Saturday, August 13, 2016

प्रधान मंत्री जी ! अपराध घटाने के लिए संस्कारों की बर्षा बादल करेंगे क्या ?

     बाबाओं को व्यापार और ब्यभिचार सूझा है शिक्षक कामचोरी और अयोग्यता से ग्रस्त हैं!अपराध रोकने के लिए जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारियों को घूस खोरी से फुरसत ही नहीं है ! 
     कमीशनखोर लप्फाज सरकारों में इतनी नैतिकता ईमानदारी लज्जा और कर्मठता हिम्मत नहीं है कि वो बेईमानों से पूछें कि जिस काम को करने की हम तुम्हें सैलरी देता हैं वो काम होता क्यों नहीं हैं और जिस गलत काम को रोकने के लिए हम तुम्हें सैलरी देते हैं वो काम रुकता क्यों नहीं है फिर तुम्हारी सैलरी किस बात की !तुम्हारे रहते अवैध निर्माण हुए कैसे और अवैध काम काज चल कैसे रहे हैं !तुम्हें आज तक दी गई सैलरी तुमसे वापस क्यों न ले ली जाए किंतु सरकार को लगता है यदि ऐसा किया तो ये हमरे भी भ्रष्टाचार की पोल खोल देंगे !इसी डर से दूसरी पार्टी के नेताओं के भ्रष्ट कारनामों के विरुद्ध भाषण बड़े बड़े देते हैं किंतु कार्यवाही नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि कल वो सत्ता में आएँगे तो हमारी पोल खोलेंगे !इसी भावना से अभी तक चलती भ्रष्टाचार पोषक सरकारों के विरुद्ध ही तो आपको लाया गया था आपने प्रयास किए भी किन्तु आपको आपके लोगों ने ही असफल सिद्ध कर दिया !जन प्रतिनिधियों का वर्ताव जनता के प्रति आत्मीय नहीं रहा और आत्मीयता की भावुक बातें करते रहे लोग आपको झूठा समझने लगे !अभी भी समय है अच्छे लोगों आगे लाइए और अपनी शाख बचाइए श्रीमान जी !दो वर्ष काम तो नहीं होते !!   
   योग के नाम पर समाज से धन माँगने वाले बाबा उसे  भोग पर खर्च करने लगे हैं  ऊपर से ये समाज को बताते हैं कि मैं तो केवल एक ग्लास दूध लेता हूँ बस !क्या समाज ऐसे झूठों पर भरोसा करता है । संस्कारों की शिक्षा देने के लिए सरकार के पास अपनी व्यवस्था क्या है?
    कई बाबा तो व्यापार तक करने लगे हैं । इसी प्रकार से घूस देकर नौकरी पाने वाले संस्कार भ्रष्ट शिक्षक स्कूल जाने से डरते हैं पढ़ाएँ क्या खाक !अयोग्यता के कारण डर डर कर जिंदगी काटने वाले शिक्षक कैसे सिखावें संस्कार !जिन्हें खुद कुछ आता  नहीं है झूठ बोल बोल कर आँखें झुकाकर मुख बंद करके बड़े बड़े अधिकारियों के यहाँ दुम हिलाकर शिक्षक रूप में जो जिंदगी काटे ले रहे हैंऐसे लोग कैसे सिखाएँगे संस्कार !
   असहिष्णुता घटाना  प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों का काम नहीं होता है  !इसके लिए भी कर्तव्य भ्रष्ट समाज सरकारों को ही कोसता  रहता  है !हर बात के लिए सरकारों की ओर ताक झाँक करना उचित नहीं है कुछ जिम्मेदारी अपनी भी तो होती है !
     जिस देश में संन्यासी लोग  ब्यापारी होने लगें ,शिक्षक कुसंस्कारी होने लगें, कर्तव्यभ्रष्ट अधिकारी होने लगें !मीडिया भिखारी होने लगे,नेता विकारी होने लगें ! ऐसे देश के युवाओं में संस्कार जगावे आखिर कौन !और कैसे रोके जाएँ बलात्कार !
     सहिष्णुता सिखाने के लिए साधूसंत आदि  धर्म से जुड़े लोग ,शिक्षक और मीडिया से जुड़े लोग ही तो होते हैं किंतु चरित्रवान साधूसंतों के दर्शन दुर्लभ हैं पाखंडी बाबा घूम रहे हैं कद्दू टिंडे मूली बैगन बेचते !कोई भी चरित्रवान साधू संत इतना कभी नहीं गिर सकता कि वो व्यापार करने लगे !क्योंकि व्यापार आदि सांसारिक प्रपंच छोड़ना ही तो संन्यास है किंतु संन्यास लेकर फिर व्यापार करने लगना ये तो अपनी की हुई वोमिटिंग चाटने के समान है ! ऐसे संन्यासियों से लोग संस्कारों की शिक्षा कैसे ले सकते हैं क्योंकि ये स्वयं दिनभर व्यापारिक झूठ बोला करते हैं । वास्तविकता तो ये है कि ऐसे लोगों का लक्ष्य साधू बन कर संसार के सारे भोग  भोगने के लिए धन जुटाना होता है।उसी दान के धन से वो  फैला लेते हैं सारा व्यापार जो अनैतिक है ! ऐसे लोगों से समाज क्या सीखे यही न कि व्यापार करने वालों को पहले दाढ़ा झोटा बढ़ाकर लाल कपडे पहनने चाहिए जब समाज  संतों जैसा ईमानदार होने का ठप्पा लगा दे तो व्यापार शुरू कर देना चाहिए  !इसे नैतिकता कैसे कहा जा सकता है ये तो विशुद्ध धोखा धड़ी है । ऐसे लोगों के पास समाज को सिखाने लायक होता क्या है !ये खुद पापों में प्रवृत्त होते हैं । 
     एक बाबा जी स्वदेशी अपनाने  नाटक करते थे किंतु दवा बनाने की उनकी सारी मशीनें विदेशी थीं दवा बनाने की प्रक्रिया उनकी विदेशी थी !उनके कहने का मतलब था कि विदेशों में बना जींस मत पहनों किंतु सिलाई मशीन विदेशी रख सकते हो किंतु ऐसे लोगों को ये समझ में नहीं आता है कि सिलाई मशीन विदेशी यदि रखी जा सकती है तो विदेशी जीन्स  पहनने में कौन सी बुराई हो जाती है !ऐसे बाबाओं को यदि थोड़ी भी  स्वदेशी की लज्जा होती तो ये पहले स्वदेशी मशीन बनाते और बाद में प्रोडक्ट बना लेते !

