Thursday, May 30, 2013

माता सीता का मंदिर लंका में बनाने वालों से निवेदन !

                          सभी से प्रार्थना

श्री मान जी ,
        आपकी इस सीता  भक्ति निष्ठा , धार्मिक सोच एवं पवित्र प्रयास की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है।इसलिए बार बार साधुवाद
महोदय ,मैं श्री राम एवं सीता को मानने वाले समस्त विश्व समुदाय को सूचित करना चाहता हूँ कि अपने देवी देवताओं के मंदिर बहुत बन रहे हैं और बनने भी चाहिए किन्तु एक बात पर विशेष ध्यान देना भी आवश्यक हो गया है कि आप सभी धनवान ,विद्यावान आदि लोगों को चाहिए कि वे श्रीराम   एवं  श्रीकृष्ण आदि अपने आराध्य परमात्मा के शास्त्र प्रमाणित चरित्रों पर शोध (रिसर्च) पूर्वक उनकी लीलाओं, कथाओं का प्रचार प्रसार किया जाए जिससे वर्तमान में टूटते समाज एवं विखरते परिवारों को बचाया जा सकता है।साथ ही सभीप्रकार के अपराधों से मुक्त समाज का निर्माण किया जा सकता है। 
       आज साधू महात्माओं से लेकर नाचने गाने वाले समस्त अशास्त्रीय कथाबाचकों  में पैसे की बढ़ती भूख ने उन्हें तरह से पैसे के लिए पागल किया है कि जिस कथा के कहने से पैसे मिलते हैं वे केवल वही कथा कहते,उसी पर नाचते, गाते, बजाते हैं किन्तु जिस कथा से चरित्र निर्माण होता है उससे उनका कोई लेना देना होता ही नहीं है। दूसरी बात यह है कि ऐसे लोग कोई शास्त्र प्रमाणित बात बोलना भी नहीं चाहते  हैं जिससे श्रीराम   एवं  श्रीकृष्ण आदि अपने आराध्य परमात्मा के शास्त्र प्रमाणित चरित्रों ,उनकी लीलाओं, कथाओं पर अक्सर तर्क कुतर्क करते सुने जा सकते हैं लोग !अभी हाल में ही सीता निर्वासन  एवं श्रीराधा कृष्ण की रासलीलाओं के विषय में भी कुछ लोग कुछ ऐसा ही बोलते बकते सुने गए थे। ज्ञान के अभाव में ऐसा ही कुछ अक्सर ही चलता रहता है । 
        इन सबसे समाज को बचाने एवं शास्त्र प्रमाणित जानकारी देने के लिए  विभिन्न स्तरों पर समाज में काम कर रहा है शास्त्रीय विषयों के प्रचार प्रसार के लिए सभी की  सभी शास्त्रीय शंकाओं का समाधान करने का प्रयास किया जा रहा है। जिसके लिए आर्थिक आदि सभी प्रकार के सहयोग के लिए आप सादर आमंत्रित हैं यदि आप भी हमारे विचारों से सहमत हों तो आप भी कर सकते हैं हमारा सहयोग। 
                          निवेदकः-
आचार्य डॉ. शेष नारायण वाजपेयी 
  संस्थापकः- राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध संस्थान                
                                    तथा
दुर्गापूजाप्रचारपरिवार एवं ज्योतिष जनजागरण मंच 
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             
व्याकरणाचार्य (एम.ए.)
संपूर्णानंदसंस्कृतविश्वविद्यालयवाराणसी   ज्योतिषाचार्य(एम.ए.ज्योतिष)
 संपूर्णानंदसंस्कृतविश्वविद्यालय वाराणसी  
   एम.ए.      हिन्दी    
 कानपुर विश्व  विद्यालय 
 पी.जी.डिप्लोमा पत्रकारिता  
उदय प्रताप कॉलेज वाराणसी 
 पी.एच.डी. हिन्दी (ज्योतिष)   
  बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी बी. एच. यू.  वाराणसी
  विशेषयोग्यताः-वेद, पुराण, ज्योतिष, रामायणों तथा समस्त प्राचीनवाङ्मयएवं राष्ट्र भावना से जुड़े साहित्य का लेखन और स्वाध्याय 
 प्रकाशितः-पाठ्यक्रम की अत्यंत प्रचारित प्रारंभिक कक्षाओं की हिन्दी की किताबें
कारगिल विजय      (काव्य )     

श्री राम रावण संवाद  (काव्य )
श्री दुर्गा सप्तशती     (काव्य अनुवाद ) 

श्री नवदुर्गा पाठ      (काव्य)                               
श्री नव दुर्गा स्तुति (काव्य ) 

 श्री परशुराम(एक झलक)
 श्री राम एवं रामसेतु  
 (21 लाख 15 हजार 108 वर्षप्राचीन
कुछमैग्जीनोंमेंसंपादन,सहसंपादनस्तंभलेखनआदि। 
वर्तमान पता  के -71, छाछी बिल्डिंग चौक , कृष्णानगर,दिल्ली51                                                        फो.नं-01122002689,011 22096548,मो.09811226973,09968657732 





 
                                            




                पांचजन्य में प्रकाशित अंश 




                                                                                                                                                                                                                                                                                           
    
                                            

क्या सीता जी को दोषी मानते थे भगवान श्री राम ?

भगवती सीता पर शंका होने का सवाल ही नहीं उठता 

     यदि ऐसा हुआ होता तो कौन मानता प्रभु श्री राम को भगवान ?जो शत्रु के विरुद्ध नहीं हुए वो सीता के विरुद्ध कैसे हो सकते हैं ऐसी छिछली कल्पना ही क्यों ?मायके में रहने का विकल्प भी उनके पास था आखिर उनके पिता भी राजा थे!

      सीता  जी को अयोध्या से गए दो मास हो गए थे तब सीता ने शुभघड़ी में एक पुत्र को जन्म दिया।इसी समय श्री राम को यह समाचार दिया गया तो प्रसन्न श्रीराम जी लक्ष्मण जी के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर  रात्रि में ही बाल्मीकि जी के आश्रम पहुँचे और दोनों भाइयों ने उन्हें प्रणाम किया। बाल्मीकि जी ने जातक का नामकरण नान्दीमुख श्राद्ध आदि संस्कार कराया।सीता जी के समक्ष श्रीरामजी ने आनंदपूर्वक बेटे का मुख देखा और ब्राह्मणों को बहुत सारी दान दक्षिणा दी। खूब नाच गाने हुए पुष्प  वर्षा हुई बाजे बजाए गए।जनक जी ने अलग से बाजे वाले  बुलाकर बाजे बजवाए।

