Thursday, November 7, 2013

सेक्सालु लोग प्यार का नाटक क्यों करते हैं ?


 प्यार किया जिस जिस ने अब तक मर मर कर जीवन पाता है । 

तभी    पुराने  जख्म    भूलता    नया     जख्म जब हो जाता है ॥ 

प्रेम     पंथ    जख्मों   की दुनियाँ   सभी     बेहोशी   में  जीते हैं । 

प्रेम   मूर्च्छितों   को    जब     देखो     बेचारे    आँसू    पीते   हैं ॥ 

हँसना     रोना     आहें     भरना     घुट    घुट कर जीना होता है ।

अच्छी    भली    जिंदगी    चौपट    करके    सब   पीना होता है ॥ 

इसीलिए  इस प्रेम जाल    में    फँसने    की      मज़बूरी    क्या  !

जीवन    को     अच्छे    से    जीओ     सड़ते    ब्यर्थ जरूरी क्या ?

जिन्हें   प्रेम    के  भूत     लगे    उनके    जीवन    बेस्वाद   हुए  । 

माता     पिता     भाई     बहनें     बीबी      बच्चे    बरबाद   हुए ॥ 

किसी  एक   की   बलि   लेकर  ही   सदा प्रेम खुजली मिटती  है !

प्रेम    न    है,   है   सेक्स   भावना   घी   से   कहीं आग बुझती है ?

                         निवेदक -डॉ.एस.एन. वाजपेयी 

                 संस्थापक -राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान

Wednesday, November 6, 2013

भाजपा न जाने खोई खोई क्यों रहती है ?

  भाजपा को इससे अच्छा मौका और कब मिलेगा ?

        बिना कुछ काम किए भी जिस काँग्रेस को अपनी बारी आने पर बिना प्रयास किए ही सत्ता मिल जाती हो  उसका उन्मत्त होना स्वाभाविक ही है इसीलिए संभ्रांत वर्ग काँग्रेस से बहुत पहले ही निराश हो चुका था क्योंकि उसे पता है कि इन्हें कुछ करना ही होता तो बहुत बार सत्ता में रह चुके हैं अब तक कभी का  कर लेते! इसलिए  या तो इनके बश की बात नहीं है या इन्हें पता नहीं है कि करना क्या और कैसे है या फिर ये लोग कुछ करना ही नहीं चाहते हैं !इन्हें पता है कि जब हमारी बारी आएगी तब हमें सत्ता स्वयं ही मिल जाएगी इसलिए क्यों कुछ करना !किन्तु अबकी बार देश काँग्रेस से मुक्ति पाने का मन बना चुका है किन्तु इसका  अर्थ ये कतई नहीं है कि देश का झुकाव  भाजपा की ओर हो रहा है और न ही भाजपा को सन 2009  के चुनावों की तरह अपनी बारी के इंतजार में ही भाग्य के भरोसे बैठना चाहिए अन्यथा काँग्रेसी सरकारों की फीडर पार्टियाँ चुनावों  से कुछ पूर्व सरकार  से अलग होकर काँग्रेस की  बुराई करके विपक्ष की भूमिका निभा लेती हैं और सरकार के विरोधी वोट पर कर लेती हैं अपना कब्ज़ा और ये सारा पत्रं पुष्पं  लेकर चढ़ा देती हैं काँग्रेस के चरणों में इस प्रकार बदले में माँग लेती हैं कोई अभय वरदान ! इसी  प्रकार से बन जाती है उनकी सरकार और भाजपा अगले चुनावों की प्रतीक्षा में अपनी बारी की आशा लगा कर दिन बिताने लगती है मन मारकर!फिर कब चुनाव आएँगे कब मेरी बारी आएगी किन्तु चुनाव आते हैं काँग्रेस फिर मार ले जाती है दाँव भाजपा फिर देख़ती  रह जाती है ।आखिर चक्कर क्या है ?

      मेरी समझ में सबसे बड़ी बात यह है कि जहाँ जहाँ  भाजपा नंबर दो पर है वहाँ वहाँ काँग्रेस जीतती नहीं है अपितु भाजपा हार जाती है इसलिए स्वाभाविक है कि काँग्रेस जीतेगी  ही !केवल आलू प्याज की  कीमतें बढ़ने पर दिल्ली की भाजपा सरकार काँग्रेसियों ने उखाड़  फेंकी थी तब से आज तक भाजपा को दिल्ली की गद्दी नसीब नहीं हुई किन्तु आज काँग्रेसियों की सरकार भगवान् दया से सारे दोषों से भरी पुरी  है फिर भी उसके विरुद्ध आज भाजपा कोई लहर नहीं बना पाई है! काँग्रेसियों की सरकार के विरुद्ध आज क्या क्या मुद्दे नहीं भाजपा के पास हैं केवल उठाने वाला चाहिए उठावे कौन?

     जो उठाने वाला था वो इस दुविधा में था कि वो मुख्य मंत्री का प्रत्याशी होगा कि नहीं इसलिए  व्यर्थ परिश्रम क्यों करे ! इसी प्रकार भाजपा की ओर से जो आज दिल्ली के मुख्य मंत्री पद का प्रत्याशी है वो तब निश्चित नहीं था जब काँग्रेस के विरुद्ध एवं भाजपा के पक्ष में लहर बनाने का समय था तो वो अकारण परिश्रम क्यों करता ? और जब प्रत्याशी निश्चित हुआ तब समय इतना कम है कि कोई लहर पैदा कर पाना सम्भव ही नहीं है इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि मानसिक रूप से पराजित हो चुकी काँग्रेस फिर से न केवल बराबरी में खड़ी हो गई है अपितु जीत के सपने भी देखने लगी है  क्या भाजपा की ओर से दिल्ली के मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी कौन होगा इस विषय का  निर्णय कुछ और पहले नहीं लिया जा सकता था ? मैं तो कहूँगा कि यह सारी  प्रबंधन की कमजोरी है जिसका दंड भाजपा के सारे कार्यकर्ताओं को भोगना पड़ता है कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है निराशा बढती है ।

    क्या क्या मुद्दे नहीं हैं आज भाजपा के पास ? सम्पूर्ण दोषों से भरी पूरी है काँग्रेसी सरकार ! कौन सा दोष नहीं है इस सरकार में ?महँगाई है , भ्रष्टाचार है,चरमराती कानून व्यवस्था है,ध्वस्त होती शिक्षा व्यवस्था है ,छिन्न भिन्न हुई चिकित्सा व्यवस्था है ,लचर डाक व्यवस्था है , उपेक्षित फोन व्यवस्था है इसी प्रकार से बलात्कार आदि सम्पूर्ण दोषों से समलंकृत इन काँग्रेसी सरकारों का कार्यकाल है फिर भी भाजपा की उदासीनता चिंतनीय है लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने में भाजपा से अधिक अरविन्द केजरीवाल ने सफलता पाई है। चुनाव शिर पर हैं भाजपा न जाने कहाँ खोई खोई रहती है !!!

 

अब पढ़िए श्री हनुमत सुन्दर काण्ड बिलकुल अलग अलग    एवं  शास्त्रीय  शंका  समाधानों  सहित!

 

Tuesday, November 5, 2013

सबसे बड़ी परेशानी कभी मोल मत लेना !

जीवन से सम्बंधित तीन  नारियों  की महती भूमिका

 1.  माता- कवच बनकर सुरक्षित रखना चाहती है 

2. पत्नी - प्रसन्नता  का एहसास कराना चाहती है  

 3. प्रेमिका -प्रसन्न रहने का आश्वासन देकर न जीने देती है न मरने !

  माता और पत्नी के सम्बन्धों  को शास्त्रों ने  पवित्र माना है किंतु प्रेमी प्रेमिकाओं के सम्बन्धों को घातक माना है उन्होंने ने कहा कि जिन दो के बीच ये सम्बन्ध बनते हैं वे यदि चल जाते हैं तो जैसे पतंगा अपने प्रेमी से मिलकर मर जाता है वैसे मरना पड़ता है और यदि प्रेम सम्बन्ध टूट जाते हैं तो जैसे पानी से अलग होकर मछली तड़प तड़प कर मरती है वैसे मरना पड़ता है !

