Saturday, March 15, 2014

आरक्षण समर्थक नेताओं के पास कहाँ से आई इतनी संपत्ति ! पहले नेताओं की संपत्तियों की जाँच हो बाद में दूसरी बात !

    क्या सवर्णों में गरीब नहीं होते हैं और दलितों में रईस नहीं  होते यदि हाँ तो गरीब सवर्णों पर क्यों किया जा रहा है जातीय अत्याचार और रईस दलितों का दुलार पियार बारे लोकतंत्र और बारी सरकार !
   अब तो एक ही रास्ता है कि पहले नेताओं की संपत्तियों की जाँच हो बाद में दूसरी बात !ऐसे नेता लूट रहे हैं खुद और दलितों के शोषण का आरोप लगा रहे हैं सवर्णों पर !इन नेताओं का अपना कार्य व्यापार क्या है और वो करते कब हैं अन्यथा ये संपत्तियाँ  आती कहाँ से हैं ?
     सवर्णों को रईस बताकर किया जा रहा है उन पर जातीय अत्याचार ! क्या सवर्णों में गरीब नहीं होते हैं और दलितों में रईस नहीं  होते यदि हाँ तो गरीब सवर्णों के लिए भी सरकारों का कोई दायित्व नहीं है क्या ? इसीलिए फिर हाल सवर्णों के लिए किसी भी राजनैतिक पार्टी की सरकार के पास कोई योजना ही नहीं है ने इस भरोसे  इसे गद्दारी क्यों न कहा जाए कि अच्छा अच्छा सब अपने एवं अपनों के लिए और वोट चाहिए जनता से ! 
      अरे नेताओ ! जनता कहीं पिछले कामों का हिसाब किताब न पूछने लगे तुम्हारे घपले घोटाले न उठाने लगे तुम्हारे भ्रष्टाचार पर जवाब न माँगने लगे इसलिए जनता के क्रोध की तोप का मुख जाति, क्षेत्र, समुदाय के नाम पर दूसरों की और मोड़ देते हो कितनी कुटिलता  भरी है आपके मनों  में !इसी प्रकार से  दलितों के नेता कहलाने वाली राजनैतिक आत्माएँ खुद तो जनता के पैसे से खुद तो करोड़ों के घाँघरे पहनें जहाजों पर चढ़े घूमें कोठियों पर कोठियाँ खरीदें महँगी महँगी गाड़ियों के मालिक मालकिन बन बैठे हों और जब दलितों की गरीबत की बात आवे तो उनके मन में सवर्णों के प्रति घृणा पैदा करना कि तुम्हारा शोषण सवर्णों ने किया है जबकि दलितों के हिस्से का सारा पैसा नेता जी के कोष में पहुँच चुका होता है फिर भी ये कुटिल नेतालोग झूठी बातें बता बता कर दलितों को सवर्णों से लड़ने के लिए उत्तेजित करते हैं!ऐसे दुराचरणों को नीचता और गद्दारी न कहा जाए तो क्या कहा जाए ?

     इसी प्रकार अपने को दलित कहलाने के शौकीन नेता लोग जो दलितों की दुर्दशा के लिए सवर्णों को कोसते या दोषी ठहराते हैं ऐसे नेताओं में यदि थोड़ी भी शर्म संकोच हो तो सवर्णों की संपत्ति की जाँच करवा लें और अपनी संपत्ति की भी करवा लें जिसके पास ज्यादा निकल जाए सो लुटेरा मान लिया जाए ! इसके बाद सवर्णों के शोषण सम्बन्धी बात को आधार हीन मान लिया जाए और ये जाँच आम जनता के द्वारा कराई जाए !साथ ही यह भी पता लगाया जाए कि जब आप राजनीति में आए थे तब आपके पास कितनी संपत्ति थी और आज कितनी है कहाँ से आई ये संपत्ति !और जो नेता कहते हैं कि हमारे पास पहले से ही है तो उस आय के स्रोत क्या थे उसका भी पता लगाया जाए !और यदि वास्तव में पहले से ही थी इतनी सम्पत्ति तो दलित किस बात के ?

    इसका सीधा सा अर्थ है कि कुछ राजनैतिक मगरमच्छों ने जाति क्षेत्र संप्रदायों के नाम पर जनता के मन में आपसी फूट डालकर  स्वयं ही दलितों  गरीबों अल्पसंख्यकों और सवर्णों को भी लूटा है और सवर्ण मगर मच्छों ने सवर्णों को लूटा है आखिर सवर्णों में भी तो गरीब हैं !या फिर दलित हों कि सवर्ण सभी वर्ग के संपत्तिसिन्धुओं के आर्थिक स्रोतों की जाँच की जाए जिसके आय स्रोत पवित्र और पारदर्शी हों उन्हें प्रोत्साहित किया जाए बाकी की संपत्ति देश के कोष में जमा की जाए जो जनता के काम आवे !

          ऐसे अकर्मण्य नेताओं में पनपी सत्ता की भयंकर भूख  गरीब सवर्णों को मार डालने पर अमादा है क्या है आरोप है  इन गरीब सवर्णों पर ! यही न कि इनके पूर्वजों ने कभी दलितों के पूर्वजों का शोषण किया होगा !केवल इस आशंका के कारण जातिगत आरक्षण के रूप में सवर्णों से बदला लिया जा रहा है!आखिर क्या है सच्चाई इस आरोप में ?बहु संख्यक दलितों ने आखिर क्यों सहा होगा अल्प संख्यक सवर्णों के द्वारा किया गया शोषण !ऐसे तर्कहीन अंधविश्वासी आरोपों पर क्यों दी जा रही है गरीब सवर्णों को सजा ? क्या इस देश में गरीब सवर्णों के कोई अधिकार ही नहीं होने चाहिए ?जहाँ सभी नागरिकों के समान अधिकार न हों वह कैसा लोकतंत्र ?ऐसे अंधविश्वास के सहारे कब तक ढोया जाएगा यह प्रभाव विहीन पूर्वाग्रह ग्रस्त लोकतंत्र ?

        जब वी.पी.सिंह सरकार के समय  सरकारी शोषण से ऊभकर गरीब सवर्ण लोमहर्षक आत्मदाह कर रहे थे तब कहाँ था लोकतंत्र ? आत्मदाह कोई सुख से नहीं कर सकता है कितना कठिन होता है एक अंगुली भी जलाना ! आखिर कोई असह्य पीड़ा तो रही ही होगी उनकी जिसे सहने की अपेक्षा आत्मदाह करना उन्हें अधिक आसान लगा !ऐसे गरीब सवर्णों की पीड़ा पर किसी का ध्यान क्यों नहीं गया ऐसे कठोर क्रूर लोकतंत्र को गरीब सवर्ण कैसे क्यों और कब तक लगाए रहें सीने से जो तर्क हीन अंधविश्वास के सहारे केवल सत्तालु नेताओं का पेट भरने के लिए चलाया जा रहा हो! इस जातीय अंधविश्वास के कारण गाँवों में उन गरीबों को आपस में लड़ाया जा रहा है जो पहले कभी एक दूसरे के पास बैठकर मन के सुख दुःख बता लिया करते थे एक दूसरे के सहारे मिलजुल कर आपस में कर लिया करते थे अपने बेटा बेटियों के काम काज ! अब नेताओं की सत्ता भूख ने नष्ट कर दी गाँवों की सुषमा सुंदरता सद्भावना भाईचारा आदि और घटित हो रहे हैं मुजफ्फर नगर  जैसे असह्य  नर संहार!

