Tuesday, August 15, 2017

अपराधियों की अपराध की कमाई जाती कहाँ है ?लाखों रूपए की लूट ! लूटे हुए सोने चाँदी आभूषण !

अपराधियों की अपराध की कमाई जाती कहाँ है ?
    लाखों रूपए की लूट के आरोप जिन पर लगाए जाते हैं वे तो भूखे नंगे ही दिखाई पड़ते हैं उनके घरों एवं घर वालों की हालत खस्ता होती है आखिर कहाँ जाते हैं वे लूटे हुए सोने चाँदी आभूषण !दूसरी ओर बड़े बड़े नेताओं अधिकारियों के पास आय से अधिक होने वाली सम्पत्तियों के स्रोत पता नहीं चलते कहीं उनकी संपत्ति इकट्ठी करने के भूख ही तो इन बेचारे गरीबों को अपराधी तो नहीं बना देती है नेताओं और अफसरों की सम्पत्तियों की इस दृष्टि से भी जाँच की जानी चाहिए ताकि बढ़ते अपराधों पर लगाम लगाई जा सके !
     बड़े बड़े नेताओं या बड़े बड़े अधिकारियों के यहाँ से चोरी गई चीजें मिल भी जाती हैं भैंसें तक मिल जाती हैं जिनमें कोई खास पहचान नहीं होती है उनके अपराधी भी पकड़ जाते हैं क्यों ? अपराधियों और सरकारी मशीनरी में कोई साँठ गाँठ होती है क्या ?जिसे वे पकड़ना चाहते हैं वो मिल जाता है अन्यथा .... !
   अपराधी जो धन कमाते हैं वो जाता  कहाँ है उनके घर में दिखता नहीं शरीर पर कुछ होता नहीं बच्चे फटीचर बने रहते हैं फिर वो धन उनके आका लोग ही तो नहीं खा जाते हैं बड़े बड़े नेताओं और अधिकारियों की अकूत सम्पत्तियों के संग्रह में अपराधियों का कितना योगदान है इस पर भी सघन जाँच की जानी चाहिए !
    अपराधी लोग आपराधिक कमाई करने के बाद भी प्रायः गरीब ही बने रहते हैं किंतु अपराधियों को पकड़ने के लिए जिम्मेदार अधिकारी मालामाल हो जाते हैं क्यों ?कहाँ से आती हैं उनके पास इतनी संपत्तियाँ !इसमें सरकार सम्मिलित नहीं है तो जाँच कराए निकलेंगे अपराधों के बड़े बड़े मगरमच्छ !यदि सरकार भी हिस्सा लेती है तो चुप बैठे भ्रष्टाचार के विरुद्ध शोर क्यों मचाती है सरकार ?
     जिसकी जब नौकरी लगी थी तब कितनी संपत्ति थी उसके पास और आज कितनी है ?सैलरी कितनी मिलती है ?बाकी संपत्ति  आई कहाँ से ?उसकी जाँच हो और दोषियों पर कार्यवाही की जाए !निर्दोष कर्मचारियों को प्रोत्साहित किया जाए !
   अवैध संपत्ति प्रकरण में जनता मुख्य दोषी है ही नहीं फिर क्यों धमकाया जा रहा है जनता को !
    अवैध संपत्तियों से या अवैध काम काज से सबसे अधिक पैसा कमाया है उसे रोकने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों कर्मचारियों ने उन्होंने अकूत संपत्तियाँ कमाई हैं इस अवैध कारोबार से !सरकार जाँच करवाकर ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों कर्मचारियों  की   संम्पत्तियाँ जप्त क्यों नहीं करती है साथ ही आज तक दी गई सैलरी उनसे वसूले सरकार !उसके बाद अवैध सम्पत्तियों के लिए जनता को दोषी माना जाए तब हो जनता पर कार्यवाही !ऐसे प्रकरणों में जनता मुख्य दोषी है ही नहीं फिर क्यों धमकाया जा रहा है जनता को !
   सरकार चाह ले तो अपराध रोके भी जा सकते हैं किंतु अपराध रुकने से जिनका घाटा होने लगता हैं वे रुकने ही नहीं देते !अपराधी बेचारे क्या करें !एकबार संग साथ में पढ़ कर धोखे से अपराधियों की श्रेणी में नाम चढ़ गया तो अब तो करने ही पड़ेंगे अपराध ,अपने लिए न सही तो भाड़े के अपराध तो करने ही पड़ेंगे उन्हें अन्यथा भोगेंगे !गरीबों का साथ कब देता है कानून !चाकू खरभुजे पर गिरे या खरभूजा चाकू पर कटेगा खरभूजा ही ऐसे ही सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों  से कानूनी मदद की आशा ले कर जाने वाले गरीब लोग या तो निराश होकर लौटते हैं या फिर अपराधी बनने का संकल्प लेकर !