         असहिष्णुता (Intolerance) सामाजिक बुराई है इसे नष्ट करने का दायित्व भी समाज पर ही है
 सहिष्णुता बनाए रखना समाज का ही तो कर्तव्य है कि विपक्ष के हवा भरने पर भी लोग आंदोलित न हो किंतु समाज नहीं निर्वाह कर पा रहा है अपना दायित्व !
      असहिष्णुता अपराधों की जननी एवं विपक्ष के लिए साक्षात् संजीवनी होती है क्योंकि असहिष्णुता और अपराध साथ साथ बढ़ते हैं और अपराध बढ़ते ही सत्तापक्ष अर्थात सरकार को दोषी सिद्ध  करने का अवसर मिल जाता है !
        सहिष्णुता सत्ता पक्ष को सबल बनाती है इससे सरकार को अपनी पीठ थपथपाने का मौका मिलता है क्योंकि सामाजिक सहिष्णुता अपराधों को समाप्त करने में सहायक होती है ।इसलिए सत्ता पक्ष कभी भी नहीं चाहता है कि सहिष्णुता समाप्त हो ! 
  विपक्ष हर संभव प्रयास करता है कि सहिष्णुता समाप्त हो और उसे अपनी बात कहने का मौका मिले इसलिए जिस देश समाज में जितनी असहिष्णुता बढे उसके लिए केवल और केवल विपक्ष को ही जिम्मेदार माना जाना चाहिए !
मोदी जी सिखाएँगे क्या ? फर्जी ज्योतिषियों का भ्रष्टाचार भगाओ !
     संतान पैदा करने के उपायों नाम पर बाबा कर रहे हैं बलात्कार !
ज्योतिष पाखंडी और वास्तु व्यापारी उपायों के नाम पर कर रहे हैं नग नगीने यंत्र तंत्र ताबीजों का भारी भरकम कारोबार !कौवे कुत्ते चीटी चमगादड़ पुजाने में लगे हैं ! वास्तु व्यापारी पेंडुलम बेच रहे हैं। करवाचौथ जैसे पर्वों कौन किस कलर के कपड़े पहने ये राशि के हिसाब से बताया जा रहा है किस दिशा में सिर करके लेटें ये वास्तु एक्सपर्ट बताते हैं उस दिन किस आसन से लेटें कौन क्रीम लगावें कौन कैप्सूल खाएँ आदि का सारा इंतजाम भोगगुरु कलियुगी पतंजलि स्वामी कामदेव जी सँभाल रहे हैं डाँसपार्टियों चूमने चाटने वाले रिटायर्ड जिगोलो 'भोगवत' कथा कह रहे हैं !

Friday, August 12, 2016

Beauty Tips ब्यूटी टिप्स !

Beauty Tips ब्यूटी टिप्स !

Makeup Tricks ,Yoga

' दलित ' शब्द का अर्थ है टुकड़े -टुकड़े ,खंड-खंड ,कुचला हुआ ,छिन्न भिन्न आदि ! वास्तव में दलित ऐसे होते हैं क्या ?

जातियाँ कभी गलत नहीं होतीं जिसकी जैसी जाति होती है उसका वैसा स्वभाव !जातियाँ काल्पनिक नहीं होतीं ! 
  1. ब्राह्मणों के अलावा दूसरी जातियों के लोग भी साधु संन्यासी बनते देखे जाते हैं किंतु निभा नहीं पाते हैं उनका संन्यास लेकर भी भजन में मन नहीं लगता है वो वहाँ जाकर भी दूध घी और भूरे रंग का गेंहूँ का आता बेचना नहीं छोड़ते !बहुत सारे महात्माओं को करोड़ों अरबों की संपत्तियाँ कमाते देखा होगा किन्तु उन धनी बाबाओं में बहुत कम लोग ब्राह्मण होंगे ! जो महात्मा वैश्य वर्ग के हैं वो संन्यास लेने के बाद भी व्यापार करना नहीं छोड़ते हैं !बल्कि और अच्छे ढंग से करते हैं क्योंकि संन्यास लेने के बाद फंडिंग की समस्या नहीं रह जाती है जब कम पड़े या घाटा होने लगे तो समाज से मांग लो न कर्जा चुकाना न ब्याज देना !कुल मिलाकर जातियों के संस्कार कभी पीछा नहीं छोड़ते !
  2.    आरक्षण माँग माँग कर दलितों ने खुद को इतना कमजोर सिद्ध कर दिया है कि अब कुछ कहने लायक बचे ही नहीं हैं !वैसे भी सवर्णों की तरह हाथ पैर दिल दिमाग वाले हट्टे कट्टे दलित लोग भी सवर्णों की तरह ही भोजन पानी सब कुछ करते हैं फिर सवर्ण लोग खुद तरक्की करके यदि अपना विकास कर सकते हैं तो दलित क्यों नहीं ?इन्हें कोई दिक्कत नहीं है और न ही इनका कभी किसी ने शोषण ही किया है इसलिए ये इनमें मानसिक कमजोरी है जिसे दूर करने के लिए आरक्षण नहीं अपितु किसी मनोचिकित्सकको दिखाया जाना चाहिए !
  3.   दलित लोग अपने तरक्की न कर पाने का कारण सवर्णों और ब्राह्मणों को बताते हैं !ये तो उसी तरह की बात है कि किसी के अपने घर बेटा न पैदा हो रहा हो तो उसके लिए दोष पड़ोसी को दिया जा रहा हो ! 
  4. दलित लोग महान जाति वैज्ञानिक महर्षि मनु की निंदा करते और मनुस्मृति को जलाते देखे जाते हैं किंतु इसमें मनु का दोष क्या है उन्होंने हम सबके पूर्वजों की योग्यता की परीक्षा ली जो फस्ट डिवीजन आए वो ब्राह्मण जो सेकेण्ड आए वो क्षत्रिय जो थर्ड आए वो वैश्य और जो बेचारे पास ही नहीं हुए ऐसे फेलियर लोगों को पुरस्कृत करने की परंपरा तो  पहले थी न आज है फिर उन्हें महर्षि मनु कैसे पुरस्कृत कर देते ! 
  5. जिन्हें शिक्षा में आरक्षण चिकित्सा में आरक्षण मान  सम्मान में आरक्षण !भोजन सामग्री मिलने में आरक्षण जगह जमीनें मिलने में आरक्षण इन्हें सरकार से आरक्षण में सब कुछ मिलता है सरकारें  सारी योजनाएँ ही दलितों के विकास के लिए बनाती हैं इतनी सब सुख  सुविधाएँ पाकर भी जो अपना विकास न कर पाते हों इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि अतीत में भी यही हुआ होगा अर्थात दलितों के पूर्वज खुद ही नहीं कर पाए होंगे विकास और सवर्णों को दोषी ठहराते रहे किंतु ऐसे आरोपों को कितना और कैसे विश्वसनीय मान लिया जाए ? 
  6. ब्राह्मण वर्ग यदि इतना ही दोषी होता तो अंबेडकर टाइटिल डॉ BR अंबेडकर साहब के शिक्षक  की थी  दूसरी पत्नी भी ब्राह्मण थीं ये ब्राह्मण टाइटिल और दूसरी पत्नी भी ब्राह्मण होना वो आजीवन सहर्ष स्वीकार करते रहे !फिर ब्राह्मण गलत कैसे हो सकते हैं ! 
  7. कांशीराम जी के तीन मित्र बताए जाते हैं  एक गुर्जर दूसरा सैनी तीसरा ब्राह्मण क्यों ? 
  8. सतीश मिश्रा जी की योग्यता के प्रति नत  मस्तक हैं अपने को दलितों की मसीहा और देवी मानने वाली बसपा प्रमुख  क्यों ! 
  9. जातियों के आधार पर जब तक आरक्षण लिया  जाता रहेगा तब तक जातियाँ समाप्त करने की कल्पना कैसे की जा सकती है ! 
  10. जिन लोगों का सब कुछ आरक्षण और सरकारों से प्राप्त भिक्षा के आधीन हो ऐसे युवकों से सवर्णों के उन लड़के लड़कियों को विवाह करने के लिए कैसे बाध्य  किया जा सकता है जिन्होंने अपने जीवन को स्वयं अपने त्याग और परिश्रम से बुना हो !यदि ऐसा कर  भी दिया जाए तो क्या उनके साथ यह अन्याय नहीं होगा ? 
  11. जिनका आत्म विश्वास इतना कमजोर  है कि जो अपने बल पर अपनी रसोई और घर गृहस्थी का खर्च तक नहीं चला सकते इसके लिए उन्हें सरकारों  से मदद लेनी पड़ती हो वे चुनाव जीतकर भी अपने क्षेत्र का विकास कैसे कर  पाते  होंगे ! 
  12. दलितों को सरकारों के द्वारा मिलने वाली सारी  सुविधाएँ भी तो सवर्णों के द्वारा कमाई हुई ही होती हैं जिन्हें टैक्स रूप में सवर्णों से लेकर सरकार आरक्षण प्रेमियों को देती है सवर्णों की कमाई पर जीवन यापन करने वाले लोगों के द्वारा सवर्णों की निंदा किया जाना कहाँ तक न्यायोचित माना जा सकता है !
      नेताओं को जब चुनाव लड़ना होता है तब वो केवल दलितों को मूर्ख बनाते हैं वे जानते हैं कि सवर्ण लोग तो नेताओं पर भरोसा करना कब का छोड़ चुके हैं !   दलितों को कुछ देने की बात करके नेता लोग जीत लिया करते हैं चुनाव ! सुरक्षा दलितों की आरक्षण दलितों को आटा,दाल चावल दलितों को वजीफा दलितों को सरकार से प्राप्त सारी सुविधाएँ दलितों को मिलती हैं फिर भी परेशान  हैं दलित !आखिर क्यों ?या तो देने वालों की नियत ठीक नहीं है या फिर लेने वालों की !वैसे भी माँगने वालों को सम्मान कहाँ मिलता है ।