          इसलिए अब आवश्यक हो गया है जब ऐसे सत्ता लोलुप  नेताओं को मुख लगाना ही बंद कर दिया जाए और इनसे कहा जाए कि आप केवल भ्रष्टाचार रहित स्वच्छ प्रशासन दीजिए बस !बाकी हम लोग अपनी अपनी तरक्की स्वयं कर लेंगे हमें आपकी नरेगा ,मरेगा,मनरेगा एवं भोजन बिल जैसी किसी सुविधा की आवश्यकता ही नहीं है हम लोग परिश्रम पूर्वक अपना परिवार चला  लेने में सक्षम हैं !

 


Friday, March 14, 2014

अपने को योग्य कहूँ या अयोग्य ! किन्तु राजनीति हम जैसे लोगों को किसी लायक नहीं मानती है !

आचार्य डॉ. शेष नारायण वाजपेयी

संस्थापकःराजेश्वरीप्राच्यविद्याशोधसंस्थान 

                        तथा 

दुर्गापूजाप्रचारपरिवार एवं ज्योतिष जनजागरण मंच

व्याकरणाचार्य (एम.ए.)
 संपूर्णानंदसंस्कृतविश्वविद्यालय वाराणसी 
  ज्योतिषाचार्य(एम.ए.ज्योतिष)
 संपूर्णानंदसंस्कृतविश्वविद्यालय वाराणसी  
   एम.ए.      हिन्दी    
  कानपुर   विश्व  विद्यालय पी.जी.डिप्लोमा पत्रकारिता 
उदय प्रताप कॉलेज वाराणसी 
 पी.एच.डी. हिन्दी (ज्योतिष)   
  बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी बी. एच. यू.  वाराणसी 
 विशेषयोग्यताः-वेद, पुराण, ज्योतिष, रामायणों तथा समस्त प्राचीनवाङ्मयएवं राष्ट्र भावना से जुड़े साहित्य का लेखन और स्वाध्याय 
 प्रकाशितः-पाठ्यक्रम की अत्यंत प्रचारित प्रारंभिक कक्षाओं की हिन्दी की किताबें
कारगिल विजय      (काव्य )     

श्री राम रावण संवाद  (काव्य )
श्री दुर्गा सप्तशती     (काव्य अनुवाद ) 

श्री नवदुर्गा पाठ      (काव्य)                               
श्री नव दुर्गा स्तुति (काव्य ) 

 श्री परशुराम(एक झलक)
 श्री राम एवं रामसेतु  
 (21 लाख 15 हजार 108 वर्षप्राचीन
कुछमैग्जीनोंमेंसंपादन,सहसंपादनस्तंभलेखनआदि। 
अप्रकाशितसाहित्यः-श्रीशिवसुंदरकांड,श्रीहनुमतसुंदरकांड,
संक्षिप्तनिर्णयसिंधु,   
ज्योतिषायुर्वेद,श्रीरुद्राष्टाध्यायी,

वीरांगनाद्रोपदी,दुलारीराधिका,
ऊधौगोपीसंवाद,    
श्रीमद्भगवद्गीता‘काव्यानुवाद’
रुचिकर विषयः- प्रवचन, भाषण, मंचसंचालन, काव्य लेखन, काव्य पाठ एवं शास्त्रीय विषयों पर नित्य नवीन खोजपूर्ण लेखन तथा राष्ट्रीय भावना के विभिन्न संगठनों से जुड़कर कार्य करना।
जन्मतिथिः9.10.1965                                                    
जन्म स्थानः- पैतृक गाँव-इंदलपुर, पो.संभलपुर, जि.कानपुर,उत्तरप्रदेश                                       वर्तमान पता  के -71, छाछी बिल्डिंग चौक , कृष्णानगर,दिल्ली51                                                        01122002689,01122096548,मो.09811226973,09968657732






 
                                            



                पांचजन्य में प्रकाशित अंश 


                                काश  मैं भी नेता  होता !

  हर पार्टी के लोगों को मैंने यह कहते  सुना है कि वो राजनैतिक शुद्धि के लिए पढ़े लिखे ईमानदार लोगों को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं।जिससे देश में ईमानदार राजनीति का वातावरण बनाया जा सके। यह सुनकर मैंने सोचा कि मैंने भी तीन विषय से आचार्य (एम.ए.)  दो विषय से अलग से एम.ए. एवं बी.एच.यू. से पीएच.डी की है।करीब150 किताबें लिखी हैं यद्यपि सारी प्रकाशित नहीं हैं,कई काव्य ग्रंथ भी हैं।प्रवचन भाषण आदि करने ही होते हैं।आरक्षण आंदोलन से आहत होकर मैंने आजीवन सरकार से नौकरी न मॉंगने का व्रत लिया हुआ है। वैसे भी ईमानदारीपूर्वक जीवन यापन करने का प्रयास करता रहा  हूँ। फिलहाल अभी तक निष्कलंक जीवन है यह कहने में हमें कोई संकोच नहीं हैं।           
      इस प्रकार से अपनी शैक्षणिक सामर्थ्य  का राजनैतिक दृष्टि से देशहित में सदुपयोग करना चाहता था, इसी दृष्टि से मैंने लगभग हर पार्टी से संपर्क करने के लिए सबको पत्र लिखे अपनी पुस्तकें भेजीं अपने डिग्री प्रमाणपत्र भेजे फोन पर भी संपर्क करने का प्रयास किया,किंतु कहीं किसी ने हमसे मिलने के लिए रुचि नहीं ली।किसी ने हमें पत्रोत्तर देना भी ठीक नहीं समझा।कई जगह तो दो दो बार पत्र डाले किंतु कहीं कोई चर्चा न हो सकी किसी ने मुझे पत्र लिखने लायक या फोन करने लायक नहीं समझा मिलने की बात तो बहुत दूर की है।
      हमारे राष्ट्रपति जी दुर्गा जी के भक्त हैं यह सुनकर उन्हें अपनी दोहा चौपाई में लिखी दुर्गा सप्तशती की पुस्तकें  भेंट करके अपनी कुछ बात निवेदन करने का मन बनाया किंतु वहॉं पुस्तकें एवं पत्र भेजने के बाद भी उसके उत्तर में कोई पत्र नहीं मिला।
       इसके बाद कुछ हिंदू संगठनों से  इसलिए संपर्क किया कि मेरी धार्मिक शिक्षा विशेष रूप से है शायद  वहीं हमारा या हमारी शिक्षा का जनहित में शैक्षणिक सदुपयोग हो सके तो अच्छा होगा तो वहॉं के बड़े बड़े लोगों ने हमसे मिलना ठीक नहीं समझा,उनसे छोटे लोगों को हमारी शिक्षा में कोई प्रत्यक्ष रुचि नहीं हुई, यद्यपि वहॉ मुझे इसलिए उन्होंने संपर्क में रहने को कहा ताकि हमारी समाज में जो गुडबिल है उसे संगठन के हित में आर्थिक रूप से कैस किया जा सके ऐसा उन्होंने कहा भी!यहॉं से इसी प्रकार के यदा कदा फोन भी आये जिनमें मैंने पैसे के कारण रुचि नहीं ली।
      इसके बाद निष्कलंक जीवन बेदाग चारि़त्र का नारा देने वाले एक सामाजिक संगठन से जुड़ने के लिए वहॉं के मुखिया को अपना साहित्य भेजा और मिलने के लिए पत्र के माध्यम से समय मॉंगा किंतु वहॉं भी मुझे घास नहीं डाली गई।इसके बाद ब्लाग पर बैठ कर चुपचाप मैं अपने बिचार लिखने लगा।