       अब तो देश का बच्चा मानता है कि जिस काम के लिए जो अधिकारी रखे गए हैं वो काम इसलिए नहीं होता है कि काम के स्थानों पर आराम के इंतजाम सरकार ने इतने अधिक करवा रखे हैं कि आफिस पहुँचते ही नींद आने लग जाती है|संतरी कह देता है कि साहब मीटिंग में हैं !जनता उनसे कुछ पूछने की हैसियत नहीं रखती और सरकार के पास इतना पता करने का न समय है न जरूरत !इसलिए सरकारी कार्यालय आजादी से आजतक सोते चले आ रहे हैं !कर्मचारियों की सैलरी पेंसन  सरकार खाते में पहुँचाती जा रही है |सरकार का निगरानी तंत्र इतना नाकाम है कि जो बिल्कुल काम न करे उसकी भी शिकायत सरकार तक कैसे पहुँच पाएगी और कौन पहुँचा पाएगा !   
     जिस कम्प्लेन  की जाँच करने कर्मचारी जाते हैं वहाँ जो जो घूस देता है वो निर्दोष होता है और जो नहीं देता है सारा दोष उसी के मत्थे मढ़कर उसी के विरुद्ध भेज देते हैं रिपोर्ट !
      रही बात सरकारों में उच्च पदों पर बैठे नेता लोग उन्हें केवल दो जिम्मेदारी सँभालनी होती हैं पहली मीडिया में कुछ अच्छा बोलने के लिए जिससे जनता का ध्यान भटकाया जा सके तो दूसरा गरीबों की भलाई करने के लिए हो हल्ला मचाया जा सके क्योंकि वोट काम करके नहीं अपितु दूसरों को बदनाम करके आसानी से लिया जा सकता है | जनता की आँखों में धूल झोंककर ही लेना होता है वोट !उसके प्रयास में संपूर्ण समय लगे रहते हैं नेता लोग !
   आजादी के बाद आजतक सरकार के नाम पर ऐसे ही खेल खेले जा रहे हैं !काम के लिए जनता पार्षद के पास जाती है विधायक सांसद मंत्री मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री तक सबके पास जाती है जो मिलता है उससे मिल लेती है जो नहीं मिलता है वहाँ से लौट आती है !जनता के काम करने के लिए अधिकारी कर्मचारी स्वतंत्र होते हैं वो काम करें न करें !जनता का दबाव वो क्यों मानेंगे आखिर अधिकारी हैं जनता की क्या औकात जो उन पर दबाव डाले और सरकार दबाव डालेगी क्यों ?उसका अपना तो कोई काम रुकता नहीं है | वैसे भी सरकार की नैया डुबाने तारने वाले वही होते हैं | 
    आजादी के बाद आजतक इसी गैरजिम्मेदारी के साथ घसीटा जा रहा है लोकतंत्र किसी विभाग में कोई जिम्मेदारी समझता ही नहीं है | सरकार तो सरकार है सरकार जनता के कामों से सरोकार रखे तो सरकार किस बात की !प्रधानमंत्री जी तरह तरह की घोषणाएँ तो किया करते हैं योजनाएँ बना बना कर परोसा करते हैं किंतु उनकी बात उनके अधिकारी कर्मचारी मानते कितनी हैं इस सच को तो केवल जनता ही  समझती है जिसे हमेंशा फेस करना पड़ता है ! वो यदि अपनी पीड़ा बताना भी चाहे तो बोलने बताने के लिए माध्यम बहुत हैं  किंतु शिकायत कहीं भी भेजो तो न कार्यवाही होती है और न ही जवाब आता है | न जाने सरकार कहाँ रहती है और कितनी जागरूकता से काम कर रही है जो जिनके लिए काम कर रही है उन्हें ही बताना पड़ रहा है कि हम काम कर रहे हैं |
     सुना है कि सोशल साइटों में तो केवल सरकार एवं सरकार में बैठे लोगों की निंदा करने संबंधी बातों पर ही ध्यान दिया जाता है उन्हीं का संग्रह किया जाता है और उन्हीं पर कार्यवाही की जाती है बाकि अपनी जरूरत की बातें कोई कितनी भी लिखता रहे ध्यान ही नहीं दिया जाता है न कोई जवाब आता है |  तब से मैंने भी लेटर लिखने बंद कर दिए पहले तो मैं भी लिखा करता था किंतु सच्चाई समझने के बाद मन ही नहीं हुआ लिखने का | रही बात जनता की तो जनता बेचारी तो बनी ही भटकने के लिए है भटका करती है सरकार के इस द्वार से उस द्वार तक शायद कहीं उसकी भी आवाज सुन ली जाए किंतु जनता को जीवित मानने वाले हैं कितने नेता अधिकारी कर्मचारी लोग !!   



No comments:

Post a Comment