Tuesday, March 28, 2017

शिक्षा व्यवस्था के साथ गद्दारी करने वालों को सैलरी दी जाती है देशवासियों के खून पसीने की कमाई से !

       नक़ल करवाने में लगी है जो सरकारी मशीनरी   उन पर भी सैलरी उड़ेल रही है सरकार बारी उदारता !एक ओर गरीबों ग्रामीणों मजदूरों किसानों का संघर्ष पूर्ण मुसीबतों भरा जीवन तो दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था के  साथ गद्दारी करने वाले नक़ल करवाने वालों का सुख सुविधापूर्ण जीवन ! सच कहें तो शिक्षा कर्म से जुड़े अधिकारियों कर्मचारियों की घिनौनी करतूतें देखकर अब तो शिक्षा व्यवस्था से ही घृणा होने लगी है अब तो किसी को बताने में भी शर्म  लगने लगी है कि मैंने भी चार विषय से MA किया है !आप स्वयं देखिए -see more.... http://aajtak.intoday.in/karyakram/video/special-report-24th-march-over-ayodhya-and-ram-mandir-1-919535.html

    नक़ल रोकने के लिए जिम्मेदार लोगों ने पूरी ताकत झोंक रखी है नक़ल करवाने में !बारे सरकारी काम काज की शैली !इतनी गद्दारी करते हैं सरकार के अपने लोग इसके बाद भी सरकार उन्हें देती है सैलरी ये सरकार के हिम्मत की बात है किंतु सैलरी जनता की कमाई से देनी होती है इसमें सरकारों का मोह कैसा !
        काम करने के नाम पर गद्दारी करने की सैलरी उठा रहे हैं बहुत लोग !सरकार ख़ुशी ख़ुशी देती जा रही है उन्हें भारी भरकम सैलरी !जितनी सैलरी में आम मार्केट में तीन से चार शिक्षक मिल जाएँ वो भी पढ़े लिखे परिश्रम करने वाले ईमानदार लोग किंतु उतनी सैलरी सरकार अपने एक एक शिक्षक को देती है फिर भी वे लोग यदि शिक्षा व्यवस्था के साथ गद्दारी कामचोरी मक्कारी बेईमानी आदि करने लगें तो दोष सरकार का नहीं तो किसका है !
      सरकारी कर्मचारियों से काम लेना जब सरकार के बश का है ही नहीं और न ले पा रही है फिर उन्हें क्यों दे रही है सैलरी और जनता से क्यों लेती है टैक्स !भ्रष्टाचार मुक्त ईमानदार सेवाएँ उपलब्ध करवाना सरकार की जिम्मेदारी है !इसमें सरकारी कर्मचारी यदि सरकार का साथ नहीं देते हैं तो ये समस्या सरकार के अपने परिवार की है किन्तु सरकार यदि जनता से टैक्स लेती है तो सरकार की सेवाओं के प्रति दिनोंदिन मरते जा रहे जनता के विश्वास को जिन्दा करना सरकार का धर्म है और स्वधर्म का पालन करे सरकार !
    शिक्षाअधिकारी प्रेंसिपल शिक्षक और पुलिस विभाग से संबंधित जो लोग गद्दारी कर रहे हैं छात्रों के भविष्य के साथ उनसे शक्तिपूर्वक निपटे सरकार !सरकारों के भ्रष्टाचार की पोल न खोल दें केवल इसलिए सैलरी लुटाई जा रही है उन्हें !सरकार आगे से आगे बढ़ाती जाती है उनकी भी सैलरी ! उन्हें भी न केवल सारी सुविधाएँ दी जाती हैं अपितु छींकने खाँसने नहाने धोने आदि हर काम की छुट्टी भी देती है सरकार !
    इसमें सरकार के पिता जी का जाता क्या है सैलरी तो जनता की जेब से जाती है वाहा वाही सरकार की होती है छुट्टियों पर छुट्टियाँ घोषित करना कामचोरी को प्रोत्साहित करना नहीं तो क्या है ?
     इन्हें सैलरी नक़ल कराने के लिए दी जाती है क्या ?
      शिक्षक ,प्रेंसिपल और शिक्षाअधिकारी हों या पुलिस विभाग !बच्चों के भविष्य के साथ गद्दारी कर रही है भ्रष्ट सरकारी मशीनरी ! ऐसे लोगों को भी सरकार न केवल सैलरी आदि सारी सुविधाएँ देती जा रही है अपितु इन भ्रष्टाचारियों की भी सैलरी बढ़ाती जा रही है!ये सैलरी देश वासियों के खून पसीने की गाढ़ी कमाई से प्राप्त टैक्स से देती है सरकार !ये नहीं भूला जाना चाहिए । 
        गरीबों ग्रामीणों मजदूरों किसानों की ओर देखो दिन रात शर्दी गर्मी हमेंशा कर्तव्य पालन में लगे रहते हैं कितना संघर्ष पूर्ण मुसीबत की जिंदगी जीते हैं वे लोग !इनमें बहुत बड़ा वर्ग अच्छे खासे पढ़े लिखे लोगों का है जिनके पास घूस देने के पैसे नहीं थे सोर्स लगाने के लिए दलाल नहीं थे इसलिए उनकी सरकारी नौकरी नहीं लग पाई वे भी बेचारे पढ़े लिखे होनहार लोग आज मेहनत मजदूरी करके अपना जीवन यापन करने पर मजबूर हैं !दूसरी ओर सरकारें सरकारी विभागों में बैठे गद्दारों मक्कारों कामचोरों बेईमानों को भी सैलरी बाँटे जा रही हैं जो सरकार से भारी भरकम सैलरी लेकर भी अपराधियों और शिक्षा माफियाओं का साथ देते देखे जाते हैं शिक्षा से जुड़े लोग शिक्षा विभाग चौपट करने पर लगे हुए हैं चिकित्सा से जुड़े लोग चिकित्सा विभाग चौपट कर रहे हैं किंतु इन विभागों से जुड़े अधिकारियों के चेहरों पर जिम्मेदारियों का जरा सा एहसास नहीं दिखाई देता है और न ही उनकी कोई भूमिका ही समझ में आती है सरकारी विभागों में एक एकांत कमरा रूपी कोप भवन बना दिया जाता है जहाँ वातानुकीलित वातावरण में समय पास किया करता है भूमिका विहीन ये वर्ग !
      किसान भी अपने खेतों की ओर चक्कर मारने जाते हैं किंतु अधिकारी आफिसों में आराम करते हैं उन्हें उनके विभाग की लापरवाहियाँ मीडिया वाले बताते हैं तब वो बड़े आराम से कह रहे होते हैं मैंने जाँच के आदेश दे दिए हैं रिपोर्ट मँगवाई है दोषियों पर कठोर कार्यवाही होगी किंतु सोचने वाली बात है कि जिनका अधिकारी इतना आलसी हो उसके कर्मचारी कितने सक्रिय और ईमानदार होंगे कल्पना की जा सकती है ! जाँच करने वालों में भी सम्मिलित लोग वे ही होते हैं जो वहाँ उन शिक्षा माफियाओं की मदद कर रहे होते हैं ऐसी परिस्थिति में रिपोर्टें बिलकुल ओके आती हैं न कोई अपराध और न कोई अपराधी !कैमरे झूठ वीडियो गलत !सबजगह रामराज्य !
    खेती के मामलों में भ्रष्टाचार करने वाले लेखपाल से ही उसी से संबंधित भ्रष्टाचार के मामले की मँगवाई जाती है जाँच रिपोर्ट !सरकार के हर विभाग का यही हाल है !सरकारी विभागों का शोषितों पीड़ितों के साथ जाँच नाम का ये इतना भद्दा मजाक है जैसा छोटे छोटे बच्चे अपनी हँसी मजाक के खेलों में भी नहीं खेलते हैं ।इसीलिए सरकारी कामकाज की शैली से उठता जा रहा है जनता का विश्वास ! 
          शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े ईमानदार लोगों का सर शर्म से झुक जाता होगा जब वे देखते होंगे नक़ल करवाने वाले शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों की ऐसी कुकार्यशैली उनकी पीड़ा का एहसास हमें है उनसे क्षमा याचना के साथ मुझे कठोर शब्दों का प्रयोग करना पड़ रहा है !




Monday, March 27, 2017

भष्टाचार का पैसा ऊपर तक जाता है ! सरकार कहती है कि घट गया है भ्रष्टाचार !बारी सरकार !!

