भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को न सफलता मिलती है और न ही सुख ! विवाह, विद्या ,मकान, दुकान ,व्यापार, परिवार, पद, प्रतिष्ठा,संतान आदि का सुख हर कोई अच्छा से अच्छा चाहता है किंतु मिलता उसे उतना ही है जितना उसके भाग्य में होता है और तभी मिलता है जब जो सुख मिलने का समय आता है अन्यथा कितना भी प्रयास करे सफलता नहीं मिलती है ! ऋतुएँ भी समय से ही फल देती हैं इसलिए अपने भाग्य और समय की सही जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए |एक बार अवश्य देखिए -http://www.drsnvajpayee.com/
Wednesday, December 18, 2013
जब तक रहेगा भ्रष्टाचार तब तक रहेंगे चाटुकार !
यह सब देखकर लगता है कि इस देश में लोकपाल को भी जोकपाल बना कर ही छोड़ा जाएगा और भ्रष्टाचार इस देश में सरकार एवं सरकारी कर्माचारियों के लिए संजीवनी हमेंशा साबित होता रहेगा !
मोदी जी की दाढ़ी मूँछ केवल दिखावे के लिए नहीं अपितु आवश्यक भी है
आखिर ईश्वर ने कुछ सोच कर ही पुरुषों को दाढ़ी मूँछ दिए होंगे वह भी तब जब कोई लड़का युवा हो जाता है ताकि वो अपने दाढ़ी मूँछ का महत्त्व समझ सके और उसका सम्मान सुरक्षित रख सके जिससे कोई ऐसा गलत काम न करे ताकि मुच्छ के बाल झुका कर चलना पड़े इसीलिए मर्द की पहचान और स्वाभिमान ही मुच्छ मानी जाती रही है पुराने सभी राजा महराजा भी दाढ़ी मूँछ रखने वाले ही होते थे तब भ्रष्टाचार भी आज की अपेक्षा कम था ।
पहले लोग फैशन भी अपनी इच्छा के अनुशार करते थे आज की तरह टेलीवीजन देखकर कोई अपनी जिंदगी नहीं जीता था क्योंकि वो तो नाटक खेलते हैं किन्तु उन्हें जो वास्तविक जीवन में धारण कर लेते है उन्हें दिक्कत होती है जैसे ठोढ़ी पर बाल रखाने वाले पहले व्यक्ति को हो सकता है कि यहाँ कोई दाग धब्बा रहा हो उसे ढकने के लिए उसने ठोढ़ी रखाई हो किन्तु जो लोग आज ठोढ़ी रखाते हैं उनकी तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं है
जिन सिंहों के दाढ़ी मूँछ होती है उन्हें ही धुतकेशर कहते हैं ये सिंह उच्च कोटि के माने जाते हैं भगवती दुर्गा जी भी जिस सिंह की सवारी करती थीं वह भी धुत केशर ही था ।
अतएव यह तो अपना अपना देखने का नजरिया है कि कोई किसको कैसा अच्छा लगता है किन्तु भ्रष्टाचार में फँसा देश अब एक दाढ़ी मूँछ वाला पूर्ण पुरुष ही प्रधान मंत्री के रूप में चाहता है खंडित नहीं !साथ ही यह भी चाहता है कि दाढ़ी मूँछ वह किसी धार्मिक मजबूरी में न रखता हो वह अपने, अपने समाज एवं अपने देश की रक्षा के लिए आत्म गौरव की भावना रखता हो इस भावना से यदि वह दाढ़ी मूँछ रखता है तो चित्रांगदा जी आपको अच्छा लगे न लगे किन्तु देश को अच्छा जरूर लगेगा क्योंकि देश अब तंग है अपूर्ण पुरुषों से ! इसलिए इन सभी अच्छाइयों को ध्यान में रखते हुए नरेंद्र मोदी जी ही इस समय की प्रधान मंत्री की दृष्टि से इस समय की सर्व श्रेष्ठ माँग हैं ।
Monday, December 16, 2013
बलात्कार की घटनाएँ बहुत हुई हैं किन्तु चर्चा केवल एक बलात्कार की ही क्यों है ?
पिछले वर्ष हुई एक बलात्कार की दुर्घटना आखिर सब बलात्कारों पर भारी क्यों है केवल उसी की चर्चा उसी पर योजनाएँ उसी पर शोक संवेदनाएँ उसी पर सहानुभूति उसी पर नेताओं मीडिया कर्मियों की निगाह आखिर क्यों टिकी रहती है ? वही बलात्कार बलात्कार है उसी के माता पिता के आँसू आँसू हैं उसी की पीड़ा पीड़ा है आखिर क्यों ?