     बी.पी.सिंह जी की सरकार के समय में राजनेताओं के आधारहीन अदूरदर्शी फैसलों से सारा समाज आहत था आरक्षण से लेकर श्री राम मंदिर आन्दोलन तक उसी समय की उपज थे और दोनों में निरपराध लोग मारे गए!उस समय के बाद राज नीति धीरे धीरे प्रदूषित होती चली जा रही है।बहुत दिन बाद जब अटल जी की सरकार आई उसमें तो देश वासियों के प्रति अपनापन दिखा जिसमें जनता को सुख सुविधाएँ मिलती दिखीं भी जनता की जरूरत की चीजें जनता की आर्थिक क्षमता के अनुशार उपलब्ध कराने का प्रयास हुआ।इसके अलावा तो आँकड़ों और आश्वासनों का खेल चलता रहता है जनता मरे मरती रहे,महँगाई बढ़े बढ़ती रहे अपराध बढ़ें बढ़ते रहें, सरकारें बड़ी बेशर्मी से पूरे देश में सुख चैन के आँकड़े लेकर प्रेस कांफ्रेंस करती रहती हैं ये जनता की पीड़ा से अपरिचित सरकारें या यूँ कह लें कि जनता से दूर रहकर केवल चुनावी खेल खेलने वाली सरकारें कभी भी समाज एवं देश हित में नहीं हो सकती हैं इन्हें अपने काम पर भरोसा ही नहीं होता है इसलिए हर चुनाव केवल उन्माद फैलाकर जी तना चाहती हैं!इन राजनैतिक दलों का उद्देश्य ही जन सेवा न होकर कैसे भी सत्ता में बने रहना होता है सत्ता  से हटते ही चेहरे की चमक चली जाती है। ये भावना ठीक नहीं है हर राजनेता के मनमें समाज के लिए स्थाई सेवा भाव तो चाहिए ही जो अधिकांश नेताओं में नहीं दिखता ऐसे में उन्माद फैलाकर चुनाव जीतने के अलावा और दूसरा कोई विकल्प दिखता भी नहीं है जातिगत आरक्षण के रूप में बी.पी.सिंह जी ने भी उसी शार्टकट का ही सहारा लिया जो समाज के लिए दुखद साबित हुआ!

    इसी राजनैतिक कुचाल से आहत होकर बेरोजगारी के भय से युवा वर्ग न केवल घबड़ा गया अपितु आरक्षण के समर्थन और विरोध में संघर्ष पूर्ण आन्दोलनों में कूद पड़ा !जिस प्रकार से एक साथ एक कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों के समूह भी एक दूसरे से लड़ रहे थे जाति व्यूहों में बँट चुका था सारा देश !कितना दारुण दृश्य था वह! जब बड़ी संख्या में छात्र आत्म दाह करने पर मजबूर हो रहे थे! उसी समय में पटना में आरक्षण विरोधी छात्रों पर सरकारी मशीनरी ने गोली चलाई जिसमें कई छात्र घायल हुए थे इसी में एक छात्र श्री शैलेन्द्र सिंह जी मारे गए थे जिनका दाह संस्कार वाराणसी के हरिश्चंद घाट पर किया गया था उस समय वहाँ बहुत भीड़ उमड़ी थी जिसमे बहुत सारे लोग रो रहे थे बड़ा भावुक वातावरण था मैं भी उसी भीड़ में खड़े रो रहा था !वह विद्यार्थी जीवन था मैंने उसी भावुकता  वश अपने मन में ही एक व्रत ले लिया कि अब मैं कभी सरकार से नौकरी नहीं मागूँगा !!!उसके बाद ईश्वर की कृपा से इतना पढ़ने के बाद भी आज तक सरकारी नौकरी के लिए किसी प्रपत्र पर कभी साइन तक भी नहीं किए हैं ये बात हमारे सैकड़ों मित्रों को पता है। मुझे लगा कि मैं भी तो उसी सवर्ण जाति से हूँ जिस पर दबाने कुचलने एवं शोषण करने के आरोप लगाए जा रहे हैं! हम सवर्णों के अधिकारों के लिए ही तो शैलेन्द्र सिंह जी का बलिदान हुआ है!

    इसके बाद आर्थिक तंगी और धनाभाव से होने वाली बहुत   सारी समस्याओं का सामना तो करना ही था जो  सपरिवार मैं आज तक कर भी रहा हूँ !बचपन में पिता जी का देहांत हो गया था संघर्ष पूर्ण जीवन जीते जीते माता जी भी असमय में ही चल बसीं ! कुल मिलाकर परिस्थियाँ अच्छी नहीं थीं।केवल विद्या का साथ था।शैक्षणिक शोषण भी समाज के अर्थ संपन्न लोगों ने करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी परिस्थियों का लाभ तो चालाक या सक्षम  लोग उठा ही लेते हैं!