     दलित लोग यदि अपने बल और बुद्धि के आधार पर अपना घर नहीं चला सकते तो वे विधायक सांसद मंत्री आदि बनकर उस दायित्व का निर्वाह कैसे कर पाते होंगे इसलिए दलितों का चुनाव लड़ना कितना उचित है क्या वो अपने दायित्वों का निर्वाह करने की क्षमता रखते हैं !     दलित शब्द का अर्थ क्या होता है ये जानने के लिए मैंने शब्दकोश देखा जिसमें टुकड़ा,भाग,खंड,आदि अर्थ दलित शब्द के  किए गए हैं।मूल शब्द दल से दलित शब्द बना है।मैं कह सकता हूँ कि टुकड़ा,भाग,खंड,आदि शब्दों का प्रयोग कोई किसी मनुष्य के लिए क्यों करेगा?इसके बाद दल का दूसरा अर्थ समूह भी होता है।जैसे कोई भी राजनैतिक या गैर राजनैतिक दल, इन दलों में रहने वाले लोग दलित कहे जा सकते हैं।इसी दल शब्द से ही दाल  बना है।चना, अरहर आदि दानों के दल बना दिए जाते हैं जिन्हें दाल कहा जाता है।इस प्रकार दलित शब्द के टुकड़े,भाग,खंड,आदि और कितने भी अर्थ निकाले जाएँ  किंतु दलित शब्द का अर्थ दरिद्र या गरीब नहीं हो सकता है। 

     राजनैतिक साजिश के तहत यदि इस शब्द का अर्थ अशिक्षित,पीड़ित,दबा,कुचला आदि  करके ही कोई राजनैतिक लाभ लेना चाहे तो यह शब्द ही बदलना पड़ेगा,क्योंकि इस शब्द का अर्थ शोषित,पीड़ित,दबा,कुचला आदि करने पर यह ध्यान देना होगा कि इसमें जिन जिन प्रकारों का वर्णन है वो सब कोई अपने आप से भले बना हो किंतु किसी के दलित बनने में किसी और का दोष  कैसे हो सकता है?यदि किसी और ने किसी का शोषण करके उसे दलित बनाया होता तो दलित की जगह दालित होता।जब बनाने वाला कोई और होता है तो आदि अच की वृद्धि होकर जैसे चना, अरहर आदि दानों के दल बना दिए जाते हैं जिन्हें दाल कहा जाता है क्योंकि चना आदि यदि चाहें भी कि वे अपने आप से दाल बन जाएँ  तो नहीं बन सकते।जैसेः- तिल से बनने के कारण उसे तैल कहा जाता है।बाकी सारे तैलों का तो नाम रख लिया गया है तैल तो केवल तिल से ही पैदा हो सकता है।ऐसे ही वसुदेव के पुत्र होने के कारण ही तो वासुदेव कहे गए। इसी प्रकार दलित की जगह दालित होता। चूँकि शब्द दलित है इसलिए किसी और का इसमें क्या दोष ?वैसे भी किसी ने क्या सोच कर दलित कहा है यह तो वही जाने किंतु इस ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि  में कम से कम हम तो किसी को दलित नहीं कह सकते ऐसा कहना तो उस ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि का अपमान है।हमारा तो भाव है कि

          सीय राम मय सब जग जानी । 

          करउँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।

     मैं तो ईश्वर का स्वरूप समझकर सबको प्रणाम करता हूँ  और अपने हिस्से का प्रायश्चित्त भी करने को न केवल तैयार हूँ बल्कि दोष का पता लगे बिना ही मैंने इस जीवन को धार पर लगाकर प्रायश्चित्त किया भी है।यदि हमारे पूर्वजों के कारण समाज का कोई वर्ग अपने को बेरोजगार,गरीब या धनहीन समझता है तो मैं अपने हिस्से का जो भी मुनासिब प्रायश्चित्त हो आगे भी करना चाहता हूँ ।मेरी सविनय यह ईच्छा भी है कि मुझे इस आरोप के लिए जो भी उचित दंड हो मिलना चाहिए इसके बाद हम अपने परिजनों को इस आरोप से अलग करना चाहते हैं ।साथ ही हमारा यह भी निवेदन है कि हम अपने विषय में जो जानकारियाँ  दे रहे हैं उनकी सच्चाई के लिए किसी भी एजेंसी से जाँच कराने को तैयार हैं । 

  मैंने चार विषय से एम.ए.किया,बी.एच.यू. से पी.एच.डी. भी की।किसी डिग्री कालेज में नौकरी मिल सकती थी किंतु सन् 1989-90 में चले आरक्षण आंदोलन में पूर्वजों पर लगे शोषण के आरोपों को मैं सह नहीं सका।मैं अक्सर तनाव में रहने लगा और एक ही बिचार मन में चलता रहा कि हमारे पूर्वजों ने आखिर किसी शोषण क्यों किया?

    हमें आज तक इन बातों के जवाब नहीं मिले।मैंने एक व्रत लिया था कि इस निपटारे से पूर्व मैं किसी भी  सरकारी सेवा के लिए कभी कोई आवेदन नहीं करूँगा।मुझे गर्व है कि ईश्वर कृपा से मैं आज तक व्रती हूँ । न ही मुझे जवाब मिले न ही मैंने नौकरी मॉगी।न केवल सरकारी प्राइवेट किसी कंपनी आदि में भी कभी कोई नौकरी के लिए साइन नहीं किए ।संघर्ष बहुत हैं बहुतों ने  शिक्षा सहित मुझे अक्सर अपमानित किया है ।फिरभी सहनशीलता सबसे बड़ी मित्र है।जो  देवताओं की कृपा एवं पूर्वजों के पुण्यों का प्रसाद है ।

     ये  बातें  मैं बड़ी जिम्मेदारी से कह रहा हूँ , आखिर सवर्ण कही जाने वाली जातियों में ही मेरा भी जन्म हुआ है, जिसमें मेरा कोई वश नहीं था।जन्म मृत्यु तो ईश्वर के आधीन हैं।इसमें कोई क्या कर सकता है?अपने जन्म,जीवन,जन्मभूमि पर हर किसी को गर्व करना ही चाहिए मैं करता भी हूँ ।

     ईश्वर ने जो कुछ भी किया है।उसे ईश्वर का उपहार समझकर स्वीकार किया है और उपहार में शिकायत कैसी ?मैं इतने जीवन में जगह जगह धक्के खाकर सारी दुर्दशाएँ  भोगकर यह बात विश्वास से कह सकता हूँ कि जाति का इस जीवन में आर्थिक और व्यवसायिक आदि किसी प्रकार का कोई लाभ नहीं होता।जो कमाता है उसके पेट में जाता है उसकी जाति वालों को अकारण क्यों परेशान करना? जाति क्षेत्र समुदाय संप्रदाय की बातें तो कमजोर लोगों में ही कहते सुनते देखी जाती हैं ।बड़े आदमियों की जाति तो उनका अपना आर्थिक बड़ापन होता है, जिसके आगे वे अपने धनहीन घर खानदान के लोगों को पहचानने से मना कर देते हैं। ऐसे में जाति की चर्चा तो मूर्खता ही कही जाएगी जिसका कोई मतलब ही नहीं बचा है।