     भ्रष्टाचार का पैसा जब अपने को भी मिलने लगता है तब तो सरकारों में सम्मिलित नेता लोग भी कहने लगते हैं कि अब कहाँ है भ्रष्टाचार !किंतु जब तक अपने को नहीं मिलता था और दूसरे खाए जा रहे होते हैं तब तक भ्रष्टाचार का नाम ले लेकर मचाते रहते हैं ईमानदारी का हाहाकार !उन्हें देखकर लगता है कि इन भर कोई ईमानदार नहीं है !अपनी और अपने लोगों की इन्हीं कमजोरियों के कारण आज भ्रष्टाचार पर कार्यवाही करना तो दूर कम्प्लेन का जवाब देना तक जरूरी नहीं समझती है सरकार !उसे पता होता है कि इसमें अपने लोग ही फँसेंगे !   
घूसलेने का नशा -    
     घूसलेने की इच्छा सबसे भयंकर नशा है घूस खोरी से जब तक जो दूर रहता है तभी तक उसे ये बुरी लगती है किंतु जो लेने लगता है वो तो लती हो जाता है उसके तो हाथ ही नहीं चलते हैं बिना घूस लिए !
      EDMC में भ्रष्टाचार के कारण ही बिना सैलरी लिए भी अपनी सेवाएँ देने को तैयार बैठे हैं बहुत से लोग !एक बार विज्ञापन देकर तो देखे सरकार !बारे भ्रष्टाचार !!
    लोग तैयार भी क्यों न हों आखिर निगमों में काली कमाई की तो रौनक सी लगी ही रहती है निगम वालों के काले कारनामों के कारण  ही अक्सर  घाटे में ही चला करते हैं निगम !निगमों के अधिकारी कर्मचारी लोग पहले तो बहुत सारे कामों को अवैध घोषित कर देते हैं इससे उन कामों का पैसा लेने का निगम का हक़ ही ख़त्म हो जाता है किंतु अपने कहे हुए अवैध कार्यों को करने से ये मना किसी को नहीं करते अपितु उन अपने घोषित किए हुए अवैध कार्यों के बदले अवैध काम करने वालों से करते रहते हैं वसूली और आपस में छोटे से लेकर बड़े तक मिल बाँटकर खा जाते हैं धन और निगम को दिखा देते हैं ठेंगा !ऊपर से कहते हैं निगम घाटे में चल रहा है । अरे !किसी खेत को जब मेड़ ही खाने लगे तो उसका भला भगवान् भी नहीं कर सकते हैं । 
     नियमानुसार तो अवैध काम रोके जाने चाहिए और वैध काम होने देने चाहिए यही निगम कर्मचारियों का कर्तव्य माना जाता है और संभवतः यही करने के लिए सरकार ने उनको नौकरी पर रखा है पद दे रखे हैं और सैलरी देती है और यदि वे ऐसा नहीं करते तो सरकार उन्हें ढोए क्यों जा रही है और क्यों दिए जा रही है सैलरी !किंतु इनकी काली कमाई चूँकि ऊपर तक जाती है इसलिए सरकार उनसे पूछे क्यों और किस मुख से ?ये काली कमाई का ही कमाल है !
     निगम की घूसखोरी के कारण जनता आपस में लड़ती रहती है !निगमों के अधिकारी कर्मचारी भ्रष्टाचार के कारण खुद तो कमाई करते रहते हैं और जनता को लड़ाया करते हैं !ये कानून हैं या मजाक !!
   EDMC जिस काम को अवैध घोषित कर चुकी होती है !नियमानुसार चलने वाले कुछ लोग तो EDMCकी ऐसी शाकाहारी बातों पर भरोसा कर लेते हैं जो उनकी हरकतों से परिचित नहीं हैं बाकी आजकल सभी लोग समझने लगे हैं कि EDMC का लालच नहीं होगा तो वो गलत काम होने क्यों देगी गलत कामों को रोकना उनका दायित्व है किन्तु यदि वे रोक नहीं रहे हैं तो इसमें उनका घूस प्रेम नहीं तो फिर मक्कारी कामचोरी कही जाए क्या ?  
   EDMC घूस लेकर उन्हीं लोगों के उन्हीं कार्यों को करने की अघोषित अनुमति दे देती है जो पहले अवैध घोषित कर चुकी होती है !उधर अवैध कार्यों के विरुद्ध शिकायत करने वालों की तरफ से उन्हीं अवैध काम वालों को नोटिश दे देती है और उनसे कह देती है कि तुम कोर्ट में जाकर स्टे ले लो !वो स्टे ले लेते हैं इसके बाद वो अवैध काम करने वाला व्यक्ति अवैध होते हुए भी EDMC की कृपा से चारों ओर से सुरक्षित हो जाता है। कोर्ट के स्टे  का नाम सुनते ही हर विभाग उससे डरने लगता है । 
    अब वह अवैध कार्य शिकारी की मुट्ठी में बंद चिड़िया की जिंदगी की तरह होता है वो चाहे तो मार दे या छोड़ दे उसकी मर्जी !ठीक इसी प्रकार से जेई और ल अफसरों के रहमों करम पर टिका होता है वो अवैधकाम !जब तक उनको अवैध काम करने वाले पैसे देते जाते हैं तब तक वे लोग लंबी लंबी तारीखें लेते जाते हैं और बढ़वाते जाते हैं स्टे !और जिस दिन उसने पैसे देने बंद किए उसी दिन ये निगमों के ड्रामेबाज लोग बुलडोजर वगैरह लेकर पहुँच जाते  हैं और करने लगते हैं नंगा नाच !पैसा मिलता रहे तो EDMC के अपने  नियमों के अनुशार वो अवैध काम भी वैध काम की अपेक्षा ज्यादा मजबूत हो जाता है और EDMC को ठेंगा दिखा देते हैं ! जनता तंग होती रहती है किंतु EDMC के भूत प्रेत अपनी जेबें भरा करते हैं !पूछो तो कहते हैं कि ये तो ऊपर तक जाता है ऊपर वाले जब भाषण देते हैं तो साक्षात धर्मराज लगते हैं जनता वहाँ जाकर उनसे पूछ सकती नहीं है कि भाई EDMC के गलत कार्यों का पैसा आप तक पहुंचता है या नहीं !
   EDMC के कर्मचारियों की काली  कमाई से प्रभावित होकर सैकड़ों लोग बिना सैलरी लिए भी EDMC के अधिकारी कर्मचारियों के रूप में अपनी सेवाएँ देने के लिए तैयार बैठे हैं सरकार  एक बार वैकेंसी निकाल के तो देखे !
EDMC के चुनाव !
  EDMC के चुनावों का मतलब होता है जिन जिन पार्षदों के पेट भर चुके हैं वे लोग अपनी सम्पत्तियाँ इकट्ठी कर चुके हैं अब वे पीछे हटें और अपने दूसरे भाइयों को मौका दें ! 
        आप स्वयं देखिए एक उदाहरण -
   एक प्रकरण पूर्वी दिल्ली कृष्णानगर में छाछी बिल्डिंग चौक पर K -71 नाम से एक बिल्डिंग है जिसमें सोलह फ्लैट्स हैं और चार दुकानें हैं । ये बिल्डिंग 1998 में बनी थी सारे फ्लैट्स एवं दुकानें बेच दी गई थीं !
      इसके लगभग 5-6 वर्ष बाद बिल्डिंग की छत के एक कोने पर एक मोबाईल टॉवर लगवा दिया गया ! जिसमें  MCD से कोई परमीशन नहीं ली गई ,बिल्डिंग में रहने वाले फ्लैट्स मालिकों से सहमति नहीं ली गई ,तीसरी बात इस बिल्डिंग की ऊँचाई लगभग 55 से 57 फिट है जबकि 50 फिट ऊँचाई से अधिक निर्माण की अनुमति नहीं है !इसके अतिरिक्त भार के लिए बिल्डिंग की मजबूती की कभी कोई जाँच नहीं की गई  इन सारी अनियमितताओं के लिए जिम्मदार है केवल भ्रष्टाचार !सरकार कहती है भ्रष्टाचार कहाँ है !
       मोबाईल टावर का किराया किसी ऐसे व्यक्ति को जाता है जिसका इस बिल्डिंग में कोई फ्लैट नहीं है और न ही वो यहाँ रहता है इसलिए इस मोबाईल टावर से होने वाले रेडिएशन से बीमार हों तो इस बिल्डिंग के सोलह फ्लैटों में रहने वाले परिवारों के सदस्य और किराया ले वो बाहरी व्यक्ति !
   बिल्डिंग के बीचोबीच बनी सीढ़ियों से मोबाईल टावर मेंटीनेंस के जो अपरिचित से मैकेनिक लोग छत पर जाते हैं उन्होंने कई बार कई लोगों के साथ आपराधिक वारदातें की हैं जिनसे लोगों का बड़ा नफा नुक्सान भी हुआ है !वो कहतें हैं टावर नहीं रहेगा तो बिल्डिंग भी नहीं रहने दूँगा एक बार तो विस्फोटक जैसी कोई चीज बिल्डिंग के बेस मेंट में रखकर चले गए थे जिसमें पुलिस भी आई थी किंतु टावर गिरोह ने  सब को मैनेज कर लिया था !शुरू से ही बिल्डर ने छत पर पानी की बारह टंकियाँ सामूहिक रखी थीं जिनसे सभी फ्लैटों में पानी की सप्लाई होती रहती थी किंतु इसी टॉवर गिरोह ने पहले तो टंकियों में कूड़ा कबाड़ मरे चूहे बिल्ली आदि डाल देता रहा पिछले तीन वर्षों से तो पाइप काट रखे हैं टंकियाँ फाड़ दी हैं छत पर जाने के रास्ते पर ताला लगा रखा है तब से पानी बंद है ऐसी ही गुंडा गर्दी से तंग होने के कारण कई फ्लैट वाले लोग अपना फ्लैट बेचकर चले गए !
      इस अवैध मोबाईल टॉवर का किराया गुंडागर्दी और घूस खोरी के बल पर खाने वाले गिरोह का मानना है कि जिस फ्लैट वाले को रहना हो रहे नहीं रहना है न रहे किंतु अवैध होने के बाद भी ये मोबाईल टावर हटने दूँगा !EDMCसे लेकर SDM और पुलिस विभाग तक हर किसी का हिस्सा सबको पहुँचा दिया जाता है जेई हर महीने पैसे लेता है !यहाँ तक कि टॉवर हटाने के विरुद्ध दिया गया स्टे भी आपसी सेटिंग से बढ़वाया जाता रहेगा तारीखें पड़ती जाएँगी किंतु टॉवर नहीं हटेगा जज को भी EDMC वालों ने मैनेज कर लिया है उसके पैसे भी देने पड़े थे ऐसे भ्रष्टाचार का पैसा दिल्ली सरकार तक पहुँचता है !यदि ऐसा न होता तो अभी तक हटा न दिया जाता !जो पैसे खाते हैं वो टॉवर हटाने संबंधी कम्प्लेन पर कोई विचार ही क्यों करेंगे !
        मोबाईल टॉवर का किराया बिल्डिंग मेंटिनेंस में लगाया जाएगा ये कहकर लगाए गए टावर का एक भी पैसा आज तक बिल्डिंग के किसी भी कार्य में नहीं लगाया गया है सब टावर गिरोह EDMC के लोग और सरकार के अधिकारी कर्मचारी खा जाते हैं किन्तु बेसमेंट में अक्सर पानी भर जाता है!वो ठीक करवाने के लिए फ्लैट वाले लोग तब तक अपना पैसा क्यों लगावें जब तक टॉवर हटाया नहीं जाता !  EDMC के भ्रष्टाचार से निराश होकर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार को भी कई पात्र लिखे जा चुके हैं किंतु कहीं कोई सुनवाई नहीं होती यह देश सुनकर अब हम लोगों को भी भरोसा हो चला है कि भ्रष्टाचार का पैसा वास्तव में ऊपर तक जाता है !

Thursday, January 5, 2017

महिला शरीरों के महान महत्त्व को समझने वाली महिलाएँ पुरुषों की बराबरी कर ही नहीं सकतीं !

 "पुरुष अकेले घूम सकते हैं तो 'मैं क्यों अकेले नहीं घूम सकती ?-एक महिला कार्यकर्त्री"

      देवी ! आपको अकेले घूमने से रोकता कौन है वो आपकी शारीरिक ,सामाजिक एवं सरकारी परिस्थितियाँ ही हैं जो आपको अकेले आने जाने से रोकती हैं !

   सब्जी वाले रेड़ी पर सब्जी लादे गली गली भटकते बेचते दिन भर देखे जाते हैं किंतु किसी हीरा बेचने वाले जौहरी को कभी रेड़ी  पर हीरा लादकर बेचते देखा है क्या ?दूसरी बात क्या हीरा बेचने वाला कोई व्यक्ति कभी सब्जी बेचने वाले से अपनी तुलना करते देखा जाता है क्या ? 

  जो ऐसा करेगा वो मरेगा !क्योंकि जो वस्तु जितनी अलभ्य होती है उसे पाने के लिए लोग उतना ही बड़ा बलिदान देने को तैयार रहते हैं अपनी बासनास्पद को पाने के लिए जो लोग जीवन का मोह छोड़कर आत्म हत्या करने लगते हैं अर्थात मारने से नहीं डरते हैं वे पुलिस से क्या डरेंगे !

    कामी अर्थात सेक्सालु पुरुषों के लिए महिला शरीर कितने अलभ्य होते हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सेक्स की इच्छापूर्ति के जतन में लगे कामांध लोग महिलाशरीरों के शवों से भी दुष्कर्म करते देखे जाते हैं दो दो महीने की बच्चियों को भी नहीं छोड़ते !स्त्रीलिंग पशुओं तक को नहीं छोड़ते !ऐसे कामांध लोग महिलाओं के सजे धजे युवा शरीरों को बक्स देंगे क्या !वो  भी उट पटांग आधे चौथाई कपड़े पहनकर तरह तरह से शरीर दिखाने की शौकीन महिलाओं के तो इरादों पर ही कभी कभी शक होने लगता है कि क्या वे वास्तव में अपनी सुरक्षा चाहती हैं ! वो भी सरकारी कानून के भरोसे !सरकारी कामकाज की जिम्मेदारियों को निभाने का सच जानते हुए भी । 

      जिस देश में हर प्रकार के अपराधों को करने के लिए सरकारी विभागों से काम करवाने वाले दलालों ने अघोषित रेटलिस्ट बना रखी हो कि किस अपराध को करने के लिए किसको कितने पैसे देकर बचा जा सकता है !जिसमें जितने पैसे खर्च कर सकने की क्षमता हो वो उतना बड़ा अपराध कर सकता है !देश में ईमानदारी के बड़े बड़े दम्भ भरने वाली सरकारें आईं किन्तु सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों के प्रति आम अपराधी की इस मानसिकता को तोड़ने में वो अभी तक असफल रही हैं उस देश में  कानून के भरोसे जो महिलाएँ अपनी सुरक्षा करवाना चाहती हैं वे अंधेले में हैं ।

    नोट बंदी अभियान को ही ले लें प्रधानमंत्री जी जनता से 50 दिन माँगने के लिए गिड़गिड़ाते रहे और सरकार के अपने कर्मचारियों ने सबसे पहले उन्हीं कालेधन वालों के गोदामों के बोरे सफेद किए जिनके विरुद्ध प्रधानमंत्री जी ने युद्ध छेड़ रखा था !जिनसे 50 दिन की मोहलत माँगी जा रही थी वे दो दो हजार के लिए दम तोड़ रहे थे !