     मुझे लगा कि जब अब नौकरी करनी नहीं है तो शिक्षा का समाज हित में ही सदुपयोग किया जाए और जन जागरण किया जाए कि किसी जाति के पीछे रह जाने में सवर्णों का कोई हाथ नहीं है ये राजनेताओं के द्वारा गढ़े गए किस्से हैं। इस प्रकार आपसी भाईचारे की भावना भरना हमारा लक्ष्य था जिसके लिए कुछ प्राइवेट   संगठनों से जुड़ा तो देखा वो समाज सेवा तो कहाँ वो लोग समाज से केवल धन इकट्ठा करने की बात किया करते और सोचते भी यही थे!मुझे लगा कि यही करना है तो किसी राजनैतिक दल से जुड़ जाता हूँ सभी दलों और यथासंभव यथा सुलभ नेताओं से संपर्क किया किन्तु किसी ने मुझमें समाज सेवा के वो गुण नहीं पाए जो एक राजनेता में होने चाहिए!मेरे व्रती,शिक्षित ,सदाचारी,त्याग पूर्ण समाजसेवी जीवन की बातें कहाँ पसंद की जाती हैं राजनीति में? वहाँ तो ऐसी बातें लिखकर भाषणों में पढ़ने के काम आती हैं। 

     इस प्रकार से सब जगह एवं सभी दलों से निराश अंततः अब मैं राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान नामक संस्थान के तत्वावधान में यथा संभव जन हित के कार्य करने का प्रयत्न करता रहता हूँ।
    यहॉं यह अपनी निजी कहानी लिखने का अभिप्राय केवल यह है कि इन राजनेताओं को अपने दलों में अपने साथ जोड़ने में न जाने किस शैक्षणिक या और प्रकार की योग्यता की आवश्यकता होती है जिन ईमानदार कार्यकर्ताओं के नाम पर वे जिनकी तलाश किया करते हैं न जाने वे कौन से भाग्यशाली लोग होते हैं,और वे अपनी किस योग्यता से अपनी ओर राजनैतिक समाज को प्रभावित किया करते हैं?मुझे तो केवल इतना पता है कि  हमारे जैसा शिक्षा से जुड़ा हुआ व्यक्ति इन राजनैतिक लोगों के किसी काम का नहीं है तो आम ग्रामीण या सामान्य आदमी इन राजनैतिक या सामाजिक संगठनों से क्या आशा  रखे?अगर उसे अपनी कोई समस्या कहनी ही हो तो किससे कहे ?और यदि राजनैतिक क्षेत्र में जुड़कर कोई काम करना ही हो तो कैसे करे ?

     मेरा उद्देश्य समाज को आत्म निर्भर  बनाना है, जिससे समाज अपनी हर जरूरत के लिए सरकार की कृपा पर ही आश्रित न रहे!आखिर पुराने समय में भी तो लोग आपसी भाई चारे से रह लेते थे!आज साधन बहुत हो गए हैं किन्तु उनका उपयोग बिलकुल नहीं के बराबर है मोबाईल हर किसी की जेब में पड़ा है किन्तु बात किससे करें! कारें दरवाजे पर खड़ी हैं किंतु जाएँ किसके घर? सबसे तो संबंध बिगाड़ रखे हैं! न जानें क्यों ? सरकारी कानून बल,सरकारी सोर्स सिफारिस बल धनबल कहाँ किसी के काम आ पा रहे हैं जो इनके सहारे रहा सो मरा ! 

राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान से जुड़ने के लिए मैं आप सभी का आह्वान करता हूँ आप सबके  सहयोग एवं इस संस्थान के माध्यम से मैं भी इसी दिशा में निरंतर प्रयासरत हूँ-

                                                                                                                                                                                                                                                        


Arogya Mela

Posted By:

Anon

Mon Feb 11, 2002 8:16 am  |

Friends,

Appended below is a news item on the "Arogya Mela" carried in the Hindustan

Times of 10th Feb.. The Mela is being organised by the Swadeshi Jagaran

Manch in New Delhi and is reportedly drawing huge crowds. It is reported to

have received funds drom the Ministries of Health, Chemicals and S&T! I feel

that the JSA should react to this. Please send your views.

Amit

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Banish the spirit, cure the ‘disease’ at Arogya mela

Sutirtho Patranobis

(New Delhi, February 9)

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If you have a stomach problem or a throbbing headache, look behind.

According to Dr Shesh Narayan Vajpayee, an astrologer who looks up to the

planets to treat patients, ‘spirits’ often follow people around and are

responsible for prolonged illnesses.

These ‘spirits’ are mischievous as well, Vajpayee says. “They are aware when

the person is going for a check-up. So, they disappear and the test results

come out normal. Step out of the clinic, the spirit is back,” he says,

rather seriously. The only way you can get rid of them is to perform ‘puja

and havan’ and appease the planets.

Vajpayee is busy these days at the Swadeshi Arogya Mela at the Jawaharlal

Nehru Stadium, catering to people waiting to get their hands and bodies

checked. The Mela has been organised by the Centre for Bharatiya Marketing

Development (CBMD)—a unit of Swadeshi Jagran Foundation—and National Medicos

Organisation, an NGO.

The Government, according to a CBMD official has just provided logistical

support. The official, however, declines to comment on the financial

aspects, saying the details would be available after the fair concludes on

February 12.

Besides Vajpayee, numerous doctors and medical companies, dabbling in Indian

systems of medicine, have put up stalls at the Mela, which was inaugurated

on Thursday by Union Human Resources Development Minister Dr Murli Manohar

Joshi. Some are selling ayurvedic herbs to treat baldness and some others

are selling clothes made with ‘vastra vigyan’, designed to make the buyer

feel happy about life.

The fair is an attempt to spread awareness about the Indian systems of

medicine, says Delhi's former Health Minister Dr Harsh Vardhan. “Even if

‘health for all’ has not been achieved so far, we want to show that Indian

systems of medicine have the potential to cure many diseases,” he says.

Vajpayee, meanwhile, says the premise of his treatment is that diseases are

related to planetary movement.




                                   

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             




Thursday, March 13, 2014

राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान

      राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान से जुड़ें 

      राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान का संपर्क सूत्र से के आयाम

 

        ज्योतिष  तथा वास्तु  सेवाएँ एवं शंका समाधान 

         शास्त्र पुराणों से सम्बंधित शंका समाधान 

         पूजा पाठ के विषय में शंका और समाधान 

           धर्म एवं धार्मिकों पर शंका और समाधान 

          धार्मिक एवं नैतिक सरल साहित्य का सृजन 

         भारतीय प्राचीन विज्ञान पर खोज पूर्ण समाधान

          टूटते समाज एवं विखरते परिवारों पर विचार 

           स्वास्थ्य सुरक्षा पर शास्त्रीय चिंतन 



समझें अपने पूर्वजों का प्राचीन विज्ञान 


      प्राचीन काल में तलाक नहीं होते थे ?कन्या पूजन होता था ,नारियों की तुलना देवियों से की गई थी अब वैसा नहीं है ,तब  माता पिता का देवतुल्य सम्मान था जिनका स्वर्गवास होने पर भोजन के नाम पर पिंडदान तक दिया जाता था अब जीवन काल में ही वृद्धों को भोजन के लिए वृद्धाश्रम भेजने की तैयारी होती है ! तब अनाथों के नाथ बाबा विश्वनाथ द्वारिका नाथ आदि समस्त देवी देवता माने जाते थे थे अब उनके लिए अनाथाश्रम बनाए जा रहे हैं !तब शिक्षा दीक्षा और चिकित्सा की सहज सुविधा से समाज संस्कारवान था ।अब ऐसा क्यों नहीं हो सकता है ?
     आधार हीन, प्रमाण हीन,तर्क विहीन दलितों के शोषण का आरोप सवर्णों पर लगाकर सरकारी सेवाओं एवं सम्पत्तियों को लूटने लुटाने की प्रतिस्पर्द्धा में लगे भ्रष्टाचारी राजनैतिक दलों के कटघरे में खड़ी भारतीय राजनीति के इस घिनौने  स्वरूप को आखिर कब तक चला पाएँगे भ्रष्टाचारी लोग !आखिर कभी तो  सच्चाई भी सामने आएगी ही कितना लूटा है सवर्णों ने यह भी पता चल पाएगा इस विषय पर कोई पार दर्शी जाँच तो हो।