उसके अलावा भी कई बड़ी दुर्भाग्य पूर्ण दुर्घटनाएँ महिलाओं बच्चियों के साथ घटी हैं कई के मुख पर तेज़ाब फेंकने की दुर्घटनाएँ हुई हैं इसके अलावा कई नाबालिग बच्चियाँ अत्याचार की शिकार हुई हैं उन सब की पीड़ा क्या पीड़ा नहीं है या वे इंसान नहीं हैं या वो इस देश की सम्माननीय नागरिक नहीं हैं।
चर्चा जब बलात्कारों की चलाई जाए तो सभी महिलाओं बच्चियों की पीड़ा को सामान रूप से क्यों न देखा जाए सबके जीवन के साथ समान सहानुभूति क्यों न रखी जाए सबके साथ सामान संवेदनाएँ क्यों न रखी जाएँ ? अपराध अपराध में भेद भाव क्य़ों ?
Sunday, December 15, 2013
पांडव केवल अपने को ईमानदार नहीं समझते थे और न ही उन्होंने ईमानदारी की कोई टोपी लगा रखी थी फिर भी उनकी ईमानदारी की मिशाल आज तक दी जाती है उन्होंने तो भिक्षा के सहारे जीवन यापन की बात तक सोच ली थी किन्तु भाइयों से युद्ध टालना चाहते थे फिर भी माता की बात मान कर उन्होंने राज्याधिकार के लिए अपना रुख शक्त किया था! किन्तु यहाँ अरविन्द जी के विरोध में ऐसी हवा बनती दिख रही है कि जैसे अरविन्द केजरीवाल एवं उनकी सारी रामलीला मंडली जो सारी बातें अब कह रही है वो एक नई आशंका को जन्म दे रही हैं ।
अब ऐसा लगने लगा है कि आम आदमी पार्टी सत्ता के लिए बहुत परेशान है उसकी बेचैनी इस बात से भी समझ में आ रही है कि दुर्योधनी अहंकार में डूबे इन सत्तालु लोगों ने उस समय सीधे साधे अन्ना हजारे को बरगलाकर जन लोक पाल के नाम पर उनसे ऐसी ऐसी शर्तें रखवाई थी जिनका एक बार में ही पालन सम्भव न था ये उस तरह का प्रयोग है कि न शर्तें पूरी होंगी और न लोकपाल बन पाएगा औरयदि ऐसा न हो पाया तो हम लोग सभी राजनैतिक दलों को चोर चोर चिल्लाएँगे जनता उस पर भरोसा कर लेगी और आम आदमी पार्टी जीत जाएगी !सम्भवतः इसीलिए अन्ना हजारे,किरण वेदी आदि की परवाह न करते हुए वो प्रयोग दिल्ली चुनावों में इन्होंने किया भी जिसमें वे सफल भी हुए! अब इसके बाद वो सफलता इनसे सँभाली नहीं जा रही शर्तों के लती इन शर्तासुरों ने लोकपाल की ही तरह ही फिर न पूरी होने वाली अठारह शर्तें रखीं यहाँ भी वही भावना कि जो पार्टी इन्हें अपना समर्थन देना चाहे वो पहले मुद्दों सहित अपनी आत्म हत्या कर ले इसके बाद इन शर्तासुरों को समर्थन दे ऐसा कोई क्यों करे किसी की क्या मजबूरी है लिहाजा प्रदेश दूसरे चुनावी खर्चों से जूझने के लिए तैयार है यदि दूसरे चुनावों में भी निर्णय न हो सका तो तीसरा आदि आदि !क्या यह व्यवहारिक है ?