      इसीलिए  शास्त्रों ने कहा है कि स्नेहवान् ज्वलतेनिशम्   अर्थात जब तक स्नेह रहता है तब तक जलना पड़ता है ! स्नेह के दो अर्थ होते हैं एक तेल और दूसरा प्रेम । अर्थात जब तक दीपक में तेल रहता है तब तक दीपक जलता है और जब तक किसी के मन में किसी के प्रति प्रेम रहता है तब तक वह हमेशा जलता रहता है

        इसीलिए लिए देवी भागवत में लिखा गया है कि  प्रेमी प्रेमिकाओं का हृदय  बाल  काटने वाले नाई  के  छूरे   की धार  के समान होता है कोई किसी को कभी भी काट सकता है इसलिए प्रेम सम्बन्धों से बचो सतर्क रहो कहीं किसी से प्रेम न हो जाए !

 हृदयं क्षुरधाराभं  प्रियः को नाम योषिताम् 

                                                 -   देवी भागवत 

 

      निवेदक   -       डॉ. एस. एन. वाजपेयी

   संस्थापक -राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान 

   ब्लॉगर -  स्वस्थ समाज                                

 

 

काँग्रेस से निराश देश विकल्प ढूँढ रहा है

    जब काँग्रेस से मिली निराशा ही निराशा तो भाजपा से ही क्या आशा ?
    लगता है कि काँग्रेस के पास देश के विकास की अब कोई योजना ही नहीं है !भाजपा की यह भावना ठीक नहीं है कि अभी तक काँग्रेस सत्ता में रही है इसलिए अबकी हमारी बारी है और केवल नमो नमो या नरेंद्र मोदी का नाम रटते रहने से भी कुछ नहीं होने जाने वाला है नेताओं एवं राजनैतिक दलों ने कई बार देश का विश्वर तोडा है भाजपा भी इसमें पीछे नहीं रही  है हाँ अटल जी कि सरकार  ने देश को सराहनीय अपनापन देने का प्रयास किया था किन्तु इनकी आपसी खींचतान इतनी अधिक है कि देश का निराश होना स्वाभाविक है जो अपने घर को बाँध कर नहीं रख सकता वह देश को क्या रख पाएगा ?अबकी बार ही अडवाणी जी की भावनाओं का देश में जाना,विजय गोयल की बातें मीडिया  कि सुर्खियाँ  बनना इससे भाजपा का इतना बड़ा नुकसान हो चूका है जिसकी भरपाई भाजपा इन चुनावों में नहीं ही कर सकेगी किन्तु इसका एहसास उन्हें चुनावों के बाद ही होगा तब उनके हाथ से सब कुछ निकल चुका होगा। वस्तुतः काँग्रेस से निराश देश विकल्प के रूप में भाजपा की ओर ही देख रहा था जब वो लोग आपस में ही लड़ने लगे तो परेशानी हुई काँग्रेस से निराश  लोग भाजपा से भी अकारण ही निराश होने लगे जब तक भाजपा के लोग अपना अपना मुख गंगाजल से धो कर पहुँचे कि हमारी आपस में कोई बुराई ही नहीं है हम लोग तो आपस में एकदम बड़े छोटे भाई ही हैं आदि आदि किन्तु तब तक देर हो चुकी थी। 
       
     दूसरी ओर शिक्षित संभ्रांत और गैर राजनैतिक राष्ट्रभक्त वर्ग काँग्रेस से बहुत पहले निराश हो चुका था क्योंकि काँग्रेस ने देश के लिए कभी कुछ किया ही नहीं!केवल आश्वासन ही दिए हैं वैसे भी इन्हें देश के लिए कभी कुछ करना ही होता तो ये लोग बहुत बार सत्ता में रह चुके हैं अब तक कभी का कर लेते!
    ये लोग आज भाजपा का दोष देते हैं जब भाजपा का जन्म भी नहीं हुआ था तब भी तो ये सत्ता में रहते रहे थे तब क्या कर लिया था  इन्होंने ?जब इरादा ही कुछ करने का नहीं है तो कुछ हो कैसे और करे कौन? कभी वे ऐसा कुछ नहीं कर पाए जिसके बल पर वोट माँग लेते!हर बार किन्हीं  दो वर्गों के बीच आपसी मतभेद पैदा करके चुनाव जीतने का प्रयास करते रहे हैं भले वह आरक्षण ही क्यों न हो!

       इनकी कुशासन शैली का दुष्प्रभाव ही है कि आज सरकारी डाक विभाग को कोरियर विभाग पीट रहा है  सरकारी स्कूलों को प्राइवेट स्कूल पीट रहे हैं सरकारी टेलीफोन विभाग को  प्राइवेट टेलीफोन विभाग पीट रहा  है। कितनी हालत खस्ता है देश की?यदि सच सच कहा जाए तो सरकार एवं सरकारी विभागों में फ्री में न केवल सैलरी दी जाती है अपितु समय से बढ़ा भी दी जाती है।सरकारी विभागों में काम या तो होता नहीं है यदि होता है तो बिलकुल न के बराबर होता है या यूँ कह लें कि जितना अच्छा जो काम प्राइवेट विभाग  दस रुपए में करा लेते हैं वही काम सरकारी विभाग हजार रुपए में भी न तो उतना करा पाते हैं और उतने अच्छे के विषय में तो सोचना ही क्यों? वैसे भी जिन सरकारी विभागों में प्राइवेट का विकल्प नहीं है वहाँ काम कहाँ होता है केवल दलाली ही होती है किसी के साथ कितना भी बड़ा दुष्कर्म हुआ हो किन्तु तब तक एफ.आई .आर. नहीं लिखी जाएगी जब तक उसके पास उन्हें देने के लिए पैसा या दिखाने के लिए प्रभाव न हो!सम्भव था कि यदि यहाँ भी प्राइवेट का विकल्प होता तो अन्य सरकारी विभागों की लापरवाही की  तरह ही पुलिस विभाग की लापरवाही भी कवर कर रहे होते प्राइवेट विभाग ! इससे हो सकती थी और अधिक चुस्त कानून व्यवस्था की स्थिति!

       यद्यपि सरकारी विभागों की इन लापरवाहियों के लिए केवल काँग्रेस ही दोषी नहीं है क्योंकि अन्य पार्टियों की भी सरकारें रही हैं किन्तु सबसे अधिक समय तक काँग्रेस पार्टी ही सत्ता में रही है साथ ही काँग्रेस पार्टी का मुखिया एक ही परिवार हमेंशा सत्ता का सञ्चालन करता रहा है इसलिए स्वाभाविक रूप से काँग्रेस पार्टी एवं काँग्रेस पार्टी का मुखिया परिवार दो के दोनों ही दोषी हैं बाकी  किसी काँग्रेसी व्यक्ति को मैं इसलिए दोषी नहीं मानता क्योंकि पार्टी के मुखिया परिवार का गुणगान करने के आलावा उन्होंने कभी कुछ सोचा ही नहीं है करना तो दूर की बात है!इसलिए उनसे कभी कोई गलती होने की सम्भावना ही नहीं रही है वही आज भी हो रहा है!!!