     इसे सरकारी भ्रष्ट तंत्र की कार्यशैली का छोटा सा सैंपल माना जाए या फिर सरकार के अपने कर्मचारियों की सरकार को सीधी चुनौती माना जाए !कि हे प्रधान मंत्री जी तुम हमें घूस लेकर भ्रष्टाचार करने से नहीं रोक सकते !अब इसे PM साहब चुनौती न मानें तो और बात है । 

     जिस देश में कानून के रखवाले प्रधानमंत्री की योजनाओं की ऐसे धज्जियाँ उड़ा देते हों उस देश में सरकारी सुरक्षा के बलपर आधुनिकता और फैशन परस्त महिलाओं को अपनी सुरक्षा की बागडोर स्वयं अपने हाथ में सँभालनी चाहिए और यदि सुरक्षित रहने का  इरादा वास्तव में हो तो जैसे रहन सहन आचार व्यवहार में अपनी सुरक्षा संभव हो वैसा ही रहन सहन स्वयं बनाकर चलने का व्रत लें !

      


 

भूकंप (कॉपी )

         भूकंप -2
  वैदिकविज्ञान से पता लगाया सकता है कभी भी कहीं भी किसी भी भूकंप के आने का उद्देश्य !    
        भूकंप कभी अकारण नहीं आते हैं भूकंपों के आने का कोई न कोई उद्देश्य जरूर होता है भूकंप हमें अतीत का दर्पण दिखा रहे होते हैं वर्तमान में डरा धमका कर हमें प्रकृति में संतुलन बना कर चलने के लिए प्रेरित कर रहे होते हैं और निकट भविष्य में घटित होने वाली कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाओं की सूचना दे रहे होते हैं !
     ये घटनाएँ प्रकृति या मौसम से संबंधित हो सकती हैं लोगों के स्वास्थ्य और स्वभाव से संबंधित हो सकती हैं दो देशों के आपसी संबंधों विचारों व्यवहारों  से संबंधित हो सकती हैं ।
      भूकंप को भेजते समय संसार की शुभचिंतक प्रकृति उस क्षेत्र के लोगों के लिए कोई न कोई महत्त्वपूर्ण संदेशा भेजती है खाली हाथ कभी नहीं आता है कोई भी भूकंप !यह निश्चित है । 
      जो भूकंप जब ,जहाँ और जैसे आता है वो स्थान,समय और वहाँ की प्राकृतिक स्थिति लोगों और जीवों में होने वाले रोगों और मनुष्यों से लेकर वहाँ के जीव जंतुओं के स्वभावों के सूक्ष्म लक्षणों का अध्ययन करके पहचाना जा सकता है किसी भूकंप के आने का उद्देश्य !
     जो भूकंप जब ,जहाँ और जैसे आता है उसके आने के कुछ मिनट बाद ही इस बात की उद्घोषणा की जा सकती है कि किस भूकंप के बाद आफ्टर शॉक्स आएँगे किसके बाद नहीं !
       जो भूकंप जब ,जहाँ और जैसे आता है उसके आधार पर इस रहस्य को सुलझाया जा सकता है कि किस भूकंप का प्रभाव किन जीवों पर कब से कैसा पड़ने लगता है अर्थात भूकंप आने के कितने समय पहले से किन जीवों के व्यवहार में किस किस प्रकार के परिवर्तन कितने दिन या महीने पहले से अनुभव किए जाने योग्य थे । 
      कई मामलों में तो जिस दिन इस विषय के रहस्य का उद्धाटन किया जाएगा और समाज को पता चलेगा या समाज को इस बात का विश्वास दिलाने में जिस दिन हम सफल होंगे कि भूकंपों का हमारे जीवन से इतना नजदीकी  संबंध है वो क्षण भूकंप के विषय में जानकारी की दृष्टि से ऐतिहासिक होगा !भारत वर्ष के सनातन हिंदू धर्म के प्राचीनतम वैदिक विज्ञान का चमत्कार उस दिन दुनियाँ देखेगी !
      विश्व के अनेकों देशों की सतर्क सरकारें भूकंपों का पूर्वानुमान लगाने की दिशा में भारी भरकम धनराशि खर्च करती हैं मोटी मोटी सैलरी देती हैं किंतु उनके द्वारा कई दशकों में अभी तक कुछ इस सामने नहीं लाया जा सका है जिसे खोज की श्रेणी में रखा जा सकता हो !ख़ास अपने अपने देश में भूकंप
    
            

Wednesday, December 28, 2016

मायावती जी !लोकतंत्र को लूटकर इकठ्ठा की गई नेताओं की संपत्ति भी क्यों न पकड़ी जाए !

मायावतीजी !भाजपा केविरुद्ध आप कोर्ट जाइए किंतु जनता को तो ये बताइए कि आपका पैसा कहाँ से आया ? 
         इतना भारी अमाउंट अन्य दलितों के पास से क्यों नहीं निकला आपके भाई के पास ही क्यों ?क्या भाई भतीजों का घर भरने ही आप लोग आते हो राजनीति में !जनता जाए जहन्नुम में !केवल बातों के ही बताशे बनाते हो दलितों के लिए ! ये है दलितों के प्रति दिखावटी हमदर्दी !आप जैसे कपटी नेताओं के कारण ही हो रही है दलितों की ये दुर्दशा !दलितों के नाम पर माँगना अपने पास रख लेना बारी हमदर्दी !अरे! ये तो बताओ कि पैसा आपके भाई के पास ही क्यों इकठ्ठा हुआ अन्य दलितों के पास क्यों नहीं !ऐसी ठंढ में दलित ठिठुरते घूम रहे हैं आप सैकड़ों करोड़ लिए घूम रही रही हैं आखिर ये दलितों के किस काम आएगा जो दलितों के विकास के लिए इकठ्ठा किया गया है वो आपके भाई के पास क्यों दलितों के पास क्यों नहीं ?आप तो अपने को दलितों की नेता बताते नहीं थकती हैं नेता दलितों की और पैसा भाई के पास ।अब तो लगता है कि दलितों को भी धोखा ही दिया है आपने जनता आब आप पर भरोसा कैसे करे !
    मायावती जी !जब आपने पहला चुनाव लड़ा था तब कितना पैसा और कितनी संपत्तियाँ थीं आपके पास और आज कितनी हैं इसके  बीच में आप फुल टाइम राजनीति करती रहीं इसलिए कुछ और करने का सवाल ही नहीं उठता फिर ये सारी संपत्तियाँ ईमानदारी पूर्वक इकठ्ठा कैसे की गई हैं ?ईश्वर साक्ष्य करके आप दलितों को बताइए कि आपके पास इतना धन दौलत इकठ्ठा कैसे हुआ ? 
      मायावती जी !भाजपा और मोदी जी भी यदि आपको भ्रष्ट लगते हैं तो उनके विरुद्ध आप कोर्ट चले जाइए आपको किसने रोका  है । उनके भ्रष्टाचार को भी निकाल बाहर निकालकर लाइए किंतु जनता को तो ये बताइए कि आपके पास कहाँ से आया इतना पैसा ! आप दलितों की गरीबत के लिए ब्राह्मणों ठाकुरों और बनियों को दोषी ठहराते रहे और दलितों के विकास के लिए पैसे पास करते रहे और खुद खा जाते रहे !आपके जैसे दलितों के हमदर्द कपटी नेताओं के कारण ही तो दलितों का विकास आप लोगों के सहारे कभी हो ही नहीं सकता !

Saturday, September 17, 2016

Mind 1(कॉपी)