    भगवान श्री राम के चारु चरित्र पर अँगुली उठाकर श्री जेठमलानी जी ने असहनीय पीड़ा दी है।एक बार पता तो कर लिया होता कि सच क्या है।मान्यवर, आप उनके विषय में तो थोड़ा सोचते जिन्होंने श्री राम के पावन चरितामृत से प्रभावित होकर जंगलों में धूनी रमा रखी थी। आज भी सब साधु संत व्यापारी नहीं हैं चरित्रवान सदाचारी उन महापुरुषों   संतों के विषय में सोचा होता जो आज भी सनातन धर्म की धरोहर हैं।

     जिन्होंने रामचरित पर ही न केवल काशी  हिंदू विश्व विद्यालय से रिसर्च किया है अपितु बचपन से आज तक निरंतर इन्हीं शास्त्रों से संबंधित शोधकार्य  चला रखा है ऐसे हमारे जैसे उन सामान्य लोगों के विषय में भी सोचा होता जिन्होंने श्री राम के चारु चरणों में जीवन बिताने का महान व्रत लेकर अपने जीवन को कृतार्थ करने की लालषा लगा रखी है।आज क्या बीता होगा हमजैसों  पर ?
     मान्यवर, श्रीराम के जीवन के किसी चरित्र में कहीं कोई शंका लगती भी थी तो आधे अधूरे ज्ञान के बल पर ये बात मीडिया में नहीं उठाई जानी चाहिए थी अभी भी रामायण के विद्वान महापुरुष हैं उनसे शंका  समाधान किया जा सकता था। मान्यवर, आप विद्वान और ख्याति प्राप्त अधिवक्ता हैं।विधि के क्षेत्र में आपके बचन प्रमाण माने जाते हैं,किंतु हर विषय में ये हठ ठीक नहीं है ।इस बिषय का निर्णय रामायण के विद्वानों पर छोड़ देना चाहिए था।जो हमारी दृष्टि में आप से भूल हुई है।उमर के इस पड़ाव पर युवा पीढ़ी के लिए यह कपोल कल्पित अप्रमाणित अप्रिय संदेश ! आश्चर्य!!!

 
   श्री राम ने सीता को क्यों निकाला था?
    राजा के रूप में श्रीराम 

      1.श्री राम के राज्य में आम आदमी को यह हक था कि वह राज परिवार के विषय में अपनी बेबाक टिप्पणी न केवल कर सकता था अपितु उसकी न्यायोचित टिप्पणी को राज परिवार मानने के लिए विवश  होता था। टिप्पणी करने वाला आम आदमी है जो लंका में नहीं गया था वो कैसे और क्यों विश्वास कर ले कि माता सीता पवित्र हैं।आखिर वह राम राज्य का सजीव जागरूक और स्वाभिमानी नागरिक धोबी था। यदि आम आदमी अपनी पत्नी बच्चों की सुरक्षा को लेकर इतना जागरूक है तो इसमें बुरा क्या है? श्रीराम राजा हैं इसलिए प्रजारूप धोबी की बात का सम्मान करना उनका कर्तव्य  बन जाता है,क्योंकि राजा उन्हें प्रजा ने बनाया था परिवार ने नहीं। इसलिए उनके लिए प्रजा प्रथम थी परिवार बाद में। आज केवल एक धोबी कह रहा था कल सारा समाज कहता फिर क्या होता? इसलिए इस लिए इस विषय को यहीं रोक देने के लिए सीता को निकालना अपरिहार्य हो गया था।

      यदि यह सोचा जाए कि श्रीराम को भी साथ जाना चाहिए था।एक पति के रूप में तो यही उचित था किंतु राजकाज की जिम्मेदारी भी श्री राम की ही थी।अभी तक उनके कोई संतान नहीं थी।इसलिए सीता को अकेले भेजा था।         
 
पति के रूप में श्रीरामः-     सीता को निकालने के बाद श्रीराम ने समस्त सुख सुविधाओं का परित्याग कर दिया था जमीन में सोना आदि समस्त वैराग्य व्रत के लक्षण अपना लिए थे।

  यहॉं विशेष बात एक और कह देना चाहता हूँ कि इसकी प्रमाणित कथा क्या है।उसे एक बार पढ़ने से सारी शंकाएँ  स्वतः दूर हो जाएँगी।
     सीता निर्वासन की प्रमाणित कथा-

  गर्भिणी सीता से भगवान श्रीराम ने पूछा- देवी,  इस अवस्था में तुम्हारी भी कोई ईच्छा हो तो बताओ तो सीता जी ने कहा कि गंगा तट निवासी ऋषियों के आश्रमों बनों आदि के दर्शन की इच्छा है और कहा कि मुझे शीघ्र वहाँ भेज दीजिए।श्री राम ने कहा ठीक है कल वहाँ लक्ष्मण तुमको ले जाएँगे थोड़ी देर बाद बोले कि मैं भी कुछ जप तप करना चहता हूँ।तुम कुछ दिनों के लिए वहाँ चली  जाओ तो मैं भी कुछ भजन कर लूँगा।इस प्रकार श्रीराम और सीता ने प्रेमपूर्वक बातचीत की इसके बाद रामजी सो गए।सीता जी सोचने लगीं कि वहाँ पर मेरे माता पिता आदि परिवार के लोग विद्यमान हैं वहाँ कोई कष्ट तो होगा नहीं कल मैं अवश्य जाऊँगी।ऐसा सोच कर आनंदपूर्वक सो गईं।

     प्रातःकाल उठने के बाद स्नान किया भोजन बनाया श्रीराम ने भी स्नान किया सीता ने बड़े प्रेम से परोसकर भोजन कराया,तदनंतर स्वयं भोजन किया फिर उर्मिला आदि बहनों से पूछकर माताओं को प्रणाम करके सीता जी तैयार हो गईं।

     श्री राम जी की आज्ञा पाकर लक्ष्मण जी रथ ले आए, सीताजी  अपनी सखियों, दासियों और तुलसी वृक्ष के साथ सबसे बिदा लेकर रथ पर बैठ गईं।रथ गंगा तट की ओर चल पड़ा। बाल्मीकि आश्रम के समीप रथ रोककर लक्ष्मण जी ने एक पीपल वृक्ष के नीचे आसन बिछा दिया,तब सखियों के साथ सीता उस पर जा बैठीं।आँखों में आँसू भरकर लक्ष्मण जी कहने लगे माता!लोकापवाद के कारण भैया ने मुझे यहाँ भेजने की आज्ञा दी है इसमें मेरा कोई दोष नहीं है।अब आप यहॉं से ऋषि बाल्मीकि के आश्रम पर चली जाएँ ।चूँकि यह तो लक्ष्मण जी को भी पता होगा कि सीता जी का पूरा परिवार और माता पिता बाल्मीकि के आश्रम में ही रहते हैं।इसलिए वहॉं जाने के लिए कहा।इतना कह कर सीता जी की परिक्रमा करके प्रणाम किया।बिदा लेकर वहॉं से चले आए।