       अपने द्वेष पूर्ण अलाभकर कर्मों को छिपाने के लिए जाति गत आरक्षण आदि ऐसी हरकतें चुनाव जीतने के लिए ये लोग करते रहे हैं कि क्या कहा जाए !कभी रोटी बाँटते हैं कभी धोती बाँटते हैं इन लोगों को ये संकोच भी  नहीं लगता है कि साठ साल की सत्ता में रहने के बाद भी अभी तक तुमने रोटी धोती में ही फँसा रखा है आखिर विकास की तुमसे कोई आशा की भी जाए या नहीं या यूँ कह लें कि विकास क्या होता है तुम्हें पता भी है या नहीं ?
       आखिर आम आदमी किसी सरकारी विभाग में जाए तो उसका काम बिना घूस के समय से कब होगा ?कब सुनी जाएगी उसकी बात ?बाकी काम तो देश का परिश्रमी वर्ग स्वयं कर लेगा !
     ये तुम्हारे लोक लुभावने वायदे केवल चुनाव जीतने के लिए भले अच्छे हों किंतु जनता अब अविश्वास करने लगी है।अब समय आ गया है जब देश से इस ठग संस्कृति को बिदा कर देना चाहिए।
   ये बात सबको पता है मीडिया में ख़बरें आती हैं कि किसी के पीछे सी. बी. आई.क्यों छोड़ दी गई है किसके केस  क्यों वापस ले लिए गए हैं ?इसके बाद भी हम सबसे बड़े लोक तंत्र हैं इसका कारण आम जनता की सहन शीलता ही है अन्यथा राजनैतिक दलों ने नीचता करने में कोई कोर कसर छोड़ नहीं रखी है !
    छोटे छोटे राजनैतिक दल पहले साम्प्रदायिकता  के विरोध में ढिंढोरा पीट कर लामबंद होकर चुनाव  जीतते हैं फिर किसी बड़ी पार्टी के हाथ अपना जन समर्थन बेंच लेते हैं क्या इसे लोक तंत्र के नाम पर मजाक नहीं माना जाएगा? उसके बदले में उनके सब घपले घोटाले माफ कर दिए जाते हैं! उधर उस बड़ी पार्टी के मुखिया अपनी पार्टी में घोषणा करते  हैं कि जो जिस विषय में बिलकुल कुछ न जनता हो वह अपना अयोग्यता प्रमाण पत्र  जमा करे इस प्रकार से उसकी आयोग्यता के आधार पर ही उसे पद दिए जाते हैं ताकि मुखिया परिवार  अपना बर्चस्व बरक़रार बना रख सके। जैसे जिसने  प्रादेशिक स्तर पर राजनीति की हो राष्ट्र के विषय में सोचा ही न हो उसे राष्ट्रपति बना दिया जाए! इसी प्रकार जिसको  कभी किसी ने बोलते ही न सुना हो उसे लोक सभा स्पीकर बना दिया जाए! इसी प्रकार जिसने कभी किसी एक संसदीय क्षेत्र का समर्थन हासिल न किया हो हर समय आत्मबल बिहीन होकर  गिड़ गिड़ाता  रहता हो  ऐसे व्यक्ति को खोज कर प्रधानमंत्री बना दिया जाए जिस व्यक्ति में स्वप्न में भी कभी स्वाभिमान जगने की सम्भावना ही न हो! ऐसे आत्म बल बिहीन लोग कैसे चला सकते हैं सरकार और कैसे कर सकते हैं आम आदमी के साथ न्याय?क्यों माने कोई मंत्रालय या मंत्री इनकी बात? क्यों सुने कोई अधिकारी इनकी बात?ये लोग कैसे बचा सकते हैं अपने सैनिकों के शिर ? 
    इसी प्रकार अन्य पद भी दीन हीन अकिंचनों के हाथ ठेके पर उठा  दिए जाते हैं फिर शुरू होता है गम्भीर भ्रष्टाचार जिसका लाभ ले रहा होता है कोई और साइन कर रही होती हैं वो तत्पदों पर स्थापित निष्प्राण मूर्तियाँ  बाद में फाइलें गायब करने के अलावा और विकल्प ही क्या बचता  है !
      कोई कहीं सफाई देने को तैयार नहीं होता केवल कुछ लोग अपनी सफाई न देकर विरोधी पार्टियों के दोष दिखाने के लिए नियुक्त कर दिए जाते है जिन्हें शक्त हिदायद दी गई होती कि तुम हमारे एवं हमारी पार्टी के विषय एवं हमारी नीतियों के विषय में कुछ नहीं बोलोगे तुम केवल विरोधियों की ही बातें करोगे उन्हीं के दोष दिखाओगे उन्हीं की निंदा आलोचना करोगे ,और जब तुम्हें कुछ भी समझ में न आवे कि अब क्या बोलना है तब श्री जी पूर्वक केवल हमारी बंशावली पढ़ना और अपनी व्यस्तता बताकर वहाँ से उठ कर सीधे अपने घर चले आना !यह सब कुछ अब देश समझ चुका है अब इसके विरुद्ध आम जनता में कभी भी कोई बहुत बड़ा ज्वार उठ खड़ा हो सकता है इसलिए राजनैतिक दलों को समय रहते ही सावधान हो जाना चाहिए!

Monday, November 4, 2013

भारतवर्ष में भाजपा और ज्योतिष एवं दिल्ली में भाजपा और ज्योतिष !

          भाजपा का ज्योतिषीय सुधार अति शीघ्र अत्यंत आवश्यक है अन्यथा वर्त्तमान परिस्थिति के अनुशार लोकसभा चुनाव 2014 भी भाजपा के लिए कोरे कोरे फीलगुड से ज्यादा और कुछ भी नहीं होगा !

    जब किन्हीं दो या दो से अधिक लोगों का नाम यदि एक अक्षर से ही प्रारंभ होता है तो ऐसे सभी लोगों के आपसी संबंध शुरू में तो अत्यंत मधुर होते हैं बाद में बहुत अधिक खराब हो जाते हैं, क्योंकि इनकी पद-प्रसिद्धि-प्रतिष्ठा -पत्नी-प्रेमिका आदि के विषय में पसंद एक जैसी होती है। इसलिए कोई सामान्य मतभेद भी कब कहॉं कितना बड़ा या कभी न सुधरने वाला स्वरूप धारण कर ले या शत्रुता में बदल जाए कहा नहीं जा सकता है। 

जैसेः-राम-रावण, कृष्ण-कंस आदि। इसी प्रकार और भी उदाहरण हैं।

    ज्योतिष की दृष्टि से भारतवर्ष  में भाजपा की  स्थिति बहुत ठीक नहीं है इसीलिए उसे राजग का गठन करना पड़ा जबकि भाजपा से कम सदस्य संख्या वाले अन्य दलों के लोग  पहले भी प्रधानमंत्री बन चुके हैं ।जिनका  अटल जी जैसा विराट व्यक्तित्व भी नहीं था फिर भी सरकार बनाने में सबसे अधिक कठिनाई भाजपा को ही हुई थी आखिर अन्य  कारण भी  रहे  होंगे किन्तु ज्योतिष  की यह एक विधा भी महत्त्व पूर्ण कारण कही जा सकती है ।

         आर. यस. यस. के समर्पित पवित्र प्रचारकों के परिश्रम एवं देश भक्ति भावना से सुसिंचित भाजपा एवं उसका अपना अत्यंत सक्षम तथा कर्मठ नेतृत्व है प्रतिपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है कई प्रदेशों में उसकी न केवल यशस्वी सरकारें हैं अपितु अनेक वर्षों से सफलता पूर्वक  संचालित हो रहीं हैं किन्तु क्या कारण है कि केंद्र में आकर भाजपा की धार कुंद हो जाती है?क्या अन्य पार्टियों के नेता ज्यादा समझदार और ईमानदार हैं ?जो भी हो यह चिंतन का विषय जरूर है   और   ज्योतिष में है इस प्रश्न का उत्तर !