      Mind 1
     लेख नं 3 
मनोरोगियों  के लिए ज्योतिष काउंसलिंग ही कारगर बाक़ी सब फेल !जानिए क्यों ?
    योगासनों का भी मनोरोग में कोई रोल नहीं ! मनोरोगी इतना निरुत्साही और निराश हो जाता है कि आसन करेगा कैसे !फिर आसनों से पेट हिलेगा दिमाग नहीं !मनोरोग से योगासनोंका क्या संबंध !
       सुश्रुत संहिता में शारीरिक रोगों के लिए तो औषधियाँ बताई गई हैं  किंतु मनोरोग के लिए किसी औषधि का वर्णन न करते हुए उन्होंने कहा कि इसके लिए शब्द स्पर्श रूप रस गंध आदि का सुखकारी प्रयोग करना चाहिए !
    यथा -  "मानसानां तु शब्दादिरिष्टो वर्गः सुखावहः |'
     कुल मिलाकर विश्व की किसी  भी चिकित्सा पद्धति में मनोरोगियों को स्वस्थ करने की कोई दवा नहीं होती नींद लाने के लिए दी जाने वाली औषधियाँ  मनोरोग की दवा नहीं अपितु नशा  हैं उन्हें मनोरोग की दवा नहीं कहा जा सकता है ! अब बात आती है  काउंसलिंग अर्थात परामर्श चिकित्सा की !
    काउंसलिंग अर्थात परामर्श चिकित्सा - 
    काउंसलिंग के नाम पर चिकित्सावैज्ञानिक मनोरोगी को जो बातें समझाते हैं उनमें उस मनोरोगी के लिए कुछ नया और कुछ अलग से नहीं होता है क्योंकि स्वभावों के अध्ययन के लिए उनके पास कोई ठोस आधार नहीं हैं और बिना उनके किसी को कैसे समझा सकते हैं आप !कुछ मनोरोगियों पर किए गए कुछ अनुभव कुछ अन्य लोगों पर अप्लाई किए जा रहे होते हैं किंतु ये विधा कारगर है ही नहीं  हर किसी की परिस्थिति मनस्थिति सहनशीलता स्वभाव साधन और समस्याएँ आदि अलग अलग होती हैं उसी हिसाब से स्वभावों के अध्ययन की भी कोई तो प्रक्रिया होनी चाहिए !इस विषय में मैं ऐसे कुछ समझदार लोगों से मिला भी उनसे चर्चा की किंतु वे कहने को तो मनोचिकित्सक  थे किंतु मनोचिकित्सा के   विषय में  बिलकुल कोरे और खोखले थे !मैंने उनसे पूछा कि मन के आप चिकित्सक है तो मन होता क्या है तो उन्होंने कई बार हमें जो समझाया उसमें मन बुद्धि आत्मा विवेक आदि सबका घालमेल था किंतु मनोचिकित्सा की ये प्रक्रिया ठीक है ही नहीं क्योंकि इसके लिए हमें मन बुद्धि आत्मा आदि को अलग अलग समझना पड़ेगा और चोट कहाँ है ये खोजना होगा तब वहाँ लगाया जा सकता है प्रेरक विचारों का मलहम ! इसलिए ऐसी आधुनिक काउंसलिंग से केवल सहारा दे दे कर मनोरोगी का  कुछ समय तो  पास किया जा सकता है बस इससे ज्यादा कुछ नहीं !
     'समयशास्त्र' (ज्योतिष) -के द्वारा मनोचिकित्सा के क्षेत्र में किसी मनोरोगी का विश्लेषण करने के लिए उसके जन्म समय तारीख़ महीना वर्ष आदि पर रिसर्च कर के सबसे पहले उस मनोरोगी का स्थाई स्वभाव खोजना होता है इसके बाद उसी से उसका वर्तमान स्वाभाव निकालना होता है फिर देखना होता है कि रोगी का दिग्गज फँसा कहाँ है ये सारी चीजें समय शास्त्रीय स्वभाव विज्ञान के आधार पर तैयार करके इसके बाद मनोरोगी से करनी होती है बात और उससे पूछना कम और बिना  बताना ज्यादा होता है उसमें उसे बताना पड़ता है कि आप अमुक वर्ष के अमुक महीने से इस इस प्रकार की समस्या से जूझ रहे हैं उसमें कितनी गलती आपकी है और कितनी किसी और की ये सब अपनी आपसे बताना होता है उसके द्वारा दिया गया डिटेल यदि सही है तो ये प्रायः साठ से सत्तर प्रतिशत तक सही निकल आता है जो रोगी और उसके घरवालों ने बताया नहीं होता है इस कारण मनोरोगी को इन बातों पर भरोसा होने लगता है इसलिए उसका मन मानने को तैयार हो जाता है फिर वो जानना चाहता है कि ये तनाव घटेगा कब और घटेगा या नहीं !ऐसे समय इसी विद्या से इसका उत्तर खोजना होता है यदि घटने लायक संभावना निकट भविष्य में है तब तो वो बता दी जाती है और विश्वास दिलाने के लिए रोगी से कह  दिया जाता है कि मैं आपके बीते हुए जीवन से अनजान था मेरा बताया हुआ आपका पास्ट जितना सही है उतने प्रतिशत फ्यूचर भी सही निकलेगा !इस बात से रोगी को बड़ा भरोसा मिल जाता है और वह इसी सहारे बताया हुआ समय बिता लेता है !
     दूसरी बात इससे विपरीत अर्थात निकट भविष्य में या भविष्य में जैसा वो चाहता है वैसा होने की सम्भावना नहीं लगती है तो भी उसका पास्ट बताकर पहले तो विश्वास में ले लिया जाता है फिर फ्यूचर के विषय  में न बताकर  अपितु  घुमा फिरा कर कुछ ऐसा समझा दिया जाता है जिससे तनाव घटे और वो धीरे धीरे भूले इसके लिए कईबार उसके साथ बैठना होता है । आदि  इस प्रकार से   मनोचिकित्सा के   विषय में भी  'समयशास्त्र' (ज्योतिष)की बड़ी भूमिका है ।  मनोरोगियों में पनपजाते हैं कई प्रकार केशारीरिकरोग -
      मनोरोग के कारण  शारीरिक बीमारियाँ भी पैदा होने लगती हैं उसी के साथ एक एक पर एक जुड़ती चली जाती हैं धीरे धीरे मनोरोग तो पीछे पड़ बाक़ी शारीरिक बीमारियों का समूह बन जाता है मनोरोगी  !ऐसे रोगों का इलाज शारीरिक  चिकित्सा पद्धति की दृष्टि से अत्यंत कठिन एवं काम चलाऊ  होता है ऐसे लोगों को समयशास्त्र  (ज्योतिष)की पद्धति से कुछ समय तक यदि लगातार काउंसलिंग दी जाए और उसके बाद चिकित्सा की जाए तो घट सकती हैं जीवन से जुडी अनेकों बीमारियाँ !
   आजकल मानसिक तनाव बहुत बढ़ता जा रहा है असहिष्णुता इतनी की छोटी छोटी बातों पर तलाक हो रहे हैं किसी को किसी की बात बर्दाश्त ही नहीं है पति पत्नी में आपसी तनाव के कारण एक दूसरे को देखकर ख़ुशी नहीं होती ! जीवन साथी की बुरी बातें, बुरी आदतें,बुरे आचार व्यवहार आदि हमेंशा याद बने रहने के कारण लोग मानसिक नपुंसकता के शिकार होते जा रहे हैं ऐसे लोग अपने जीवन साथी के साथ खुश नहीं हैं इसलिए उनके शारीरिक संबंध प्रभावित हो रहे हैं इससे  दिमागी तनाव बढ़ता है उससे नींद नहीं आती है नींद न आने से पेट ख़राब रहता है पेट खराब रहने से भूख नहीं लगती है कुछ खाने का मन नहीं होता है जब तीन सप्ताह ऐसा रह जाता है तो गैस बनने लगती है ये गंदी गैस ऊपर को चढ़ कर हृदय में पहुँचती है इससे घबड़ाहट बेचैनी हार्टबीट आदि बढ़ने लगती है ब्लड प्रेशर जैसी दिक्कतें बढ़ने लगती हैं ! जब यही गैस और ऊपर जाकर मस्तिष्क में चढ़ती है तो शिर में दर्द होना चक्कर आना ,आँखों में जलन या आँखों के आगे अचानक धुँधला दिखाई पड़ना या अँधेरा छा जाना,शरीर में अचानक झटका सा लग जाना,ऐसा समझ में आना जैसे कोई अपने ऊपर बैठ गया हो या पास से निकल गया हो इससे भूतों का भ्रम होना ,यही गैस कान में पहुँच कर कर्ण निनाद अर्थात कानों में आवाजें आने लगना तैयार कर देती है बाल फटना ,सफेद होना ,झड़ना, उलटी लगना,त्वचा ढीली पड़ने लगना,झुर्रियाँ पड़ने लगना,आँखों के आसपास काले घेरे होने लगना आँखों के नीचे गड्ढे पड़ने लगना,गर्दन और कंधों में जकड़न होने लगना,सीने एवं कंधों पर मांस बढ़ने लगना पेट के ऊपरी भाग में जलन होते होते गले तक पहुँचने लगना , 6 महीने तक यदि ऐसा ही चलता रहा तो मांस बढ़ने लगना पेट लटकने लगना,कमर चौड़ी तथा जाम होने लगना ,जाँघें भारी होने लगना,घुटने जाम होने लगना ,हड्डियों के जोड़ बजने लगना, तलवों सहित पूरे शरीर में जलन होने लगना आदि दिक्कतें होने लगती हैं !ऐसी दिक्कतें बढ़ने पर पीड़ित स्त्री-पुरुष थर्मामीटर से नापते हैं तो बुखार नहीं होता वैसे शरीर जला करता है शरीर में दिन भर टूटन होती है उठकर कहीं चलने का मन नहीं होता किसी से मिलने बोलने का मन नहीं होता है किसी शादी विवाह उत्सव आदि में जाने  मन नहीं होता किसी से आँख मिलाने की हिम्मत नहीं पड़ती ! ऐसे स्त्री-पुरुष मेडिकली चेकअप करवाते हैं तो प्रारम्भ में तो कोई खास बीमारी नहीं निकलती है किंतु इन परिस्थितियों पर यदि समय रहते नियंत्रण न किया जाए तो इन्हीं कारणों से बीमारियाँ धीरे धीरे बनने और बढ़ने लगती हैं !ऐसे लोग अपने को असमय में बूढ़ा होने का अनुभव करने लगते हैं किंतु इस अनचाहे बुढ़ापे को रोकने के लिए या इसे न सह पाने के कारण ये बचे खुचे बाल काले करने लगते एवं भारी भरकर मेकअप करने लगते हैं किंतु उससे और कुछ तो होता नहीं वो श्रृंगार और चिढ़ाने सा लगता है क्योंकि उसमें सजीवता नहीं आ पाती है धीरे धीरे अपने को भी झेंप लगने लगती है !   कुल मिलाकर ऐसी सभी परेशानियाँ दिनोंदिन बढ़ती चली जाती हैं इसमें चिकित्सकीय इलाज से काम चलाऊ  सहयोग तो मिलता है किंतु वो स्थाई नहीं होता है थोड़े दिन बाद फिर वैसा ही हो जाता है दूसरी बात छोटी छोटी बीमारियाँ इतनी अधिक हो जाती हैं कि दवा किस किस की लें साथ ही बहुत सी बीमारियों का भ्रम बहुत अधिक बढ़ जाता है बड़ी से बड़ी बीमारी किसी के मुख से या न्यूज में सुनने पर ऐसे लोग उस बड़ी से बड़ी बीमारी के लक्षण अपने अंदर खोजने लगते हैं मानसिक दृष्टि से ये इतने अधिक कमजोर हो जाते हैं कई बार बात बात में या बिना बात के सकारण या अकारण रोने लग जाते हैं ऐसे स्त्री पुरुष !
       ऐसे लोगों पर कोई भी इलाज बहुत अधिक कारगर नहीं होते हैं इलाज की प्रक्रिया तो ऐसी है कि आप गैस बताएँगे तो वो गैस की गोली दे देंगे ,दाँत दर्द बताएँगे तो दाँत दर्द की गोली दे देंगे किंतु ये पर्याप्त इलाज नहीं है धीरे धीरे वो भी यही बताने लगेंगे कि सलाद खाओ,पानी अधिक पियो ,सैर करो,कहीं घूमने फिरने जाया करो मौज मस्ती  करो आदि आदि ! इससे आंशिक लाभ तो होता है किंतु वो स्थाई नहीं होता और बहुत अधिक कारगर नहीं रहता है थोड़े दिन बाद फिर वैसे ही हो जाते हैं क्योंकि ये सब उपाय बहुत अधिक कारगर नहीं रहते !
     चिकित्सा करते समय ऐसे लोगों का मानसिक तनाव सर्व प्रथम कम करना चाहिए जब  मानसिक तनाव घटकर चिंतन सामान्य हो जाए!ऐसे लोगों की चिकित्सा में धीरे धीरे कुछ महीना  या अधिक दिक्कत हुई तो वर्ष भी लग सकते हैं ठीक ढंग से सविधि चिकित्सा करने में समय तो लगता है किंतु धीरे धीरे सब कुछ नार्मल होता चला जाता है !कंडीशन पर डिपेंड करता है ! सबसे पहले तो हमें ऐसे लोगों के विषय में गंभीर रिसर्च इस बात के लिए करनी होती है कि ये परिस्थिति पैदा क्यों हुई !दिमागी तनाव बढ़ा क्यों और कब से बढ़ा तथा रहेगा कब तक और उसे ठीक करने के लिए क्या कुछ उपाय किए जा सकते हैं !
      दूसरी स्टेज वो आती है जब पता करना होता है कि इतने दिनों तक तनाव बना रहने से सम्बंधित व्यक्ति के शरीर में किस प्रकार से कितना नुक्सान हुआ और उसे रिकवर कैसे किया जाए !ये खान पान औषधि टॉनिक आदि  चीजों के साथ साथ उचित आहार व्यवहार से उचित समय से उचित मात्रा में देना होता है । इन सबके साथ साथ अपने विरुद्ध सोचने की आदत ऐसे लोगों की इतनी जल्दी नहीं छूटती है ये डर हमेंशा बना रहता है कि ये कहीं पुरानी स्थिति में फिर न लौट जाएँ इसलिए ऐसे लोगों समय समय पर आवश्यकतानुशार उचित काउंसेलिंग करनी होती है ।
     योगासन करने से लाभ -   ऐसे में ये निरुत्साही लोग योगासन भी नहीं कर पाते करें तो थोड़ा डैमेज कंट्रोल हो सकता है किन्तु अधिक नहीं कुछ पाखंडी लोग ऐसे सपने दिखाते हैं कि योगासनों से मनोरोग दूर हो जाएंगे ये सच नहीं हैं इसमें एकमात्र भूमिका निभा सकता है तो समयशास्त्र  (ज्योतिष)इसकी पद्धति  ही मनोरोग में सबसे अधिक प्रभावी है । 