  जहाँ तक जातिगत आरक्षण की बात है यह भी भारतवर्ष को प्रतिभाविहीन बनाने का प्रयास है।सवर्णवर्ग के लोग यह सोच लेंगे कि क्यों पढ़ना आरक्षण के कारण नौकरी तो मिलनी नहीं है इसी प्रकार असवर्ण लोग भी सोच सकते हैं कि क्यों पढ़ना नौकरी तो मिलनी ही है।अंततः नुकसान तो देश का ही हो रहा है। वैसे भी समृद्ध देश की संकल्पना में सभी भेद भावों से ऊपर उठकर गरीब और पठनशील लोगों को स्वतंत्र शैक्षणिक सहयोग मिलना चाहिए।इससे हर वर्ग के विद्यार्थी अपना जीवन सुधारने का प्रयास तो कम से कम कर ही सकते हैं परिणाम तो ईश्वर के ही हाथ है।समान व्यवस्था प्राप्त करके भी दुर्भाग्य से यदि कोई असफल हुआ ही तो वह इसके लिए किसी और को नहीं कोसेगा।यह उसकी अपनी लापरवाही मानी जाएगी।

      अन्यथा आज असवर्ण कहे जाने वाले लोग सवर्णों को कोस रहे हैं कल सवर्ण कहे जाने वाले लोग अपनी दुर्दशा  के लिए असवर्णों को कोसेंगे।जहॉं तक राजनेताओं की बात है ये कल को सवर्णों को आरक्षण का एलान कर देंगे। इस प्रकार सवर्णों के मसीहा बनकर असवर्णों को गालियॉं देंगे।अपने को गरीबों का बेटा बेटी कह कर तीन तीन करोड़ का घाँघरा पहनकर घूँमेंगे।कितने शर्म की बात है?आज अरबों पति लोग अपने को दलित कहते हैं!क्या उनसे पूछा जा सकता है कि वे आखिर गरीबों का मजाक क्यों उड़ा रहे हैं?कौन सी ऐसी अदालत है जो इस प्रकार से अपमानित लोगों की दशा  पर भी दया पूर्वक बिचार करेगी?

      मैं पॉंच वर्ष का था जब मेरे पिता जी का देहांत हो गया था । मेरे भाई साहब सात वर्ष के थे मेरी माता जी घरेलू परिश्रमशील स्वाभिमानी महिला थीं।किसी संबंधी का कोई सहारा नहीं मिला उस अत्यंत संघर्ष पूर्ण समय में भी माँ के पवित्र आँचल में लिपट कर आनंद पूर्ण बचपन बिताया हम दोनों भाइयों ने।धन के अत्यंत अभाव में जो दुर्दशा होनी थी वह तो सहनशीलता से ही सहना संभव था न किसी से कोई शिकायत न शिकवा हर परिस्थिति में मैं अपने कर्मों और अपने भाग्य का ही दोष  देता हूँ  और किसी पर क्या बश ?कोई चाहे तो दो कदम साथ चल ले न चाहे तो अकेले का अकेला किसी से क्या आशा ?

      हमारे उस छोटे से परिवार ने भयंकर मुशीबत उठा कर मुझे पढ़ने बनारस भेजा।इसमें हमारे लिए अत्यंत आवश्यक संसाधन जुटाने में भाई जी की भी शिक्षा रुक गई थी माता जी के लिए भी बहुत  संघर्ष तो था  ही। 

     भूख पर लगाम लगाकर मैंने चार विषय से एम.ए.किया,बी.एच.यू. से पी.एच.डी. भी की।किसी डिग्री कालेज में नौकरी मिल सकती थी हमारे बहुत हमसे छोटे छात्र मित्र सरकारी नौकरियों में अच्छे अच्छे पदों पर हैं जो अक्सर हमारी परिश्रमशीलता एवं वैदुष्य की प्रशंसा करके हमें सुख पहुँचाते हैं जिनके लिए मैं हमेशा उनका आभारी हूँ ।कई बार अमीरों से अपमानित और आहत होने पर ऐसी प्रशंसाएँ बड़ा संबल बनती हैं बड़ा सहारा देती हैं।लगता है चलो किसी को पता तो है कि मैं भी सम्मान एवं आर्थिक विकास का अधिकारी  था ।

    किंतु सन् 1989-90 में चले आरक्षण आंदोलन में पूर्वजों पर लगे शोषण के आरोपों को मैं सह नहीं सका।मैं अक्सर तनाव में रहने लगा और एक ही बिचार मन में चलता रहा कि हमारे पूर्वजों ने आखिर किसी का शोषण क्यों किया? पचासों विद्वानों शिक्षाविदों से मिला उनसे हमारे बस इतने ही प्रश्न  होते थे।

1.  हमारे पूर्वजों ने किसी का शोषण  क्यों किया?

2.वह शोषण का धन गया कहॉं आखिर हमें इतनासंघर्ष  क्यों करना पड़ा? 

3. संख्या बल में सवर्णों से अधिक होने पर भी असवर्णों  के पूर्वजों ने शोषण सहा क्यों?

4.  सजा अपराधी को दी जाती है उसके परिजनों को नहीं पूर्वजों का यदि कोई अपराध हो ही तो उसका दंड हमें  क्यों?

5. यदि अपराध की आशंका है ही तो अपराध के प्रकार की जॉंच होनी चाहिए और हम लोगों की तलाशी  की जानी चाहिए और जातीय ज्यादती के द्वारा प्राप्त ऐसा कोई धन यदि प्रमाणित हो जाए तो जब्त किया जाना चाहिए। इस प्रकार से सवर्ण वर्ग का  शुद्धिकरण करके ये फाँस हमेंशा के लिए समाप्त कर देनी चाहिए।आखिर कितनी पीढ़ियॉं और शहीद की जाएँगी इस तथाकथित शोषण पर?कब तक ढोया जाएगा इस शोषण कथा को?आखिर शोषण का आरोप सहते सहते और कितने लोगों की बलि ली जाएगी ?  

    हमें आज तक इन बातों के जवाब नहीं मिले।मैंने एक व्रत लिया था कि इस निपटारे से पूर्व मैं किसी सरकारी सेवा के लिए कोई आवेदन नहीं करूँगा मैं आज तक व्रती हूँ।न मुझे जवाब मिले न ही मैंने नौकरी माँगी।

     स्वजनों अर्थात तथा कथित सवर्णों ने हमारा और हमारी शिक्षा का शोषण करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।किसी को किताबें लिखानी थीं किसी को मैग्जीन,किसी ने देश सेवा की दुहाई दी किसी ने हमारे और हमारे परिवार के भविष्य सुधारने का लालच दिया।कुछ लोगों ने बड़े लालच देकर बड़े बड़े काम लिए दस बारह घंटे दैनिक परिश्रम के बाद वर्षोँ तक सौ दो सौ रुपए मजदूरों की भाँति देते रहे एक आध ने तो यह लालच देकर काम लिया कि हम तुम्हें एक स्कूल खोल कर दे देंगे उसको परिश्रम पूर्वक चला लेना जिससे तुम्हारा जीवन यापन हो जाएगा किंतु काम निकलने के बाद में उन्होंने भी मुख फेर लिया यह कैसे और किसको किसको कहें कि वे बेईमान हो गए आखिर शिक्षा से जुड़ा हूँ , मर्यादा तो ढोनी ही है।पेट और परिवार का पालन करना है। 