     उस समय दासियाँ सीता जी को पंखा झल रही थीं।उधर बाल्मीकि जी ने शिष्यों से यह वृत्तांत सुना तो जनक जी सुमेधा तथा कितनी ही स्त्रियों और ब्राह्मणों के साथ वहाँ जा  पहुँचे जहाँ सीता जी बैठी हुई थीं।वहाँ  पहुँचकर उन लोगों ने सीता जी की पूजा की फिर उन्हें सुंदर पालकी में बैठाया और आश्रम की ओर ले चले रास्ते में अनेक प्रकार के बाजे बजाए जा  रहे थे।नाच गाना इसी खुशी में रास्ते भर हो रहा था। भाटगण बिरुदावली गा रहे थे।आश्रम पर पहुँचते ही मुनि पत्नियों ने सहर्ष उन पर विविध प्रकार के पुष्प  बरसाए आरती उतारी गई और सोने के पलंग पर बैठाया गया । दिव्य अन्न और सुंदर सुंदर फल मूल देकर मुनि पत्नियों ने उन्हें प्रसन्न कर रखा था,क्योंकि बाल्मीकि जी के मुख से उनकी प्रशंसा सुन चुकी थीं।सीता जी का जब मन होता तब पालकी पर बैठकर बनों में घूमने जाया करती थीं।जो सुख सीता जी को अयोध्या में मिलता था वही यहाँ पर भी सुलभ था।

  यथा-       यथा पूर्वं तु साकेते सुखमाप विदेहजा।
               तथामुनेराश्रमेपि सुखमाप पतिव्रता।।
         
      इसप्रकार आनंदमय जीवन बिताते हुए सीता जी को दो मास हो गए तब सीता ने शुभघड़ी में एक पुत्र को जन्म दिया।इसी समय श्री राम को यह समाचार दिया गया तो प्रसन्न श्रीराम जी लक्ष्मण जी के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर  रात्रि में ही बाल्मीकि जी के आश्रम पहुँचे और दोनों भाइयों ने उन्हें प्रणाम किया। बाल्मीकि जी ने जातक का नामकरण नान्दीमुख श्राद्ध आदि संस्कार कराया।सीता जी के समक्ष श्रीरामजी ने आनंदपूर्वक बेटे का मुख देखा और ब्राह्मणों को बहुत सारी दान दक्षिणा दी। खूब नाच गाने हुए पुष्प  वर्षा हुई बाजे बजाए गए।जनक जी ने अलग से बाजे वाले  बुलाकर बाजे बजवाए।
    मुनि पत्नियों ने सुंदर थाल सजाकर सीताराम जी की तथा नवजात शिशु की आरती उतारी।मंगलगायन हुआ। 
 यथा-  ऋषि पत्न्यःशिशुं  सीतां रामं दीपैः सुभूषिताः।

जनक जी ने भी सीता राम जी का पूजन किया-
          सीतारामौ विदेहोपि पूजयामास विस्तरात्।

   इस प्रकार  श्री राम ने पति और पिता धर्म का निर्वाह किया और सीता जी का निर्वासन करके धोबी को खुश  करके राज धर्म का निर्वाह किया।
                   नीति   प्रीति  परमारथ  स्वारथ।
                   कोउ न राम सम जान जथारथ।।


अर्थात नीति और प्रीति के परि पालन में श्री राम की तुलना किसी और से की ही नहीं जा सकती।
नीति का पालन धोबी के साथ और प्रीति का पालन सीता के साथ दोनों ही धर्म सुंदरता पूर्वक श्री राम ने निर्वाह किए।ये सब शास्त्र प्रमाणित बातें हैं यहाँ  विस्तार भय से प्रमाण नहीं दिए गए हैं फिर भी प्रमाण के लिए हमारे यहाँ  संपर्क किया जा सकता है। 

 

 

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

सीता को निकालने की गलती भगवान राम से क्यों हुई ?

भगवती सीता पर शंका होने का सवाल ही नहीं उठता 

     यदि ऐसा हुआ होता तो कौन मानता प्रभु श्री राम को भगवान ?जो शत्रु के विरुद्ध नहीं हुए वो सीता के विरुद्ध कैसे हो सकते हैं ऐसी छिछली कल्पना ही क्यों ?मायके में रहने का विकल्प भी उनके पास था आखिर उनके पिता भी राजा थे!

      सीता  जी को अयोध्या से गए दो मास हो गए थे तब सीता ने शुभघड़ी में एक पुत्र को जन्म दिया।इसी समय श्री राम को यह समाचार दिया गया तो प्रसन्न श्रीराम जी लक्ष्मण जी के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर  रात्रि में ही बाल्मीकि जी के आश्रम पहुँचे और दोनों भाइयों ने उन्हें प्रणाम किया। बाल्मीकि जी ने जातक का नामकरण नान्दीमुख श्राद्ध आदि संस्कार कराया।सीता जी के समक्ष श्रीरामजी ने आनंदपूर्वक बेटे का मुख देखा और ब्राह्मणों को बहुत सारी दान दक्षिणा दी। खूब नाच गाने हुए पुष्प  वर्षा हुई बाजे बजाए गए।जनक जी ने अलग से बाजे वाले  बुलाकर बाजे बजवाए।

    भगवान श्री राम के चारु चरित्र पर अँगुली उठाकर श्री जेठमलानी जी ने असहनीय पीड़ा दी है।एक बार पता तो कर लिया होता कि सच क्या है।मान्यवर, आप उनके विषय में तो थोड़ा सोचते जिन्होंने श्री राम के पावन चरितामृत से प्रभावित होकर जंगलों में धूनी रमा रखी थी। आज भी सब साधु संत व्यापारी नहीं हैं चरित्रवान सदाचारी उन महापुरुषों   संतों के विषय में सोचा होता जो आज भी सनातन धर्म की धरोहर हैं।

     जिन्होंने रामचरित पर ही न केवल काशी  हिंदू विश्व विद्यालय से रिसर्च किया है अपितु बचपन से आज तक निरंतर इन्हीं शास्त्रों से संबंधित शोधकार्य  चला रखा है ऐसे हमारे जैसे उन सामान्य लोगों के विषय में भी सोचा होता जिन्होंने श्री राम के चारु चरणों में जीवन बिताने का महान व्रत लेकर अपने जीवन को कृतार्थ करने की लालषा लगा रखी है।आज क्या बीता होगा हमजैसों  पर ?
     मान्यवर, श्रीराम के जीवन के किसी चरित्र में कहीं कोई शंका लगती भी थी तो आधे अधूरे ज्ञान के बल पर ये बात मीडिया में नहीं उठाई जानी चाहिए थी अभी भी रामायण के विद्वान महापुरुष हैं उनसे शंका  समाधान किया जा सकता था। मान्यवर, आप विद्वान और ख्याति प्राप्त अधिवक्ता हैं।विधि के क्षेत्र में आपके बचन प्रमाण माने जाते हैं,किंतु हर विषय में ये हठ ठीक नहीं है ।इस बिषय का निर्णय रामायण के विद्वानों पर छोड़ देना चाहिए था।जो हमारी दृष्टि में आप से भूल हुई है।उमर के इस पड़ाव पर युवा पीढ़ी के लिए यह कपोल कल्पित अप्रमाणित अप्रिय संदेश ! आश्चर्य!!!