 मनोरोग, मानसिक तनाव ,स्ट्रेस आदि  को  कंट्रोल करने में सक्षम है ज्योतिष ! जानिए कैसे ?
   भविष्य के भय को चिंता कहते हैं और गंभीर एवं लगातार रहने वाली चिंताएँ ही मनोरोगी बना देती हैं जिनके कारण सुगर, B. P. , हार्टअटैक, अनिद्रा ,पेटखराबी  जैसी तमाम अन्य बड़ी बीमारियों को पैदा कर देता है मानसिक तनाव !उन बीमारियों पर यथासंभव नियंत्रण करने की योग्यता तो डॉक्टरों के पास है किंतु जिस मानसिक तनाव से वो बीमारियाँ होती हैं उस तनाव को कैसे घटाया जाए ! इसके लिए चिकित्सा पद्धति में कोई उपाय नहीं है । वस्तुतः ये विषय ही ज्योतिषविज्ञान का है  ।
    मन के प्रायः समस्त रोग भविष्य के भय सोच सोच कर होते हैं "कल क्या होगा !"जो हम पाना चाहते हैं वो हमें मिलेगा कि नहीं ?जो हमें मिला आई उसे सुरक्षित रख पाएँगे कि नहीं !कल कोई बीमारी तो नहीं हो जाएगी !व्यापार में घाटा तो नहीं हो जाएगा !कुल मिलाकर भविष्य में कुछ बुरा न हो जाए चिंता तो इसी बात की है कि सब कुछ वैसा होगा क्या जैसा हम भविष्य में चाहते हैं आदि बातों के ही तो हमें मानसिक तनाव होते हैं !भविष्य में क्या होगा क्या नहीं आदि भविष्यसंबंधी बातों का जवाब कोई डॉक्टर या मनोचिकित्सक कैसे दे सकता है !ये तो काम  ही ज्योतिष का है इसलिए इसका उत्तर भी ज्योतिष वैज्ञानिक ही दे सकते हैं ।     
        डॉक्टरों का कार्यक्षेत्र हमारे शरीर का हार्डवेयर तो है किंतु साफ्टवेयर पर उनका कोई अधिकार नहीं है!डॉक्टर या विश्ववैज्ञानिक अभी तक आत्मा मन बुद्धि प्राण इंद्रियों आदि को लेकर इनके आस्तित्व को केवल इसलिए नहीं स्वीकार करते हैं क्योंकि इन्हें वो देख नहीं सकते छू नहीं सकते इनका अनुभव नहीं कर सकते !यदि सच्चाई इतनी ही है तो इन्हें मनोचिकित्सक क्यों मान लिया जाए !ये मन को देख नहीं सकते छू नहीं सकते मन की जाँच नहीं कर सकते मन को दवा नहीं दे सकते किसी के मन की उदासी निराशा आत्मग्लानि आदि को कम करने की इनके पास कोई दवा नहीं है फिर भी मनो चिकित्सक आखिर किस बात के !मन की चिकित्सा में इन चिकित्सकों की भूमिका आखिर क्या है !
     मोबाईल का मैकेनिक मोबाईल के पुर्जे पुर्जे खोल सकता है बाँध सकता है नए बदल सकता है किंतु उसमें मैसेज आएगा कि नहीं कॉलड्रॉप होगा कि नहीं ये मोबाइल मैकेनिक नहीं बता सकता !घर में लगे बिजली के उपकरण ठीक कर लेने वाला मैकेनिक बिजली आने न आने की गारंटी नहीं दे सकता और बिजली के बिना उन्हें चला कर नहीं दिखा सकता !जैसे मोबाईल और बिजली उपकरणों के मैकेनिक का उसके साफ्टवेयर पर कोई अधिकार नहीं होता है ठीक उसी प्रकार से शरीरों के मैकेनिक डॉक्टरों का  शरीरों के साफ्टवेयर पर कोई अधिकार नहीं होता !
     आत्मा मन बुद्धि प्राण इंद्रियों आदि का क्या पता उनको !डॉक्टर लोग पूरा शरीर खोलकर देख लेते हैं किंतु उन्हें आत्मा मन बुद्धि प्राण इंद्रियाँ आदि कहीं नहीं मिलते !आधुनिक वैज्ञानिकों की आदत है कि वो जिस चीज को देख नहीं सकते छू नहीं सकते आदि उसे वो विज्ञान मानने को तैयार ही नहीं होते !जिसमें भारत के प्राचीन ज्ञान विज्ञान की तो बात सुनते ही वो भड़क उठते हैं । मोबाईल और टेलीवीजन में जितने सन्देश या चित्र आदि दिखाई पड़ते हैं यदि मोबाईल एवं  टेलीवीजन का पुर्जा पुर्जा खोल दिया जाए तो एक भी सन्देश या चित्र आदि उसके अंदर खोजने पर भी कहीं नहीं मिलेगा किंतु वैज्ञानिकों को उसमें आपत्ति इसलिए नहीं है क्योंकि इनमें जो सन्देश या चित्र आदि दिखाई पड़ते हैं वो जहाँ से भेजे जातें हैं उन कंपनियों के विषय में इन्हें पता है ये उस सारे सिस्टम को समझते हैं इसलिए इन्हें उसमें कोई आश्चर्य नहीं लगता किंतु शरीर के साफ्टवेयर विज्ञान के विषय में इन्हें चूँकि जानकारी नहीं है इसलिए ये उन बातों को गलत मानते हैं यदि इन वैज्ञानिकों को जानकारी नहीं है इसलिए इनके कह देने  पर  शरीर के साफ्टवेयर विज्ञान को गलत कैसे मान लिया जाए !हम अपने शरीर की हर समस्या का समाधान डाक्टरों से चाहते हैं किंतु उनकी भी सीमाएँ  हमें समझनी होंगी !के पास भागते हैं किंतु हमें यह भी सोचना चाहिए कि डाक्टर हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत कुछ हैं किंतु सब  कुछ नहीं हैं 
मन है क्या ? मनोरोग क्या हैं इनकी जाँच कैसे हो दवा कैसे हो !मनोचिकित्सा या औषधि देने से मानसिकतनाव, निराशा, उदासी, हीनभावना आदि रुकजाती है क्या ?यदि नहीं तो मनोचिकित्सा का मतलब क्या है !मन को देखा नहीं जा सकता छुआ नहीं जा सकता जाँचा नहीं जा सकता !मन में दवा नहीं दी जा सकती फिर मनोचिकित्सा कैसी !
मन -
   जुकाम बुखार जैसी छोटी छोटी बीमारियों में बिना जाँच कराए एक कदम भी आगे न बढ़ने वाले चिकित्सक मन की जाँच किस मशीन से करते होंगे ?मनोरोगी को कौन सी दवा देते हैं और उस दवा से मानसिक तनाव घट जाता है क्या ? सुगर, B. P. , हार्टअटैक, अनिद्रा ,पेटखराबी  जैसी तमाम अन्य बड़ी बीमारियों को पैदा करने वाले मानसिक तनाव को घटाने के लिए क्या है आधुनिक चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के पास उपाय क्या है ?     बेरोजगारी, किसी प्रियजन की मृत्यु, कर्जदार होने जैसी आर्थिक समस्याएं, अकेलेपन बांझपन या नपुंसकता, वैवाहिक झगड़ा, हिंसा और मानसिक अघात ऐसी समस्याएं हैं जो बहुत ज्यादा तनाव पैदा करती है | कुछ लोग ऐसी स्थिति में ही मनोरोगी होकर सुगर B. P. जैसी तमाम अन्य बड़ी बीमारियों का शिकार हो जाते हैं ।मन को न मानने वाली चिकित्सा पद्धति में मन को  जाँचने वाली न कोई मशीन है और न ही मनोरोग की कोई दवा ही होती है !चिकित्सा पद्धति में लोगों का स्वभाव समझने के लिए कोई विज्ञान नहीं है अच्छे बुरे समय के अनुसार लोगों का स्वभाव बदलता रहता है इसलिए किसी भी व्यक्ति के समय को समझे बिना उसके स्वभाव को समझ पाना अत्यंत कठिन है और स्वभाव को समझे बिना मनोरोगियों को दी जाने वाली काउंसलिंग  खानापूर्ति मात्र होती  है जबकि ऐसे स्थलों पर ज्योतिष विज्ञान संपूर्ण रूप से सटीक बैठता है ।इसके  द्वारा काफी हद तक नियंत्रित किए जा सकते हैं मनोरोग !
 रोग और मनोरोग जैसी परिस्थिति पैदा ही न हो इसके लिए  समय का पूर्वानुमान लगाकर उसके अनुरूप ही कार्य योजना बनाकर चलने से ऐसी परेशानियों के  पैदा होने से बचा जा सकता है । पुराने समय में जब राजा प्रजा लोग ज्योतिषीय पद्धति से  समय का पूर्वानुमान लगा लिया करते थे उसी के अनुसार जीवन और शासन सत्ता को ढाल लिया करते थे !इसीलिए तब रोगी मनोरोगी हत्यारे आत्महत्यारे बलात्कारी और लुटेरे आदि इतने नहीं होते थे । ज्योतिषीय पूर्वानुमान के कारण ही लोग अच्छी बुरी परिस्थितियों को सहने की क्षमता  रखते थे यही कारण है कि  तब जो समाज विश्व बन्धुत्व की भावना से जुड़ा होता था कितने बड़े बड़े संयुक्त परिवार हुआ करते थे किंतु ज्योतिष की उपेक्षा होते ही समाज बिखर रहा है परिवार टूट रहे हैं 'वसुधैवकुटुम्बकं' तो दूर अब तो पति -पत्नी ,बाप-बेटा ,भाई - भाई के संबंध भी बोझ बनते जा रहे हैं एक साथ कब तक रह पाएँगे कहना कठिन  है ।
ज्योतिष अपनाओ ! तनाव घटाओ ! मनोरोग भगाओ !
    भविष्य का भय ही चिंता है जिसे जितना बड़ा भय उसे उतनी बड़ी चिंता !
      जिसके स्वप्नों और परिस्थितियों में जितना बड़ा गैप उसे उतनी बड़ी चिंता !इस गैप को ही तो तनाव खिंचाव चिंता स्ट्रेस आदि कुछ भी कहा जा सकता है । गलत काम करने वालों को, अधिक कर्ज से रिस्क लेकर काम करने वालों को जीवन की आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति न कर पाने वालों को !किसी न ठीक होने लायक बीमारी वालों को या दवा कराने की सामर्थ्य न होने वालों को भविष्य का भय बहुत अधिक रहता है ऐसे लोगों में मनोरोग होने की प्रबल संभावनाएँ होती हैं । 
     जिसका मन नैतिकता, कानून ,सिद्धांत, सदाचार ,कृतज्ञता और ईश्वर पर विश्वास छोड़कर जितनी दूर चला जाता है उतनी ज्यादा गंदगी समेट लाता है ! गंदे काम करके आया कोई संस्कारित बच्चा जैसे अपने माता पिता का सामना करने में डरता है वैसे ही गलत काम करने वाले लोग अपनी आत्मा का सामना करने से डरने और बचने लगते हैं जैसे हम यदि सूर्य के सामने नहीं पड़ेंगे तो सूर्य की किरणे हमारे ऊपर नहीं पड़ेंगी और धूप न लगने से जैसे स्वास रोग, टीवी ,एलर्जी आदि अनेकों बीमारियाँ होने लगती हैं हड्डियाँ कमजोर  हो जाती हैं । ठीक इसी प्रकार से आत्मसूर्य का प्रकाश मन पर न पड़ने से मन में होने वाली बीमारियाँ जोर पकड़ने लगती हैं और मन कमजोर होने लगता है । क्योंकि हमारे मन को बल (ताकत) आत्मा से ही मिलता है और आत्मा के सामने न पड़ने के कारण मन को आत्मा का बल नहीं मिल पाता है ऐसे आत्मबल से विहीन लोग हर किसी से डरने लगते हैं हर काम डर डर कर करते हैं । मन उदास रहता है काम करने का उत्साह नहीं रहता इसीलिए काम डरने के कारण काम धीरे धीरे करते हैं और धीरे धीरे काम करने के कारण ही सबसे पहले पेट की पाचन शक्ति समाप्त होने लगती है इसके बाद शरीर बिगड़ने लगता है और धीरे धीरे शरीर निष्क्रिय (जाम) होता चला जाता है यही स्थिति बढ़ते बढ़ते हृदय रोग शुगर रोग जैसी तमाम बड़ी बीमारियाँ पनपने  लगती हैं और धीरे धीरे बीमारियों से बीमारियाँ बनने लगती हैं ।बीमारियों का जाल बनता चला जाता है सकने वाले न हमारे उससे हमारे देता है यही आत्मा ही हमारे आतंरिक जगत का सूर्य है जैसे सूर्य 
 सूर्य हमें प्रकाश देता है और बिटामिन 'D ' अर्थात शक्ति देता है सूर्य
     भविष्य का भय हर किसी को रहता है  हर कोई जानना चाहता है कि हमारे जीवन में कल क्या होगा !और यह जानना जरूरी भी है !भविष्य के विषय में ये पता हो कि हम अपने जीवन का विकास करने के किस क्षेत्र में कितना बढ़ सकते हैं तो वो उस सीमा में अपने को समेटने की कोशिश करता है या उससे अधिक जो प्रयास भी करता है उनसे बहुत अधिक आशा नहीं रखता है मिल जाए तो अच्छा और न मिल जाए तो विष तनाव नहीं होता !
ज्योतिष अपनाओ ! तनाव घटाओ ! मनोरोग भगाओ !
    भविष्य का भय ही चिंता है जिसे जितना बड़ा भय उसे उतनी बड़ी चिंता !
      जिसके स्वप्नों और परिस्थितियों में जितना बड़ा गैप उसे उतनी बड़ी चिंता !इस गैप को ही तो तनाव खिंचाव चिंता स्ट्रेस आदि कुछ भी कहा जा सकता है । गलत काम करने वालों को, अधिक कर्ज से रिस्क लेकर काम करने वालों को जीवन की आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति न कर पाने वालों को !किसी न ठीक होने लायक बीमारी वालों को या दवा कराने की सामर्थ्य न होने वालों को भविष्य का भय बहुत अधिक रहता है ऐसे लोगों में मनोरोग होने की प्रबल संभावनाएँ होती हैं । 
     जिसका मन नैतिकता, कानून ,सिद्धांत, सदाचार ,कृतज्ञता और ईश्वर पर विश्वास छोड़कर जितनी दूर चला जाता है उतनी ज्यादा गंदगी समेट लाता है ! गंदे काम करके आया कोई संस्कारित बच्चा जैसे अपने माता पिता का सामना करने में डरता है वैसे ही गलत काम करने वाले लोग अपनी आत्मा का सामना करने से डरने और बचने लगते हैं जैसे हम यदि सूर्य के सामने नहीं पड़ेंगे तो सूर्य की किरणे हमारे ऊपर नहीं पड़ेंगी और धूप न लगने से जैसे स्वास रोग, टीवी ,एलर्जी आदि अनेकों बीमारियाँ होने लगती हैं हड्डियाँ कमजोर  हो जाती हैं । ठीक इसी प्रकार से आत्मसूर्य का प्रकाश मन पर न पड़ने से मन में होने वाली बीमारियाँ जोर पकड़ने लगती हैं और मन कमजोर होने लगता है । क्योंकि हमारे मन को बल (ताकत) आत्मा से ही मिलता है और आत्मा के सामने न पड़ने के कारण मन को आत्मा का बल नहीं मिल पाता है ऐसे आत्मबल से विहीन लोग हर किसी से डरने लगते हैं हर काम डर डर कर करते हैं । मन उदास रहता है काम करने का उत्साह नहीं रहता इसीलिए काम डरने के कारण काम धीरे धीरे करते हैं और धीरे धीरे काम करने के कारण ही सबसे पहले पेट की पाचन शक्ति समाप्त होने लगती है इसके बाद शरीर बिगड़ने लगता है और धीरे धीरे शरीर निष्क्रिय (जाम) होता चला जाता है यही स्थिति बढ़ते बढ़ते हृदय रोग शुगर रोग जैसी तमाम बड़ी बीमारियाँ पनपने  लगती हैं और धीरे धीरे बीमारियों से बीमारियाँ बनने लगती हैं ।बीमारियों का जाल बनता चला जाता है 
         