      आज क्या मुझे मान लेना चाहिए कि ब्राहमण या सवर्ण था इसलिए ऐसे लोग  हम पर इस प्रकार की कृपा करते रहे।सरकारी नौकरी न माँगने का व्रत है तो जीवन ढोने के लिए किसी पर विश्वास तो करना ही पड़ेगा।अनुभव लेते लेते जीवन गुजरा जा रहा है। 

     किसी और की अपेक्षा अपने जीवन को मैंने इसलिए उद्धृत किया है कि गरीब सवर्णों को भी अमीरों के शोषण का उतना ही शिकार होना पड़ता है जितना किसी और को वह अमीर किसी भी जाति,समुदाय, संप्रदाय आदि का क्यों न हो।अमीर केवल अमीर होता है इसके अलावा कुछ नहीं ।यह हमारे अपने अनुभव का सच है मेरा किसी से ऐसा आग्रह भी नहीं है कि वो मुझसे या मेरी बातों से सहमत ही हो। 

 

         राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

Sunday, August 7, 2016

शरद यादव जी ! शिव भक्तों के अलावा कभी किसी अन्य धर्म वालों के विरुद्ध कुछ बोलकर देखो तो वो मुख नोच लेंगे आपका !

   शरद यादव जी !आपसे बड़ा बेरोजगार कौन है इस धरती पर !आप क्यों नहीं गए काँवड़ लेकर !
आप मुख्यमंत्री नहीं बनाए गए और अध्यक्ष पद भी आपसे छीन लिया गया है  अपनी ही पार्टी पर बोझ बन चुके हैं आप !अन्यथा बिहार के मुख्यमंत्री आप भी तो बनाए जा सकते थे !दो रोटी आप भी तो खाते हैं थोड़ी बहुत अकल तो भगवान् ने आपको भी दी है किंतु आपकी पार्टी आपको अकलमंद मानने को तैयार क्यों नहीं है ?
    ऐसे नेताओं की बातों पर कैसे भरोसा किया जाए !भगवान् शंकर के भक्तों को बेरोजगार बता देना कितनी मूर्खता की निशानी है राजनैतिक स्वार्थों के लिए शिव भक्तों के लिए इतनी बड़ी बात बोल देना ! शरद जी खैर मनाओ !हिंदुओं के विषय में बोला है तो हिंदूलोग सहिष्णु हैं सह भी जाएँगे किसी और धर्म वालों के लिए बोला होता तो वो अब तक मुख नोच लेते आपका !
    धिक्कार है ऐसी राजनीति और ऐसे राजनेताओं को जो दूसरे धर्मवालों को खुश करने के लिए क्या क्या नहीं बोल जाते हैं हिंदुओं को !और हिन्दू लोग थोड़ा भी प्रतीकार करने लग जाएँ तो कह देंगे कि इनमें सहनशीलता नहीं है ।वोट लोभ से राजनेताओं को क्या कुछ नहीं करने पड़ते हैं पाप ! कितना गिर जाते हैं ये लोग !वैसे बयानों की तुलना तो वेश्याओं से भी नहीं की जा सकती है । 
 वेश्याओं ने पेट भरने के लिए शरीर को दाँव पर लगा दिया किंतु चरित्र और सिद्धांतों को बचा लिया !केवल धन ही इकठ्ठा करना था तो वेश्यावृत्ति नहीं अपितु राजनीति करतीं जो सबसे अधिक कमाऊ धंधा है । जहाँ कुत्तों की तरह से केवल दूसरों  की कमाई पर ही नजर गड़ाए रखनी होती है !    वेश्याओं को पता है कि दूसरों की कमाई पर कब्जा करने के लिए वेश्यावृति नहीं अपितु राजनीति करनी होती है !
    राजनीति में आने के बाद चरित्र बचाना कठिन हो जाता है और जिसका चरित्र ही न बचे उसके जीवन का अर्थ और औचित्य ही समाप्त हो जाता है इसीलिए वेश्याएँ बेचारी गरीबत के कारण सारी दुर्दशा सहती हैं यहाँ कि शरीर बेचना स्वीकार कर लेती हैं किंतु चरित्र बचा लेती हैं जिसे राजनीति में आने के बाद बचा पाना अत्यंत कठिन हो जाता है !अपने चरित्र को बचाने के लिए कितनी सतर्क हैं वो!भगवान् दत्तात्रेय ने उनके सिद्धांतों से प्रभावित होकर ही तो उन्हें गुरूबनाया होगा !आखिर उन्होंने किसी राजा या राजनेता को तो गुरू नहीं बना लिया
     !इसलिए नेताओं की तुलना वेश्याओं से नहीं की जा सकती ।वेश्याएँ अपनी आमदनी के स्रोत बता सकती हैं इतनी पारदर्शिता और कानून के प्रति सम्मान की भावना है उनमें किंतु नेताओं की अथाह संपत्ति के स्रोत आकाश से भी अनंत हैं चुने हुए प्रतिनिधियों को मिलने वाली सैलरी से संपत्ति के इतने अंबार नहीं लगाए जा सकते !
      राजनीति में पैसा तो बहुत मिलता है पर चरित्र चला जाता है चरित्र बचाने के लिए वेश्याओं को करनी पड़ी वेश्यावृत्ति !वेश्याएँ भी नेता बनकर इकट्ठा कर सकती थीं अपार संपत्ति !किंतु चरित्र चला जाता !इसलिए शरीर बेच लिया और चरित्र बचा लिया !
   नेता बनते समय पैसे पैसे के लिए मोहताज नेतालोग अचानक अरबों खरबों के मालिक हो जाते हैं न कोई धंधा न कोई रोजगार फिर भी संपत्तियों के भरे हैं  भंडार ! किंतु नेताओं की तरह पाप करने के लिए वेश्याओं का मन नहीं माना !वो नेताओं की तरह अपना कालेजा कठोर नहीं कर सकीं !वो भी नेता बनकर अपराधियों से ले सकती थीं घूस !दलितों के नाम पर शोर मचाकर योजनाएँ पास करवातीं और खुद हड़पजातीं !अशिक्षित लोगों से घूस लेतीं उन्हें शिक्षक बना देतीं !सरकारी नौकरी दे देतीं !प्रमोशन कर देतीं !मिड डे मील बेचलेतीं !मरीजों के हिस्से की दवाइयाँ बेच लेतीं !गरीबों के हिस्से का राशन बेच लेतीं !अधिकारियों से भ्रष्टाचार करके धन कमवातीं कुछ अपने पास रख लेतीं और कुछ से उनकी सैलरी बढ़ दिया करतीं सारे खुश ! अरबों इकठ्ठा कर सकती थीं बड़ी बड़ी कोठियाँ बना सकती थीं किंतु नेताओं की तरह बच्चों गरीबों मरीजों को दगा देने के लिए वेश्याओं का मन नहीं माना !    
    नेताओ खबरदार! वेश्याओं से नेताओं की तुलना की तो !जिस डर से वेश्याएँ बेचारी सारी मुसीबतें सह लेती हैं !आर्थिक परिस्थितियों के कारण शरीर बेचती हैं किंतु अपना चरित्र बचा लेती हैं उन पर गर्व किया जा सकता है किन्तु नेताओं पर नहीं ! 