       इसी प्रकार दिल्ली की कांग्रेस सरकार है वो अपनी अच्छाई से जीतती है या विपक्षी भाजपा का आपसी असामंजस्य उसकी जीत का कारण बनता है कहना कठिन है यह भी चिंतन का विषय है ।

      दिल्ली भाजपा के चार विजय  और चारों को दिल्ली में एक साथ ही काम करना होता है इन  चारों लोगों  ने अपने एवं अपनी पार्टी का  यश बढ़ाया भी है फिर भी दिल्ली भाजपा की धार दिनों दिन कुंद होती दिखती है।उस समय तो केवल आलू प्याज की महँगाई पर भाजपा सरकार की दिल्ली से बिदाई हुई थी ।आज तो सब कुछ महँगा है सत्ता धारी पार्टी के केंद्र से लेकर प्रदेश तक घोटालों के आरोप हैं फिर भी भाजपा के लोग सरकार के विरुद्ध कोई सशक्त आन्दोलन नहीं खड़ा कर सके हैं ।आज की तारीख में सरकार यदि जाती भी है तो वो उसका अपना अपयश हो सकता है

      कम से कम भाजपा की सामर्थ्य बढ़ रही है इस कारण काँग्रेस सरकार जायगी अभी तक तो ऐसा कहना उचित नहीं होगा ।यह भी नहीं है कि भाजपा के लोग ही अयोग्य हों आखिर इन्हीं शूरमाओं ने दिल्ली नगर निगम में जीत हासिल की है क्योंकि  वहाँ इन चारों विजयों में प्रतिस्पर्द्धा नहीं थी ।खैर जो भी हो इस दृष्टि से भी चिंतन अवश्य होना चाहिए,अन्यथा आगामी चुनावों में भाजपा के राजनैतिक भविष्य के लिए चिंता प्रद हैं।इन चारों में आपसी तालमेल बेहतर  बनाने के लिए किसी मजबूत व्यक्तित्व की व्यवस्था  समय रहते कर  लेना उत्तम होगा । 

                        विजयेंद्रजी -विजयजोलीजी 

     विजयकुमारमल्होत्राजी - विजयगोयलजी 

 

उत्तर प्रदेश

 

       इसीप्रकार उत्तर प्रदेश के  विगत चुनावों में  भाजपा ने अत्यंत प्रसिद्ध, परिश्रमी ,धार्मिक ,अद्भुत  वक्ता सुश्री उमाभारती जी के नेतृत्व में चुनाव करा दिए उसे क्या पता था कि उत्तरप्रदेश और उमाभारती में है।यदि उमा जी प्रचार करतीं और नेतृत्व किसी और का होता तो भाजपा का प्रदर्शन इससे अच्छा होने की संभावना मानी जानी चाहिए। 

    इसलिए ज्योतिष शास्त्र के इन सिद्धांतों समेत अन्य समस्त चुनावी विजयदायिनी शास्त्रीय विचारधारा का परिपालन अवश्य किया जाना चाहिए।इसका  सकारात्मक असर अवश्य पड़ेगा ।

        कलराजमिश्र-कल्याण सिंह  

           ओबामा-ओसामा   

   अरूण जेटली- अभिषेकमनुसिंघवी


नरसिंहराव-नारायणदत्ततिवारी 

 परवेजमुशर्रफ-पाकिस्तान 

लालकृष्णअडवानी-लालूप्रसाद

      भाजपा-भारतवर्ष  

 मनमोहन-ममता-मायावती    

   उमाभारती -   उत्तर प्रदेश 
अमरसिंह - आजमखान - अखिलेशयादव 

 अमर सिंह - अनिलअंबानी - अमिताभबच्चन 

नितीशकुमार-नितिनगडकरी-नरेंद्रमोदी  

प्रमोदमहाजन-प्रवीणमहाजन-प्रकाशमहाजन  अन्नाहजारे-अरविंदकेजरीवाल-असीम त्रिवेदी-अग्निवेष- अरूण जेटली - अभिषेकमनुसिंघवी

 

   इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान समय में कहा  जा सकता है कि इन चारों विजयों का दिल्ली भाजपा में एक साथ काम करना  भाजपा की दिल्ली विजय पर कभी भी भारी पड़ सकता है ।इसलिए इन्हें बहुत सावधानी एवं सहनशीलता पूर्वक काम करनाही इनके एवं पार्टीके लिए विशेष कल्याणकारी रहेगा ।

            एक विशेष बात और यह है कि  दिल्ली भाजपा में इन चार विजयों के अलावा भी जो प्रमुख नेतागण हैं उन्हें विशेष सामंजस्य बनाने का प्रयास करते रहना श्रेयस्कर रहेगा।इतना सब होने पर भी यदि थोड़ी भी आपसी सहमति में कमी आई तो इन चारों लोगों को अपनी अपनी राजनैतिक  विकास यात्रा में ब्रेक लेनी पड़ सकती है। ।

 

गुजरात

       केशुभाई पटेल के नेतृत्व वाली गुजरात परिवर्तन पार्टी ने गुजरात विधानसभा चुनावों में या गुजरात  की सम्पूर्ण राजनीति में गुजरात परिवर्तन पार्टी  के   तत्वावधान  में जो कमर कसी है वो उनके लिए किसी भी प्रकार से  गुजरात में लाभप्रद नहीं रहेगी।प्रदेशों या देशों के नामों वाली पार्टियाँ कभी भी सफलता प्रद नहीं रहती  हैं ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखता है ।इस लिए  गुजरात परिवर्तन पार्टी  का गुजरात  में कोई भविष्य नहीं है और नरेंद्र मोदी सभी दलों पर अपनी बढ़त बनाने में सफल होते दिखते हैं ।

अन्ना हजारे

    इसीप्रकार अन्ना हजारे के आंदोलन के तीन प्रमुख ज्वाइंट थे अन्ना हजारे , अरविंदकेजरीवाल एवं अग्निवेष जिन्हें एक दूसरे से तोड़कर ये आंदोलन ध्वस्त किया जा सकता था। इसमें अग्निवेष कमजोर पड़े और हट गए। दूसरी ओर जनलोकपाल के विषय में लोक सभा में जो बिल पास हो गया वही राज्य सभा में क्यों नहीं पास हो सका इसका एक कारण नाम का प्रभाव भी हो सकता है। सरकार की ओर से अभिषेकमनुसिंघवी थे तो विपक्ष के नेता अरूण जेटली जी थे। इस प्रकार ये सभी नाम अ से ही प्रारंभ होने वाले थे। इसलिए अभिषेकमनुसिंघवी की किसी भी बात पर अरूण जेटली का मत एक होना ही नहीं था।अतः राज्य सभा में बात बननी ही नहीं थी। दूसरी  ओर अभिषेकमनुसिंघवी और अरूण जेटली का कोई भी निर्णय अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल को सुख पहुंचाने वाला नहीं हो सकता था। अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल का महिमामंडन अग्निवेष कैसे सह सकते थे?अब अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल कब तक मिलकर चल पाएँगे?कहना कठिन है।असीमत्रिवेदी भी अन्नाहजारे के गॉंधीवादी बिचारधारा के विपरीत आक्रामक रूख बनाकर ही आगे बढ़े। आखिर और लोग भी तो थे।  अ अक्षर से प्रारंभ नाम वाले लोग ही अन्नाहजारे  से अलग क्यों दिखना चाहते थे ? ये अ अक्षर वाले लोग  ही अन्नाहजारे के इस आंदोलन की सबसे कमजोर कड़ी हैं।

 

अमर सिंह

अन्नाहजारे की तरह ही अमर सिंह जी भी अ अक्षर वाले लोगों से ही व्यथित देखे जा सकते हैं। अमरसिंह जी की पटरी पहले मुलायम सिंह जी के साथ तो खाती रही तब केवल आजमखान साहब से ही समस्या होनी चाहिए थी किंतु अखिलेश  यादव का प्रभाव बढ़ते ही अमरसिंह जी को पार्टी से बाहर जाना पड़ा। ऐसी परिस्थिति में अब अखिलेश के साथ आजमखान कब तक चल पाएँगे? कहा नहीं जा सकता। पूर्ण बहुमत से बनी उत्तर प्रदेश में सपान की अखिलेश सरकार के सबसे कमजोर ज्वाइंट आजमखान  सिद्ध हो सकते  हैं।
   चूँकि अमरसिंह जी के मित्रों की संख्या में अ अक्षर से प्रारंभ नाम वाले लोग ही अधिक हैं इसलिए इन्हीं लोगों से दूरियॉं बनती चली गईं। जैसेः- आजमखान अमिताभबच्चन  अनिलअंबानी  अभिषेक बच्चन आदि।

राहुलगॉधी - रावर्टवाड्रा - राहुल के पिता  श्री राजीव जी इन दोनों पिता पुत्र का नाम रा अक्षर  से था इसीप्रकार रावर्टवाड्रा  और उनके पिता श्री राजेंद्र जी इन दोनों पिता पुत्र का नाम  भी रा अक्षर  से ही था। दोनों को पिता के साथ अधिक समय तक रहने का सौभाग्य नहीं मिल सका ।
    अब राहुलगॉधी के राजनैतिक उन्नत भविष्य  के लिए रावर्टवाड्रा  का सहयोग सुखद नहीं दिख रहा है क्योंकि कि यहॉं भी दोनों का नाम  रा अक्षर  से ही है।

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु  ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी नीतिगत  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

 

आशाराम जी बढ़ती परेशानियों का कारण एवं उनका निवारण क्या है?