 मन क्या है ? मनोरोग कितने हैं ? मन में होने वाले रोगों की जाँच कैसे की जाती है ?मनोरोगों की दवा क्या है ?उस दवा से मनोरोग  या मानसिक तनाव  को रोका जा सकता है क्या ?

      मनोरोग, मानसिक तनाव ,स्ट्रेस आदि कंट्रोल करने का एक मात्र  उपाय है ज्योतिष !जानिए कैसे ?

   जुकाम बुखार जैसी छोटी छोटी बीमारियों में बिना जाँच कराए एक कदम भी आगे न बढ़ने वाले मनोचिकित्सक लोग मन की जाँच किस मशीन से करवाते हैं और मनोरोगी को कौन सी दवा देते हैं और उस दवा से मानसिक तनाव घट जाता है क्या ? सुगर, B. P. , हार्टअटैक, अनिद्रा ,पेटखराबी  जैसी तमाम अन्य बड़ी बीमारियों को पैदा करने वाले मानसिक तनाव को घटाने के लिए क्या है आधुनिक चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के पास उपाय क्या है ?

कुछ लोग ऐसी स्थिति में ही मनोरोगी होकर सुगर B. P. जैसी तमाम अन्य बड़ी बीमारियों का शिकार हो जाते हैं ।मन को न मानने वाली चिकित्सा पद्धति में मन को  जाँचने वाली न कोई मशीन है और न ही मनोरोग की कोई दवा ही होती है !चिकित्सा पद्धति में लोगों का स्वभाव समझने के लिए कोई विज्ञान नहीं है अच्छे बुरे समय के अनुसार लोगों का स्वभाव बदलता रहता है इसलिए किसी भी व्यक्ति के समय को समझे बिना उसके स्वभाव को समझ पाना अत्यंत कठिन है और स्वभाव को समझे बिना मनोरोगियों को दी जाने वाली काउंसलिंग  खानापूर्ति मात्र होती  है जबकि ऐसे स्थलों पर ज्योतिष विज्ञान संपूर्ण रूप से सटीक बैठता है ।इसके  द्वारा काफी हद तक नियंत्रित किए जा सकते हैं मनोरोग !

     रोग और मनोरोग जैसी परिस्थिति पैदा ही न हो इसके लिए  समय का पूर्वानुमान लगाकर उसके अनुरूप ही कार्य योजना बनाकर चलने से ऐसी परेशानियों के  पैदा होने से बचा जा सकता है । पुराने समय में जब राजा प्रजा लोग ज्योतिषीय पद्धति से  समय का पूर्वानुमान लगा लिया करते थे उसी के अनुसार जीवन और शासन सत्ता को ढाल लिया करते थे !इसीलिए तब रोगी मनोरोगी हत्यारे आत्महत्यारे बलात्कारी और लुटेरे आदि इतने नहीं होते थे । ज्योतिषीय पूर्वानुमान के कारण ही लोग अच्छी बुरी परिस्थितियों को सहने की क्षमता  रखते थे यही कारण है कि  तब जो समाज विश्व बन्धुत्व की भावना से जुड़ा होता था कितने बड़े बड़े संयुक्त परिवार हुआ करते थे किंतु ज्योतिष की उपेक्षा होते ही समाज बिखर रहा है परिवार टूट रहे हैं 'वसुधैवकुटुम्बकं' तो दूर अब तो पति -पत्नी ,बाप-बेटा ,भाई - भाई के संबंध भी बोझ बनते जा रहे हैं एक साथ कब तक रह पाएँगे कहना कठिन  है । 

मानसिकतनाव विज्ञान !

 ऐसे लोगों को समय विज्ञान की दृष्टि से यदि काउंसलिंग (परामर्श) दिया जाए एक सीमा तक बचाव हो सकता है अन्यथा ऐसे मनोरोगी धीरे धीरे गंभीर शारीरिक बीमारियों से ग्रसित होते चले जाते हैं । 
      कुछ समय विंदु ऐसे होते हैं जिनमें जन्म लेने वाले लोग बिना तनाव के रह ही नहीं सकते !ऐसे लोग अच्छी से अच्छी एवं अनुकूल से अनुकूल बातों व्यवहारों से भी अपने लिए मानसिक तनाव खोज लेते हैं ऐसे लोग धीरे धीरे मानसिक तनाव में रहने के आदी हो जाते हैं ।कुछ समय विंदुओं में ऐसी परिस्थितियाँ सारे जीवन के लिए होती हैं तो कुछ में दो चार दस पाँच वर्ष के लिए होती हैं । ऐसे समय विन्दुओं का अध्ययन करके ये पता किया जा सकता है कि यह तनावी मानसिकता किसमें कितने समय के लिए है जिसके जीवन में कुछ वर्षों के लिए है वो किस उम्र या किस  वर्ष में होगी  साथ ही इससे बचने के लिए क्या कुछ सावधानी बरती जानी चाहिए आदि पर व्यापक रिसर्च की आवश्यकता है । इन्हें कोई नमस्ते करे तो तनाव न करे तो तनाव ।किसी के नमस्ते करने से इस बात का तनाव कि कोई स्वार्थ होगा तभी ऐसा कर रहा है और नमस्ते न करने से इन्हें लगता है वो घमंडी  हो गया है। आफिस में या घर में इनकी आज्ञा लेकर कोई काम करे तो इन्हें चमचा गिरी लगती है और इनसे बिना पूछे करे तो इन्हें लापरवाह घमंडी आदि वो सब कुछ लगता है जिससे अपना तनाव बढ़ाया जा सके !
      ऐसे लोग अपने इतने बड़े शत्रु स्वयं होते हैं कि ये अपनों पर तो शक करते ही रहते  हैं साथ ही इन्हें अपनी कार्यक्षमता पर भी हमेंशा शक बना रहता है किंतु ऐसी बातें ये मन खोलकर कभी किसी के सामने रखते नहीं हैं केवल अंदर ही अंदर सहते रहते हैं ऐसे लोग अपने  गलत चिंतन से तैयार हुआ दिमागी कूड़ा कचरा खुद ढोया करते हैं इन्हें अपने को अकारण व्यस्त और सम्मानित मानने की लत होती है बहुत काबिल समझते हैं अपने को इसीलिए इन्हें एक एक करके धीरे धीरे अपने लोग छोड़ते चले जाते हैं। यहाँ तक कि पति पत्नी और बच्चों के संबंध भी इतने अधिक बोझिल हो जाते हैं कि कुछ को ये छोड़ देते और कुछ इन्हें छोड़ देते हैं यदि सामाजिक सम्मान प्रतिष्ठा धन दौलत मान मर्यादा आदि बहुत अच्छी हुई तो परिवार के लोग दिखावटी रूप से तो जुड़े रहते हैं किंतु मन से औरों के प्रति समर्पित हो जाते हैं उसका भी  इन्हें तनाव होता है ऐसे तनाव प्रिय लोग अपनी सोच के कारण अपने घर को एक घोसला बना लेते हैं जहाँ रात्रि में केवल सोने के लिए इकट्ठे होते हैं बाकी उनकी सारी  सुख सुविधाएँ दूसरों पर आश्रित एवं घर से बाहर होती हैं । 
       ऐसे लोग सुखों एवं अपनेपन  के अभाव में आजीवन तड़पते रहते हैं इनकी मदद के लिए समय विज्ञान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और इन्हें भी सामान्य जीवन की सुख सुविधाओं का एहसास करवा सकता है भविष्य का भय हर किसी को रहता है  हर कोई जानना चाहता है कि हमारे जीवन में कल क्या होगा !और यह जानना जरूरी भी है !भविष्य के विषय में ये पता हो कि हम अपने जीवन का विकास करने के किस क्षेत्र में कितना बढ़ सकते हैं तो वो उस सीमा में अपने को समेटने की कोशिश करता है या उससे अधिक जो प्रयास भी करता है उनसे बहुत अधिक आशा नहीं रखता है मिल जाए तो अच्छा और न मिल जाए तो विष तनाव नहीं होता !