    वेश्याओं को भी पता होता है कि राजनीति सबसे अधिक कमाऊ धंधा है नेताओं की कमाई के आगे वेश्याओं की कमाई फीकी है !किंतु चरित्रवती वेश्याएँ सोचती हैं कि कमाई के लालच में राजनीति करनी शुरू की तो चरित्र चला जाएगा !चरित्र की चिंता में बेचारी सारी दुर्दशा सहती हैं किंतु नेता कहलाना पसंद नहीं करती हैं । 
    वेश्याओं को लगता है कि राजनीति में कमाई भले ही कितनी भी क्यों न हो किंतु वो हुई कैसे इस बात का नेता के पास कोई जवाब नहीं होता है ।गरीब से गरीब लोग जिनकी जेब में किराया नहीं हुआ करता था राजनीति में आने के बाद वो अरबों खरबों के मालिक हो गए आखिर ये चमत्कार हुआ कैसे !व्यापार कोई किया नहीं पुस्तैनी संपत्ति इतनी थी नहीं और यदि  गरीबों अल्प संख्यकों का हक़ नहीं हड़पा तो अपने आयस्रोत बताइए !जनता स्वयं जाँच कर लेगी कि कितने कमाऊ और कितने इज्जतदार हैं नेता लोग !चले वेश्याओं को नीची निगाह से देखने !जिनके काम में पारदर्शिता है राजनेताओं के काम में कोई पारदर्शिता  नहीं है !वेश्याएँ अपने शरीर की कमाई खाती हैं किंतु नेता लोग दूसरों के हक़ हड़पते हैं ।
     महिलाओं के हकों के लिए लड़ने का नाटक करने वाले नेता महिलाओं के लिए पास किया गया फंड खुद खा जाते हैं इस ही अल्पसंख्यकों के हितैषी नेता खा जाते हैं अलप संख्यकों के हक़ !दलितों के नाम पर राजनीति चमकाने वाले नेता नीतियाँ दलितों के हक़ हड़प जाते हैं ।दूसरों के हक़ हड़पकर सुख सुविधाएँ भोगते घूम रहे अकर्मण्य लोग चले वेश्याओं का सम्मान घटाने !
     वेश्याएँ किसी की माँ बहन बेटियाँ होती हैं वो इस देश की  सम्मानित नारियाँ हैं वो हमसबकी तरह ही देश की नागरिक हैं !उनमें सभी धर्मों और सभी जातियों की महिलाएँ होती हैं !वो नहीं चाहती हैं कि राजनीति में आवें उनके भी घपले घोटाले उजागर हों उनकी अकर्मण्यता के कारण उनके नाते रिश्तेदारों सगे संबंधियों को आँखें झुकानी पढ़ें !ये वेश्याओं का अपना गौरव है । 
    वेश्याएँ सेक्स करती हैं ये बुरा होता है या जो ग्राहक ज्यादा पैसे दिखाए उसके पीछे भाग खड़ी होती हैं ये बुरा है !आखिर वेश्याओं में बुराई क्या है सेक्स तो सभी करते हैं एक से अधिक लोगों से सेक्स करना बुरा है तो प्रेमी जोड़े नाम के सेक्स व्यापारी भी तो अधिक  स्त्री पुरुषों से सेक्स करते हैं वो नहीं बुरे इसका मतलब वेश्याएँ अधिक लोगों से सेक्स के कारण बदनाम नहीं हैं अपितु बदनाम इसलिए हैं कि जो ज्यादा पैसे दिखाए उसकी हो जाती हैं । वेश्याएँ यदि केवल इस दोष के कारण दोषी होती हैं तो राजनीति में तो ये खूब हो रहा है प्रत्याशियों  का चयन करते समय अधिकाँश तो पैसा ही देखा जाता है बाकी  शिक्षा  चरित्र सदाचरण आदि सबकुछ तो गौण होता है एक से एक चरित्रवान विद्वान् कार्यकर्ता पैसे न होने के कारण पीछे कर दिए जाते हैं और पैसे वाले एक से  एक खूसट जिन्हें ये भी नहीं पता होता है कि किससे कैसे क्या बोलना है क्या नहीं या हम जो बोल रहे हैं उसका अर्थ क्या निकलेगा फिर भी उनका पैसा देखकर पार्टियाँ उन्हें न केवल उन्हें अपना प्रत्याशी बनती हैं अपितु अपनी पार्टी और संगठन के जिम्मेदार पदों पर भी ऐसे ही लोगों को बैठा देती हैं फिर उन पैसे वालों का जो मन आता है वो उसे बोल देते हैं और उन पार्टियों का लालची केंद्रीय नेतृत्व पीछे पीछे खेद प्रकट करते माफी माँगते चलता है !ये राजनैतिक वैश्यावृत्ति नहीं तो है क्या ?
    वेश्याओं के भी कुछ तो तो जीवन मूल्य होते होंगे ही किंतु राजनेताओं के तो वो भी नहीं रहे !उन्हें तो केवल कमाई दिखाई पड़ती है ! जो लोग दबे कुचलों लोगों के हकों के लिए दम्भ भरते हैं उन्हें कुछ कह दिया जाए  इतनाबुरा लगता है किंतु वही शब्द किसी और को बोल दिया जाए तो बुरा क्यों नहीं लगता !
    अरे !दबे कुचलों के हिमायती ड्रामेवाजो !ये क्यों नहीं सोचते कि जो शब्द हमें कह दिया जाए तो इतना बुरा लग जाता है जिन महिलाओं की पहचान ही वही शब्द हो उन्हें कितना बुरा लगता होगा उनकी दशा सुधारने के लिए कितने आंदोलन किए अपने !दबे कुचलों के नाम पर सरकारी खजाना लूटकर अपना घर भर लेने वालो !यदि कर्म इतने ही अच्छे होते तो CBI का नाम सुनते ही पसीना क्यों छूटने लगता है !इसके पहले की सरकार तो जब जिस मुद्दे पर हामी भावना चाहती थी छोड़दिया पार्टी थी CBI सारे घोटालेवाजों को जब जहाँ चाहती थी तब तहाँ मुर्गा बना दिया करती थी !हिम्मत थी तो तब न मानते उनकी बात !आज आए इज्जतदार बनने !!
    वेश्याओं को राजनेता  इतनी गिरी दृष्टि से देखते हैं जिनके अपने कोई जीवन मूल्य नहीं होते !वेश्याओं का चरित्र राजनेताओं से ज्यादा गिरा होता है क्या ?वेश्याओं को इतनी गंदी दृष्टि से देखते हैं नेता लोग !
   वेश्याएँ भी चाहें तो और कुछ कर पावें न कर पावें किंतु वेश्यावृत्ति को छोड़कर राजनीति तो वो भी कर सकती हैं और वो भी कर सकती हैं अनाप शनाप कमाई किंतु उन्हें अपना चरित्र प्यारा है वो शरीर बेच लेती हैं किंतु चरित्र बचा लेती हैं ।    
   वेश्या से तुलना कर देना किसी को यदि इतना बुरा लग सकता है तो जो वास्तव में वेश्याएँ हैं कितना  दुःख सह रही हैं वे महिलाएँ !क्या उनके लिए इस राजनीति की कोई जिम्मेदारी नहीं है !

Friday, June 24, 2016

ज्योतिष की निंदा करने से पाखंडी भोगगुरु की पोल तो खुल गई कि इन्होंने आयुर्वेद भी नहीं पढ़ा है !