आखिर क्या है इन समस्याओं का समाधान और क्या हो सकता है इनका उपाय ?

     किन्हीं भी  दो या दो से अधिक लोगों का नाम यदि एक अक्षर से ही प्रारंभ होता है-

जैसेः-राम-रावण, कृष्ण-कंस आदि 

इसीप्रकार आशाराम जी भी इसी ज्योतिषीय नाम प्रतिकूलता का दंड भोग रहे हैं -

 आशाराम और अशोक गहलोत (मुख्यमंत्री राजस्थान)
 आशारामऔरआनंदपुरोहित(सरकारीवकील) 
 आशाराम और अजय पाल लांबा(इंवेस्टीगेटिंगऑफीसर)
                   
 आशाराम औरअजय लांबा  (डीसीपी )   
 आशाराम और आम आदमी पार्टी

आशाराम और आरक्षण बचाओ समिति 

  इसीप्रकार दो टी.वी.चैनल जिन्होंने आशाराम जी की गिरफ्तारी की खबर दिखाने में विशेष रूचि ली है -

आशाराम और आजतक ( टी.वी.चैनल ) आशारामऔरआनंदबाजारपत्रिका(टी.वी.चैनलA.B.P)

     सच्चाई तो ईश्वर ही जाने जो न्याय प्रणाली के आधीन है कानून व्यवस्था पर सबको भरोसा रखना ही चाहिए! किंतु हम तो  ज्योतिष शास्त्र का एक दृष्टिकोण समाज के सामने रखना चाह रहे हैं कि  इन्हीं नामों का पहला अक्षर एक जैसा मिलने के  ज्योतिषीय दोष के कारण आशाराम जी को इन लोगों का तीखा विरोध झेलना पड़ा -

    ऐसे सभी लोगों के आपसी संबंध शुरू में तो अत्यंत मधुर होते हैं बाद में बहुत अधिक खराब हो जाते हैं, क्योंकि इनकी पद-प्रतिष्ठा-प्रसिद्धि-पत्नी-प्रेमिका आदि के विषय में पसंद एक जैसी रहती है, अर्थात जिस पद-प्रतिष्ठा-प्रसिद्धि आदि को इनमें से कोई एक प्राप्त करना चाहेगा उसी को पाने की ईच्छा दूसरा भी रखता है,उसी तरह की भी नहीं बल्कि वही चीज चाहिए होती है ऐसे लोगों को जो किसी दूसरे के पास होती है।चूँकि एक ही चीज एक समय पर किसी दो या दो से अधिक के पास कैसे  रह सकती है! यही कारण है कि उसे पाने के लिए उस तरह के लोग एक दूसरे का नुकसान किसी भी स्तर तक गिरकर कर सकते हैं और उस पद-प्रतिष्ठा-और प्रसिद्धि को भी नष्ट कर देते हैं, अर्थात जो मुझे नहीं मिली वो किसी और को नहीं मिलने देंगे।

         खैर, जो बीत गई सो बात गई अब आगे के बारे में सोचना है कि आशाराम जी का बचाव कैसे हो उसके लिए क्या किया जाना चाहिए?जहाँ तक आस्था की  बात है मैं उनका अनुयायी नहीं हूँ और न ही हमें उनकी बातें कभी प्रभावित ही कर सकी हैं। यद्यपि मैं शास्त्रीय ज्ञान विज्ञान का केवल समर्थक  ही नहीं अपितु उसके प्रति समर्पित भी  हूँ !

     मैं केवल इतना चाहता हूँ कि आशाराम जी का निजी जीवन जैसा भी रहा हो वो तो केवल वो जानते होंगे या फिर  ईश्वर को पता होगा किन्तु समाज का जो भी वर्ग उन्हें केवल धर्म एवं धार्मिकता की दृष्टि से देखता था उसे यह सब देख सुन कर गम्भीर ठेस लगी है वह आज भी आशाराम जी को किसी  भी प्रकार से दोषी सुनने सहने और मानने को तैयार नहीं है। ये उसकी निजी भावना है और किसी कि आस्था के साथ खिलवाड़ करने का कम से कम हमें तो कोई अधिकार है ही नहीं!मैं केवल इतना सोचता हूँ कि आशाराम जी पर कानून को अपना काम करने दिया जाए उसमें सहयोग करने में ही भलाई है। 

           आशाराम जी धार्मिक व्यक्ति हैं इसलिए उनकी सुरक्षा एवं कारागार से मुक्ति के लिए धार्मिक उपाय किए जाने चाहिए।इसके दो लाभ होंगे पहलेतो यदि उनका कोई दोष ही नहीं होगा तो इसके प्रभाव से शीघ्र निर्दोष साबित होंगे और यदि मनुष्य होने के नाते जेन अनजाने  में हुए किन्हीं पापों के परिणाम स्वरूप यदि आशाराम जी को यह दंड मिल रहा है जिसकी सम्भावना अधिक है क्योंकि ये मामला खिंचता ही चला जा रहा है ऐसे में  इन धार्मिक उपायों से  प्रायश्चित्त होकर शुद्धि होगी और देवी की कृपा के प्रभाव से शीघ्र मुक्ति मिल जाएगी इसलिए आवश्यक है कि देवी दुर्गा की आराधना की जाए जिसके लिए यदि सम्भव हो तो दुर्गा सप्तशती के एक लाख पाठ संस्कृत भाषा में किए जाएँ तो अत्यंत  शीघ्र मुक्ति मिल सकती है,किन्तु इसके लिए संस्कृत का अभ्यास अच्छा होना चाहिए क्योंकि उच्चारण दोष बिलकुल ही न हो। एक और सरल रास्ता है कि यदि संस्कृत भाषा में पाठ  कर पाना सम्भव न हो तो हिंदी में भी किया जा सकता है हिंदी में कई पुस्तकें प्रचलित हैं  जिनमें कई प्रकार के दोष छूट गए हैं इसलिए उनका कोई लाभ नहीं है।राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान से प्रकाशित दुर्गा सप्तशती न केवल पूर्ण  प्रमाणित और हिंदी भाषा में है अपितु दोहा चौपाइयों में होने के कारण बड़ी आसानी से सुन्दर काण्ड की तरह पढ़ी जा सकती है इसका पाठ भक्त लोग सामूहिक रूप से मिल जुल कर भी कर सकते हैं।यह सबसे सरल और प्रभावी विधि है और यह पाठ सभी लोग स्वयं कर भी सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए पढ़ें-

                                   (Saral Durga Saptshati 

                                   By Dr.S.N. Vajpayee

http://snvajpayee.blogspot.in/2013/01/durga-saptshati-by-drsn-vajpayee.html)


 