आजकल मानसिक तनाव बहुत बढ़ता जा रहा है असहिष्णुता इतनी की छोटी छोटी बातों पर तलाक हो रहे हैं किसी को किसी की बात बर्दाश्त ही नहीं है पति पत्नी में आपसी तनाव के कारण एक दूसरे को देखकर ख़ुशी नहीं होती ! जीवन साथी की बुरी बातें, बुरी आदतें,बुरे आचार व्यवहार आदि हमेंशा याद बने रहने के कारण लोग मानसिक नपुंसकता के शिकार होते जा रहे हैं ऐसे में वो अपने जीवन साथी के साथ खुश नहीं हैं ऐसे में उनके शारीरिक संबंध प्रभावित हो रहे हैं इससे  दिमागी तनाव बढ़ता है उससे नींद नहीं आती है नींद न आने से पेट ख़राब रहता है पेट खराब रहने से भूख नहीं लगती है कुछ खाने का मन नहीं होता है जब तीन सप्ताह ऐसा रह जाता है तो गैस बनने लगती है ये गंदी गैस ऊपर को चढ़ कर हृदय में पहुँचती है इससे घबड़ाहट बेचैनी हार्टबीट आदि बढ़ने लगती है ब्लड प्रेशर जैसी दिक्कतें बढ़ने लगती हैं ! जब यही गैस और ऊपर जाकर मस्तिष्क में चढ़ती है तो शिर में दर्द होना चक्कर आना ,आँखों में जलन या आँखों के आगे अचानक धुँधला दिखाई पड़ना या अँधेरा छा जाना,शरीर में अचानक झटका सा लग जाना,ऐसा समझ में आना जैसे कोई अपने ऊपर बैठ गया हो या पास से निकल गया हो इससे भूतों का भ्रम होना ,कानों में आवाजें आने लगना ,मसूड़ों में दर्द होना सूजन हो जाना ,मुख के अंदर छाले पड़ना या घाव होने लगना ,जीभ में बलगम लिपटा रहना मुख से दुर्गंध आने लगना,बाल फटना ,सफेद होना ,झड़ना उलटी लगना,त्वचा ढीली पड़ने लगाना,झुर्रियाँ पड़ने लगना,आँखों के आसपास काले घेरे होने लगना आँखों के नीचे गड्ढे पड़ने लगना,गर्दन और कंधों में जकड़न होने लगना,महिलाओं के मुख पर बाल उगने लगना, सीने एवं कंधों पर मांस बढ़ने लगना पेट के ऊपरी भाग में जलन होते होते गले तक पहुँचने लगना ,दबाने से बायीं और दायीं छाती से निचे पेट के ऊपर ज्वाइंट में दर्द होने लग्न या कुछ अड़ा सा प्रतीत होने लगना होने लगना ! 6 महीने तक यदि ऐसा ही चलता रहा तो मांस बढ़ने लगाना पेट लटकने लगना,कमर चौड़ी तथा जाम होने लगना ,जाँघें भारी होने लगना,घुटने जाम होने लगना ,हड्डियों के जोड़ बजने लगना, तलवों सहित पूरे शरीर में जलन होने लगना आदि दिक्कतें होने लगती हैं !ऐसी दिक्कतें बढ़ने पर पीड़ित स्त्री-पुरुष थर्मामीटर से नापते हैं तो बुखार नहीं होता वैसे शरीर जला करता है शरीर में दिन भर टूटन होती है उठकर कहीं चलने का मन नहीं होता किसी से मिलने बोलने का मन नहीं होता है किसी शादी विवाह उत्सव आदि में जाने  मन नहीं होता किसी से आँख मिलने की हिम्मत नहीं पड़ती ! ऐसे स्त्री-पुरुष मेडिकली चेकअप करवाते हैं तो प्रारम्भ में तो कोई खास बीमारी नहीं निकलती है किंतु इन परिस्थितियों पर यदि समय रहते नियंत्रण न किया जाए तो इन्हीं कारणों से बीमारियाँ धीरे धीरे बनने और बढ़ने लगती हैं !ऐसे लोग अपने को असमय में बूढ़ा होने का अनुभव करने लगते हैं किंतु इस अनचाहे बुढ़ापे को रोकने के लिए या इसे न सह पाने के कारण ये बचे खुचे बाल काले करने लगते एवं भारी भरकर मेकअप करने लगते हैं किंतु उससे और कुछ तो होता नहीं वो श्रृंगार और चिढ़ाने सा लगता है क्योंकि उसमें सजीवता नहीं आ पाती है धीरे धीरे अपने को भी झेंप लगने लगती है !
     कुल मिलाकर ऐसी सभी परेशानियाँ दिनोंदिन बढ़ती चली जाती हैं इसमें चिकित्सकीय इलाज से काम चलाऊ  सहयोग तो मिलता है किंतु वो स्थाई नहीं होता है थोड़े दिन बाद फिर वैसा ही हो जाता है दूसरी बात छोटी छोटी बीमारियाँ इतनी अधिक हो जाती हैं कि दवा किस किस की लें साथ ही बहुत सी बीमारियों का भ्रम बहुत अधिक बढ़ जाता है बड़ी से बड़ी बीमारी किसी के मुख से या न्यूज में सुनने पर ऐसे लोग उस बड़ी से बड़ी बीमारी के लक्षण अपने अंदर खोजने लगते हैं मानसिक दृष्टि से ये इतने अधिक कमजोर हो जाते हैं कई बार बात बात में या बिना बात के सकारण या अकारण रोने लग जाते हैं ऐसे स्त्री पुरुष !
       ऐसे लोगों पर कोई भी इलाज बहुत अधिक कारगर नहीं होते हैं इलाज की प्रक्रिया तो ऐसी है कि आप गैस बताएँगे तो वो गैस की गोली दे देंगे ,दाँत दर्द बताएँगे तो दाँत दर्द की गोली दे देंगे किंतु ये पर्याप्त इलाज नहीं है धीरे धीरे वो भी यही बताने लगेंगे कि सलाद खाओ,पानी अधिक पियो ,सैर करो,कहीं घूमने फिरने जाया करो मौज मस्ती  करो आदि आदि ! इससे आंशिक लाभ तो होता है किंतु वो स्थाई नहीं होता और बहुत अधिक कारगर नहीं रहता है थोड़े दिन बाद फिर वैसे ही हो जाते हैं क्योंकि ये सब उपाय बहुत अधिक कारगर नहीं रहते !कि किंतु भी बहुत अधिक कारगर नहीं होते
पेट में शांत करने के लिए पति पत्नियों के आपसी शांत करने के लिए बीमारियाँ
 

Friday, September 9, 2016

साधूसंतों और नेताओं में चरित्रवान लोग खोजे जाएँ वही बचा सकते हैं अब देश और समाज !

    जिनके चरित्र की चर्चा सुनकर बिगड़ रहे हैं देश के बच्चे !उन्हें नेता साधू संत शिक्षक या अधिकारी मानने का मन ही नहीं करता !इन पर विश्वास करना दिनों दिन कठिन होता जा रहा है ! 
      देश का बचपन बचाने की सशक्त पहल की जरूरत है अन्यथा "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ"कहने से कुछ नहीं होगा ! बेटियों को बचाना और पढ़ाना तो दूर उनकी जीवन रक्षा भी होती अब तो कठिन दिख रही है सरकारी सुरक्षा उनकी रक्षा करने में सफल नहीं है और सरकारी शिक्षक इतने पढ़े लिखे कहाँ होते हैं कि बेटियों को पढ़ा लें वो बुद्धू शिक्षक अपने बच्चे खुद प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं !
     बड़े से बड़ा अपराधी या तो किसी नेता का ख़ास होगा या किसी बाबा का इनकी मदद के बिना अपराध कर पाना आसान है क्या !
      आप थोड़ा सा कोई गलत काम करके देखिए अगले दिन ही कोई सरकारी बाबू आपके दरवाजे आकर खड़ा हो जाएगा आपको रोकने के लिए नहीं किंतु आपसे हफ्ता महीना आदि माँगने इसका मतलब है कि लगभग सभी प्रकार के अपराधों की जानकारी सरकारियों की जेब में हो होती है किंतु जब तक वो पैसे देते हैं तब तक वो निर्भय विचरण करते हैं किंतु जिस दिन वे बेचारे घूस न दे पाए उसी दिन सरकारी कमाऊपूत उसे पकड़ कर ऐसे खड़े होते हैं जैसे कोई कायर किसी सिंह को पकड़ने में सफल हो गया हो !उसकी ऐसे जाँच करने का नाटक किया जाता है जैसे मंगल ग्रह पर पानी खोज रहे हों !कुल मिलाकर कार्यवाही केवल भोले भाले और भले लोगों पर होती है बाकी  जितने असली अपराधी हैं उनकी ओर देखता कौन है !यही कारण है कि कोई भी आम आदमी व्यापार  शुरू तो कर लेता है किंतु चला कम ही लोग पाते हैं वहीँ नेताओं और बाबाओं के बड़े बड़े संस्थान स्कूल कालेज फैक्ट्रियाँ आदि केवल चल ही नहीं रही हैं अपितु दौड़ रही हैं आखिर कैसे !
    जितने बाबा अपराधों में पकड़े गए सब करोडों अरबोंपति निकले आखिर कैसे !जिनकी जाँच ही नहीं हुई वे पकड़े कैसे जाते जो नहीं पकड़े गए वो निकलते कैसे !जिन बाबाओं के बस का कमाना नहीं था किंतु खाने के शौकीन थे वे बाबा बने थे खाने के लिए किंतु वे अकर्मण्य लोग अचानक व्यापारी बन जाएँ ये बात समझ के बाहर की है !दूसरी बात यदि वे इतने ही काबिल थे तो जब उन्हें करना ही व्यापार था तो उन्होंने संन्यास को बदनाम क्यों किया पहले से ही व्यापार करने लगते किसने रोका  था उन्हें !किंतु व्यापार करने के लिए जो पाप करना जरूरी था वो करने की अघोषित छूट  या तो नेताओं को होती है या फिर बाबाओं को !व्यापार के लिए जुटाई जाने वाली जरूरी फंडिंग दूसरी बात व्यापार में घाटा हो जाने पर उसकी भरपाई की धनराशि बाबा धर्म के नाम पर समाज से माँग लेते हैं और नेता पार्टी फंड के नाम पर इकठ्ठा कर लेते हैं और फिर शुरू कर देते हैं व्यापार !कुल मिलाकर सारा फायदा उनका और घाटा समाज का !
    कई महाभ्रष्ट बाबाओं को तो यहाँ तक कहते सुना जाता है कि मैं एक ग्लास गाय का दूध पीकर रहता हूँ केवल !अरे !यदि वे इतने ही विरक्त होते तो इतने सारे प्रपंचों में फँसते क्यों ? वे कहते हैं हम ब्रह्मचारी हैं जबकि उनके आश्रमों में सैकड़ों महिलाएँ भी रहती हैं जिनमें कुछ के बच्चे बाबा जी के अपने होते हैं और कोई समझ भी नहीं पाता है कि बाबा जी गृहस्थ हैं जो महिला घरेलू कलह से तंग आकर शांति की तलाश में किसी आश्रम पहुँची तो बाबा जी को केवल एक बात ही कहनी होती है कि आपके पति के संबंध किसी और से हैं तो तू क्यों उसके चक्कर में पड़ी है ऐसा समझा  कर रख लेते हैं रखैल बनाकर !उन्हीं के बच्चों के लिए भूत बनकर कमाते रहते हैं बाबा जी !
    ये बेईमान झुट्ठे कहते हैं कि हम चैरिटी करते हैं और अरबों रूपए कमा रहे होते हैं !चैरिटी में कहीं कमाई होती है क्या !यही हाल नेताओं का है !ये दोनों भरोसा करने लायक ही अब नहीं रहे हैं !चरित्रवान ईश्वर भक्त साधूसंत और देश भक्त नेता मुश्किल से ही ढूँढे  मिलते हैं आज कल !
  आपको जो व्यक्ति चरित्रवान कर्मठ ईमानदार परिश्रमी देशभक्त आदि लगे उसे किसी राजनैतिक पार्टी में सम्मिलित कराने के लिए ले जाओ या तो उसे पार्टी से जोडेंगे नहीं विशेष दबाव में यदि जोड़ना पड़ा भी तो अंदर ही अंदर उसे इतना अधिक सताएँगे कि थोड़े दिनों में वो स्वयं भाग खड़ा होगा अन्यथा राजनैतिक नपुंसकता का शिकार होकर वहीँ पड़े पड़े दफन हो जाएगा ! 
    बिना किसी ब्यवसाय के राजनैतिक क्षेत्र के लोगों की संपत्ति बढ़ने का रहस्य आखिर क्या है ?चरित्र निर्माण के लिए दंभ भरने वाले बाबा लोग आज चरित्र संकट से जूझ रहे हैं!आरक्षण की नीतियों से निरपराध एक वर्ग दबाया कुचला जा रहा है !फिर भी हम सबसे सक्षम लोकतांत्रिक देश हैं यह इस देश के आम आदमी की सहन शीलता का ही परिणाम है !मुझे चिंता है कि जिस दिन आम जनता के धैर्य की नदी के तट बंध टूटेंगे उस दिन कौन सँभालेगा यह लोकतांत्रिक देश !आखिर कब सहेगा आम आदमी !
     वैसे तो आधुनिक संतों और नेताओं में बहुत सारी समानताएँ  होती हैं जैसे रैलियॉं दोनों के लिए जरूरी होती हैं।अपनी अच्छी बुरी कैसी भी बात को समाज पर जबरदस्ती थोपने के लिए भीड़ का सहारा लेना पड़ता है।भीड़ को बुलाया तो कुछ और समझा करके जाता है, भाषण किसी और बात के दिए जा रहे होते हैं, उद्देश्य  कुछ और होता है,परिणाम कुछ और होता है। इसीप्रकार रैली में सम्मिलित होने वाले लोग भी समझने कुछ और आते हैं किंतु समझकर कुछ और चले जाते हैं।जहॉं तक भीड़ की बात है। भीड़ तो पैसे देकर भी इकट्ठी की जा रही है वो समाज का प्रतिनिधित्व तो नहीं कर सकती।जो पैसे देकर भीड़ बुलाएगा वो भीड़ से ही पैसे कमाएगा भी। तो राजनीति या धर्म में भ्रष्टाचार तो होगा ही। किसी भी प्रकार का आरक्षण या छूट के लालची लोग अथवा कर्जा माफ करवाने के शौकीन लोग भ्रष्ट नेताओं को जन्म देते  हैं।इसी प्रकार बहुत सारा पापकरके  पापों से मुक्ति चाहने वाले चतुर लोग ही भ्रष्ट बाबाओं को जन्म देते हैं।ऐसी परिस्थिति में धर्म और राजनैतिक भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार आखिर कौन ? 
      उसे पकड़े और सुधारे  बिना भ्रष्टाचार के विरुद्ध खोखले नारे लगाने, नेताओं की तथाकथित पोल खोलने से कुछ नहीं होगा।जब तक भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट बाबाओं के विरुद्ध संयुक्त जनजागरण अभियान नहीं चलाया जाएगा।तब तक इसे मिटा पाना संभव नहीं है,क्योंकि भ्रष्टाचार सोचा मन से और किया तन से जाता है।सोच पर लगाम लगाने के लिए धर्म एवं उसकी क्रिया पर लगाम लगाने के लिए कानून होता है।धर्म तो धार्मिक लोगों के आधीन एवं कानून नेताओं के आधीन हो गया है। ऐसे में किसी एक पर लगाम लगाने पर भी अपराध पर अधूरा नियंत्रण हो पाएगा जो उचित नहीं है।


