी  सुंदरता बिना दिखाए ही दिख जा रही हो और  सबके मन को आनंदित करती हो  वह पूर्वजन्म के संचित पुण्यों से प्राप्त होती है । ऐसे मित्र या जीवन साथी बड़े भाग्य से मिलते हैं। ये जन्म जन्मांतर के लिए समर्पित साथी होते हैं। ये सम्बन्ध अंत तक सुरक्षित रहते हैं । 

 2.      जहाँ दूसरों को प्रभावित करने के उद्देश्य से तरह तरह की पोशाकें वेष भूषा आदि बदलकर सुंदरता पैदा करने का प्रयास किया जा रहा हो वह केवल कुछ उन लोगों को प्रसन्न कर सकती है जो उस सुंदरता की चाहत रखते हों ! यह अपने प्रयास से पैदा की जाती है।ऐसे मित्र या जीवन साथी बड़े प्रयास से मिलते हैं।ये इसी जन्म में खोजने से मिल जाते हैं प्रयास करके एक दूसरे का साथ देते रहते हैं !  

3.        जहाँ श्रृंगार की अत्यधिकता हो वास्तविकता काफी कम हो यह ब्यूटी पार्लरी स्वार्थ साधक क्षुधित सुंदरता में स्त्री पुरुष प्रधान नहीं रह जाते यहाँ तो वैभव से संबंध जुड़ते टूटते रहते हैं ये वास्तविकता पर टिके हुए सम्बन्ध न होने के कारण जब तक वैभव रहता है तब तक ही संबंध जुड़े रहते हैं वैभव  समाप्त होते ही टूट जाते हैं ।

 4.  जो सुंदरता केवल बाल और वस्त्रों  को  बनाने बिगाड़ने पर टिकी हो यह केवल दूसरों की देखा देखी धारण की गई अभिनयात्मक सुंदरता केवल अपनी मानसिक बासना व्यक्त करने के लिए होती है इससे जुड़े सम्बन्ध तब तक चलते हैं जब तक उससे अच्छा कोई और साथी न मिल जाए ऐसे साथियों की खोज ये लोग आजीवन जारी रखते हैं !

 5.  जो लोग भयंकर तरह से बाल बिखेरने, कटाने, लटें बना लेने वाले, आधे चौथाई कपड़े पहनने वाले, नग्न अर्ध नग्न आदि रहकर बासनात्मक गीत संगीत नाचने गाने शोर मचाने वाले ये बासना विक्लवित  लोग कहीं भी कभी भी किसी से भी केवल बासना पूर्ति के लिए जुड़ते छूटते रहते हैं।  ऐसे लोग बासना विहीन किसी अन्य सम्बन्ध पर भरोसा ही नहीं करते जहाँ बासना है वहीं सम्बन्ध है अन्यथा नहीं !बासना की क्षमता समाप्त होते ही  नशा या  मृत्यु का वरण  कर लेते हैं । ये इतने अधिक कामी होते हैं कि केवल अपनी काम बासना की पूर्ति के लिए अपने माता पिता भाई बहन आदि सभी के सम्बन्ध भूल जाते हैं !ये बहुत भयंकर लोग होते है ये बीमार लोग प्रेम प्यार का खेल खेलते खेलते एक दूसरे के प्राणों के प्यासे तक हो  जाते हैं।शास्त्रों में ऐसी सुंदरता को राक्षसी सुंदरता कहा गया है । 

      इस तरह की सुंदरता का उदाहरण रामायण में सूर्पणखा के सन्दर्भ में मिलता है कि बूढ़ी और कुरूप होने के बाद भी शरीर में इसी प्रकार के आधुनिक सौंदर्य से युक्त होकर श्री राम के पास प्रणय निवेदन करने पहुँची तो श्री राम समझ गए कि भारतीय नारी इतने भयंकर श्रृंगार की शौक़ीन कभी नहीं होती हैं इसलिए यह कोई राक्षसी ही हो सकती है तो श्री राम ने सूर्पणखासे कहा कि

     "त्वं हि तावन्मनोज्ञांगी राक्षसी प्रतिभासि मे"

अर्थात तुम इतनी सुन्दर हो कि साक्षात राक्षसी  जान पड़ती हो !