जातीय आरक्षण के दुष्प्रभाव से शिक्षा विहीन शिक्षक,चिकित्सक एवं जप तप संयम शास्त्रीय स्वाध्याय विहीन साधू एवं भ्रष्टाचार युक्त सरकारें एवं कर्तव्य हीन सरकारी कर्मचारियों का एक बहुत बड़ा वर्ग जिसके दुष्परिणाम स्वरूप सरकारी प्राथमिक स्कूल,सरकारी अस्पताल ,सरकारी टेलीफोन,सरकारी डाक विभाग आदि के पचासों हजार सैलरी लेने वाले सरकारी कर्मचारी वो सेवाएँ नहीं दे पा रहे हैं जो पाँच दस हजार रूपए सैलरी पाने वाले प्राइवेट,शिक्षक,चिकित्सक,कोरियरवाले तथा प्राइवेट फोन और मोबाईल विभाग से जुड़े कर्मचारी अपनी कर्तव्यनिष्ठा से इन विभागों से जुड़े सरकारी कर्मचारियों की इज्जत बचाए हुए हैं सरकारी नाकामी की पोल ढके हुए हैं अन्यथा प्राइवेट विकल्प विहीन पुलिस विभाग की तरह मची होती यहाँ भी …!
   स्वदेशी के नाम पर व्यापारी होने लगे हैं संस्कार संयम सदाचार के अभाव में  अपराध की भावना बढ़ती जा रही है पुण्य पाप का भय समाप्त हो रहा है सारे सम्बन्ध टूटते जा रहे हैं मोबाईल  है किन्तु मन की बात किससे कहें ,गाड़ियाँ  हैं किन्तु जाएँ किसके घर !सब कोई है सब कुछ है फिर भी न जाने क्यों जीवन सूना सूना है अपनापन ,आत्म विश्वास के अभाव से बेचैन समाज के उत्साह विहीन जीवन में के लिए चाहिए आपका भी योगदान जुड़ें "राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान" से !

Wednesday, March 12, 2014

ज्योतिष वैज्ञानिकों  की सलाह न मानने का कठिन दंड कई बड़ी राज नैतिक पार्टियाँ भोग रही हैं किन्तु योग्य ज्योतिष वैज्ञानिकों से मिलने में उन्हें शर्म लग रही है ज्योतिष के नाम पर शौकिया ज्योतिषी या पंडित पुजारियों ने उनका मन बहला रखा है और ऐसे चालाक नेता लोग गंगा नदी की जगह नालों में नहा कर खुश हो रहे हैं !मैं भी भविष्यवाणियाँ महीनों वर्षों पहले ब्लॉग पर लिख कर डाल चुका हूँ!

जैसे केंद्र से लेकर दिल्ली चुनावों तक में मिली पराजय के रूप में भाजपा भोग रही है ,जिस कारण राजग टूटा जिसे टाला जा सकता था उत्तर प्रदेश में भाजपा इसी दोष के कारण खड़ी नहीं हो पाई ! इसी कारण से  चार जगह से टीम अन्ना टूट गई! इसी प्रकार से अलग थलग पड़े अमर सिंह ऐसी  और भी कई घटनाएँ जिनकी भविष्यवाणियाँ मैं महीनों वर्षों पहले ब्लॉग पर लिख कर डाल चुका हूँ मुझे याद है कि 12-6-2012को दिल्ली भाजपा के एक वरिष्ठ नेता से मिलकर मैंने एक वर्ष 

Thursday, March 6, 2014

इस लेख को आप जरूर पढ़ें और समझें "आम आदमी पार्टी" बनने की संभावित सच्चाई !

     यही वो लेख है जिसके प्रकाशित होने के 26 दिन बाद घोषित की गई थी आम आदमी पार्टी। आप इस लेख को जरूर पढ़ें और इससे मिलाएँ आम आदमी पार्टी के लोगों का आचरण ! क्या आपको नहीं लगता है कि मेरी स्क्रिप्ट के आधार पर ही लिया गया है आम आदमी पार्टी बनाने का आइडिया और"आम आदमी पार्टी"नाम रखने का आइडिया भी वहीँ से लिया गया है जिसमें मेरी सहमति न लेना क्या अनैतिक नहीं है यदि हाँ तो ऐसे लोगों को ईमानदार कैसे कहा जा सकता है ? 

     मेरी उसी  स्क्रिप्ट(लेख) के आधार पर  अभिनयात्मक रूप से आज सारा आचरण करते दिख रहे हैं अरविन्द केजरी वाल!अन्यथा जिस आम आदमी का नाम ले लेकर राजनीति करते रहे कहाँ है वो आम आदमी ?और किसमें दिखता है आम आदमी जैसा आचरण !इसलिए आप भी यह लेख जरूर पढ़ें और हो सके तो अपनी टिप्पणी से हमें अवगत भी अवश्य  कराएँ (इसमें लिखने के बाद किसी भी प्रकार की एडीटिंग नहीं की गई है )खोलिए यह लेख लिंक -

Wednesday, 31 October 2012



ऐ मेरे देश के शासको! अब तो विश्वास भी टूट रहा है!



  आम आदमी और नेताओं  में  इतनी दूरी आश्चर्य !