   पाखंडी बाबा लोग बिना पढ़े लिखे होने के कारण  कसरत और व्यायाम को भी योग बताने लगते हैं किंतु ज्योतिष को पाखंड और ज्यातिषियों को पाखंडी कहते हैं जबकि ज्योतिष ही वास्तव में दिव्य विद्या है ।
    इसीलिए पुराने लोग कहा करते थे कि बचपन में मेहनत करके पढ़ लो अन्यथा तुम्हारी मूर्खता के कारण ज्योतिष जैसा दिव्य शास्त्र तुम्हें समझ में नहीं आएगा और तुम समझोगे ज्योतिष ही गलत है !बेकार में नाक कटाते घूमोगे ज्योतिष एवं ज्योतिषियों पर उठ पटांग टिप्पणियाँ करके !वैसे भी हाथ पर हिलाने डुलाने वाले व्यायामी योगियों के बश का कहाँ है ज्योतिष जैसा गंभीर शास्त्र समझना !
     समय ही जिसका खराब हो उसे कैसे स्वस्थ कर लगा   आयुर्वेद या विश्व की कोई भी चिकित्सा पद्धति !समय जिसका पूरा  हो चुका हो उसे कैसे बचा लेगी विश्व की कोई भी चिकित्सा पद्धति !समय अच्छा है या बुरा इसे बताने वाला आयुर्वेद नहीं अपितु ज्योतिष है व्यायाम और आयुर्वेद की सामर्थ्य अत्यंत सीमित है चिकित्सा पद्धति स्वस्थ होने लायक रोगी को ही स्वस्थ कर सकती है हर रोगी को नहीं किंतु स्वस्थ होने लायक रोगी और न स्वस्थ होने लायक रोगियों के अंतर को स्पष्ट तो ज्योतिष ही करेगा !ये आयुर्वेद के बश की बात ही नहीं है !
      जिन पाखंडियों ने आयुर्वेद भी नहीं पढ़ा है वे ज्योतिष की निंदा करते फिर रहे हैं !आयुर्वेद ही पढ़ा होता तो भी पता होता ज्योतिष एवं वास्तु आदि का महत्त्व !मैं 'सुश्रुतसंहिता' और और 'चरकसंहिता' जैसे ग्रंथों में दिखा दूँगा ज्योतिषशास्त्र का खुला प्रयोग ! ज्योतिष शास्त्र के बिना विकलांग है आयुर्वेद !

    ज्योतिष शास्त्र समय संबंधी पूर्वानुमान का सबसे बड़ा विज्ञान है !ये अगर पेट पिचका कर पैसे कमाने वाले नट नागरों को न समझ में आए तो इसके लिए ज्योतिष शास्त्र और ज्योतिष विद्वान क्या करें !कैसे घुसाएँ उन दिमागी अपाहिजों की घमंडी खोपड़ी में! 
     जिस ज्योतिष शास्त्र को आयुर्वेद केवल मानता ही नहीं है अपितु आयुर्वेद अधूरा है ज्योतिष शास्त्र के बिना !आयुर्वेद के बड़े बड़े ग्रंथों में ज्योतिष शास्त्र संबंधित बातों को उद्धृत किया गया है  गया है !यदि कोई व्यक्ति ज्योतिष शास्त्र न भी पढ़ा हो केवल आयुर्वेद भी पढ़ा हो तो उसे भी पता होगा ज्योतिष शास्त्र का महत्त्व किंतु जिसने कुछ पढ़ा ही न हो उसके लिए बेकार है ज्योतिष क्या कोई भी शास्त्र ! वो जिस विषय में जितनी चाहे उतनी बकवास करे स्वतंत्र है वो !जितनी योग के नाम पर कसरत करने के लिए हाथ पैर तो कोई भी हिला  डुला सकता है पढ़ा हो या अनपढ़ किंतु ज्योतिष शास्त्र वेदों का नेत्र है !ये उसी को समझ में आएगा जिसके पास दिमाग होगा !ज्योतिष जैसे शास्त्र के विषय में मुख उठा के ऐसे ऐसे लोग बकवास करने लगते हैं जिनमें शास्त्रों को समझने की क्षमता ही नहीं है । 
    आयुर्वेद के शीर्ष ग्रंथों में भी औषधि आहरण से लेकर औषधि निर्माण एवं औषधि दान तक की विधि में ज्योतिष शास्त्र का भरपूर उपयोग किया गया है !औषधि आहरण में स्थान विशेष की चर्चा सुश्रुत संहिता में वास्तु के आधार पर ही की गई है की तक की विधि थ भी कहते हैं !ज्योतिषशास्त्र जन्मपत्री विज्ञान वास्तु विज्ञान को यदि वे गलत कहते हैं तो इधर उधर योग शिविरों कहते क्यों घूम रहे हैं सीधे शास्त्रार्थ करें और गलत सिद्ध करके दिखावें ज्योतिष को !साधू संतों जैसा वेष धारण करके शास्त्रों की निंदा करना निंदनीय है कोई बात यदि किसी को समझ में न आवे इसका मतलब ये नहीं कि वो गलत है !रिओं यदि उन्हें गलत की सत्यता पर यदि संदेह हो तो बाबा जी करें शास्त्रार्थ !सरकार व्यवस्था करे !
    योग शिविरों में ज्योतिष की बुराई करना ठीक नहीं है यदि ज्योतिष की पद्धति गलत सिद्ध होगी तो बंद कर दी जाएगी !दूध का दूध पानी का जाएगा !यदि सही होगी तो ज्योतिष की बुराई बंद हो जाएगी !ऐसे कोई भी कभी भी ज्योतिष की निंदाकरने लगता आखिर ज्योतिष एक विषय है !कोई ज्योतिषी गलत हो सकता है किंतु शास्त्र नहीं
!
के
वल ज्योतिष ही नहीं संपूर्ण धर्म क्षेत्र ही आज भ्रष्टाचार का शिकार है योग्य और सदाचारी लोगों को खोज पाना दिनोंदिन कठिन होता जा रहा है !धर्म की जितनी विधाएँ हैं सब फेल होती जा रही हैं समाज में बढ़ते अपराध इस बात के सुदृढ़ प्रमाण हैं !पैसे के बल पर भीड़ कहीं कोई कितनी भी इकट्ठी कर ले किंतु समाज सिरे से ख़ारिज करता जा रहा है !ज्योतिष शास्त्र के क्षेत्र में जो ज्योतिष पढ़े नहीं हैं वो भी ज्योतिष की निंदा करते हैं अरे !जिस विषय को आप जानते ही नहीं हैं उसके सही गलत होने का फैसला आप कैसे कर सकते हैं ! आखिर ज्योतिष भी एक शास्त्र है कोई व्यक्ति कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए वो शास्त्र से बड़ा कभी नहीं हो सकता !वैसे भी शास्त्रार्थ अपनी पुरानी परंपरा है इसमें कोई बुराई भी नहीं है ! शंका समाधान हो जाए तो क्या बुरा है !
" ग्रहों की मान्यता को पाखंड बताने वाला कोई भी व्यक्ति यदि ज्योतिष पढ़ा हो तो उसे शास्त्रार्थ की खुली चुनौती !"

जिसने ज्योतिष पढ़ी हो उसी से हो सकता है शास्त्रार्थ !और जिसने जिस विषय को पढ़ा ही न हो वो उस विषय को सही या गलत कैसे कह सकता है ।बिना पढ़े लोग तो सारी दुनियाँ को अपने जैसा ही अनपढ़ समझते हैं इसलिए मुख उठाकर कभी किसी को भी कुछ भी बोल देते हैं ऐसे लोगों से शास्त्रार्थ कर पाना कैसेsee more...http://bharatjagrana.blogspot.in/2016/06/blog-post_20.html "

Sunday, May 22, 2016

Bhukamp Date and Time


Magnitude 8 and Greater Earthquakes Since 1900

The lists and statistics on this webpage have not been updated since December 2012. Many of these will be updated and available when we have completed the transition into the new earthquake database. We hope to provide this sometime in 2015.