       इसी प्रकार पुराने समय में बालों को पति प्रेम का प्रतीक माना जाता था इसीलिए महिलाएँ बाल बाँध कर रहती थीं जब कि लंका में ऐसा प्रचलन नहीं था वहाँ की महिलाएँ उनकी भाषा में एक पति से बँधकर अपनी जिंदगी नरक नहीं करती थीं यह संकेत था वहाँ उनके बाल न बाँधने का! किन्तु कुछ महिलाओं में प्रचलन था कि जो जितने पतियों के साथ जुड़ पाती थीं उनके नामों  की उतनी चोटियाँ  बाँध लिया करती थीं उसी क्रम में सबसे कम अर्थात तीन चोटियाँ  बाँधने वाली त्रिजटा से सीता जी ने बात चीत करना प्रारम्भ किया था। 

        इसी प्रकार से हनुमान जी लंका में सीता जी को खोजने जब गए तो सीता जी को कभी देखा तो था नहीं आखिर पहचानते कैसे! जैसे ही सीता जी पर दृष्टि पड़ी तो देखा कि -

        ""राजत शीश जटा एक बेनी""

शिर में एक जटा थी देखते ही पहचान गए कि ये ही माता सीता हो सकती हैं। 

भारतीय संस्कृति में भी कुछ महिलाएँ किसी व्रत या संकल्प लेने या क्रोध करने पर बाल बिखेरती देखी  गईं हैं जैसे द्रौपदी कैकेई आदि! इसी प्रकार पुरुषों को भी देखा गया है चाणक्य ने शिखा खोल ली थी !आधुनिक भारत में अपनी संस्कृति के नाम पर सब मिला जुला ही चल रहा है कैसे किसको पहचाना जाए ?

  

Thursday, November 28, 2013

बच्चे कोरे कपड़े की तरह होते हैं, जैसा चाहो वैसा रंग लो,
     आज सरकारी प्राथमिक स्कूलों के कुछ लापरवाह शिक्षकों की लापरवाही ही बच्चों को अपराधों की ओर धकेल रही है।क्या इसके लिए सरकार उन्हें इतनी मोटी मोटी सैलरी देती और समय समय पर बढाती भी रहती है इस प्रकार से ऐसी सरकारें और ऐसे लापरवाह शिक्षक 

 अपने देश में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है 
 
     सरकारी कर्मचारी हड़ताल क्यों किया करते हैं और उनकी माँगें मान मान कर सरकारें उन्हें बार मनाती क्यों रहती है?कहीं सरकार और सरकारी कर्मचारियों ने आपस में एक दूसरे की कोई पोल तो नहीं छिपा रखी होती है जिसके खुलने का भय हो जिससे देश की जनता कोई हंगामा खड़ा कर दे! जैसे कि सुना जाता है कि सरकारी कर्मचारी जो घूस लेते हैं वो ऊपर तक भेजी जाती है !!!
    आज पचासों हजार सैलरी लेने वाले सरकारी पोस्ट आफिस के कई कर्मचारियों के बराबर  पाँच हजार रुपए महीना पाने वाला एक कोरियर कर्मचारी अधिक काम कर लेता है क्यों ? 
     