     आप सबको याद होगा दिल्ली के चर्चित बलात्कार काण्ड में आशाराम जी ने कहा था कि यदि उसने सारस्वत मन्त्र की दीक्षा ली होती तो उसका बचाव हो गया होता ! यह बात और है कि उनकी इस प्रकार की अप्रासंगिक बातों का उस समय के माहौल में पुरजोर विरोध हुआ था।इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वो सारा गलत ही बोल रहे रहे थे मैं तो कहूंगा कि माता सरस्वती बुद्धि  की स्वामिनी हैं वो किसी की  भी बुद्धि बढ़ा या बदल सकती हैं किन्तु उन देश काल परिस्थितियों में उस बालिका पर माता सरस्वती की कितनी कृपा हो पाती ये तो माता सरस्वती ही जानें!जहाँ तक आशाराम जी की दूसरी बात हमसे दीक्षा ली होती तो ऐसा हो सकता था मैं इससे बिलकुल सहमत नहीं हूँ!जो उनकी तपो शक्ति को लेकर तब सोचते भी थे कि आशाराम जी में ऐसी साधना या सिद्धि आदि होगी उन्हें भी आज यह भरोसा हो गया होगा कि उनका वह दावा अत्यंत उतावलेपन में किया गया आत्मविज्ञापन मात्र था! संभवतः उनकी इसी प्रकार की आत्म विज्ञापनी अतिशयोक्ति पूर्ण बातों से और कुछ हुआ हो न हुआ हो किंतु  ऐसी बातों ने आज की परिस्थितियों  में उनका उपहास सबसे अधिक कराया है ।

      यह भी सच है कि पढ़ा लिखा धार्मिक या शास्त्रीय समुदाय न तो आशाराम जी को कभी महात्मा मानता रहा और न ही धर्म गुरु और विद्वान् वो हैं भी नहीं, अभी भी उन्हें संस्कृत बोलने समझने में कठिनाई होती है गीता आदि के श्लोकों का हमेंशा वे अशुद्ध उच्चारण करते रहे यहाँ तक कि रामचरित मानस की चौपाइयाँ वे शुद्ध नहीं पढ़ पाते हैं ऐसी परिस्थिति में अपने सारे धर्म ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं उनका पढ़ पाना आशाराम जी के बश का भी नहीं था।वो अपने को आत्म ज्ञानी ब्रह्म ज्ञानी आदि जो कुछ भी बोलते थे वो सच्चाई से कोसों  दूर अर्थात झूठ होता था!

       इतना सब होने के बाद भी उनके ऊपर बलात्कार के आरोप लगने मात्र से धर्मक्षेत्र का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है यह सच था कि पढ़ा लिखा धार्मिक या शास्त्रीय समुदाय न तो आशाराम जी को कभी महात्मा मानता रहा और न ही धर्म गुरु और विद्वान् वो हैं नहीं यह सब कुछ सही होने के बाद भी एक सच्चाई यह भी स्वीकार करनी होगी कि आम समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को अपनी गतिविधियों  में सम्मिलित करने में वे सफल रहे जिनमें कई जनहित के कार्य भी उन्होंने किए हैं गुरुकुल आदि चलाए हैं किन्तु जो भी  काम उन्होंने किए हैं उनमें धन तो दिखाई देता है किन्तु तपस्या साधना जैसी बातों  का विस्तार कर पाने में वे असफल ही रहे, न केवल इतना अपितु अपने उन सेवकों को जो किसी लायक ही नहीं थे उन्हें साधक कह कर बुलाते रहे जो गलत था  इससे साधना कि गरिमा घटती थी । जब वहाँ साधना  की कोई रूप रेखा ही नहीं है तब कोई साधक कैसे हो सकता है ?और यदि साधना  थी तो जब आशाराम जी गिरफ्तार हुए तबसे आज तक वो दिखाई पड़नी चाहिए थी किन्तु ऐसा कभी कोई चमत्कार हुआ ही नहीं । उनके भगत लोग केवल रोते गिड़गिड़ाते ही दिखाई देते रहे जब कि  साधना संपन्न साधकों में इस प्रकार का दैन्य आना ही नहीं चाहिए था और कुछ तो चमत्कार होना ही चाहिए था जो नहीं हुआ!केवल यह कहना कि आशाराम जी को गलत फँसाया गया है इस बात में ताकत इसलिए नहीं है कि अपने यहाँ की कानून व्यवस्था ही ऐसी है कि किसी ने आरोप लगाए हैं उसकी जाँच होगी ही और जो भी कानूनी कार्यवाही बनती होगी सो होगी बाकी एक बात साफ थी कि आशाराम जी एवं उनके अनुयायियों में साधक साधना सिद्ध जैसा सारा वक्तव्य ही निराधार था ! दूसरों के साथ किया गया छल आज स्वयं उन पर ही भारी पड़ रहा है! तब जो  मीडिया बिना किसी धार्मिक संस्था से प्रमाणित कराए ही आशाराम जी को धर्म गुरु कहने लगा।उसी मीडिया ने इसी प्रकार के अपने कुछ और  प्रोडक्ट लांच किए हैं जिसमें किसी को योग गुरु,मलमल बाबा,क्षुधांशु गुरू,सुकुमार स्वामी शनैश्चरासुर, ज्योतिष गुरु,वास्तु गुरु और जाने कौन कौन से गुरु मीडिया ने पैसे ले लेकर तैयार किए हैं जिस दिन पैसा नहीं पहुँचेगा उस दिन मीडिया सबके कपड़े  उतारेगा । अंधेर है कि मीडिया पर इतना अंकुश क्यों नहीं लगाया जाता है कि ज्योतिषादि जिस विषय का जो विज्ञापन देने आवे पहले उसकी डिग्रियाँ तो चेक की जानी चाहिए कि वह व्यक्ति उस विषय में अधिकृत वक्तव्य देने की योग्यता रखता भी है कि  नहीं !

     जैसे किसी गधे पर शेर की खाल डाल देने से वह शेर थोड़े ही  हो जाएगा किन्तु धर्म के क्षेत्र में ऐसे बहुत सारे शेर मीडिया ने तैयार कर के छोड़ दिए हैं जब वो दहाड़ने के बजाए चीपों चीपों चिल्लाने लगते हैं तो जब लोग शोर मचाने लगते हैं तब मीडिया भी शोर मचाता है हर प्रकरण में यही हो रहा है किसी रँगे  पोते व्यापारी का नाम मीडिया के लोगों ने योग गुरु रख दिया किन्तु अब वह काला नीला हरा गुलाबी आदि धन खोजता घूम रहा है कोई योग साधक ऐसा करता है क्या!उसे  दुनियां के प्रपंच से क्या लेना देना ? और वो करेगा भी क्यों ऐसे और भी बहुत सारे उदाहरण हैं। 

      मजे की बात यह है कि आजकल धर्म के क्षेत्र में  मीडिया जिससे पैसे लेता है उसका पहले नाम करता है और बात बिगड़ने पर मीडिया  ही उन्हें बदनाम करता है इस नाम करने से बदनाम करने तक की मीडिया की सम्पूर्ण कार्यवाही में कोई शास्त्रीय शिक्षित साधक महापुरुष दूर दूर तक सम्मिलित नहीं होता है।पिछले साल एक भोगगुरु के सलवार पहनकर भागने का प्रकरण हो या इस साल का आशाराम प्रकरण किसी शास्त्रीय संत का कोई वक्तव्य नहीं आया!टी. वी. चैनलों पर महीनों से आशाराम के साथ साथ धर्म एवं संत परंपरा पर बड़ी बड़ी बहसें चलती रहीं किंतु मेरी समझ में ऐसी किसी भी बहस में कभी कोई शास्त्रीय संत सम्मिलित नहीं हुआ। एक आध मीडिया से जुड़े लुटे पिटे रँगे पोते पत्रकार थे जो मीडिया की सुविधा के लिए अभी हाल ही में बाबा बने थे। 

     इसी प्रकार एक आध राजनैतिक पार्टियों के पक्ष में माहौल बनाने के लिए बाबा बने रँगे पोते नेता लोग थे कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने सरकारी अनुदान जीमने के लिए कोई न कोई संस्था चला रखी है जिसके वे अध्यक्ष उपाध्यक्ष आदि हैं इसी प्रकार गौशाला चलाने वाले ग्वाले लोग आदि ऐसे ही कलियुगी संत लोग धर्म की छीछालेदर कराने को मीडिया के हाथ लगते हैं उन्हें धर्म एवं धर्म शास्त्रों के विषय में कुछ पता नहीं होता है इसलिए मीडिया के विरोधीपक्ष की भूमिका अदा करने के लिए वे  ही टी. वी. चैनलों पर केवल बुंबुआया करते हैं!  