Display Magnitude 8 Earthquakes in Google Earth.
Date - UTC - Time
Latitude
Longitude
Magnitude
Fatalities
Region
1902/06/11 05: 50.00 148.00 8.0
Sea of Okhotsk
1903/01/04 05:07 -20.00 -175.00 8.0
Tonga
1903/08/11 04:32 36.36 22.97 8.3
southern Greece
1905/07/09 09:40 49.0 99.0 8.4
Mongolia
1905/07/23 02:46 49.0 98.0 8.4
central Mongolia
1906/01/31 15:36 1.0 -81.5 8.8 1000 Colombia-Ecuador
1906/08/17 00:40 -33.0 -72.0 8.2 3882 Valparaiso, Chile
1907/10/21 04:23 38.00 69.00 8.0
Afghanistan
1908/12/12 12:08 -14.0 -78.0 8.2
off the coast of central Peru
1911/06/15 14:26 28.0 130.0 8.1 12 Ryukyu Islands, Japan
1914/05/26 14:22 -2. 137. 8.0
West New Guinea
1915/05/01 05:00 47. 155. 8.0
Kurile Islands
1917/05/01 18:26 -29.0 -177.0 8.0
Kermadec Islands, New Zealand
1917/06/26 05:49 -15.0 -173.0 8.4
Tonga
1918/08/15 12:18 5.653 123.563 8.0 50 Celebes Sea
1918/09/07 17:16 45.5 151.5 8.2
Kuril Islands
1919/04/30 07:17 -19.823 -172.215 8.2
Tonga region
1920/06/05 04:21 23.5 122.0 8.0
Taiwan region
1920/09/20 14:39 -20.0 168.0 8.0
Loyalty Islands
1922/11/11 04:32 -28.553 -70.755 8.5
Chile-Argentina Border
1923/02/03 16:01 54.0 161.0 8.5
Kamchatka
1924/04/14 16:20 7.023 125.954 8.3
Mindanao, Philippines
1928/06/17 03:19 16.33 -96.7 8.0
Oaxaca, Mexico
1931/08/10 21:18 47.1 89.8 8.0 5 northern Xinjiang, China
1932/06/03 10:36 19.84 -103.99 8.1
Jalisco, Mexico
1933/03/02 17:31 39.22 144.62 8.4 2990 Sanriku, Japan
1934/01/15 08:43 27.55 87.09 8.1 10700 Bihar, India
1938/02/01 19:04 -5.05 131.62 8.5
Banda Sea
1938/11/10 20:18 55.33 -158.37 8.2
Shumagin Islands, Alaska
1939/04/30 02:55 -10.5 158.5 8.0
Solomon Islands
1940/05/24 16:33 -10.5 -77.0 8.2
near the Coast of central Peru
1941/11/25 18:03 37.171 -18.960 8.2
Azores-Cape St. Vincent Ridge
1942/08/24 22:50 -15.0 -76.0 8.2 30 Off the coast of central Peru
1943/04/06 16:07 -30.75 -72.0 8.2 18 off the coast of Coquimbo, Chile
1944/12/07 04:35 33.75 136.00 8.1 1223 Tonankai, Japan
1945/11/27 21:57 24.5 63.0 8.0 4000 off the coast of Pakistan
1946/04/01 12:28 52.75 -163.50 8.1 165 Unimak Islands, Alaska
1946/08/04 17:51 19.25 -69.00 8.0 100 Dominican Republic
1946/12/20 19:19 32.5 134.5 8.1 1330 Nankaido, Japan
1948/01/24 17:46 10.5 122.0 8.2 72 Panay, Philippines
1949/08/22 04:01 53.62 -133.27 8.1
Queen Charlotte Island, B.C., Canada
1950/08/15 14:09 28.5 96.5 8.6 1526 Assam-Tibet
1952/03/04 01:22 42.5 143.0 8.1 31 Hokkaido, Japan region
1952/11/04 16:58 52.76 160.06 9.0
Kamchatka, Russia
1957/03/09 14:22 51.56 -175.39 8.6
Andreanof Islands, Alaska
1957/12/04 03:37 45.15 99.21 8.1
Gobi-Altai, Mongolia
1958/11/06 22:58 44.329 148.623 8.3
Kuril Islands
1959/05/04 07:15 53.351 159.645 8.2 1 near the east coast of Kamchatka
1960/05/22 19:11 -38.29 -73.05 9.5 1655 Chile
1963/10/13 05:17 44.9 149.6 8.5
Kuril Islands
1964/03/28 03:36 61.02 -147.65 9.2 125 Prince William Sound, Alaska
1965/02/04 05:01 51.21 -178.50 8.7
Rat Islands, Alaska
1966/10/17 21:41 -10.807 -78.684 8.1 125 near the coast of central Peru
1968/05/16 00:49 40.903 143.346 8.2 47 off the east coast of Honshu, Japan
1969/08/11 21:27 43.478 147.815 8.2
Kuril Islands
1970/07/31 17:08 -1.49 -72.56 8.0
Colombia
1971/01/10 07:17 -3.132 139.697 8.1
Papua, Indonesia
1974/10/03 14:21 -12.254 -77.524 8.1 78 near the coast of central Peru
1976/08/16 16:11 6.292 124.090 8.0 8000 Mindanao, Philippines
1977/06/22 12:08 -22.878 -175.900 8.1
Tonga region
1977/08/19 06:08 -11.085 118.464 8.3 100 south of Sumbawa, Indonesia
1979/12/12 07:59 1.598 -79.358 8.1 600 near the coast of Ecuador
1985/03/03 22:47 -33.135 -71.871 8.0 177 offshore Valparaiso, Chile
1985/09/19 13:17 18.190 -102.533 8.0 9500 Michoacan, Mexico
1986/05/07 22:47 51.520 -174.776 8.0
Andreanof Islands, Aleutian Islands, Alaska
1989/05/23 10:54 -52.341 160.568 8.1
Macquarie Island region
1994/06/09 00:33 -13.841 -67.553 8.2 5 La Paz, Bolivia
1994/10/04 13:22 43.773 147.321 8.3 11 Kuril Islands
1995/07/30 05:11 -23.340 -70.294 8.0 3 Near Coast of Northern Chile
1995/10/09 15:35 19.055 -104.205 8.0 49 Near Coast of Jalisco, Mexico
1996/02/17 05:59 -0.891 136.952 8.2 166 Irian Jaya region, Indonesia
1998/03/25 03:12 -62.877 149.527 8.1
Balleny Islands region
2000/11/16 04:54 -3.980 152.169 8.0 2 New Ireland region, Papua New Guinea
2001/06/23 20:33 -16.264 -73.641 8.4 75 near the coast of southern Peru
2003/09/25 19:50 41.815 143.910 8.3
Hokkaido, Japan region
2004/12/23 14:59 -49.312 161.345 8.1
north of Macquarie Island
2004/12/26 00:58 3.295 95.982 9.1 227898 off the west coast of northern Sumatra
2005/03/28 16:09 2.074 97.013 8.6 1313 Northern Sumatra, Indonesia
2006/05/03 15:26 -20.187 -174.123 8.0
Tonga
2006/11/15 11:14 46.592 153.226 8.3
Kuril Islands
2007/01/13 04:23:21 46.243 154.524 8.1
East of the Kuril Islands
2007/04/01 20:39:58 -8.466 157.043 8.1 34 Solomon Islands
2007/08/15 23:40:57 -13.386 -76.603 8.0 650 Near the Coast of Central Peru
2007/09/12 11:10:26 -4.438 101.367 8.5 25 Southern Sumatra, Indonesia
2009/09/29 17:48:10 -15.489 -172.095 8.1 192 Samoa Islands region
2010/02/27 06:34:14 -35.846 -72.719 8.8 577 Offshore Maule, Chile
2011/03/11 05:46:23 38.322 142.369 9.0 28050 Near the East Coast of Honshu, Japan
2012/04/11 08:38:37 2.311 93.063 8.6
off the west coast of northern Sumatra
2012/04/11 10:43:09 0.773 92.452 8.2
off the west coast of northern Sumatra

South Latitudes and West Longitudes are indicated by NEGATIVE numbers.
Source: USGS NEIC PDE catalog; Data are preliminary.