    कई क्षेत्रों में उन सरकारी कर्मचारियों से अधिक परिश्रमी एवं उनसे ज्यादा पढ़े लिखे लोग मजदूरी करते घूम रहे हैं यदि ऐसे कर्मचारियों का पेट भर चुका है तो वो अवसर किसी और को क्यों नहीं उपलब्ध कराए जाते हैं क्या उनका इस देश की आजादी पर कोई अधिकार नहीं होना चाहिए?
 एक
 प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक शिक्षकों

 
     यदि इनका पेट पचास हजार की सैलरी में नहीं भरता है तो पाँच पाँच हजार रूपए महीने कमाने वाले कैसे अपना पेट भरते होंगे 
                सैलरी उड़ाते है सरकारी शिक्षक और  मेहनत करते हैं प्राइवेट शिक्षक!

     पचासों हजार रुपए महीने की सैलरी पाने वाले सरकारी अनेकों शिक्षकों की अपेक्षा पाँच हजार रुपए महीना पाने वाला प्राइवेट स्कूल का एक शिक्षक इतना अधिक काम कर लेता है क्यों? 
     वह इतना अधिक विश्वसनीय भी होता है कि सरकारी कर्मचारी भी अपने बच्चे सरकारी स्कूलों में नहीं पढ़ाते हैं यहाँ तक कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी अपने बच्चे प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ाते हैं। 
     इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कम से कम सरकारी पाँच शिक्षकों के काम से अच्छा काम प्राइवेट स्कूल का एक शिक्षक कर लेता है। 
    अर्थात ढाई लाख रुपया रूपया महीना खर्च करके भी सरकार जो काम नहीं करा पाती है वो काम गैर सरकारी शिक्षक पांच हजार रुपए में उससे अधिक अच्छा कर दिखाता है। 
    फिर भी सरकारी शिक्षक हड़ताल किया करते हैं और उनकी माँगें मान मान कर सरकारें उन्हें बार मनाती क्यों रहती है? उनकी छुट्टी करके प्राइवेट स्कूलों के शिक्षक रखकर उससे सस्ते में उससे अच्छा एवं उससे अधिक विश्वसनीय कार्य क्यों नहीं करवा लेती हैं? कहीं सरकार और सरकारी कर्मचारियों ने आपस में एक दूसरे की कोई पोल तो नहीं छिपा रखी होती है जिसके खुलने का भय हो जिससे देश की जनता कोई हंगामा खड़ा कर दे! जैसे कि सुना जाता है कि सरकारी कर्मचारी जो घूस लेते हैं वो ऊपर तक भेजी जाती है !!! 
    जिसका कुछ अंश फिर महँगाई भत्ता या सैलरी बढ़ाने के नाम पर वापस लौटाकर उन शिक्षकों को प्रसन्न किया जाता है
   सरकार और सरकारी शिक्षकों के बीच का यह तालमेल इसी प्रकार से शिक्षा सिद्धांतों के साथ खिलवाड़ करता रहा तो क्या आम आदमी का कोई कर्तव्य नहीं बनता है कि वह सरकार से ललकार कर कह सके कि शिक्षा पर खर्च होने वाला धन आप सीधे हमें दें हम अपने विद्यालय स्वयं बना और चला लेंगे !इस प्रकार से अभिभावकों के हाथ में नियंत्रण  पहुंचते ही कितना भी मक्कार शिक्षक क्यों न हो उसे पढ़ाना ही पढ़ेगा 

Wednesday, November 27, 2013

धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज जी

       धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज  अपनी सनातनी शास्त्रीय संस्कृति एवं भारत भूमि के कण कण के लिए समर्पित थे सबसे लगाव रखते थे कभी कभी  मन विवश हो जाता है यह सोचने को कि ऐसा धर्म योद्धा अवतारी महामानव क्या  फिर  कभी इस मेदनी मंडल पर कृपा करने पधारेगा ?
          जहाँ तक गाँव में तीन दिन रह ने से  मूर्ख  हो जाने की बात है ये केवल महाराज जी का ही कथन नहीं है अपितु सभी शास्त्रीय विद्वानों की आम मान्यता है कि शिक्षाकाल जैसे विरक्त तपस्या काल में गाँवों का असीम आनंद प्राप्त करके सुकोमल मन शिक्षा की कठोर साधना  से कहीं भटक न जाए !
                                 श्री शंकराचार्य नवावतारम् विद्वद् वरेण्यं च यतींद्र मुख्यम् ।