     केवल आशाराम जी ही नहीं अपितु और भी  इस तरह के जितने भी टेलीवीजनी प्रोडक्ट बाबा ज्योतिषी वास्तु शास्त्री या अन्य यन्त्र तंत्र ताबीज बनाने बेचने वाले हैं उन सभी के अनुयायिओं के विषय में विश्वास से कहा जा सकता है क़ि वो लोग केवल भावना के बहाव में बह रहे हैं और उनकी भावनाओं के साथ खेला जा रहा है! क्योंकि उन्हें इन विषयों की  कोई जानकारी ही नहीं है इस कारण उनके अनुयायियों को अक्सर इस तरह के फंसाव में फँसते देखा जा सकता है किन्तु कटघरे में आज केवल आशाराम जी हैं इसका एक मात्र उपाय है कि Saral Durga Saptshati  का पाठ किया जाना चाहिए भगवती सब ठीक करेंगी ।         

     इसी प्रकार और लोगों के भी उदाहरण हैं -

 दिल्ली में भाजपा के चार विजयों  का एक  समूह एवं  पाँचवाँ नाम विजय शर्मा जी का है-                                                             विजय शर्मा जी 

                        विजयेंद्रजी -विजयजोलीजी 

     विजयकुमारमल्होत्राजी - विजयगोयलजी

       ज्योतिष के अनुशार ये पाँच वि एक साथ एक क्षेत्र में एक समय पर काम नहीं कर सकते या एक साथ रह नहीं सकते!जरूरी नहीं कि ऐसा राजनीति में ही हो!अन्य क्षेत्रों में भी जहाँ कहीं ऐसा संयोग बनता है|

      इसलिए एक अक्षर से प्रारंभ नाम वाले दो या दो से अधिक लोग एक दूसरे को हमेंशा पीछे धकेला करते हैं ये लोग संगठित रूप से किसी एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए  काम कर पाएँगे इसकी संभावना बहुत कम होती है।इनके बीच कोई सामान्य मतभेद भी कब कहॉं कितना बड़ा या कभी न सुधरने वाला स्वरूप धारण कर ले या शत्रुता में बदल जाए कहा नहीं जा सकता है।इनमें आपसी तालमेल बेहतर बनाने के लिए किसी मजबूत व्यक्तित्व की व्यवस्था  समय रहते कर  लेना भाजपा के लिए उत्तम होगा।

    यही वो मजबूत कारण है जिसका दंड दिल्ली भाजपा को सत्ता से दूर रह कर पिछले दसों वर्षों से झेलना पड़ रहा है।चूँकि साहब सिंह वर्मा जी के बाद दूसरा  जनाधार वाला जो भी नेता दिल्ली भाजपा के शीर्ष पदों पर आया उसका नाम वि से प्रारंभ हुआ जो आपसी खींच तान में उलझ कर रह गया!इस अक्षर के अलावा आने वाला कोई और नाम यदि आया तो आम जनता में उसकी वैसी पकड़ नहीं बन सकी जैसी  राजनैतिक सफलता के लिए आवश्यक होती है,इस लिए उसे वैसी सफलता भी नहीं मिल सकी जैसी उसके लिए जरूरी थी।परिणाम स्वरूप दिल्ली की सत्ता के शीर्ष पर काँग्रेस  के सदस्य के रूप में शीला दीक्षित जी ही  सुशोभित होती  रहीं! बात और है कि काँग्रेस इसे अपनी उत्तम प्राशासनिक क्षमता का परिणाम मानती हो किंतु ज्योतिषी सच्चाई यही है कि विपक्षी पार्टी भाजपा जनाधार संपन्न, लोकप्रिय, एवं स्वदल में अधिकाधिक स्वीकार्य नेता  दिल्ली  की  जनता के सामने उपस्थित कर पाने में अभी तक सफल नहीं हो सकी है ।पहले वाले दिल्ली के चुनावों में पराजित हो चुकी भाजपा अभी भी उसी काम चलातू तैयारी के सहारे ही आगे बढ़ रही है!जो दिल्ली भाजपा के आगामी चुनावी  भविष्य के लिए चिंताप्रद है,साथ ही उसका यह तर्क कि इतने दिन तक लगातार काँग्रेस दिल्ली की सत्ता में रहने के कारण अलोकप्रिय हो चुकी है इसलिए जनता अबकी बार भाजपा को मौका देगी ही !मेरा विनम्र निवेदन है कि भाजपा के इस दावे या सोच में कोई दम नहीं है।इसलिए भाजपा को दिल्ली की चुनावी विजय के लिए चाहिए कि इन पाँचों विजयों की कार्य कुशलताओं का अन्य दूसरी तीसरी जगहों पर उपयोग करना चाहिए किन्तु दिल्ली के चुनावी मैदान में कोई एक विजय या किसी और नाम वाले व्यक्ति की व्यवस्था करनी चाहिए !अन्यथा आने वाले चुनावों में शीला दीक्षित जी की संभावित विजय को रोका नहीं जा सकेगा क्योंकि -

       अरविन्द केजरीवाल का आम आदमी पार्टी

 में कोई भविष्य नहीं है जब से यह पार्टी बनी है तब सेअरविन्द जी की लोकप्रियता घटी ही है बढ़ी तो है ही नहीं !आम आदमी पार्टीवातावरण बिगड़ता ही जा रहा है।स्थिति कुछ दिनों में और साफ हो जाएगी।    इसलिए भाजपा को अभी और अधिक गंभीर मंथन करने  की आवश्यकता है इसके लिए भाजपा अभी जिस रास्ते की ओर  बढ़ रही है उसमें अपनी बढ़ी लोकप्रियता का भरोसा कम एवं वर्तमान सरकार की अलोकप्रियता का विश्वास अधिक है जो भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं कहे जा सकते।यह सोचशीला दीक्षित जी को ही फायदा पहुँचाएगी भाजपा को नहीं!

     इसप्रकार केंद्र से प्रान्तों तक भाजपा नाम समस्या जन्य इस बड़ी बीमारी से लगातार जूझती रही है इस कारण सत्ता में रह रही काँग्रेस विपक्षी पार्टी भाजपा  को लगातार कमजोर सिद्ध करती जा रही है दूसरी ओर भाजपा की ओर से भी समृद्ध एवं विश्वनीय संदेश  जनता में नहीं पहुँचाया जा सका है इसलिए  दिल्ली प्रदेश एवं संपूर्ण देश में जनता काँग्रेस के संवेदन हीन व्यवहार से दुखी तो है किंतु उस दुःख को घटाने में भाजपा कामयाब होगी इसका भी भरोसा भाजपा की ओर से समाज को नहीं मिल पा रहा है। इसलिए ज्योतिषीय संकेतों को समझते हुए आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए उसके परिणाम स्वरूप समाज भाजपा की भाषा पर भरोसा करेगा ! 

               भाजपा की दिल्ली पराजय का कारण

                                विजय शर्मा जी 

                        विजयेंद्रजी -विजयजोलीजी 

     विजयकुमारमल्होत्राजी - विजयगोयलजी

 

         भाजपा की राष्ट्रीय समस्या का कारण 

                    भाजपा-भारतवर्ष

               -राजग टूटने का कारण-

नितीशकुमार-नितिनगडकरी-नरेंद्रमोदी 

   इन तीनों में किसी एक की प्रमुखता दूसरे को बर्दाश्त नहीं हो पाती इसलिए राजग टूटना ही था !

   उत्तर प्रदेश में भाजपा

कलराजमिश्र-कल्याण सिंह 

उमाभारती -   उत्तर प्रदेश

जिन प्रदेशों में ऐसा नहीं है वहाँ भाजपा का जनता में  ठीक ठीक विश्वास है !