 
   श्री राम ने सीता को क्यों निकाला था?
    राजा के रूप में श्रीराम 

      1.श्री राम के राज्य में आम आदमी को यह हक था कि वह राज परिवार के विषय में अपनी बेबाक टिप्पणी न केवल कर सकता था अपितु उसकी न्यायोचित टिप्पणी को राज परिवार मानने के लिए विवश  होता था। टिप्पणी करने वाला आम आदमी है जो लंका में नहीं गया था वो कैसे और क्यों विश्वास कर ले कि माता सीता पवित्र हैं।आखिर वह राम राज्य का सजीव जागरूक और स्वाभिमानी नागरिक धोबी था। यदि आम आदमी अपनी पत्नी बच्चों की सुरक्षा को लेकर इतना जागरूक है तो इसमें बुरा क्या है? श्रीराम राजा हैं इसलिए प्रजारूप धोबी की बात का सम्मान करना उनका कर्तव्य  बन जाता है,क्योंकि राजा उन्हें प्रजा ने बनाया था परिवार ने नहीं। इसलिए उनके लिए प्रजा प्रथम थी परिवार बाद में। आज केवल एक धोबी कह रहा था कल सारा समाज कहता फिर क्या होता? इसलिए इस लिए इस विषय को यहीं रोक देने के लिए सीता को निकालना अपरिहार्य हो गया था।

      यदि यह सोचा जाए कि श्रीराम को भी साथ जाना चाहिए था।एक पति के रूप में तो यही उचित था किंतु राजकाज की जिम्मेदारी भी श्री राम की ही थी।अभी तक उनके कोई संतान नहीं थी।इसलिए सीता को अकेले भेजा था।         
 
पति के रूप में श्रीरामः-     सीता को निकालने के बाद श्रीराम ने समस्त सुख सुविधाओं का परित्याग कर दिया था जमीन में सोना आदि समस्त वैराग्य व्रत के लक्षण अपना लिए थे।

  यहॉं विशेष बात एक और कह देना चाहता हूँ कि इसकी प्रमाणित कथा क्या है।उसे एक बार पढ़ने से सारी शंकाएँ  स्वतः दूर हो जाएँगी।
     सीता निर्वासन की प्रमाणित कथा-

  गर्भिणी सीता से भगवान श्रीराम ने पूछा- देवी,  इस अवस्था में तुम्हारी भी कोई ईच्छा हो तो बताओ तो सीता जी ने कहा कि गंगा तट निवासी ऋषियों के आश्रमों बनों आदि के दर्शन की इच्छा है और कहा कि मुझे शीघ्र वहाँ भेज दीजिए।श्री राम ने कहा ठीक है कल वहाँ लक्ष्मण तुमको ले जाएँगे थोड़ी देर बाद बोले कि मैं भी कुछ जप तप करना चहता हूँ।तुम कुछ दिनों के लिए वहाँ चली  जाओ तो मैं भी कुछ भजन कर लूँगा।इस प्रकार श्रीराम और सीता ने प्रेमपूर्वक बातचीत की इसके बाद रामजी सो गए।सीता जी सोचने लगीं कि वहाँ पर मेरे माता पिता आदि परिवार के लोग विद्यमान हैं वहाँ कोई कष्ट तो होगा नहीं कल मैं अवश्य जाऊँगी।ऐसा सोच कर आनंदपूर्वक सो गईं।

     प्रातःकाल उठने के बाद स्नान किया भोजन बनाया श्रीराम ने भी स्नान किया सीता ने बड़े प्रेम से परोसकर भोजन कराया,तदनंतर स्वयं भोजन किया फिर उर्मिला आदि बहनों से पूछकर माताओं को प्रणाम करके सीता जी तैयार हो गईं।

     श्री राम जी की आज्ञा पाकर लक्ष्मण जी रथ ले आए, सीताजी  अपनी सखियों, दासियों और तुलसी वृक्ष के साथ सबसे बिदा लेकर रथ पर बैठ गईं।रथ गंगा तट की ओर चल पड़ा। बाल्मीकि आश्रम के समीप रथ रोककर लक्ष्मण जी ने एक पीपल वृक्ष के नीचे आसन बिछा दिया,तब सखियों के साथ सीता उस पर जा बैठीं।आँखों में आँसू भरकर लक्ष्मण जी कहने लगे माता!लोकापवाद के कारण भैया ने मुझे यहाँ भेजने की आज्ञा दी है इसमें मेरा कोई दोष नहीं है।अब आप यहॉं से ऋषि बाल्मीकि के आश्रम पर चली जाएँ ।चूँकि यह तो लक्ष्मण जी को भी पता होगा कि सीता जी का पूरा परिवार और माता पिता बाल्मीकि के आश्रम में ही रहते हैं।इसलिए वहॉं जाने के लिए कहा।इतना कह कर सीता जी की परिक्रमा करके प्रणाम किया।बिदा लेकर वहॉं से चले आए।

     उस समय दासियाँ सीता जी को पंखा झल रही थीं।उधर बाल्मीकि जी ने शिष्यों से यह वृत्तांत सुना तो जनक जी सुमेधा तथा कितनी ही स्त्रियों और ब्राह्मणों के साथ वहाँ जा  पहुँचे जहाँ सीता जी बैठी हुई थीं।वहाँ  पहुँचकर उन लोगों ने सीता जी की पूजा की फिर उन्हें सुंदर पालकी में बैठाया और आश्रम की ओर ले चले रास्ते में अनेक प्रकार के बाजे बजाए जा  रहे थे।नाच गाना इसी खुशी में रास्ते भर हो रहा था। भाटगण बिरुदावली गा रहे थे।आश्रम पर पहुँचते ही मुनि पत्नियों ने सहर्ष उन पर विविध प्रकार के पुष्प  बरसाए आरती उतारी गई और सोने के पलंग पर बैठाया गया । दिव्य अन्न और सुंदर सुंदर फल मूल देकर मुनि पत्नियों ने उन्हें प्रसन्न कर रखा था,क्योंकि बाल्मीकि जी के मुख से उनकी प्रशंसा सुन चुकी थीं।सीता जी का जब मन होता तब पालकी पर बैठकर बनों में घूमने जाया करती थीं।जो सुख सीता जी को अयोध्या में मिलता था वही यहाँ पर भी सुलभ था।

  यथा-       यथा पूर्वं तु साकेते सुखमाप विदेहजा।
               तथामुनेराश्रमेपि सुखमाप पतिव्रता।।
         