                                  कलौ युगे धर्म युग प्रवर्त्तकं वंदे सदा श्री करपात्रिणम् गुरुम् ॥

              आपने सँभाल लिया मैं आपका आभारी हूँ !वर्त्तमान धार्मिक झंझावातों में सनातनी शास्त्रीय संस्कृति से जुड़े असंख्य लोग उन्हीं धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज जी की चिरस्मृति के सहारे प्राण पोषण कर रहे हैं मैं सभी महानुभावों से प्रार्थना करता हूँ कि उनके नाम के साथ किसी बात को जोड़ने से पहले उस बात का सम्यक परीक्षण किया जाना चाहिए वे सामान्य तर्कों से समझे जाने योग्य न होकर अपितु  असाधारण महामानव थे।  आज उनके बिना सूनी सूनी लगती है काशी !और उनके बिना अनाथों की तरह भटकते हैं शास्त्रीय संस्कृति से जुड़े विद्वान और महात्मा !जिनकी आँखें हमेशा खोजती हैं सनातनी शास्त्रीय संस्कृति के उस अमर साधक को -
         धर्म का नारा देकर बढ़के ललकारा जिसने
                                          हिन्द का हितैषी ऐसा होगा दुबारा कौन !

                                                                             आप सभी बंधुओं को क्षमा प्रार्थना के साथ पुनः प्रणाम

                   महापुरुषों के आशीर्वाद से मैं बिलकुल ठीक हूँ                                                        
                                                                          आपका -वाजपेयी


Monday, November 25, 2013

भाजपा भूल सुधारों पर भी सोचे !

    भाजपा में भी चाहिए एक हनकदार हाईकमान ?

    जहाँ तक काँग्रेस का हाईकमान तो विश्व विदित है । इस प्रकार से जनता हर पार्टी की हाईकमान एवं उसकी स्वाभाविक स्थिरता और विचारधारा पर भरोसा करके  उसका साथ देती है कि ये हारे चाहें जीते किन्तु ये समय कुसमय में हमारा साथ देगा!

    जैसे - मुलायम सिंह जी सपा में कभी भी कोई भी निर्णय ले सकते हैं वे स्वतंत्र हाईकमान हैं ,इसी प्रकार बसपा में मायावती,नीतीशकुमार जी जद यू में,लालू प्रसाद जी जनतादल में,तृणमूल काँग्रेस में ममता बनर्जी जी ,अकाली दल में प्रकाश सिंह जी बादल ,इसी प्रकार उद्धव ठाकरे जी,राज ठाकरे जी ,ओम प्रकाश चोटाला जी ,शरद पवार जी,करुणा निधि जी , जय ललिता  जी, नवीन पटनायक जी ,चन्द्र बाबू नायडू जी आदि और भी छोटे बड़े सभी दलों के हाईकमान अपनी अपनी पार्टी में सदैव सम्माननीय  एवं प्रभावी बने रहते हैं चुनावों में उनकी हार जीत कुछ भी हो तो होती रहे किन्तु इनके सम्मान एवं अधिकारों में कटौती नहीं होती है ये स्वतन्त्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम बने रहते हैं उन्हें ही देखकर उनके स्वभाव को समझने वाली जनता यह समझकर वोट देती है कि ये हारें या जीतें किन्तु यदि हम इनका साथ देंगे तो ये हमारे साथ भी खड़े होंगे!इसी प्रकार से पार्टी कार्यकर्ता भी अपने हाईकमान को पहचानने लगते हैं कि ये जैसा कहेंगे इस पार्टी में रहने के लिए  हमें वैसा ही करना होगा किन्तु जिन पार्टियों में हाईकमान गुप्त है वहाँ कार्यकर्ता भी चुप रहता है और समर्थक तो चुप ही रहते  हैं। 