                           इसी प्रकार 

   अन्ना हजारे का आन्दोलन पिटने का कारण 

  अन्नाहजारे-अरविंदकेजरीवाल-असीमत्रिवेदी-   अग्निवेष- अरूण जेटली - अभिषेकमनुसिंघवी

                    सपा में फूट का कारण

  अमरसिंह - आजमखान - अखिलेशयादव 

  अमरसिंह-अनिलअंबानी-अमिताभबच्चन

    राम देव का आन्दोलन बिगड़ने का कारण

  रामदेव हवाई अड्डे पर मंत्रियों का ब्यवहार ठीक था किन्तु रामलीला मैदान पहुँचकर बात बिगड़ी ऊपर से राहुल गाँधी का हस्त क्षेप !

      रामदेव -रामलीला मैदान -राहुल गाँधी 

       रामदेव -राजीव गाँधी स्टेडियम-राहुल गाँधी

       रामदेव -अम्बेडकर स्टेडियम -राहुल गाँधी

     दूसरी बार भी वैसा ही होता किंतु ये मैदान छोड़कर निकल पड़े इन्हें जाना था राजीव गाँधी स्टेडियम तो भी वही होता किन्तु ये पहुँच गए अम्बेडकर स्टेडियम

 इससे बचाव हो गया !  

  इसीप्रकार  और भी उदाहरण हैं ----

लालकृष्णअडवानी-लालूप्रसाद

अरूण जेटली- अभिषेकमनुसिंघवी 

  ओबामा-ओसामा 

  मायावती-मनुवाद

नरसिंहराव-नारायणदत्ततिवारी

 परवेजमुशर्रफ-पाकिस्तान 

  मनमोहन-ममता-मायावती    

अमरसिंह - आजमखान - अखिलेशयादव 

  अमरसिंह-अनिलअंबानी-अमिताभबच्चन

प्रमोदमहाजन-प्रवीणमहाजन-प्रकाशमहाजन

 जैसे - अन्ना हजारे के आंदोलन के तीन प्रमुख ज्वाइंट थे अन्ना हजारे , अरविंदकेजरीवाल एवं अग्निवेष जिन्हें एक दूसरे से तोड़कर ये आंदोलन ध्वस्त किया जा सकता था। इसमें अग्निवेष कमजोर पड़े और हट गए। दूसरी ओर जनलोकपाल के विषय में लोक सभा में जो बिल पास हो गया वही राज्य सभा में क्यों नहीं पास हो सका इसका एक कारण नाम का प्रभाव भी हो सकता है। सरकार की ओर से अभिषेकमनुसिंघवी थे तो विपक्ष के नेता अरूण जेटली जी थे। इस प्रकार ये सभी नाम अ से ही प्रारंभ होने वाले थे। इसलिए अभिषेकमनुसिंघवी की किसी भी बात पर अरूण जेटली का मत एक होना ही नहीं था।अतः राज्य सभा में बात बननी ही नहीं थी। दूसरी  ओर अभिषेकमनुसिंघवी और अरूण जेटली का कोई भी निर्णय अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल को सुख पहुंचाने वाला नहीं हो सकता था। अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल का महिमामंडन अग्निवेष कैसे सह सकते थे?अब अन्ना हजारे एवं अरविंदकेजरीवाल कब तक मिलकर चल पाएँगे?कहना कठिन है।असीमत्रिवेदी भी अन्नाहजारे के गॉंधीवादी बिचारधारा के विपरीत आक्रामक रूख बनाकर ही आगे बढ़े। आखिर और लोग भी तो थे।  अ अक्षर से प्रारंभ नाम वाले लोग ही अन्नाहजारे  से अलग क्यों दिखना चाहते थे ? ये अ अक्षर वाले लोग  ही अन्नाहजारे के इस आंदोलन की सबसे कमजोर कड़ी हैं।


अन्नाहजारे की तरह ही अमर सिंह जी भी अ अक्षर वाले लोगों से ही व्यथित देखे जा सकते हैं। अमरसिंह जी की पटरी पहले मुलायम सिंह जी के साथ तो खाती रही तब केवल आजमखान साहब से ही समस्या होनी चाहिए थी किंतु अखिलेश  यादव का प्रभाव बढ़ते ही अमरसिंह जी को पार्टी से बाहर जाना पड़ा। ऐसी परिस्थिति में अब अखिलेश के साथ आजमखान कब तक चल पाएँगे? कहा नहीं जा सकता। पूर्ण बहुमत से बनी उत्तर प्रदेश  में सपा सरकार का यह सबसे कमजोर ज्वाइंट सिद्ध हो सकता है
       चूँकि अमरसिंह जी के मित्रों की संख्या में अ अक्षर से प्रारंभ नाम वाले लोग ही अधिक हैं इसलिए इन्हीं लोगों से दूरियॉं बनती चली गईं। 

जैसेः- आजमखान अमिताभबच्चन  अनिलअंबानी  अभिषेक बच्चन आदि।
राहुलगॉधी - रावर्टवाड्रा - राहुल के पिता  श्री राजीव जी इन दोनों पिता पुत्र का नाम रा अक्षर  से था इसीप्रकार रावर्टवाड्रा  और उनके पिता श्री राजेंद्र जी इन दोनों पिता पुत्र का नाम  भी रा अक्षर  से ही था। दोनों को पिता के साथ अधिक समय तक रहने का सौभाग्य नहीं मिल सका ।
    अब राहुलगॉधी के राजनैतिक उन्नत भविष्य  के लिए रावर्टवाड्रा  का सहयोग सुखद नहीं दिख रहा है क्योंकि  यहॉं भी दोनों का नाम  रा अक्षर  से ही है।

  इसीप्रकार भारतवर्ष  में भाजपा की  स्थिति है इसीलिए उसे राजग का गठन करना पड़ा जबकि

भाजपा से कम सदस्य संख्या वाले अन्यलोग  पहले भी प्रधानमंत्री बन चुके हैं ।

                                -निवेदक -

    राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान का निवेदन-

       यदि ज्योतिष, वास्तु ,नग नगीना यन्त्र तंत्र ताबीज ,धर्म शास्त्र ,रामायण,भागवत,गीता  या और भी धर्म एवं शास्त्र के किसी भी विषय  में आप भी कुछ जानना चाहते हैं या किसी ने कोई बहम डाल रखा है और आप परेशान हैं तो आप भी हमारे यहाँ फोन करके जान सकते हैं अपने प्रश्न का उत्तर पा सकते हैं अपनी भी शंका का समाधान ! विशेष बात यह है कि हमारे यहाँ  दिए गए उत्तरों एवं उपायों में आपको किसी प्रकार का कोई बहम नहीं होगा दूसरा वैदिक या लौकिक मंत्र जपने के उपाय बताए जाते हैं। नग नगीना यन्त्र तंत्र ताबीजों से सम्बंधित कोई उपाय नहीं बताए जाते हैं हाँ इनसे जुड़ी शंकाओं एवं बहमों का निवारण अवश्य किया जाता है।  

      इन सभी प्रश्नों के उत्तर पाने के लिए हमारे यहाँ संस्थान संचालन के लिए सहयोग राशि के रूप में अलग अलग प्रकार के प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए अलग अलग प्रकार की सहयोग राशि जमा करने का प्रावधान किया गया है!जो शुल्क केवल पारिश्रमिक रूप में ही लिया जाता है जो आगे सम्बंधित विद्वानों को देना होता है।जिनके बदले उनसे सम्बंधित विषयों के लिये  जाते हैं प्रमाणित उत्तर और यह बहम रहित सच्चाई सहित शास्त्रीय सेवा आपको कभी भी कहीं भी 24 घंटे के अंतराल में फोन पर भी उपलब्ध कराई जाती है ।

 संपर्क सूत्र -Dr. S.N.Vajpayee ,M.9811226973   संस्थापक-राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान

        निवेदकः-ज्योतिष जनजागरण मंच