     इस देश  का आम आदमी कहॉं जाए अपनी पीड़ा किसे सुनावे ?जो न हिंदू और न ही मुशलमान है न हरिजन और न ही सवर्ण है।न स्त्री न ही पुरुष  है। न बच्चा न बूढ़ा है।वो see more...http://snvajpayee.blogspot.in/2012/10/blog-post_4683.html

Tuesday, March 4, 2014

मोदी जी पर दिखा पासवान का पूरा असर see more...http://snvajpayee.blogspot.in/2014/03/blog-post.html


भाजपा को सभी जातियों सम्प्रदायों की ही  पार्टी बनी रहने देते तो क्या बिगड़ जाता ! see more...http://snvajpayee.blogspot.in/2014/03/blog-post.html



आखिर सवर्णों के प्रति सबकी सोच एक जैसी ही क्यों है सब लोग सवर्णों को ही दोषी मानते हैं आखिर क्यों ? see more...http://snvajpayee.blogspot.in/2014/03/blog-post.html




मोदी जी ने ब्राह्मण और बनियाँ  ही क्यों गिनाए सवर्णों में तो क्षत्रिय भी होते हैं खैर हो सकता है अध्यक्ष जी का लिहाज कर गए हों see more...http://snvajpayee.blogspot.in/2014/03/blog-post.html



मोदी जी के लिए उचित होगा कि वो सर्व जन हितैषी अपना गौरव बनाए और बचाए रखें see more...http://snvajpayee.blogspot.in/2014/03/blog-post.html

Monday, March 3, 2014

आज मोदी जी को यह क्या हो गया !क्या बोल गए मोदी जी !!!

"अब भाजपा ने भी अब  अलापा दलित राग" सवर्ण रे ! भाग यहाँ से भी भाग !!!मोदी जी के भाषण में साफ दिखा पासवान के कुसंग का असर !

दैनिकभास्कर-3-3-2014मुजफ्फरपुर.नरेंद्रमोदी ने सोमवार को मुजफ्फरपुर रैली में कहा,'ब्राह्मण और बनियों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी अब पिछड़ों की पार्टीबनगईहै।आनेवाला वक्त दलितों,पिछड़ों का ही है।'

      इस बात के कहने का मतलब क्या है कि ब्राह्मण और बनियों को अब भाजपा ने भी सस्पेंड कर दिया है किन्तु इस बात में भी कोई चाल है क्या? सवर्ण तो क्षत्रिय भी हैं इसमें  ब्राह्मण और बनियाँ ही क्यों क्षत्रिय क्यों नहीं ? इसका कारण कहीं अध्यक्ष जी का लिहाज तो नहीं है! खैर जो भी हो किन्तु मेरी इतनी जिज्ञाशा जरूर है कि आखिर  ब्राह्मण और बनियों का अपराध क्या है ? यही न कि ये अब तक भाजपा पर आँख बंद करके  भरोसा करते रहे ! दूसरा आरक्षण सम्बन्धी मंडल आंदोलन से आहत होकर सवर्णों ने अपना वोट थोक में भाजपा को दिया था उसी का परिणाम था कि भाजपा की सीटें अचानक बढ़ गई थीं सवर्णों को उसकी सजा देना चाहती है आज भाजपा क्या ?किन्तु भाजपा का स्वभाव ऐसा अवसरवादी तो पहले कभी न था! भाजपा के खून में कृतघ्नता का दोष तो पहले कभी न था !एक वोट से अटल जी की सरकार गिरी थी किन्तु अटल जी के चेहरे की चमक नहीं गई थी अपितु उनके चेहरे पर नैतिकता का तेजस दमक रहा था !सरकार भले गिरी थी किन्तु नैतिकता के युद्ध में सभी राजनैतिक दलों को पराजित करके जिस समय लोक सभा से निकले थे अटल जी उस समय उनकी छटा देखते ही बन रही थी। 

     लोक सभा में हुए अटल जी के उस सार गर्भित भाषण में अटल जी ने इस दलित नेता की भी आत्मा को झकझोरते हुए दो बार इनका नाम लेकर सम्बोधन किया था तब इन्होंने भी बताया था कि अटल जी का भाषण सुनने के लिए ये कैसे कैसे स्कूल से बस्ता लेकर भाग आया करते थे !किन्तु उनका भाषण सुनकर तो ये नेता हो गए अगर उनका सत्संग भी कर लिया होता तो आज काँग्रेस के दरवाजे हाजिरी नहीं लगानी पड़ती !
    अपने आदरणीय अटल जी ने उस समय बड़ों बड़ों को सोचने पर मजबूर कर दिया था कि नैतिकता भी कोई चीज होती है जिसका सम्मान केवल भाजपा के मन में है भाजपा सिद्धांतों के साथ समझौता करके सत्ता लोलुप तो कभी नहीं रही फिर आज मोदी जी के मुख से यह सब निकला कैसे ?
      जिस कुसंग ने वी.पी.सिंह जी को भी ऐसे ही बदनाम करवाया था अब  मोदी  जी की बारी है क्या ? जिसकी शर्तों के साथ समर्पण करके वी.पी.सिंह जी को अपनी सरकार में कभी शांति नहीं मिली आज मोदी जी के माध्यम से भाजपा ने उसके मुद्दों के आगे समर्पण करके वी.पी.सिंह जी की तरह ही अपने को अविश्वसनीय बनाना प्रारम्भ कर दिया है क्या ?जिस दिन भाजपा और लोजपा का बेमेल समझौता हुआ था मुझे उसी दिन शक हुआ था कि सत्ता सुंदरी की असह्य प्यास से पराजित होकर भाजपा  के राजनाथ सिंह जी कहीं वी.पी.सिंह जी से प्रभावित तो नहीं होते जा रहे हैं !

       कहने को तो  वी.पी.सिंह जी भी सरकार  बनाने से पूर्व एक आम इंसान की तरह ही देश के सभी नागरिकों के प्रति समान सोच ही रखते रहे होंगे क्योंकि ये वही वी. पी. सिंह जी थे जिन्होंने सरकार बनने के कुछ माह पूर्व ही  वाराणसी के अस्सी क्षेत्र स्थित गोयनका संस्कृत महाविद्यालय में काशी के विद्वान  ब्राह्मणों का सम्मान किया था तथा  संस्कृत भाषा और संस्कृत विद्वानों एवं उनकी शास्त्रीय साधना की प्रशंसा की थी बाद में गुरुवर वागीश जी जैसे बड़े विद्वान ब्राह्मणों   ने जिनकी प्रशंसा में बड़े बड़े कसीदे पढ़े थे न केवल इतना अपितु उन्हें " राजर्षि" की उपाधि  तक प्रदान की गई थी जाते समय उन्होंने ब्राह्मणों के हित साधन के लिए बहुत कुछ करने का आश्वासन दिया था किन्तु जाने के बाद वे न केवल अचानक भूल गए अपितु वी.पी.सिंह जी पूरी तरह से बदल भी गए !और उनकी सरकार में सवर्णों एवं राम भक्तों के विरुद्ध क्या कुछ नहीं किया गया दहल गया था पूरा समाज और पूरा देश ! लगने लगा था कि अब क्या होगा !