       भाजपा में ऐसा नहीं है यहाँ कब कौन किसका कब तक हाईकमान रहेगा फिर कब कौन किस कारण से कहाँ से हटाकर कहाँ फिट कर दिया जाएगा ये सब काम कौन क्यों कहाँ से किसकी प्रेरणा से कर रहा है या किसी अज्ञात शक्ति की प्रेरणा से होता रहता है आम जनता इसे जानने की हमेंशा इच्छुक रहती है किन्तु किसी को कुछ बताने कि जरूरत ही नहीं समझी  जाती है इतनी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी में कब क्या उथल पुथल चल रहा होता है जनता में से किसी को कुछ पता नहीं होता है।यहाँ तक कि बड़े बड़े कार्यकर्त्ता तक अखवार पढ़ पढ़ कर समाज को समझा रहे होते हैं कि अंदर क्या कुछ चल रहा है ,जैसे आम परिवारों में माता पिता की लड़ाई में बच्चों की  स्थिति होती है न माता की बुराई कर सकते हैं और न ही  पिता की न सच्चाई ही किसी को बता सकते हैं केवल मौन रहना ही उचित समझते हैं ये स्थति भाजपा के आम कार्य कर्ता की होती है जब हाईकमान हिलता है ।ऐसी बातों में सुधार की आवश्यकता दिखती है। 

      जिन जिन प्रदेशों में भाजपा किसी प्रांतीय हाईकमान को स्थापित करने में सफल हो गई है उन उन प्रदेशों में न केवल सफल हो गई है भाजपा अपितु अन्य सभी दलों पर भारी भी पड़  रही है।उसका मुख्य कारण संघ के विरक्त, बुद्धिमान, एवं राष्ट्रीय समर्पणवाले अत्यंत अनुभववान, ज्ञानवान ,समाजसाधकों से सुसेवित है भाजपा!ऐसा सौभाग्य भाजपा को छोड़कर किसी अन्य दल को नहीं मिला है जिसे अपने दल के विचारकों कार्यकर्ताओं के अलावा पीछे से विराट ऊर्जा देने वाला कोई आर.एस.एस. जैसा अति विशाल संगठन साथ दे रहा हो  इसीलिए  भाजपा की नियति, नीति, निर्णय एवं न्यायनिष्ठा सुदृढ़ सिद्धांतों से सम्बद्ध हैं इसलिए उनमें संदेह की  कहीं कोई गुंजाईस ही नहीं है किन्तु उनका कार्यान्वयन उस प्रकार से नहीं हो पा रहा है जैसा होना चाहिए और जहाँ हो पा रहा है वे मध्य प्रदेश छत्तीस गढ़ आदि में मिल रही सफलता उसी के प्रमाण हैं किन्तु जिन प्रदेशों में प्रांतीय हाईकमान ही व्यवस्थित नहीं है उन प्रदेशों में आपसी कलह के कारण पिछड़ी है भाजपा !

   दिल्ली, उत्तर प्रदेश, विहार आदि में इसी परिस्थिति की शिकार भाजपा है !

Sunday, November 24, 2013

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी से प्रश्न ! जरूर पढ़ें -

     माननीय मनमोहन सिंह जी से विनम्र निवेदन !

   आपके मंत्रिमंडल के द्वारा पास किए गए किसी बिल को बकवास बताते हुए राहुल गाँधी जी ने जिस दिन सरकार को लताड़ लगाई थी जिसके बाद सरकार का दिमाग कुछ ठनका और अपना बिल वापस ले लिया किन्तु शिक्षा से जुड़े होने के नाते व्यक्तिगत रूप से मेरे मन में वो ढंग बहुत बुरा लगा हो सकता है कि सबको ही लगा हो या कुछ लोगों को अच्छा भी लगा हो मैं नहीं जानता !