      इसप्रकार आनंदमय जीवन बिताते हुए सीता जी को दो मास हो गए तब सीता ने शुभघड़ी में एक पुत्र को जन्म दिया।इसी समय श्री राम को यह समाचार दिया गया तो प्रसन्न श्रीराम जी लक्ष्मण जी के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर  रात्रि में ही बाल्मीकि जी के आश्रम पहुँचे और दोनों भाइयों ने उन्हें प्रणाम किया। बाल्मीकि जी ने जातक का नामकरण नान्दीमुख श्राद्ध आदि संस्कार कराया।सीता जी के समक्ष श्रीरामजी ने आनंदपूर्वक बेटे का मुख देखा और ब्राह्मणों को बहुत सारी दान दक्षिणा दी। खूब नाच गाने हुए पुष्प  वर्षा हुई बाजे बजाए गए।जनक जी ने अलग से बाजे वाले  बुलाकर बाजे बजवाए।
    मुनि पत्नियों ने सुंदर थाल सजाकर सीताराम जी की तथा नवजात शिशु की आरती उतारी।मंगलगायन हुआ। 
 यथा-  ऋषि पत्न्यःशिशुं  सीतां रामं दीपैः सुभूषिताः।

जनक जी ने भी सीता राम जी का पूजन किया-
          सीतारामौ विदेहोपि पूजयामास विस्तरात्।

   इस प्रकार  श्री राम ने पति और पिता धर्म का निर्वाह किया और सीता जी का निर्वासन करके धोबी को खुश  करके राज धर्म का निर्वाह किया।
                   नीति   प्रीति  परमारथ  स्वारथ।
                   कोउ न राम सम जान जथारथ।।


अर्थात नीति और प्रीति के परि पालन में श्री राम की तुलना किसी और से की ही नहीं जा सकती।
नीति का पालन धोबी के साथ और प्रीति का पालन सीता के साथ दोनों ही धर्म सुंदरता पूर्वक श्री राम ने निर्वाह किए।ये सब शास्त्र प्रमाणित बातें हैं यहाँ  विस्तार भय से प्रमाण नहीं दिए गए हैं फिर भी प्रमाण के लिए हमारे यहाँ  संपर्क किया जा सकता है।

  राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

माता सीता का निष्कासन क्यों हुआ था ?

भगवती सीता पर शंका होने का सवाल ही नहीं उठता 

     यदि ऐसा हुआ होता तो कौन मानता प्रभु श्री राम को भगवान ?जो शत्रु के विरुद्ध नहीं हुए वो सीता के विरुद्ध कैसे हो सकते हैं ऐसी छिछली कल्पना ही क्यों ?मायके में रहने का विकल्प भी उनके पास था आखिर उनके पिता भी राजा थे!

      सीता  जी को अयोध्या से गए दो मास हो गए थे तब सीता ने शुभघड़ी में एक पुत्र को जन्म दिया।इसी समय श्री राम को यह समाचार दिया गया तो प्रसन्न श्रीराम जी लक्ष्मण जी के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर  रात्रि में ही बाल्मीकि जी के आश्रम पहुँचे और दोनों भाइयों ने उन्हें प्रणाम किया। बाल्मीकि जी ने जातक का नामकरण नान्दीमुख श्राद्ध आदि संस्कार कराया।सीता जी के समक्ष श्रीरामजी ने आनंदपूर्वक बेटे का मुख देखा और ब्राह्मणों को बहुत सारी दान दक्षिणा दी। खूब नाच गाने हुए पुष्प  वर्षा हुई बाजे बजाए गए।जनक जी ने अलग से बाजे वाले  बुलाकर बाजे बजवाए।

    भगवान श्री राम के चारु चरित्र पर अँगुली उठाकर श्री जेठमलानी जी ने असहनीय पीड़ा दी है।एक बार पता तो कर लिया होता कि सच क्या है।मान्यवर, आप उनके विषय में तो थोड़ा सोचते जिन्होंने श्री राम के पावन चरितामृत से प्रभावित होकर जंगलों में धूनी रमा रखी थी। आज भी सब साधु संत व्यापारी नहीं हैं चरित्रवान सदाचारी उन महापुरुषों   संतों के विषय में सोचा होता जो आज भी सनातन धर्म की धरोहर हैं।

     जिन्होंने रामचरित पर ही न केवल काशी  हिंदू विश्व विद्यालय से रिसर्च किया है अपितु बचपन से आज तक निरंतर इन्हीं शास्त्रों से संबंधित शोधकार्य  चला रखा है ऐसे हमारे जैसे उन सामान्य लोगों के विषय में भी सोचा होता जिन्होंने श्री राम के चारु चरणों में जीवन बिताने का महान व्रत लेकर अपने जीवन को कृतार्थ करने की लालषा लगा रखी है।आज क्या बीता होगा हमजैसों  पर ?
     मान्यवर, श्रीराम के जीवन के किसी चरित्र में कहीं कोई शंका लगती भी थी तो आधे अधूरे ज्ञान के बल पर ये बात मीडिया में नहीं उठाई जानी चाहिए थी अभी भी रामायण के विद्वान महापुरुष हैं उनसे शंका  समाधान किया जा सकता था। मान्यवर, आप विद्वान और ख्याति प्राप्त अधिवक्ता हैं।विधि के क्षेत्र में आपके बचन प्रमाण माने जाते हैं,किंतु हर विषय में ये हठ ठीक नहीं है ।इस बिषय का निर्णय रामायण के विद्वानों पर छोड़ देना चाहिए था।जो हमारी दृष्टि में आप से भूल हुई है।उमर के इस पड़ाव पर युवा पीढ़ी के लिए यह कपोल कल्पित अप्रमाणित अप्रिय संदेश ! आश्चर्य!!!

 
   श्री राम ने सीता को क्यों निकाला था?
    राजा के रूप में श्रीराम 

      1.श्री राम के राज्य में आम आदमी को यह हक था कि वह राज परिवार के विषय में अपनी बेबाक टिप्पणी न केवल कर सकता था अपितु उसकी न्यायोचित टिप्पणी को राज परिवार मानने के लिए विवश  होता था। टिप्पणी करने वाला आम आदमी है जो लंका में नहीं गया था वो कैसे और क्यों विश्वास कर ले कि माता सीता पवित्र हैं।आखिर वह राम राज्य का सजीव जागरूक और स्वाभिमानी नागरिक धोबी था। यदि आम आदमी अपनी पत्नी बच्चों की सुरक्षा को लेकर इतना जागरूक है तो इसमें बुरा क्या है? श्रीराम राजा हैं इसलिए प्रजारूप धोबी की बात का सम्मान करना उनका कर्तव्य  बन जाता है,क्योंकि राजा उन्हें प्रजा ने बनाया था परिवार ने नहीं। इसलिए उनके लिए प्रजा प्रथम थी परिवार बाद में। आज केवल एक धोबी कह रहा था कल सारा समाज कहता फिर क्या होता? इसलिए इस लिए इस विषय को यहीं रोक देने के लिए सीता को निकालना अपरिहार्य हो गया था।