      जब वी.पी.सिंह जी को " राजर्षि" की उपाधि प्रदान की गई थी उस सभा के मंच संचालक श्री अखिलानंद शास्त्री जी थे जिन्हें लोग अक्सर चिढ़ाया करते थे कि कैसा आशीर्वाद दिया आप लोगों ने कि ये तुम्हारे राजर्षि जी तो धन(आरक्षण) धर्म(रामभक्तों पर अत्याचार ) सब कुछ चौपट करने पर तुले हुए हैं यदि सवर्ण इतने ही गलत थे तो काशी के विद्वानों के बीच एक संस्कृत विद्यालय में राजर्षि बनने आए ही क्यों थे वी.पी.सिंह !इसलिए निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि निजी तौर पर वी.पी.सिंह जी भी उदार ही रहे होंगे किन्तु कुसंग ने सब कुछ करा दिया -

                 "को न कुसंगति पाई नशाई "

      उनमें अचानक इतना बड़ा बदलाव इसी दलित नेता के कुसंग के कारण आया जिस कुसंग ने मोदी जी को कुछ दिनों में ही इतना बदल कर रख दिया आज तक इतने भाषण मोदी जी के हुए थे तब तो मोदी जी के मुख से इस तरह के संकीर्ण भाषण कभी नहीं सुने गए यहाँ तक कि गुजरात के चुनावों में भी नहीं सुने गए किन्तु आज मोदी जी ने उन सवर्णों का दिल  तोड़ दिया है जो महीनों से प्राण प्रण से समर्पित हैं मोदी जी को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए ! यदि आप भी दलितों और पिछड़ों का ही रोना धोना लेकर बैठ गए तब तो सवर्णों के लिए जैसे मुलायम सिंह जी मायावती जी जैसे जाति,संप्रदाय वाद आदि से प्रभावित होकर राजनीति करने वाले लोग हैं वैसे ही आप भी हैं !उनमें और भाजपा में अंतर क्या रह जाएगा ?
    आखिर सवर्णों को भी बँधुआ मजदूर तो नहीं ही माना जाना चाहिए कि इनका वोट तो मिलेगा ही इन्हें कुछ भी बोलते रहो ये कर क्या लेंगे किन्तु याद रखना चाहिए कि प्रत्येक नागरिक को मतदान का अधिकार प्राप्त है उसमें बड़ी ताकत है इसलिए लोकतंत्र  में किसी को कमजोर नहीं समझा जाना चाहिए !
     यदि समय रहते इसकी भरपाई नहीं की गई तो आगे इन बातों के जवाब ढूँढे नहीं मिलेंगे जब समाज में भाजपा के विरुद्ध भड़केगा आक्रोश उसकी भरपाई कौन करेगा ?वही राजनाथ सिंह जी ! जिन्होंने मोदी जी की गलतियों की माफी माँगने के लिए पहले से ही शीश झुका रखा है ! किन्तु कब तक ऐसा चलेगा कि मोदी जी गलती करते रहें और राजनाथ सिंह जी शीश झुकाकर माफी माँगते रहें !और भाग्यवश यदि कहीं मोदी जी की सरकार बन ही गई और मोदी जी ने गुजरात की तरह ही केंद्र में भी दशक लगा ही दिया तब अध्यक्ष जी की जिंदगी तो माफी माँगते माँगते ही बीत जाएगी !खैर, वो जानें अध्यक्ष जी जानें हमें तो मोदी जी के आज के भाषण के बाद भविष्य के विषय में भी सोचना पड़ेगा कि हर कोई यदि दलित पिछड़ों और मुश्लिमों का ही राग अलापेगा तो आखिर सवर्णों के विषय में कौन सोचेगा? और यदि कोई नहीं सोचेगा तो आखिर सवर्ण क्यों किसी के साथ चिपके रहें ? जब भाजपा को भी सवर्णों की ओर लातें ही फेंकनी हैं तब बेइज्जती कराने के लिए कोई सवर्ण वहाँ भी क्यों जाए !
      जब सभी राजनैतिक दलों की तरह भाजपा के भी एजेंडे में सवर्णों के विकास के लिए कोई योजना नहीं थी किन्तु सबके साथ समान व्यवहार होगा इसी बात की ख़ुशी थी जो अन्य पार्टियों में नहीं दिखता था किन्तु जब भाजपा भी दलित वादी बन जाएगी तो सवर्णों के लिए तो सब बराबर हो गए मन आवे उसको वोट दें न मन आवे न दें जब सवर्णों को लोकतंत्र की वर्त्तमान पद्धति में कुछ लाभ होना ही नहीं है उनके पूर्वजों पर दलितों के शोषण का झूठा आरोप लगना ही है तो क्या यही बकवास सुनने जाएगा कोई रैलियों में और इसीलिए देगा वोट !सवर्णों को भाजपा भी इतना भ्रमित  करेगी क्या ?
       मोदी जी आखिर महीनों पहले से  तो बोल रहे थे! तब उनकी वाणी पर यह सब क्यों नहीं आया जो कुछ वे आज बोले हैं इतने ऊँचे ओहदे पर पहुँच कर भी ये संकीर्णता !आश्चर्य !!!क्या मोदी जी को थोड़ा भी ध्यान नहीं रहा कि आज की तारीख में वे भारतीय समाज में इतने अधिक लोकप्रिय हो चुके हैं कि उनके मुख से बिना किसी भेदभाव के देश के प्रत्येक नागरिक को समेटकर चलने का भाव प्रकट होना चाहिए था देशवासियों को उनकी विशाल भुजाओं से आशा है इसीलिए महापुरुषों को विशालबाहु या आजानु बाहु कहा जाता था !क्योंकि जनता उनके हाथों की ओर देखती है किन्तु मोदी जी तो आज सवर्णों को अपना छप्पन इंच का सीना दिखाकर चले गए ! इसलिए किसी के छप्पन इंच के सीने की जरूरत सवर्णों को नहीं है आवश्यकता इस बात की है कि काँग्रेस ने जो अभी तक जाति क्षेत्र समुदाय एवं सम्प्रदायों को बाँट कर राजनीति की है अब "फूट डालो राजनीति करो" वाली नीति से देश मुक्त होना चाहता है अब तो मेल मिलाप वाली बातें ही समाज सुनना चाहता है अब देश के किसी भी नागरिक को तड़पते देखने की भावना नहीं है फिर यदि दलित सवर्ण का खेल शुरू हुआ तो समाज एकबार फिर बहुत पीछे चला जाएगा !कम से कम ऐसा करने की आशा भाजपा से तो नहीं ही थी । 
      इस दलित नेता का तो खेल ही अजब है वी. पी. सिंह जी की सरकार के समय जब पूरा देश त्राहि त्राहि कर रहा था जब छात्र आत्मदाह कर रहे थे उस समय ये महाशय जी कह रहे थे कि सरकार को सवर्ण छात्रों के साथ और अधिक कड़ाई से पेश आना चाहिए !ऐसे लोगों का असर आज से मोदी जी पर भी छाने लगा है क्या यदि हाँ तो यह चिंता की बात है !यदि भाजपा वास्तव में देश को दिशा देने के प्रति गम्भीर है तो ऐसे वक्तव्यों से बचा जाना चाहिए क्योंकि उन्हें अब एक ऐसे  आत्मघाती कालिदास का साथ मिला है जो जिस शाखा पर बैठता है उसी को काटता है और जिस थाल में खाता है उसी में छेद करता है आखिर अब इनसे कोई क्यों नहीं पूछता है कि उस समय जब अटल जी की सरकार विरोधियों के निशाने पर होने के कारण मुशीबत में थी तब आप राजग छोड़कर क्यों चले गए गए थे !किन्तु पूछे कौन?  उससे अच्छा उन्हीं के मुद्दों से प्रभावित होकर उन्हीं पर काम किया जाने लगा उन्हें ही प्रोत्साहित करने के लिए दलित राग अलापा जाने लगा किन्तु भाजपा को सतर्क रहने की जरूरत है कि ये दलित नेता के तौर पर पहचान बना चुके महाशय कब कैसी लहर मारेंगे क्या पता!मैं तो यही कह सकता हूँ कि अब भाजपा की रक्षा भगवान  स्वयं करें तभी कुछ हो सकता है अन्यथा यदि दलित और सवर्णों का यह खेल ऐसा ही चला तो भाजपा की विजय का जश्न मनाया जा सकेगा इसमें संशय है !