      आप जैसे सुयोग्य व्यक्ति के निर्णय को मीडिया के सामने जितने  अपमान पूर्ण ढंग से न केवल नकारा  गया अपितु बिना किसी ना नुकुर के आपको उस निर्णय से पीछे हटने के लिए बाध्य किया गया और आप बिना किसी सामाजिक प्रतिक्रिया के हटे भी !यह सब मैं क्या किसी भी आत्म सम्मान से जीने की ईच्छा रखने वाले व्यक्ति के लिए सुनना सहना सब कुछ बहुत कठिन था, हो सकता है कि आप ऐसी परिस्थितियों के पहले से ही अभ्यासी रहे हों किन्तु मीडिया के सामने पहली बार इस रूप में यह सब देखकर बुरा लगना  स्वाभाविक था!इन परिस्थितियों से प्रकटे प्रश्नों को शिक्षित भारतीय नागरिक होने के नाते मैं सामजिक रूप से आपसे पूछना चाहता हूँ !

   प्रधानमंत्री जी ! क्या कभी आपको ऐसा नहीं लगता कि आप अपने बल बूते पर यदि ग्राम प्रधानी का चुनाव भी जीतने की हैसियत नहीं रखते हैं तो फिर दूसरे के कह देने मात्र से आपको अचानक ऐसा क्यों लग गया कि आपको  प्रधानमंत्री बन जाना चाहिए!यह कितना और कहाँ तक उचित है? जब सोनियाँ जी को ही  देखकर लोग  वोट देते हैं आपको तो देते नहीं हैं फिर आप बीच में क्यों टपक पड़ते हैं! इसलिए आप लोकतांत्रिक दृष्टि से चुने गए जनता के प्रतिनिधि प्रधानमंत्री कैसे कहे या माने जा सकते हैं?

    माना कि प्रधानमंत्री ऐसा नाम रखने के लिए सोनियाँ जी को तलाश थी किसी  दबे- कुचले,लाचार बेचारे,स्वाभिमान विहीन और उनके प्रति पूर्ण समर्पित व्यक्ति की,जिसका नाम प्रधानमंत्री रखकर वो इसी नाम से उसे पुकार सकें ताकि उनकी अपनी चौधराहट चलती रहे यहाँ तक तो ठीक है किन्तु उनकी आधीनता इस प्रकार से स्वीकार करने की आप की मजबूरी क्या थी मान्यवर ?

    आप तो सुशिक्षित हैं लोग आपको ईमानदार  मानते हैं और आप हैं भी!वैसे भी आप जैसे भले व्यक्ति के लिए ईश्वर का दिया हुआ इतना सुयश जीने के   लिए पर्याप्त नहीं था क्या कि आपकी सरकार पर भ्रष्टाचार के बड़े बड़े आरोप लगे जिनमें  कुछ मंत्रियों को जेल भी जाना पड़ा, फिर भी लोग आज भी आपकी ईमानदारी पर भरोसा करते हैं ?

    आदरणीय  प्रधानमंत्री जी ! आखिर क्या और कितना जरूरी था सोनियाँ जी के द्वारा प्रायोजित प्रधानमंत्री नामकरण संस्कार में अकारण इस प्रकार से आपका आत्म समर्पण कर देना ?

     खैर, और जो हो सो हो आप कुछ तो सोच कर ही सम्मिलित हुए होंगे किन्तु एक बात तो है ही  कि यदि आप प्रधानमंत्री न बने होते तो आप में जो सद्गुण हैं उनके बल से आयु पूर्ण होने पर आप गौरव पूर्वक मर भी सकते थे किन्तु आप ऐसे लोगों के कुसंग का शिकार बने कि अब आपको वह सौभाग्य भी नसीब होते नहीं दिख रहा है !आपको भी इन बातों का पश्चात्ताप रहेगा ही ! 