     नेता और तथाकथित संतों में बहुत सारी समानताएँ  होती हैं इन बाबाओं के पास ईश्वरभक्ति नहीं होती है। और नेताओं में देश भक्ति नहीं होती है।जनता को दिखा कर ठगने के लिए एक देश भक्ति की बातें करता है तो दूसरा ईश्वर भक्ति की किंतु दोनों भ्रष्टाचारी हैं दोनों अपनी आमदनी के स्रोत प्रूफ नहीं कर सकते !दोनों को काम करते किसी ने नहीं देखा होगा !एक पाप का भय दिखाकर समाज को लूटता है तो दूसरा कानून का जबकि लुटेरे दोनों है एक स्वर्ग पहुँचाने का सपना दिखाकर यौन शोषण करता है तो दूसरा सत्ता की सुख सुविधाएँ प्रदान करने का सपना दिखाकर यौन शोषण करता है दोनों ही भ्रष्टाचारी बदमाश अपने  अनुयायिओं की भीड़ के बल पर फूलते हैं। भीड़ देखकर दोनों  ही पागल हो जाते हैं चाहें वह किराए की ही हो।अनाप सनाप कुछ भी बोलने बकने लगते हैं।दोनों को लगता है कि सारा देश  उनके पीछे ही खड़ा है।दोनों की गिद्धदृष्टि  पराई संपत्ति सहित पराई सारी चीजों को भोगने की होती है।दोनों वेष  भूषा  का पूरा ध्यान रखते हैं एक नेताओं की तरह दिखने की  दूसरा महात्माओं की तरह दिखने की पूरी कोशिश   करता है। दोनों रैलियॉं करने के आदी होते हैं।दोनों मीडिया प्रेमी होते हैं इसलिए पैसे देकर भी दोनों टी.वी.टूबी पर खूब बोलते हैं।बातों में दम हो न हो पैसे का दम जरूर दिखता है पैसे के ही बल पर बोलते हैं। नेता जब भ्रष्ट  होता है तो कहता कि यदि ये आरोप सही साबित हुए तो संन्यास ले लूँ गा।जैसे उसे पता हो कि भ्रष्ट लोग ही संन्यासी होते हैं।मजे की बात यह है कि संन्यासी चुप करके सुना करते हैं कोई विरोध दिखाई सुनाई नहीं पड़ता।मानो पोलखुलने के भय से संन्यासी भयभीत हों कि कहीं कोई पोल न खुल जाए।इसी प्रकार कोई संन्यासी भ्रष्टहोता है तो नेता बन जाता है।क्योंकि   बिना पैसे ,बिना परिश्रम और बिना जिम्मेदारी के उत्तमोत्तम सुख सुविधाओं का भोग इन्हीं दो जगहों पर संभव है।   

      इसप्रकार धार्मिक लोगों की गतिविधियों को भी शास्त्रीय संविधान की सीमाओं के दायरे में बॉंधकर रखने की भी कोई तो सीमा रेखा होनी ही चाहिए। स्वामी जी रैलियॉं कर रहे हैं, आज स्वामी जी साड़ी बॉंट रहे हैं।स्वामी जी स्वदेशी  के नाम पर सब कुछ बेच रहे हैं , स्वामी जी उद्योगधंधे लगा रहे हैं, स्वामी जी चुनाव लड़ रहे हैं, स्वामी जी मंत्री भी हैं।ऐसे लोगों के पर्दे के पीछे के भी बहुत सारे अच्छे बुरे आचरण देखने सुनने को मिलते हैं।ये सब गंभीर चिंता के बिषय हैं ।

       इनकी दृष्टि में  क्या सारे पापों का कारण पत्नी ही होती है?केवल विवाहिता पत्नी का परित्याग करके या अविवाहित रह कर हर कुछ कर सकने का परमिट मिल जाता है इन्हें ?वो कितना भी बड़ा पाप ही क्यों न हो? मन पर नियंत्रण न करने पर कैसे विरक्तता संभव  है? साधुत्व के अपने अत्यंत कठोर नियम होते हैं उन्हें हर परिस्थिति में नहीं निभाया जा सकता है जबकि राजनीति हर परिस्थिति में निभानी पड़ती है। अपने सदाचारी तपस्वी संयमी जीवन से सारी समाज को ठीक रखने की जिम्मेदारी संतों की ही है।ऐसे में शास्त्रों एवं संतों की गरिमा रक्षा के लिए शास्त्रीय विरक्त संतों को ही आगे आकर यह शुद्धीकरण करना होगा। साथ ही तथाकथित बाबाओं  पर लगाम कैसे लगे?यह संतों को ही सोचना होगा।जो धार्मिक व्यवसायी लोग कहते हैं कि हमारा गुरुमंत्र जपो सारे पाप नष्ट हो जाएँगे इसका मतलब क्या यह नहीं निकाला जा सकता है कि ये पाप करने का परमिट बाँट रहे हैं ?कितना अभद्र है यह बयान ?         
     जैसे स्वामी जी के किसी प्रवचन में एक पति पत्नी सतसंग करने गए थे पैसे पास नहीं थे काम धाम चलता नहीं था।सोचा चलो सतसंग से ही शांति मिलेगी। वहॉं जाकर सजे धजे मजनूँ टाइप के बाबा को मुख मटका मटका कर नाचते गाते बजाते या या तथा कथित प्रवंचन करते देखा, बहुत सारा सोना पहने बाबाजी और बहुत सारा ताम झाम देखकर उसने सोचा बाबाजी का भी कोई उद्योग धंधा तो है नहीं ,बाबा जी ने  समझादारी से काम लिया है।इस देश  की जनता धर्म केवल सुनना चाहती है सुनाओ दिखाओ अच्छा अच्छा करो चाहे कुछ भी! जो इस देश की जनता को पहचान सका उसने पेट हिलाकर पैसे बना लिए कौन पूछता है कि बाबाजी योग के विषय में आप खुद क्या जानते हैं?बाबाजी को धर्म की बात बताना आता है करते चाहें जो कुछ भी हों इस पर जनता का ध्यान नहीं जाता है। जब बाबाजी का भी कोई उद्योग धंधा तो है नहीं तो बाबा जी ने भी कुछ किया नहीं तो धन आया कहॉं से?आखिर जनता को भी पता है।वैसे भी जो लोग हमारा पेमेंट नहीं देते वो बाबा जी को फ्री में क्यों दे देगें?अब मैं भी वही करूँगा और उसने भी बाबा बनने की ठानी इसप्रकार वह भी अच्छा खासा अपराधी बन गया।क्योंकि अब उसका लक्ष्य धन कमाना ही हो गया था।इसी प्रकार तथाकथित सतसंगों के कई और भी कुसंग होते हैं। इसी जगह यदि किसी चरित्रवान संत का संग होता है तो कई जन्म के कुसंगों का दोष  नष्ट भी हो जाता है किन्तु ऐसे कुसंगों के कारण ही बसों में बलात्कार हो रहे हैं।यदि इन्हें सत्संग माना जाए तो बढ़ रही सतसंगों की भीड़ें आखिर 
सतसंगों से सीख क्या रही हैं ?अपराधों का ग्राफ दिनों दिन बढ़ता जा रहा है इसका कारण आखिर क्या है ?
     इसी प्रकार नेताओं की एक बार की चुनावी विजय के बाद हजारों रूपए के नेता करोड़ों अरबों में खेलने लगते हैं।इन्हें देखकर भी लोग सतसंगी लोगों की तरह ही बहुत बड़ी संख्या में प्रेरित होते हैं।ईश्वर भक्त संतों एवं देश भक्त नेताओं के दर्शन दिनों दिन दुर्लभ होते जा रहे हैं।बाकी राजनेताओं की बिना किसी बड़े व्यवसाय के दिनदूनी रात चैगुनी बढ़ती संपत्ति सहित सब सुख सुविधाएँ  बढ़ते अपराधों की ओर मुड़ते युवकों के लिए संजीवनी साबित हो रही हैं ।