      यदि यह सोचा जाए कि श्रीराम को भी साथ जाना चाहिए था।एक पति के रूप में तो यही उचित था किंतु राजकाज की जिम्मेदारी भी श्री राम की ही थी।अभी तक उनके कोई संतान नहीं थी।इसलिए सीता को अकेले भेजा था।         
 
पति के रूप में श्रीरामः-     सीता को निकालने के बाद श्रीराम ने समस्त सुख सुविधाओं का परित्याग कर दिया था जमीन में सोना आदि समस्त वैराग्य व्रत के लक्षण अपना लिए थे।

  यहॉं विशेष बात एक और कह देना चाहता हूँ कि इसकी प्रमाणित कथा क्या है।उसे एक बार पढ़ने से सारी शंकाएँ  स्वतः दूर हो जाएँगी।
     सीता निर्वासन की प्रमाणित कथा-

  गर्भिणी सीता से भगवान श्रीराम ने पूछा- देवी,  इस अवस्था में तुम्हारी भी कोई ईच्छा हो तो बताओ तो सीता जी ने कहा कि गंगा तट निवासी ऋषियों के आश्रमों बनों आदि के दर्शन की इच्छा है और कहा कि मुझे शीघ्र वहाँ भेज दीजिए।श्री राम ने कहा ठीक है कल वहाँ लक्ष्मण तुमको ले जाएँगे थोड़ी देर बाद बोले कि मैं भी कुछ जप तप करना चहता हूँ।तुम कुछ दिनों के लिए वहाँ चली  जाओ तो मैं भी कुछ भजन कर लूँगा।इस प्रकार श्रीराम और सीता ने प्रेमपूर्वक बातचीत की इसके बाद रामजी सो गए।सीता जी सोचने लगीं कि वहाँ पर मेरे माता पिता आदि परिवार के लोग विद्यमान हैं वहाँ कोई कष्ट तो होगा नहीं कल मैं अवश्य जाऊँगी।ऐसा सोच कर आनंदपूर्वक सो गईं।

     प्रातःकाल उठने के बाद स्नान किया भोजन बनाया श्रीराम ने भी स्नान किया सीता ने बड़े प्रेम से परोसकर भोजन कराया,तदनंतर स्वयं भोजन किया फिर उर्मिला आदि बहनों से पूछकर माताओं को प्रणाम करके सीता जी तैयार हो गईं।

     श्री राम जी की आज्ञा पाकर लक्ष्मण जी रथ ले आए, सीताजी  अपनी सखियों, दासियों और तुलसी वृक्ष के साथ सबसे बिदा लेकर रथ पर बैठ गईं।रथ गंगा तट की ओर चल पड़ा। बाल्मीकि आश्रम के समीप रथ रोककर लक्ष्मण जी ने एक पीपल वृक्ष के नीचे आसन बिछा दिया,तब सखियों के साथ सीता उस पर जा बैठीं।आँखों में आँसू भरकर लक्ष्मण जी कहने लगे माता!लोकापवाद के कारण भैया ने मुझे यहाँ भेजने की आज्ञा दी है इसमें मेरा कोई दोष नहीं है।अब आप यहॉं से ऋषि बाल्मीकि के आश्रम पर चली जाएँ ।चूँकि यह तो लक्ष्मण जी को भी पता होगा कि सीता जी का पूरा परिवार और माता पिता बाल्मीकि के आश्रम में ही रहते हैं।इसलिए वहॉं जाने के लिए कहा।इतना कह कर सीता जी की परिक्रमा करके प्रणाम किया।बिदा लेकर वहॉं से चले आए।

     उस समय दासियाँ सीता जी को पंखा झल रही थीं।उधर बाल्मीकि जी ने शिष्यों से यह वृत्तांत सुना तो जनक जी सुमेधा तथा कितनी ही स्त्रियों और ब्राह्मणों के साथ वहाँ जा  पहुँचे जहाँ सीता जी बैठी हुई थीं।वहाँ  पहुँचकर उन लोगों ने सीता जी की पूजा की फिर उन्हें सुंदर पालकी में बैठाया और आश्रम की ओर ले चले रास्ते में अनेक प्रकार के बाजे बजाए जा  रहे थे।नाच गाना इसी खुशी में रास्ते भर हो रहा था। भाटगण बिरुदावली गा रहे थे।आश्रम पर पहुँचते ही मुनि पत्नियों ने सहर्ष उन पर विविध प्रकार के पुष्प  बरसाए आरती उतारी गई और सोने के पलंग पर बैठाया गया । दिव्य अन्न और सुंदर सुंदर फल मूल देकर मुनि पत्नियों ने उन्हें प्रसन्न कर रखा था,क्योंकि बाल्मीकि जी के मुख से उनकी प्रशंसा सुन चुकी थीं।सीता जी का जब मन होता तब पालकी पर बैठकर बनों में घूमने जाया करती थीं।जो सुख सीता जी को अयोध्या में मिलता था वही यहाँ पर भी सुलभ था।

  यथा-       यथा पूर्वं तु साकेते सुखमाप विदेहजा।
               तथामुनेराश्रमेपि सुखमाप पतिव्रता।।
         
      इसप्रकार आनंदमय जीवन बिताते हुए सीता जी को दो मास हो गए तब सीता ने शुभघड़ी में एक पुत्र को जन्म दिया।इसी समय श्री राम को यह समाचार दिया गया तो प्रसन्न श्रीराम जी लक्ष्मण जी के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर  रात्रि में ही बाल्मीकि जी के आश्रम पहुँचे और दोनों भाइयों ने उन्हें प्रणाम किया। बाल्मीकि जी ने जातक का नामकरण नान्दीमुख श्राद्ध आदि संस्कार कराया।सीता जी के समक्ष श्रीरामजी ने आनंदपूर्वक बेटे का मुख देखा और ब्राह्मणों को बहुत सारी दान दक्षिणा दी। खूब नाच गाने हुए पुष्प  वर्षा हुई बाजे बजाए गए।जनक जी ने अलग से बाजे वाले  बुलाकर बाजे बजवाए।
    मुनि पत्नियों ने सुंदर थाल सजाकर सीताराम जी की तथा नवजात शिशु की आरती उतारी।मंगलगायन हुआ। 
 यथा-  ऋषि पत्न्यःशिशुं  सीतां रामं दीपैः सुभूषिताः।

जनक जी ने भी सीता राम जी का पूजन किया-
          सीतारामौ विदेहोपि पूजयामास विस्तरात्।

   इस प्रकार  श्री राम ने पति और पिता धर्म का निर्वाह किया और सीता जी का निर्वासन करके धोबी को खुश  करके राज धर्म का निर्वाह किया।
                   नीति   प्रीति  परमारथ  स्वारथ।
                   कोउ न राम सम जान जथारथ।।


अर्थात नीति और प्रीति के परि पालन में श्री राम की तुलना किसी और से की ही नहीं जा सकती।
नीति का पालन धोबी के साथ और प्रीति का पालन सीता के साथ दोनों ही धर्म सुंदरता पूर्वक श्री राम ने निर्वाह किए।ये सब शास्त्र प्रमाणित बातें हैं यहाँ  विस्तार भय से प्रमाण नहीं दिए गए हैं फिर भी प्रमाण के लिए हमारे यहाँ  संपर्क किया जा सकता है। 

 

 

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

माता सीता का निष्कासन कितना उचित था ?