अन्ना हजारे की परवाह न करते हुए जैसे इन्होंने राजनैतिक पार्टी बना ली चुनाव लड़ा फिर किरण वेदी की सरकार बनाने सम्बन्धी सलाह को न मानना,प्रशांत भूषण कि बात को उनकी निजी राय
जिससे करने उनके आचरण और व्यवहार
अब ऐसा लगने लगा है कि आम आदमी पार्टी सत्ता के लिए बहुत परेशान है उसकी बेचैनी इस बात से भी समझ में आ रही है कि दुर्योधनी अहंकार में डूबे इन सत्तालु लोगों ने उस समय सीधे साधे अन्ना हजारे को बरगलाकर जन लोक पाल के नाम पर उनसे ऐसी ऐसी शर्तें रखवाई थी जिनका एक बार में ही पालन सम्भव न था ये उस तरह का प्रयोग है कि न शर्तें पूरी होंगी और न लोकपाल बन पाएगा औरयदि ऐसा न हो पाया तो हम लोग सभी राजनैतिक दलों को चोर चोर चिल्लाएँगे जनता उस पर भरोसा कर लेगी और आम आदमी पार्टी जीत जाएगी !सम्भवतः इसीलिए अन्ना हजारे,किरण वेदी आदि की परवाह न करते हुए वो प्रयोग दिल्ली चुनावों में इन्होंने किया भी जिसमें वे सफल भी हुए! अब इसके बाद वो सफलता इनसे सँभाली नहीं जा रही शर्तों के लती इन शर्तासुरों ने लोकपाल की ही तरह ही फिर न पूरी होने वाली अठारह शर्तें रखीं यहाँ भी वही भावना कि जो पार्टी इन्हें अपना समर्थन देना चाहे वो पहले मुद्दों सहित अपनी आत्म हत्या कर ले इसके बाद इन शर्तासुरों को समर्थन दे ऐसा कोई क्यों करे किसी की क्या मजबूरी है लिहाजा प्रदेश दूसरे चुनावी खर्चों से जूझने के लिए तैयार है यदि दूसरे चुनावों में भी निर्णय न हो सका तो तीसरा आदि आदि !क्या यह व्यवहारिक है ?
अन्ना हजारे की परवाह न करते हुए जैसे इन्होंने राजनैतिक पार्टी बना ली चुनाव लड़ा फिर किरण वेदी की सरकार बनाने सम्बन्धी सलाह को न मानना,प्रशांत भूषण कि बात को उनकी निजी राय
जिससे करने उनके आचरण और व्यवहार
Friday, December 13, 2013
अरे!अन्ना के समर्थकों "जागते रहो"कहीं टीम अरविन्द आ न जाए !
| म |
अब सामने आया राष्ट्र समर्पित अन्ना का अन्नात्व जब दुदकारा गोपालराय के राजनैतिक अरविंदत्व को !
अपने मन पर पड़े बोझ को अकारण ढो रहे अन्ना ने इसी बहाने अचानक फ़ेंक कर अच्छा किया कम से कम अपना हृदय तो हल्का कर लिया !बधाई हो अन्ना जी को !!!
उचित भी है कि अन्ना के अहिंसक एवं गैर राजनैतिक आंदोलन की स्वच्छ छवि को ईमानदार वाद के स्वयंभू मसीहा दागदार करने में लगे हुए हैं। वास्तव में भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई यदि अन्ना जी लड़ने में लगे हुए हैं तो किसी दम्भी ईमानदारवादी को अन्ना के अनशन स्थल पर जाने की जरूरत क्या है यदि उसे वहाँ की भाषा एवं भाषण पसंद नहीं हैं तो ?अन्ना जीवन के चौथे पन में चल रहे हैं अपनी शादी वेष भूषा तथा रहन सहन एवं भाषाई शालीनता से वो बड़ों बड़ों को अपने विचारों से प्रभावित कर लेते हैं। सफेद कपड़ों में रहकर भी बिना किसी आडंबर के अन्ना ने अपना ऋषित्व सिद्ध किया है जब तेरह दिनों के अनवरत अनशन के बाद भी उनकी शारीरिक एवं भाषाई ओजस्विता बरकार रही थी सारे विश्व ने अन्ना के उस शालीन भाषण को सुना था जिसमें उन्होंने सत्ता सलभ नेताओं को देश हित में काम करने के लिए ललकारा था । ये उनका योग एवं तपस्या ही है!जबकि ऋषित्व एवं योगीत्व के बड़े बड़े ठेकेदार अन्ना की नक़ल करते हुए अनशनी आडम्बर तो करने लगते हैं किन्तु उनमें न बोलने की शालीनता और न ही सहन शीलता ऐसे लोगों का अनशन न केवल बीच में ही टूट जाता है अपितु इन्हें प्राण रक्षा के लिए भी डाक्टरों की शरण लेनी पड़ती है।
खैर , अन्ना एक साधक आदमी हैं उन्हें चाहिए कि राजनीति से दूरी बनाए ही रहें अन्यथा उनके पुराने साथी लोग अन्ना के साथ सम्मिलित होकर अन्ना की नक़ल करते हुए एक अनशनी आडम्बर का आयोजन तो कर लेंगे किन्तु ऐसे घाल मेल से अन्ना एवं उनका अन्नात्व कहीं राजनैतिक अरविंदत्व में ओझल न हो जाए मुझे डर है !