     आखिर ऐसा हो भी क्यों न !आपका बुढ़ापा था आपने तो चाटुकारिता पूर्वक या जैसे तैसे हाथ पैर जोड़ते हुए मानापमान सहकर भी  काट लिया अपना बुढ़ापा प्रधानमंत्री कहलाकर ही सही !किन्तु आपके इस शासन काल में आपकी प्राशासनिक क्षमता के आभाव में जिनकी जवानी बर्बाद हुई वे आपको क्यों नहीं कोसेंगे आखिर दस वर्ष का समय थोड़ा तो नहीं होता आपकी अक्षमता के कारण बढ़ी महँगाई में जिन बच्चों  का बचपन बर्बाद हुआ, मान्यवर!  वे क्यों न  कोसें आपको?जो बलात्कारों के शिकार हुए वे कैसे भूल जाएँ अपनी पीड़ा ?

   आपकी कृपा पूर्ण अक्षमता से  देश में बलात्कार ,भ्रष्टाचार आदि सब कुछ तो छाए रहे! सैनिकों के शिर काटे गए!क्या क्या नहीं हुआ आपके कलुषित  शासन काल में ?महोदय, आपके रूप में सारे देश ने देखा है कि स्वाभिमान विहीन जब एक सुशिक्षित सिंह लाचार और बेचारा होता है तो उसके दुष्परिणाम किस किस रूप में भोगने पड़ते हैं देश और समाज को!धन्यवाद !!!

                            - डॉ.शेष नारायण वाजपेयी
         संस्थापक -राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान


  

 


 

 



Friday, November 22, 2013

भाजपा का मुखिया कौन? कोई क्यों दे भाजपा को वोट ?

आखिर क्यों और कैसे बन जातीहै  काँग्रेस की सरकार बार बार! और क्यों देखती रह जाती है भाजपा ?

      कल मैंने किसी बड़े नेता के भाषण में  सुना कि सपा बसपा जैसी क्षेत्रीय पार्टियाँ काँग्रेस जैसी पार्टी की ही देन हैं !

      मैं इस तर्क से सहमत नहीं हूँ क्योंकि जब ये बात में सोचता हूँ तो एक सच्चाई सामने आती है कि काँग्रेस हमेशा से गलतियाँ करती रही है पहले जब भाजपा का हाईकमान हिलता नहीं था अर्थात हिमालय की तरह सुस्थिर था तब तक काँग्रेस का विरोध करने की क्षमता भाजपा में थी इसीलिए भाजपा आगे बढती चली गई !

     किन्तु जब सर्व सम्मानित अटल जी  एवं अडवाणी जी को संन्यास लेने की सलाहें अंदर से ही आने लगीं। इस पर उस समाज को भयंकर ठेस लगी जिसके मन में भाजपा का नाम आते ही अटल जी  एवं अडवाणी जी सहसा कौंध जाया करते थे उसने सोचना शुरू किया कि यदि ये नहीं तो कौन?जनता को इसका उचित उपयुक्त एवं सुस्थिर जवाब अभी तक नहीं मिल सका है क्योंकि बार बार बनने बिगड़ने बदलने वाला निष्प्रभावी हाईकमान जनता को अभी तक मजबूत सन्देश देने में सफल नहीं हो सका है जो पार्टी में हार्दिक रूप से सर्वमान्य हो !

           भारत वर्ष में एक ऐसी भी बड़ी पार्टी है जिसका हाईकमान सरस्वती नदी की तरह अदृश्य रहता है आखिर क्यों ? इसकी  कीमत देश की जनता को बार बार चुकानी पड़ती है।इस पार्टी की कई वर्षों तक सरकार चलने के बाद भी भगवान् श्री राम के कार्य को भूल जाने के कारण लगता है कि उस पार्टी को शाप लगा है कि इसका हाइकमान  हमेशा चलता फिरता रहेगा !