भगवती सीता पर शंका होने का सवाल ही नहीं उठता 

     यदि ऐसा हुआ होता तो कौन मानता प्रभु श्री राम को भगवान ?जो शत्रु के विरुद्ध नहीं हुए वो सीता के विरुद्ध कैसे हो सकते हैं ऐसी छिछली कल्पना ही क्यों ?मायके में रहने का विकल्प भी उनके पास था आखिर उनके पिता भी राजा थे!

      सीता  जी को अयोध्या से गए दो मास हो गए थे तब सीता ने शुभघड़ी में एक पुत्र को जन्म दिया।इसी समय श्री राम को यह समाचार दिया गया तो प्रसन्न श्रीराम जी लक्ष्मण जी के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर  रात्रि में ही बाल्मीकि जी के आश्रम पहुँचे और दोनों भाइयों ने उन्हें प्रणाम किया। बाल्मीकि जी ने जातक का नामकरण नान्दीमुख श्राद्ध आदि संस्कार कराया।सीता जी के समक्ष श्रीरामजी ने आनंदपूर्वक बेटे का मुख देखा और ब्राह्मणों को बहुत सारी दान दक्षिणा दी। खूब नाच गाने हुए पुष्प  वर्षा हुई बाजे बजाए गए।जनक जी ने अलग से बाजे वाले  बुलाकर बाजे बजवाए।

    भगवान श्री राम के चारु चरित्र पर अँगुली उठाकर श्री जेठमलानी जी ने असहनीय पीड़ा दी है।एक बार पता तो कर लिया होता कि सच क्या है।मान्यवर, आप उनके विषय में तो थोड़ा सोचते जिन्होंने श्री राम के पावन चरितामृत से प्रभावित होकर जंगलों में धूनी रमा रखी थी। आज भी सब साधु संत व्यापारी नहीं हैं चरित्रवान सदाचारी उन महापुरुषों   संतों के विषय में सोचा होता जो आज भी सनातन धर्म की धरोहर हैं।

     जिन्होंने रामचरित पर ही न केवल काशी  हिंदू विश्व विद्यालय से रिसर्च किया है अपितु बचपन से आज तक निरंतर इन्हीं शास्त्रों से संबंधित शोधकार्य  चला रखा है ऐसे हमारे जैसे उन सामान्य लोगों के विषय में भी सोचा होता जिन्होंने श्री राम के चारु चरणों में जीवन बिताने का महान व्रत लेकर अपने जीवन को कृतार्थ करने की लालषा लगा रखी है।आज क्या बीता होगा हमजैसों  पर ?
     मान्यवर, श्रीराम के जीवन के किसी चरित्र में कहीं कोई शंका लगती भी थी तो आधे अधूरे ज्ञान के बल पर ये बात मीडिया में नहीं उठाई जानी चाहिए थी अभी भी रामायण के विद्वान महापुरुष हैं उनसे शंका  समाधान किया जा सकता था। मान्यवर, आप विद्वान और ख्याति प्राप्त अधिवक्ता हैं।विधि के क्षेत्र में आपके बचन प्रमाण माने जाते हैं,किंतु हर विषय में ये हठ ठीक नहीं है ।इस बिषय का निर्णय रामायण के विद्वानों पर छोड़ देना चाहिए था।जो हमारी दृष्टि में आप से भूल हुई है।उमर के इस पड़ाव पर युवा पीढ़ी के लिए यह कपोल कल्पित अप्रमाणित अप्रिय संदेश ! आश्चर्य!!!

 
   श्री राम ने सीता को क्यों निकाला था?
    राजा के रूप में श्रीराम 

      1.श्री राम के राज्य में आम आदमी को यह हक था कि वह राज परिवार के विषय में अपनी बेबाक टिप्पणी न केवल कर सकता था अपितु उसकी न्यायोचित टिप्पणी को राज परिवार मानने के लिए विवश  होता था। टिप्पणी करने वाला आम आदमी है जो लंका में नहीं गया था वो कैसे और क्यों विश्वास कर ले कि माता सीता पवित्र हैं।आखिर वह राम राज्य का सजीव जागरूक और स्वाभिमानी नागरिक धोबी था। यदि आम आदमी अपनी पत्नी बच्चों की सुरक्षा को लेकर इतना जागरूक है तो इसमें बुरा क्या है? श्रीराम राजा हैं इसलिए प्रजारूप धोबी की बात का सम्मान करना उनका कर्तव्य  बन जाता है,क्योंकि राजा उन्हें प्रजा ने बनाया था परिवार ने नहीं। इसलिए उनके लिए प्रजा प्रथम थी परिवार बाद में। आज केवल एक धोबी कह रहा था कल सारा समाज कहता फिर क्या होता? इसलिए इस लिए इस विषय को यहीं रोक देने के लिए सीता को निकालना अपरिहार्य हो गया था।

      यदि यह सोचा जाए कि श्रीराम को भी साथ जाना चाहिए था।एक पति के रूप में तो यही उचित था किंतु राजकाज की जिम्मेदारी भी श्री राम की ही थी।अभी तक उनके कोई संतान नहीं थी।इसलिए सीता को अकेले भेजा था।         
 
पति के रूप में श्रीरामः-     सीता को निकालने के बाद श्रीराम ने समस्त सुख सुविधाओं का परित्याग कर दिया था जमीन में सोना आदि समस्त वैराग्य व्रत के लक्षण अपना लिए थे।

  यहॉं विशेष बात एक और कह देना चाहता हूँ कि इसकी प्रमाणित कथा क्या है।उसे एक बार पढ़ने से सारी शंकाएँ  स्वतः दूर हो जाएँगी।
     सीता निर्वासन की प्रमाणित कथा-

  गर्भिणी सीता से भगवान श्रीराम ने पूछा- देवी,  इस अवस्था में तुम्हारी भी कोई ईच्छा हो तो बताओ तो सीता जी ने कहा कि गंगा तट निवासी ऋषियों के आश्रमों बनों आदि के दर्शन की इच्छा है और कहा कि मुझे शीघ्र वहाँ भेज दीजिए।श्री राम ने कहा ठीक है कल वहाँ लक्ष्मण तुमको ले जाएँगे थोड़ी देर बाद बोले कि मैं भी कुछ जप तप करना चहता हूँ।तुम कुछ दिनों के लिए वहाँ चली  जाओ तो मैं भी कुछ भजन कर लूँगा।इस प्रकार श्रीराम और सीता ने प्रेमपूर्वक बातचीत की इसके बाद रामजी सो गए।सीता जी सोचने लगीं कि वहाँ पर मेरे माता पिता आदि परिवार के लोग विद्यमान हैं वहाँ कोई कष्ट तो होगा नहीं कल मैं अवश्य जाऊँगी।ऐसा सोच कर आनंदपूर्वक सो गईं।