जनरल साहब का भाषण वहाँ बैठे किसी एक अधकचरे नेता को पचा नहीं, परिणाम स्वरूप जो कुछ हुआ यह सब देखकर मुझे आशंका होती है कि कहीं अन्ना के अनुयायिओं को भ्रमित करने की यह कोई कोशिश तो नहीं है!
इस विषय से सम्बंधित एक बात याद आती है ,जो लोग ग्रामीण जीवन से सम्बंधित रहे हैं वो जानते होंगे कि गाँवों में लोग हरी हरी घास की रस्सी बना लिया करते थे जो समय समय पर उनके काम आया करती थी एक अंधे सज्जन घास की रस्सी बनाते जा रहे थे उनके पास बाँधा गया भैंस का बच्चा उस रस्सी को खाता जा रहा था उन सज्जन को दिखाई तो पड़ता नहीं था इस प्रकार से जितनी रस्सी बनी वो पाड़ा खाता गया !
इसी प्रकार से अन्ना जी में चालाकी चतुराई है नहीं, वो त्याग तपस्या से जो जन जागरण कर पाते हैं राजनैतिक भावना से जुड़े लोग उसकी पार्टी बना डालते हैं फिर जब अन्ना अनशन करते हैं तो फिर वही राजनैतिक पाड़ा लोग टोपी लगा लगा कर वहाँ भी पहुँचने लगते हैं जो अन्ना जी के लिए अच्छा नहीं है।आज की तरह ही अन्ना को चाहिए कि वे इन्हें दुदकारते भगाते रहें अन्यथा अन्ना का त्याग तपस्या और बलिदान ये लोग उसी भैंस के बच्चे की तरह सब चर जाएँगे!
इसलिए अन्ना के समर्थक सभी लोगों से मेरा निवेदन है कि अरे!अन्ना के समर्थकों "जागते रहो"!!!कहीं टीम अरविन्द आ न जाए !
Wednesday, December 11, 2013
आप से सीखने की जरुरत: राहुल गांधी
आपसे से क्या सीखेंगे आप ?अभी तक वो स्वयं ही भटक रही है !वैसे भी आपको पता सब कुछ है केवल अमल करने में चूक गए -
सीखना तो सारे जीवन ही होता है किन्तु जो जनता ने अबकी सिखाया है शायद ही कभी भूले । अभी भी सुधरने का समय है इस संसार में सुधरे बिना किसी का गुजारा नहीं होता है आप भी सुधर जाओ अपनी पार्टी वालों को भी समझा दो ---
"ये आशा या सलाह ठीक नहीं है न ही यह सोचना ही ठीक है कि थोड़े दिन विपक्ष में बैठने से जनता धीरे धीरे सब कुछ भूल जाएगी ।
अभी तो काँग्रेस को केवल सहना ही सहना है और पिछली लापरवाही के ही परिणाम अभी तो भोगने होंगे ! और इतना सुधार करना होगा कि काँग्रेस पार्टी में जो लोग जिस लायक नहीं हैं उनकी उन पदों पर प्रतिष्ठा करके उनकी आरती पूजा करने की परंपरा बंद होनी चाहिए । चतुर चाटुकारों का बर्चस्व घटना ही चाहिए ! जहाँ तक आमूल चूल परिवर्तन करने की बात है काँग्रेस में वो किसी के बश का नहीं है क्योंकि जिस स्तर से गलतियाँ हो रहीं हैं उन्हें बदलेगा कौन ? उन्हें भी पुजाने एवं चाटुकारों से घिरे रहने की आदत छोड़नी चाहिए !!!"
'"आप' के नवनिर्वाचित विधायक धर्मेंद्र सिंह कोली पर लगा छेड़छाड़ का आरोप"
राजनीति का अर्थ ही राजाओं के सामान सुख सुविधा भोगने की भावना आदि आदि! जिसमें राजाओं को तो कभी कभी युद्ध भी लड़ने होते थे जबकि राजनीति तो पूरी तरह सेफ है यहाँ और काम ही क्या है कभी कोई किसी पर आरोप लगाए कभी कोई किसी पर !मीडिया में ख़बरें बनती हैं प्रसिद्धि बढ़ती है बाद में जांच होती है फिर क्लीन चिट दे दी जाती है वैसे भी आम आदमी पार्टी तो आपनी जांच भी खुद ही कर लेती है वहाँ वो झंझट भी नहीं है वहाँ तो क्लीन चिट अपनी ही है चाहें जितनी जिसको बाँटें वो भी अपनों के लिए क्या कमी है क्लीन चिटों की ?
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