       जहाँ तक काँग्रेस का हाईकमान तो विश्व विदित है । इस प्रकार से जनता हर पार्टी की हाईकमान एवं उसकी स्वाभाविक स्थिरता और विचारधारा पर भरोसा करके  उसका साथ देती है कि ये हारे चाहें जीते किन्तु ये समय कुसमय में हमारा साथ देगा!

    जैसे - मुलायम सिंह जी सपा में कभी भी कोई भी निर्णय ले सकते हैं वे स्वतंत्र हाईकमान हैं ,इसी प्रकार बसपा में मायावती,नीतीशकुमार जी जद यू में,लालू प्रसाद जी जनतादल में,तृणमूल काँग्रेस में ममता बनर्जी जी ,अकाली दल में प्रकाश सिंह जी बादल ,इसी प्रकार उद्धव ठाकरे जी,राज ठाकरे जी ,ओम प्रकाश चोटाला जी ,शरद पवार जी,करुणा निधि जी , जय ललिता  जी, नवीन पटनायक जी ,चन्द्र बाबू नायडू जी आदि और भी छोटे बड़े सभी दलों के हाईकमान अपनी अपनी पार्टी में सदैव सम्माननीय  एवं प्रभावी बने रहते हैं चुनावों में उनकी हार जीत कुछ भी हो तो होती रहे किन्तु इनके सम्मान एवं अधिकारों में कटौती नहीं होती है ये स्वतन्त्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम बने रहते हैं उन्हें ही देखकर उनके स्वभाव को समझने वाली जनता यह समझकर वोट देती है कि ये हारें या जीतें किन्तु यदि हम इनका साथ देंगे तो ये हमारे साथ भी खड़े होंगे!इसी प्रकार से पार्टी कार्यकर्ता भी अपने हाईकमान को पहचानने लगते हैं कि ये जैसा कहेंगे इस पार्टी में रहने के लिए  हमें वैसा ही करना होगा किन्तु जिन पार्टियों में हाईकमान गुप्त है वहाँ कार्यकर्ता भी चुप रहता है और समर्थक तो चुप ही रहते  हैं। 

       भाजपा में ऐसा नहीं है यहाँ कब कौन किसका कब तक हाईकमान रहेगा फिर कब कौन किस कारण से कहाँ से हटाकर कहाँ फिट कर दिया जाएगा ये सब काम कौन क्यों कहाँ से किसकी प्रेरणा से कर रहा है या किसी अज्ञात शक्ति की प्रेरणा से होता रहता है आम जनता इसे जानने की हमेंशा इच्छुक रहती है किन्तु किसी को कुछ बताने कि जरूरत ही नहीं समझी  जाती है इतनी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी में कब क्या उथल पुथल चल रहा होता है जनता में से किसी को कुछ पता नहीं होता है।यहाँ तक कि बड़े बड़े कार्यकर्त्ता तक अखवार पढ़ पढ़ कर समाज को समझा रहे होते हैं कि अंदर क्या कुछ चल रहा है ,जैसे आम परिवारों में माता पिता की लड़ाई में बच्चों की  स्थिति होती है न माता की बुराई कर सकते हैं और न ही  पिता की न सच्चाई ही किसी को बता सकते हैं केवल मौन रहना ही उचित समझते हैं ये स्थति भाजपा के आम कार्य कर्ता की होती है जब हाईकमान हिलता है । 

         भाजपा के इस ऊहा पोह के दिशाभ्रम से बल मिलता है क्षेत्रीय पार्टियों को !ये  केंद्र सरकार के विरुद्ध उठे जनाक्रोश को काँग्रेस का विरोध करके पहले कैस करती हैं और फिर काँग्रेस को ही बेच लेती हैं इस प्रकार से फिर से बन जाती है काँग्रेस की सरकार !भाजपा काँग्रेस को कोसती  रह जाती है!