     प्रातःकाल उठने के बाद स्नान किया भोजन बनाया श्रीराम ने भी स्नान किया सीता ने बड़े प्रेम से परोसकर भोजन कराया,तदनंतर स्वयं भोजन किया फिर उर्मिला आदि बहनों से पूछकर माताओं को प्रणाम करके सीता जी तैयार हो गईं।

     श्री राम जी की आज्ञा पाकर लक्ष्मण जी रथ ले आए, सीताजी  अपनी सखियों, दासियों और तुलसी वृक्ष के साथ सबसे बिदा लेकर रथ पर बैठ गईं।रथ गंगा तट की ओर चल पड़ा। बाल्मीकि आश्रम के समीप रथ रोककर लक्ष्मण जी ने एक पीपल वृक्ष के नीचे आसन बिछा दिया,तब सखियों के साथ सीता उस पर जा बैठीं।आँखों में आँसू भरकर लक्ष्मण जी कहने लगे माता!लोकापवाद के कारण भैया ने मुझे यहाँ भेजने की आज्ञा दी है इसमें मेरा कोई दोष नहीं है।अब आप यहॉं से ऋषि बाल्मीकि के आश्रम पर चली जाएँ ।चूँकि यह तो लक्ष्मण जी को भी पता होगा कि सीता जी का पूरा परिवार और माता पिता बाल्मीकि के आश्रम में ही रहते हैं।इसलिए वहॉं जाने के लिए कहा।इतना कह कर सीता जी की परिक्रमा करके प्रणाम किया।बिदा लेकर वहॉं से चले आए।

     उस समय दासियाँ सीता जी को पंखा झल रही थीं।उधर बाल्मीकि जी ने शिष्यों से यह वृत्तांत सुना तो जनक जी सुमेधा तथा कितनी ही स्त्रियों और ब्राह्मणों के साथ वहाँ जा  पहुँचे जहाँ सीता जी बैठी हुई थीं।वहाँ  पहुँचकर उन लोगों ने सीता जी की पूजा की फिर उन्हें सुंदर पालकी में बैठाया और आश्रम की ओर ले चले रास्ते में अनेक प्रकार के बाजे बजाए जा  रहे थे।नाच गाना इसी खुशी में रास्ते भर हो रहा था। भाटगण बिरुदावली गा रहे थे।आश्रम पर पहुँचते ही मुनि पत्नियों ने सहर्ष उन पर विविध प्रकार के पुष्प  बरसाए आरती उतारी गई और सोने के पलंग पर बैठाया गया । दिव्य अन्न और सुंदर सुंदर फल मूल देकर मुनि पत्नियों ने उन्हें प्रसन्न कर रखा था,क्योंकि बाल्मीकि जी के मुख से उनकी प्रशंसा सुन चुकी थीं।सीता जी का जब मन होता तब पालकी पर बैठकर बनों में घूमने जाया करती थीं।जो सुख सीता जी को अयोध्या में मिलता था वही यहाँ पर भी सुलभ था।

  यथा-       यथा पूर्वं तु साकेते सुखमाप विदेहजा।
               तथामुनेराश्रमेपि सुखमाप पतिव्रता।।
         
      इसप्रकार आनंदमय जीवन बिताते हुए सीता जी को दो मास हो गए तब सीता ने शुभघड़ी में एक पुत्र को जन्म दिया।इसी समय श्री राम को यह समाचार दिया गया तो प्रसन्न श्रीराम जी लक्ष्मण जी के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर  रात्रि में ही बाल्मीकि जी के आश्रम पहुँचे और दोनों भाइयों ने उन्हें प्रणाम किया। बाल्मीकि जी ने जातक का नामकरण नान्दीमुख श्राद्ध आदि संस्कार कराया।सीता जी के समक्ष श्रीरामजी ने आनंदपूर्वक बेटे का मुख देखा और ब्राह्मणों को बहुत सारी दान दक्षिणा दी। खूब नाच गाने हुए पुष्प  वर्षा हुई बाजे बजाए गए।जनक जी ने अलग से बाजे वाले  बुलाकर बाजे बजवाए।
    मुनि पत्नियों ने सुंदर थाल सजाकर सीताराम जी की तथा नवजात शिशु की आरती उतारी।मंगलगायन हुआ। 
 यथा-  ऋषि पत्न्यःशिशुं  सीतां रामं दीपैः सुभूषिताः।

जनक जी ने भी सीता राम जी का पूजन किया-
          सीतारामौ विदेहोपि पूजयामास विस्तरात्।

   इस प्रकार  श्री राम ने पति और पिता धर्म का निर्वाह किया और सीता जी का निर्वासन करके धोबी को खुश  करके राज धर्म का निर्वाह किया।
                   नीति   प्रीति  परमारथ  स्वारथ।
                   कोउ न राम सम जान जथारथ।।


अर्थात नीति और प्रीति के परि पालन में श्री राम की तुलना किसी और से की ही नहीं जा सकती।
नीति का पालन धोबी के साथ और प्रीति का पालन सीता के साथ दोनों ही धर्म सुंदरता पूर्वक श्री राम ने निर्वाह किए।ये सब शास्त्र प्रमाणित बातें हैं यहाँ  विस्तार भय से प्रमाण नहीं दिए गए हैं फिर भी प्रमाण के लिए हमारे यहाँ  संपर्क किया जा सकता है। 

 

 

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

Tuesday, May 28, 2013

Articals Of Dr. Vajpayee

 गुग्गल पर उपलब्ध डॉ. एस. एन. वाजपेयी  द्वारा विभिन्न विषयों पर लिखे गए लेखों की सूची




  • अपने दुःख दर्द एवं विकास के  लिए हमें खुद जूझना होगा !








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        Lal Kitab Nahin Hai Jyotish Shastra Se Sambadhit
     गो दान तक को रोका गया है और कुत्ता पालना सिखाया गया है  
शिक्षित ईमानदार एवं चरित्रवान लोग ही दूर कर सकते हैं भ्रष्टाचार ! आखिर    क्या    कमी   है हम   में !
शिक्षित ईमानदार एवं चरित्रवान लोग ही दूर कर सकते हैं भ्रष्टाचार !
आखिर    क्या    कमी   है हम   में !
क्या ईमानदार लोगों के लिए राजनीति नहीं है
वाजपेयी के जन्म दिवस पर वाजपेयी की शुभ कामनाएँ 
गॉंधी जी के तीन बंदर और भ्रष्टाचार।