जातीय आरक्षण देने के पीछे सोच आखिर क्या है ?

निर्दयी सरकारों में बैठे लोग  इस प्रकार के आधार और तर्क हीन जातीय आरक्षण का खेल आखिर कब तक खेलते रहेंगे? 


    दुर्भाग्य की बात है कि जिस राजनीति ने सन 1989-90 में इसी तरह के जातीय आरक्षण के विरुद्ध सवर्णों को आत्म दाह करने के लिए मजबूर कर दिया हो छात्रों पर गोलियाँ चलाई हों फिर भी सरकारों ने कोई सबक न लिया !बिना कुछ काम किए चुनाव जीतने की लालसा से किए जाते हैं ऐसे सारे संकीर्ण फैसले ! कितने सवर्ण छात्र जातीय आरक्षण नाम के अत्याचार के विरुद्ध  आत्म दाह जैसी कठोर यातना सहने के लिए विवश हुए  थे कितने सवर्ण छात्रों को गोलियों से भून दिया गया था तब इन  नेताओं का हृदय क्यों नहीं हिला था क्यों नहीं दिया ध्यान ?

     इस प्रकार से हमारे जैसे कितने स्वाभिमानी नौजवानों की जिंदगी से खेले हैं ये नेता लोग! अपना अपना पाप हर किसी को भोगना पड़ता है ये भी भोगेंगे इन्हें  जनता जरूर सबक सिखाएगी इन पापों का प्रायश्चित्त जरूर करना होगा हमें तो भगवान् पर भरोसा है । 

     जातिगत आरक्षण का विरोध करने के कारण हमारे सवर्ण बंधुओं को गोलियों से भून दिया जा रहा था या  वे बेचारे लोमहर्षक आत्मदाह करने को मजबूर हो रहे थे उनके पवित्र बलिदान को मैं आज तक सह नहीं पाया हूँ मेरी आत्मा मुझे रात रात भर सोने नहीं देती थी । 

        इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हमारे उन भाइयों के साथ अन्याय हो जिन्हें आरक्षण का लाभ मिलने का तथाकथित दावा किया जा रहा है !किन्तु मेरी प्रार्थना मात्र इतनी है कि यदि यहाँ सक्षम लोकतंत्र है तो फिर इस वैज्ञानिक युग में ऎसे अंधविश्वास के साथ क्यों जीना कि दलित या किसी और जाति   का  पहले कभी शोषण किया गया होगा अरे! पहले जो हुआ होगा सो हुआ होगा हमें वर्त्तमान में जीना  चाहिए और इस देश का जो भी नागरिक गरीब हो वह किसी भी जाति  संप्रदाय का क्यों न हो उसका यथा सम्भव सहयोग किया जाए किन्तु आरक्षण का प्रावधान केवल विकलांगों अपाहिजों के लिए हो  क्योंकि ये तो मानने वाली बात है कि जिनके हाथ पैर ठीक न  हों शरीर और दिमाग स्वस्थ न हो उन्हें आरक्षण दिया जाना चाहिए बाकी स्वस्थ और सक्षम लोगों को आरक्षण किस बात का इन्हें आरक्षण क्यों दिया जाए ? 

    सब कुछ ठीक होने पर भी अगर कुछ लोगों के अंदर इस बात के लिए हीन भावना है कि वो अपने संघर्ष बल पर सवर्णों की बराबरी नहीं कर सकते हैं तो मैं कहना  चाहता हूँ कि आखिर क्यों ? क्या कमी है ऐसे लोगों में ?वैसे भी यदि गरीब सवर्ण का बच्चा संघर्ष  करके आगे बढ़ सकता है तो अन्य लोगों का क्यों नहीं? केवल यही न कि सवर्णों के अलावा अन्य जातियों को आरक्षण का सहारा होता है जबकि सवर्णों को अपने संघर्ष का ही भरोसा होता है और अपने सहारे रहने वाला कभी पराजित नहीं होता है और यदि होता है तो कुछ अनुभव लेकर लौटता है जो भविष्य की तरक्की में सहायक होता है!फिर भी यदि किसी को लगता ही है कि वो अपने संघर्ष के बल पर सवर्णों की बराबरी नहीं कर सकते इसलिए उन्हें जातीय तौर पर आरक्षण चाहिए तो ये कोई दिमागी बीमारी है जिसकी जाँच होनी चाहिए और प्रापर इलाज उपलब्ध कराया जाए! हो न हो इसी बीमारी का शिकार होने के कारण ही अतीत में भी ये तरक्की न कर पाए हों !जिसके लिए आज भी सवर्णों पर आधार हीन शोषण करने के आरोप लगाए जाते रहते हैं !इसलिए सभी जातियों के लोगों को चाहिए कि सवर्णों की तरह ही अपनी भुजाओं का भरोसा करें उसी से सब कुछ ठीक हो जाएगा !अन्यथा आरक्षण से साठ  नहीं छै सौ वर्ष में भी तरक्की नहीं हो सकती है भीख से किसी का भला नहीं हो सकता है!  

     मेरा निवेदन मात्र इतना है कि बात हमारी भी सुनी जाए !तब फैसला लिया जाए कि जातिगत आरक्षण दिया जाना चाहिए या नहीं किन्तु सरकार ने हम लोगों की माँगों पर विचार करना कभी जरूरी नहीं समझा !

      उचित होगा  कि काँग्रेस अपने पुराने पापों का  प्रायश्चित्त करते हुए ऐसे अवसर वादी हथकंडों से ऊपर उठकर देश हित में विचार करे, प्रजा प्रजा में भेद नहीं किया जाना चाहिए अन्यथा जैसे को तैसा !!जय श्री राम !!!